मंगलवार, मई 11, 2010

संस्मरण स्मृति शेष जब्बार ढाकवाला

संस्मरण
मेरा दोस्त जब्बार ढाकवाला
वीरेन्द्र जैन्
मैं कह नहीं सकता कि कैसे हम लोगों का परिचय दोस्ती में और दोस्ती से उस रिश्ते में बदल गया जिसे खून के रिश्ते से भी बड़ा रिश्ता कहा जाता है। सिलसिलेवार याद करने पर कुछ कड़ियाँ जुड़ती नज़र आती हैं।
बात 1994 से शुरू होती है जब मेरा ट्रांसफर दतिया से भोपाल के लिए हुआ था। दतिया में मैं पंजाब नैशनल बैंक के लीड बैंक आफिस में पदस्थ था। लीड बैंक आफिस का काम किसी जिले के समस्त बैंकों द्वारा अपनी वार्षिक ऋण योजना तैयार करना उनमें सरकार द्वारा प्रायोजित योजनाऑं का लक्ष्य अनुसार समायोजन तथा सरकारी अधिकारियों और विभिन्न बैंकों के प्रबन्धकों के साथ बैठकें आयोजित करके उनका मूल्यांकन करने एवं उनमें आ रही परेशानियों को दूर करने का होता है। इस काम में सरकारी अधिकारियों और बैंक प्रबन्धकों के साथ निरंतर सम्पर्क में रहना होता है। लगभग पाँच साल इस कार्यालय में काम करते हुए मेरा जिले के कलेक्टर से लेकर बीडीओ तक सारे अधिकारियों से परिचय रहा जिससे सरकारी अधिकारियों के साथ मित्रता की आदत सी हो गयी थी।
भोपाल में मेरी पद स्थापना एक ऐसी बड़ी शाखा में हुयी थी जहाँ मैं एक छोटा अधिकारी था और सारा काम एकाउंटिंग जैसा नापसन्दगी का काम था। मैं अपने साहित्यिक सांस्कृतिक शौक को पंख देने के जिस उत्साह के साथ भोपाल आया था उसे गहरी ठेस लगी थी। मेरा मूल निवास दतिया ही होने के कारण परिवार और बच्चे दतिया में ही छूट गये थे। इसी निराशा के दौर में मेरी औपचारिक सी मुलाकात बैंक की शाखा में प्रशासनिक अधिकारी जब्बार जी से इस कारण हुयी कि परिचय करवाने वाला बैंक अधिकारी हम दोनों के ही साहित्यिक शौक को एक जैसे खब्त की तरह देखता था। कुछ दिनों बाद एक रविवार को मैंने उनका एक व्यंग्य लेख किसी अखबार में देखा जिसमें उनका पता और फोन नम्बर भी दिया हुआ था। उन दिनों मोबाइल नहीं चले थे और फोन इतने आम नहीं थे किंतु संयोग से मुझे जो निवास बैंक के द्वारा मिला था उसमें मकान मालिक ने फोन भी दिया हुआ था और इस कारण मैं विशिष्ट स्तिथि में था। मैंने तुरंत फोन लगाकर लेख की तारीफ करते हुये मिलने की इच्छा व्यक्त की तो उन्होंने उत्तर दिया कि आज तो मैं पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार कहीं पिकनिक पर जा रहा हूं अपुन बाद में मिलते हैं। मैंने सोचा कि ये अपनी अफसरी में टाल गये हैं तो मेरा बुन्देलखंडी अहंकार भड़क गया और फिर मैंने दुबारा फोन नहीं किया। फिर एक दो महीने बाद डा. ज्ञान चतुर्वेदी के साथ मुलाकात हुयी तो उन्होंने कहा कि मेरे पास आपका फोन नम्बर नहीं था पर आपने भी दुबारा फोन नहीं किया। इस मुलाकात में वे इतनी आत्मीयता से मिले कि सारे गिले शिकवे जाते रहे। मेरा फोन नम्बर मिल जाने के बाद उनके खुद फोन आते रहे जिनकी आवृति धीरे धीरे बढती गयी।
मुझे लगा कि भोपाल में वह खोया किनारा वापिस मिल गया है, जिसकी मुझे तलाश थी।
कविता और व्यंग्य हम दोनों के ही शौक में शामिल थे और उस दौरान हम लोग कवि गोष्ठियों में भी चले जाते थे। तब कवि गोष्ठियाँ होती भी खूब थीं और अपेक्षाकृत अच्छी होती थीं। मेरा सेक्युलरिज्म उनसे दोस्ती में मजबूती का मुख्य आधार बना। कभी वे भी बाम पंथी छात्र संगठन से जुड़े रहे थे और बाम पंथ के प्रति एक सम्मान का भाव उनके मन में था। मेरे अकेले रहने के कारण मेरी घरेलू जिम्मेवारियाँ भी कम थीं इसलिए साहित्यिक आयोजनों के लिए मैं सहज उपल्ब्ध साथी था, शालीन था, और बैंक में अधिकारी होने के नाते उसकी दोस्ती के लिहाज से ऐसा कमतर नहीं था कि किसी से दोस्त की तरह परिचय कराने में संकोच हो। यानि कि बहुत सारी स्तिथियाँ अनुकूल थीं। उनके बच्चे बाहर होने के कारण वे पति पत्नी ही यहाँ थे, घरेलू काम के लिए नौकर थे ड्राइवर था इसलिए उनके पास भी बहुत अधिक घरेलू ज़िम्मेवारियाँ नहीं थीं, दूसरी ओर पद की अनेक सुविधाएं थीं। समय की इस उपलब्धता और सुविधाओं ने उनके अन्दर के समारोह धर्मी जीव को पंख दे दिये थे। हर समारोह उन्हें आकर्षित करता था।
इधर बैंक में मेरे प्रबन्धकों के साथ पटरी न बैठने के कारण मुझे एक एक्स्टैंशन काउंटर का स्वतंत्र प्रभारी बना दिया गया था जिससे मेरा भी कार्यस्थल का टैंसन समाप्त हो गया था। वे उस समय जिस सिविल सप्लाई निगम के प्रभारी थे उस निगम के कुछ जमा खाते हमारे बैंक में खुलवाकर उन्होंने हमारे बैंक के जमा लक्ष्य प्राप्त करने में सहयोग किया था। धीरे धीरे हम लोग अन्योनाश्रित होते चले गये। अपने मन की कुछ बातें व्यक्ति किसी से कह कर मन को हल्का कर लेना चाहता है, उन्होंने मेरे अन्दर ऐसा विश्वसनीय दोस्त पा लिया था जिससे कही बातें वन वे ट्रैफिक होने का उन्हें भरोसा हो चला था। वे मेरे साथ अपनी परेशानियाँ बाँट सकते थे।
इसी एक दो साल के दौरान उनका ट्रांसफर छतरपुर हुआ और मेरा ट्रांस्फर वापिस दतिया हो गया। पर पत्र फोन पर दुख सुख की सूचनाएं और त्योहारों पर शुभकामनाओं का आदान प्रदान जारी रहा। बाद में जैसे ही बैंक में वीआरएस योजना आयी तो मैंने उसे स्वीकार करने में देर नहीं की और कुछ ही महीनों बाद भोपाल आकर रहने लगा। भोपाल आकर बसने के पीछे अन्य कारणों के साथ उनका यहाँ होना भी था।
बीच में एक दो साल के लिए वे कलैक्टर हो कर बड़वानी चले गये और इस दौरान अपने सारे दोस्तों को एक एक कर किसी न किसी कार्यक्रम में वहाँ बुलवाते रहे। मैं एक बार श्रीकांत आप्टे, और मूला राम जोशी के साथ तो एक बार प्रताप राव कदम,प्रभु जोशी और ज्ञान चतुर्वेदी के साथ तथा एक बार कमला प्रसाद, राजेन्द्र शर्मा और नईमजी के साथ, कार्यक्रमों में वहाँ गया। उनके इस साहित्यिक रुझान के कारण बड़वानी के अन्य प्रशासनिक अधिकारियों के बीच उनके प्रति एक खीझ का भाव भी मैंने पाया जिसका जिक्र भी मैंने उनसे किया पर उन पर कोई फरक नहीं पड़ा। वे यथावत कलैक्टर रहते हुये भी कवि सम्मेलन के कवियों की तरह हास्य व्यंग्य की कविताएं सुनाते रहे तथा प्रशासनिक अधिकारियों वाली दहशत को हल्का करते रहे। बाद में अनुशासन का यही गैर परम्परागत रूप उनके खिलाफ गया। उनका एक एसडीएम स्तीफा दिये बिना लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार बन गया परिणाम स्वरूप उन्हें समय से पूर्व स्थानांतरण झेलना पड़ा।
वहाँ से लौट कर वे उद्योग, आयुर्वेद, पिछड़ा वर्ग एवम अल्पसंख्यक कल्याण, जैव विविधिता, जन शिकायत निवारण आदि विभागों के पदों पर रहे, और उनकी चर्चित बने रहने की आदत ने निरंतर विवाद आमंत्रित किये। जैसी नौकरशाही चलती है वे वैसा चलना नहीं जानते थे उसमें हमेशा कुछ नया करना चाहते थे इसलिए नौकरशाही के जमे हुये लोग हमेशा उनके खिलाफ वही परम्परागत आरोप लगा कर अपना बदला लेना चाहते थे, जिसे वे पहले कई अफसरों पर लगा चुके होते। मैं भी कभी कभी एक दोस्त के अधिकार से उन पर खीझता था किंतु उनकी अपनी गति थी और ज्ञान चतुर्वेदी कहते थे कि यह आदमी कभी लो प्रोफाइल नहीं रह सकता और यही आदत इसे परेशान करती है। पर वे खुद उतने परेशान नहीं होते थे जितने हम लोग हो जाते थे।
वे मुझसे अपेक्षा करते थे कि मैं रिटायरमेंट लेने के बाद भी कुछ ऐसा भी करूं जिससे मेरी कुछ आय हो सके किंतु मेरा कहना होता था कि मैं बैंक की नौकरी से बेहतर कोई काम नहीं कर सकता था और जब उसे भी छोड़ दिया तो अपनी वैचारिक स्वतंत्रता को बाधित करने वाला दूसरा कुछ क्यों करूं! मेरी सादगी और मितव्यता से वे दुखी थे पर मैं अपने जीवन दर्शन से मजबूर था। हार कर उन्होंने यह शर्त रख दी कि मैं जब उनके साथ होया करूं तो किसी भी हालत में अपनी जेब से कुछ भी खर्च न किया करूं तथा इसका कठोरता से पालन करवाया। सिनेमा देखने हम हमेशा साथ जाते थे किंतु मुझ से टिकिट लेने के लिए नहीं कह सकते थे क्योंकि अगर मैं टिकिट लाया तो फिर उनसे पैसे नहीं लूंगा, इसलिए टिकिट खिड़की पर खुद जाकर टिकिट खरीदते थे, जो किसी भी आइ ए एस की पत्नी की तरह उनकी पत्नी को भी अच्छा नहीं लगता था, पर वे परवाह नहीं करते थे। मुझे भरोसा है कि पति पत्नी में इस बात पर भी कभी नोक झोंक हुयी होगी किंतु उन्होंने अपनी आदत नहीं बदली।
अपने पद के रुतवे का प्रयोग वे एक मामले में ज़रूर करते थे। किसी भी समारोह में सबसे आगे बैठना उन्हें पसन्द था और अपने साथ लाये लोगों को भी अपने साथ बैठाना चाहते थे भले ही आयोजन के प्रायोजकॉ को बैठने के लिए सुरक्षित रखा स्थान भर जाने के कारण आयोजक झुंझलाते रहते हों।
श्रीमती ढाकवाला पाक कला में न केवल प्रवीण थीं अपितु नई नई डिशें बनवाना उन्हें अच्छा लगता था। नई डिशें बनवाने वाली प्रत्येक गृहणी की तरह उसे किसी मेहमान को खिला कर उसकी प्रशंसा पाने की वे भी अपेक्षा रखती थीं किंतु जब्बार को अक्सर ऐसा मेहमान मैं ही मिलता था जिसके लिए खाना केवल पेट भरने के लिए होता रहा था और अच्छी डिश को भी दाल रोटी की तरह खा लेने के बाद मैं प्रशंसा करना भूल जाता था। मेरी इस गलती को वे खुद तारीफ करके सुधारते थे। दूसरा कोई होता तो ऐसे मेहमान को कभी नहीं बुलाता।
सेलिब्रिटी को अपने घर बुलाने का उन्हें बहुत शौक था। अपने पसन्द की विधा के शहर में किसी भी सेलिब्रिटी के आने पर वे उसे खाने या चाय पर ज़रूर बुलाते थे और ज्यादातर लोग एक कला प्रेमी वरिष्ठ अधिकारी के स्नेहिल आमंत्रण को ठुकरा भी नहीं पाते थे। अब ऐसे अवसर पर महफिल जोड़ना भी उन्हें अच्छा लगता था और इस महफिल के लिए उनके यहाँ कुछ स्थायी आमंत्रित होते थे जिनमें मैं, शिरीश शर्मा दम्पत्ति, डा. विजय अग्रवाल दम्पत्ति तो अवश्य होते थे। अगर मैं ऐसे आयजनों की सूची बनाने बैठूं तो सैकड़ों आयोजनों की याद तो मुझे ही होगी। ईद पर उनके यहाँ विभिन्न वर्गों से आने वालों की बहुतायत देख कर एक बार मैंने कहा था कि मैं तो बासी ईद पर आया करूंगा ताकि इत्मीनान से बैठ सकूं तो इसके बाद वे सबको अलग अलग टाइम देने लागे थे जैसे साहित्यकारों को विशेष रूप से शाम 6 से 7 के बीच आने की दावत देते ताकि सारे साहित्यकार एक साथ मिल बैठ सकें। इसमें बहुत सारे लोग तो ऐसे होते जो ईद पर ही उसी जगह मिलते थे।
आम तौर पर अधिकारी वर्ग को ज्यादा घुलना मिलना इसलिए पसन्द नहीं आता क्योंकि लोग सरकारी काम में अनुचित फेवर की अपेक्षा करने लगते हैं किंतु जब्बारजी को किसी भी परिचित की भी मदद करने में कोई संकोच नहीं होता था यदि कोई वैधानिक अड़चन न हो तो अपने विभाग का काम वे तुरंत कर देते थे और दूसरे अधिकारियों से सिफारिश भी कर देते थे। मेरे बारे में वे कहते रहते थे कि ये मेरा सबसे अच्छा दोस्त है फिर भी इसने आज तक कभी किसी काम के लिए नहीं कहा। उन्हें लगता रहता था कि काश वे मेरे लिए कुछ कर सकें।
मैं घनघोर निराशावादी जबकि वे घोर आशावादी, मैं जीवन के प्रति उदासीनता और गम्भीरता से भरा हुआ और वे पूरे जोश और उत्साह से परिपूर्ण, मैं संकोची और वे मुखर, फिर भी मित्र। अभी हाल ही मैं उन्होंने जो पंक्तियाँ लिखी थीं उन्हें सैकड़ों बार हज़ारों लोगों को सुना चुके थे-
जीवन के हर पल का खुल कर मज़ा लीज़िए या ज़िन्दगी भर टेंशन की सज़ा लीज़िए
अपने दौड़ने के साथ मुझे भी घसीटते रहते, भोपाल हो या उसके बाहर जहाँ भी कविता गोष्ठी की गुंजाइश निकलती उसमें मुझे भी शामिल कराने की कोशिश करते, जबकि में इस बारे में बहुत चूज़ी किस्म का व्यक्ति हूं, जहाँ मेरे श्रोता न हों वहाँ मैं कविता सुनाना पसन्द नहीं करता, भले ही कई बार मेरे इंकार को लोग ज्यादा आग्रह का ढोंग समझ लेते हैं।
पिछले दिनों से मित्रों के जन्मदिन के बहाने वे महफिल जोड़ने लगे थे। अपना जन्म दिन तो बाल सुलभ उत्साह से मनाते ही थे अपितु मित्रों परिचितों के जन्मदिन को भी उसी उत्साह से मनाने का सिलसिला शुरू किया था। हम लोगों ने गत एक दो सालों में वरिष्ठ कथाकार स्वयं प्रकाश, उर्मिला शिरीष, डा. शिरीष शर्मा और मेरा जन्म दिन उत्सव की तरह मनाया था। डा. विजय अग्रवाल की स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति का अवसर हो या उनकी माँ की बरसी, हम लोग इकट्ठा आमंत्रित कर लिए जाते थे। कोई हाट हो या मेला हो उसमें जाना ज़रूरी था, कहते कि हमारे शहर में कितनी दूर दूर से कलाकार शिल्पकार आये हैं इनका मन तो रखना ही होगा। पत्नी की असहमति के बाबज़ूद उसमें से कहीं न कहीं कुछ न कुछ खरीद ही लेते। जब वे कहतीं कि हम लोग अपने ट्रांसफर पर इतना सामान कहाँ ले जायेंगे तो कहते कि इसे जैन साहब को दे जायेंगे, इस तर्क पर मेरे सामने उन्हें चुप रह जाना पड़ता था।
उनमें जीवन छलछलाता रहता था और वे मित्रों से भी यही अपेक्षा रखते थे। मेरी डाइबिटीज के बारे में मुझसे अधिक चिंतित रहते थे, नियमित ब्लड टैस्ट के प्रति मेरी लापरवाही को देखते हुए उन्होंने मुझे ग्लूकोमीटर भेंट किया और मेरे द्वारा अस्वीकार से बचने के लिए वह भेंट देने के लिए मेरे जन्म दिन को अवसर बनाया। मुझे भोपाल के सबसे बड़े डायबिटोलोजिस्ट के पास ले गये और मेरे द्वारा आनाकानी करने पर कहा कि वो डाक्टर मेरा मित्र है और तुमसे फीस नहीं लेगा। मजबूरन जाना पड़ा तथा डाक्टर ने सचमुच फीस नहीं ली। मैंने पहले कभी अपना जन्म दिन नहीं मनाया था किंतु भले ही मैं भूल जाऊँ पर उन्हें याद रहता था और बारह जून की सुबह उनका फोन ज़रूर आता था। कई बारह जून की शामें हम लोगों ने जन्म दिन के बहाने शाम के डिनर पर गुजारीं हैं। इस अवसर पर मेरी जेब का ख्याल रख कर ज्यादा लोगों को नहीं बुलाते थे। जब किसी शाम कोई कार्यक्रम नहीं होता तब भी उनका फोन आता और एक स्थायी सलाह रहती कि शाम के समय घर मत बैठा करो, इससे तुम्हारा डिप्रेशन और बढेगा। मज़ाक करते कि कोई महिला मित्र ही बना लो जिसके साथ बैठ कर कुछ पवित्र शामें गुज़ार लिया करो। मेरा साठवाँ जन्म दिन जिस समारोह पूर्वक उन्होंने मनाया मैं उसके लिए तैय़ार नहीं था पर उनका कहना था कि साठवाँ जन्म दिन बार बार तो नहीं आता। तुम्हें कुछ नहीं करना है केवल आ भर जाना है। उन्होंने ही शैलेन्द्र कुमार शैली से कह कर राग भोपाली का विशेषांक निकलवाया, मीडिया की व्यवस्था की, हाल बुक करवाया, मेरी पत्नी और बेटे को बुलवाया, तथा खुद फोन करके बहुत सारे लोगों को निमंत्रण दिया और उनसे लिखने के लिए कहा। उनका वश चलता तो वे केक भी कटवाते और गुब्बारे भी बाँध सकते थे किंतु थोड़ा सा तो मेरा लिहाज़ कर गये।
कहीं बाहर जाते तो वहाँ का कुछ न कुछ खास ज़रूर लाते और उसे सबको बुला कर खिलाते। वे तो चाहते थे कि उनके लिए आये दावतों के निमंत्रणों में भी मैं उनके साथ चलूं जिसके लिए उनका तर्क होता था कि अगर मेरा कोई भाई होता तो क्या मैं उसे साथ नहीं लाता, ये नेता लोग तो पूरी की पूरी गाड़ी भर कर लोग लिये फिरते हैं। पर मेरी मध्यम वर्गीय मानसिकता और मेरा स्वाभिमान आड़े आता। एक बार किसी वरिष्ठ अधिकारी की दावत थी और कार्यक्रम के अनुसार हमें उसके बाद कहीं और जाना था इसलिए मैं साथ था मैंने ज़िद की कि आप लोग दावत में हो आइए मैं यहीं गाड़ी में बैठा हूं, तो उन्होंने अन्दर जाकर उक्त अधिकारी को मेरे पास गाड़ी में भिजवाया जो अनुरोध करके मुझे अन्दर ले गया। मुझे खीझ भी हुयी और शर्मिन्दगी भी। उसके बाद मैं ध्यान रखता कि एक शाम एक ही कार्यक्रम हो।
कई बार मुझे लगता कि इस आदमी के भीतर कोई गहरा दर्द है जो इसे सालता रहता है और इसे भुलाने के ले ही यह ये सारी हरकतें करता है। मेरा यह विश्वास तब और पुष्ट हो गया जब सुबह घूमने जाने के साथ इन्होंने हास्य क्लब ज्वाइन किया। उसमें उनका इतना मन लगा कि उन्होंने पूरे देश के हास्य क्लब की सूची अपने पास रख ली और जहाँ भी जाते वहाँ के हास्य क्लब के सदस्यों से ज़रूर मिलते।
अभी कुछ दिनों से डा. विजय अग्रवाल से प्रेरणा लेकर उन्होंने लाइफ मेनेजमेंट पर भाषण देने का शौक पाल लिया था। प्रशासनिक सेवा में आने के पूर्व कालेज में व्याख्याता रहे थे इसलिए लेक्चर तैयार करने में ज्यादा मेहनत नहीं होती थी। उनके पद के कारण श्रोताओं पर एक विशेष प्रभाव पड़ता था और उनकी बात ध्यान से सुनी जाती थी। मैंने भी थोड़ा रजनीश को पढा है तो कभी कभी उस बारे में मुझसे भी बात कर लिया करते थे। जहाँ भी सफलता पूर्वक भाषण करके आते तो गदगद भाव से सुनाते। कोशिश करते कि सरकारी कार्यक्रमों में भी जहाँ युवा एकत्रित हों और सम्भव हो तो उनका लेक्चर हो जाये। कई बार इस बात से उनके सहयोगी अधिकारी असंतुष्ट भी रहते थे, और इसे पद की गरिमा के अनुकूल नहीं मानते थे। पर उन्होंने कब परवाह की। एक बार आए ए एस एशोसिएशन के फिल्म फेस्टीविल में उदघाटन के लिए ओम पुरी को आना था, उसमें ये भी पदाधिकारी थे जब ओम पुरी को एयर पोर्ट पर रिसीव करने की बात आयी तो सारे वरिष्ठ अधिकारियों ने इसे पद के अनकूल नहीं माना और किसी जूनियर को भेजने की व्यवस्था कर दी। इन्होंने मुझे फोन किया कि ओम पुरी बड़ा कलाकार है उसे रिसीव किया जाना चाहिए, अपुन लोग चलेंगे। हम लोगों ने जाके उन्हें रिसीव किया और होटल नूर-उस सवा तक छोड़ कर आये।
साहित्य की हर विधा में उन्होंने लिखना चाहा। कविताएं लिखीं, कहानियां लिखीं व्यंग्य लिखे, और अभी हाल ही में एक अच्छा नाटक भी लिखा था जो थोडा अधूरा रह गया था। वह बहुत ही अच्छा हास्य नाटक था।
कितना कितना साथ था इसलिए कितनी कितनी यादें हैं, शुरू करने बैठता हूं तो खत्म होने का नाम ही नहीं लेतीं। कोई हमारे जीवन का कितना बड़ा हिस्सा है इसका पता उसके जाने के बाद ही चलता है। वह मेरे जीवन का एक हिस्सा हो गये थे और उनकी मृत्यु से लगता है कि मैं भी एक हिस्से में मर गया हूं।
वीरेन्द्र जैन 2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023 मो. 9425674629

1 टिप्पणी:

  1. यारों के यार थे जब्बार ... उनका इस तरह चले जाना ..अब तक मन स्वीकार नहीं कर पा रहा है । उनकी कवितायें उनका गले मिलना सब कुछ बहुत बहुत याद आ रहा है ।
    आपने बहुत कुछ याद दिला दिया ..।

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