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रविवार, नवंबर 22, 2015

बिहार में पराजय, मोदी के मुखौटे का रंग उतरना है

बिहार में पराजय, मोदी के मुखौटे का रंग उतरना है
वीरेन्द्र जैन
बिहार विधानसभा के चुनाव अभियान के दौरान भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने यह कह कर बिहार की जनता को डराया था कि अगर भूल से भी भाजपा बिहार में हार गयी तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे। उनका यह चुनावी जुमला बताता है कि बिहार में जीत का उनके लिए क्या महत्व था, जिसे प्राप्त करने के लिए वे जनता की देशभक्ति की भावना को भड़काने के लिए भय का एक नकली वातावरण बनाने के लिए तैयार थे। यह तब था जब मोदी-शाह युग्म ने मोदी के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण समारोह में पहली बार पाकिस्तान समेत सभी पड़ोसी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया था। वे अभी भी अंतर्र्राष्ट्रीय समारोहों में अपनी समस्याओं को बातचीत के आधार पर सुलझाने के नेहरूयुग के जुमले दुहराते रहते हैं। यह बात अलग है कि नेहरू की इस नीति की सबसे अधिक आलोचना जनसंघ ही करती रही थी। भाजपा का यही दुहरापन उनकी हर बात में रहता है। उन्होंने भाजपा को देश और राष्ट्रभक्ति का पर्याय प्रचारित करना चाहा है, जबकि उनके कर्मों के परिणाम सर्वाधिक देश विरोधी हैं ।
राजनीतिक पंडित कहते हैं और सही ही कहते हैं कि देश पर शासन करने के लिए उत्तर प्रदेश और बिहार को जीतना जरूरी होता है। पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी की सफलता के पीछे इन प्रदेशों में काँग्रेस विरोधी लहर होने व चुनाव को काँग्रेस बनाम भाजपा में बदल देने की नीति काम आ गयी थी। पर काठ की हांडी बार बार नहीं चढती है। वे अभी तक किसी आरोपी काँग्रेसी नेता के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर सके हैं।
बिहार चुनाव में उनकी पराजय का कथानक तो बहुत पहले ही प्रारम्भ हो गया था। बिहार में कुछ मुस्लिम बाहुबलियों के अपराधी माफिया गिरोहों और उसी तरह के हिन्दू बाहुबलियों और माफिया गिरोहों के बीच टकराव तो चलता रहा है किंतु यह टकराव साम्प्रदायिक आधार पर नहीं रहा। इसका एक कारण हिन्दुओं में जातिवादी टकराव का तेज होना भी है। भयंकर आर्थिक असमानता वाले समाज में गरीब वर्ग दोनों ही तरह के अपराधी गिरोहों से प्रभावित व प्रताड़ित रहा है। बिहार में भाजपा की उपस्थिति गुजरात, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश से भिन्न रही है क्योंकि यहाँ उसका प्रसार गैर काँग्रेसवाद वाले समाजवादी धड़े के गले लग कर उसे हड़पते जाने से हुआ है। भारतीय इतिहास में अंग्रेजों की चला चली के समय को छोड़ कर कहीं धार्मिक आधार पर समाज में तनाव की कथाएं नहीं मिलतीं। जबकि पहले धार्मिक़ आधार पर हिन्दुओं और बौद्धों के बीच बहुत हिंसक संघर्ष हुये जिनमें लाखों लोग मर गये। देश में राजनीतिक लाभ उठाने के लिए साम्प्रदायिकता पैदा की जाती है क्योंकि वह स्वभाव में विद्यमान नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में दूसरे प्रत्याशियों से अधिक मत प्राप्त कर लेने वाले को शासन का अधिकार मिल जाता है इसलिए साम्प्रदायिकता का चुनावी लाभ हमेशा बहुसंख्यक वर्ग को मिलता है। यही कारण है कि बहुसंख्यक वर्ग इसे पैदा करने के लिए झूठ फैलाते हैं, गलत इतिहास गढवाते हैं, व नफरत के संस्थान चलाते हैं।
बिहार में भाजपा को संविद सरकारों के दौरान प्रवेश का मौका मिला और उसने अपनी कूटनीति व खेलकूद के नाम पर बनाये गये संगठन के सहारे दूसरे दलों को हड़पने का दुष्चक्र चला कर अपना विस्तार तो किया किंतु वे कभी भी स्वतंत्र रूप से अपनी सरकार नहीं बना सके। पिछली लोकसभा के चुनाव परिणाम देख कर उन्हें लगने लगा था कि शायद पहली बार यह सम्भव हो जाये।
मोदी पार्टी की पराजय में एक कारण तो यह था कि उक्त चुनाव न तो काँग्रेस के खिलाफ था न ही लालू प्रसाद के खिलाफ था अपितु यह नितीश कुमार के समक्ष लड़ा गया था, जिनके ऊपर कोई गम्भीर आरोप नहीं थे और छवि खराब करने वाला अस्त्र नहीं चल पाया। दूसरे भाजपा स्वयं भी उन्हीं के साथ लम्बे समय तक सहयोगी रही थी। नितीश की छवि स्वच्छ, व कर्मठ प्रशासक की रही जिन्होंने लोकसभा में पार्टी की पराजय की जिम्मेवारी लेते हुए स्वैच्छिक त्यागपत्र दे दिया था और एक महादलित को मुख्यमंत्री बना कर सत्ता मोह के ऊपर सिद्धांतवादिता की मिसाल पेश की। इसके विपरीत किसी भी कीमत पर पद से जुड़ने के लिए लालायित भाजपा ने बागी मांझी को समर्थन देने का फैसला किया जो उल्टा पड़ा। दूसरी ओर वे जिस आधार पर मांझी का समर्थन कर रहे थे उसी आधार के विरुद्ध उनका मूल सवर्ण वोट बैंक है। इसी के समानांतर भाजपा जैसी सवर्ण समर्थन वाली पार्टी के साथ गलबहियां करके माँझी ने अपने दलित नेता होने का नैतिक अधिकार ही खो दिया था, व आंकड़ागत नासमझी का ही परिचय दिया था। टीवी चैनलों पर उनके साक्षात्कार उनसे सहानिभूति को घटा ही रहे थे। भाजपा ने न तो उन्हें उचित सीटें ही दी थीं और न ही मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा ही की थी। यही कारण रहा को उनको दी गयी सीटों पर पराजय देखने को मिली। अब उनका कोई राजनीतिक भविष्य शेष नहीं रह गया है।
माँझी, पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा, अपने पदों के कारण अपने उम्मीदवारों के लिए तो कुछ हद तक जातिवादी वोट ले सके किंतु उन वोटों को अपने गठबन्धन की दूसरी पार्टियों को ट्रांसफर कराने में समर्थ नहीं हो सके। जिस आधार पर जातिवादी दलों का गठन होता है उसके कारण वे उन मतों को सवर्ण समर्थन वाले दलों तक ट्रांसफर कराने में वैसे भी सफल नहीं हो सकते हैं, जब तक कि किसी जातिभाई को मुख्यमंत्री पद प्रत्याशी न घोषित कर के चुनाव न लड़ा जा रहा हो। मायावती इसीलिए बिना किसी समझौते के चुनाव लड़ती हैं। इतने अधिक दलित व पिछड़े दलों के साथ चुनावी समझौते के लिए मजबूर होकर भाजपा का सवर्ण अपराधबोध खुद भी प्रकट हो रहा था। दूसरी ओर सवर्ण समर्थन कभी भी किसी दलित या पिछड़े को मुख्यमंत्री बनते नहीं देख सकता। यही विसंगति रही कि भजपा को इकतरफा समर्थन ही मिला। चुनावों के दौरान ही भाजपा को नरेन्द्र मोदी की जाति का उल्लेख करना पड़ा। किसी राष्ट्रीय पार्टी द्वारा अपने प्रधानमंत्री की जाति का खुले आम किये गये उल्लेख का यह दुर्लभ उदाहरण है, और पद की गरिमा के प्रतिकूल है।
ओवैसी द्वारा पहले सभी चुनाव क्षेत्रों में प्रत्याशी लड़ाने की घोषिणा की गयी थी जिससे यह संकेत गया था कि वे भाजपा के पक्ष में सौदेबाजी कर के यह सब कर रहे हैं। उनके इस फैसले का भाजपा के क्षेत्रों में जिस तरह से स्वागत हुआ उससे मुस्लिम वोट शंकित हो गया । अचानक ओवैसी ने प्लान बदलते हुए कुल छह स्थानों से उम्मीदवार उतारे जिससे मुस्लिम मत एकजुट हो कर महागठबन्धन के पक्ष में गये।
मोदी की ताबड़तोड़ सभायें व स्थानीय नेताओं को विश्वास में लिये बिना बाहरी लोगों के सहारे पूरा चुनाव अभियान चलाने से उनके डिगे हुये हौसले के संकेत गये। कीर्त आज़ाद, शत्रुघ्न सिन्हा, आर के सिंह, राम जेठमलानी, गोबिन्दाचार्य, अरुण शौरी, के बयानों से संकेत गया कि लोकसभा में संख्या बल के अलावा भाजपा में सब कुछ सामान्य नहीं है। भगवाभेषधारी हिन्दुत्ववादी नेताओं के कुटिल और उत्तेजक बयानों से कभी तो लगा कि यह योजनाबद्ध है, और कभी लगा कि ये सब नियंत्रण से बाहर हैं व आगे भी यही सब चलने वाला है।
दादरी की हिंसा और उसमें भाजपा के लोगों की सम्बद्धता के आरोपों के बाद उनके किये गये बचावों के साथ साथ चुनाव में गाय का स्तेमाल इस आरोप की पुष्टि कर गया कि ये चुनाव जीतने के लिए किसी भी स्तर तक गिरने को तैयार हो सकते हैं। श्री आर के सिंह ने तो खुले आम कहा कि इन्होंने दो करोड़ रुपये लेकर कई अपराधियों को टिकिट बेचा। इसके विपरीत जिसे जंगलराज बताया जा रहा था उसमें कई चरण के चुनावों के दौरान न कोई बूथ कैप्चरिंग हुयी न कोई हिंसा व दबाव डालने की घटना सामने आयी। इसके उलट कुछ उन लोगों को वोट डालने का अवसर मिला जिनको पिछले साठ सालों में वोट नहीं डालने दिया गया था। राम जेठमलानी जैसे वरिष्ठतम वकील ने कहा कि मोदी ने देश को धोखा दिया है और मैं बिहार में उनके विरुद्ध काम करूंगा। शत्रुघ्न सिन्हा ने तो भाजपा में रहते हुए भी विरोधियों जैसी भूमिका निभायी और प्रचार का अवसर न देने का आरोप भी लगाते रहे। चुनाव के बाद वरिष्ठ सांसद भोला सिंह ने तो स्थानीय नेतृत्व को प्रचार अभियान से दूर रखने को गम्भीरता से लेते हुए पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव बताया। आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी के कारण मँहगाई, कालेधन के बारे में किये गये वादे को पूरा न करना और चुनावी जुमला बताना प्रमाण बन गया कि इनके चुनावी वादों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। जल्दबाजी में भूमि अधिग्रहण विधेयक लाना और उसे पास न करा पाना, राज्यसभा में अवरोध का हल न निकाल पाना, आदि से मोदी की पिछली गढी हुयी छवि खंडित हो चुकी है, और काँग्रेस से उपजी निराशा में जो काम आ गयी थी उसका मुलम्मा उतर चुका है। सारी नकारात्मकता मोदी-शाह के खिलाफ ही गयी।
भाजपा के पास कुल आठ-नौ प्रतिशत स्थायी मत हैं और इनमें वृद्धि के लिए हर चुनाव में नये नये झूठ गढने पड़ते हैं, नये हथकण्डे अपनाने पड़ते हैं। उनका लक्ष्य मुख्य रूप से कम राजनीतिक चेतना वाला वर्ग रहता है जिसे वे किराये के मीडिया के सहारे झूठ फैला कर साधते हैं। किंतु सूचना माध्यमों की विविधता के कारण सच की किरणें कहीं न कहीं से फूट ही पड़ती हैं। जब ये पार्टी के अन्दर से निकलती हैं तो अधिक रोशनी करती हैं।
बिहार की पराजय केवल एक विधानसभा चुनाव की पराजय नहीं है अपितु उनकी गाड़ी के उस इंजन का ही खराब हो जाना है, जो उन्हें इतनी दूर लाकर बीच रास्ते में अटक गया है और ड्राइवर ने शेष सारे साधनों को नष्ट करवा दिया था।
वीरेन्द्र जैन                                                                          
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बुधवार, दिसंबर 08, 2010

यह ब्लेकमेलरों की भाषा है language of blackmailers


यह ब्लैकमेलरों की भाषा है

वीरेन्द्र जैन
कभी अपने आप को मुलायम सिंह का हनुमान और कभी टेलर बताने वाले अमर सिंह ने अब कहना शुरू कर दिया है कि अगर उन्होंने मुँह खोल दिया तो सपा नेता जेल में होंगे।
इन दिनों कोई एमरजैंसी नहीं लगी हुयी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है और संघ के पूर्व सर संघ चालक समेत कोई भी कुछ भी बोल रहा है, तब फिर समाजवादी पर्टी के पूर्व महासचिव अमर सिंह को मुँह खोलने से कौन रोक रहा है? जहाँ तक मुलायम सिंह से उनकी पुरानी मित्रता का सवाल है तो उसे तो वे वैसे भी कब की तिलांजलि दे चुके हैं। वे भूल चुके हैं कि ठाकुर अमर सिंह के राजनीतिक उत्थान और उसके सहारे हुये उनके आर्थिक उत्थान में यादव जाति के समर्थन से नेता बने मुलायम सिंह यादव का समुचित योग दान रहा था, और मुलायम सिंह को राजनीति में अर्थजगत के महत्व को उन्होंने ही पहलवान मुलायम सिंह को समझाया था। इस दौरान वे मुलायम सिंह यादव को दो जिस्म एक जान कहते थे। इस अहसान फरामोशी का प्रमाण तो उनके निम्नांकित बयानों से ही मिल जाता है जिनका ना तो उन्होंने कभी खण्डन किया और ना ही ये कहा कि ये प्रैस ने तोड़ मरोड़ कर छाप दिये हैं-
-मुम्बई। अमर सिंह ने कहा कि सपा का अर्थ मुलायम सिंह और उनका परिवार है और कुछ नहीं।[पीपुल्स समाचार] -इलाहाबाद। समाजवादी पार्टी के पूर्व महा सचिव अमर सिंह ने रविवार को सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव पर अब तक का सबसे करारा हमला बोला है। अमर ने कहा है कि उनके जीने से ज्यादा जरूरी है मुलायम सिंह यादव का मरना। मुलायम सिंह ने मुसलमानों को हमेशा धोखा दिया है। [दैनिक भास्कर 10 अगस्त 2010]
-रायबरेली। सोनिया के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में दंगल प्रतियोगिता के उद्घाटन में शामिल होने आये समाजवादी पार्टी के निष्कासित नेता अमर सिंह ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गान्धी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जम कर तारीफ की साथ ही सोनिया गान्धी को अच्छे व्यक्तित्व वाली दुनिया की सबसे बेहतर नेता भी बताया। [पीपुल्स समाचार 1 सितम्बर 2010]
लखनउ। अमर सिंह ने यहाँ आयोजित “ देश के मौजूदा हालात और मुसलमान” विषय पर आयोजित कार्यक्रम में कहा कि चौदह साल तक जिनकी जबान को कुरान की आयत और गीता का श्लोक समझा उन्हीं ने हमें रुसवा किया। मुलायम सिंह ने ही कल्याण सिंह को सपा में शामिल किया। व्यक्तिगत रूप से में कल्याण सिंह को मुलायम सिंह से बेहतर व्यक्ति मानता हूं क्योंकि वे साफ बात करते हैं और अपने कार्यों को स्वीकार करते हैं। कभी हमारे बगलगीर रहे मुलायम वर्ष 2003 में जनादेश की वजह से नहीं बल्कि मेरी कलाकारी से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रह सके थे। राज बब्बर को समाजवादी पार्टी में लाने और विश्व हिन्दू परिषद के वरिष्ठ विष्णु हरि डाल्मियाँ के बेटे संजय डाल्मियाँ को पार्टी का कोषाध्यक्ष और सांसद बनाने वाले मुलायम सिंह ही हैं। [जनसत्ता 19 अक्टूबर 2010] नई दिल्ली। मुलायम सिंह मेरे घर पर कब्जा किये हुये हैं और खाली नहीं कर रहे हैं। महारानी बाग का यह घर मैंने ही मुलायम सिंह को दिया था जिसका किरायानामा राम गोपाल के नाम से बना हुआ है जो मुलायम सिंह के निकट के रिश्तेदार हैं [डीबी स्टार नवम्बर 2010] कभी सोनिया गान्धी को प्रधानमंत्री न बनने देने के लिए विदेशी मूल का मुद्दा उछालने वाले अमर सिंह आज कल प्रति दिन मुलायम सिंह को कोसते रहते हैं। ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब वे मुलायम सिंह और उनके रिश्तेदारों, भाई भतीजों के खिलाफ असंसदीय भाषा में कुछ न कुछ नहीं कहते हों। अपने ताज बयान में वे कहते हैं “आजम खान यह समझ लें कि अगर मैंने मुँह खोल दिया तो मुलायम सिंह यादव मुश्किल में पड़ जायेंगे, उनको जेल जाना पड़ सकता है, जो आजम खान मुझे दलाल कह रहे हैं, पहले वे जरा यह बताएं कि मैंने उन्हें क्या क्या दिया है। मुझे सप्लायर कहने वाले समाजवादी पार्टी के अन्य नेता भी आगे आकर बताएं कि मैंने उन्हें या मुलायम सिंह को क्या सप्लाई किया है,”।
इतना सब कुछ कह लेने के बाद वे अब और क्या छुपाना चाहते हैं। यह राजनीतिज्ञों की भाषा नहीं अपितु ब्लेकमेलरों की भाषा है। वे सार्वजनिक रूप से पूर्व मित्र हो चुके जिन मुलायम सिंह यादव के मरने तक की कामना करते हैं उन्हें जेल जाने से वे क्यों बचाना चाहते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसी कोई बात कहने पर वे खुद किसी अधिक बड़े अपराध में सम्मलित पाये जायें और उसी से बचने के लिए वे गोलमाल भाषा में धमकी दे रहे हैं। अमर सिंह जैसे जनाधार विहीन नेता हमारे लोकतंत्र के लिए एक बड़े अभिशाप की तरह हैं जो जनता को निरी मूर्ख और स्मृतिहीन मानते हैं। ऐसे लोग ही लोकतंत्र को जोड़तोड़ और जनसमर्थन को कारपोरेट घरानों के यहाँ गिरवी रखवाने का काम करते हैं। लायजिनिंग का जो काम नीरा राडिया राजनीति में आये बिना करती रहीं वही काम अमर सिंह जैसे लोग राज्यसभा की सदस्यता से मिल चुकी विशिष्ट स्तिथि का दुरुपयोग करते हुये करते रहे हैं। देश के रक्षामंत्री पद पर रह चुके किसी नेता ने यदि जेल जाने लायक अपराध किया है तो उसे छुपाना और उसकी ओट में अपने राजनीतिक हित साधना भी अपराध है, जो अमर सिंह जैसे लोग डंके की चोट पर करते रहते हैं।
अपनी सामाजिक जिम्मेवारी समझते हुए सुप्रीम कोर्ट जिस तरह से राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों को कटघरे में खड़ा कर रहा है, तब देश की सुरक्षा से जुड़े रहे किसी व्यक्ति कथित अपराध को छुपाने का अपराध करने वाले उसकी दृष्टि से अलक्षित क्यों हैं? जरूरत तो इस बात की है कि देश के सारे जनप्रतिनिधियों और उसकी पेंशन लेने वाले भूतपूर्व जनप्रतिनिधियों से यह शपथ पत्र लिया जाये कि कानून विरोधी किसी भी गतिविधि का पता चलते ही वे शीघ्रातिशीघ्र कानून की निगाह में लायेंगे और दोषी को सजा दिलाये जाने में कानून की भरपूर मदद करेंगे। ऐसा न करने पर वे स्वयं भी अपराध छुपाने के अपराधी माने जायेंगे।

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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