शुक्रवार, जुलाई 10, 2009

चौथे खम्भे भी संपत्ति की घोषणा करें

लोकतंत्र के चौथे खम्भे वालों की सम्पत्ति भी घोषित होनी चाहिये
वीरेन्द्र जैन
सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों(कार्यपालिका) के लिए अपनी सम्पत्ति की घोषणा करने का नियम बहुत पहले से ही लागू रहा है पर पिछले कुछ वर्षों के दौरान चुनाव लड़ रहे नेताओं(विधायिका) को अपना उम्मीदवारी का पर्चा दाखिल करते समय अपनी सम्पत्ति की घोषणा करने के साथ उनके ऊपर चल रहे आपराधिक प्रकरणों की जानकारी देना भी अनिवार्य कर दिया गया था। गत दिनों केन्द्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने प्रैस एसोसियेशन की ओर से आयोजित मुलाकात में कहा कि सरकार सौ दिनों के अन्दर न्यायाधीशों की ओर से सम्पत्तियों और देनदारियों की घोषणा से सम्बंधित एक विधेयक संसद में पेश करेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस मामले में वे न्यायपालिका को पूरे विश्वास में लेकर ही यह कदम उठायेंगे, हम उनसे टकराव के रास्ते पर नहीं हैं। स्मरणीय है कि कलकत्ता हाईकोर्ट के मौजूदा न्यायधीश सौमित्र सेन के खिलाफ दुराचरण के आरोप लगने के बाद ऐसे कानून की जरूरत महसूस की जा रही थी। श्री मोइली का कहना था कि सरकार सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही पूरी करवा कर जनता के बीच पनप रही यह धारणा समाप्त करेगी कि कुछ नहीं होता है। सौमित्र के खिलाफ लगे आरोपों की जाँच के लिए एक समिति का गठन किया गया है जिसमें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्यन्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर और प्रख्यात अधिवक्ता फाली एस नरीमन के साथ सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बी सुर्दशन रेड्डी को शामिल किया गया है।
ऐसा लगता है कि अब न्यायाधीशों को भी अपनी सम्पत्ति की घोषणा करना ही पड़ेगी। पिछले दिनो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने सार्वजनिक रूप से यह मान कर कि तीस प्रतिशत जज भ्रष्ट हैं, सारे ही जजों को कटघरे में खड़ा कर दिया था। देश के समस्त न्यायधीशों में से कौन तीस प्रतिशत में आता है और कौन सत्तर प्रतिशत में आता है, यह कहा नहीं जा सकता। यद्यपि यह भी सच है कि केवल सम्पत्ति की घोषणा भर कर देने से ना तो भ्रष्टाचार पर ही लगाम लगेगी और ना ही उनकी सही सम्पत्ति ही सामने आ पायेगी, किंतु अगर गलत सूचना देंगे तो भ्रष्ट जज एक गलती और करेंगे जो उन्हें कानून की गिरफ्त में लाने में मदद देगी। वैसे तो अधिकारियों और नेताओं की सम्पत्ति की घोषणा होने के बाद भी इनका भ्रष्टाचार कम नहीं हआ, अपितु दिन दूना रात चौगुना बढ ही रहा है। हाँ इतना अवशय ही हुआ है कि इससे नेताओं में एक भय व्याप्त हुआ और उन्होंने जरूरी सावधानियाँ लेना प्रारंभ कर दिया।
दूसरी ओर जब लोकतंत्र के तीन स्तंभों द्वारा अर्जित सम्पत्ति को सार्वजनिक घोषणाओं के दायरे में लाया जा रहा है तो चौथे स्तंभ को ही क्यों मुक्त रखा जाये। पिछले दिनों प्रैस के बारे में जो सूचनाएं आयी हैं और जनसत्ता सहित अनेक वेव पत्रिकाओं ने इस विषय में जो कुछ भी छापा है उससे पता चलता है कि इस बहती गंगा में प्रैस के एक हिस्से के हाथ भी सूखे नहीं हैं। कोई समय था जब प्रैस में छपी खबर का कोई सम्मान था पर इसके व्यवसायीकरण के बाद इस संस्था का जो पतन हुआ है इससे इसे दलाल का दर्जा मिलता गया है। एक सेमिनार में तो मीडियाकर्मियों को 'मीडिया के मीडियेटर' कह कर याद किया गया था। मीडिया के जो संस्थान बकायदा कम्पनी अधिनियमों के अर्न्तगत रजिस्टर्ड हैं और आइ पी ओ लाकर बाजार से पूंजी एकत्रित करते हैं वे केवल एक उद्योग भर हैैंं! उनके पास समाज हितैषी कोई आर्दश होने का कोई सवाल ही नहीं है अपितु वे तो उसे लगायी गयी पूंजी की वापिसी और असीमित धन कमाने के साधन के रूप में ही देखेंगे! दरअसल वे प्रकाशन का उद्योग चला रहे हेैं और उत्पाद का व्यापार कर रहे हैं। इसके लिए वे अखबार को किसी भी स्तर पर गिर कर बेचेंगे तथा जनता के बीच अपनी पहुँच सकने की क्षमता की पूरी कीमत वसूलना चाहेंगे। यह कुछ ऐसा है जैसे किसी ने दवाइयों की दुकान में जूतों की दुकान खोल ली हो पर बोर्ड वही पुराना ही लगा रखा हो। जब मालिक चुनावों में पैकेज बेचेंगे तो पत्रकार भी अपने हाथ कैसे साफ रख सकते हैं क्योंकि मालिक तो शब्द जोड़ने और भाषा चित्र बनाने का काम करता नहीं है उसे तो वह काम पत्रकारों से ही कराना पड़ता है। भोपाल में जब एक पत्रकार ने अखबार मालिक से कम तनख्वाह के बारे में शिकायत की तो उसका कहना था कि तुम्हें इतना बड़ा बैनर तो दे दिया है, क्या अब भी तुम्हें ज्यादा वेतन की जरूरत है? बुन्देली में एक कहावत है- सौ के नब्बे कर दो, नाव दरोगा धर दो- अर्थात भले ही वेतन सौ की जगह नब्बे रूप्ये महीने कर दो पर पदनाम दरोगा का मिल जाये तो फिर पैसे तो बनाये ही जा सकते हैं। अच्छे बैनर के लिए लोग इसी कारण से लालायित रहने लगे हैं। अकेले भोपाल में ही ऐसे पचास से अधिक पत्रकार हैं जो आज से पच्चीस-तीस साल पहले साइकिल से चलते थे पर आज वे न केवल करोड़पति हैं अपितु उनके बंगलों में एकाधिक गाड़ियाँ हैं। अपने कर्तव्य के प्रति न्याय न करने के बदले में ही उन्होंने किसी न किसी संस्थान के पद हथिया लिये हैं व प्रमुख स्थलों पर स्थित लाखों रूप्यों की कीमत के सरकारी बंगले उनके अधिकार में हैं जिसका किराया भी वे ठीक से नहीं चुकाते पर कोई भी अधिकारी उनके खिलाफ चूँ भी नहीं करता।
प्रैस मालिकों ने सरकार से प्रैस के नाम पर प्रमुख बाजार में प्लाट ले लिये हैं व अपने प्रभाव का स्तेमाल कर बैंकों से भरपूर ऋण ले उन पर बड़े बड़े भवन बना लिए हैं जिन्हें वे प्रैस से भिन्न कामों के कार्यालयों को किराये पर उठाये हुये हैं। प्रैस का दबाव बना कर वे भवन निर्माण आदि ऐसे अनेक तरह के व्यवसायों में लिप्त हैं जहाँ सरकारी हस्तक्षेप अधिक रहता है तथा अपने प्रभाव का स्तेमाल कर कानून का पालन कराने वाले अधिकारियों को धमका कर स्थिति अपने पक्ष में करते रहते हैं। इससे भी वे अटूट काला धन पैदा कर रहे हैैं।
कभी कमलेश्वर ने लिखा था कि प्रैस की स्वतंत्रता का मतलब प्रैस मालिकों की स्वतंत्रता नहीं होता अपितु पत्रकार की स्वतंत्रता होती है। प्रैस मालिकों ने प्रैस की सुविधाओं को अपनी व्यापारिक सुरक्षा में बदल लिया है व उनके पास समुचित मात्रा में दो नम्बर के पैसे एकत्रित होते जा रहे हैं इसलिए उनके लिए भी जजों की तरह सम्पत्ति की घोषणा को अनिवार्य किया जाना जरूरी हो गया है।

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