शनिवार, मई 29, 2010

लोकतंत्र की राह के कांटे


लोकतंत्र की राह के काँटे
वीरेन्द्र जैन
हमारे देश में लोकतंत्र ने कुछ इस तरह से अपनी जगह बनायी है जैसे कि रेल के जनरल डिब्बे में चार लोगों के बैठने की सीट पर पहले से ही छह लोग बैठे होते हैं और सातवाँ व्यक्ति अपनी बीमारी बुढापे या किसी अन्य दयनीयता का प्रर्दशन कर उस सीट पर अपने लिए जगह बना लेता है। सीट पर पूर्व से बैठे हुये छहों लोग कसमसाते रहते हैं और चाहते हैं कि वह उठ जाये तो कुछ फैल सकें, इसलिए वे निरंतर इस पर दबाव बनाते रहते हैं और वह दबा सिकुड़ा सिमिटा सकुचाया सा कई कई आसन बदलता हुआ अपना कठिन सफर तय करता रहता है। इस लोकतंत्र को अभी तक अपना उचित स्थान नहीं मिल पाया है जबकि कुछ भगवा भेषधारी बिना टिकिट चलते हुये ऊपर की सीट पर टांगें पसार कर आराम कर रहे हैं।
कारण यह है कि लोकतंत्र धड़धड़ाता और अपना हक मांगने की हुंकार भरता हुआ नहीं आया। जो लोग पहले से पसरे बैठे थे वे वैसे ही बैठे रहे। कुछ लोग तो उसे अन्दर ही नहीं आने दे रहे थे और जब आ गया तो बैठने की जगह नहीं। लोगों ने बैठने की जगह पर रखा अपना सामान भी नहीं उठाया और मांगते मूंगते बैठ गया तो धकेलने पर तुले हैं। सच तो यह है कि कोई अपनी जगह आसानी से नहीं छोड़ना चाहता। जो लोग दूसरों के हकों पर अधिकार जमाये हुये सुख पूर्वक रह रहे हैं वे किसी भी तरह का बदलाव नहीं चाहते। वे यथास्थिति को बनाये रखना चाहते हैं। अपने को बुद्धिजीवी व मानवीय दर्शाने के लिए कभी कभी यथास्थिति पर औपचारिक असंतोष व्यक्त कर जुबान की कसरत भर कर लेते हैं, पर समाज में आने वाले किसी भी परिवर्तन पर और भी अधिक असंतुष्ट होते हैं तथा पुराने समय की अच्छाइयों के गुण गाने लगतें हैं।
पुराने समय को वर्तमान से अच्छा बताने वाले वे लोग हैं जो यथास्थिति से लाभान्वित होते रहे हैं जैसे कि भारतीय समाज की सवर्ण जातियाँ। पर जिन्हें पुराने समय ने पीड़ा उपेक्षा और शोषण के अलावा कुछ नहीं दिया उनका बदलाव के प्रति आकर्षण सहज स्वाभाविक है। अतीत उनके लिए प्रीतिकर नहीं है।
पीड़ित उपेक्षित और शोषित रहे, गरीब, दलित, व पिछड़े ही नहीं अपितु अल्पसंख्यक और महिलाएँ भी हैं। ये लोग संख्या में अधिक हैं और लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुसार इनकी एकजुटता सवर्णों व पूंजी के ढेर पर बैठे हुये लोगों के पास से सत्ता छीन सकती है। यही कारण है कि यथास्थिति से लाभान्वित लोगों का प्रयास इस एकजुटता की स्थापना न होने देना और यदि होने लगे तो उसे तोड़ने का रहता है। वे उसे बाहर से भी तोड़ते हैं और इसमें कठिनाई होने पर भीतर से से भी तोड़ते हैं।
गणतंत्र के प्रारंभिक दौर में यथास्थिति से लाभान्वित लोगों के सामने दो खतरे थे। एक कम्युनिष्ट और दूसरे अम्बेडकर से प्रभावित दलित। कम्युनिष्ट आंदोलन सामाजिक यथार्थ से जुड़ा बुद्धिवादी आन्दोलन था जिसमें एक समझ के साथ लोग जुड़ पाते थे इसलिए उन्हें फुसलाना आसान नहीं था। यही कारण रहा कि उन्हें देशद्रोही प्रचारित करवा दिया गया व उनमें विभाजन कराने के लिए श्रीपाद अमृत डांगे जैसे नेता का स्तेमाल किया गया जिन्हें बाद में विभाजित कम्युनिष्ट पार्टी से भी हटा दिया गया था। समाजवादी देश चीन के साथ चले सीमाविवाद को किसी साम्राज्यवादी देश द्वारा किये गये हमले की तरह प्रचारित किया गया जबकि चीन इस लड़ाई में एक सीमा से आगे नहीं बढा था और बाद में वह स्वत: ही अपनी सीमा में वापिस लौट गया। पर दुष्प्रचार से प्रभावित देश में कभी प्रमुख विपक्षी पार्टी रही कम्युनिष्ट पार्टी के जनसमर्थन को संकुचित करा दिया गया था जिससे साम्प्रदायिक व विभाजनकारी ताकतों के लिए बड़ी जगह उपलब्ध हो गयी तथा परिवर्तनकारी शक्तियाँ कमजोर हुयीं जिससे यथास्थितिवादियों के सुख सुरक्षित रहे।
प्रचारित किया गया कि हमारी गुलामी एक विदेशी कम्पनी के देश पर शासन करने के कारण थी तथा उसके अपने देश वापिस चले जाने से हम आजाद हो गये हैं। जबकि सच यह था कि अंग्रेज कम्पनी के बहुत थोड़े से सिपाही इस देश में थे और वे केवल लड़ाई लड़ कर व जीत कर उस स्थिति में नहीं पहुंचे थे। उन्होंने इस देश में आपस में लड़ते रहने वाली दो-ढाईसौ रियासतों के प्रमुखों को मानसिक रूप से गुलाम बना कर उनके माध्यम से पूरे देश को अधीनता में लिया था। अंग्रेजों के जाने के बाद वे रियासतें लगभग वैसी ही रहीं तथा अपने विशालकाय महलों, वाहनों, हथियारों, कृषिभूमियों, बेशकीमती जेवरातों, के साथ साथ विशोषाधिकार और मासिक प्रिवीपर्स की भी पात्र रहीं।
दुनिया में इससे पहले कभी ऐसा ''सत्ता परिवर्तन'' नहीं हुआ था जो मात्र औपचारिक था। कुछ ही दिनों में उन रियासतों के आभामंडल वाले प्रमुख लोग संसद सदस्य या विधायक बन कर मंत्रिमंडल अथवा दूसरे सत्तासुख वाले स्थानों को सुशोभित करने लगे। जहाँ आरक्षण से कुछ सीमा बंधी वहाँ उनके ही कारिन्दे फिट हो गये जो उनकी कठपुतली की तरह उनके ही इशारे पर अंगूठा लगाने लगे।
दलितों की ओर से अपनी ताकत को पहचान कर सत्ता परिवर्तन की पहली चुनौती बहुजन समाज पार्टी की ओर से आयी थी जिसका नेतृत्व काँशीराम ने किया था तथा दूसरी चुनौती पिछड़ों की ओर से आयी जो कि विशवनाथ प्रतापसिंह की राजनीतिक आवशयकतावश मंडल कमीशन की सिफारिशों लागू करवाने के फैसले से मिली थी पर इसका राष्ट्रीय नेतृत्व नहीं उभर सका। ताकतवर यथास्थितिवादियों ने इन दोनों ही चुनौतियों को जल्दी ही ठिकाने लगा दिया। कांशीराम के सब्र की सीमा थी इसलिए उन्होंने कच्चा फल तोड़ लिया व सत्ता का स्वाद चखने के लिये यथास्थितिवादियों से मांगे मसाले के साथ खाने लगे। मसाला देने वालों ने जल्दी ही उनके आंदोलन को ही खा लिया। उन्होंने उनके अंदर एक तानाशाह और पूंजी की ताकत को ही सर्वोंत्तम ताकत मानने वाला चालाक आदमी विकसित करवा दिया जो अपने ही उन लोगों को अक्षम और अविश्वसनीय मानता था जो उन पर भरोसा करते थे। यही कारण रहा कि उन्होंने संगठन में लोकतंत्र नहीं आने दिया और किसी को भी नेतृत्व में हिस्सेदारी नहीं दी। वे कहते थे कि हमारे यहाँ कोई सांगठनिक चुनाव नहीं होते। हमारे यहाँ कोई फाइल नहीं है। हमारे यहाँ पैसे का कोई हिसाब किताब नहीं रखा जाता।
वे जिस कमरे में बैठते थे उसमें केवल एक कुर्सी होती थी और सांसदों विधायकों समेत सारे कार्यकर्ता र्फश पर नीचे बैठते थे। जल्दी उन्होंने जुटाये गये समर्थन को सवर्णों और पूंजीपतियों को मँहगे दामों में बेचना प्रारंभ कर दिया व माया जोड़ते जोड़ते अपना उत्तराधिकार मायावती को सोंप गये। उनके इस व्यवहार से क्षुब्ध कुछ सांसद विधायक स्वयं बिकने लगे तथा कुछ क्षेत्रीय छत्रप हाथी के समर्थन को बेच कर खुद पैसा हड़पने लगे। परिणाम यह निकला कि एक आंदोलन बीच में ही नष्ट हो गया। सत्ता पाने की आतुरता और दौलत के प्रेम में मायावती ने अपने उन शत्रुओं से हाथ मिला लिया जिनके विरोध ने उनके आंदोलन को जन्म दिया था। इस बेमेल एकता ने उन्हें सत्ता के वेन्टीलेटर की साँसें तो मिल गयीं पर उसके हटते ही आन्दोलन का ''डैथ सार्टिफिकेट'' लिख दिया जाना सुनिशचित हो गया है।
कभी कुछ संभावनाएं लोहिया के समाजवादी आंदोलन में दिखीं थीं किंतु बाद में जैसे ही उन्होंने गैरकाँग्रेसवाद जैसे बेढंगे दिशाहीन सत्तालोलुप नारे को हवा दी वैसे ही यथास्थितिवादियों ने तोड़ खाया। उस आंदोलन में से कुछ संघ के शरणागत हो गये तो कुछ काँग्रेस में हलुआ पूड़ी जीमने चले गये। बचेखुचे ईमानदार लागों में से कुछ नक्सलवादियों की ओर मुड़े तो अंतिम टुकड़े की मूर्ति बनाकर मुलायम सिंह यादव जैसे लोगों ने अम्बानी अमिताभ अमरसिंह द्वारा हाँके जाने वाले रथ पर सजा कर रख दी। अब जड़ मूर्ति के नाम पर उसके पुजारी मालपुये उड़ा रहे हैं।
स्मरणीय है कि लालबहादुर शास्त्री के निधन के बाद जब वरिष्ठ नेता मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बनने के लिए तेजी से प्रयासरत थे तब घनशयामदास बिड़ला ने कहा था कि मोरारजी प्रधानमंत्री कैसे बन जायेंगे जबकि दो सौ सांसद तो मेरे हैं, मैं जिसको चाहूँ वही प्रधानमंत्री बनेगा। हुआ भी ऐसा ही था और तब मोरारजी के दिल के अरमान दिल में ही रह गये थे। इसके अलावा भी एक सौ चौबीस पूर्व राजपरिवार के सदस्यों, टीवी-फिल्मी सितारों, कवियों क्रिकेट खिलाड़ियों, साधुभेषधारियों, आदि आदि गैर राजनीतिक कारणों से लोकप्रिय व्यक्तियों से गठित संसद से अधिक जनहितैषी उम्मीद रखना अपने को धोखा देना है।
लोकतांत्रिक चेतना की राह में यथास्थितिवादी कभी धर्म को फंसा देते हैं तो कभी जाति को। कभी क्षेत्र को तो कभी भाषा को। इतना ही नहीं उनके झोले और उर्वर दिमाग में नये से नये अवरोधक सदैव तैयार रहते हैं। लोकतंत्र के स्वस्थ विकास के लिए राह के अवरोध पैदा करने वालों की ताकत को कमजोर करने की आवश्कता है जिसके लिए एक अलग आंदोलन की जरूरत पड़ेगी। दुष्यंत कुमार ने कहा है-
पक गयी हैं आदतें बातों से सर होंगीं नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुजर होगी नहीं

वीरेन्द्र जैन
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अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही बढ़िया विवेचना असल लोकतंत्र ऐसे ही सोच और इसके लिए एकजुट होने से लाया जा सकता है / ऐसे ही लिखते रहिये और दूसरों को भी सोचने को प्रेरित करिये /

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