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शनिवार, नवंबर 19, 2022

समीक्षा नरेन्द्र मौर्य के गज़ल संग्रह ‘सदी पत्थरों की ‘ पर कुछ बेतरतीब विचार

 

समीक्षा

नरेन्द्र मौर्य के गज़ल संग्रह ‘सदी पत्थरों की ‘ पर  कुछ बेतरतीब विचार


वीरेन्द्र जैन

दुष्यंत कुमार के बाद हिन्दुस्तानी [ हिन्दी-उर्दू ] भाषा में व देवनागरी लिपि में लिखी गयी गज़लों की बाढ आ गयी क्योंकि यह विधा पाठकों और कवियों दोनों को भा रही थी। इस विधा ने हिन्दी के गीतों और दूसरे छन्दों को पीछे छोड़ दिया। नरेन्द्र मौर्य की ‘अपनी बात’ के अनुसार वे भी गत तीस वर्षों से इसी भाषा और लिपि में रचनारत हैं जिसे गज़ल या हिन्दी गज़ल कहा जाता है। इसे मैं गज़ल की मूल विधा या कहें कि उर्दू गज़ल से थोड़ा भिन्न इसलिए मानता हूं क्योंकि बहुत सारे रचनाकारों ने इसके मूल अनुशासन को तोड़ कर अपनी बात कही है और जहाँ कथ्य में दम था वहाँ शिल्प को नकार कर भी रचना स्वीकारी गयी है। चूंकि यह बाढ दुष्यंत कुमार के प्रभाव के बाद आयी थी इसलिए इसमें स्वातंत्रोत्तर राजनीति का मूल्यांकन प्रमुख रूप से उभरा। नरेन्द्र मौर्य लिखते हैं कि उन्होंने पत्र पत्रिकाओं में निरंतर लिखते हुए भी अपने संकलन को लाने का विचार तब किया जब उन्हें श्री अनवारे इस्लाम जैसे उस्ताद शायर की सलाह प्राप्त हुयी जिसके आधार पर उन्होंने पर्याप्त सुधार किये। उस्ताद की सलाह पर आये संकलनों को परोक्ष में संयुक्त उपक्रम माना जा सकता है जिसके लिए रचनाकार ने पुस्तक में आभार प्रकट किया ही है।

मैं भी दुष्यंत के बाद तेजी से फैली इस विधा को पसन्द करने वाले लोगों में रहा हूं इसलिए अनेक रचनाकार मुझे भी अपनी कृति भेंट करने की कृपा करते हैं और सौजन्यतावश उस पर अपने विचार बताने की व्यवहारिकता निभाते हैं, जबकि मेरे साथ वे भी जानते होंगे कि मैं पाठकीय प्रतिक्रिया ही दे सकता हूं और एक अधिकृत समीक्षक नहीं हूं। सन्दर्भित संकलन ‘ सदी पत्थरों की ‘ पर भी अपने विचार इन्हीं सीमाओं में रह कर व्यक्त कर रहा हूं।

गज़ल में मतले के शे’र में व्यक्त तुकांत के बाद का अनुशरण करते हुए भिन्न भिन्न रंग के शे’र कहे जा सकते हैं जो उसी बहर और काफिये में अलग विषय पर हो सकते हैं। इस संकलन में संकलित बहुत सारी गज़लों के शे’र , गीतों की तरह एक ही विषय पर कहे गये शे’र हैं। हिन्दी गज़ल के शे’र गज़लों की पुरानी परम्परा के अनुसार निजी प्रेम के सुख दुखों पर या महबूबा के सौन्दर्य या कोमलकांत व्यवहार, बफा बेबफाई आदि तक सीमित नहीं हैं अपितु उनमें जमाने भर के दुख दर्द शामिल हैं। रहबरों की रहजनों की तरह की जाने वाली हरकतों का वर्णन है।

मेरा मानना है कि वैज्ञानिक और अवैज्ञानिक विचारधारा साथ साथ नहीं चल सकती । बहुत सारे लोग यह घपला कर रहे हैं किंतु नरेन्द्र की गज़लों में कथित धार्मिकों और धर्म के ठेकेदारों के कारनामों की कलई खोली गयी है। ईश्वर के अस्तित्व के बारे में कुछ ना कहते हुए भी वे उसके ठेकेदारों द्वारा बनायी गयी दुर्व्यवस्था पर निरंतर सवाल उठाते हैं।

ये सरफिरा भी कैसे खुरापात करे है

अल्ला मियां से कैसे सवालात करे है

कैसी इमारतों मे खुदा कैद हो गया

खुद अपने घर को कौन हवालात करे है। [पृष्ठ 11 ]

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झूठ के देवता को नहीं मानते

जा तिरे हम खुदा को नहीं मानते

राम का नाम लेकर करें कत्ल जो

उस सियासी फ़जा को नहीं मानते [पृष्ठ 12]

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भूखे पेटों को रोटी चाहिए

जो भरे हैं पेट उनको राम दे  [पृष्ठ 27 ]

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हम तुम तो अपना हुनर बेचते हैं

शातिर, खुदाओं का डर बेचते हैं [ पृष्ठ 31 ]

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कहाँ वीरानियों में दिल लगे है

अकेला आदमी पागल लगे है

कहाँ जायें भला फरियाद करने

खुदा ही जानिए कातिल लगे है  [पृष्ठ 35]

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कितने पंडे पुजारी हैं मुल्ला यहाँ

और कितने तुझे अर्दली चाहिए [पृष्ठ 46 ]
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पता ही नहीं जिसकी मौजूदगी का

कभी दर पै उसके भी झुकना पड़ा है  [पृष्ठ 64 ]

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वही पत्थर जिसे हम पूजते थे

उसी से चोट खाना पड़ गया है [पृष्ठ 69 ]
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खुदाया लूट कर हमको तिरे खादिम यूं कहते हैं

जो मुश्किल में है पैगम्बर तो फिर तेरी गुजर क्यों हो [पृष्ठ 69 ]

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उनकी गज़लों में सियासत की बातें बहुत ही स्पष्ट और साफ साफ कही गयी हैं। गत तीस वर्षों की उनकी गज़लों के शे’रों में वर्तमान की राजनीति के चेहरे भी साफ पहचाने जा सकते हैं –

विरासत की बड़ी ऊंची इमारत

सियासत को गिराने की पड़ी है

नहीं कोई मियां सुनने को राजी

सभी को बस सुनाने की पड़ी है [ पृष्ठ 37 ]

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जो मानो तो ये फलसफा हो गया

वो झुक कर जरा सा, बड़ा होगया

जो पियक्कड़ थे खामोश पीते रहे

कठमुल्लों को लेकिन नशा हो गया

राह सूझी नहीं, बैठे जब तक रहे

उठके चलने लगे रास्ता हो गया

जमाने का उसपै असर ये हुआ

मदारी था अब मसखरा हो गया [ पृष्ठ 45 ]

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तेरे कायदे कानून दुनिया से निराले है

       लुटेरा भी यहाँ देखो तो पहरेदार मांगे है  [पृष्ठ 47 ]

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डोले है ये धरती जब अपनी ही मस्ती में

चाँद सितारों को आने लगते हैं चक्कर से

सरकस जैसी लगती है अब मुझे सियासत भी

जिसमें करतब करते रहते नेता जोकर से    [पृष्ठ 56 ]

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इस दौरे तरक्की के वल्लाह दो चेहरे हैं

इंडिया में उजाला है, भारत में अंधेरे हैं   [पृष्ठ 60 ]

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धर्म अहिंसा की पोथी तो बाँध के रख दी है सबने

अब तो भाई के सीने पर भाई ही गोली दागे है [पृष्ठ 95 ]

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जबसे हुजूर बज्मे सियासत में आ गये

जितने तमाशेबाज थे हरकत में आ गये

यार तू कातिल की भी दरियादिली तो देख

खुद कत्ल करके बेहया मैयत में आ गये [पृष्ठ 96 ]

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नाज था जिस पर सियासत देख ले

वो तेरा किरदार तो बौना हुआ    [पृष्ठ 100 ]

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करो फैसला और छोड़ दो लोगों पर

ये जनता की राय वाय अब छोड़ो भी

देखा है वादों का जुमला बन जाना

कितने धोखे खाय वाय अब छोड़ो भी

इन्हीं मसखरों से चलना है देश मने

कौन रहनुमा आय जाय अब छोड़ो भी [पृष्ठ 124 ]  

इस संग्रह में और कुछ याद रह जाने वाले शे’र हैं-

बहुत मुश्किल है यूं चुपचाप जीना

कभी तो आस्मा सर पर उठा रख

भले ही आंसुओं से सींच लेकिन

बस उम्मीद का पौधा हरा रख  [ पृष्ठ 24 ]

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छोड़ दे हमको किसी भी मोड़ पर

और उनको चाहे चारों धाम दे [ पृष्ठ 24 ]

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नहीं तो फकत खाली धुंआ है

बरस जाये तभी बादल लगे है  [ पृष्ठ 35 ]

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खोल में सब अपनी अपनी बन्द हैं

       लोग भी खुल कर यहाँ मिलते नहीं

उसको इक अच्छा सा नौकर चहिए

क्या करें पर बेजुबां मिलते नहीं   [ पृष्ठ 43 ]

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झूठ बोलना गुनाह है

सच कहूं तो दिल्लगी लगे  [पृष्ठ 58 ]

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शहर तक जो अभी पहुंचा नहीं है

उसे फिर गाँव जाना पड़ गया है  [पृष्ठ 69 ]

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कैसे जाहिल थे हम भी, शहर में ऐसे आ पहुंचे,

बच्चा ये स्कूल तो पहुंचा, घर में बस्ता भूल गया  [पृष्ठ 71 ]

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दो और दो अब चार नहीं होगा हमसे

कहता है सरकार नहीं होगा हमसे

बढता पानी देख डरे है दिल मेरा

अब ये दरिया पार नहीं होगा हमसे [पृष्ठ 106 ]

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समाज में निरंतर सूखती जा रही संवेदनाओं ने मानव जाति को जिस तरह के पत्थर में बदल दिया है उसे महसूस करके ही उन्होंने अपने संग्रह का नाम ‘ सदी पत्थरों की ‘ रखा है।   

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वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

 

 

शनिवार, सितंबर 05, 2009

अहमद फ़राज़ की याद में

अहमद फराज हमारे दिल में बने हुये हैं
वीरेन्द्र जैन

अहमद फराज साहब से मेरी कभी मुलाकात नहीं हुयी किंतु उनके साथ मुहब्बत उनकी शायरी के साथ मुहब्बत होने के कारण हुयी। उनकी शायरी ने मेरे दिल में पहले जगह बना ली और बहुत बाद में पता चला कि बेपनाह मनपसंद शायरी का शायर कौन है। मैंने किसी मुशायरे की रिपोर्ट पढी थी जिसमें उदाहरण बतौर हर एक शायर की चार छह पंक्तियाँ दी गयी थीं। उन पंक्तियों में जो दिल को असीमित आनंद दे गयीं वे थीं-
सुना है लोग उसे आह भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
सुना है बोले तो बातों से फूल झरते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं
जैसा कि ऐसे अवसरों पर आम तौर पर किया करता रहा था मैं टेलीफोन की ओर दौड़ा जिससे कि अपने निकट के कविताप्रेमी दोस्तों को सुना सकूं। इस खुशी खुशी में मैं शायर का नाम याद रखना ही भूल गया और बात भी आयी गयी हो गयी। पर पंक्तियाँ दिल में खुब गयीं थीं जिन्हें सुनाने के लिए मैं मौके की तलाश में रहता था तथा कभी कभी तो बेमौके भी उन्हें सुनाने की भूल कर बैठता था।
असल में यह बात मुझे बहुत बाद में पता चली कि उक्त शेर पाकिस्तान के मशहूर शायर अहमद फराज की गजल के थे और यह भूल केवल मुझ से ही नहीं हुयी अपितु इस पूरी गजल पर मोहित होने वाले दुनिया में लाखों लोग इसी भूल के शिकार हुये हैं जो गजल में इतने खो गये कि उन्होंने शायर की खोज खबर ही नहीं ली। मुझे उसी समय कृष्ण बिहारी नूर का वह शेर याद आ गया जो केवल नूर साहब ही नहीं सारे अच्छे शायरों के दर्द को भी बयाँ करता है-
मैं तो गजल सुना के अकेला खड़ा रहा
सब अपने अपने चाहने वालों में खो गये
इसके बाद जब मैंने अहमद फराज को खोज खोज कर पढना प्रारंभ किया तब वे दिल मे गहरे उतरने लगे। इस मुहब्बत में इस जानकारी ने और भी इजाफा किया जब पता चला कि वे इकबाल, फैजअहमद फैज और अली सरदार जाफरी जैसे प्रगतिशील शायरों के फैन होने के बाद लेखन के क्षेत्र में उतरे थे तथा फैज और अली सरदार जाफरी ही शायरी में उनके मॉडल रहे थे। उनके लिए मेरे दिल में सम्मान का भाव तब और भी बढ गया जब यह मालूम हुआ कि वे पाकिस्तान में फौजी हुकूमत के हमेशा खिलाफ रहे व जियाउल हक के दौर में तीन साल तक आत्मनिर्वासन में ब्रिटेन कनाडा व यूरोप के दूसरे देशों में रहे। वे कहा करते थे कि आसपास घट रही दुखद घटनाओं के प्रति यदि मैं मूक र्दशक बना रहूंगा तो मेरी आत्मा कभी मुझे माफ नहीं करेगी। मैं और क्या कर सकता हूँ , सिवाय तानाशाही निजाम को यह बताने के कि उस जनता की निगाह में, जिसके मौलिक अधिकारों को उन्होंने हड़प लिया है, वे कहाँ ठहरते हैं। मैं सिविल नाफरमानी की घोषणा कर रहा हूं और सत्ता को बता देना चाहता हूँ कि मैं उससे जुड़ने व उसके आदेशों को मानने से इंकार कर रहा हूँ। अहमद फराज साहब ने कभी भी अभिव्यक्ति की पाबंदी को नहीं माना और जीवन भर अपने विचार खुल कर व्यक्त किये। उनके रचना कर्म पर नजर रखने वालों के साथ उनकी भी इस बात पर सहमति रही कि उनका सर्वश्रेष्ठ रचनाकर्म निर्वासन के दौर में ही रहा। इस दौर की उनकी एक रचना महाशरा को बहुत महत्वपूर्ण माना गया। भले ही ज्यादा लोग निम्नांकित गजल को उनके नाम से न जानते हों पर इस गजल को पसंद करने वाले उन्हें जानने वालों से कई गुना अधिक हैं-
रंजिश ही सही दिल को दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
यह शेर उनकी निर्वासन के दौर में लिखी वतन को याद करने वाली गजलों में से एक है।
गुलामअली ने उनकी बहुत सारी गजलों को गाया है या दूसरे शब्दों में कहें कि उनके चुनाव के सबसे पसंदीदा शायरों में से एक हैं। उनकी एक गजल में वे बहुत गहरे उतरे हैं वह है-
ये आलम शौक का देखा न जाये
वो बुत हैं या खुदा देखा न जाये
कम लोगों को पता है कि ये शेर भी अहमद फराज का ही है जिसे लाखों प्रेमपत्रों में लाखों प्रेमियों ने बार बार लिखा होगा-
अब के बिछुड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुये फूल किताबों में मिलें
ढूंढ उजड़े हुये लोगों में बफा के मोती
ये खजाने तुझे मुमकिन है खराबों में मिलें
इस गजल का पहला शेर तो हजारों ट्रकों के पीछे लिखा हुआ भी मिलता है जो उस स्थान पर एक अलग ही अर्थ देता है।

अहमद फराज साहब की शिक्षा दीक्षा पेशावर यूनीवर्सिटी में हुयी जहाँ उन्होंने उर्दू और फारसी की पढाई की। वे जन्म से पश्तो बोलने वाले पश्तूनी थे पर उनकी रचनाओं की विशेषता है सरल हिन्दुस्तानी भाषा और आम जनजीवन से उठाये बिम्बों द्वारा अपनी बात कहना। इसी कारण से वे आम आदमी के दिल में सीधे उतर जाते हैं। उदाहरण देखें-
आशिकी बेदिली से मुश्किल है
फिर मुहब्बत उसी से मुश्किल है
इशक आगाज ही से मुश्किल है
सब्र करना अभी से मुश्किल है
14जनवरी 1931 को नौशेरा पाकिस्तान में जन्मे शैयद अहमद शाह को शायरी और उर्दू के प्रेम ने अहमद फराज बना दिया। वे रेडियो पाकिस्तान में स्क्रिप्ट रायटर भी रहे और पाक अकेदमी आफ लैटर्स के डायरेक्टर जनरल तथा बाद में चेयरमैन भी रहे । उन्होंने कुछ समय पेशावर यूनीवर्सिटी में प्रोफेसरी भी की। उनकी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं।

पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर वे सत्ताधीशों और अवाम दोनों को ही संबोधित करते हुये कहते हैं-
अब किसका जश्न मनाते हो, उस देस का जो तकसीम हुआ
अब किसके गीत सुनाते हो उस तनमन का जो नीम हुआ
उस परचम का जिसकी हुरमत बाजारों में नीलाम हुयी
उस मिट्टी का जिसकी हुरमत मंसूब उदू के नाम हुयी
bl ’kkgh dk tks nLr cLr vk;h gS rqEgkjs fgLls esa
क्यों नंगे बदन की बात करो क्या रक्खा है इस किस्से में

उनकी वह प्रिय गजल जब भी याद आ जाती है तो गुनगुनाने का मन करने लगता है। गजल इस प्रकार है-
सुना है लोग उसे ऑंख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
सुना है रब्त है उसको खराब हालों से
सो अपने आप को बरबाद करके देखते हैं
सुना है दर्द की गाहक है चश्मेनम उसकी
सो हम भी उसकी गली से गुजर के देखते हैं
सुना है उसको भी है शेरो शायरी से शगफ
सो हम भी मौजजे अपने हुनर के देखते हैं
सुना है बोले तो बातों से फूल झरते हें
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं
सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बामे फलक से उतर के देखते हैं
सुना है हश्र हैं उसकी गजाल सी ऑंखें
सुना है उसको हिरन दशत भर के देखते हैं
सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगुनू ठहर के देखते हैं
सुना है रात से बढ कर हें काकुलें उसकी
सुना है शाम को साये गुजर के देखते हैं
सुना है उसके लवों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पै इल्जाम धर के देखते हैं
सुना है चश्म तसव्वुर से दश्ते इमकां में
पलंग जावे उसी की कमर को देखते हैं
सुना है उसके बदन की तराश ऐसी है
कि फूल अपनी गवायें कतर के देखते हैं
बस इक निगाह से लूटे है काफिला दिल का
सो राहरांवे तमन्ना भी डर के देखते हैं
सुना है उसके शबिस्तां से मुतासिल है बहिश्त
मकीं उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं
किसे नसीब कि बेपैरहन उसे देखे
कभी कभी दरो दीवार घर के देखते हैं
कहानियाँ ही सही सब मुबालगे ही सही
अगर वो ख्वाब है ताबीर कर के देखते हैं
अब उसके शहर में ठहरें कि कूच कर जायें
फराज आओ सितारे सफर के देखते हैं