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गुरुवार, मई 02, 2019

भगवा आतंकवाद पर काँग्रेस रक्षात्मक क्यों?


भगवा आतंकवाद पर काँग्रेस रक्षात्मक क्यों?

वीरेन्द्र जैन
2019 के आम चुनाव में प्रत्याशी म.प्र. के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह काँग्रेस के कुछ विरले नेताओं में से एक हैं जो कांग्रेसी राजनीति के सभी गुणों में पारंगत हैं और एक परिपूर्ण राजनेता हैं। वे एक छोटे से राजपरिवार के सदस्य हैं, शिक्षा से इंजीनियर हैं, सुलझे हुये हैं, आम लोगों के बीच उठते बैठते हैं, प्रदेश में समुचित संख्या में उनके समर्थक और उपकृत लोग हैं। काँग्रेस में उनका एक अलग गुट है, जितने लोग उन्हें पसन्द करते हैं, उतने ही काँग्रेस के दूसरे गुट के लोग उनसे जलते हैं। इन्दिरा गाँधी के समय से ही वे कुछ कुछ सेंटर से लेफ्ट की ओर झुके नजर आते हैं। सारे पूजा पाठ, नर्मदा परिक्रमा, साधुओं की संगत, आदि के बाद भी उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि अन्य कई काँग्रेसियों की तुलना में ज्यादा चमकदार है, वे सबसे ज्यादा मुखर हैं। हो सकता है कि यह उनके प्रबन्धन का ही एक हिस्सा हो, पर यह इतना सफल है कि काँग्रेस को समाप्त करने के सपने देखने वाली भाजपा उन्हें अपना दुश्मन नम्बर एक मानती है।
मुख्य मंत्री के रूप में म.प्र. में अपने दस वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने भाजपा के विस्तार पर लगाम लगा कर रखी व उनकी सारी चुनावी योजनाओं की काट प्रस्तुत करते रहे। जो भी विपक्ष का नेता बनता था वह भी उनका मुरीद हो जाता था, और यही कारण रहा कि भाजपा को बार बार अपने विधायक दल का नेता बदलना पड़ा । थक हार कर 2003 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने दिग्विजय सिंह के खिलाफ तेज साम्प्रदायिक कार्ड खेला और यब केन्द्र की मंत्री भगवा भेषधारी उमा भारती को उनके न चाहते हुए भी मुख्यमंत्री प्रत्याशी बना कर मैदान में उतार दिया था।  
कर्मचारियों के असंतोष और कांग्रेस की गुटबाजी के कारण वे चुनाव हार गये। प्रायश्चित में उन्होंने दस वर्षों तक कोई पद न लेने व प्रदेश की राजनीति में सक्रिय न होने का फैसला लेकर उस पर अमल भी किया। इस दौरान अपनी राजनीतिक चेतना के कारण, घटनाओं पर तात्कालिक सटीक राजनीतिक टिप्पणियों से काँग्रेस के प्रमुख नेता बने रहे। दस वर्ष के बाद ही उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता स्वीकार की और काँग्रेस के महासचिव के रूप में राहुल गाँधी के प्रमुख सलाहकार बने रह कर पूरी काँग्रेस को संचालित करते रहे। जब राजनीति व्यक्ति केन्द्रित होने लगती है तो प्रतिक्रिया में व्यक्ति की छवि को भी झूठे सच्चे आरोपों से धूमिल करने का काम भी उसका विरोध पक्ष करने लगता है। सोनिया गाँधी को विदेशी ईसाई महिला और राहुल गाँधी को पप्पू कह कर बदनाम किया गया था। दिग्विजय सिंह को भी न केवल मुसलमानों का पक्षधर अपितु आतंकियों का पक्षधर तक प्रचारित कर दिया गया। भाजपा के पास शुरू से ही एक मजबूत दुष्प्रचार एजेंसी रही है जो पहले मौखिक प्रचार के रूप में संघ के नेतृत्व में काम करती थी, तब भी इसे रियूमर स्पोंसरिंग संघ कहा जाता था। इसी एजेंसी ने कभी देश के सबसे मजबूत विपक्ष कम्युनिष्ट पार्टी को विदेश के इशारे और पैसे पर संचालित होने वाला दल कह कर बदनाम किया था। बाद में तो कम्युनिष्ट देशों में वृद्धों को मार देने से लेकर तरह तरह से वैज्ञानिकता विरोधी प्रचार किये जिसमें जल विद्युत का अर्थ पानी में से बिजली निकाल कर उसे खेती के लिए अनुपयुक्त बना देने तक था। उनका यह काम लगातार जारी रहा और बाद में अखबारों, पत्रकारों से लेकर टीवी का स्तेमाल करते हुए ब्लाग्स फेसबुक और व्हाट’स एप्प तक उन्हें बेनामी होकर अफवाहें फैलाने की सुविधा मिलती गयी।
दूसरी ओर काँग्रेस किसी बरबाद हो चुके साम्राज्य की तरह ढहती गयी। उसके पास कुछ पुराने खण्डहर होते किले और जंग लगी तोपें व सामंती अहंकार शेष बचा।  काँग्रेस अपनी अपनी हवेलियों को सम्हाले दरबारियों के समूह में बदलती गयी जो आपस में भी जंग करते रहे और निजी लाभ के लिए एकजुट भी होते रहे। काँग्रेस की चिंता करने वाला और उसमें रह कर उसी को नुकसान करने वालों के प्रति कठोर होने का साहस करने वाला कोई नहीं बचा। ऐसी ही दशा में भाजपा काँग्रेस पर लगातार हमलावर होती गयी, कार्पोरेट घरानों से जुड़ कर उसके प्रभावी सदस्यों को खरीदती गयी, दुष्प्रचार से इतिहास तक को बदनाम करती गयी व चुनाव जीतने के लिए दोदलीय व्यवस्था जैसी स्थितियां बनाती गयी।  
काँग्रेस चुनावी परिस्तिथियों के अनुकूल होने पर भले ही गठबन्धन की सरकार बनाती गयी हो किंतु उसकी संगठन क्षमता निरंतर क्षीण होती गयी। विचारधारा को समर्पित कार्यकर्ताओं की फसल बिल्कुल सूख गयी। नेताओं के पट्ठे पैदा होते गये जो कांग्रेस के लिए नहीं अपितु अपने उस्ताद के लिए तत्पर रहते हैं। ऐसी दशा में भाजपा अपनी कुशल संगठन क्षमता के कारण निरंतर जड़ें जमाती गयी। भले ही 2004 से 2014 तक काँग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार रही किंतु संसद भाजपा के चाहने पर ही चल सकी। उन्होंने सफलतापूर्वक झूठ का सिक्का चलाया। उनकी इस क्षमता के लिए बार बार पाकिस्तानी शायरा परवीन शाकिर का वह शे’र याद आता है-
मैं सच कहूंगी और फिर भी हार जाऊंगी
वो झूठ बोलेगा, और लाजवाब कर देगा
पिछले दिनों भोपाल लोकसभा चुनाव क्षेत्र से काँग्रेस के उम्मीदवार दिग्विजय सिंह के मुकाबले भाजपा को कोई सही उम्मीदवार नहीं मिला [ बकौल राजनाथ सिंह] तो उन्होंने विभिन्न बम विस्फोटों और हत्याओं के लिए आरोपित, स्वास्थ के आधार पर जमानत पर छूटी प्रज्ञा ठाकुर को यह कह कर चुनाव में उतार दिया कि वे निर्दोष हैं और उन्हें जानबूझ कर फंसाया गया था। इस्लामिक आतंकवाद की तर्ज पर दिग्विजय सिंह ने विभिन्न मुस्लिम इबादतगाहों में हुये विस्फोटों को भगवा आतंकवाद कहा था, पर पूजा पाठी दिग्विजय सिंह का वह मतलब नहीं था जो संघ परिवार ने प्रचारित किया। उन्होंने प्रचारित किया कि उन्होंने सभी हिन्दुओं को आतंकवादी कह दिया है जबकि हिन्दू तो शांतिप्रिय और सहिष्णु होता है। सच तो यह है कि समझौता एक्सप्रैस, अजमेर. हैदराबाद, जामा मस्जिद, मालेगाँव, मडगाँव, आदि स्थानों पर जो बम विस्फोट हुये थे वे उन आतंकवादी घटनाओं की प्रतिक्रिया में साम्प्रदायिक दिमाग के लोगों ने किये थे, जिन्हें इस्लामिक आतंकवाद कहा गया था। जब इस्लामिक आतंकवाद कहने से सारे मुसलमानों को आतंकवादी नहीं माना जाता है तो हिन्दू समाज के एक वर्ग विशेष के लोगो द्वारा किये गये कारनामों की जिम्मेवारी पूरे हिन्दू समाज पर कैसे डाली जा सकती है। भगवा आतंकवाद कहने का इतना ही मतलब था कि इस घटना को करने वाले अपराधी हिन्दू थे और उन्होंने वैसी ही प्रतिक्रिया में मुस्लिम इबादतगाहों को निशाना बनाया। जाँच एजेंसियों ने कुछ लोगों की पहचान कर सबूत जुटाये व मामला दर्ज कराया जिनमें प्रज्ञाठाकुर भी एक आरोपी थीं।
दुखद यह है कि दुष्प्रचार के डर से कांग्रेस इस निर्दोष बयान को स्पष्ट करने की जगह इसे छुपाने में लगी है, और एक झूठ सिर चढ कर बोल रहा है। घटनाएं हुयी हैं, जाँच में कुछ लोग पकड़े गये हैं, मुकदमे चल रहे हैं, सरकारी वकील को इस कारण वकालत छोड़ना पड़ी क्योंकि वर्तमान सरकार ने इस प्रकरण में धीमे चलने को कहा था जिसे उन्होंने कानून के हक में नहीं माना। व्यापम और ई-टेन्डरिंग समेत अनेक भ्रष्टाचरणों से रंगी आरोपी पार्टी चुनावों में साम्प्रदायिक रंग लाकर मुद्दे बदल चुकी है तो निर्दोष काँग्रेस अपने सच को भी सामने नहीं ला पा रही है। काँग्रेस उम्मीदवार दिग्विजय सिंह ने अपने होंठ सिल लिये हैं और कह रहे हैं कि मैं साध्वी के बारे में कुछ भी नहीं बोलूंगा।
यह सत्य की हार और असत्य की जीत है। कांग्रेस अगर सच बोलने का साहस नहीं जुटाती तो वह पार्टी को समाप्त करने के भाजपाई सपने को पूरा कर रही होगी।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

            

शनिवार, अक्टूबर 30, 2010

क्या भगवा आतंकवाद भी आस्था का मामला है?


क्या भगवा आतंकवाद भी आस्था का मामला है
वीरेन्द्र जैन

अयोध्या के राम जन्मभूमि मन्दिर – बाबरी मस्जिद मालिकाना विवाद का फैसला आने से पहले जब संघ परिवार के लोगों को लग रहा था कि न्यायिक सम्भावनाओं के अनुसार उनके पक्ष के लोग मुकदमा हार जायेंगे तब उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया था कि आस्था के सवालों को अदालत में हल नहीं किया जा सकता। यह वे तब कह रहे थे जब लगातार साठ सालों से मुकदमा चल रहा था और उनके पक्ष के लोग भी अदालत की कार्यवाही में भाग ले रहे थे। इतना ही नहीं मस्जिद को तोड़े जाने के बाद आडवाणी ने कहा था कि फैसले में होने वाली देरी से नाराज होने के कारण लोगों ने उस विवादित ढांचे के मस्जिदनुमा स्वरूप को तोड़ दिया जिसे वे मन्दिर मानते थे और जिसमें 1949 से रामलला की मूर्ति विराजमान थी। यही लोग उस विवादित स्थल के दो तिहाई भाग को मिल जाने पर अदालत के फैसले को स्वीकार करके खुशी व्यक्त कर रहे थे। कुछ दिनों बाद जब दूसरे पक्ष द्वारा सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय किया गया तो वे फिर आस्थावानों को उकसाने वाले बयानों पर उतरने के लिए साधु संतों को आगे कर दिया। चित भी मेरी, पट भी मेरी, अंटा मेरे बाप का।
पद पर आने के लिए संविधान की शपथ लेने वाले इस दक्षिणपंथी दल को लोकतंत्र के स्तम्भों पर कितना भरोसा है यह उसके बयानों से पता चलता है। जब देश में आतंकवादी घटनाएं घटती थीं तब त्वरित और सबसे पहले होने की दौड़ में मीडिया खबरों की जगह अनुमानों के आधार पर जिम्मेवारी डाल देता था जिसके अनुसार प्रत्येक आतंकी घटनाओं के लिए मुस्लिम आतंकियों का हाथ बता दिये जाने से संघ परिवार के साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण कार्यक्रम को बल मिलता था। जाँच एजेंसियों के काम की गोपनीयता के कारण आम जन को भी वे लगभग उसी बहुप्रचारित दिशा में कार्य करती हुयी महसूस होती थीं। किंतु मालेगाँव, मडगाँव, कानपुर आदि में समयपूर्व या अपने निर्माण स्थल में ही फट गये बमों के कारण जो सच सामने आया उसने कहानी ही बदल दी। वहाँ न केवल गैर मुस्लिम आतंकी ही दुर्घटना के मृतकों में थे अपितु उनके निवास से मुस्लिम पहनावे के वस्त्र और् नकली दाढियाँ भी बरामद हुयीं। जाँच के दौरान जो लोग चिन्हित हुये उनसे पूछ्ताछ के आधार पर प्राप्त सबूतों से जो लोग सन्देह के घेरे में आये वे संघ परिवार से जुड़े हुये लोग थे। आजकल मोबाइल की काल डिटेल से अपराधियों के सम्पर्कों और घटनाओं के समय उनकी उपस्तिथि के स्थलों की पुष्टि आसान हो जाती है। इस तरह के मामलों में जाँच एजेंसियां बहुत सावधानी पूर्वक काम करती हैं और पर्याप्त प्रमाण मिलने से पूर्व संदिग्ध की निगरानी करती हैं।
आतंकी घटनाओं का उद्देश्य केवल अपने शत्रु की हत्या करना नहीं होता अपितु अनेक बार वे समाज में उपस्थित साम्प्रदायिक विद्वेष को साम्प्रदायिक दंगों में बदलने के लिए की जाती हैं। साम्प्रदायिक दल अफवाहों के द्वारा लोगों को भड़काते हैं। आतंकी कार्यवाहियां करने वाले कई बार अपने ही समुदाय के लोगों को उकसाने के लिए अपने ही धार्मिक समारोहों की भीड़ के बीच ही बम विस्फोट करके उन्हें उत्तेजित करने की कोशिश करते हैं। मडगाँव में साइकिल पर रख कर बम ले जाने वाले हिन्दू आतंकी अपने ही समुदाय के धार्मिक आयोजन के बीच बम विस्फोट कराने के लिए ले जा रहे थे जो बीच में ही फट गया। समाज में पूर्व से ही फैलायी गयी साम्प्रदायिकता आतंकी घटनाओं के लक्ष्य के लिए आधार भूमि का काम करती है किंतु जब समाज में समझदारी होती है तो लोग आतंकियों का आशय समझ कर अपने प्रतिद्वन्दी वर्ग के प्रति उत्तेजित नहीं होते। पिछले वर्षों में मुम्बई लोकल ट्रेन बम विस्फोट, दिल्ली सदर बाजार में दीवाली के अवसर पर हुआ विस्फोट, वाराणसी में एक मन्दिर समेत अनेक स्थलों पर किये गये बम विस्फोटों के बाद भी लोगों का शांत बने रहना साम्प्रदायिकता के निष्प्रभावी होने की सूचना है। जब अजमेर की दरगाह में हुए विस्फोटों की जाँच में मिले सबूतों के आधार पर खोजबीन की गयी तो उसमें संघ के कार्यकर्ताओं के सम्मलित होने के साफ संकेत मिले। पर अब आरएसएस और संघ परिवार का राजनीतिक मुखौटा भाजपा के लोग इन सन्दिग्धों के बचाव में अनाप शनाप बयान देने में लग गये हैं जिनमें से यह भी एक है कि यह उन्हें बदनाम करने की कोशिश है। स्मरणीय है कि समय समय पर संघ और भाजपा यह कहने से नहीं चूकते कि दोनों अलग संगठन हैं और संघ एक सांस्कृतिक संगठन है तथा उसका भाजपा के दैनिन्दिन कार्यों से कुछ भी लेना देना नहीं है। यदि यह सच है तो कोई राजनीतिक बदले के लिए संघ के पदाधिकारी को क्यों फँसाने की कोशिश करेगा। हमारे यहाँ एक स्वतंत्र न्यायपालिका है और यदि कोई जाँच एजेंसी अदालत के सामने पर्याप्त सबूत नहीं प्रस्तुत कर पाती तो वह आरोपी को ससम्मान बरी कर देती है और आवश्यकता होने पर जाँच एजेंसियों के खिलाफ भी टिप्पणी करती है। जिस आतंकवाद के विरोध में संघपरिवार सबसे अधिक मुखर है और जब पर्याप्त प्रमाणों के आधार पर सन्दिग्धों से पूछ्ताछ की जाती है तो वे जाँच एजेंसी के खिलाफ तरह तरह के आरोप लगा कर उसका मनोबल गिरा रहे हैं। यही काम उन्होंने करकरे के खिलाफ भी किया था जिनकी 26\11\2008 को मुम्बई में किये गये हमलों के दौरान मृत्यु हो गयी थी। असल में संघ परिवार का जो दोहरा चरित्र है वही उन्हें परेशानी में डालता है। यह कतई जरूरी नहीं है कि भाजपा और संघ सिद्धांत रूप से उन आतंकी गतिविधियों में सम्मलित हों किंतु वे जिन कुतर्कों और इतिहास की गलत व्याख्या के आधार पर अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करते हैं उससे किसी अतिउत्साही कार्यकर्ता के हिंसक आन्दोलन में कूद पड़ने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। जरूरी होता है कि कार्यकर्ताओं की गतिविधियों और कार्यप्रणाली पर निगाह रखी जाये और उसके सिद्धांतों से विचलित होने की दशा में उसके निष्कासन की कार्यवाही की जाये। यदि उच्च पदाधिकारियों को उसकी गतिविधियों का संज्ञान बाद में होता है तो यह काम एक क्षमा के साथ बाद में भी किया जा सकता है। किंतु संघ परिवार का इतिहास यह रहा है कि वे कभी भी अपनी गलतियों के लिए क्षमा नहीं माँगते तथा दुनिया की आँखों देखी सच्चाई को भी ढीठ बयानों से झुठलाने की कोशिश करते हैं। महात्मा गाँधी की हत्या से लेकर बाबरी मस्जिद तोड़ने और गुजरात में निर्दोष मुसलमानों का नरसंहार करने तक उन्होंने कभी भी भूल नहीं स्वीकारी। झूठ का सहारा भले ही कभी तात्कालिक लाभ दिला दे, किंतु सार्वजनिक जीवन में वह व्यक्ति को अन्दर से कमजोर करता है। इसी कमजोरी को ढकने के लिए वह कठोरता अपनाते अपनाते हिंसक हो जाता है। ये लोग दलबदल करने, करवाने, संसद में सवाल पूछने के लिए पैसे लेने, सांसदनिधि बेचने, सदन न चलने देने से लेकर अनियंत्रित भ्रष्टाचार के द्वारा विधायिका को तो पर्याप्त नुकसान पहुँचाते ही रहे हैं, अब कार्यपालिका को काम न करने देने और न्यायपालिका के आदेशों को आस्था के नाम पर नकारने की बात करके पूरे तंत्र को नष्ट करने की सतत कोशिश कर रहे हैं।
सवाल उठता है कि इनका यह काम नक्सलवादियों, अलगाववादियों और आतंकवादियों से किस तरह भिन्न है? क्या भगवा आतंकवाद भी इनकी आस्था का सवाल है जिस पर अदालत विचार नहीं कर सकती।

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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