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मंगलवार, मार्च 29, 2016

ट्वेंटी-ट्वेंटी में निजता हनन करता सोशल मीडिया

 ट्वेंटी-ट्वेंटी में निजता हनन करता सोशल मीडिया

वीरेन्द्र जैन

टेस्ट मैच से वन डे और उसके बाद ट्वेंटी-ट्वेंटी तक आ गये क्रिकेट में, खेल व मनोरंजन के साथ जुए का सम्मिश्रण अधिक हो गया है। खेल में एक खास अनुशासन के अंतर्गत शारीरिक मानसिक श्रम और कौशल को विकसित करने की प्रवृत्ति होती है जिसमें अपने व सार्वजनिक मनोरंजन के साथ एक स्वस्थ प्रतियोगी भाव भी रहता है। इस प्रतियोगिता के बीच जो परिणाम की अनिश्चितता रहती है उसके पूर्वानुमान के आधार पर जब शर्तें प्रारम्भ हुयीं वे आगे चलकर जुए का आधार बनती गयीं। जब इस खेल को जुआ खिलाने वाले प्रायोजित करने लगे तो उन्होंने इसकी समय सीमा को उसी तरह संकुचित करना प्रारम्भ किया जिस तरह से रमी खेलने वाले मांग पत्ता खेलने लगें। टीवी चनलों के प्रसार ने इसे दुनिया के किसी भी हिस्से से सीधे प्रसारण की सुविधा दी और दुनिया का एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग इससे एक साथ सीधे जुड़ने लगा। इस बड़े दर्शक वर्ग के सम्पर्क का लाभ उठाने के कारण विभिन्न उत्पादकों ने विज्ञापन देकर इसके प्रायोजकों को आर्थिक मजबूती प्रदान की जिसका लाभ खिलाड़ियों तक भी पहुँचा। कुछ मामलों में जब इसके परिणामों को तय करने के सौदे हुए तो जुआरियों के साथ व्यापारी भी जुड़ गये जिन्होंने खिलाड़ियों को अपने अनैतिक व्यापार का भागीदार बना लिया।
बड़े दर्शक वर्ग के कारण इस खेल के खिलाड़ी सितारे बने और किसी भी तरह सत्ता हासिल करने के लिए उतावले राजनीतिक दलों ने इन खिलाड़ियों को चुनाव में प्रचार करने के लिए उतारा। कई मामलों में तो उन्हें सीधे उम्मीदवार ही बना दिया। चयन समितियों तथा खेल पुरस्कारों को तय करने में सत्तारूढ दल के राजनेता अपना लाभ देख कर हस्तक्षेप करने लगे। लोकप्रियता पर आधारित फिल्म उद्योग की कई अभिनेत्रियां लोकप्रिय क्रिकेट खिलाड़ियों से जुड़ कर चर्चा में बने रहने का खेल खेलने लगीं। इसी क्रम में उनकी मित्रता और ‘ब्रेक-अप’ भी लम्पट समाज के बीच उन्हें खबरों में रखने लगा। फिल्म निर्माताओं को भी उनकी नायिकाओं का चर्चा में बने रहना लाभ का सौदा दिखा इसलिए उन्होंने भी खबरों की खेती को सिंचित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
पिछले वन डे मैचों के दौरान जब अभिनेत्री अनुष्का शर्मा, विराट कोहली के साथ दिखायी दीं व उन मैचों में वे अपने खेल का अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सके तो खबरें गढने वालों ने इसको उनके साथ से जोड़ा जिसे बड़ी रुचि के साथ पढा गया और आपसी बात चीत में चुभलाया गया। इसके विपरीत जब ट्वेंटी-ट्वेंटी वर्ल्ड कप 2016 के दौरान विराट ने अच्छा प्रदर्शन किया और अनुष्का शर्मा वहाँ नहीं दिखीं तो मनोरंजन प्रेमी दर्शकों के एक वर्ग ने तरह तरह के मजाक गढ कर सोशल मीडिया के माध्यम से इसे फैलाया। अमर्यादित सोशल मीडिया ने कुछ अशालीन टिप्पणियां भी कीं। जब ये टिप्पणियां अपनी सीमा तोड़ गयीं तो दुखी होकर विराट कोहली ने अपने इन्हीं प्रशंसकों के खिलाफ कटु टिप्पणी करते हुए लिखा- “ उन लोगों को शर्म आनी चाहिए, जो हर गलत और नकारात्मक चीज को अनुष्का से जोड़ रहे हैं। उन लोगों को खुद को पढा-लिखा कहने में शर्म आनी चाहिए। खेल में मैं कैसा प्रदर्शन करता हूं, उसका अनुष्का से से कोई लेना देना नहीं है, तो उसे दोषी क्यों ठहराया जाता है? अगर उन्होंने [अनुष्का] कुछ किया है, तो वह है कि मुझे मोटीवेट किया, और हमेशा मुझे सकारात्मकता दी। यह बात मैं बहुत पहले कह देना चाहता था। ...... और हाँ मुझे इस पोस्ट के लिए किसी का सम्मान नहीं चाहिए, बल्कि तरस खाइये और उनका सम्मान कीजिए। अपनी बहन, गर्ल फ्रैंड, या पत्नी के बारे में सोचिए, वो कैसा महसूस करेंगी, जब कोई उनके पीछे पड़ा रहे और सहजता से किसी भी समय सार्वजनिक रूप से उनका मजाक उड़ाए।“
मैंने सोशल मीडिया पर उपरोक्त आलोच्य टिप्पणियों के लिखने वालों को परखने की कोशिश की तो पाया कि ये अशालीन टिप्पणियां लिखने वालों का बहुमत उन लोगों में से था जिन्होंने जे एन यू में चल रहे छात्र आन्दोलन का विरोध किया था। इनमें से अधिकांश अपनी मौलिक टिप्पणियां नहीं लिखते अपितु किसी केन्द्र से आने वाली टिप्पणियों को ही कापी पेस्ट करके फारवर्ड कर देते हैं। एक ने तो कह ही दिया कि सोशल मीडिया में विराट अनुष्का प्रकरण चल निकलने से कन्हैया का प्रकरण गुम हो गया और देख लेना वह भी हार्दिक पटेल की तरह गुम हो जायेगा।
ट्वेंटी-ट्वेंटी का यह खेल जिस सक्रिय मध्यम वर्ग को मनोरंजन और अपने उत्पादन की बिक्री के लिए सम्बोधित करता है, उसी मध्यम वर्ग का एक बड़ा हिस्सा भाजपा और मोदी समर्थक रहा है। इसी हिस्से को पिछले दिनों सबसे ज्यादा निराशा भी हुयी थी जो विभिन्न चुनाव परिणामों में दिखायी भी दी। अलग अलग समय पर सिद्धू, चेतन चौहान, कीर्ति आज़ाद, आदि के बाद अब केरल में फिक्सिंग का आरोप झेल चुके श्रीसंत को उम्मीदवार बनाने वाली भाजपा के सोशल मीडिया केन्द्रों और उनके सन्देशों को फैलाने वाली भीड़ को विराट की खरी खरी से धक्का लगा होगा। अगर उनमें जरा भी शर्म होगी तो वे वैसे ही पूरे खेल जगत से क्षमा मांगने का साहस दिखायेंगे जिस तरह गन्दे सन्देश फैलाने का काम करते हैं।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629
         

मंगलवार, मार्च 24, 2015

चहचहाटों में बदलती अभिव्यक्ति की आज़ादी



चहचहाटों में बदलती अभिव्यक्ति की आज़ादी

वीरेन्द्र जैन
       प्रेमचन्द ने आज से अस्सी साल पहले अपने एक लेख में लिखा था कि साम्प्रदायिकता राष्ट्रवाद का मुखौटा लगा कर आती है। सुप्रसिद्ध व्यंगकार हरिशंकर परसाई की लघुकथाओं और आर के लक्ष्मण के कार्टूनों ने इन्हीं जैसे  बहुत सारे मुखौटों को नोंचने का काम किया है। स्वार्थी तत्व समाज में मान्य आदर्शों की ओट लेकर समाज विरोधी काम करते रहते हैं। इसी तरह अभिव्यक्ति की आज़ादी की ओट में गलत बयानी करने, अफवाह फैलाने, और चरित्र हनन करने, का काम किया जा रहा है। जब किसी आदर्श की ओट में गलत काम किया जाता है तो वह आदर्श बदनाम होने लगता है जिससे नुकसान समाज का होता है। जब इस विकृति की ओर उंगलियां उठायी जाती हैं तो उसे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला बताया जाने लगता है। अभिव्यक्ति की आज़ादी, झूठ बोलने की आज़ादी में बदलती जा रही है, जबकि आदर्श सच की अभिव्यक्ति और उसकी आज़ादी का है।
       सोशल मीडिया में बेनामी अभिव्यक्ति की सुविधा होने से इसकी ओट में ढेर सारे ऐसे काम किये जा रहे हैं जिन्हें लोकतंत्र विरोधी कहा जा सकता है। अभिव्यक्ति की आखिर ऐसी आज़ादी क्यों होनी चाहिए जिसमें इस अधिकार को प्रयोग करने वाले नागरिक की कोई पहचान न हो और उसके कथन की जिम्मेवारी लेने वाला कोई न हो। अभिव्यक्ति का अधिकार नागरिकों के लिए है भूतों के लिए नहीं। उसमें भी जब ऐसे अधिकांश कथन किसी व्यक्ति, समूह, आस्था, समाज हतैषी संस्थाओं या राजनीति विशेष को गलत आधार पर बदनाम करने और विद्वेष फैलाने के लिए व्यक्त किये जा रहे हों। उल्लेखनीय है कि ऐसी अभिव्यक्ति का दुरुपयोग 2014 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में एक पार्टी विशेष के समर्थको, एजेंटों द्वारा ध्रुवीकरण करने के लिए व्यापक रूप से किया गया था और अब उसकी सत्ता की रक्षा में किया जा रहा है।
       नागरिकों को सच्ची अभिव्यक्ति की आज़ादी की पूर्ण पक्षधरता करते हुए भी अदृश्य अमूर्त की आपराधिक अभिव्यक्ति की आज़ादी की वकालत नहीं की जा सकती जिसकी जिम्मेवारी लेने को कोई नजर नहीं आ रहा हो, और जिस में बनावटी नाम से अभिव्यक्ति की जा रही हो। यह बात स्पष्ट रूप से समझ ली जानी चाहिए कि किसी भी सशक्तीकरण कानून का दुरुपयोग उस समाज का दुगना नुकसान करता है जिसके हित में यह कानून लाया गया होता है क्योंकि उससे कानून पर से भरोसा उठता है। इसलिए जितना जरूरी उस कानून को लाना होता है उसका दुरुपयोग रोकना उससे ज्यादा जरूरी होता है। समाज के निहित स्वार्थ जब ओढी हुयी नैतिकितावश उस अधिकार का सीधे सीधे विरोध नहीं कर पाते तो उसे विकृत करने लगते हैं। दहेज विरोधी कानून का ऐसा ही परिणाम हुआ है जिनकी सुनवाई में विभिन्न अदालतों ने भी यह पाया है कि ज्यादातर मामले पारिवरिक कलह या खराब दाम्पत्य सम्बन्धों के होते हैं जिन्हें इस तरह प्रस्तुत कर के जनता के बीच इस कानून के प्रति नफरत पैदा की जा रही है। इस कानून से दहेज प्रथा रोकने में तो कोई प्रभावी मदद नहीं मिली है, किंतु इसके दुरुपयोग को देखते हुए अदालतों को आरोपियों के प्रति नरम होना पड़ा है। अब समाज में दहेज के आरोपियों के प्रति कोई नफरत देखने को नहीं मिलती। अगर दबंगों के भय, कमजोर और अपराधियों का सहयोगी शासन प्रशासन व न्याय व्यवस्था शिकायतकर्ताओं या व्हिसल ब्लोअरों को अपनी पहचान गुप्त न रह पाने के कारण खतरे में डालते हैं तो इसका हल वहाँ ही निकाला जाना चाहिए जहाँ ये कमजोरियां हैं। इन कमजोरियों के कारण बड़े अपराध की जनक झूठ बोलने की आज़ादी को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता। मुज़फ्फरनगर का उदाहरण सबसे ताज़ा है।
प्रैस की आज़ादी का सवाल भी ऐसा ही है। इस क्षेत्र में दलालों, चापलूसों, चाटुकारों की चाँदी है तो सच बोलने वाले पत्रकारों को हँसी का पात्र बनाया जाता है और वे हर तरह से पिछड़ते जा रहे हैं। हम आज जिस लोकतंत्र को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नाम से बताते हैं, वह झूठ की बुनियाद पर खड़ा भ्रष्ट तंत्र है। अधिकतर मीडिया हाउसों के मुखिया यह स्वीकारने में कोई संकोच नहीं करते कि अगर हम सच्ची पत्रकारिता करेंगे तो अखबार को ज्यादा दिन नहीं चला सकते। सरकारी विज्ञापन लेने के लिए नब्बे प्रतिशत अखबार सरकुलेशन के गलत आंकड़े देते हैं, पर विज्ञापन की दरें बदलवाने के लिए कोई सामूहिक अभियान नहीं चलाते। हर तीसरे दिन कोई न कोई नेता यह कहता हुआ नज़र आता है कि हमारे बयान को उसकी भावना के विपरीत आधा अधूरा या तोड़ मोड़ कर छापा गया है और कई मामलों में ऐसा होता भी है। मीडिया के पास अपने विचार व्यक्त करने के लिए केवल सम्पादकीय पृष्ठ होते हैं, शेष में उसे जैसा देखा या कहा गया है वैसा ही छापना चाहिए। खेद है कि हम जिस मीडिया की स्वतंत्रता की वकालत करते हैं वह वैसा मीडिया रहा ही नहीं है। इसका बड़ा हिस्सा किसी न किसी नेता, दल या कार्पोरेट हाउस का पिछ्लग्गू बन गया है, और खबरें देने की जगह, खबरें तोड़ने मरोड़ने, बदलने, अफवाहें उड़ाने, के साथ साथ खबरें दबाने का माध्यम बन कर रह गया है। होना तो यह चाहिए कि हर गलत खबर का खंडन शीघ्र से शीघ्र, उसी स्थल पर उतने ही बड़े आकार में छापने की अनिवार्यता हो और हर गलत खबर के लिए जिम्मेवार को रेखांकित किया जाये। भ्रष्टाचार और अपराध के हर बड़े भण्डाफोड़ के साथ इस बात को भी याद किया जाना चाहिए कि उस क्षेत्र में इतने सूचना प्रतिनिधि काम करते रहे और फिर भी इतने लम्बे समय तक अपराध कैसे चलता रहा। पत्रकारों को जितना सम्मान मिलता है और जितनी पूछ परख होती है उसके अनुपात में वे सामाजिक जिम्मेवारी महसूस नहीं करते। कुछ क्षेत्रों में तो उन्हें वेतन और सुविधाएं भी समुचित मिलती हैं। खेद की बात है कि पत्रकारों को जो सरकारी सुविधाएं उनके काम के लिए मिलना चाहिए वे अपनी जिम्मेवारियों से हटने के लिए मिलती हैं और अगर वे सरकारी अपराधियों के अनुरूप काम नहीं करते तो उन सुविधाओं के छिनने का खतरा बना रहता है। प्रदेश की राजधानियों में ही देखें तो आये दिन सीबीआई, इनकम टैक्स, लोकायुक्त, आर्थिक अपराध ब्यूरो आदि के छापे पड़ते रहते हैं जिनमें करोड़ों अरबों रुपयों के दुरुपयोग सामने आते रहते हैं, किंतु हजारों की संख्या में सरकारी सुविधाएं पाने वाले पत्रकारों में से किसी ने भी कभी भी ये मामले नहीं उठाये होते हैं। यदा कदा जब कोई ऐसा मामला आता भी है तो उसमें पत्रकारिता का कोई योगदान नहीं होता अपितु वह राजनीतिक या नौकरशाही की आपसी प्रतिद्वन्दिता का परिणाम होता है। इसमें पत्रकार का काम पोस्टमैन से अधिक नहीं होता। इनमें से कौन अभिव्यक्ति की आज़ादी चाहता है और इनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए कौन लड़ेगा!
       इस नक्कारखाने में तूती की अभिव्यक्ति घुट रही है पर हम फिर भी सच्ची अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए कोई संग्राम नहीं लड़ रहे और इस तरह खुद भी अपना गला घोंट रहे हैं। सोशल मीडिया केवल इन तूतियों की आवाजों की चहचहाटों को दर्ज करने का माध्यम बन रहा है, पर इसमें जो गलत चल रहा है उस पर कोई अंकुश नहीं है। इस कारण उससे बड़ी उम्मीदें नहीं पालना चाहिए। मुक्तिबोध ने कहा था- अब हमें अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे..........। जो खतरे उठाने से डरते हैं उनकी आज़ादी उनकी झूठ बोलने की सुविधा है।

वीरेन्द्र जैन                                                                           
2 /1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल म.प्र. [462023]
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शनिवार, सितंबर 28, 2013

राष्ट्रीय एकता परिषद का सोशल मीडिया पर गुस्सा

राष्ट्रीय एकता परिषद का सोशल मीडिया पर गुस्सा
वीरेन्द्र जैन
       गत दिनों एक अरसे बाद आयोजित राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक का अपने उद्देश्यों में असफल होना चिंता का विषय है। ऐसी बैठकें किसी घटना के बाद राजनीतिक दलों, केन्द्र व राज्यों की सरकारों और कुछ चयनित बुद्धिजीवियों का सामूहिक स्यापा और कभी पूरा न होने वाले संकल्पों की औपचारिकता के बाद समाप्त हो जाती रही हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ है। ऐसा महसूस किया गया है कि वे सही विन्दु पर पहुँचना ही नहीं चाहते इसलिए औपचारिकता का निर्वाह भर कर के रह जाते हैं। मुज़फ्फरनगर की हिंसा के बाद आयोजित सन्दर्भित बैठक इस बार सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर सारी जिम्मेवारी डाल कर और प्रधानमंत्री के दृढ संकल्प के दुहराव के साथ समाप्त हो गयी। इस बैठक में व्यक्त विचारों से ऐसा लगा जैसे कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग ही समस्या की असली जड़ है जबकि यह साम्प्रदायिक संगठनों के हाथ में आया केवल एक नया साधन भर है, जिसका प्रयोग धर्मनिरपेक्षता के हित में भी किया जा सकता है। असल समस्या तो धर्मान्धता, और राजनीतिक आर्थिक हित में उस अन्धत्व का लाभ उठाने वालों से निबटने की है। वोटों की राजनीति के शिकार जनता से कटे हुए दल तरह तरह के बहानों से इस अन्धत्व निवारण के बड़े परिश्रम से बचते लगते हैं, जबकि इसके विपरीत साम्प्रदायिक दल इसी अन्धत्व में अपना हित पाने के कारण उसे बनाये ही नहीं रखना चाहते अपितु उसमें वृद्धि करने के प्रति निरंतर सक्रिय हैं।
       मूल लड़ाई निष्क्रिय धर्मनिरपेक्षता और सक्रिय साम्प्रदायिकता के बीच है जिसमें लगातार धर्मनिरपेक्षता कमजोर पड़ कर पराजित हो रही है और साम्प्रदायिकता अपनी पूरी कुटिलता के साथ नये नये दाँव चलती जा रही है। उत्तर प्रदेश की ताज़ा घटनाएं, जिनके कारण इस बैठक को आहूत किया गया था, इसी का परिणाम हैं।
       सोशल मीडिया के दुरुपयोग करने में साम्प्रदायिक संगठन अग्रणी रहे हैं  और लाखों की संख्या में छद्म पहचानों से नफरत फैलाने के काम को आगे बढाया है। ऐसा वे इसलिए कर सके क्योंकि उनके पास पहले से ही एक बड़ा प्रचारतंत्र कार्यरत था। इस मीडिया के प्रारम्भ के साथ ही वे बहुत कुशलता से तर्क विहीन धार्मिकता और भौगोलिक राष्ट्रवाद को बढावा देने की ओट में नफरत भरे लेखों और टिप्पणियों की बाढ ले आये थे तथा गलत नामों वाली पहचानों से उन पर पसन्दगी के ढेर लगाने लगे जिससे ऐसा भ्रम फैले कि उनकी बात को सबसे ज्यादा पसन्द किया जा रहा है। कुछ एग्रीगेटर ज्यादा पसन्दगी के आधार पर प्रतिदिन मेरिट लिस्ट बनाते थे जिसमें इसी झूठी पसन्दगी के आधार पर साम्प्रदायिकों की पोस्टों को पहली दस पोस्टों में आना तय होता था। इस कारण से इन पोस्टों को दूसरे वे लोग भी पढने की कोशिश करते थे जिन्होंने इन्हें पहले नहीं पढा होता था। यही छद्म नाम गन्दी गन्दी गालियों से छुटपुट रूप से आने वाली धर्मनिरपेक्षता की पक्षधर पोस्टों को हतोत्साहित करने में जुट जाते थे। इन छद्म नामधारियों की टिप्पणियों के पोस्टिंग समय को देख कर ऐसा लगता रहा है कि ये किसी व्यक्ति विशेष के विचार भर नहीं हैं अपितु किसी सुव्यवस्थित कार्यालय से संचालित हो रही हैं एक ही छद्म नाम से विभिन्न वेबसाइटों पर चयनित अद्यतन सूचनाओं से भरी पूरे चौबीसों घंटे टिप्पणियां आते रहना किसी एक व्यक्ति का काम नहीं हो सकता। गत वर्ष गुजरात के विधानसभा चुनाव के दौरान यह सच सामने आया था कि मोदी के प्रचारक ट्विटर पर नकली फालोअर बनवा कर भ्रम पैदा करा रहे हैं। अक्टूबर 2012 में लन्दन की एक कम्पनी ने ट्विटर के आंकड़ों का पर्दाफाश करते हुए यह गड़बड़ी पकड़ी थी और बताया था कि दस लाख फालोअर्स का दावा करने वाली साइट के आधे से अधिक फालोअर्स नकली हैं।  सूचना तकनीक बहुत आगे बढ चुकी है और हम लोग दावा करते हैं कि हमारे यहाँ ऐसे तकनीकी विशेषज्ञ लाखों की संख्या में निकल रहे हैं तो क्यों नहीं झूठ पर आधारित साम्प्रदायिकता फैलाने वाली इन पोस्टों के छद्मनामों से सक्रिय अपराधियों की पहचान इसके प्रारम्भ से ही किये जाने की कार्यवाही की गयी और न अब की जा रही है। यदि ऐसा किया जा सके तो उनके सांगठनिक जुड़ाव का खुलासा किया जा सकता है।
       तकनीक पर आधारित सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए इसे तकनीकी विशेषज्ञों की मदद और प्रशासनिक कार्यवाहियों से ठीक किया जा सकता था। उल्लेखनीय है कि जब से एक खास संगठन से निकले लोग आतंकी गतिविधियों के लिए पहचाने और पकड़े गये थे तब से देश में आतंकी गतिविधियां न केवल बन्द हो गयी हैं अपितु उन से जुड़े राजनीतिक दल को आतंकवाद को देश की सबसे बड़ी समस्या बताने के बहाने एक खास समुदाय को निशाना बना कर साम्प्रदायिकता फैलाने का काम करना स्थगित करना पड़ा था। यदि करकरे जैसे पुलिस अधिकारियों की शहादत से सबक लेते हुए उनके कार्यकाल के दौरान उनका विरोध करने वालों की पहचान कराने का काम लगातार चलाया जाता तो साम्प्रदायिकता फैलाने वालों को रक्षात्मक बनाया जा सकता था। स्मरणीय है कि शहीद करकरे की पत्नी ने उनकी शहादत के बाद मोदी द्वारा दी गयी एक करोड़ की रकम को इसीलिए ठुकरा दिया था क्योंकि उनके जीवनकाल में मोदी गिरोह ही उनके महत्वपूर्ण कार्यों का लगातार विरोध कर रहा था, और उनके खिलाफ आन्दोलन की धमकियां दे रहा था।
       भले ही राष्ट्रीय एकता परिषद की उपलब्धियां हमें वांछित लक्ष्यों तक नहीं पहुँचा सकी हों किंतु उसमें  उन तक पहुँचने के संकल्प बिन्दु होने की सम्भावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। ये कैसी दुखद स्थिति है कि कुछ खास पार्टियों के मुख्यमंत्री और नेता जानबूझ कर इसकी बैठक से अनुपस्थित रहते हैं और इसमें उपस्थित होने वाले उनकी जिम्मेवारियों से विमुख होने को ढंग से प्रचारित भी नहीं कर पाते। इस बात को बार बार रेखांकित किये जाने की जरूरत है कि साम्प्रदायिक दंगों को उनके प्रारम्भ होने के कारणों तक सीमित रखने से काम नहीं चलने वाला अपितु उस षड़यंत्रपूर्ण कूटनीति के विरुद्ध लगातार काम करने की जरूरत है जो घटना के पात्रों को तुरंत ही समुदायों के कामों में बदल देने का माहौल बनाने में निरंतर सक्रिय रहती हैं। इसके साथ ही सुरक्षा बलों और प्रशासनिक अधिकारियों के कार्यकलापों की निरंतर समीक्षा किये जाने और सक्षम अधिकारियों को जानकारी देने का काम भी राष्ट्रीय एकता परिषद द्वारा किये जाने का तंत्र बनाया जाना चाहिए।  
वीरेन्द्र जैन
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