शुक्रवार, मई 01, 2015

भाजपा संस्कृति में स्मार्ट शहर का झुनझुना



भाजपा संस्कृति में स्मार्ट शहर का झुनझुना
वीरेन्द्र जैन

      अपनी पद स्थापना के लगभग एक वर्ष बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सौ स्मार्ट शहरों के निर्माण स्थलों की सूची तैयार कर ली है। आमतौर पर ये वे नगर हैं जो स्वायत्तशासी निकायों में नगर निगम की श्रेणी में आते हैं। घोषणा के इस एक साल बाद भी न तो अधिकारी और न ही राजनेता स्मार्ट शहर की परिकल्पना को पूरी तरह समझ पाये हैं इसलिए कोई भी इस पर अपनी अधिकृत टिप्पणी दे सकने की स्थिति में नहीं है। सच तो यह है कि यह स्वर्ग की तरह का एक ऐसा सपना है जिसे सब अपनी अपनी तरह से देख कर मन बहला सकते हैं और अपना लोभ लाभ सोच मन के मोदक खा सकते हैं।
      इसकी जो प्राथमिक परिकल्पना मन में उभरती है उसके अनुसार विद्युत, जल, हवा. धूप, गन्दगी निस्तारण, पर्यावरण, पार्किंग, सामुदायिक भवन, झूलाघर, प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ केन्द्र, दैनिन्दिन वस्तु बाजार, आदि से सम्बन्धित सभी तरह की समस्याओं से मुक्त बहुमंजली आवास और प्रदूषणमुक्त कई लाइनों की सुचारु आवागमन प्रणाली से परिपूर्ण मार्गों वाले नगरों का निर्माण करना होगा। इसके साथ ही इस नगर में रहने वालों के लिए क्षेत्र विशेष के अनुसार रोजगार के केन्द्र भी समानुपात में बनाने होंगे तब ही उक्त स्मार्ट नगर में रहने वाले उस स्तर का जीवन यापन करने लायक धन अर्जित कर सकेंगे और आदर्श आवास स्थल में रहने का अधिकार प्राप्त कर सकेंगे। यदि यह काम आज की तारीख से ही प्रारम्भ कर दिया जाये तो भी बसे हुये नगरों के समानांतर विकास का ऐसा कार्य पूरा करने में बारह से पन्द्रह वर्ष लग जायेंगे बशर्ते सामान की आपूर्ति बनी रहे और कोई नागरिक या न्यायिक बाधा पैदा न हो। उल्लेखनीय है कि खाली जगह में नया नगर बनाना बसे हुये नगर को नया बनाने की तुलना में आसान होता है। अगर नया नगर बनाना हो तो निकट में ही उपयुक्त भूमि का समुचित अधिग्रहण करना होगा।
      भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ हर पाँच वर्ष में चुनाव होते हैं इसलिए किसी भी लम्बी अवधि की योजना के लिए व्यापक सहमति जरूरी होती है और ऐसी सहमति प्राप्त करने के लिए योजना को अपनी अच्छाइयों, बुराइयों सहित स्पष्ट होना जरूरी होता है। अभी तक इस योजना के बारे में विपक्ष तो दूर की बात है सत्ता पक्ष के लोगों तक को ठीक तरह नहीं मालूम है तो इसके कार्य निष्पादन में लगने वाले समय की कल्पना ही की जा सकती है।
      जिन दिनों संसद चलती है उन दिनों देखा गया है कि संसदीय कार्य मंत्री की जिम्मेवारी सम्हाल रहे वैंक्य्या नायडू हर तर्क के उत्तर में दिन में कम से कम दस बार सदस्यों को यह याद दिलाते रहते हैं कि उनकी पार्टी को जनादेश मिला हुआ है इसलिए उनकी सरकार जो कुछ भी कर रही है वह ठीक है और उसके खिलाफ किसी को कुछ कहने का अधिकार नहीं है। यदि ऐसा ही है तो न तो सदन की कार्यवाही की कोई जरूरत रह जाती है और ना ही न्यायालयों की कोई भूमिका शेष बचती है। जबकि सच्चाई यह है कि उनकी पार्टी को कुल 31 प्रतिशत मत ही मिले हैं और राज्यसभा में उन्हें बहुमत प्राप्त नहीं है। देश के पूर्वी और दक्षिणी भाग से उनका प्रतिनिधित्व न्यूनतम है। जनादेश भी उन्हें कुशल प्रबन्धन के कारण मिला हुआ है जो स्वाभाविक रूप से मिले जनसमर्थन जैसा नहीं है, जैसा कि 1971 के आम चुनावों में श्रीमती इन्दिरा गाँधी को मिला था, या दिल्ली विधानसभा के पिछले चुनावों में अरविन्द केजरीवाल को मिला है। उनके बहुत सारे सदस्य केवल रणनीतिक रूप से चुप हैं और संकेत मिलते हैं कि वहाँ शांति नहीं अपितु सन्नाटा है, जिसे कभी कभी शत्रुघ्न सिन्हा जैसे लोग तोड़ते रहते हैं।
      भाजपा ने पिछले लोकसभा चुनाव में भले ही विकास और कुशल प्रशासन को अपनी घोषणाओं में शामिल किया हो किंतु उसकी मूल पहचान एक दक्षिणपंथी कट्टर हिन्दुत्ववादी दल की ही है जिसने सत्ता में आने के लिए न केवल साम्प्रदायिकता को बार बार भड़काया है अपितु अपने पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के माध्यम से उसमें सक्रिय भागीदारी भी की है। विकास और कुशल प्रशासन के जिस नारे पर लोकसभा में उनके मतों में जो वृद्धि हुयी थी वह पिछले दस महीनों के शासन में घट चुकी है जिसके संकेत दिल्ली विधानसभा समेत बंगाल के नगर निकाय चुनावों में दिखायी दे गये हैं। दूसरी ओर उनका परम्परागत समर्थन म.प्र., छत्तीसगढ, गुजरात, राजस्थान आदि में बना हुआ है। इसका अर्थ यही है उनकी पहचान एक कट्टर हिन्दुत्ववादी दक्षिणपंथी दल के रूप में तो बनी रही किंतु विकासवादी कुशल प्रशासक के रूप में नहीं बन सकी है। क्या इस पहचान और मान्यताओं वाले लोगों के साथ स्मार्ट शहरों की सम्भावित दुनिया की ओर देश को ले जाया जा सकता है? क्या स्मार्ट शहर के लोगों से चार हिन्दू बच्चे पैदा करने का आवाहन किया जा सकता है? क्या स्मार्ट शहर के लोगों के बीच रामजादों और हरामजादों का विभाजन किया जा सकता है? क्या स्मार्ट नगरों के अस्पतालों का उद्घाटन करते समय मनुष्य की देह में हाथी के सिर का प्रत्यारोपण करने की पौराणिक कथा के माध्यम से हमारे प्राचीन ज्ञान का महिमामंडन किया जा सकता है। क्या स्मार्ट शहर के लोगों को यह विश्वास दिलाया जा सकता है कि गीता पढने से न आँखों पर चश्मा लगेगा और न ही डायबिटीज होगी। क्या स्मार्ट शहर के बच्चों को बतरा जैसे शैक्षिक सलाहकारों द्वारा अनुशंसित पुस्तकें पढवायी जा सकती हैं। क्या स्मार्ट शहर के लोग कैसे वस्त्र पहिनें यह कट्टरपंथी संगठनों से पूछने जा सकेंगे? क्या स्मार्ट शहर के लोग रंगभेद के शिकार होंगे? क्या स्मार्ट शहर के लोग अपने खाद्य पदार्थों के चुनाव के लिए कट्टरपंथी संगठनों पर निर्भरता रख सकेंगे। स्मार्ट शहर क्या इंडिया के होंगे या स्वयंभू जगतगुरु भारत के? क्या भाजपा संस्कृति और अनुमानित स्मार्ट शहर एक साथ चल सकते हैं।
      वैक्य्या नायडू की मोदी सरकार जो स्मार्ट शहर योजना ले कर आयी है वह सरकार केवल मनोहर पारीकर और किरण रिजजू से ही बनी हुयी नहीं है अपितु इसमें केबिनेट मंत्री के रूप में सुशोभित सुश्री उमा भारती निरंजन ज्योति और गिरिराज सिंह भी हैं तथा बहुमत जुटाने में भगवा वेषधारी स्वामी सच्चिदानन्द साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ, सुमेधानन्द सरस्वती, चाँदनाथ आदि दर्ज़न भर लोग तो साफ दिखायी देते हैं। यह भी नहीं भूला जा सकता कि पूरी भाजपा के जो लोग एक स्वर से अडवाणीजी का भजन करते थे वे ही लोग संघ द्वारा नजर फेरते ही मोदी मोदी करने लगे थे। अभी तक किसी को भी यह पता नहीं है कि संघ परिवार का स्मार्ट शहरों के बारे में क्या रुख है और इसमें बजरंगदल, व विहिप का स्थान कहाँ होगा और शाखाएं लगाने व शोभा यात्राएं निकालने का मार्ग क्या होगा?
      जो लोग बात बात में लोकतंत्र और जनादेश की दुहाई देते हैं, उन्हें यह भी बताना चाहिए कि स्मार्ट शहर की माँग किस जनता ने कब की थी? क्या जनता इसे स्वीकार करने के लिए अपने पुराने संस्कार छोड़ने को तैयार हो चुकी है? मैं जब एक बैंक में अधिकारी था जिसका मुख्य कार्यालय और प्रशिक्षण केन्द्र कानपुर में था तब प्रशिक्षण कार्यक्रमों में चेन्नई से एक आफीसर आता था और वह कानपुर जो देश का पाँचवा बड़ा शहर माना जाता था, अपनी नाक सिकोड़ते हुए कहता था- बिगेस्ट विलेज आफ इंडिया। सच था कि इंडिया का मैनचेस्टर कहलाने वाला महानगर कानपुर कभी अपना देशी चरित्र नहीं छोड़ पाया। आज भी भोपाल समेत बहुत सारी प्रादेशिक राजधानियों में असंख्य निजी और सार्वजनिक वाहन चलते हैं पर उत्तर भारत की राजधानियों के लोगों को अभी तक ट्रैफिक सेंस नहीं आया और जहाँ पर कोई ट्रैफिक चैकिंग नहीं होती वहाँ वाहन जंगली जानवरों की तरह मनमाने ढंग से चलते हैं। क्या स्मार्ट शहर के योजनाकारों के पास आम जनता को स्मार्ट करने की कोई योजना है जिससे स्मार्ट शहर में जगह जगह पान की पीक नहीं मिले और लोग पब्लिक टायलेट का प्रयोग करें। 


वीरेन्द्र जैन                                                                       
2 /1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल म.प्र. [462023]
मोबाइल 9425674629
  
                                                     

रविवार, अप्रैल 26, 2015

रंगीन अँधेरों का समय



रंगीन अँधेरों का समय
वीरेन्द्र जैन

यह नई तकनीकों का दौर है इसलिए अब अँधेरे काले ही नहीं होते वे रंगीन भी हो सकते हैं और हमें सच न देख पाने की वैसी ही परिस्तिथियां पैदा कर सकते हैं, जैसी कि चकाचौंध करती है। काले अँधेरे को झेलने के अभ्यस्त लोगों को इस दौर में लम्बे समय तक यह पता भी नहीं चल पाता कि वे अँधेरे में हैं। पिछले दिनों एक मध्यम वर्गीय गृहणी ने बहुत गम्भीर होकर कहा था कि आज मैं कल्पना भी नहीं कर पाती कि जब टेलीविजन के चौबीस घंटे चलने वाले चैनल नहीं थे तो महिलाएं अपना समय कैसे काटती थीं। इन रंगीन चैनलों ने उनके खाली समय को अपनी तरह से भर दिया है, और उन्हें यह पता नहीं चल पा रहा कि उन्हें नई तरह से कैद कर दिया गया है। इस कैद में चैनलों के मालिक और उनके विज्ञापनदाता सतही समझ के लोगों को सतही सम्वेदनाओं के द्वारा अपना माल बेचने की कोशिश करते हैं। अब बाज़ार से स्वाद तो मंगा लिया जाता है किंतु खुद के द्वारा प्यार और मेहनत से बनाये गये पकवानों को परोसने और निरंतर प्रयोगधर्मी पाक कौशल से प्रशंसा पाने का सुख समाप्त हो गया है। एक विज्ञापन में दादी माँ छुप कर बाज़ार का तैयार मसाला प्रयोग करके अपनी झूठी प्रशंसा का सुख लेती दिखायी जाती है, किंतु चंचल पोती उसका राज खोल देती है।  
कई दशक पहले लगभग सभी शिक्षा संस्थानों में सांस्कृतिक गतिविधियों से सम्बन्धित वार्षिक कार्यक्रम होते रहे थे जिनके द्वारा छात्रों की रचनात्मक गतिविधियों को सामने लाने उन्हें परखने, सजाने संवारने और प्रोत्साहित करने का काम होता था किंतु अब उनकी जगह भारी भरकम भुगतान पर किसी फिल्म या टीवी कार्यक्रम से जुड़े रहे किसी आर्केस्ट्रा ग्रुप को बुला लिया जाता है। अब छात्रों के बीच शिक्षा के साथ समानांतर रूप से सांस्कृतिक बीज पल्लवित पुष्पित होने बन्द हो गये। अब शिक्षा जगत में अच्छे कैरियर के लिए बैल की तरह जुते युवाओं और कलात्मक रुचि वाले युवाओं के वर्ग अलग अलग हैं। कलात्मक रुचि के युवाओं के लक्ष्य भी फिल्म और टीवी के कलाकार बनना, लाखों रुपयों में बिकने वाली पेंटिंग के स्तर तक पहुँचना या मँहगा संगीतज्ञ बनना हो गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो इस क्षेत्र में भी घर में बनने वाले स्वादिष्ट खाने की जगह होटल से लाया गया भोजन या तैयार मसालों द्वारा होटल जैसा ही भोजन घर में तैयार करने की कोशिशें होती हैं, जिससे घरेलू कलाएं विस्मृत हो रही है। अब विवाह के लिए मुलाकात के समय शायद ही किसी लड़की से गीत संगीत सम्बन्धित ज्ञान के बारे में पहले की तरह पूछा जाता हो या वह चयन का आधार बनता हो। शौकिया कलाकार निरंतर कम हो रहे हैं। कवि गोष्ठियां लगभग बन्द या फ्लाप होने लगी हैं किंतु व्यापारियों या उनके क्लबों द्वारा बड़े बज़ट वाले कवि सम्मेलन होने लगे हैं जिनमें लाखों रुपया पारिश्रमिक लेने वाले कवि अपनी वर्षों पुरानी सतही सम्वेदनाओं वाली गीत रचनाएं या तोंदों को बाहर से गुदगुदाने वाला हास्य परोस कर मनोरंजन करते हैं। इस व्यवसाय में अति प्रचार द्वारा कलाकारों को इतना बढा चढा दिया जाता है कि उनको सामने सुनने का सुख किसी ऎतिहासिक घटना में सम्मलित होने जैसा लगता है, अन्यथा आजकल टीवी, डीवीडी, और इंटरनेट पर उन्हीं के मुख से गायी गयी वे ही रचनाएं सहज रूप में मौजूद हैं। जल्दी ही रिकार्ड होकर रचनाओं के बासी हो जाने से बचने के लिए व्यवसायी कवि बहुत सीमित मात्रा में ताजा ‘माल’ बाहर निकालता है पर समाचार पत्रों में साक्षात्कार देने की जुगाड़ जरूर जमाता है ताकि सेलीब्रिटी की तरह स्थापित होने की दिशा में अग्रसर हो सके। समाज को सम्वेदनहीन बनाया जा रहा है और शोक के समय पर नये तरह के रुदाले बुलवाये जाने लगे हैं, कामेडी सीरियलों में हँसी पीछे से जोड़ना पड़ रही है। जीवन को नकली सम्वेदनाओं से सजाया जाने लगा है।
सूचना की दुनिया में तो सबसे ज्यादा रंगीन अँधेरा फैलाया जा रहा है। यह रोचक है कि अखबारों के सरकुलेशन के आँकड़े बढ रहे हैं, उनके पेजों की संख्या बढ रही है, समाचार चैनल बढ रहे हैं, पत्रकारों की संख्या बढ रही है, पहले की तुलना में उनके वेतन और सरकारी पुरस्कार बढ रहे हैं, मुखर हो सकने की सम्भावना वाले पत्रकारों को सरकारी सुविधाएं बढ रही हैं पर खबरें कम से कम हो रही हैं। उक्त सारे पुरस्कार और सुविधाएं खबरों को दबाने, छुपाने या भटकाने के लिए दी जा रही हैं। खोजी पत्रकारिता लगभग समाप्त हो चुकी है, स्टिंग बन्द हो चुके हैं, विचारों का नयापन चर्चा में नहीं आ पाता क्योंकि इतना कचरा फैलाया जाता है कि उसमें से मोती ढूंढना मुश्किल होता है। कोई नहीं पूछ रहा कि इतना भारी भरकम अखबार छरहरे अखबार की तुलना में सस्ता और बेकार क्यों है! मोटे अखबारों में अक्षर कम पर चित्र अधिक छापे जा रहे हैं। समाज को उन सूचना माध्यमों से भर दिया गया है जिनमें ज्यादा रद्दी निकलती है। इस रद्दी में दो तीन पेज तो मुम्बइया फिल्मी गासिप और उनके रंगीन चित्रों से भरे रहते हैं। क्रिकेट में टूर्नामेंटवार, देशवार ही नहीं टीमवार, खिलाड़ीवार, खेल के मैदानवार रिकार्डों का अम्बार ही नहीं उसके खिलाड़ियों के प्रेम प्रसंग और विवाहों की खबरें खेलों के समाचारों से ज्यादा भरी होती हैं। सट्टेबाजी ने इनको और भी बढावा दिया है। इसी लोकप्रियता के आधार पर वे खिलाड़ी दुनिया भर के विज्ञापन भी कर लेते हैं।   
राजनीति में मोदीयुग के उदय में इसी मीडिया की भूमिका रही है। उनके चुनावी रणनीतिकारों ने न केवल प्रिंट और विजुअल मीडिया को ही भटकाया अपितु अदृश्य श्रोतों वाले सोशल मीडिया के नकली समर्थकों द्वारा झूठ और भ्रम पैदा करवाया गया। किराये के नाचने गाने वालों के साथ तो एक अवसर के लिए ही सौदा होता है। दूसरे अवसर पर अपनी प्रस्तुति देने के लिए उन्हें फिर से मेहनताना चाहिए होता है। केन्द्रीय मंत्री जनरल वी के सिंह ने  प्रैस को अनजाने में प्रैस्टीट्यूट नहीं कहा था। बाद में उसे केवल दस प्रतिशत तक सीमित रखने वाली सफाई भी बयान को नकारने वाली नहीं थी अपितु उसे गोलमोल बनाने की कोशिश थी क्योंकि उन्होंने दस प्रतिशत को चिन्हित नहीं किया गया था। उनकी सफाई से प्रैस का कोई भी हिस्सा नब्बे प्रतिशत में आ सकता है और कोई भी दस प्रतिशत में आ सकता है। अपने अपराधबोध के कारण ही प्रैस अपने विरोध को दूर तक नहीं ले जा सकी तथा नरेन्द्र मोदी ने भी परोक्ष में जनरल की बात से खुद को और पार्टी को अलग नहीं किया। भाजपा के प्रशंसक पत्रकार श्री वेद प्रताप वैदिक ने भी वी के सिंह की बात का समर्थन यह कह कर किया कि सभी ऐसे नहीं हैं और कुछ पत्रकार तो देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से भी ज्यादा समझदार हैं, जिसका अर्थ यह हुआ कि प्रैस के एक हिस्से को वे भी दोषी मानते हैं, पर किस हिस्से को, यह स्पष्ट नहीं करते। पत्रकार कलम का मज़दूर होता है पर जब अचानक ही कुछ पत्रकारों की धन दौलत और हैसियत में अकूत वृद्धि देखने को मिले तो यह स्वीकार कर लेना चहिए कि यह वृद्धि जनता के सामने सच्चाई छुपाने, जानबूझ कर गलत छवि गढने के बदले में देश की जनता के धन को लूटने वाले भ्रष्ट नेताओं, व्यापारियों, ठेकेदारों, और अधिकारियों के माध्यम से पहुँची होगी। एक पत्रकार द्वारा किया गया भ्रष्ट आचरण पूरे समाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था को नुकसान पहुँचाता है। आखिर क्या कारण है कि भ्रष्टाचार के अम्बारों में से किसी के प्रकटीकरण का काम प्रैस के द्वारा नहीं हुआ अपितु पत्रकार सरकारी गोपनीय सूचनाओं को पूंजीपतियों तक पहुँचाने का काम करते हुए पहचाने गये। जो खुद को लोकतंत्र का चौथा खम्भा कहता है वह शेष तीन खम्भों को तो कलंकित करने की शक्ति चाहता है पर अपने वर्ग में पल रहे अँधेरे की ओर इंगित नहीं करता। यह साहस केवल जनसत्ता के पूर्व सम्पादक प्रभाष जोशी ने किया था तब चुनावों के थोड़े समय तक पेड न्यूज की चर्चा चली थी जो अब बन्द हो चुकी है जबकि चुनावों के अलावा भी जो प्रतिदिन पेड न्यूज चलती है वह ज्यादा खतरनाक होती है। प्रैस की पवित्रता तब ही स्वीकार हो सकेगी जब वह निर्मम होकर अपने वर्ग में पल रहें दोषियों को भी उजागर करे। सम्वेदनहीन कला जब मनोरंजन मात्र बन रही हो और वह मनोरंजन सही सूचनाओं को ढकने के लिए प्रयोग में लाया जा रहा हो तो ऐसे मनोरंजन की अति का विरोध कला का विरोध नहीं कहा जा सकता। कौन सा लेखक, कलाकार, पत्रकार किन समकालीनों के बीच में से कब धनधान्य से पुरस्कृत और सम्मानित हो जाये इसका कोई कारण सरकारें बताने को तैयार नहीं। पुरस्कार किसी का सम्मान ही नहीं बढाता अपितु पुरस्कृत के समकालीनों में हताशा या उत्तेजना भी जगाता है, विशेष रूप से जब वे पुरस्कार पक्षपातपूर्ण लग रहे हों, व सच को दबाने छुपाने के लिए दिये जा रहे हों। चौथे खम्भे को अपराध बोध से भर देने के बाद उसे न केवल ब्लैकमेल ही किया जाने लगा है अपितु देश की  सबसे भ्रष्ट राजनीति करने वाले उसे प्रैस्टीट्यूट कह रहे हैं और वह दाँत निपोर रहा है। हीरो हीरोइनों के सहारे चुनाव की नैया पार लगाने वाले अपने प्रिय कार्पोरेट घरानों को मीडिया हाउस पर अधिकार कर लेने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। अब समाचार चैनलों पर भी मनोरंजक कार्यक्रमों या फूहड़ हास्य के कार्यक्रम अधिक आने लगे हैं और दूर दराज की फील्ड रिपोर्टिंग बिल्कुल गायब हो गयी है। एक अखबार तो ‘नो निगेतिव न्यूज’ का नारा उछाल कर समाचार दबाने का खुला खेल खेलने लगा है जिसके बदले में विदेश की धरती पर देश के प्रधानमंत्री से प्रशंसा पा चुका है।
 चौथे खम्भे में आयी विकृतियों से लोकतंत्र पर बड़ा खतरा मंडराने लगा है।
वीरेन्द्र जैन                                                                           
2 /1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल म.प्र. [462023]
मोबाइल 9425674629
  

मंगलवार, अप्रैल 14, 2015

मध्य प्रदेश में पत्रकारिता के लिए ब्राम्हणों, सवर्णों को पुरस्कार



मध्य प्रदेश में पत्रकारिता के लिए ब्राम्हणों, सवर्णों को पुरस्कार
वीरेन्द्र जैन

केन्द्र और राज्य दोनों ही जगह मनु स्मृति को संविधान की जगह देने का विचार रखने वाले लोगों की सरकार बन जाने के बाद मध्य प्रदेश में यह तय पाया गया कि अब वर्षों से रुके हुए पत्रकारिता के पुरस्कार वितरित किये जाना चाहिए। एक हिन्दुत्व वाली पार्टी की सरकार जब पुरस्कार वितरित करती है तो जाहिर है कि किसी मुस्लिम या दलित पत्रकार को पुरस्कार योग्य कैसे समझा जा सकता है। यही कारण है कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने जब पिछले दिनों पत्रकारिता पुरस्कार दिये तो उनमें से एक भी मुस्लिम और दलित नहीं था। उल्लेखनीय है कि प्रदेश में माखनलाल चतुर्वेदी के नाम से चल रहे पत्रकारिता विश्वविद्यालय का देश में बड़ा नाम है और उससे हर जाति वर्ग के प्रतिभाशाली छात्र प्रतिवर्ष निकलते रहे हैं जो प्रदेश और देश के राष्ट्रीय मीडिया संस्थानों में काम कर रहे हैं। यदि प्रदेश में इस दलित मुस्लिम वर्ग के किसी पत्रकार को पुरस्कार के योग्य नहीं समझा गया तो यह संकेतक है कि या तो उक्त वर्गों को शिक्षा में या/और रोजगार में उचित स्थान नहीं मिल पा रहा। यदि ऐसा नहीं है तो तय है कि पुरस्कार के लिए चयन में निष्पक्षता की कमी रह गयी है। कितना अच्छा हो अगर सूचना के अधिकार के इस युग में चयन प्रक्रिया के सारे तथ्य सार्वजनिक हों।
पुरस्कारों के लिए पाँच सदस्यों की जूरी बनायी गयी थी इनमें से चार सर्व श्री मदन मोहन जोशी, श्री शरद द्विवेदी, श्री जय कृष्ण गौड़, श्री जयराम शुक्ला [सभी ब्राम्हण] और श्री महेश श्रीवास्तव सम्मलित थे। स्पष्ट है कि लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटने वाले इस युग में सरकार द्वारा तय की गयी जूरी में बहुमत से फैसला हुआ होगा।
मध्य प्रदेश सरकार ने सात पुरस्कारों में सात-सात लोगों को कुल उननचास पुरस्कार प्रदान किये इन उननचास पुरस्कारों में कोई भी मुस्लिम नहीं है और कोई भी दलित नहीं है। आज मीडिया में बहुत सारी महिलाएं पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं और बहुत अच्छा काम कर रही हैं किंतु महिला वर्ग में केवल एक पुरस्कार दिया गया। यह मात्र संयोग हो तो अच्छा है किंतु ऐसा है नहीं कि उननचास पुरस्कारों/सम्मानों में से तीस से अधिक अर्थात 62 प्रतिशत घोषित रूप से ब्राम्हण हैं और कुछ अन्य की उपजातियों से भी ब्राम्हण होने के संकेत मिलते हैं। इतने ब्राम्हणों को सम्मानित करने का पुण्य प्राप्त करने के अवसर से गदगद मुख्यमंत्री ने किसी महाराजा की तरह उसी स्थल पर इक्यावन हजार के पुरस्कार को एक लाख का घोषित कर दिया और इक्यावन हजार का चैक तुरंत देते हुए शेष राशि उनके खातों में जमा कराने की घोषणा कर दी। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश सरकार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब चल रही है और भूमि अधिग्रहण के कानून से आतंकित किसान मौसम की मार से आत्महत्याएं कर रहे हैं तब बिना किसी मांग के इसी वर्ष से दी गयी मुख्यमंत्री की यह उदारता सन्देह पैदा करती है।
यद्यपि कुछ पुरस्कार बहुत ही सुयोग्य व्यक्तियों जैसे श्री राम विद्रोही, श्री सतीश एलिया, श्री प्रमोद भार्गव श्रीमती रानी शर्मा, आदि को मिले हैं जिन्हें ये पुरस्कार बहुत पहले ही मिल जाने चाहिए थे ताकि उन्हें ऐसे समूहों में सम्मलित नहीं होना पड़ता, पर योग्यता का स्वाभिमान अपने कामों के लिए स्वयं आवेदन करने की स्थिति तक बहुत मजबूरियों में ही पहुँच सकता है।
वीरेन्द्र जैन                                                                           
2 /1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल म.प्र. [462023]
मोबाइल 9425674629