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सोमवार, अप्रैल 22, 2013

भाजपा का अपमान बोध से दूर तक सम्बन्ध नहीं


भाजपा का अपमान बोध से दूर तक सम्बन्ध नहीं  
वीरेन्द्र जैन

       पिछले दिनों भाजपा कार्यालय में एक और चेहरा बचाने की ओट तैयार की गयी।
       जेडी[यू] ने अपने सम्मेलन में यह जोर शोर से यह स्पष्ट कर दिया है कि वे ऐसी भाजपा के साथ गठबन्धन में सम्मलित नहीं होंगे जिन्हें नरेन्द्र मोदी जैसे बदनाम [राजनाथ सिंह के शब्दों में मशहूर] नेता को प्रधानमन्त्री पद प्रत्याशी के रूप में चुनने की मजबूरी हो। उन्होंने साफ साफ शब्दों में कहा कि वे अटल बिहारी वाजपेयी जैसे उदारवादी चेहरे [गोबिन्दाचार्य के शब्दों में मुखौटे] के कारण भाजपा जैसे [राजनीतिक अछूत] दल के नेतृत्व में एनडीए में सम्मलित हुए थे और वैसी ही दशा में बने रह सकते हैं। स्मरणीय है कि इस एनडीए गठबन्धन को बनाये रखने के लिए ही भाजपा ने अपनी उन तीन प्रमुख माँगों को स्थगित कर दिया था जिनके कारण उसकी एक अलग पहचान थी और वे माँगें थीं, अयोध्या में रामजन्म भूमि स्थल पर ठीक उसी स्थान पर एक भव्य मन्दिर का निर्माण जहाँ बाबरी मस्जिद स्थित थी, दूसरी समान नागरिक संहिता और तीसरी थी कश्मीर के लिए बनी धारा 370 की समाप्ति। इनको स्थगित रखने के बाद भी तेलगु देशम ने उनके गठबन्धन में सम्मलित होना स्वीकार नहीं किया था तथा सरकार से बाहर रह कर कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के उद्देश्य से समर्थन दिया था। लोकसभा अध्यक्ष के रूप में भी उन्होंने पहले अध्यक्ष के आकस्मिक निधन के बाद दूसरे किसी सांसद को अध्यक्ष पद के लिए नामित करने से इंकार कर दिया था। 2002 में गुजरात में सरकारी सहयोग से किये गये मुसलमानों के नरसंहार के बाद ही ममता बनर्जी, राम विलास पासवान, जयललिता आदि के नेतृत्व वाले दलों ने अपना समर्थन वापिस ले लिया था व अन्य दलों ने राजनीतिक मजबूरियों के कारण समर्थन बनाये रखते हुए भी इस कृत्य की निन्दा की थी। स्वय़ं अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी गोलमोल शब्दावली में दोनों पक्षों को साधते हुए राजधर्म निभाने की बात कही थी व अत्याचार की घटनाओं को सुनने के बाद आँखों के आगे रूमाल रख कर फोटो खिंचवाया था। जब देश के अल्पसंख्यक आयोग, महिला आयोग, मानव अधिकार संगठन से लेकर देश भर के राजनीतिक दलों, मीडिया हाउसों, के साथ उनके अपने नेताओं ने भी एक स्वर में मोदी सरकार की निन्दा की थी तब यह जरूरी था कि गुजरात के मुखिया को बदल दिया जाता। यदि गुजरात की जनता भाजपा के कार्यकाल से खुश थी तो विभिन्न जाँचों के पूरा होने तक नेतृत्व बदलने से क्या नुकसान था जबकि ये इसी आधार पर केशुभाई पटेल, आदि को पहले भी बदल चुके थे। सच तो यह है कि यह वही समय था जब नरेन्द्र मोदी नामक व्यक्ति ने भाजपा नामक संगठन की जगह ले ली थी और गुजरात भाजपा को जयललिता की एआईडीएमके, मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी, करुणानिधि की डीएमके, लालू प्रसाद की राजद आदि में बदल दिया था। गुजरात भाजपा एक लोकतांत्रिक सैद्धांतिक संगठन की जगह एक फासिस्ट गिरोह में बदल गयी थी जिसके दुष्परिणाम स्वयं भाजपा ने भुगते। मोदी सरकार पर केवल मुसलमानों के नरसंहार के ही आरोप नहीं लगे अपितु उनके मंत्रिमण्डल के महत्वपूर्ण मंत्री व भाजपा के समर्पित नेता हरेन पण्ड्या के परिवार वालों ने भी सार्वजनिक रूप से भाजपा के वरिष्ठतम नेताओं के सामने नरेन्द्र मोदी को जिम्मेवार ठहराया। उल्लेखनीय है कि जब पिछले दिनों भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम भारत आयी तो वह हरेन पण्ड्या की विधवा जाग्रति पण्ड्या के साथ तो रहीं पर गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यालय के निरंतर प्रयास के बाद भी उन्होंने नरेन्द्र मोदी से मिलना पसन्द नहीं किया। अमेरिका और ब्रिट्रैन आदि देशों द्वारा वीजा देने से इंकार कर देने की तो काफी चर्चा हो ही चुकी है।
       जब यह साफ हो गया कि जेडी[यू] नरेन्द्र मोदी को नेता घोषित किये जाने की सम्भावनाओं पर भी एनडीए गठबन्धन से बाहर होने पर कृतसंकल्प है और वह अपनी बात बिना किसी लाग लपेट के कह रही है तो यह भी तय हो गया कि या तो भाजपा को साफ साफ यह कहना होगा कि वह किसी भी हालत में नरेन्द्र मोदी जैसे व्यक्ति को अपनी ओर से प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नहीं बनायेगी या उसे उस एनडीए गठबन्धन से बाहर जाना होगा जिसके अध्यक्ष श्री शरद यादव हैं। इसका परिणाम यह भी होगा कि उसे बिहार में सत्ता सुख की हिस्सेदारी छोड़ना होगी, जिसका नेतृत्व जेडी[यू] के नितीश कुमार कर रहे हैं। जब नितीश कुमार भाजपा को सरकार से बाहर करेंगे तो सत्तासुख भोगने वाले विधायक विद्रोह भी कर सकते हैं इसलिए भाजपा नेतृत्व ने बिहार के कुछ नेताओं को यह बयान देने के लिए दिल्ली बुलाया कि वे निकले जाने से पहले स्वयं ही बिहार सरकार से बाहर हो लें और रोज रोज हो रहे अपमान से बच सकें। असल में निर्लज्ज भाजपा ने सत्ता के लिए कभी भी किसी भे तरह के अपमान की परवाह नहीं की है और वे अंत अंत तक सत्ता से चिपके रहने की कोशिश करते रहे हैं। जिस साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे उनकी राजनीति चलती है उसकी बेल सत्ता के सहारे ही ऊपर चढती है। स्मरणीय है कि वे अकेले ऐसे दल हैं जो हर तरह की संविद सरकार में सम्मलित होने में सबसे आगे खड़े रहते रहे हैं। जनता पार्टी के गठन के समय तो उन्होंने अपने जनसंघ को जनता पार्टी में विलीन करने का ड्रामा करना भी मंजूर कर लिया था जबकि सीपीएम जैसे दलों ने ने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया था और अपना अस्तित्व बनाये रखते हुए केवल सीटों का समझौता ही किया था। सत्ता के लिए इन्होंने उत्तर प्रदेश में बसपा के साथ छह छह महीने तक सत्ता चलाने का हास्यास्पद समझौता किया और अधिक विधायक होने के बाद भी मायावती को पहले सरकार बनाने की शर्त पर भी झुक गयी थी। बाद में मायावती ने तो समझौता तोड़ दिया था पर इन्होंने दल बदल कर सरकार बना ली थी। उल्लेखनीय है कि सरकार बनाने के लिए सर्वाधिक दल बदलवाने की बीमारी इसी पार्टी ने फैलायी है। सत्ता के लिए सामाजिक और आर्थिक अपराधियों को टिकिट देने में यह किसी भी ऐसे दल से पीछे नहीं रही। मुलायम सिंह के खिलाफ मोहर सिंह को खड़ा करने की शुरुआत इसी पार्टी ने शुरू की थी। बाद में तो उत्तर प्रदेश में राजा भैया, कुंवर अखिलेश सिंह, सुशील सिंह,  और जेल में बन्द बृजेश सिंह तक को टिकिट देकर जीतने की बाजी बिछाते रहे हैं। मध्य प्रदेश आदि राज्यों में भी भ्रष्टाचार से घिरे विधायकों को महत्वपूर्ण मंत्री पद लगातार दिये जाने में भी पार्टी ने कभी अपमानित महसूस नहीं किया। येदुरप्पा को तब तक पद पर बनाये रखा जब तक कि पानी सिर से ऊपर नहीं गुजर गया और खनन माफिया रेड्डी बन्धुओं के सिर पर तो सुषमा स्वराज का हाथ हमेशा रहा। बंगारुओं और ग़डकरियों से भरी इस पार्टी में अब सारे ही लोग सत्ता लोभ में ही पार्टी में हैं इसके लिए वे किसी बदनामी से नहीं डरते। इनके लोग सवाल पूछने के लिए पैसे मांगते पकड़े जाते हैं, सांसद निधि बांटने में पकड़े जाते हैं, कबूतर बाजी में पकड़े जाते हैं, अविश्वास प्रस्ताव पर पाला बदलने के लिए धन लेने में पकड़े जाते हैं और कोई शर्म महसूस नहीं करते व दुबारा टिकिट पा जाते हैं तो गठबन्धन से निकाले जाने में काहे की शर्म? जब अमित शाह और माया कोडनानी को मंत्रिमण्डल में रखने वाले को वे सबसे मशहूर मुख्यमंत्री बताते हुए राजनाथ सिंह गर्व कर सकते हैं तो वे बिहार में जेडी[यू] द्वारा किये जा रहे अपमान की चिंता क्यों करेंगे। बिहार के नेताओं से इसलिए बयान दिलवा दिया गया है ताकि हटाये जाने के संकेत मिलते ही खुद ही छोड़ देने का पाखण्ड दिखा सकें।
       भाजपा स्वाभमानियों की पार्टी नहीं है, यदा कदा कभी गोबिन्दाचार्य जैसे स्वाभिमानी आ जाते हैं तो अब उनके भाजपा के बारे में जो विचार हैं वे भाजपा के चरित्र की असलियत बताते हैं।
खग जाने खग ही की भाषा।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड                           
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629
 

शुक्रवार, जुलाई 15, 2011

आतंकी हमले और धर्मनिरपेक्ष समाज


आतंकी हमले और धर्मनिरपेक्ष समाज

वीरेन्द्र जैन

मुम्बई में हुए दुखद बम विस्फोटों पर संघ परिवारियों की बाछें खिल गयीं हैं, और उनके बयान वीरों ने ही नहीं अपितु इंटरनैटियों ने भी अपने अपने हिस्से की राजनीति खेलना शुरू कर दी। लाशों पर राजनीति करने वाले इन बयानबाजों ने गोयबल्स के सिद्धांत के अनुसार बहुत जोर शोर से वे कहानियां बनानी और फैलानी शुरू कर दीं जिससे जाँच या किसी स्वीकारोक्ति से पहले ही लोग एक खास गुट और वर्ग को अपराधी मानना शुरू कर दें। मालेगाँव, अजमेर, हैदराबाद,.समझौता एक्सप्रैस बगैरह के जिन मामलों में जाँच के बाद असली संदिग्ध पकड़ में आये हैं, उन मामलों में भी पहले दुष्प्रचार के कारण कतिपय कट्टरवादी आतंकी मुस्लिम संगठनों को दोषी समझा गया था और नाकारा पुलिस भी बाहरी तत्वों के सिर पर इसका ठीकरा फोड़ कर चैन करना चाहती थी। भले ही लोग मरते रहें, और आपस में कट मरें, पर आंतरिक सुरक्षा की एजेंसियां सरल लक्ष्य तलाश कर अपनी जाँचें बन्द कर देती हैं। यह प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है। यदि करकरे की लगन नहीं होती तो सारे लोग मेहनत से बचने वाली प्रैस को पहुँचा दी गयी पकी पकायी कहानी से गलत निष्कर्ष निकाल कर, साम्प्रदायिकों के उद्देश्यों को मदद पहुँचा रहे होते। पर एएसटी की जाँच ने दृष्य ही उलट दिया था।

पिछले दिनों देर शाम को मुम्बई में घटी बम विस्फोट की घटना में तुरंत केवल इतने संकेत मिले थे कि ये बम विस्फोट उसी तरह की आई ई डेवाइस से किये गये हैं जैसे पिछले वर्षों में हुये थे जिनमें इंडियन मुजाहिदीन का हाथ पाया गया था, किंतु घटना की कुछ ही घंटों के अन्दर भोपाल में बैठे मध्यप्रदेश के भाजपा पदाधिकारी इस तरह से बयान दे रहे थे जैसे कि किसी अदालत ने फैसला सुना कर किसी को दोषी साबित कर दिया हो। उनके संकेत मिलते ही संघ परिवार के प्रचार से जुड़ी सारी एजेंसियां इसी काम में जुट गयी थीं। आतंकी घटनाएं अनजान और अज्ञात लोगों को मारने की दृष्टि से नहीं की जाती हैं अपितु इनका उद्देश्य समाज में डर और अविश्वास पैदा करके पहले से पैदा कर दिये गये मनमुटाव को दंगों में बदल देने का होता है। जाँच से पूर्व ही एक आतंकी गुट और वर्ग को नामित करके जोर शोर से उसके विरुद्ध जुट जाने वाले आतंकियों के काम में मदद कर रहे होते हैं।

अनुभवी पत्रकार रहे मध्यप्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने तुरंत बयान दिया कि “बुधवार को कसाव का जन्मदिन है इसलिए आतंकियों ने उसे ये बर्थडे गिफ्ट दी है। कसाव और अफजल गुरू को सजा होने के बाद भी आजतक फांसी पर नहीं लटकाया गया इससे आतंकियों के हौसले बुलन्द हैं। मुम्बई में बम धमाकों की घटना इसी का नतीजा है।“ कहना न होगा कि उन्होंने योजनाबद्ध ढंग से माहौल बनाना और जाँच से पहले ही निष्कर्ष थोपना शुरू कर दिया जिसके परिणामस्वरूप प्रैस ने भी उसी लीक पर दौड़ना शुरू कर दिया। इंडियन मुजाहदीन भी एक धार्मिक कट्टरतावादी आतंकी संगठन है और उसके भी हाथ होने से इंकार नहीं किया जा सकता, किंतु आतंकी संगठन अपना दबदबा बनाने के लिए घटना के बाद अपना दावा भी कर देते हैं। बिना किसी दावे और जाँच निष्कर्ष के जोर शोर से एक संगठन विशेष को इंगित कर देने से जाँच की दिशा भटक भी सकती है और असली अपराधी को लाभ मिल सकता है। यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि कसाव का जन्मदिन 13 जुलाई नहीं अपितु 13 सितम्बर को पड़ता है, किंतु राजनीतिक दुष्प्रचारकों ने विकीपेडिया पर दो बार उसकी जन्मतिथि बदल कर उसे 13 जुलाई करने का प्रयास किया। इससे संकेत मिलता है कि इस दुर्भाग्यपूर्ण अमानवीय घटना से लाभ उठाने के इरादे किसके हैं।

आतकियों का लक्ष्य चन्द जानें लेना नहीं होता है अपितु इससे वे पूरे समाज के बीच डर और टकराव पैदा करना चाहते हैं, यदि लोग डरना और आपस में अविश्वास करना छोड़ देते हैं तो कुछ अनजान लोगों को मारकर, जिनमें किसी भी समुदाय के सदस्य हो सकते हैं, उनका लक्ष्य पूरा नहीं होता। मुम्बई वालों ने एक बार फिर संकेत दिया है कि वे आतंकियों के मंसूबों को पूरा नहीं होने देंगे।

इस अवसर पर सत्तारूढ दल के नेताओं के बयान बेढंगे, बेडौल, बेहूदे रहे। भले ही इसमें कोई सन्देह नहीं है कि इस इतने बड़े बहुसंस्कृतियों वाले विकासशील लोकतांत्रिक देश में अकेले पुलिस के सहारे ऐसी आतंकी घटनाओं का स्थायी तौर पर रोकना कभी भी सम्भव नहीं हो सकता फिर भी उसके आगे हार भी स्वीकार नहीं की जा सकती। आपत्ति काल में तात्कालिक मरहम की जरूरत होती है न कि विश्लेषण की। सच तो यह है कि कट्टरता किसी भी किस्म की हो वह खतरनाक होती है और एक धार्मिक कट्टरता का जबाब दूसरी धार्मिक कट्टरता से नहीं दिया जा सकता अपितु उसका जबाब होता है एक मजबूत धर्मनिरपेक्ष समाज। दुर्भाग्य से हमारे यहाँ यह समाज कमजोर है और इस पर हर तरह की कट्टरता के हमले होते रहते हैं। जिस दिन धर्मनिरपेक्ष समाज मजबूत हो जायेगा उस दिन आतंकियों को ऐसी घटनाओं का लाभ नहीं मिलने के कारण ये हमले बन्द हो जायेंगे। इसके विपरीत जब तक कट्टरवादी धार्मिक समाज फलते फूलते रहेंगे तब तक आतंकी हमलों को रोकना कठिन रहेगा।

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

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शुक्रवार, अक्टूबर 22, 2010

फैसला नहीं जनहित में एक समाधान

फैसला नहीं किंतु जनहित में एक समाधान वीरेन्द्र जैन
एक सम्पन्न सेठ एक बार यात्रा पर जाने के लिए प्रातः जब घर से निकले तो उनके रात्रि कालीन चौकीदार ने हाथ जोड़ कर निवेदन किया कि वे जिस हवाई जहाज से यात्रा करने वाले हैं उससे न जायें क्योंकि उसने रात्रि में सपने में देखा कि उस हवाई जहाज का एक्सीडेंट हो गया है। वैसे तो सेठजी इन बातों को दकियानूसी मानते थे पर कुछ सोच कर उन्होंने अपनी यात्रा स्थगित कर दी। संयोग से उस दिन वह् जहाज सचमुच दुर्घटनाग्रस्त हो गया और उसमें सवार सभी यात्री मारे गये। उसके कुछ दिन बाद वे जब एक ट्रेन से जाने वाले थे तो उसी रात्रि कालीन चौकीदार ने एक बार फिर हाथ जोड़ते हुये बताया कि उसने सपने में देखा कि उस ट्रेन का एक्सीडेंट हो गया है इसलिए कृपया उस ट्रेन से न जायें। सेठजी ने यात्रा स्थगित कर दी और एक बार फिर ऐसा संयोग हुआ कि उस ट्रेन का एक्सीडेंट हो गया और एक बार फिर सेठजी की जान बच गयी। सेठजी ने उस चौकीदार को बुलाया और उसे पाँच लाख रुपयों की राशि इनाम में देते हुए बोले कि तुमने हमारी जान बचायी है इसके लिए यह मामूली सी राशि दे रहा हूं और इसी के साथ तुम्हें नौकरी से निकाल रहा हूं। खुशी और दुख एक साथ झेलते हुए जब उसने सेठजी से कारण जानना चाहा तो वे बोले कि तुमने हमारी जान बचायी उसके लिए यह चेक है, किंतु हमने तुम्हें रात की चौकीदारी के लिए रखा है न कि सोने और सपने देखने के लिए। तुमने हमारी जान बचाने के लिए जो कुछ किया वह पुरस्कार के योग्य है किंतु अपनी ड़्यूटी ठीक तरह नहीं निभाने के कारण तुम्हें नौकरी से मुक्ति देना भी जरूरी है।
ठीक इसी तरह रामजन्म भूमि मन्दिर और बाबरी मस्जिद भवन भूमि विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिये गये फैसले ने हमारी जान बचा दी है भले ही उसे मुकदमे के इतिहास और उसकी संवेदनशीलता को देखते हुए जनहित में न्याय की जगह समाधान माना जा रहा हो।
इस फैसले ने देश को एक नये मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। विवादित भूमि- भवन का यह बँटवारा यदि समाज में शांति बनाये रखने व हिंसक साम्प्रदायिकों से लोगों की जान माल की रक्षा के पवित्र लक्ष्य को ध्यान में रख कर किया गया है, जैसा कि विभिन्न न्यायविदों द्वारा समझा जा रहा है, तो ये हमारी व्यवस्था पर गम्भीरतापूर्वक विचार का विषय है। इस फैसले का स्पष्ट संकेत है कि न्यायपालिका हमारे समाज और शासन-प्रशासन को इतना सक्षम नहीं मानती जो संवैधानिक न्याय का शांतिपूर्वक परिपालन करा सके। इसलिए उसने अपनी ओर से सरकारों की क्षमता के अनुरूप ऐसा फैसला देने का प्रयास किया है जो सीधे सीधे किसी को भी आहत न महसूस होने दे और अपने स्वार्थ में साम्प्रदायिक शक्तियां इसका अनुचित लाभ न उठा सकें। उन्हें आभास रहा होगा कि इतने लम्बे चले विवाद में राजनीतिज्ञों के पड़ जाने से वे किसी भी पक्ष को न तो फैसला स्वीकार करने देंगे और न ही समझौता करने देंगे। अंततः इसका अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट से होना होगा तथा समाज में शांति चाहने वाले लोग यही चाहेंगे कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी तब तक चले, जब तक कि समाज इतना परिपक्व न हो जाये कि न्यायपालिका के अंतिम फैसले को विनम्रतापूर्वक स्वीकार कर ले।
कानून और व्यवस्था राज्य सरकारों की जिम्मेवारी होती है और भिन्न भिन्न राज्यों में भिन्न भिन्न राजनीतिक दलों या गठबन्धनों की सरकारें हैं। इनमें से कुछ राजनीतिक दल ऐसे भी हैं जो अपनी सांगठनिक क्षमता की दम पर साम्प्रदायिक हिंसा से लाभ उठाते रहे हैं व गैर राजनीतिक आधार पर अपना विस्तार करते रहे हैं। इस सण्भवना से इंकार नहीं किया जा सकता कि ऐसे राजनीतिक दल और संगठन उसे एक चुनावी लाभ के अवसर की तरह लें। ऐसा सोच इसलिए भी सम्भव है कि पिछले कुछ वर्षों में कुछ राज्य सरकारों ने अपने चुनावी लाभ के लिए राजधर्म का पालन नहीं किया था। इसी विवादित स्थल को अदालत के फैसले के पूर्व ही ढोल धमाकों के साथ ध्वस्त कर दिया था और राष्ट्रीय एकता परिषद में उसकी रक्षा का वादा करने के बाद भी तत्कालीन सत्तारूढ मुख्यमंत्री आज अपने उस कृत्य पर गर्व करते घूम रहे हैं। इस घटना के लिए षड़यंत्र रचने वालों की जाँच को ही सम्भवतः देश में शांति बनाये रखने के लिए अठारह साल तक खींचा गया था और आज तक उसकी अंतिम रिपोर्ट अपनी परिणति की प्रतीक्षा कर रही है। गुजरात में साबरमती एक्सप्रैस की बोगी नम्बर 6 में लगी आग के बाद पूरे प्रदेश में सरकारी इशारे पर निर्दोष और कमजोर मुसलमानों का नर संहार किया गया था व उसके अपराधियों को आठ साल बाद कोई सजा नहीं मिल सकी है, सारे अपराधी सोचे समझे कमजोर अभियोजन और गवाहों पर पड़े दबावों के कारण छूट गये हैं। बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद आहत मुस्लिम संगठनों ने पूरे मुम्बई में जगह जगह बम विस्फोट करके सैकड़ों निर्दोष नागरिकों को मौत के मुँह में धकेल दिया था जिन में से कई को फाँसी की सजा घोषित हुयी है, किंतु जिस जिस घटना की प्रतिक्रिया में बम विस्फोट हुये उसके अपराधी अभी भी बड़े बड़े संवैधानिक पदों को भोगते हुये आराम से हैं व और बड़े सपने देख रहे हैं। जब तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला आये तब तक का समय यह अवसर देता है कि इस बीच समाज एक ऐसा सशक्त धर्मनिरपेक्ष संगठन तैयार कर ले जो अदालत के फैसले को लागू करवाने लायक व्यवस्था बना सकने में प्रशासन का सहयोगी हो और इतना सक्षम हो कि साम्प्रदायिक सद्भाव को तोड़ने वाली किसी भी रंग की शक्तियों से मुकाबले के लिए तैयार हो।

साम्प्रदायिक ताकतों का दुस्साहस धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के अभाव में ही उफान लेता है और अपने पक्ष की सरकार में ही हिंसा फैलाता है। जहाँ जहाँ धर्मनिरपेक्ष शक्तियाँ सक्रिय होती हैं वहाँ साम्प्रदायिकता कोने में दुबक जाती है। यह चिन्ता का विषय है कि उत्तर पश्चिम भारत में अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए समाज को तोड़ने वाली शक्तियाँ अधिक संगठित और साधन सम्पन्न हैं जिसका दुष्प्रभाव न्यायिक फैसलों तक पहुँचता है। इस फैसले का एक खतरा यह भी हो सकता है कि साम्प्रदायिक शक्तियों की विध्वंसक क्षमता अपने अनुसार फैसला करवाने के लिए अपनी हिंसक मनोवृत्ति को और अधिक धार देने लगे। विनय कटियार और महंत अवैद्यनाथ जैसे लोगों ने संकेत देने शुरू कर दिये हैं।
वीरेन्द्र जैन
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