गुरुवार, सितंबर 09, 2010

आरोप की एक और खुद की और उठी तीन उंगलियाँ


अस्वीकृति में उठा हाथ
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आरोप की एक और खुद की ओर उठी तीन उंगलियां
वीरेन्द्र जैन
राजतंत्र में कभी कहा गया था कि ' यथा राजा तथा प्रजा' जिसे लोकतंत्र आने के बाद उलट कर 'यथा प्रजा तथा राजा' हो जाना चाहिये था। पर क्या ऐसा हुआ है?
हमारे यहाँ जैसा लोकतंत्र आया है वैसा ही बदलाव भी आयेगा। सच तो यह है कि हमने अब तक राजतंत्र को समाप्त नहीं कर पाया है तथा आजादी के कुछ ही दिन बाद सारे राजे महराजे अपना नाम सांसद विधायक रख कर फिर से सत्ता पर काबिज हो गये हैं। सच तो यह भी है कि अंग्रेजों ने हमें गुलाम नहीं बनाया था अपितु हमारे राजा महाराजाओं को गुलाम बनाया था जिनके गुलाम होने के कारण ही हम अंग्रेजों के गुलाम भी हो गये। आजादी हमें नहीं अपितु राजे महाराजाओं को मिली पर हम में से बहुत सारे तो यथावत गुलाम बने रहे। [चुनावों में राज परिवारों की लगातार जीत इसका प्रमाण देती है] चूंकि पूर्व व्यवस्था को निर्मूल किये बिना ही हमें नई व्यवस्था का भ्रम दे दिया गया इसलिए हम शासक की तरह राजतंत्र की सारी बुराइयाँ भोग लेने को उतावले हो गये किंतु अतीत में राजतंत्र के शासकों ने राज्य पाने और उसे बचाये रखने के लिए जो संघर्ष किये थे, जो युद्ध लड़े थे, वैसी लड़ाई की जिम्मेवारी हमने नहीं ली। हम यह भूल गये कि दुनिया में मुफ्त में कुछ भी नहीं मिलता, और हर चीज की कीमत चुकाना पड़ती है। चाहे उस भुगतान का स्वरूप कुछ भी क्यों न हो।
अब हमारे लोकतंत्र के नये राजा पुराने राजाओं की सोहबत में जनता का नये ढंग से शोषण करते हैं जिसमें वे जनता से सीधे नहीं टकराते अपितु उनके बीच में तथाकथित सरकार रहती है जो सीधे टैक्स के अलावा वस्तुओं और सेवाओं पर मनमाने टैक्स थोप कर जनता की कमाई में से बड़ा हिस्सा उगाहती है। सरकार पर सवार नेता व्यवस्था के नाम पर, योजना के नाम पर, रक्षा के नाम पर या विकास के नाम पर वसूले गये धन में से बड़े हिस्से को अफसरों के साथ मिल कर हड़प जाते हैं। चूंकि पॉच साल बाद उन्हें जनता से वोट भी लेने होते हैं इसलिए वे वोटों के दलालों को भी थोड़ी सी बेईमानी की छूट दे देते हैं। यही कारण है कि लुटेरे नेता जनता के एक हिस्से द्वारा निर्भयता से की जा रही अनियमताओं के खिलाफ बोलने की जरूरत नहीं समझते। हम लूट रहे हैं तो तुम भी थोड़ा सा लूट लो।
ऐसे ही लोगों के सहारे अपराध की प्रत्येक विधा के अपराधी संसद तक पहुँच जाते हैं। इनमें हत्यारों से लेकर डकैतों चोरों और बलात्कार के आरोपी ही नहीं सजायाफ्ता तक सम्मलित हैं। जिन लोगों को जनता ने तथाकथित लोकतांत्रिक ढंग से चुना है उन्हें बाद में दुनिया की सबसे बड़ी सजा फाँसी तक हुयी है। सवाल पूछने के लिए पैसे लेने, सांसद/विधायक निधि की अनुमति को बेचने और अपने पासपोर्टों पर दूसरों की पत्नियों को विदेश ले जाने के पैसे लेना आदि तो वे पद पर आने के बाद ही सीखे हैं। पर जनता ऐसे लोगों को ऐसे ही नहीं चुन देती है अपितु उसका एक हिस्सा उन्हें चुनने के लिए पैसे रखा लेता है। यह सोचने का विषय है कि जब कुल मतदान के बहुसंख्यक मत बिके हुये मत हों तो उस बहुमत को कितना लोकतांत्रिक कहा जा सकता है! यह और भी मनोरंजक होता है जब राजनीतिक दल अपनी जीत हार पर सैद्धांतिक मुलम्मा चढाते हैं।
जिस तरह आजादी भी हमें बिना किसी अधिक रक्तपात के शार्टकट से मिल गयी उसी तरह जनता भी संघर्ष के रास्ते से अपने हक नहीं पाना चाहती अपितु वह भी अपने हकों को चुराने लगी है। छोटी छोटी झुग्गियों से लेकर बड़े बड़े बंगलों तक बिजली की चोरी चलती है तथा जिनके जीवन में बिजली की जितनी अधिक जरूरत होती है वहाँ चोरी भी उतनी ही अधिक होती है। उद्योग जगत में भी बहुमत बिजली चोरो का है और जो जितना बड़ा उद्योग चला रहा है वह उतनी अधिक बिजली चोरी कर रहा है ऐसा स्वयं विद्युत विभाग के अधिकारियों ने व्यक्तिगत बातचीत में स्वीकारा है। विद्युत विभाग में जिसे परिचालन हानि मानी जाती है उसका बड़ा हिस्सा बिजली चोरी का ही दूसरा नाम है। मन्दी के दौर में कई लघु उद्यमियों ने बताया कि वे तो बिजली चोरी के दम पर ही उद्योग चला पा रहे हैं अन्यथा कभी का बन्द कर देना पड़ा होता।
बिना कानून के ही लाखों लोग जंगलों में खेती करते रहे हैं । करोड़ों की संख्या में झुग्गियाँ बनी हुयी हैं जो कानूनन अवैध हैं वे सरकार से अपना हक नहीं माँगते अपितु सरकार के साथ संघर्ष की नौबत तभी आती है जब उन्हें झुग्गी से भी हटाया जाता है। जिन लोगों के पास अपने घर मकान हैं उनमें से बहुत सारों ने अपनी पात्रता से अधिक जगह घेर कर रखी हुयी है। पुरानी बस्तियों में चबूतरे बढा रखे हैं तो नई कालोनियों में फेन्सिंग या हरितिमा के नाम पर अतिक्रमण कर लिया गया है। बड़े बड़े बंगलों के मालिक अपने बंगलों को किराये पर चढाये रहते हैं और सरकारी बंगलों में कम किराये या मुफ्त में रह रहे हैं।

मध्यमवर्ग के ज्यादातर लोग किस्तों पर कार तो ले आते हैं पर उसे चलाने के लिए पैट्रोल नहीं खरीद पाते और उनकी कार गाहे बगाहे चलाने के लिए घर के आगे बंधे हाथी की तरह शोभा बढाती रहती है। यह हाथी भी बांधने की जगह चाहता है जिसके लिए उन्हें सरकारी रास्ते में अतिक्रमण करना पड़ता है। पुराने मकानों को बनवाने की अनुमति आमतौर पर लोग नहीं लेते। उसमें किसी भी तरह की तोड़फोड़ और मरम्मत बिना अनुमति के चलती है। घर के आगे सड़क के ऊपर बारजा (बालकनी) निकालना कस्बों में आम बात है और उनमें से अधिकांश अवैध ढंग से बने हैं। रिहायशी इलाकों को व्यावसायिक इलाकों में बदल दिया जाता है और अनुमत्य मंजिलों से अधिक बना ली जाती हैं। बाजार में दुकानदार अपनी दुकान से ज्यादा सड़क तक अपना माल फैलाये रखता है। सड़क पर कचरा फेंकना नाली में बदबूदार गटर का पानी बहाना नाली में बच्चों को टट्टी फिराना और घर का कचरा फेंक कर उनका प्रवाह रोक देना आम बात है। वे अपने अनाधिकार कार्य मे दूसरों की असुविधाओं की चिन्ता नहीं करते जो लोकतंत्र विरोधी प्रवृत्ति है। पूरे देश की नगर पालिकाओं/ निगमों आदि के टैक्स जितनी मात्रा में लम्बित होते हैं वे जनता की वृत्ति को प्रकट करते हैं। जलापूर्ति के बिल समय पर न चुकाने वाले जल समस्या की सबसे अधिक मुखर चिन्ता करते हैं। कस्बों में जलापूर्ति एक समस्या है वहाँ शायद ही किसी घर में मुख्य पाइपलाइन के नल में टोंटी मिले। जल तो वैसे भी आवश्यकता से कम मिलता है पर जहाँ जरूरत से या संग्रह क्षमता से अधिक आता है वहाँ वह टोंटी के अभाव में बेकार बहता रहता है।
टैक्सी टैम्पो ट्रक बस आदि सार्वजनिक वाहनों के चलाने वालों में से बहुत कम ऐसे हैं जिनके पास पार्किंग की सुविधा है। वे चलने वाली सड़क पर ही अपने वाहन खड़े करते हैं। वाहन चालकों द्वारा अपनी सुविधा और लाभ की खातिर ट्रैफिक नियमों की धज्जियाँ उड़ाना तो आम बात है। किसी भी पब्लिक पार्किंग में जिस अन्दाज से वाहन खड़े किये जाते हैं वे इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि अनुशासन को हम ठेंगे पर रखते हैं और हमें अपने स्वार्थ में अपने भाई बन्धुओं की चिन्ता नहीं है।
विकास हेतु ऋण योजनाएं और अनुदान आदि चलाये जाते हैं जो ऊंट के मुँह में जीरे की तरह होती रही है जिन्हें यथार्थ परक बनाये जाने की जरूरत थी पर ज्यादातर लोगों ने उन योजनाओं से प्राप्त अपर्याप्त ऋणों को लेकर उन्हें चुकाया नहीं व योजनाओं को असफल घोषित कराके राहें ही बन्द करवा दीं। अनुदान का पैसा अपात्र लोग पी गये।
सिर्फ सुनिश्चित वेतन पाने वालों, जिनके वेतनभुगतान में से ही आयकर काट लिया जाता है, ऐसे कितने लोग हैं जो पूरी ईमानदारी से आयकर चुकाते हैं। हम उन दुकानदारों की शिकायत करने की जगह उनसे सामान खरीदना ज्यादा ठीक समझते हैं जो बिक्री कर की चोरी को खुले बाजार की प्रतियोगिता का आधार बनाते हैं और बिना बिल के सस्ते में बता कर हमें मौसेरा भाई बना लेते हैं। हम लोग ये नहीं सोच पाते कि रिश्वत लेकर सरकारी विभाग की आय का नुकसान कर हमें जो फायदा पहुंचाते हैं वे दूसरों को भी यही सुविधा देते होंगे और सरकार इस कमी की आपूर्ति नये टैक्स लगा कर करती होगी जो अंतत: हमारे ऊपर ही पड़ता है। जब हम लोकतांत्रिक हैं तो इसका अर्थ है कि हम राजा हैं और हम ऐसे राजा हैं जो अपने ही राज्य को चूना लगा रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग और सहकारिता क्षेत्र के संचालन में हमारी असफलताएं अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसी घटनाएं हैं। होना तो यह चाहिये था कि इन क्षेत्रों को असफल करने वाली सरकारों के खिलाफ एक बड़ा जन आन्दोलन होता पर हम इन क्षेत्रों को ठीक करने के लिए दबाव बनाने की जगह सार्वजनिक क्षेत्र की निन्दा करने वालों की मंडली में बिना सोचे समझे शामिल होते जाते हैं।
रोजगार का अधिकार मांगने की जगह हम रिश्वत देकर नौकरी पाने में लग गये और दी गयी रिश्वत का पैसा निकालने के लिए खुद रिश्वतखोर हो गये। इस तरह एक जहरीले वृत्त में फंस कर सम्पूर्ण देश को फंसाते चले गये। जातिवाद साम्प्रदायिकता, क्षेत्रीयतावाद भाषावाद आदि भी व्यक्तिवाद का थोड़ा सा विस्तारित रूप ही हैं क्योंकि व्यक्तिगत हित साधन हेतु सत्ता से जुड़ाव आवश्यक है जो बहुमत से मिलती है। इसलिए हमने उस सीमा तक घेरा बड़ा करने का प्रयास किया है। लोकतंत्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सीमा होती है तथा सार्वजनिक जिम्मेवारी अधिक होती है वहाँ वैचारिक मतभेद भी सर्वजन सुखाय होते हैं न कि व्यक्तिगत हित में। पर हमने इसका उल्टा व्यवहार किया है।
हमारी व्यवस्था ऐसे मेले की तरह है जिसमें देखने वालों से ज्यादा जेबकतरे घूम रहे हें और वे एक दूसरे की जेबें काटते फिर रहे हैं। नुकसान में वही है जिसे जेब काटना नहीं आता जिसके लिए वह दुखी भर है। हमारे अपने आचरण हमें गलत को गलत कहने से रोकते हैं।

वीरेन्द्र जैन
21 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
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