लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट और उमा भारती की कूटनीति
वीरेन्द्र जैन्
मैं समझता हूं कि लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट को सदन के पटल पर रख दिये जाने के बाद अब किसी को यह जानने की ज़रूरत शेष नहीं रह जानी चाहिये कि इस रिपोर्ट के सामने आने में सत्तरह मह्त्वपूर्ण वर्ष क्यों लग गये जिस कारण इस पर नौ करोड़ का खर्च आया।रिपोर्ट से साफ है कि आरोपियों ने जो कि देश के लोकप्रिय नेता थे और इस बीच प्रधान मंत्री और उपप्रधान मंत्री और गृह मंत्री जैसे सर्वोच्च पदों पर आसीन रहे थे, अपने अपराध बोध के कारण आयोग के साथ सहयोग नहीं किया। अब स्पष्ट है कि आयोग चाहता रहा होगा कि आरोपी अपने किये की सज़ा पायें। वैसे भी जैसा कि सी बी आई के पूर्व निर्देशक जोगिन्देर सिन्ह ने कहा है कि ये आयोग तो केवल जनता को बहलाने के लिये होते हैं। सच है क्योंकि कौन नहीं जानता था कि अपराधी कौन कौन हैं। किसने रथ यात्रायें निकालीं, उन रथ यात्राओं में कैसे कैसे नारे लगाते हुये उन्हें अल्प संख्यकों की बस्तियों में से गुज़ारा गया और विरोध करने पर पूरी तैयारी के साथ साम्प्रदायिक हिंसा फैलायी गयी जिससे वोटों का ध्रुवीकरण हो सके और दो सीटों तक सिमिट गयी पार्टी को आधार मिल सके। सब जानते हैं कि इतनी सारी भीड़ किसने एकत्रित की थी और यात्रा के अंतिम दिन् वाराणसी में आडवाणी ने साफ साफ कहा था कि अबकी कारसेवा बिना साधनों के नहीं होगी। ढेर सारी मीडिया रिपोर्टें थीं और देशी विदेशी फोटोग्राफरों द्वारा खींचे गये फोटुओं के सबूत थे जो बता रहे थे कि उस दिन वहाँ कौन कौन उपस्तिथ था।
अगर कुछ नहीं था तो तत्कालीन सत्तारूढ दल के पास समान संख्या में मुक़ाबला करने वाला जन बल नहीं था, इसलिये उसने टालने के लिये वक़्त देना ज़रूरी समझा।आज एक धर्म निरपेक्ष सरकार सता में है और भले ही उसके पास हुड़दंगियों की वैसी टोली नहीं हो पर सैनिक और अर्ध सैनिक बलों पर तो उसका नियंत्रण है जो हुड़दंगियों का मुक़ाबला कर सकते हैं। उम्मीद की जाना चाहिये कि इस अवसर पर कम से कम हुड़दंगियों का मुक़ाबला करने में सभी धर्म निरपेक्ष दल एकजुट होंगे जो लम्बे अर्से से बाबरी मस्ज़िद तोड़कर साम्प्रदायिक हिंसा फैलाने वालों के खिलाफ कार्यवाही की मांग करते रहे हैं।
राजनीति का शौक न केवल तरह तरह के स्वांग बनाने, और अगर उससे राजनीतिक लाभ मिल रहा हो तो, उसे बनाये रखने को विवश करता है इसका उदाहरण देखना हो तो उमा भारती को देख लेना ही काफी होगा। साध्वी भेष में रहने वाली यह राजनेता भाजपा द्वारा सत्ता प्राप्ति के लिये किये जाने वाले इस राजनीतिक अभियान की ही उपज रही थीं जिन्हें बचपन से धार्मिक प्रवचनों के कारण मिली लोकप्रियता को भुनाने के लिये भाजपा नेता विजया राजे सिन्धिया ने पार्टी में सम्मलित कर लिया था। दूसरे शब्दों में कहें तो राजनीति ने अपने लाभ के लिये एक धार्मिक काम में लिप्त लड़की को धार्मिक काम छोड़ देने को विवश किया था। तत्कालीन सत्तारूढ दल की अलोकप्रियता ने उमा भारती को साध्वी से भाजपा सांसद में बदल दिया था पर जिस स्वरूप ने उसे यह अवसर दिलाया था उसे न त्यागना भी उनकी मजबूरी बन गयी थी। ऊपर से साध्वी और भीतर से राजनीतिज्ञ इस युवती ने भाजपा की मजबूरी को खूब भुनाया और अपनी मनपसन्द सुरक्षित सीट से टिकिट लिया, सांसद बनी रही, केन्द्र में मंत्री बनी, फिर प्रदेश की मुख्य मंत्री बनी। जब भाजपा ने उसकी ज़िदें और शर्तें मानने से इंकार कर दिया तो अलग पार्टी बनायी और भाजपा की भरपूर छीछालेदर की। चुनाव लड़े और हारने के बाद फिर भाजपा में सम्मलित होने के लिये एड़ी चोटी का जोर लगाया पर अपनी वाचालता के कारण कुछ ऐसे मनभेद पैदा कर लिये थे कि भाजपा में दुबारा सम्मलित नहीं हो सकीं। किसी तरह उनके गठबन्धन में ही सम्मलित होने का प्रयास किया पर पहले से ही गुटबाज़ी से ग्रस्त पार्टी ने कोई खतरा मोल लेना ठीक नहीं समझा। लिब्रहन आयोग की रिपोर्ट उनके लिये छींके की तरह टूटी है यही कारण है कि आरोपियों में सबसे पहली और मुखर प्रतिक्रिया उमा भारती की ही रही। उन्होंने कहा कि अगर कोई नेता ज़िम्मेवारी नहीं लेना चाहते तो मैं अकेले ज़िम्मेवारी लेने के और राम मन्दिर के लिये फांसी पर चढने को तैयार हूं। स्मरणीय है कि इससे पूर्व भी वे यह कह चुकी थीं कि भाजपा नेताओं को 6 दिसम्बर 92 की ज़िम्मेवारी से भागना नहीं चाहिये क्योंकि वे सब वहां मौज़ूद थे। पर उस समय उनका यह बयान भाजपा नेताओं को ब्लेकमेल करने की चाल की तरह लिया गया था। अब वे फिरसे यही बयान दे रहीं हैं और भाजपा नेताओं से दोहरेपन से बाहर आने को प्रेरित कर रहीं हैं। भले ही अब माना जा रहा है कि ये इतने दिनों से निष्क्रिय राजनीतिज्ञ के सुर्खियों में आने के हथकंडे हैं किंतु उमा जी की स्वीकरोक्ति और गवाही मुकदमे में महत्वपूर्ण हो सकती है। इससे पूर्व वे दूसरे अभियुक्त कल्याण सिंह से भी गुफ्तगू कर चुकी हैं और उन्होंने भी लगभग ऐसा ही बयान दिया है जिससे अडवाणी की मुश्किलें और बढ गयी हैं। अब या तो वे इन लोगों के आगे झुक कर समझौता करें या फिर सज़ा भुगतने के लिये तैयार रहें। दूसरी ओर उमा भारती और कल्याण सिन्ह से किया गया समझौता वैंक्य्या नायडू, सुषमा स्वराज, अरुण जैटली, शिवराज सिंह चौहान आदि को किसी भी तरह मंज़ूर नहीं होगा जिससे भाजपा में संकट और बड़ेगा। संकट के समय भाजपा को जो इकलौता हल सूझता है वह साम्प्रदायिक दंगों का ही होता है। इसलिये अगर अतिरिक्त सावधानी नहीं बरती गयी तो इस समय भाजपा प्रेरित दंगों की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629
राजनीतिक सामाजिक और साहित्यिक रंगमंच के नेपथ्य में चल रही घात प्रतिघातों का खुलासा
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बुधवार, नवंबर 25, 2009
मंगलवार, अगस्त 11, 2009
लोकतंत्र के हित में नहीं यह अंध श्रद्घा
लोकतंत्र के हित में नहीं यह अंध श्रद्धा
वीरेन्द्र जैन
जार्ज फर्नांडीज के पूर्वार्ध जीवन के प्रति पूरे सम्मान के बाबजूद नीतीश कुमार द्वारा इस समय उनको राज्यसभा में भेजा जाना और उनका स्वीकार कर लेना दोनों ही जुगुप्साजनक हैं। यह उस बिहार की जनता का अपमान भी है जिसने उन्हें हाल ही में उनके 'स्वास्थ' को दृष्टिगत रखते हुये उन्हें लोकसभा के लिए न चुन कर सांसद के रूप में उनकी ताजा क्षमताओं के प्रति अपना अविश्वास जताया था। अपनी श्रद्धा के लिए जनता के हितों को दाँव पर लगाने का नीतीश कुमार एन्ड कम्पनी को कोई अधिकार नहीं है।
इस दया से पूर्व राजनीति में वे किसी की कृपा के मोहताज नहीं रहे व कोई नहीं कह सकता कि उसने उन्हें रोपा था। जार्ज ऐसे नेता हैं जो अपने काम से नेता के रूप में क्रमश: विकसित हुये और उन्होंने अपनी देशव्यापी स्वीकृति बनायी। वे जब तक विश्वनाथ प्रताप सिंह मंत्रिमंडल के सदस्य रहे तब तक वे विश्वसनीय रहे व जनता को उनसे बड़ी उम्मीदें रहीं। उनके प्रति यह जनता का विश्वास ही था कि इमरजैंसी के बाद हुये चुनाव में वे हथकड़ी डाले हुये अपने फोटो के माध्यम से चुनाव जीते और मोरारजी भाई मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री बने। उस दौरान उन्होंने दुनिया की सबसे ताकतवर कोका कोला को देश से बाहर का रास्ता दिखा दिया। बाद में विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार के समय उसी रेल विभाग के केन्द्रीय मंत्री बनाये गये जिसकी पटरियों को उड़ाने के प्रकरण में उन्हें कैद किया गया था ।
वे खाली हाथ मुंबई (तब की बम्बई) पहुँचे थे, फुटपाथ पर सोये थे व कुछ ही दिनों में वहाँ ट्रेडयूनियनों के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में सामने आये थे। मुंबई जो अपनी मिली जुली आबादी के कारण संवैधानिक हिन्दुस्तान का सच्चा नमूना है व जहाँ पर हर प्रदेश के लोग अपना 'देश' मान कर रहते रहे हैं, वहाँ उन्होंने प्रत्येक क्षेत्र के मजदूरों का समर्थन जुटा कर उस समय महाराष्ट्र के सबसे शक्तिशाली नेता एस के पाटिल को हरा कर पूरे देश को चौंका दिया था। वे कुछ उन विरले राष्ट्रीय नेताओं में रहे जो हिन्दुस्तान के अलग अलग हिस्सों से चुनाव लड़े व समर्थन हासिल किया।
जनता पार्टी के शासनकाल में उन्होंने राजनारायण के साथ मिल कर अटल बिहारी बाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की दोहरी सदस्यता के खिलाफ अभियान चलाया था और मोरारजी सरकार को गिरवाने में संकोच नहीं किया था। राजनारायण तो उन्हें प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे पर उन्होंने ही चौधरी चरण सिंह के नाम का सुझाव रखा था। 1989 के चुनाव के दौरान हिन्दू साम्प्रदायिकता की भयावहता के खिलाफ उनके भाषण रोमांचित कर देने वाले होते थे पर उस समय उन पर कभी कोई यह आरोप नहीं लगा सका कि वे किसी साम्प्रदायिक पृष्ठभूमि पर खड़े होकर किसी समुदाय के तुष्टीकरण के लिए यह बोल रहे हैं।
कहते हैं कि सत्ता विचारभ्रष्ट करती है। बाद में जैसे जैसे उन्हें सत्ता की सुख सुविधाओं की आदत पड़ती गयी तब उन्होंने अपना हेयर स्टाइल और पहनावा तो नहीं बदला पर वे केन्द्र में मंत्री बने रहने के लिए किसी भी स्तर पर गिर कर सैद्धांतिक समझौते करने लगे यहाँ तक कि भाजपा के अडवाणी जैसे लोगों के साथ केन्द्रीय मंत्रिमंडल में अपेक्षाकृत कनिष्ठ मंत्री बनना और साम्प्रदायिकता के सवाल पर मौन रहने का अभ्यास डालना भी आ गया। उन्होंने उड़ीसा में फादर स्टेंस और उसके दो मासूम बच्चों को जिन्दा जलाने वाले का बचाव करने की कोशिश की व संघ परिवार ने उन्हें ढाल की तरह स्तेमाल किया। उन्होंने गुजरात के भीषण नरसंहार पर आये अविश्वास प्रस्ताव के अवसर पर भी अटल बिहारी सरकार का बचाव कर अपनी छवि घूमिल की। उनके रक्षामंत्री रहते हुये ही कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठ हुयी और कारगिल की पहाड़ियों को मुक्त कराने में हमें अपने पाँच सौ सैनिकों और अधिकारियों का बलिदान देना पड़ा। यही नहीं उनके विभाग में मृत सैनिकों के लिए खरीदे गये ताबूतों की खरीद में भी भ्रष्टाचार पाया गया। यहीं से उनके पतन का प्रारंभ होता है। उन्हें अटल बिहारी बाजपेयी के परमाणु कार्यक्रम का समर्थन करने के लिए मजबूर होना पड़ा जबकि कभी वे इस कार्यक्रम के सख्त खिलाफ थे। तहलका के स्टिंग आपरेशन ने उनकी रही सही कसर भी पूरी कर दी थी जब उनकी पार्टी पदाधिकारी और घरेलू मित्र का नाम रक्षा सौदों के भ्रष्टाचार में छुपे कैमरों में कैद प्रमाण सहित सामने आया था। इस अवसर पर वे कुछ दिन के लिए मंत्रिमंडल से बाहर भी रहे। ये वे दिन थे जब उन्हें राजग की जगह 'अटल बिहारी का रक्षा मंत्री', कहा जाने लगा था। उन दिनों एक षड़यंत्र रच कर अमेरिका के एक अखबार में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी के स्वास्थ और आदतों के बारे में निंदात्मक समाचार प्रकाशित कराया गया था व उसे आधार बना कर आडवाणी को आनन फानन में उप प्रधानमंत्री की शपथ दिला दी गयी थी जबकि उससे अगले ही दिन मंत्रिमंडल का विस्तार होना था और विश्वस्त सूत्रों के अनुसार आडवाणी और जार्ज दोनों को ही उपप्रधानमंत्री की शपथ दिलायी जाना थी किंतु आरएसएस व आडवाणीी को जार्ज का उपप्रधानमंत्री बनना मंजूर नहीं था।
स्मरणीय है कि जब 2009 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी जनता दल (यू) ने उन्हें टिकिट देने से मना कर दिया तब उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा व पराजित हुये। इस चुनाव में उन्होने अपनी सम्पत्ति 15 करोड़ पचास लाख घोषित की जबकि पिछले चुनाव में यह, उनकी पत्नी की सम्पत्ति मिला कर भी, साढे तीन करोड़ थी। उन्हें उनके खराब स्वास्थ के नाम पर नीतिश कुमार व शरद यादव ने टिकिट देने से इंकार कर दिया था किंतु अगर वे चुनाव न लड़ें तो उन्हें राज्यसभा में भेजने का वादा किया था। वे नहीं माने थे व चुनाव लड़ कर बुरी तरह हारे। इस अवसर पर उनका कहना था कि राज्यसभा तो चुके हुये नेताओं की शरण स्थली है। उनके बयान से ऐसा लगता था कि वे कभी भी पिछले दरवाजे से संसद में प्रवेश करने के लिए राज्यसभा की उम्मीदवारी स्वीकार नहीं करेंगे किंतु उन्होंने जनता द्वारा ठुकराये जाने के बाद बहुत बेशर्मी से उन्हीं नीतीश कुमार और शरदयादव जैसे लोगों के सहयोग से राज्यसभा में जाने का पर्चा भी भर दिया जिन्होंने उन्हें पार्टी अध्यक्ष भी नहीं रहने दिया था। इतना ही नहीं वे जब राज्यसभा के सदस्य के रूप में शपथ पढने के लिए गये तो अपने खराब स्वास्थ के कारण शपथ तक नहीं पढ सके जिसे किसी दूसरे ने पढा और वे केवल बुदबुदाते रहे। संयोग से उन पर दया दिखलाते हुए उसे पढा हुआ मान लिया गया।
ऐसा लगता नहीं है कि भविष्य में वे संसद में बोल भी सकेंगे या राजनीतिक घटनाक्रम पर सहज रूप से अपने विचार व्यक्त कर सकेंगे। उनकी पत्नी लैला कबीर जो कुछ वर्षों से उनके साथ नहीं रहतीं, ने भी कहा था कि जो लोग उन्हें चुनाव लड़वा रहे हैं वे उनके शुभ चिंतक नहीं हैं क्योंकि उन्हें संसद में जाने की नहीं अपितु बेहतर देखभाल की जरूरत है। तब समझ में नहीं आता कि जनता द्वारा नकार दिये जाने के बाद आखिर वे क्यों सदन में बने रहना चाहते हैं! क्या उन पर किसी निकटस्थ अनजान व्यक्ति का दबाव है कि वे पद पर बने रहें.
स्मरणीय है कि मंत्री होने के दौरान उन पर सन 2000 में इजरायल से बराक मिसाइल सिस्टम खरीदने के मामले में 10अक्टूबर 2006 को उनके, उनकी मित्र जया जेटली, और नौसेना प्रमुख एडमिरल सुशील कुमार के खिलाफ सीबीआई ने एक प्रकरण दर्ज किया था। पर जिसके बारे में जार्ज का तब कहना था कि उस सौदे को उस समय के रक्षा सलाहकार जो बाद में देश के राष्ट्रपति भी बने एपीजे अब्दुल कलाम ने सहमति दी थी। यह प्रकरण अभी लंबित है। जार्ज साहब केन्द्र में मंत्री रहते हुये न केवल म्यांमार(बर्मा) के अलगाव वादियों के ही खुले पक्षधर रहे हैं अपितु लंका में सक्रिय रहे लिबरेशन टाइगर आफ तमिल इलम (लिट्टे) के समर्थक भी रहे हैं। वे भारत में रह रहे तिब्बतविद्रोहियों के रक्षक और शरणदाता रहे हैं। कहते हैं कि इन पड़ोसी देशों के कई वांछित लोग उनके रक्षामंत्री निवास में शरण पाते रहे हैं। वे समाजवादी चीन को अपना दुशमन नम्बर वन बताते रहे हें जबकि उनके बयानों का हर बार ही सेना के बड़े अधिकारियों ने खण्डन किया है। चीन से दुश्मनी बनाये रखने के लिए वे समय समय पर चीन के हमलों का शगूफा छोड़ते रहते हैं जबकि चीन कोई साम्राज्यवादी देश नहीं है, और ना ही उसकी अर्थव्यवस्था शस्त्र उद्योग पर आधारित है। इसके बाबजूद भी अमेरिका की निगाह में उनकी हैसियत यह है कि देश के रक्षा मंत्री होते हुये भी सन 2002 में डयूल्स हवाई अड्डे पर उनकी कपड़े उतार कर तलाशी ली गयी थी व वे उफ भी नहीं कर सके थे।
बहुत सम्भव है कि नीतीश और शरद यादव ने उनकी उम्र और सेवाओं को देख कर ही उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाने में रूचि ली हो किंतु यह श्रद्धा देश और जनता को मँहगी पड़ सकती है और उसके छींटे नीतीश सरकार पर भी पड़ सकते हैं। देश का उच्च सदन कोई वृद्धों और बीमारों और आरोपितों की शरणस्थली नहीं है, यह देश का भविष्य तय करने वाला पवित्र स्थल है।
वीरेन्द्र जैन
जार्ज फर्नांडीज के पूर्वार्ध जीवन के प्रति पूरे सम्मान के बाबजूद नीतीश कुमार द्वारा इस समय उनको राज्यसभा में भेजा जाना और उनका स्वीकार कर लेना दोनों ही जुगुप्साजनक हैं। यह उस बिहार की जनता का अपमान भी है जिसने उन्हें हाल ही में उनके 'स्वास्थ' को दृष्टिगत रखते हुये उन्हें लोकसभा के लिए न चुन कर सांसद के रूप में उनकी ताजा क्षमताओं के प्रति अपना अविश्वास जताया था। अपनी श्रद्धा के लिए जनता के हितों को दाँव पर लगाने का नीतीश कुमार एन्ड कम्पनी को कोई अधिकार नहीं है।
इस दया से पूर्व राजनीति में वे किसी की कृपा के मोहताज नहीं रहे व कोई नहीं कह सकता कि उसने उन्हें रोपा था। जार्ज ऐसे नेता हैं जो अपने काम से नेता के रूप में क्रमश: विकसित हुये और उन्होंने अपनी देशव्यापी स्वीकृति बनायी। वे जब तक विश्वनाथ प्रताप सिंह मंत्रिमंडल के सदस्य रहे तब तक वे विश्वसनीय रहे व जनता को उनसे बड़ी उम्मीदें रहीं। उनके प्रति यह जनता का विश्वास ही था कि इमरजैंसी के बाद हुये चुनाव में वे हथकड़ी डाले हुये अपने फोटो के माध्यम से चुनाव जीते और मोरारजी भाई मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री बने। उस दौरान उन्होंने दुनिया की सबसे ताकतवर कोका कोला को देश से बाहर का रास्ता दिखा दिया। बाद में विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार के समय उसी रेल विभाग के केन्द्रीय मंत्री बनाये गये जिसकी पटरियों को उड़ाने के प्रकरण में उन्हें कैद किया गया था ।
वे खाली हाथ मुंबई (तब की बम्बई) पहुँचे थे, फुटपाथ पर सोये थे व कुछ ही दिनों में वहाँ ट्रेडयूनियनों के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में सामने आये थे। मुंबई जो अपनी मिली जुली आबादी के कारण संवैधानिक हिन्दुस्तान का सच्चा नमूना है व जहाँ पर हर प्रदेश के लोग अपना 'देश' मान कर रहते रहे हैं, वहाँ उन्होंने प्रत्येक क्षेत्र के मजदूरों का समर्थन जुटा कर उस समय महाराष्ट्र के सबसे शक्तिशाली नेता एस के पाटिल को हरा कर पूरे देश को चौंका दिया था। वे कुछ उन विरले राष्ट्रीय नेताओं में रहे जो हिन्दुस्तान के अलग अलग हिस्सों से चुनाव लड़े व समर्थन हासिल किया।
जनता पार्टी के शासनकाल में उन्होंने राजनारायण के साथ मिल कर अटल बिहारी बाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की दोहरी सदस्यता के खिलाफ अभियान चलाया था और मोरारजी सरकार को गिरवाने में संकोच नहीं किया था। राजनारायण तो उन्हें प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे पर उन्होंने ही चौधरी चरण सिंह के नाम का सुझाव रखा था। 1989 के चुनाव के दौरान हिन्दू साम्प्रदायिकता की भयावहता के खिलाफ उनके भाषण रोमांचित कर देने वाले होते थे पर उस समय उन पर कभी कोई यह आरोप नहीं लगा सका कि वे किसी साम्प्रदायिक पृष्ठभूमि पर खड़े होकर किसी समुदाय के तुष्टीकरण के लिए यह बोल रहे हैं।
कहते हैं कि सत्ता विचारभ्रष्ट करती है। बाद में जैसे जैसे उन्हें सत्ता की सुख सुविधाओं की आदत पड़ती गयी तब उन्होंने अपना हेयर स्टाइल और पहनावा तो नहीं बदला पर वे केन्द्र में मंत्री बने रहने के लिए किसी भी स्तर पर गिर कर सैद्धांतिक समझौते करने लगे यहाँ तक कि भाजपा के अडवाणी जैसे लोगों के साथ केन्द्रीय मंत्रिमंडल में अपेक्षाकृत कनिष्ठ मंत्री बनना और साम्प्रदायिकता के सवाल पर मौन रहने का अभ्यास डालना भी आ गया। उन्होंने उड़ीसा में फादर स्टेंस और उसके दो मासूम बच्चों को जिन्दा जलाने वाले का बचाव करने की कोशिश की व संघ परिवार ने उन्हें ढाल की तरह स्तेमाल किया। उन्होंने गुजरात के भीषण नरसंहार पर आये अविश्वास प्रस्ताव के अवसर पर भी अटल बिहारी सरकार का बचाव कर अपनी छवि घूमिल की। उनके रक्षामंत्री रहते हुये ही कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठ हुयी और कारगिल की पहाड़ियों को मुक्त कराने में हमें अपने पाँच सौ सैनिकों और अधिकारियों का बलिदान देना पड़ा। यही नहीं उनके विभाग में मृत सैनिकों के लिए खरीदे गये ताबूतों की खरीद में भी भ्रष्टाचार पाया गया। यहीं से उनके पतन का प्रारंभ होता है। उन्हें अटल बिहारी बाजपेयी के परमाणु कार्यक्रम का समर्थन करने के लिए मजबूर होना पड़ा जबकि कभी वे इस कार्यक्रम के सख्त खिलाफ थे। तहलका के स्टिंग आपरेशन ने उनकी रही सही कसर भी पूरी कर दी थी जब उनकी पार्टी पदाधिकारी और घरेलू मित्र का नाम रक्षा सौदों के भ्रष्टाचार में छुपे कैमरों में कैद प्रमाण सहित सामने आया था। इस अवसर पर वे कुछ दिन के लिए मंत्रिमंडल से बाहर भी रहे। ये वे दिन थे जब उन्हें राजग की जगह 'अटल बिहारी का रक्षा मंत्री', कहा जाने लगा था। उन दिनों एक षड़यंत्र रच कर अमेरिका के एक अखबार में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी के स्वास्थ और आदतों के बारे में निंदात्मक समाचार प्रकाशित कराया गया था व उसे आधार बना कर आडवाणी को आनन फानन में उप प्रधानमंत्री की शपथ दिला दी गयी थी जबकि उससे अगले ही दिन मंत्रिमंडल का विस्तार होना था और विश्वस्त सूत्रों के अनुसार आडवाणी और जार्ज दोनों को ही उपप्रधानमंत्री की शपथ दिलायी जाना थी किंतु आरएसएस व आडवाणीी को जार्ज का उपप्रधानमंत्री बनना मंजूर नहीं था।
स्मरणीय है कि जब 2009 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी जनता दल (यू) ने उन्हें टिकिट देने से मना कर दिया तब उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा व पराजित हुये। इस चुनाव में उन्होने अपनी सम्पत्ति 15 करोड़ पचास लाख घोषित की जबकि पिछले चुनाव में यह, उनकी पत्नी की सम्पत्ति मिला कर भी, साढे तीन करोड़ थी। उन्हें उनके खराब स्वास्थ के नाम पर नीतिश कुमार व शरद यादव ने टिकिट देने से इंकार कर दिया था किंतु अगर वे चुनाव न लड़ें तो उन्हें राज्यसभा में भेजने का वादा किया था। वे नहीं माने थे व चुनाव लड़ कर बुरी तरह हारे। इस अवसर पर उनका कहना था कि राज्यसभा तो चुके हुये नेताओं की शरण स्थली है। उनके बयान से ऐसा लगता था कि वे कभी भी पिछले दरवाजे से संसद में प्रवेश करने के लिए राज्यसभा की उम्मीदवारी स्वीकार नहीं करेंगे किंतु उन्होंने जनता द्वारा ठुकराये जाने के बाद बहुत बेशर्मी से उन्हीं नीतीश कुमार और शरदयादव जैसे लोगों के सहयोग से राज्यसभा में जाने का पर्चा भी भर दिया जिन्होंने उन्हें पार्टी अध्यक्ष भी नहीं रहने दिया था। इतना ही नहीं वे जब राज्यसभा के सदस्य के रूप में शपथ पढने के लिए गये तो अपने खराब स्वास्थ के कारण शपथ तक नहीं पढ सके जिसे किसी दूसरे ने पढा और वे केवल बुदबुदाते रहे। संयोग से उन पर दया दिखलाते हुए उसे पढा हुआ मान लिया गया।
ऐसा लगता नहीं है कि भविष्य में वे संसद में बोल भी सकेंगे या राजनीतिक घटनाक्रम पर सहज रूप से अपने विचार व्यक्त कर सकेंगे। उनकी पत्नी लैला कबीर जो कुछ वर्षों से उनके साथ नहीं रहतीं, ने भी कहा था कि जो लोग उन्हें चुनाव लड़वा रहे हैं वे उनके शुभ चिंतक नहीं हैं क्योंकि उन्हें संसद में जाने की नहीं अपितु बेहतर देखभाल की जरूरत है। तब समझ में नहीं आता कि जनता द्वारा नकार दिये जाने के बाद आखिर वे क्यों सदन में बने रहना चाहते हैं! क्या उन पर किसी निकटस्थ अनजान व्यक्ति का दबाव है कि वे पद पर बने रहें.
स्मरणीय है कि मंत्री होने के दौरान उन पर सन 2000 में इजरायल से बराक मिसाइल सिस्टम खरीदने के मामले में 10अक्टूबर 2006 को उनके, उनकी मित्र जया जेटली, और नौसेना प्रमुख एडमिरल सुशील कुमार के खिलाफ सीबीआई ने एक प्रकरण दर्ज किया था। पर जिसके बारे में जार्ज का तब कहना था कि उस सौदे को उस समय के रक्षा सलाहकार जो बाद में देश के राष्ट्रपति भी बने एपीजे अब्दुल कलाम ने सहमति दी थी। यह प्रकरण अभी लंबित है। जार्ज साहब केन्द्र में मंत्री रहते हुये न केवल म्यांमार(बर्मा) के अलगाव वादियों के ही खुले पक्षधर रहे हैं अपितु लंका में सक्रिय रहे लिबरेशन टाइगर आफ तमिल इलम (लिट्टे) के समर्थक भी रहे हैं। वे भारत में रह रहे तिब्बतविद्रोहियों के रक्षक और शरणदाता रहे हैं। कहते हैं कि इन पड़ोसी देशों के कई वांछित लोग उनके रक्षामंत्री निवास में शरण पाते रहे हैं। वे समाजवादी चीन को अपना दुशमन नम्बर वन बताते रहे हें जबकि उनके बयानों का हर बार ही सेना के बड़े अधिकारियों ने खण्डन किया है। चीन से दुश्मनी बनाये रखने के लिए वे समय समय पर चीन के हमलों का शगूफा छोड़ते रहते हैं जबकि चीन कोई साम्राज्यवादी देश नहीं है, और ना ही उसकी अर्थव्यवस्था शस्त्र उद्योग पर आधारित है। इसके बाबजूद भी अमेरिका की निगाह में उनकी हैसियत यह है कि देश के रक्षा मंत्री होते हुये भी सन 2002 में डयूल्स हवाई अड्डे पर उनकी कपड़े उतार कर तलाशी ली गयी थी व वे उफ भी नहीं कर सके थे।
बहुत सम्भव है कि नीतीश और शरद यादव ने उनकी उम्र और सेवाओं को देख कर ही उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाने में रूचि ली हो किंतु यह श्रद्धा देश और जनता को मँहगी पड़ सकती है और उसके छींटे नीतीश सरकार पर भी पड़ सकते हैं। देश का उच्च सदन कोई वृद्धों और बीमारों और आरोपितों की शरणस्थली नहीं है, यह देश का भविष्य तय करने वाला पवित्र स्थल है।
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