गुरुवार, सितंबर 23, 2010

दहशत के समय में आशंकाओं के भूत


दहशत के समय में आशंकाओं के भूत
22 सितम्बर की रात में तीन बजे शोर से आँख खुल गयी। बालकनी में बाहर निकला तो “जय श्री राम” का सम्मिलित घोष और शंख ध्वनि जैसी आवाजें सुनायी दीं। दरवाजा खोल कर सडक तक बाहर आया तो पाया कि गणेश विसर्जन करके लौटे किशोर जय श्री राम के घोष के साथ लौट रहे थे और उनके पास ऐसी पीपियाँ थीं जिनमें से शंख से मिलती जुलती ध्वनि निकलती थी। किसी ने बड़े शातिराना ढंग से गणेश विसर्जन कर लौट रहे उन किशोरों को वे पीपियाँ और गणपति बप्पा मोरिया की जगह जय श्री राम का नारा दे दिया था।
साठ वर्ष से लटके फैसले को घोषित किये जाने की तिथि का संयोग भी क्या विचित्र है। किंतु तिथि कोई भी हो हमारे यहाँ हिन्दू मुस्लिम सब मिलाकर इतने ज्यादा त्योहार हैं कि कोई भी तिथि कहीं न कहीं त्योहारों से जुड़ ही जाती और उनकी आड़ में भीड़ की सामूहिकता में भ्रम पैदा करने का काम समाज विरोधी शक्तियाँ करने की कोशिश करतीं। जब तक धर्मनिरपेक्ष ताकतें साम्प्रदायिक ताकतों से मजबूत नहीं होंगी समाज में भय का वातावरण कभी भी बन सकता है।

2 टिप्‍पणियां:

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  2. बिल्कुल सही कहा आपने, हे राम को बडी शातीरता के साथ जय श्री राम के जेहादी नारे में तब्दील करवा दिया गया है। बाजार के हाथो कठपुतली बनी नयी पिढी सांप्रदायिकता की सडी गडी लाश को बंदर की मा के समान छाती से लगाये विश्वशक्ति बनने या कहे रईस बनने का ख्वाब देख रही है। एक तरफ उन्हें इंटरनेट नयी तकनीकि नये गजेट्स, माल, पिज्जा बर्गर चाहिये साथ ही भाग बाचते साफ्टवेयर या भाग बेचते एस एम एस भी चाहिये। विज्ञान चाहिये तकनिकी चाहिये साथ में अंधविश्वास भी चाहिये, जातीवाद भी चाहिये धर्मांधता भी चाहिये। सांप्रदायिक ताकते विज्ञान का इस्तेमाल सांप्रदायिकता मजबुत करने के लिये कर रही है, अज्ञान के अंधकार में डुबी नयी पिढी शंख के स्थान पर पिपरी बजाकर, भजन व भक्ति की जगह डीजे पर ठुमके मारकर गौरवान्वित महसुस कर रही है।
    हे राम...

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