बुधवार, मई 05, 2010

एक बेकार की बहस्

एक बेकार की बहस
उद्यमेन हि सिद्धंते, न हि कार्याणि मनोरथैः
[स्पेलिंग मिस्टेक हो तो संस्कृत के विद्वान क्षमा करें]
वीरेन्द्र जैन्

प्रत्येक मित्र मण्डली में कुछ मित्र ऐसे होते हैं जिन्हें विवादी या बहसी कह कर पुकारा जाता है। सच तो यह है कि ये लोग ही वैचारिक जड़ता को तोड़ने वाले भी होते हैं और चले आ रही वैचारिकी की गाड़ी के आगे ऐसे सवाल खड़े कर देते हैं कि गाड़ी को रुकना ही होता है।
किसी का कहना था कि बिना परिश्रम के कुछ नहीं मिलता। इसी से सवाल उठा कि क्या चोरी, डकैती, राहजनी से लेकर रिश्वतखोरी और नौकरशाही का भ्रष्टाचार भी मेहनत की कमाई है?
इस पर उन्होंने उत्तर दिया कि अगर ये बिना मेहनत के मिल जाती तो कभी तुम्हें मिल जाती और कभी हमें मिल जाती, पर ऐसा होता नहीं है और यह उसी को मिलती है जो पहले मेहनत करके उस पद तक पहुँचता है, फिर रिश्वत वाली सीट पर पोस्टिंग कराता है और फिर अपने कौशल से रिश्वतदाता को मनोवैज्ञानिक रूप से इस बात के लिए तैयार करता है कि बिना रिश्वत दिये हुये तुम्हारे काम में सौ वैधानिक दिक्कतें खड़ी हो सकती हैं और अगर इन्हें दूर करना हो अपनी फाइल सपाट गति से आगे बढाना हो तो इतनी राशि ढीली करो, बरना धक्के खाते रहो। जितना हम माँग रहे हैं उससे चौगुना तो तुम्हारे बार बार आने जाने और काम के नुकसान में बर्बाद हो जायेंगे और फिर भी काम हो जाने की कोई गारंटी नहीं है। वह शिकायत और रंगे हाथों पकड़े जाने का खतरा मोल लेता है और रिश्वत का उचित बँटवारा करता है तब कहीं जाकर रिश्वत कमा पाता है।
सवाल उठा कि अगर यह मेहनत है तो सभी ऐसी मेहनत करने वालों को समान आमदनी क्यों नहीं होती और जिस मेहनत के लिए वह वेतन पा रहा है उसी समय में वह ये दूसरी मेहनत करके क्या वह अपने नियोक्ता को धोखा देते हुये, अपने तयशुदा काम, और ज़िम्मेवारियों से विचलन नहीं है, और यह मेहनत गैर कानूनी क्यों है?
पर इस सवाल को अलग माना गया और कहा गया कि अभी सवाल मेहनत करने या नहीं करने का है उसकी नैतिकता का नहीं है। इसी बीच दूसरा सवाल आया कि आजकल सारे बड़े अधिकारी रिटायर्मेंट के बाद एनजीओ चलाते हैं जिसमें से ज्यादातर बोगस हैं और कम से कम उतना और वैसा काम तो नहीं करते जिसके लिए उन्हें ग्रांट मिली होती है। इसको भी मेहनत की कमाई माना जायेगा। उनका उत्तर था कि वे अपना एनजीओ बनाने तथा उसके लिए ग्रांट सैंक्सन कराने में जो मेहनत करते हैं उसकी खा रहे हैं व उन्होंने अपने सेवा कार्य में प्रशासन को इतना पंगु बनाने का काम किया है जिससे वह कहीं कुछ भी नहीं देखता।
ऐसी बहसों का कोई अंत नहीं होता किसी एक बात पर सब सहमत नहीं होते, पर यह तय पाया गया कि पाप और पुण्य दोनों ही करने पड़ते हैं, बिना किये न पाप होता है और ना पुण्य।

3 टिप्‍पणियां:

  1. विचारणीय पोस्ट लिखी है.....वैसे यह स्वविवेक पर निर्भर करता है कि आप कैसे कमाई करना चाहते हैं..एक कहावत है ...जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन..

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  2. आज देश की व्यवस्था में बैठे लोगों ने किस तरह से अपने निकम्मेपन से व्यवस्था को सडा दिया है और उसको फिर भी अच्छा बताने के लिए कैसे कुतर्क का सहारा लेते हैं ,इस विषय पर आपने गंभीरता से सोचा इसके लिए यह देश और इस देश के देश भक्त आपका सदा आभारी रहेंगे / ऐसे वैचारिक और चिंतन योग्य पोस्ट पर एक भी कोमेंट नहीं देखकर ब्लॉग जगत से दुःख हुआ / आपसे आग्रह, ऐसे ही ज्वलंत मुद्दों को उठाने के लिए ही ब्लॉग को प्रयोग करें /

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  3. हा अक्सर ऐसे मुद्दे सहमति नही बना पाते

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