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गुरुवार, जून 28, 2018

श्रद्धांजलि हिन्दुस्तानी के सबसे बड़े हास्य लेखक थे मुस्ताक अहमद यूसिफी


श्रद्धांजलि
हिन्दुस्तानी के सबसे बड़े हास्य लेखक थे मुस्ताक अहमद यूसिफी  
वीरेन्द्र जैन













मैं अपने को हिन्दी हास्य व्यंग्य का ठीकठाक पाठक मानता हूं और उसके आधार पर कह सकता हूं कि उर्दू के लेखक मुस्ताक अहमद यूसिफी के बराबर का हास्य लेखक  अब तक मेरी नजरों से नहीं गुजरा। यह भी तब जब कि मैंने उन्हें केवल उस सब कुछ के माध्यम से जाना है जो देवनागरी में प्रकाशित हुआ है। मैंने इस विषय के अन्य अध्येताओं से भी बात की और वे सभी मेरी बात से सहमत थे। वे ऐसे लेखक थे जो पाकिस्तान में अविभाजित हिन्दुस्तान का प्रतिनिधित्व करते थे। उनके पूरे लेखन से आप पता ही नहीं लगा सकते कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान अलग अलग मुल्क हो चुके हैं। साहित्य से जुड़े जितने भी पाकिस्तान के श्रेष्ठ सम्मान हैं वे सब उन्हें मिले हैं, जैसे 1999 में पाकिस्तान के प्रैसीडेंट द्वारा सितारा-ए- इम्तियाज, 2002 में पाकिस्तान के प्रैसीडेंट द्वारा हिलाल-ए- इम्तियाज, कायदे आज़म मैमोरियल मैडल, 1990 में श्रेष्ठ किताब के लिए दिया जाने वाला पुरस्कार पाकिस्तान अकादमी आफ लैटर्स, हिजरा अवार्ड, व अदमजी अवार्ड फर बैस्ट बुक, आदि।  ऐसा कैसे सम्भव हो सका यह बात उनके जीवन परिचय को पढ कर समझ में आ जाती है।
यूसिफी जी का जन्म 4 सितम्बर 1923 को राजस्थान के टोंक में हुआ था। उनके पिता पठान थे और यूसुफजई जनजाति से आते थे। उनकी वंश परम्परा उन लोगों से जुड़ती है जो महमूद गज़नवी के साथ इस क्षेत्र में आये थे और लम्बे समय तक शासक वर्ग से सम्बन्धित रहे।  उनके पिता जो जयपुर के पहले पढे लिखे मुसलमान थे पहले जयपुर नगर निगम के चेयरमैन और बाद में जयपुर विधानसभा के अध्यक्ष रहे। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा राजपूताने में हुयी तथा बाद में उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से बीए किया। आगे उन्होंने अलीगढ मुस्लिम यूनीवर्सिटी से फिलोस्फी में एमए और एलएलबी किया। विभाजन के बाद उनका परिवार कराची में रहने लगा था। 1950 में उन्होंने मुस्लिम कामर्सियल बैंक में सेवायें प्रारम्भ की और डिप्टी जनरल मैनेजर हो गये। 1965 में वे एलाइड बैंक लिमिटेड में मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त हुये। 1974 में वे यूनाइटिड बैंक लि. के प्रैसीडेंट बने, व 1977 में पाकिस्तान बैंकिंग काउंसिल के चेयरमैन चुने गये। अपनी श्रेष्ठ बैंकिंग सेवाओं के लिए उन्हें कायदे आज़म मैमोरियल मैडल प्रदान किया गया।
एक बार में मुम्बई गया तो रामावतार चेतन ने कहा कि शरद जोशी से मिल कर अपनी किताब दे आना। मैंने यही किया तो शरद जी ने पूछा कि मुम्बई कैसे आये थे। मैंने कहा कि यूं ही बिना किसी काम के आया था। वे बोले कि आते रहना चाहिए। क्योंकि जीवन शैली का जो कंट्रास्ट सामने आता है वह व्यंग्य को बल देता है। उन्होंने मुम्बई और भोपाल के आदमी की गति के अंतर का रोचक चित्रण कर के समझाया। जिसके जीवन में जितनी विविधता होगी उसका व्यंग्य भी उतना ही तेज होगा।
यूसिफी जी ने अध्य्यन, और नौकरी में जितनी विविधिता का सामना किया उन्हें उतने ज्यादा चरित्र मिले। कानपुर की ग्वालिन से लेकर अमृतसर के सिखों, व वलूची पठानों से लेकर मुहाजिरों तक के वर्णन बताते हैं कि उन्होंने कितनी निरपेक्षता के साथ सूक्ष्म निरीक्षण किया हुआ है। हास्य व्यंग्य के लेखक को जनक जैसे सन्यासी की तरह समस्त रागों से असम्पृक्त होकर देखना होता है। उनके छोटे छोटे वाक्यों में जो चुटीले जुमले होते हैं, वे मुस्कराने और खिलखिलाने के लिए विवश कर देते हैं। मजहबियों पर कुछ उदाहरण देखिए-
·        जो मुल्क जितना गरीब होगा, उतना ही आलू और मजहब का चलन ज्यादा होगा
·        मुसलमान किसी ऐसे जानवर को मुहब्बत से नहीं पालते जिसे जिबह करके खा न सकें।

·        नाई की जरूरत सारी दुनिया को रहेगी जब तक कि सारी दुनिया सिक्ख धर्म ना अपना ले और सिक्ख ऐसा कभी होने नहीं देंगे।

·        इस्लाम के लिए सबसे ज्यादा कुर्बानी बकरों ने दी है।

·        इस्लाम की दुनिया में आज तक कोई बकरा स्वाभाविक मौत नहीं मरा

·        कुछ लोग इतने मजहबी होते हैं कि जूता पसन्द करने के लिए भी मस्जिद का रुख करते हैं

वैवाहिक सम्बन्धों और प्रेम से सम्बन्धित कुछ जुमले देखिए –
·        हमारे जमाने में तरबूज इस तरह खरीदा जाता था जैसे आजकल शादी होती है, सिर्फ सूरत देख कर।
·        जो ज़हर देकर मारती तो दुनिया की नजर में आ जाती, अन्दाज-ए-कातिल तो देखो, हमसे शादी कर ली.
·        मर्द की आंख और औरत की जबान का दम सबसे आखिर में निकलता है
·        उस शहर की गलियां इतना तंग थीं कि अगर मुख्तलिफ जिंस आमने-सामने आ जायें तो निकाह के अलावा कोई गुंजाइश नहीं रहती.
·        मुहब्बत अंधी होती है, लिहाजा औरत के लिए खूबसूरत होना जरूरी नहीं, बस मर्द का अंधा होना काफी होता है।
·        बुढ़ापे की शादी और बैंक की चौकीदारी में जरा भी फर्क नहीं, सोते में भी एक आंख खुली रखनी पड़ती है।
कुछ अन्य उदाहरण देखिए-

·        लफ्जों की जंग में फतह किसी भी फरीक की हो, शहीद हमेशा सच्चाई होती है।
·        दुश्मनों के तीन दर्जे हैः दुश्मन, जानी दुश्मन और रिश्तेदार।
·        आदमी एक बार प्रोफेसर हो जाए तो उम्र भर प्रोफेसर ही रहता है, चाहे बाद में समझदारी की बातें ही क्यों ना करने लगे।
·        सिर्फ 99% पुलिस वालों की वजह से बाकी एक प्रतिशत भी बदनाम हैं।

हिन्दी में लफ्ज़ सम्पादक तुफैल चतुर्वेदी ने न केवल उनकी पुस्तकों के अनुवाद ही किये हैं अपितु उन्हें प्रकाशित भी किया है। ये किताबें हाथों हाथ बिक भी गयीं। उनकी 1961 में किताब ‘चिराग तले’ आयी तो 1969 में ‘खाकम बा दहन’ 1976 में ‘जर्गुरस्त’ तो 1990 में ‘आब-ए-गुम’ , 2014 में ‘शामे-ए- सैरे यारां’ आयी।अनेक पुस्तकों के अनुवाद अंग्रेजी व अन्य भाषाओं में हुये हैं। स्वस्थ होने और समय रहते वे सेमिनारों और विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रमों में भागीदारी करते रहे।  
गत 20 जून 2018 को वे नहीं रहे और उर्दू व हिन्दी का या कहें कि हिन्दुस्तानी भाषा और संस्कृति का बहुत बड़ा लेखक विदा हो गया। 
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629


 



शुक्रवार, दिसंबर 06, 2013

संस्मरण के. पी. सक्सेना लेखक नहीं लिक्खाड़ थे

संस्मरण
के. पी. सक्सेना लेखक नहीं लिक्खाड़ थे
वीरेन्द्र जैन
के.पी.सक्सेना नहीं रहे। उनके स्वास्थ के बारे में चिंतित कर देने वाली खबरें बहुत दिनों से आ रही थीं। प्रमुख रूप से वे पत्र पत्रिकाओं के व्यंग्य लेखक के रूप में जाने जाते रहे पर उन्होंने जब भी लिखने का जो लक्ष्य बनाया उसमें सफलता पायी। पत्रिकाओं में निरंतर सक्रिय लेखन की ललक मुझे उनके लेखन से ही मिली और इस तरह वे मेरे मार्गदर्शक रहे। उनके लेखन की मात्रा, विषय वैविध्य और निरंतरता को देख कर आश्चर्य और ईर्षा होती थी।
      एक छोटे ‘ए’ क्लास बैंक हिन्दुस्तान कमर्सियल बैंक में नौकरी करते हुये देश के कोने कोने में पन्द्रह साल के दौरान मेरे दस ट्रासफर हुये, क्योंकि इस बैंक में अधिकारियों के ट्रांसफर पूरे देश में कहीं भी हो सकते थे। इसी काल में मुझे एक बार हरदोई जिले के बेनीगंज में पदस्थ होना पड़ा जो लखनऊ के निकट था, अतः मेरी शनिवार की शाम और रविवार लखनऊ में ही गुजरता था। उस दौर के लखनऊ के समकालीन लेखकों में के पी का नाम सर्वाधिक चमकीला नाम था। वे अमीनाबाद के पास गुईन रोड पर किराये से रहते थे। लखौरी ईंटों से बना वह बड़े दरवाजे वाला घर था। उनसे पहली मुलाकात करने से पहले मैंने उन्हें जो पत्र लिखा था उसे न मिलना उन्होंने बताया था, पर उसके बाद भी मेरे नाम और लेखन से परिचित होने की जानकारी देकर उन्होंने थोड़ा सुख दिया था जिससे उनके साथ जल्दी सहज हो सका था। बाद में उन्होंने ही मुझे सूर्य कुमार पान्डेय और अनूप श्रीवास्तव आदि से मिलवाया था जिनसे बाद में लम्बा सम्पर्क और मित्रता रही। अभी बाद के दिनों में वे रामनगर में रहने लगे थे जहाँ उनके पड़ोस में नागरजी के पुत्र का मकान था और कभी कभी नागरजी भी वहाँ आते रहते थे। एक बार वे मुझे नागरजी से मिलवाने भी ले गये थे।
      वे उन दिनों लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर स्टेशन मास्टर थे और देश के प्रमुख राज्य की राजधानी के प्रमुख स्टेशन पर कार्यरत रहते हुए भी विपुल लेखन करते थे। उन दिनों आरक्षण की आज जैसी सुविधा नहीं थी तथा मुझे ट्रेन में स्थान दिलाने की व्यवस्था उन्होंने दर्ज़नों बार की। वे यह बताना भी नहीं भूलते थे कि उनके कार्यालय की जिस कुर्सी पर मैं बैठा हूं उसी पर परसों कमलापति त्रिपाठी बैठे थे। ऐसी बातें सुन कर गर्व होता था। उन्होंने मुझे यह भी बताया था कि इतना लेखन करने के बाद भी उन्होंने कभी लेखन के लिए नौकरी से छुट्टी नहीं ली। धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, नवनीत, माधुरी आदि उस समय की राष्ट्रव्यापी लोकप्रिय पारिवारिक पत्रिकाएं थीं जिनके होली. दिवाली, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, आदि अवसरों पर निकलने वाले विशेषांक के पी की रचनाओं के बिना पूरे नहीं होते थे। वे लखनऊ के दो प्रमुख दैनिक अखबारों में साप्ताहिक स्तम्भ लिखा करते थे, और देश भर की हिन्दी की प्रमुख पत्रिकाओं की माँग को पूरा करते थे। जब दूरदर्शन और इतने सारे प्राईवेट चैनल नहीं थे तब आकाशवाणी के हास्य व्यंग्य के रेडियो नाटक बहुत चाव से सुने जाते थे और के पी उनके प्रमुख लेखकों में से एक थे। बाद में उन्होंने टीवी के लिए भी लिखा। हास्य व्यंग्य के नाटकों के अलावा उन्होंने कुछ गम्भीर नाटक भी लिखे हैं जिनमें से एक पर कभी मेरे अनुजसम मित्र इंजीनियर राजेश श्रीवास्तव ने लघु फिल्म बनानी चाही थी। उनसे अनुमति लेने के लिए हम लोग उनके ग्वालियर प्रवास के दौरान प्रदीप चौबे के निवास पर गये थे पर उन्होंने यह कहते हुए अनुमति देने में असमर्थता व्यक्त की थी क्योंकि उस नाटक पर फिल्मांकन की अनुमति वे पहले ही ओमपुरी को दे चुके थे। उस नाटक के कई भाषाओं में हुए अनुवाद और उसके प्रभाव में घटित घटनाएं भी उन्होंने विस्तार से बतायी थीं जिससे उनके व्यक्तित्व के कुछ अनछुये पहलू ज्ञात हुये थे। शरद जोशी के साथ उन्होंने भी कवि सम्मेलनों में गद्य व्यंग्य पाठ प्रारम्भ किया था और अपने क्षेत्र में वर्षों सक्रिय रहे।
      बाद में वे फिल्म लेखन से जुड़े और लगान जैसी बहुचर्चित और बहुप्रशंसित फिल्म भी लिखी जो अनेक राष्ट्रीय पुरस्कार लेने के साथ आस्कर पुरस्कार तक के लिए नामित हुयी थी। पिछले दिनों में कादम्बिनी के पुराने अंक पलट रहा था तो एक अंक में मुझे केपी सक्सेना का नींबू के गुणों पर लिखा एक लेख मिला। उससे मुझे याद आया कि उन्होंने धर्मयुग में रेलवे गार्डों की चुनौतीपूर्ण कार्यपद्धति से लेकर ‘शरबत का मुहर बन्द गिलास- दशहरी आम’ तक पर मुख्य लेख लिखा था। वे वनस्पति शास्त्र में स्नातकोत्तर थे।
      लखनऊ के दौरान हुयी मुलाकातों के दौर में एक बार उन्होंने कहा था कि वे ऐसे किसी पत्र पत्रिका के लिए नहीं लिखते जो लेखक को पारिश्रमिक नहीं देती। उनका कहना था कि पत्रिका प्रकाशन के क्षेत्र में प्रकाशक को कागज़ वाला मुफ्त में कागज़ नहीं देता, कम्पोज़िंग सैटिंग वाला मुफ्त में काम नहीं करता, मुद्रक अपनी दर से भुगतान लेता है, डाकवाले अपना पूरा शुल्क वसूलते हैं और हाकर अपना कमीशन लेते हैं, तो फिर लेखक ही ऐसा क्यों रहे जो मुफ्त में अपनी रचना दे, और अपना अवमूल्यन कराये। उनके इन विचारों के प्रभाव में मैंने भी कई वर्षों तक ऐसी किसी पत्रिका के लिए नहीं लिखा जिसके परिणाम स्वरूप साहित्यिक [लघु] पत्रिकाओं से कटा रहा।
      एक बार वे अमीनाबाद में एक पत्रिका की दुकान पर अचानक मिल गये और तपाक से बोले कि बहुत दिनों से तुम्हरी कोई रचना नहीं पढी, आजकल कहाँ व्यस्त हो! विडम्बना यह थी कि उस सप्ताह और माह की अनेक प्रमुख पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं प्रकाशित थीं जिन्हें मैंने वहीं दिखा भी दीं। फिर हँसते हुए बोले कि बुरा मत मानना मैं लिखने और नौकरी में इतना व्यस्त रहता हूं कि दूसरों की रचनाएं कम ही पढ पाता हूं, अब ये सारी रचनाएं पढूंगा।
      उनकी हस्तलिपि बहुत सुन्दर थी। बिल्कुल टंकित से छोटे सुन्दर और साफ स्पष्ट अक्षरों से उनका लिखा अलग से पहचाना जा सकता था। अपनी व्यस्तताओं के बाद भी वे पत्रों के उत्तर देने का समय निकाल लेते थे। उनके व्यंग्यों में लखनऊ की तहज़ीब उफनती थी जिनमें मिर्ज़ा नामक एक पात्र तो लखनऊ की मिलीजुली संस्कृति और मुहब्बत से सराबोर नौक झोंक का प्रतीक बन गया था। पुरस्कारों सम्मेलनों ने उनके दायित्व को बढाया और पद्मश्री मिलने के बाद उन्होंने लगान जैसी फिल्म लिखी।
      उनकी रचनाओं के संकलनों के पुस्तकाकार प्रकाशन तो बहुत हुये किंतु उन्होंने जो भी लिखा वह फुतकर ही लिखा। किताब के लिए लिखी गयी उनकी किताबें कम ही होंगीं। वे सरल, सहज, बोधगम्य और रोचक लिखते थे। उनकी रचनाएं एक बार में ही पढी जाने वाली संतुलित आकार की होती थीं। हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, शरद जोशी और रवीन्द्र नाथ त्यागी, के बाद व्यंग्य लेखन में जो नाम आते हैं उनमें केपी का नाम प्रमुख नामों में एक है।
      श्री से. रा. यात्री की तरह ही वे अपने नाम के संक्षिप्तीकरण से इतने विख्यात थे कि बहुत ही कम लोगों को पता होगा कि के.पी का पूरा नाम कालिका प्रसाद सक्सेना था जो किसी किताब या पत्र पत्रिका में कभी नहीं लिखा गया। जब भी उनका समग्र लेखन रचनावली के रूप में प्रकाशित होगा तो वह आकार में अनेक रचनावलियों को पीछे छोड़ देगा।

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.]
मो. 09425674629