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रविवार, नवंबर 22, 2015

बिहार में पराजय, मोदी के मुखौटे का रंग उतरना है

बिहार में पराजय, मोदी के मुखौटे का रंग उतरना है
वीरेन्द्र जैन
बिहार विधानसभा के चुनाव अभियान के दौरान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने यह कह कर बिहार की जनता को डराया था कि अगर भूल से भी भाजपा बिहार में हार गयी तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे। उनका यह चुनावी जुमला बताता है कि बिहार में जीत का उनके लिए क्या महत्व था, जिसे प्राप्त करने के लिए वे जनता की देशभक्ति की भावना को भड़काने के लिए भय का एक नकली वातावरण बनाने के लिए तैयार थे। यह तब था जब मोदी-शाह युग्म ने मोदी के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण समारोह में पहली बार पाकिस्तान समेत सभी पड़ोसी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया था। वे अभी भी अंतर्र्राष्ट्रीय समारोहों में अपनी समस्याओं को बातचीत के आधार पर सुलझाने के नेहरूयुग के जुमले दुहराते रहते हैं। यह बात अलग है कि नेहरू की इस नीति की सबसे अधिक आलोचना जनसंघ ही करती रही थी। भाजपा का यही दुहरापन उनकी हर बात में रहता है। उन्होंने भाजपा को देश और राष्ट्रभक्ति का पर्याय प्रचारित करना चाहा है, जबकि उनके कर्मों के परिणाम सर्वाधिक देश विरोधी हैं ।
राजनीतिक पंडित कहते हैं और सही ही कहते हैं कि देश पर शासन करने के लिए उत्तर प्रदेश और बिहार को जीतना जरूरी होता है। पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी की सफलता के पीछे इन प्रदेशों में काँग्रेस विरोधी लहर होने व चुनाव को काँग्रेस बनाम भाजपा में बदल देने की नीति काम आ गयी थी। पर काठ की हांडी बार बार नहीं चढती है। वे अभी तक किसी आरोपी काँग्रेसी नेता के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर सके हैं।
बिहार चुनाव में उनकी पराजय का कथानक तो बहुत पहले ही प्रारम्भ हो गया था। बिहार में कुछ मुस्लिम बाहुबलियों के अपराधी माफिया गिरोहों और उसी तरह के हिन्दू बाहुबलियों और माफिया गिरोहों के बीच टकराव तो चलता रहा है किंतु यह टकराव साम्प्रदायिक आधार पर नहीं रहा। इसका एक कारण हिन्दुओं में जातिवादी टकराव का तेज होना भी है। भयंकर आर्थिक असमानता वाले समाज में गरीब वर्ग दोनों ही तरह के अपराधी गिरोहों से प्रभावित व प्रताड़ित रहा है। बिहार में भाजपा की उपस्थिति गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश से भिन्न रही है क्योंकि यहाँ उसका प्रसार गैर काँग्रेसवाद वाले समाजवादी धड़े के गले लग कर उसे हड़पते जाने से हुआ है। भारतीय इतिहास में अंग्रेजों की चला चली के समय को छोड़ कर कहीं धार्मिक आधार पर समाज में तनाव की कथाएं नहीं मिलतीं। जबकि पहले धार्मिक़ आधार पर हिन्दुओं और बौद्धों के बीच बहुत हिंसक संघर्ष हुये जिनमें लाखों लोग मर गये। देश में राजनीतिक लाभ उठाने के लिए साम्प्रदायिकता पैदा की जाती है क्योंकि वह स्वभाव में विद्यमान नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में दूसरे प्रत्याशियों से अधिक मत प्राप्त कर लेने वाले को शासन का अधिकार मिल जाता है इसलिए साम्प्रदायिकता का चुनावी लाभ हमेशा बहुसंख्यक वर्ग को मिलता है। यही कारण है कि बहुसंख्यक वर्ग इसे पैदा करने के लिए झूठ फैलाते हैं, गलत इतिहास गढवाते हैं, व नफरत के संस्थान चलाते हैं।
बिहार में भाजपा को संविद सरकारों के दौरान प्रवेश का मौका मिला और उसने अपनी कूटनीति व खेलकूद के नाम पर बनाये गये संगठन के सहारे दूसरे दलों को हड़पने का दुष्चक्र चला कर अपना विस्तार तो किया किंतु वे कभी भी स्वतंत्र रूप से अपनी सरकार नहीं बना सके। पिछली लोकसभा के चुनाव परिणाम देख कर उन्हें लगने लगा था कि शायद पहली बार यह सम्भव हो जाये।
मोदी पार्टी की पराजय में एक कारण तो यह था कि उक्त चुनाव न तो काँग्रेस के खिलाफ था न ही लालू प्रसाद के खिलाफ था अपितु यह नितीश कुमार के समक्ष लड़ा गया था, जिनके ऊपर कोई गम्भीर आरोप नहीं थे और छवि खराब करने वाला अस्त्र नहीं चल पाया। दूसरे भाजपा स्वयं भी उन्हीं के साथ लम्बे समय तक सहयोगी रही थी। नितीश की छवि स्वच्छ, व कर्मठ प्रशासक की रही जिन्होंने लोकसभा में पार्टी की पराजय की जिम्मेवारी लेते हुए स्वैच्छिक त्यागपत्र दे दिया था और एक महादलित को मुख्यमंत्री बना कर सत्ता मोह के ऊपर सिद्धांतवादिता की मिसाल पेश की। इसके विपरीत किसी भी कीमत पर पद से जुड़ने के लिए लालायित भाजपा ने बागी मांझी को समर्थन देने का फैसला किया जो उल्टा पड़ा। दूसरी ओर वे जिस आधार पर मांझी का समर्थन कर रहे थे उसी आधार के विरुद्ध उनका मूल सवर्ण वोट बैंक है। इसी के समानांतर भाजपा जैसी सवर्ण समर्थन वाली पार्टी के साथ गलबहियां करके माँझी ने अपने दलित नेता होने का नैतिक अधिकार ही खो दिया था, व आंकड़ागत नासमझी का ही परिचय दिया था। टीवी चैनलों पर उनके साक्षात्कार उनसे सहानिभूति को घटा ही रहे थे। भाजपा ने न तो उन्हें उचित सीटें ही दी थीं और न ही मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा ही की थी। यही कारण रहा को उनको दी गयी सीटों पर पराजय देखने को मिली। अब उनका कोई राजनीतिक भविष्य शेष नहीं रह गया है।
माँझी, पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा, अपने पदों के कारण अपने उम्मीदवारों के लिए तो कुछ हद तक जातिवादी वोट ले सके किंतु उन वोटों को अपने गठबन्धन की दूसरी पार्टियों को ट्रांसफर कराने में समर्थ नहीं हो सके। जिस आधार पर जातिवादी दलों का गठन होता है उसके कारण वे उन मतों को सवर्ण समर्थन वाले दलों तक ट्रांसफर कराने में वैसे भी सफल नहीं हो सकते हैं, जब तक कि किसी जातिभाई को मुख्यमंत्री पद प्रत्याशी न घोषित कर के चुनाव न लड़ा जा रहा हो। मायावती इसीलिए बिना किसी समझौते के चुनाव लड़ती हैं। इतने अधिक दलित व पिछड़े दलों के साथ चुनावी समझौते के लिए मजबूर होकर भाजपा का सवर्ण अपराधबोध खुद भी प्रकट हो रहा था। दूसरी ओर सवर्ण समर्थन कभी भी किसी दलित या पिछड़े को मुख्यमंत्री बनते नहीं देख सकता। यही विसंगति रही कि भजपा को इकतरफा समर्थन ही मिला। चुनावों के दौरान ही भाजपा को नरेन्द्र मोदी की जाति का उल्लेख करना पड़ा। किसी राष्ट्रीय पार्टी द्वारा अपने प्रधानमंत्री की जाति का खुले आम किये गये उल्लेख का यह दुर्लभ उदाहरण है, और पद की गरिमा के प्रतिकूल है।
ओवैसी द्वारा पहले सभी चुनाव क्षेत्रों में प्रत्याशी लड़ाने की घोषिणा की गयी थी जिससे यह संकेत गया था कि वे भाजपा के पक्ष में सौदेबाजी कर के यह सब कर रहे हैं। उनके इस फैसले का भाजपा के क्षेत्रों में जिस तरह से स्वागत हुआ उससे मुस्लिम वोट शंकित हो गया । अचानक ओवैसी ने प्लान बदलते हुए कुल छह स्थानों से उम्मीदवार उतारे जिससे मुस्लिम मत एकजुट हो कर महागठबन्धन के पक्ष में गये।
मोदी की ताबड़तोड़ सभायें व स्थानीय नेताओं को विश्वास में लिये बिना बाहरी लोगों के सहारे पूरा चुनाव अभियान चलाने से उनके डिगे हुये हौसले के संकेत गये। कीर्त आज़ाद, शत्रुघ्न सिन्हा, आर के सिंह, राम जेठमलानी, गोबिन्दाचार्य, अरुण शौरी, के बयानों से संकेत गया कि लोकसभा में संख्या बल के अलावा भाजपा में सब कुछ सामान्य नहीं है। भगवाभेषधारी हिन्दुत्ववादी नेताओं के कुटिल और उत्तेजक बयानों से कभी तो लगा कि यह योजनाबद्ध है, और कभी लगा कि ये सब नियंत्रण से बाहर हैं व आगे भी यही सब चलने वाला है।
दादरी की हिंसा और उसमें भाजपा के लोगों की सम्बद्धता के आरोपों के बाद उनके किये गये बचावों के साथ साथ चुनाव में गाय का स्तेमाल इस आरोप की पुष्टि कर गया कि ये चुनाव जीतने के लिए किसी भी स्तर तक गिरने को तैयार हो सकते हैं। श्री आर के सिंह ने तो खुले आम कहा कि इन्होंने दो करोड़ रुपये लेकर कई अपराधियों को टिकिट बेचा। इसके विपरीत जिसे जंगलराज बताया जा रहा था उसमें कई चरण के चुनावों के दौरान न कोई बूथ कैप्चरिंग हुयी न कोई हिंसा व दबाव डालने की घटना सामने आयी। इसके उलट कुछ उन लोगों को वोट डालने का अवसर मिला जिनको पिछले साठ सालों में वोट नहीं डालने दिया गया था। राम जेठमलानी जैसे वरिष्ठतम वकील ने कहा कि मोदी ने देश को धोखा दिया है और मैं बिहार में उनके विरुद्ध काम करूंगा। शत्रुघ्न सिन्हा ने तो भाजपा में रहते हुए भी विरोधियों जैसी भूमिका निभायी और प्रचार का अवसर न देने का आरोप भी लगाते रहे। चुनाव के बाद वरिष्ठ सांसद भोला सिंह ने तो स्थानीय नेतृत्व को प्रचार अभियान से दूर रखने को गम्भीरता से लेते हुए पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव बताया। आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी के कारण मँहगाई, कालेधन के बारे में किये गये वादे को पूरा न करना और चुनावी जुमला बताना प्रमाण बन गया कि इनके चुनावी वादों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। जल्दबाजी में भूमि अधिग्रहण विधेयक लाना और उसे पास न करा पाना, राज्यसभा में अवरोध का हल न निकाल पाना, आदि से मोदी की पिछली गढी हुयी छवि खंडित हो चुकी है, और काँग्रेस से उपजी निराशा में जो काम आ गयी थी उसका मुलम्मा उतर चुका है। सारी नकारात्मकता मोदी-शाह के खिलाफ ही गयी।
भाजपा के पास कुल आठ-नौ प्रतिशत स्थायी मत हैं और इनमें वृद्धि के लिए हर चुनाव में नये नये झूठ गढने पड़ते हैं, नये हथकण्डे अपनाने पड़ते हैं। उनका लक्ष्य मुख्य रूप से कम राजनीतिक चेतना वाला वर्ग रहता है जिसे वे किराये के मीडिया के सहारे झूठ फैला कर साधते हैं। किंतु सूचना माध्यमों की विविधता के कारण सच की किरणें कहीं न कहीं से फूट ही पड़ती हैं। जब ये पार्टी के अन्दर से निकलती हैं तो अधिक रोशनी करती हैं।
बिहार की पराजय केवल एक विधानसभा चुनाव की पराजय नहीं है अपितु उनकी गाड़ी के उस इंजन का ही खराब हो जाना है, जो उन्हें इतनी दूर लाकर बीच रास्ते में अटक गया है और ड्राइवर ने शेष सारे साधनों को नष्ट करवा दिया था।
वीरेन्द्र जैन                                                                          
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गुरुवार, अक्टूबर 01, 2015

यह एक ‘अखलाक’ की नहीं अखलाक की हत्या है

यह एक ‘अखलाक’ की नहीं अखलाक की हत्या है
वीरेन्द्र जैन

            आम आदमी तो कभी भी कहीं भी मर सकता है, वह सड़क पर दुर्घटना में मर सकता है, भूकम्प में मर सकता है, वह मस्ज़िद में क्रेन गिरने से मर सकता है, मन्दिर में जल्दी दर्शन की भगदड़ में मर सकता है, केदारनाथ के तूफान में मर सकता है, किसी रथयात्रा या कुम्भ के शाही स्नान में कुचला जा सकता है। वह कांवड़ियों के रूप में ट्रक के नीचे आ सकता है, असली नकली आतंकियों के विस्फोटों का शिकार हो सकता है, वह ट्रेन दुर्घटना में मर सकता है या किसी फैक्ट्री में लगी आग या निर्माणाधीन इमारत के गिर जाने से मर सकता है| अगर आप आम आदमी हैं, तो आपकी मौत देश और समाज की अपूरणीय क्षति नहीं होती। वह चर्चा और सूचना माध्यमों की खबर भी नहीं बनती। उस आदमी की मौत तब ही चर्चा का विषय बनती है जब वह असमय और अस्वाभाविक हो। ऐसा इसलिए होता है कि मृत्यु को थोड़ी दूर मानने वाले समाज के दूसरे लोगों की कल्पना में उनकी अपनी मौत नाचने लगती है।
      नोएडा जिले के बसोहड़ा गाँव में अखलाख की हत्या देश की अपूर्णीय क्षति के रूप में नहीं देखी जायेगी, क्योंकि वह एक मामूली लोहार था। पर उसकी हत्या जिस समय, जिस तरह से,  जिन कारणों से, की गयी वह देश देश को ऐसी क्षति पहुँचा सकती है जिसकी पूर्ति होने पर भी निशान सदा बना रहता है। 
      पुराने लोग कहते थे कि झगड़े के मुख्य रूप से तीन कारण होते हैं, ज़र [धन], ज़ोरू और ज़मीन। ग्राम बसोहड़ा में घटी उपरोक्त तरह की घटनाओं में प्राथमिक रूप से तीनों कारण ही नज़र नहीं आते। यही कारण है कि ये अधिक चिंता का विषय हो जाता है। दुश्मन या बीमारी का पता हो तो उसे रोकने का प्रयास किया जा सकता है, सावधानी रखी जा सकती है, किंतु जब बीमारी और दुश्मन अमूर्त हो तो खतरा कभी भी हो सकता है। खेद का विषय है कि हम खतरों के प्रति लगातार लापरवाह बने हुए हैं। असमय मौतों की कथाएं मुआवजे के साथ ही समाप्त मान ली जाती हैं। न तो उनके कारणों की गहराई में जाया जाता है, और न ही ऐसे उपाय तलाशे जाते हैं ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। 
      अखलाक की हत्या की सच्ची या झूठी जिम्मेवारी किसी ने नहीं ली। पुलिस द्वारा गिरफ्तार प्रत्येक व्यक्ति हमेशा की तरह खुद को निर्दोष व घटनास्थल से अनुपस्थित बतला रहा है जो इस बात का संकेत है कि या तो यह हत्या किसी विचार से जुड़ी नहीं है या हत्यारे खुद भी उस विचार को सामने रखने का साहस नहीं रखते और किसी टुच्चे अपराधी की तरह अपना सीमित स्वार्थ हल करना चाहते थे। अपराधियों से मृतक का न तो कोई सम्पत्ति का विवाद था, न लेन देन का। उन्होंने न तो चोरी की और न ही बलात्कार के इरादे से आये थे। जब ये कुछ नहीं था तो इस घटना के पीछे जिन कारणों के संकेत मिलते हैं वो वही सबसे बड़ा खतरा हैं। सूचना माध्यमों के विस्तार, उनके डिजिटिलीकरण ने सन्देशों को क्षणों में विश्वव्यापी कर देने की क्षमता प्राप्त कर ली है। सूचना की इस शक्ति को अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग निशि-दिन हाथ में लिए घूमते हैं। यही कारण है कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से लाभान्वित होने वाले लोग चुनावों के दौरान एक दूर की जगह साम्प्रदायिकता फैला कर दूसरी जगह लाभ उठाने का प्रयास करने लगे हैं। 
      खतरा यह है कि वे अपराधी देश की राजनीति की मुख्यधारा में आ गये हैं जो जर जोरू जमीन के लिए सत्त्ता पर अधिकार करना चाहते हैं, व किये हुए अधिकार को बढाना और बनाये रखना चाहते हैं। किंतु यही लोग देश के मिजाज को समझते हुए अपने मूल स्वरूप में सामने नहीं आना चाहते इसलिए मुखौटा ओढ कर अपने दोहरे चरित्र से वे अपने ही लोगों को धोखा दे रहे हैं और उन्हें साम्प्रदायिकता की आग में झौंक कर उस रास्ते पर धकेलने के लिए षड़यंत्र रचते रहते हैं जिस रास्ते पर देश के लोग चलना नहीं चाहते।
 जिस मुहल्ले में अखलाक रह्ता था वह हिन्दू बहुल मुहल्ला है और उस मुहल्ले में सबके बीच में बसे मुसलमानों के केवल दो घर थे। उनके वर्षों से वहाँ रहने पर न तो किसी को कोई परेशानी थी और न ही जमीन का कोई विवाद था। ईदुज्जहा के दिन मुसलमानों के यहाँ कुर्बानी की जो परम्परा है उसमें किसी भी पशु की कुर्बानी दी जा सकती है, इसलिए यह समझ में आने वाली बात नहीं है कि घने बसे हिन्दू बहुल मुहल्ले में रहने वाले मृतक के परिवार ने अपने घर में गाय की कुर्बानी दी होगी। यदि ऐसा होता तो कई दिन पहले से घर में गाय आ गयी होती या बाद में उसकी खाल, सींग, आदि बरामद हुआ होता। यदि यह काम घर से बाहर किया गया होता तो भी एक बड़े पशु का मांस उस छोटे से परिवार के उपयोग से बहुत अधिक होता, इसलिए इस तरह के काम में अन्य परिवार भी सम्मलित होने चाहिए थे। अगर ऐसा था तो हमला अखलाक पर ही क्यों हुआ। बसोहड़ा एक छोटे सा कस्बेनुमा गाँव है इस में भी इस कहानी को फैलाने के लिए व्हाट’स एप्प या लाउडस्पीकर जैसे पहचान छुपाने वाले माध्यमों का स्तेमाल यह बताता है कि अपराधी दूसरों को उत्तेजित कर अपनी पहचान छुपाये भी रखना चाहते थे।
      बिहार में चुनाव चल रहे हैं व उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले हैं। गत लोकसभा चुनाव में इसी तरह मुज़फ्फरनगर में फैलायी गयी हिंसा का लाभ लेकर उत्तर प्रदेश में चुनावी राजनीति की स्थिति बदली जा चुकी है। बिहार चुनाव में बहुत सारे राजनेताओं का भविष्य दाँव पर लगा है। यही कारण है कि पड़ोसी राज्य झारखण्ड में मस्ज़िद के आगे कटा हुआ सुअर फेंका जा चुका है क्योंकि वहाँ पक्ष का शासन है। दिल्ली के चारों ओर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का जो विस्तार हुआ है तथा स्मार्ट सिटी के जो तरह तरह के शगूफे हवा में हैं उससे नगरों के चारों ओर ज़मीनों की लूट शुरू हो गयी है। बहुत सम्भव है कि किसी दूरगामी योजना के अंतर्गत अखलाक को उस मुहल्ले से उजाड़ कर उस गाँव के सारे मुसलमानों को एक तरफ करने के लिए यह योजना बनायी गयी हो। गौ हत्या के झूठे आरोप या लव ज़ेहाद व बहू-बेटी बचाओ जैसे नारे सामान्य लोगों को भी जल्दी से उत्तेजित करने के लिए काफी होते हैं। स्मरणीय है कि अप्रैल 2013 में भाजपा की राष्ट्रीय नेता उमा भारती ने मुज़फ्फरनगर में एक समारोह के दौरान कहा था कि अगर पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार बन गयी तो कागज पर बनी गाय के काटने पर भी प्रतिबन्ध लगा देंगे। गम्भीर बात यह भी है कि मंडल के समय में उभरे दलों को मुलायम ने अकेला छोड़ दिया है और मोहन भागवत के आरक्षण विरोधी बयान पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। अमर सिंह मुलायम और भाजपा दोनों के नेताओं से मिलते रहते हैं व आज़म खान भी चुप्पी साधे हुए हैं। ऐसे समय में ओवैसी की अति सक्रियता क्या गुल खिलायेगी? काँग्रेस सिपाहियों के बिना जरनलों की फौज़ है और मायवती के समर्थक दलितों के केवल वोटर बना कर छोड़ दिया गया है। वामपंथी अपने कोने जरूर सम्हाले हैं, पर मध्य में वे बयानों से अधिक कुछ नहीं कर पा रहे।  
काश इस कठिन समय में भाजपा में सम्मलित हो गये पूर्व सैनिकों और पुलिस अधिकारियों में से कुछ लोग आर के सिंह की तरह सामने आकर शत्रुघ्न सिन्हा की तरह मुखर हो सकें। देश तभी बचेगा।
वीरेन्द्र जैन                                                                          
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गुरुवार, सितंबर 17, 2015

जीतनराम माँझी के नाम खुला खत

जीतनराम माँझी के नाम खुला खत
वीरेन्द्र जैन

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प्रिय जीतनराम जी
पूर्व मुख्यमंत्री बिहार
पटना
आशा है कि इस समय तक आप एनडीए से आपके दल को मिली सीटों पर चुनाव में जुट गये होगे।
मुझे आपका वह भविष्य दिख रहा है जो सम्भवतः आपको नहीं दिख रहा, इसलिए मुझे आप से सहानिभूति है। जो लोग इतिहास नहीं पढ पाते वे दूसरों की भूलों से सबक नहीं सीखते अपितु स्वयं अनुभव करके ही सीखते हैं। लगता है आप उसी प्रक्रिया में हैं। यही कारण है कि यह पत्र आपके किसी काम का नहीं पर इसके बहाने अगर दूसरे साक्षर लोग कुछ विचार कर सकें तो अच्छा होगा।
       आँख द्वारा देखने के कुछ नियम होते हैं। आँखों के बहुत निकट किसी वस्तु के आ जाने पर भी वस्तु दिखायी नहीं देती, और बहुत दूर चले जाने पर भी यही हाल होता है। यही कारण है कि चुनावी राजनीति करने वाले, और चुनाव लड़ कर जमानत जब्त कराने वाले, सभी उम्मीदवार, डमी या ‘वोट कटउआ’ नहीं होते। उनमें से कुछ तो सचमुच इस भ्रम में रहते हैं कि वे जीत जाएंगे जबकि उनके अलावा शेष सब जानते हैं कि उनकी जमानत जब्त होने वाली है, और वह होती भी है। प्रत्येक चुनाव में ऐसे कई हजार उम्मीदवार उतरते हैं और अपनी कमाई झौंकते हैं।
उम्मीद है कि आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में अगर भाजपा ने चाहा तो आप और आपके कथित दल के दो-चार लोग चुनाव जीत सकते हैं। [ मैं आपके दल का नाम जानता हूं किंतु कथित दल इसलिए कह रहा हूं कि उस नाम का कोई मतलब नहीं व यह भी जानता हूं कि वह क्या है और क्यों बना] यह तय है कि अगर भाजपा चुनाव जीतने की स्थिति में होगी तो वह आपको चुनाव हरा कर आपकी राजनीति को हमेशा के लिए समाप्त करना चाहेगी जिससे आपकी जाति का वोट और विधायक उनमें समाहित हो सकें। इसकी शुरुआत तो उन्होंने इस योजना से ही कर दी है कि आपकी पार्टी के पाँच उम्मीदवार उनके टिकिट पर चुनाव लड़ें, जिसे आपने झुक कर स्वीकार कर लिया है। इस स्वीकार से उन्हें आपकी रीढ की लोच का पता लग गया है। किसी शायर ने कहा है कि ‘नाज है उनको बहुत सब्र मुहब्बत में किया, पूछिए सब्र न करते तो और क्या करते’। आपके पास उनकी हर बात मानने के अलावा दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है।
सच तो यह है कि आपकी आज की हैसियत नितीश कुमार की एक गलत चाल का परिणाम है। जब मोदी का विरोध करके नितीश ने भाजपा को गठबन्धन से बाहर किया तो उन्हें उम्मीद थी कि मुस्लिम वोटों के समर्थन से वे बिहार में लोकसभा चुनाव जीत जाएंगे, किंतु पाँसा उल्टा पड़ा। भाजपा के चुनावी प्रबन्धकों द्वारा बहाये गये धन, गठबन्धन और दलबदलुओं की दम पर भाजपा ने चुनाव जीत लिया। हार के बाद अपनी छवि के लिए नितीश ने आपको अस्थायी मुख्यमंत्री पद सौंप कर समझा था कि आप उनकी खड़ाऊँ से शासन करेंगे, और उपकृत होंगे। कुछ महीनों तक आपने यह किया भी किंतु आपको यह कुर्सी और मुख्यमंत्री निवास के आम व लीची ऐसी भा गयी कि आप भाजपा की चाल में फँस गये और यह समझ बैठे कि अब तक आपको पानी पी पी कर कोसने वाली पार्टी आपको मुख्यमंत्री बनाये रखना चाहती है। काश आपने भाजपा के इतिहास को ठीक से जाना होता कि प्रत्येक संविद या संयुक्त मोर्चा सरकार में आगे बढ कर सम्मिलित होने वाली इस पार्टी के जन्मदाताओं का अपना एजेंडा है व उसने हमेशा ही अपने सहयोगियों को सीड़ी बनाया है और उनको कुतर कुतर कर हजम किया है। देश की पहली गैर काँग्रेस सरकार उनकी इसी हरकत के कारण टूटी थी। उनका आज जो अस्तित्व है वह उनकी इसी कूटनीति के कारण है। देश में दलबदल का खेल उन्होंने ही शुरू किया और बढाया है। देश में जो भी दलितों के उत्थान के विरोधी हैं, वे सभी इस पार्टी के समर्थक हैं, इससे इसका चरित्र प्रकट होता है।
क्या भाजपा द्वारा मुख्यमंत्री के रूप में आपको समर्थन देना विचित्र नहीं लगा था! हो सकता है आपको नहीं लगा हो किंतु पूरे देश के लोगों को आपकी समझ के स्तर और भाजपा के कुतर्क समझ में आ रहे थे। आपके खिलाफ आये अविश्वास प्रस्ताव के समय जो महादलित का तर्क दे रहे थे उन्हें चुनाव के समय महादलित का तर्क याद नहीं आया और आपको मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित करने की बात नहीं की। दूसरी ओर एनडीए के अन्य सारे घटकों को आपसे अधिक सीटें देकर उन्होंने बता दिया कि वे आपका कद कितना आँकते हैं। उन्हीं की पार्टी के वरिष्ठ सांसद शत्रुघ्न सिन्हा आपके प्रतिद्वन्दी रामविलास पासवान को सर्वोत्तम मुख्यमंत्री उम्मीदवार मान रहे हैं।
जीतनराम जी जातिवादी बिहार में आप विधान सभा की दो चार सीटें जीत कर मंत्री पद पा लेने वाले व्यक्ति तो हो सकते थे किंतु कभी भी मुख्यमंत्री मटेरियल न थे, और न हो सकते हैं। दुखद यह है आपको जिस संगठन ने किसी रणनीति की तरह मौका दिया था आपने उसी को धोखा दिया। इससे आपकी जाति के मतदाताओं को कुछ समय के लिए आप पर गर्व जरूर हुआ होगा किंतु दूसरे मतदाताओं के बीच आपकी छवि अच्छी नहीं बनी है। आपकी निर्भरता आपको बनाने वालों पर रही इसलिए भी आप ऐसा कुछ नहीं कर सके जिससे आपके व्यक्तित्व का कोई गुण उभर कर सामने आ पाता। अब आप और आपकी जाति के लोगों का समर्थन भाजपा के लिए है, पर भाजपा आपके व्यक्तित्व में कुछ भी जोड़ने नहीं जा रही है। भविष्य में आप कहीं दया और कहीं हँसी के पात्र समझे जाने वाले हैं।
पुरानी कहावत है – आधी छोड़ सारी खों धावै,  आधी मिलै, न सारी पावै । सनद रहे तथा वक्त जरूरत काम आवै।
वीरेन्द्र जैन                                                                          
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गुरुवार, फ़रवरी 25, 2010

भाजपा शिव सेना मतभेद ; बिहार चुनाव तक की नौटंकी

भाजपा शिव सेना मतभेद
आगामी बिहार चुनाव तक की नौटंकी
वीरेन्द्र जैन
भाजपा और शिवसेना का गठबन्धन बहुत पुराना व परस्पर एक दूसरे पर अश्रित है, पर इसके बाबज़ूद भी अपनी सत्ता लोलुपता में घिर कर भाजपा हमेशा ही शिव सेना के नखरे सहती रही है। दूसरी ओर शिव सेना ने भाजपा की इस कमजोरी का हमेशा ही लाभ उठाया है। बाल ठाकरे तत्कालीन महाराष्ट्र शासन द्वारा कम्युनिष्ट नेताओं से मुकाबला करने हेतु प्रोत्साहित किये गये बाहुबलियों के नेता की तरह उभरे थे और बम्बई की कपड़ा मिल की हड़ताल को तोड़ने के लिये कामरेड कृष्णा देसाई की हत्या के लिये शिव सेना ही ज़िम्मेवार रही। यह हमेशा ही होता रहा है कि किसी बाहुबली को अपनी शक्ति का भान हो जाने के बाद वह अपने आश्रयदाता को ही शिकार बनाने लगता है क्योंकि उसे लगता है कि मैं इसके कारण नहीं हूं अपितु ये हमारे कारण हैं।
अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाने के लिये उसने बम्बई में रह रहे दूसरे प्रदेशों के लोगों को निशाना बनाया ताकि मराठी लोगों की स्थानीयता को उभार कर अपना समर्थन जुटाया जा सके। एक बन्दरगाह होने के कारण बम्बई औद्योगिक रूप से विकसित शहर था तथा हिन्दी फिल्म आदि उद्योगों के तीव्र विकास के साथ देश की आर्थिक राजधानी की तरह उभरा जिससे वहाँ पूरे देश के लोग आते गये और बसते गये। कुछ मुस्लिम स्मगलरों और माफिया से प्रतियोगिता के चक्कर में शिव सेना प्रमुख ने हिन्दुत्व का सहारा लिया जिसके परिणाम स्वरूप वे हिन्दुत्ववादी मराठी अस्मिता के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सैंकने लगे। दूसरी ओर हिन्दुत्व की राजनीति करने वाले संघ परिवार का मुख्यालय भी महाराष्ट्र में ही स्थित था और उसके सारे प्रमुख पदों पर मराठियोँ को ही प्राथिमिकता दी जाती थी। यही कारण रहा कि जनसंघ और शिव सेना लम्बे समय तक एक दूसरे की काट करते रहे।
1967 के आसपास जब गैर कांग्रेसवाद के नारे पर जनसंघ के नेताओं को संविद सरकारों में सम्मलित होकर सत्ता का स्वाद मिला तब से उसे गठबन्धन की राजनीति ऐसी भायी कि उसने सदैव हर तरह की संविद सरकारों में सम्मलित होने के लिये अपने आप को प्रस्तुत किया। जनता पार्टी की सरकार में सम्मलित होने के लिये तो उन्होंने अपनी जनसंघ पार्टी को ही विलीन कर दिया था। रोचक यह भी है कि लगभग सभी संविद सरकारें इन्हीं की सता की भूख के कारण ही टूटी भीं। विश्वनाथ प्रसाद सिंह की सरकार जब भाजपा और बाम पंथियों के संयुक्त समर्थन पर ही बन सकी तब बाम पंथियों ने यह कह कर कि वे स्वयं सरकार में सम्मलित नहीं होंगे और समर्थन भी तभी देंगे जब भाजपा को सरकार में शामिल न किया जाये, ये पहली बार ये किसी संविद सरकार से बाहर रहने को मजबूर हुये थे और बाद में तो इन्होंने विश्वनाथ प्रसाद सिंह की सरकार गिराने में कांग्रेस की मदद भी की थी।
लगभग इसी काल से भाजपा और शिव सेना का गठबन्धन प्रारम्भ हुआ और भाजपा ने बाल ठाकरे की शर्तों पर गठबन्धन बनाये रखा और कभी भी शिव सेना का आसरा नहीं छोड़ा। जब भाजपा ने यूपी में सत्ता के लिये बहुजन समाज पार्टी से छह छह महीने शासन करने का बेहद अनैतिक समझौता किया तब व्यंग्य में बाल ठाकरे ने कहा था कि यह छह छह महीने का शासन क्या होता है! अरे अगर कुछ पैदा ही करना था तो कम से कम नौ नौ महीने का समझौता करना चाहिये था। इस वक्रोति को वे चुपचाप पी गये। अटल बिहारी के प्रधानमंत्रित्व काल में इन्होंने पाकिस्तान को क्रिकेट न खेलने देने के खिलाफ पिच खोद दी थी और दूरदर्शन समाचार के अनुसार अटल बिहारी ने उनसे ऐसा न करने के लिये ‘विनय’ की। उनके ही कार्यकाल में ठाकरे ने अपने पिता के नाम पर डाक टिकिट ज़ारी करवा लिया जिसकी भरपूर आलोचना हुयी, पर भाजपा को कोई फर्क नहीं पड़ा। सीटों के तालमेल में भी उन्होंने सदैव ही भाजपा को तय फार्मूला से कम सीटें दीं अन्यथा समझौता तोड़ लेने की धमकी दी पर भाजपा ने उसे भी स्वीकार कर लिया। राष्ट्रपति के गत चुनावों में उन्होंने मराठी अस्मिता के नाम पर कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन किया और भाजपा हाथ मलती रह गयी। लोकसभा चुनावों के दौरान प्रारम्भिक दौर में उन्होंने भाजपा के प्रधान मंत्री पद प्रत्याशी लाल कृष्ण आडवाणी से मिलने से ही इंकार कर दिया था पर बाद में बड़े मान मनौवल के बाद मुलाकात हो सकी।
जब राज ठाकरे ने बाल ठाकरे से विद्रोह कर दिया और अपनी राजनीति जमाने के लिये उत्तर भारतीयों पर हमले कर के सुर्खियां बटोरीं तब बाल ठाकरे को भी अपनी राजनीति को बचाने के लिये वैसे ही बयान देने पड़े ताकि राज ठाकरे से बड़ी लकीर बनाये रख सकें, तब भाजपा किंकर्तव्यविमूढ होकर रह गयी थी और अपने मुँह में दही जमा लिया था। किंतु पिछले दिनों जब शिवसेना ने शाहरुख खान की फिल्म ‘माय नेम इज खान’ के प्रदर्शन पर हिंसक प्रदर्शन की घोषणा की तो भाजपा ने शिवसेना का विरोध और शाहरुख की फिल्म का समर्थन् करते हुये यह भी जोड़ा कि देश के किसी भी नागरिक को कहीं भी रहने का अधिकार है। यह बयान भाजपा के उस प्रवक्ता से दिलवाया गया जो बिहार के रहने वाले हैं।
दर असल उक्त बयान भाजपा की सोची समझी रणनीति के अंतर्गत उठाया गया कदम है। इन दिनों भाजपा बिहार की सरकार में शामिल है और जल्दी ही बिहार में चुनाव होने वाले हैं। भाजपा गठबन्धन के सहयोगी शिव सेना परिवार द्वारा मुम्बई में बिहारियों के खिलाफ जो हिंसा की गयी है वह बिहार के चुनावों में एक बड़ा मुद्दा बन सकता है, इसलिये चुनाव तक उन्होंने शिव सेना परिवार से दूरी दिखाने की राजनीति अपना ली है किंतु साथ ही यह कहना भी नहीं भूले कि हमारा गठबन्धन बना रहेगा। बाल ठाकरे द्वारा इस विषय पर कोई तीखी प्रतिक्रिया न करने से भी ये साफ है कि यह मिली जुली कुश्ती है और केवल बिहार की जनता को चुनाव तक बहलाने के लिये है।
वीरेन्द्र जैन
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