भाजपा में मोदी विकल्पहीन क्यों?
वीरेन्द्र जैन
विचारधारा पर आधारित किसी भी संगठन में यदि किसी व्यक्ति विशेष पर निर्भरता बनी रहती है तो उसके वैचारिक संगठन होने पर संदेह होना स्वाभाविक होता है। गुजरात में भाजपा की नरेन्द्र मोदी पर निर्भरता उसके वैचारिक संगठन होने के दावे की पोल खोलता है।गत वर्षों में घटे घटनाक्रमों में ऐसे समुचित आधार थे जब उनके कारण एन डी ए और भाजपा की छवि को लगातार क्षति पहुँची तब नरेन्द्र मोदी को हटा दिया जाना चाहिये था।
नरेन्द्रमोदी स्वाभाविक नेता के रूप में उभरकर मुख्यमंत्री नहीं बने थे अपितु उन्हें ऊपर से थोपा गया था। यह पद उन्होंने दिल्ली में पार्टी प्रवक्ता के रूप में कर्य करते हुए और गोबिन्दाचार्य के साथ रहते हुये जुगाड़ जमा कर पाया था। यह पद पाने के लिए उन्होंने भाजपा के ही विधिवत चुने हुये मुख्यमंत्री को विस्थापित किया था। वे उस समय विधायक भी नहीं थे तथा जब उन्होंने उपचुनाव लड़ कर विधानसभा की सदस्यता प्राप्त की उस समय विधानसभा की चार सीटों के लिए उपचुनाव हुये थे जिनमें से तीन पर भाजपा हार गयी थी व मुख्यमंत्री रहते हुये नरेन्दमोदी जिस सीट से जीते थे उसे उससे पूर्व जीते भाजपा प्रत्याशी ने उन से दुगने मतों से जीता था। यह नरेन्द्रमोदी की 'लोकप्रियता' का नमूना था कि उस सीट पर भाजपा की जीत आधी रह गयी थी।
भाजपा ने यह कभी सार्वजनिक नहीं किया कि उन्होंने केशूभाई पटेल् को किस आधार पर हटा कर नरेन्द्र मोदी को ताज सोंपा था। पर गोधरा में साबरमती एक्सप्रैस की बोगी नम्बर छह में लगी आग और उसमें अयोध्या जाने वाले दो कारसेवकों समेत 59 लोगों के जल जाने के आधार पर मुख्यमंत्री मोदी ने सरकारी मदद से निर्दोष गुजराती मुसलमान नागरिकों के खिलाफ जो नरसंहार करवाया था उससे उनको मुख्यमंत्री पद पर प्रतिष्ठित करने के कारणों को अनुमानित किया जा सकता है। उनके बाद के कदमों से भी स्पष्ट हो चुका है कि गोधरा घटनाक्रम के बाद घटी हिंसा अचानक भड़की हिंसा नहीं थी अपितु पूर्व नियोजित थी और उसके आधार भी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में तैयार हुये थे।यदि उक्त आगज़नी में राम जन्म भूमि मन्दिर में कार सेवा का कारण रहा होता तो अयोध्या से गुजरात तक तीन राज्यों से गुजरने वाली ट्रेन में यह घटना गुजरात के गोधरा पहुँचने पर ही क्यों घटती जबकि वहाँ नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व वाला भाजपा का शासन था। इस बात को जानबूझकर दबा दिया जाता रहा है कि उस एक डिब्बे बोगी नम्बर 6 में लगी आग में मरने वालों में अयोध्या गये त्रिशूलधारी कुल दो कारसेवक थे। उसके बाद पूरे गुजरात में जो हिंसा लूटपाट बलात्कार आगजनी फैलायी गयी उससे जन धन का नुकसान उठाने वालों में गोधरा की घटना का कोई आरोपी नहीं था। यह सुनियोजित हिंसा केवल अगले विधानसभा चुनाव में साम्प्रदायिक ध्रुवी करण का लाभ उठाने के लिए ही फैलायी गयी थी।
इन मौतों के साथ भी साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले मोदी ने भेदभाव को पुष्ट करते हुये गोधरा में मरने वालों को दो लाख और शेष गुजरात में मरने वालों को एक लाख रूपये मुआवजे की घोषणा की थी। जब भारत ने ट्वेन्टी-ट्वेन्टी में विश्व कप जीता तथा राज्य सरकारों ने खिलाड़ियों को करोड़ों रूपयों के धन से पुरस्कृत कर अपनी राष्ट्रीय भावना को व्यक्त किया तब मोदी जी ने अपने भरे पूरे क्रिकेट प्रेमी राज्य के खिलाड़ियों को कुल एक एक लाख रूपये देने की घोषणा की क्योंकि उनके राज्य से खेलने वाले खिलाड़ियों के नाम इरफान पठान और यूसुफ पठान थे।
गोधरा घटनाक्रम के बाद हुयी हिंसा में जो कुछ हुआ वह अल्पसंख्यक आयोग, मानव अधिकार आयोग, महिलाआयोग, समेत सैकड़ों जनसंगठनों की जॉच समितियों, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधिमंडलों समेत समाचार माघ्यमों द्वारा सामने लाया गया था और बाद में तो तहलका के खुलासे के बाद स्वयं आरोपियों ने कैमरे के सामने भी सच स्वीकार कर लिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी को पार्टी के तमाम दबावों के बाबजूद भी राजधर्म का पालन करने जैसे गोलमोल वाक्य बोलने को विवश होना पड़ा था क्योंकि रामविलास पासवान, ममता बनर्जी, चन्द्रबाबू नायडू, फारूख अब्दुल्ला समेत उनके तमाम सहयोगी दलों के लोगों ने खुली आलोचना की थी व जनतादल(यू) बीजू जनता दल आदि भी खुल कर साथ नहीं दे पा रहे थे। अभी हाल ही में जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेता ने खुलासा कर ही दिया है कि अटलजी स्तीफा दे रहे थे तो उन्होंने उनका हाथ पकड़ लिया था। आइ ए एस अधिकारी शर्म के मारे अपने पद से स्तीफा देने लगे थे व सारी दुनिया में थू थू हो रही थी। भाजपा के नेता केवल कुतर्क और मुंहजोरी भर कर रहे थे पर अन्दर से वे भी अपने पक्ष को कमजोर मान रहे थे। मोदी को हटा देने का वह उपयुक्त समय था। बाद में भाजपा सरकार के केन्द्र से हटने में मोदी को न हटाये जाने ने बड़ी भूमिका अदा की थी।
अवसर उसके बाद भी बहुत सारे आये। नरेन्द्रमोदी के मंत्रिमंडल में मंत्री रहे हरेनपंडया की सरे आम हत्या हुयी और उनके पिता ने सार्वजनिक रूप से नरेन्द्र मोदी को ही हत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया। यह वह परिवार था जिसने सारा जीवन संघ परिवार के लिए लगाया था। केशूभाई के समर्थन में उनके साथ विधायकों के बड़े बहुमत ने भाजपा हाई कमान से गुहार की कि उन्हें बदल देना चाहिये पर उन्हें चुप बैठने को विवश कर दिया गया। राज्यपाल रहे व भाजपा के विश्वसनीय भंडारी ने अपने अंतिम दिनों से कुछ दिनों पहले ही गुजरात घटनाक्रम पर गहरा अफसोस व्यक्त किया था।
केन्द्र में मंत्री रहे काशीराम राणा मोदी के कारनामों से गहरे असंतुष्ट रहे और उन्होंने विधानसभा चुनावों के दौरान अपने को अलग रखा था। चुनाव से ठीक पहले भाजपा के पचास साल पुराने सदस्य और भाजपा की ओर से गुजरात के मुख्यमंत्री रहे सुरेश मेहता ने पार्टी से स्तीफा दे दिया था। संयुक्त राज्य अमेरिका ने मोदी को वीसा देने से इंकार करके न केवल मोदी अपितु पूरे देश का अपमान किया पर भाजपा के नेताओं के कानों पर जूं भी नहीं रेंगी। विश्व हिंदू परिषद के प्रवीण तोगड़िया ने मोदी के लिए काम करने से साफ इंकार कर दिया था। उसके बाद हुये विधान सभा और लोक सभा के टिकिट बांटने का काम भी मोदी की मरजी से हुआ था जिसमें लोकसभा सदस्य तो कबूतरबाजी आदि में पकड़े ही गये अपितु यह सत्य भी सामने आया कि मोदी द्वारा बांटे गये टिकिटों में सत्ताइस विधायकों की एक से अधिक पत्नियाँ हैं। माना जाता रहा कि भाजपा के संगठन सचिव संजयजोशी की सीडी भी मोदी ने ही तैयार करायी थी।
सोहराबुद्दीन के हत्याकांड को खुले आम स्वीकारने और गौरव प्रर्दशन का जो दंभ मोदी ने प्रकट किया उसका उदाहरण तो रावण के चरित्र में भी नहीं मिलता। इस पर मोदी के स्वयं के वकील को भी शर्म आयी और पीढियों से संघ परिवार से जुड़े उस वकील ने त्यागपत्र देना ज्यादा ठीक समझा था।
इतने सब ही नहीं और भी बहुत कुछ के बाबजूद भी भाजपा इतनी विवश क्यों है कि वह मोदी को नेतृत्व नहीं बदलना चाहती? कहीं ऐसा तो नहीं कि मोदी के पास और भी सीडियाँ दबी पड़ी हों और वे संजयजोशी से भी ऊपर के नेताओं की हों क्योंकि नाराजी की दशा में मदन लाल खुराना ने भी एक महीने का समय देकर ऐसी पोल खोल देने की धमकी दी थी। जहाँ तक औद्योगिक विकास का सवाल तो है वह गुजरात के इतिहास में सदैव से ही रहा है चाहे जिस पार्टी या नेता का शासन रहा हो।
वीरेन्द्र जैन
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