रविवार, सितंबर 05, 2010

आतंक की जगह रंग पर बहस



आतंक की जगह रंग पर बहस
वीरेन्द्र जैन
हमारे देश के झंडे में तीन रंग हैं। यही तीन रंग कांग्रेस के झंडे में भी हैं। ऐसी मान्यता है कि ये तीन रंग हिन्दू मुस्लिम और ईसाई का प्रतिनिधित्व करते हुए उनको एक झंडे में रख कर अनेकता में एकता का सन्देश देते हैं। भाजपा के झंडे में दो रंग हैं जिसमें भगवा हिस्सा बड़ा और हरा हिस्सा छोटा रखा जाता है। बहरहाल सवाल रंगों का उठा और इसलिए उठा कि देश के गृह मंत्री चिदम्बरम ने आतंकियों की एक श्रेणी को भगवा आतंकवाद कह दिया। भगवा रंग हिन्दुत्व का प्रतीक भी रहा है, इसलिए संघ परिवार के लोगों ने तुरंत आपत्ति की और इस आपत्ति से उन्होंने आस्थावान हिन्दू समाज को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की। ये वे ही लोग हैं जो नित प्रति आतंकवाद को इस्लामी आतंकवाद कह्ते रहते हैं ताकि देश की एक पूरी पूरी कौम को ही आतंकवादी ठहरा कर वोटों का ध्रुवी करण कर सकें, जबकि इनके द्वारा कथित “इस्लामी आतंकवादी” विदेशी धन से संचालित ही नहीं अपितु विदेश से आये हुये भी होते हैं। धन के लालच में उनके जो स्थानीय मददगार बन जाते हैं उनके साथ भी उनकी कौम के दूसरे लोग नहीं होते। किंतु भगवा वस्त्रधारी साधु साध्वियों के भेष में रहने वाले जो लोग आतंकी गतिविधियों में पकड़े गये हैं वे न केवल स्थानीय हैं अपितु उनका पक्ष लेकर जो लोग उन्हें निर्दोष बता इसे पूरे हिन्दुओं को परेशान करने का सरकारी अभियान बताते रहे हैं वे भी स्थानीय हैं। मुख्य धारा के किसी भी मुस्लिम संगठन ने ना तो आतंकी गतिविधियों का समर्थन किया है और ना ही आतंकी गतिविधियों में पकड़े गये लोगों के पक्ष में बयानबाजी ही की है।
उल्लेखनीय है कि चिदम्बरम की पार्टी के ही कुछ बड़े नेताओं ने उनके द्वारा प्रयुक्त शब्द से असहमति व्यक्त करते हुये कहा है कि भगवा पर किसी संगठन या दल का एकाधिकार नहीं है और इस शब्द के प्रयोग से ऐसा लग सकता है कि कथित आतंकी पूरे हिन्दू समाज के प्रतिनिधि हैं। आतंकी सिर्फ आतंकी हैं। जो दल उनके चोले के रंग के आधार पर उनका समर्थन करता है उसे अपने कदम पर गम्भीरता से पुनर्विचार करना चहिए ताकि जाने अनजाने वह अपराधियों और देशद्रोहियों की कतार में न माना जाये। सवाल यह है कि चिदम्बरम ने इस शब्द का प्रयोग क्यों किया? शायद यह प्रयोग इसलिए हो गया है क्योंकि संघ परिवार आतंकी घटनाओं से उतपन्न जनता के गुस्से को निरंतर एक साम्प्रदायिक रंग देता आ रहा था, जो उनकी रणनीति का एक हिस्सा था। वे देश की एक ज्वलंत समस्या को राजनीतिक रंग देकर अपना दलीय हित साधने की लगातार कोशिश कर रहे थे। मालेगाँव, मडगाँव, पुणे, अजमेर, हैदराबाद,और समझौता एक्सप्रैस की घटनाओं के लिए पकड़ में आये लोगों में से कुछ साधु साध्वियों पर आरोप है कि एक ओर वे भगवा लिबास में रह कर आस्थावान लोगों को धोखा दे रहे थे तथा दूसरी ओर ऐसे चिन्ह छोड़ रहे थे जिससे जाँच एजेंसियाँ भटक जायें। उनके पकड़ में आने से पूरा परिदृश्य ही बदल गया। इससे हिन्दू साम्प्रदायिक दलों का यह तर्क ही भौंतरा हो गया कि आतंकवाद का सम्बन्ध एक धर्म विशेष और उसके मानने वालों की धार्मिक आस्थाओं से जुड़ा है। इससे यह सच सामने आ गया कि आतंकवाद का धर्मों से कोई सम्बन्ध नहीं है और वह देशी विदेशी धन के लालच, धर्मान्धता, या विचार दोष के कारण भी सम्भव है। इससे एक सम्प्रदाय के खिलाफ विष वमन करके साम्प्रदायिकता फैलाने वालों को मुँह छुपाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। यही कारण है कि चिदम्बरम का समर्थन करते हुये भी उनके शब्दों पर आपत्ति करके कांग्रेस के बड़े नेताओं ने सही समय पर सही कदम उठाया है।
होना तो यह चाहिए था कि आतंकवाद के खिलाफ सारे दल एक मंच पर आकर उनका संगठित मुकाबला करके यह सन्देश देते कि देश की समस्याओं का हल लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही निहित है किंतु छुद्र राजनीतिक स्वार्थों में वे एक दूसरे पर दोषारोपण करके आतंकियों के प्रत्यक्ष या परोक्ष मददगार बन रहे हैं। यदि लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों की आस्था टूट गयी और उन्होंने आतंकी गतिविधियों में भरोसा करना शुरू कर दिया तो फिर कोई सुरक्षित नहीं होगा। आग जब फैलती है तो उसका कोई दोस्त नहीं होता।


वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

2 टिप्‍पणियां:

  1. इस देश में जिसके झंडे में भगवा रंग भी है और हरा भी, लेकिन लोग भूल जाते है की इन दोनों के बीच एक रंग अमन का भी है ......

    (आजकल तो मौत भी झूट बोलती है ....)
    http://oshotheone.blogspot.com

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