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गुरुवार, सितंबर 14, 2017

हिन्दी दिवस पर - मरती बन्दरिया से खेल दिखाते मदारी

हिन्दी दिवस पर
मरती बन्दरिया से खेल दिखाते मदारी

                                    वीरेन्द्र जैन
              एक होता है हिन्दी दिवस जो भारत वर्ष के हिन्दीभाषी प्रांतों में 14 सितम्बर को मनाया जाता है। इस दिन विद्वान के भेष में दिखने वाले लोग सरकारी गैरसरकारी कार्यालयों में हिन्दी की अवनति पर आँसू बहा कर इस आयोजन के लिए तय बज़ट का व्यय कराने में सहयोगी होते हैं।
                 इस हिन्दी दिवस के साथ हम अगले पचासों हिन्दी दिवसों तक हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं के सामाजिक व प्रशासनिक उपयोग में कमी होते जाने का रोना रोयेंगे जो धीरे धीरे एक अवसरगत परम्परा का स्वरूप लेता जायेगा। ऐसा करने वालों में धन्धेवाज़ पत्रकार और हिन्दी भाषा के नाम पर कमाई करने वाले लेखक प्रमुख होंगे जो राजस्थान के रुदालों की तरह अपने अपने रूमाल आँखों से लगाने से पहले फोटोग्राफरों और मीडिया कर्मियों को अपने प्रायोजित कार्यक्रम की सूचना दे देंगे।
       जैसा कि ‘अपने अपने’ की भावुकता को भुनाने के लिए भाजपा [पूर्व जनसंघ] के जनक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने ‘हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान’ का नारा उछाल कर देश विभाजन का सूत्रपात किया था, वैसे ही भावुकता के आधार पर हिन्दी के लिए नकली आंसू बहाने वाले भी करने जा रहे हैं। ये दोनों तरह के रोने वाले भाषा के जन्म, प्रचलन, और भविष्य के बारे में वैज्ञानिक दृष्टि से नहीं सोचते। भाषा को संवाद की ज़रूरत पैदा करती है तथा जब तक वह सहज संवाद को बनाने व बनाये रखने में सक्षम रहती है तब तक वह जीवित रहती है और जब हमारे संवाद के पात्र और विषय बदलने लगते हैं तो उसका स्थान कोई नई भाषा लेने लगती है जो सम्बन्धितों के साथ होने वाले संवाद को अधिक सुविधाजनक बना सके। संस्कृत का स्थान हिन्दी और बोलियों का स्थान खड़ी बोली लेती गयी। हम सब जब अपने मूल निवास की ओर जाते हैं तो अपने पुराने मिलने जुलने वालों से वहीं की बोली में बतिया कर खुश होते हैं पर नगर में वापिस आने पर फिर से खड़ी बोली बोलने लगते हैं।
       जब से नई आर्थिक नीतियों के अंतर्गत हम वैश्वीकरण की ओर बढने लगे  हैं तभी से हिन्दी का स्थान अंग्रेज़ी लेने लगी है, जो स्वाभाविक है। हमें जब जिससे संवाद की निरंतरता बनाये रखनी होगी तो उसको सहज रूप से समझ में आ जाने वाली भाषा का प्रयोग करना होगा। विश्व बैंक व अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण प्राप्त करने के लिए अंग्रेज़ी की ही ज़रूरत पड़ेगी जबकि देश के राष्ट्रीयकृत बंकों से ऋण लेने वालों को हिन्दी में फार्म उपलब्ध कराये जाते हैं।
       स्मरणीय है कि 1970 से बाद के दो दशकों में सरकारी कार्यालयों में हिन्दी का तेज़ी के साथ विकास हुआ। यह वह दौर था जब श्रीमती इन्दिरा गान्धी को कांग्रेस के अंदर अमेरिका परस्त गुट से मुक़ाबला करना पड़ा व आत्मरक्षार्थ उन्हें कांग्रेस से बाहर निकालना पड़ा। इस विभाजन से आये अभाव को पूरा करने के लिए उन्हें बामपंथियों से समर्थन माँगना पड़ा, जिन्होंने बैंकों, बीमा कम्पनियों, समेत अनेक जनोपयोगी संस्थानों का राष्ट्रीयकरण चाहा और सार्वजनिक क्षेत्र के विकास को प्राथमिकता पर रखने की सलाह दी। बैंक आदि जब आम आदमी के हितार्थ गाँव गाँव पहुँचे व अनेक तरह की गरीबी उन्मूलन वाली योजनाओं के सहयोगी बने तो उन्हें आम आदमी की भाषा में काम करने के लिए विवश होना पड़ा। यही वह समय था जब बहुत बड़ी संख्या में हिन्दी अधिकारी और अनुवादक नियुक्त हुये। प्रत्येक कार्यालय में हिन्दी के टाइपराइटर आये और परिपत्र हिन्दी में ज़ारी होने लगे। आम आदमी की योजना से जुड़े विज्ञापन हिन्दी में ज़ारी करने पड़े। सरकारी कार्यालयों में नौकरी पाने के इच्छुक लोगों ने हिन्दी सीखना चाही। कुल मिला कर कहने का अर्थ यह कि जब सरकार ने जनता से संवाद करना चाहा तब उसे उसकी भाषा को अपनाना पड़ा। आगे भी जब सरकार जनोन्मुखी होना चाहेगी तो वह हिन्दी और दूसरी लोक भाषाओं का प्रयोग करेगी।
       नई आर्थिक नीतियां आने के बाद सरकार सारी दुनिया से बातें करने लगी है जिसके लिए अंग्रेज़ी ज़रूरी है। इन्हीं नीतियों का ज्वलंत प्रमाण यह है कि आर्थिक विकास की दर प्रगति पर है और किसान हज़ारों की संख्या में आत्महत्याएं कर रहे हैं व भूख से मौतें हो रही हैं। समाज से कुछ लोगों को माडल बना कर उन्हें देश और विदेश में नौकरियां दी जा रही हैं व इन नमूनों को जोर शोर से प्रचार दिया जा रहा है। इसका परिणाम यह निकल रहा है कि लाखों मध्यम वर्गीय परिवार अपने बच्चों को मँहगे मँहगे अंग्रेज़ी स्कूलों में भेज रहे हैं और ऐसे स्कूल कुकरमुत्तों की तरह गली गली में खुल रहे हैं। अब फिर से सब कुछ वैसे ही अंग्रेज़ी में होने लगा है जैसे बीच में लोग हिन्दी के प्रति उन्मुख हुये थे। राजनीति अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है और अर्थव्यवस्था समाज की भाषा और संस्कृति को।
                        यह नया भाषायी रुझान देश में एक और विभाजन पैदा कर रहा है जो निम्नवर्ग और मध्यमवर्ग के बीच है। कुछ दिनों बाद एक की भाषा अंग्रेज़ी होगी और दूसरे की हिन्दी। दूसरे देशों में हिन्दी भाषी होने का अर्थ निम्नवर्गीय होना होगा। हिन्दी दिवस के दिन प्रलाप करने वालों ने कभी समस्या के मूल में जाने की ज़रूरत नहीं समझी। उन्हें तो प्रलाप के पैसे लेने हैं ताकि अंग्रेज़ी स्कूल जाने वाले अपने बच्चे की भारी फीस चुका सकें।
वीरेन्द्र जैन        
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास  भोपाल मप्र
फोन 9425674629                                      
                           




सोमवार, जनवरी 19, 2015

आवश्यकता अविष्कार की जननी की तरह ही भाषा का विकास




आवश्यकता अविष्कार की जननी की तरह ही भाषा का विकास
वीरेन्द्र जैन

       जीवित प्राणियों में केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो अपनी बात को भाषा में बोल और लिख सकता है और इस तरह दूर दराज तक अपने अनुभवों को काल के किसी भी खण्ड तक ले जा सकता है। अन्य प्राणी  आवाज तो निकालते हैं किंतु वह आवाज उनकी जाति और उस काल तक ही सम्प्रेषित हो पाती है। यह उनकी अपनी तात्कालिक जरूरत तक ही सीमित रहती है। मनुष्य सामाजिक अध्य्यन और विकास के लिए भी भाषा का उपयोग करता है।  
       भाषा जीवन के लिए है, जीवन भाषा के लिए नहीं। इसलिए अगर जीवन जड़ या पुरोगामी नहीं है तो उसके उपयोग के साधन भी समय और जरूरत के अनुसार बदलेंगे। भाषा भी उनमें से एक है। इतिहास बताता है कि हमारे देश में भी भाषाओं में निरंतर परिवर्तन होता रहा है। जैसा कि होता है कि यथास्थिति से लाभांवित होने वाले या किसी अन्य कारण से उससे चिपके रहने वाले लोग ऐसे परिवर्तनों का विरोध करते रहे हैं। हिन्दी के सबसे महत्वपूर्ण कवि तुलसी दास ने जब आम आदमी की बोलचाल की भाषा में रामकथा लिखी थी तो बनारस के ब्राम्हणों ने यह कहते हुए उन पर घातक हमले किये थे कि प्रभु का चरित्र तो देव भाषा [संस्कृत] में ही लिखा जा सकता है भाखा [आम आदमी के बोलचाल की भाषा] में लिखना उनका अपमान है। इतिहास गवाह है कि तुलसी दास ने कितनी कठिनाइयों के साथ अपने ग्रंथ का पाठ आयोजित करवाया था और उसे नाट्य रूप देकर जगह जगह रामलीलाएं करवायी थीं, जो आज लगातार खेले जाने वाला सबसे पुराना जननाट्य है। उसी का परिणाम है कि आज हिन्दी भाषी क्षेत्र में राम के सबसे अधिक भक्त हैं और अधिकांश मन्दिर इसी जनप्रियता के बाद ही निर्मित हुये हैं। आज हजारों लोग राम चरित मानस के पाठ और व्याख्याओं की दम पर ही अपनी रोजी रोटी चला रहे हैं। रामचरित मानस में ही अवधी, बुन्देली, भोजपुरी और ब्रजभाषा के शब्दों का एक साथ प्रयोग देखने को मिलता है और कहा जा सकता है कि भाषायी क्षेत्रों की एकता में तुलसी की भाषायी एकता की बड़ी भूमिका है। इन सारे क्षेत्रों में रिश्तों की नैतिकताओं के पीछे इस एक ग्रंथ के आदर्श निहित हैं। यदि रामकथा केवल संस्कृत तक सीमित रहती तो वह, और उसके आदर्श पिछड़ों और दलितों तक नहीं पहुँच पाते।
       भाषा सम्प्रेषण का माध्यम है और भाषा व उसमें शब्दों का चयन इस बात पर निर्भर करता है कि कौन किसको सम्बोधित कर रहा है और उस सम्बोधन का विषय क्या है। समाज में होने वाले परिवर्तनों में सम्बोधित करने वाले और सम्बोधित होने वाले व्यक्ति ही नहीं बदलते अपितु सम्वाद के विषय भी बदलते रहते हैं। उल्लेखनीय है कि जब 1971 में इन्दिरा गाँधी द्वारा बैंकों, बीमा कम्पनियों के राष्ट्रीयकरण की आँधी आयी और आम आदमी को बैंकों में प्रवेश मिला तब बड़ी संख्या में हिन्दी अधिकारियों की भर्ती हुयी क्योंकि बैंकों को आम आदमी के साथ सम्वाद करना था। किंतु 1991 से जब नई आर्थिक नीतियों के अंतर्गत उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण पर जोर दिया जाने लगा तो धड़ाधड़ अंग्रेजी सिखाने वाले संस्थान बढ गये। मोबाइल और कम्प्यूटराइजेशन के बढते ही बहुत सारे लोगों ने कामचलाउ अंग्रेजी सीख ली। जब हम वे वस्तुएं अधिक से अधिक स्तेमाल करना पड़ेंगीं जो विदेशों में ही अविष्कृत हुयी हैं और वहीं उन वस्तुओं व पुर्जों का नामकरण हुआ है तो हम उनकी भाषा के शब्दों से कैसे गुरेज कर सकते हैं। सरकारी कार्यालयों ने हिन्दी के नाम पर अंग्रेजी शब्दों का जो संस्कृतीकरण किया है वह कितना निरर्थक और हास्यास्पद हुआ है यह हम जानते ही हैं। इसलिए नागरिकों के बीच जाति, धर्म, रंग भाषा, और लिंग का कोई भेद न मानने वाले लोकतांत्रिक देश में हमें हर आम जन से अगर सम्वाद करना है तो उस भाषा को अपनाना होगा जो सबकी समझ में आ रही हो। इसमें संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, के शब्द भी हिन्दी में आना स्वाभाविक है व इसी तरह दूसरी भाषाओं में भी अन्य भाषाओं के शब्दों का आदान प्रदान होना तय है। दूसरी ओर यह भी ध्यान में रखने की बात है कि हम अपनी हीनताबोध में विदेशी भाषा को ओढने की कोशिश न करें। जिस तरह गंगा में गन्दे नाले मिल कर भी पवित्र हो गये मान लिये जाते हैं उसी तरह अगर हम दूसरी भाषाओं के सीमित शब्दों को ग्रहण करेंगे तो उससे हमारी गंगा का कोई नुकसान नहीं होगा। सभी जानते हैं कि अंग्रेजी भाषा कितने अधिक शब्द दूसरी भाषाओं के सम्मलित करती रही है जिसके करण ही वह विश्व में सम्वाद की भाषा बन सकी है।
       सोचने का विषय यह है कि हम आज़ादी के बाद कोई नया अविष्कार, या विचार क्यों नहीं दे सके! जब हम वस्तुओं, विचारों और कार्यक्रमों का आयात ही करते रहेंगे व हमारे पास निर्यात करने के लिए कुछ नहीं होगा तो हमें न केवल दूसरों की भाषा अपितु संस्कृति भी अपनानी पड़ेगी। बाज़ार जब आता है तो अपनी मांग पैदा करने के लिए अपने साथ अपनी संस्कृति भी लाता है। अगर हम पिज्जा और बर्गर का अनुवाद करेंगे तो उसका स्वाद ही खराब करेंगे। अपनी भाषा के नये शब्दों को प्रचलन में लाने के लिए उसे पूर्व प्रचलित भाषा और आदर्श व्यक्तियों से जोड़ना पड़ता है। जब दूरदर्शन पर महाभारत सीरियल आता था तब रिश्तों के आगे श्री लगाना प्रारम्भ हो गया था जैसे जीजाश्री, भाभीश्री, आदि। यह सीरियल का प्रभाव था। उसी तरह लोकप्रिय फिल्मों के प्रमुख डायलोग या चरित्र भी प्रचलन में आ जाते हैं।      
       भाषा का छुआछूतवाद संवाद की क्षमताओं को घटाता है। दुनिया की समस्त भाषाएं क्रियाओं से विकसित हुयी हैं। किसी भी काल खण्ड की प्रचलित भाषा किसी दूसरे कालखण्ड में वैसी ही नहीं रह सकती इसलिए जरूरी है कि हम प्रत्येक ग्रहणीय शब्द को गले लगाने में गुरेज नहीं करें। ‘आनो भद्रा क्रतवो यंतु विश्वत’ ।
वीरेन्द्र जैन                                                                           
2 /1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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मोबाइल 9425674629
          

मंगलवार, जनवरी 13, 2015

भाषायी गुलामी केवल अंग्रेजी की ही नहीं

भाषायी गुलामी केवल अंग्रेजी की ही नहीं
वीरेन्द्र जैन
हम आये दिन भाषायी गुलामी का स्यापा यहाँ वहाँ सुनते रहते हैं व 14 सितम्बर के आस पास यह रूदन और तीव्र हो जाता है क्योंकि देश में सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान आने के बाद वहाँ प्रतिवर्ष यह आयोजन धन सम्मान आदि देकर कराया जाता है इसलिए रूदालों की एक राष्ट्रव्यापी टीम खड़ी हो गयी है जो हिमालय से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक जाकर ऑंसू बहाते हैं। रोचक यह भी है कि इस रूदन कार्यक्रम में वे लोग भी सम्मिलित होते हैं जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में वयस्क अवस्था प्राप्त कर लेने के बाद भी आजादी की लड़ाई में कोई हिस्सा नहीं लिया था तथा अभी भी उन लोगों के पीछे खड़े नजर आते हैं जिनका आजादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं रहा तथा आजादी के मतवालों का जो हमेशा ही साम्प्रदायिकता फैला कर विरोध करते रहे।
      आखिर ये भाषायी गुलामी होती क्या बला है! इसे जानने से पहले हमें आजादी और गुलामी को भी सही तरीके से समझना होगा। क्या जिस देश में सारे लोग एक समान न हों वहाँ क्या आजादी और गुलामी सब के लिए एक जैसी हो सकती है? जिन देशों   में दास प्रथा थी वहाँ की राष्ट्रीय आजादी के बाद भी क्या दासों को आजादी मिल गयी थी? अमेरिका के पहले सोलह राष्ट्रपति स्वयं दासों के मालिक रहे हैं। हमारे देश के प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन के आठ साल बाद सन 1865 में वहाँ दास प्रथा समाप्त हुयी। इसके भी सौ साल बाद तक भी वहाँ रंगभेद चला और काले लोगों को पुलिस, जेल-व्यवस्था तथा केकेके अर्थात कु क्लक्स और क्लान के छापामार दस्तों का दमन झेलना पड़ा। 1967 के पहले काले लोगों को गोरे लोगों के स्कूलों में पढने नहीं दिया जाता था और ना ही वे उनके शौचालयों, बसस्टेशनों, और फव्वारों की ओर जा सकते थे। 1967 में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने काले और गोरे लोगों के बीच विवाह और यौन सम्बंधों की इजाजत दी जो पहले प्रतिबंधित थे। इतना ही नहीं अभी पिछले दिनों बराक ओबामा की उम्मीदवारी के चुनाव के दौरान हिलेरी क्लिंटन ने उनकी चमड़ी के रंग को आधार बना कर अपना चुनाव प्रचार चलाया था। उल्लेखनीय है कि हमारे देश में भी हमारे संविधान की रचना में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले बाबा साहब अम्बेडकर भी उस समय अंग्रेजों से आजादी के पक्षधर नहीं थे क्योंकि उनका मानना था कि आखिर यह आजादी किसको मिलेगी! उसी उच्च कहलाने वाले सवर्ण वर्ग को। दलित तो गुलाम के गुलाम रहेंगे और जब तक कि दलितों के लिए उनकी 'आजादी' के हालात नहीं बन जाते तब तक यह एक बहुत सीमित आजादी ही होगी। गांधीजी ने उनकी बात समझी थी इसीलिए हरिजन उद्धार के सामाजिक आन्दोलनों को राजनीतिक आन्दोलनों की बराबरी पर चलाया था और उसके विरोध का परिणाम भी झेला था- स्मरणीय है कि गांधीजी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे ने गांधीजी को गोली मारने के बाद दिये गये बयानों में कहा था कि मैंने ऐसे साँप को मारा है जो हिन्दू धर्म को डॅंस रहा था। उसकी निगाह में वर्णव्यवस्था ही हिन्दू धर्म था। बाद में अम्बेडकर ने भी हिन्दू धर्म से आजादी ली थी और पाँच लाख दलितों के साथ नागपुर में हिन्दूधर्म छोड़ने के लिये सामूहिक रूप से बौद्ध धर्म अपनाया था।
      इसलिए भेद भाव वाले समाज में भाषायी गुलामी भी सबके लिए एक जैसी नहीं हो सकती। आम तौर पर हिन्दी भाषी लोगों को अंग्रेजी में मजबूरन व्यवहार करने की विवशता को भाषायी गुलामी माना जाता है जबकि उच्चवर्ग के जो लोग अंग्रेजी स्कूलों में पढ लिख कर बड़े होते हैं उन्हें जब कभी हिन्दी में व्यवहार करना पड़ता है तो उनके चेहरों पर गुलामी का संदेश साफ पढा जा सकता है। एक आम स्कूल में पढा हिन्दीभाषी भी कार्यालयों में जो अनुवाद की हिन्दी चल रही है उसके व्यवहार में गुलामी महसूस करता है। वैसे भी किसी भी कार्यालय के कार्यों की अपनी शब्दावली होती है व वह उसी लिपि के जानने वाले किसी भी दूसरे व्यक्ति के लिए विदेशी भाषा की तरह ही होती है, हम लोग किसी विभाग के फार्म भरते समय यह परेशानी झेलते रहते हैं। हिन्दी की बोलियों का प्रयोग करने वालों के लिए खड़ी बोली भी कम से कम आधी विदेशी तो होती ही है। मैं जब बचपन में अपने गाँव जाकर अपने कस्बे की भाषा में बात करने की कोशिश करता था तो गाँव की महिलाएँ कहती थीं कि ये तो बिल्कुल रेडियो की बोली बोलता है। उनके लिए खड़ी बोली रेडियो की बोली थी। वैसे भी हम लोग आपस में बात करते समय या पुस्तकों की समीक्षा करते समय कहते ही रहते हैं कि अभिजात्य भाषा का प्रयोग किया गया है अर्थात उसी भाषा में भी अभिजात्य की भाषा अलग होती है। (माना गया है कि प्रेम के कुछ क्षणों में मौन भी भाषा बन जाता है।)
असल में सचाई तो यह है कि जब हम अपने मन की बात लगभग वैसी की वैसी सामने वाले तक पहुँचाना चाहते हैं तो उसके लिए जिन शब्दों का प्रयोग करके हम सफल होते हैं वही हमारी भाषा हो सकती है व इसके अलावा इस लक्ष्य को पाने के लिए किन्हीं अन्य शब्दों के प्रयोग की विवशता भाषायी गुलामी है। हमें सोचने विचारने में कभी भाषा का संकट नहीं आता यह संकट तो तब आता है जब हमें अपने विचार दूसरे अथवा दूसरों तक पहुँचाने होते हैं। यह संकट तब और भी बढ जाता है जब दूसरा कुछ ज्यादा ही दूसरा होता है।
      सन 1969 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरागांधी को अपनी सरकार बचाने के लिए कम्युनिष्टों का समर्थन पाने हेतु बैंकों, बीमा कंपनियों आदि का राष्ट्रीयकरण करना पड़ा व उसके बाद इन संस्थानों को आम आदमी से जुड़ने को मजबूर होना पड़ा तब उन्हें आम आदमी की भाषा समझने वाले लोगों की जरूरत पड़ी। सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों में हिन्दी अधिकारियों की नियुक्तियाँ और भाषा विभागों आदि के गठन उसी काल की देन हैं जबकि मनमोहनसिंह की नई आर्थिक नीतियों के आने के बाद हिन्दी की जाजम लपेटने का काम प्रारंभ हो गया। देश में आम आदमी के बीच लोकप्रिय वक्ता रहे अटलबिहारी बाजपेयी आम सभाओं में 'लतीफों और हास्यकथाओं की भाषा' (सहज समप्रेषण) में बात किया करते रहे तो राजनारायण से लेकर लालू प्रसाद तक आम आदमी के बोलचाल की भाषा में बात करके ही जन नेता बन सके हैं। ( लालू जी की टूटीफूटी अंग्रेजी भी अपना संदेश दे जाती है।)
भाषा संवाद का माध्यम है और उसकी बात संवाद, संवादी, उनके वर्ग, उनके बीच के सम्बंध, सम्बंधों के बीच की ईमानदारी आदि पर निर्भर करेगी। एक लतीफे में टेलीफोन पर छोटे भाई की सारी बातें बड़े भाई की समझ में आती रहती हैं पर जब वह माँ के इलाज के लिए पैसे मांगता है तो बड़े भाई को सुनाई देना बंद हो जाता है और वह कहता है कि आवाज नहीं आ रही। असल में संवादियों के बीच यदि आपसी सौहार्द है तो भाषा के सारे अवरोध दूर किये जा सकते हैं किंतु जब एक व्यक्ति दूसरे को लूटना चाहता हो तो उसके लिए भाषा को भी आधार बना सकता है। अधिकतर सरकारी कार्यालय ऐसा ही कर रहे हैं जबकि बीमा एजेन्ट को कोई परेशानी नहीं होती और ना ही ग्राहक को बीमा करवाते समय होती है। इसलिए मेरी दृष्टि में भाषा की गुलामी का सवाल बाद में आने वाला सवाल है और उसे पहले उठाना ऐसा लगता है जैसे घोड़े के आगे गाड़ी बाँधी जा रही हो। हमारे पास भी जब गाँव की बोली में बोलता हुआ आदमी आता है तो उसको भी वैसी ही गुलामी का अहसास होता है जैसा कि हमें अंग्रेजी वालों के साथ होता है। यदि सरकार अवरोध को वास्तव में दूर करना चाहेगी तो सबसे पहले सरकारी कार्यालयों से भ्रष्टाचार को समाप्त करना होगा तथा काम करने की संस्कृति  विकसित करना होगी, भाषा की समस्या तो चंद अनुवादकों की नियुक्ति से हल हो जायेगी।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास  भोपाल मप्र
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