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मंगलवार, मार्च 21, 2017

क्या योगी उमा भारती वाली परिणति से बच सकेंगे

क्या योगी उमा भारती वाली परिणति से बच सकेंगे

वीरेन्द्र जैन
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 जब भाजपा ने बिना मुख्यमंत्री का चेहरा आगे किये लड़ा तो स्वाभाविक ही था कि जीत के बाद चुनाव अभियान के मुख्य प्रचारक प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को यह अधिकार प्राप्त हो कि वे जिसे भी चाहें मुख्य मंत्री घोषित कर दें व जीत के लिए उपकृत विधायक उनके हर प्रस्ताव पर समर्थन की मुहर लगा दें। उल्लेखनीय है कि 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उमा भारती को मुख्यमंत्री पद की दावेदार बनाकर 398 सीटों से प्रत्याशी उतारे थे जिनमें से कुल 47 जीत सके थे व 229 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। उन्हें कुल 15% वोट प्राप्त हुये थे। इसके विपरीत 2017 के आम चुनाव में उनके 312 उम्मीदवार जीते और उन्हें 39% से अधिक मत मिले। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और विविधतापूर्ण राज्य में भाजपा काँग्रेस जैसी पार्टियों द्वारा मुख्यमंत्री घोषित कर चुनाव लड़ने के अपने खतरे होते हैं। भाजपा ने सावधानी बरती जिसका उसे यह लाभ हुआ कि चुनाव के पहले ही टकराव शुरू नहीं हुआ।
मुख्यमंत्री नियुक्त करने का विशेषाधिकार होते हुए भी मोदी-शाह ने जरूरत से अधिक समय लिया किंतु मंत्रिमण्डल की घोषणा के बाद लगा कि इस कठिन पहेली को सुलझाने में इतना समय लगना स्वाभाविक था। स्वयं चुनाव में न उतर कर भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपना दखल बनाये रखने के लिए ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने जनसंघ का गठन किया था जिसको 1977 में जनता पार्टी में झूठमूठ का विलय दिखाया गया था। पर जब उसमें उन्हें अलग से पहचान लिया गया जो देश की पहली गैर काँग्रेस सरकार के टूटने का कारण बना, तब उन्होंने जैसे के तैसे बाहर निकलना ही उचित समझा। वे जनता पार्टी को मिले व्यापक जन समर्थन का लाभ लेना चाह्ते थे इसलिए उन्होंने जनसंघ का नाम भारतीय जनता पार्टी रख लिया। संघ ने इस राजनीतिक शाखा को संघ की घोषित नैतिकता से मुक्त रखा व सरकार बनाने के लिए किसी भी दल से गठबन्धन करना, दलबदल के सहारे सरकारें बनवाना, बिगाड़ना, और काँग्रेस शासन पद्धति में आयी समस्त कमजोरियों को अपनाने से कभी नहीं रोका। उनकी समझ रही कि सरकार में रहने से सरकार की सुरक्षा एजेंसियां उनके काम में हस्तक्षेप नहीं करतीं अपितु बहुत हद तक मदद भी करती हैं। चुनाव के लिए धन एकत्रित करने में उन्होंने किसी नैतिक सीमा को नहीं माना और न ही संघ ने उन्हें वर्जित किया। चुनावों में शराब और पैसा बांटने में वे अपने जैसे किसी भी दूसरे दल से अलग नहीं रहे।
इन चुनावों में भाजपा गठबन्धन के विधायकों की संख्या लगभग 80% है और वे विभिन्न क्षेत्रों, जातियों, का प्रतिनिधित्व करते हैं। उल्लेखनीय है कि मण्डल कमीशन लागू करने के खिलाफ उठे आन्दोलन के कारण सत्ताच्युत होने वाले वी पी सिंह ने हावर्ड यूनीवर्सिटी में भाषण देते हुए कहा था कि भले ही मैंने अपनी टांग तुड़वा ली हो किंतु गोल तो मैंने कर दिया है। इसका सन्दर्भ लेते हुए सुप्रसिद्ध लेखक सम्पादक राजेन्द्र यादव ने लिखा था कि अब उत्तर प्रदेश में कोई सवर्ण मुख्यमंत्री नहीं बन सकता। यह बात सच भी थी क्योंकि भाजपा को भी कलराज मिश्र, लालजी टंडन, राजनाथ सिंह, आदि के होते हुए भी अपने दूसरे क्रम के नेता कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा था। सन्दर्भित चुनावों में भी ठाकुर योगी को मुख्यमंत्री बनाने का वादा निभाने में यही बाधा रही होगी। स्मरणीय है कि चुनावों में जातिवादी समीकरण बैठाने में बहुत मेहनत की गई। प्रदेश में बड़ी संख्या में ब्राम्हण वोटर हैं जिन्हें साधने के लिए ही काँग्रेस ने प्रशांत किशोर की सलाह पर श्रीमती शीला दीक्षित को उनके अनचाहे आगे किया था। यही कारण रहा कि एक ओर तो ब्राम्हण अपना प्रतिनिधित्व चाहते थे तो पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य को पिछड़े अपना मुख्यमंत्री देखना चाहते थे। योगी का अपने क्षेत्र में 141 में से 131 सीटें जितवाने का दावा था। उनका अपना साम्राज्य है जो भाजपा संगठनों के समानांतर है और अपने जनसंगठनों को उन्होंने भाजपा के जनसंगठनों में मिलाने की अनुमति नहीं दी। उन्होंने अपने कुछ समर्थकों को भी समानांतर रूप से चुनाव में उतार दिया था व कहा जाता है कि अगर उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का वादा नहीं किया गया होता तो वहाँ से वे भाजपा उम्मीदवारों को हरवा सकते थे। इन परिस्तिथियों में मुख्यमंत्री ही नहीं पूरे मंत्रिमंडल का गठन ही मोदी-शाह ने किया और योगी को केवल प्रतीकात्मक रूप में उसी तरह मुख्यमंत्री बना दिया गया है जिस तरह उमा भारती को अनचाहे मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना पड़ा था। 
उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के चुनावी कौशल के समक्ष भाजपा अपने किसी भी विधायक को उतारने का मन नहीं बना पा रही थी इसलिए उसने साध्वी वेषभूषा में रहने वाली राजनेता उमा भारती को आगे रख कर दांव लगाया, जो परिस्तिथिवश सफल रहा। भाजपा ने उन्हें प्रतीकात्मक मुख्यमंत्री बने रहने और परदे के पीछे से शासन चलाने की नीति बनायी जो बहुत दिन नहीं चली। यही कारण रहा कि पहला मौका लगते ही उन्होंने दूध में पड़ी मक्खी की तरह उन्हें निकाल कर फेंक दिया। बाद का इतिहास यही बताता है कि उन्होंने नाराज होकर अलग पार्टी बनायी, चुनाव लड़ा व भाजपा को बड़ा नुकसान पहुँचाया। योगी के साथ भी लगभग ऐसी ही स्थितियां हैं। यदि उनका भी स्वाभिमान जाग गया तो वैसा ही संकट फिर पैदा होगा। 
देखना होगा कि योगी की नमनीयता कितनी है व मोदी-शाह उन्हें पद देने के बाद कितने अधिकार देते हैं।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, नवंबर 10, 2016

कूटनीतिक चालें और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव

कूटनीतिक चालें और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 
वीरेन्द्र जैन

वैसे तो हमारे ढीले ढाले लोकतंत्र में किसी को भी सहज रूप से राजनीतिक पार्टी बनाने और चुनाव लड़ने का अधिकार है और कई ‘धरती पकड़’ पार्षद से लेकर राष्ट्रपति पद तक का फार्म भर के इस ढीले ढाले पन का उपहास करते रहते हैं पर उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में चार प्रमुख दलों के बीच टक्कर मानी जा रही है। रोचक यह है कि ये चारों दल राजनीतिक दल के नाम पर चुनावी दल हैं और सामाजिक राजनीतिक आन्दोलनों से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है, भले ही इनका ‘शुभ नाम’ कुछ भी हो। ये चारों दल पिछली परम्परा के अनुसार अपना अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी करेंगे जिसका उनके कार्यक्रमों से कोई सम्बन्ध नहीं होगा क्योंकि ये दल कोई राजनीतिक कार्य करते ही नहीं हैं, एक से दूसरे चुनाव के बीच जो कुछ भी करते हैं वह चुनावी सम्भावनाओं से जुड़ा होता है।
उक्त चार दलों में से तीन दल राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल हैं, और एक राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त दल है। विडम्बना यह है कि इनमें से भी केवल एक दल ही राष्ट्रव्यापी दल कहा जा सकता है और यही दल सबसे कमजोर स्थिति में है। दूसरा दल पश्चिम मध्य भारत का दल है जो केन्द्र में सत्तारूढ है व उद्योग व्यापार वालों की पसन्द का दल होते हुए भरपूर संसाधन जुटा लेता है जिसके सहारे वह साम्प्रदायिक संगठनों को बनाये रखता है। ये संगठन चुनावों के दौरान ऐसा ध्रुवीकरण करते हैं कि उसे चुनावी लाभ मिल जाता है। इस दल की पहचान भले ही एक साम्प्रदायिक दल की है किंतु इसकी साम्प्रदायिकता की प्रमुख दिशा चुनाव केन्द्रित ही रहती है व शेष समय में इसके साम्प्रदायिक संगठन ध्रुवीकरण हेतु भूमि विस्फोटक [लेंड माइंस] बिछाने में लगे रहते हैं। तीसरा राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल एक जातिवादी दल है जो आरक्षण के आधार पर लाभांवित वर्ग में पैदा की गयी जातीय चेतना के भरोसे उनके सहयोग से चलता है। ये वह वर्ग है जिसने सरकारी नौकरियों में आकर पाया कि सवर्णों में उनके प्रति अभी भी नफरत बनी हुयी है और वे उन्हें मुख्यधारा में स्वीकार नहीं करते। स्थानीय निकायों के चुनावों और पंचायती व्यवस्था के चुनावों से लेकर सशक्तीकरण योजनाओं में भी इन्हें आरक्षण का लाभ मिला है जिस पर वे लगातार खतरा महसूस करते रहते हैं व इस भय के कारण एकजुट हो गये हैं। यह दल आंकड़ागत रूप से भले ही राष्ट्रीय दल की मान्यता पा गया हो, किंतु चुनावी दृष्टि से मूल रूप से यह उत्तरप्रदेश तक सीमित क्षेत्रीय दल ही है क्योंकि अभीतक और कहीं भी यह स्वतंत्र सरकार बना पाने में सफल नहीं हुआ है। यह दल अपने चुनावी खर्चों के लिए सवर्णों के उम्मीदवारों से सौदा करके  भी संसाधन जुटाता है। इसका अपना एक सुनिश्चित वोट बैंक बन गया है जिसमें अगर कोई दूसरा वर्ग सहयोग कर देता है तो इनकी जीत की स्थितियां बन जाती हैं व न मिलने पर वे ठीक प्रतिशत में अपने वोट पाकर भी हार जाते हैं। गत लोकसभा चुनाव में चार प्रतिशत वोट पाकर भी वे एक भी सीट नहीं जीत सके। कहा गया था कि ‘हाथी’ ने अंडा दिया है।
चौथी पार्टी राज्य स्तर की अधिमान्य पार्टी है और वर्तमान में वही सत्तारूढ है , अपने नाम में जुड़े समाजवाद शब्द से उनका अब कोई सम्बन्ध नहीं है। यह पार्टी पिछड़े वर्गों की एक जाति के वोटों तक सीमित पार्टी है और इसे भी किसी अन्य के समर्थन की जरूरत बनी रहती है। 2007 और 2012 के परिणाम बताते हैं कि समर्थन मिल जाने पर वे सरकार बना लेते हैं, और न मिले तो हार जाते हैं। इनका जातिगत समर्थन सरकार द्वारा देय सत्ता के लाभों के पक्षपात पूर्ण वितरण से बना है। पुलिस की सहायता से वे आपराधिक भावना वाले अफसरों, व्यापारियों से धन की वसूली भी करते रहते हैं। सरकारी ठेके और खदानों के अपने लोगों के बीच आवंटन से वे बहुत अर्थसम्पन्न हो चुके हैं और पहली बार मिले इस स्वाद को बनाये रखने हेतु एकजुट रहना चाहते हैं।
इस प्रदेश में समुचित संख्या में मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं जो संघ परिवार के सच्चे- झूठे आतंक से ग्रस्त होने के कारण भाजपा को हराना अपना प्रमुख ध्येय मान कर वोटिंग करते हैं और जो दल इस स्थिति में नजर आता है उसे अपना एकजुट समर्थन देकर जीतने में सहायता करते हैं। कभी काँग्रेस तो कभी समाजवादी और कभी बसपा उनके योगदान से लाभांवित होते रहे हैं।
ये चारों ही प्रमुख दल सत्ता की शक्ति और सम्पत्ति हथियाने के लिए लालायित नेताओं से भरे हुये हैं जो अपना लक्ष्य पाने के लिए किसी भी दल में सुविधानुसार आते जाते रह्ते हैं और भविष्य में भी ऐसा आवागमन कर सकते हैं। हाल ही में इनमें से हर दल में दूसरे दल में रह चुके नेता सहज रूप से आ चुके हैं और यह सिलसिला लगातार जारी है। ये सभी कभी न कभी सत्तारूढ रह चुके हैं और भरपूर अवैध धन सम्पत्ति के सहारे चुनावों में धन के प्रवाह द्वारा वोटों में वृद्धि के लिए तैयार थे, किंतु बड़े नोटों पर लगे प्रतिबन्धों ने उनको रणनीतियों में परिवर्तन के लिए बाध्य कर दिया है। इनमें से किसको कितना नुकसान हुआ है इसका आंकलन अभी शेष है किंतु केन्द्र की भाजपा सरकार ने इसे लागू किया है अतः अनुमान किया जा सकता है कि उसने पहले ही सावधानी पूर्वक उचित समय पर पांसे चले होंगे।
सच तो यह है कि यह कोई लोकतांत्रिक लड़ाई नहीं है अपितु सामंती युग का सत्ता संग्राम है जिसे नये हथियारों से लड़ा जाना है। इनमें षड़यंत्र, दुष्प्रचार, झूठ, धोखे, सिद्धांतहीनता, वंशवाद, दलबदल,  जातिवाद, साम्प्रदायिकता, अवैध धन, बाहुबलियों के दबाव, आदि का प्रयोग होगा। सबके पास अपने अपने मिसाइल हैं और अपने अपने कवच हैं। सब एक दूसरे का प्रत्यक्ष और परोक्ष सहयोग लेते देते रहे हैं और उसके लिए अभी भी तैयार हैं। चुनावों का विश्लेषण करते हुए कुछ लोग सैद्धांतिकता का छोंक लगाने की कोशिश करते हैं जो अंततः हास्यास्पद हो जाती है। राजनैतिक चेतना सम्पन्न वोट इतनी कम संख्या में है कि वह चुनाव परिणामों पर प्रभाव नहीं डालता। काँग्रेस किंकर्तव्यविमूढ होकर किराये के चुनावी प्रबन्धक के सहारे है, सपा और बसपा अपने जातिगत मतों के सहारे है व भाजपा दलबदल से लेकर दंगों और बेमेल गठबन्धनों तक कुछ भी कर सकती है।
यह चुनाव नहीं महाभारत का संग्राम है जहां युद्ध जीतने के लिए शकुनि की चालें व कृष्ण की कूटनीतियां सब काम करेंगी।
वीरेन्द्र जैन
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