बुधवार, मार्च 17, 2010

न्यायिक सुधारों की दिशा में जड़ों से सुधार की ज़रुरत

न्यायिक सुधारों की दिशा मे जड़ से ही सुधार हो
वीरेन्द्र जैन
अभी सरकारी अधिकारियों, चुनाव लड़ने वालों, मंत्रियों, सांसदों विधायकों आदि जन प्रतिनिधियों के साथ न्यायधीशों की सम्पत्ति की घोषणा से सम्बन्धित बहस शांत ही नहीं हुयी थी कि न्यायिक सुधारों से सम्बन्धित नये विधेयक की सुगबुगाहट सुनाई देने लगी है। इस सम्भावित विधेयक के अनुसार न केवल न्यायधीशों के आचरणों को ही नियंत्रित करने का ही प्रयास होगा अपितु किसी प्रकरण में फैसला भी अनावश्यक समय के लिये टाला नहीं जा सकेगा। इतना ही नहीं उक्त निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिये जाँच समिति और निगरानी समिति भी स्थापित किये जाने की व्यवस्था की गई है। उक्त विधेयक के प्रस्तावों की जिस व्यापक स्तर पर सराहना की जा रही है उससे पता चलता है कि न्याय व्यवस्था में सुधारों के लिये लोग कितने बेचैन थे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि देश में तेजी से फैल रहे अपराध और हिंसा के पीछे अपराधियों में न्याय का भय समाप्त हो जाने और आम नागरिकों द्वारा शीघ्र, स्वच्छ, तथा निष्पक्ष न्याय की उम्मीद खत्म हो जाने की प्रमुख भूमिका रही है। सम्पन्न अपराधियों को प्राप्त सुविधाओं की तुलना में राज्य सरकारों के अधीन काम कर रहे अभियोजन विभाग् के पास ज़रूरी कानूनी लाइब्रेरी से लेकर उपयुक्त चेम्बर तक उपलब्ध नहीं होते। इनमें से बहुत सारे अपने आप को जनता का नहीं अपितु राज्य सरकार की सत्तारूढ पार्टी का वकील समझते हैं [ सन्दर्भ मध्य प्रदेश के सव्वरवाल प्रकरण में न्यायाधीश की टिप्पणी, और गुजरात नर संहार के आरोपियों का छूटना],। जिन प्रकरणों में सज़ा की सम्भावना होती है, उनमें भी अपराधियों के वकील न्याय को विलम्बित कराने और बाद में उच्च न्यायालय आदि में अपील के सहारे अपराधियों की सजाओं को टालते रहने के बाद मुज़रिम की उम्र की दुहाई देकर उसकी सज़ा कम करने की मांग करते हैं। इस बीच अपराध करने वाले समाज में अपने पूरे आतंक के साथ घूम कर राजनीति में भाग लेते हुये मंत्रियों के पद तक पहुँच, न्याय में अनास्था पैदा करते रहते हैं। यदि सचमुच ही सरकार का इरादा न्याय में सुधार करने का है तो उसे सबसे पहले कानून बनाने वाली विधायिका के सदस्यों को न्याय मिलना सुनिश्चित करना चाहिये। 2009 में हुये लोकसभा चुनाव में 50% से अधिक उम्मीदवार, और चुने गये सदस्य ऐसे हैं जिन पर आपराधिक प्रकरण दर्ज़ हैं जिनमें हत्या, हत्या का प्रयास, बलात्कार, चोरी, डकैती, बलवा, सरकारी काम में दखलन्दाज़ी, आदि आरोप हैं। यही हाल विधान सभाओं का भी है। एक सांसद को ही प्रतिमाह वेतन के रूप में बारह हजार रूपये संसदीय क्षेत्र भत्ते के रूप में दस हजार रूपये कार्यालय भत्ते के रूप में चौदह हजार रूपये, यात्रा भत्ते के रूप में अड़तालीस हजार रूपये(तक) तथा संसद चलने वाले दिनों में प्रति दिन पाँच सौ रूपये का भत्ता नकद मिलता है। उन्हें देश में कहीं भी कभी भी किसी भी ट्रेन में प्राथमिकता के आधार पर पत्नी या पीए क़े साथ प्रथमश्रेणी वातानुकूलित दर्जे में मुफ्त यात्रा की सुविधा दी गयी है। वे साल में चालीस हवाई यात्राएं भी मुफ्त कर सकते हैं। उन्हें सालाना पचास हजार यूनिट तक बिजली मुफ्त मिलती है व एक लाख सत्तर हजार टेलीफोन काल्स मुफ्त करने की सुविधा प्राप्त है तथा एमटीएनएल की मोबाइल सुविधा भी उपलब्ध है। विधायकों को भी लगभग ऐसी ही सुविधाएं उनके क्षेत्र के अनुपात में उपलब्ध हैं। दिल्ली में सोलह वीआईपी एक सौ बावन एकड़ जमीन में रहते हैं जबकि गैर वीआईपी क्षेत्र में इतनी जमीन पर दस लाख लोग रहते हैं। इस पर भी [वामपंथियों को छोड़कर] सांसद इन सुविधाओं को कम समझते हैं और इन्हें और बढाने के लिए लगातार इस आधार पर प्रस्ताव लाते रहते हैं कि यह राशि कम है और उनकी हालत दयनीय है। वैसे चुनाव आयोग द्वारा संपत्ति की घोषणा करने का कानून बना दिये जाने के बाद देश वासी यह जान गये हैं कि हमारे कुल सांसदों में पचास प्रतिशत से अधिक की सम्पत्ति पचास लाख रूपयों से अधिक की है और तीन सौ से अधिक लोकसभा सदस्य तो स्वयं की घोषणा के अनुसार ही करोड़पति हैं। इसके बाद भी उन्हें पेंशन, सस्ती दरों पर प्लाट मुफ्त स्वास्थसेवा आदि जीवन भर लगी रहने वाली अन्य सुविधाएं भी हैं भले ही उस सांसद ने कुल एक दिन ही सदन में भाग लिया हो।
जब इन सदस्यों को इतनी सुविधायें देना ज़रूरी समझा गया है तो कम से कम इतना तो और किया ही जा सकता है कि इन्हें त्वरित न्याय दिलाये जाने की व्यवस्था की जाय। किसी भी सदन का सदस्य चुने जाते ही उसके सारे प्रकरण एक विशेष न्यायालय को सौंप दिये जायें जो दैनिक आधार पर उन पर लगाये आरोपों की सुनवाई करे तथा तय समय में अपना फैसला देकर जनता के प्रतिनिधियों को उचित न्याय दे। बीच में अवकाश का समय आने के कारण जो कार्य व्यवधान आता है उसे भी विशेष कार्यक्रमों के द्वारा पूरा किया जा सकता है ताकि सांसद निर्भय होकर अपना कार्य सम्पादन करें।
न्याय व्यवस्था में एक बड़ा व्यवधान गवाहों के खरीदे जाने और उनके बयान पलटने के कारण आता है। इसे रोकने के लिये भी सख्त कानून बनाना ज़रूरी है। अदालतों को पलटे हुये गवाहों के प्रति कठोरता का व्यवहार करना चाहिये। गवाह लालच या भय के कारण ठीक गवाही के दिन पलट जाते हैं आउर कहते हैं कि पुलिस ने उनका गलत बयान दर्ज़ कर लिया, जिससे पुलिस हतप्रभ रह जाती है। सारे पलटे गवाहों से कठोरतापूर्वक पूछा जाना चाहिये कि आखिर उन्हें कब पता चला कि पुलिस ने षड़यंत्र करके उसके बयानों को गलत तरीके से न्याय के आगे प्रस्तुत किया है। उस गवाह से यह भी पूछा जाना चाहिये कि क्या वह व्यक्ति घटनास्थल पर सचमुच उपस्तिथ था?, उसने गवाही दी या नहीं, यदि दी तो उसका बयान क्या था? यदि वह सिरे से ही उपस्थित नहीं था तो सम्बन्धित पुलिस अधिकारी से उसकी ऐसी क्या दुश्मनी है कि वह गलत गवाही के मामले में फँसाने के लिये उसी का चयन करे। यदि अदालत सचमुच पलटे हुये गवाह के बयान से संतुष्ट है तो उसे उस पुलिस अधिकारी के खिलाफ उचित दण्ड देना चाहिये जिसने किसी मासूम को गलत गवाही का शिकार बनाया और अदालत का समय नष्ट किया। यदि अपराध घटित हुआ है और प्रकरण अदालत तक पहुँचा है तो तय है कि किसी न किसी स्तर पर गलत बयानी तो की ही जा रही है, इसलिये अदालतों को सरकार से लेकर जाँच अधिकारी तक किसी न किसी की कमी पर तो दण्ड देना ही चाहिये भले ही वह दण्ड प्रतीकात्मक ही क्यों न हो। जब ऐसा होने लगेगा तब प्रकरण भी लम्बित नहीं होंगे और अपराधी से लेकर पुलिस और अभियोजन तक सब में चुस्ती आयेगी।
आर्थिक अपराधियों को सामाजिक अपराधियों की तुलना में कम अपराधी माने जाने की परम्परा है जबकि आर्थिक अपराधी पूरे देश का नुकसान करता है, और उसी के साये में सामाजिक अपराधी पनपते हैं। इसलिये आर्थिक अपराधियों को न केवल त्वरित दण्ड दिया जाना चाहिये अपितु उन्हें निगरानी में रखा जाना चाहिये व अपराध के दुहराव पर उसके दण्ड को कई गुना बढा देना चाहिये क्योंकि वे अपने अवैध पैसे की दम पर न्याय व्यवस्था को भ्रष्ट करने का प्रयास भी करते हैं, जिससे पूरा न्याय तंत्र प्रभावित होता है।
जिस दिन जड़ से सुधार प्रारम्भ हो जायेगा उस दिन न केवल लम्बित मामले ही घटने लगेंगे अपितु झूठे मुकदमे दायर करने से भी लोग डरेंगे।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

2 टिप्‍पणियां:

  1. लेख बढ़िया है लेकिन " सन्दर्भ मध्य प्रदेश के सव्वरवाल प्रकरण में न्यायाधीश की टिप्पणी, और गुजरात नर संहार के आरोपियों का छूटना]" इसके अलावा आपको कुछ और दिखाई क्यों नहीं देता.

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  2. @प्रिय भाई या बहिन भारतीय नागरिक जी
    आपको यह पोस्ट पसन्द आयी इसके लिये धन्यवाद. मुझे दो आँखों से भी एक ही चीज दिखने की बीमारी है और मुझे जो सामने होता है वही दिखता है . जैसे मुझे बहुत कोशिश के बाद भी आप नहीं दिखते आपका छद्म नाम भर दिखता है। पर कुछ काम आप भी कीजिये और जो कुछ आपको दिखता है उसे भी सामने ले आइये भले ही इसी पोस्ट पर ही ले आइये।

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