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मंगलवार, अगस्त 09, 2016

गुजरात में मंत्रिमण्डल परिवर्तन और भाजपा में लोकतंत्र

गुजरात में मंत्रिमण्डल परिवर्तन और भाजपा में लोकतंत्र
वीरेन्द्र जैन

दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनावों में मिली हार तथा उत्तराखण्ड व अरुणाचल प्रदेश में दलबदल के सहारे सत्ता बदलने को न्यायालय द्वारा अनुचित ठहराये जाने के बाद गुजरात ने मोदी को बेचैन कर दिया है और उन्हें वहाँ मुख्यमंत्री या कहें मंत्रिमण्डल बदलने का अप्रिय निर्णय लेना पड़ा है। वे भले ही इसे आनन्दी बेन के 75 की उम्र के रिटायरमेंट से जोड़ कर प्रदर्शित कर रहे हों, पर उनकी इस बात पर विश्वास न करते हुए सब लोग समझ रहे हैं कि यह पिछले दिनों हार्दिक पटेल के नेतृत्व में हुए पटेलों के हिंसक आन्दोलन और ऊना के दलितों पर निर्भीकता पूर्वक किये गये दमन और अपमान से उपजे प्रतिरोध व राजनीति के उपचार का प्रयास है। यदि केवल आनन्दीबेन के 75 पार का सवाल होता तो पुराने मंत्रिमण्डल के शेष सारे चेहरे यथावत रखे गये होते, पर यहाँ तो लगभग सभी को बदल दिया गया है।  
दुनिया के कम्युनिष्ट आन्दोलन में सोवियत रूस की जो भूमिका थी लगभग वैसा ही गुजरात भाजपा के लिए एक माडल राज्य है। मोदी के सहारे भारतीय जनता पार्टी ने जो झांकी सजाई थी वह गुजरात के माडल के आधार पर ही सजी थी और उसके पतन से बिखर सकती है। यही कारण है कि उस पर विपक्ष के साथ साथ सबकी पैनी निगाहें लगी हुयी हैं। गुजरात बहुत पहले से औद्योगिक रूप से विकसित राज्य रहा है जिसे भाजपा की मोदी सरकार ने न केवल बचाये रखा था, अपितु उसमें होने वाली वृद्धि की दर को भी कम नहीं होने दिया। प्रशासनिक साफ सुथरापन और मुख्यमंत्री की ईमानदार छवि ने भी भाजपा शासित दूसरे भ्रष्ट राज्यों की तुलना में गुजरात राज्य की छवि को सुधारा था। इसी छवि के अतिरंजित प्रचार ने मोदी के नेतृत्व को मान्यता दी। गोधरा में साबरमती एक्सप्रैस में हुए हादसे के बाद जिस त्वरित गति से मुसलमानों के खिलाफ हिंसा हुयी उसकी निन्दा भले ही पूरी दुनिया में हुयी हो किंतु साम्प्रदायिकता के दुष्प्रचार से प्रभावित गुजरात के व्यापारी मानसिकता के लोगों को मोदी सरकार एक दृड़ सरकार नजर आई थी जो कठोर और अप्रिय फैसले लेने का खतरा मोल ले सकती थी।
भले ही भारतीय जनता पार्टी देश के मध्य और पश्चिमी राज्यों की प्रमुख पार्टी है अपितु उसका संगठन इन राज्यों में सक्रिय अन्य दलों से बहुत अच्छा रहा है। इस पार्टी में समान कद के बहुत सारे महात्वाकांक्षी नेता हैं पर गुजरात राज्य के माडल और संघ को प्रिय लगने वाले कठोर फैसले ले कर मोदी ने संघ नेतृत्व के सामने अपना कद बहुत बढा लिया था.। अब वे भाजपा के बादशाह है, जिन्होंने सभी वरिष्ठों को किनारे कर दिया है व लोकसभा के कुशल चुनाव प्रबन्धन से समकालीनों को नेतृत्व स्वीकारने को मजबूर कर दिया है। वे आपस में भले ही प्रतिद्वन्दिता करते रहें किंतु सत्ता और संगठन दोनों में अब मोदी का प्रतिद्वन्दी कोई नहीं है।
गुजरात के ऊना में सामंती मानसिकता के साथ दलितों की अकारण पिटाई और उस घटना का  वीडियो बना कर उसे चुनौती पूर्ण ढंग से वायरल करने को रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद से उत्तेजित दलितों और विपक्षियों ने गम्भीरता से लिया व गुजरात के दलित आन्दोलनरत हुये। पाटीदारो के हिंसक आन्दोलन के बाद यह मोदी के राज्य में उनके लिए दूसरी बड़ी चुनौती थी। उल्लेखनीय है कि इस विषय पर भाजपा नेतृत्व में दलित सांसदों समेत किसी की कोई प्रतिक्रिया देने की हिम्मत नहीं हुयी। स्वयं मोदी ने एक सप्ताह तक स्थिति का गहन परीक्षण करने के बाद आनन्दीबेन से त्यागपत्र दिला दिया। यह घटनाक्रम वर्तमान भाजपा में लोकतंत्र की असली तस्वीर प्रस्तुत करता है।
गुजरात के नये मुख्यमंत्री का चयन, जिसे मनोनयन कहना अधिक उचित होगा, भी ध्यान देने योग्य है। आनन्दीबेन के त्यागपत्र के ट्वीट होने के दो दिन तक पूरे विधायक दल में कहीं कोई सुगबुगाहट दिखाई नहीं दी, जब तक की पार्टी ने नितिन पटेल को मुख्यमंत्री बनाने के संकेत नहीं दिये। इसके आधार पर उन्होंने भावी मुख्यमंत्री की तरह मीडिया से संवाद भी शुरू कर दिया। मोदी के राज्य में उनके स्थान को भरने वाले व्यक्ति की यह आज़ादी उन्हें पसन्द नहीं आयी और चौबीस घंटे के अन्दर फैसला बदल दिया गया व विजय रूपानी को राजसिंहासन देने की राजाज्ञा को सुना दिया गया। आम तौर पर मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पसन्द को हाईकमान व्यक्त करता जिस पर विधायक दल मुहर लगाता है और फिर मुख्यमंत्री अपने मंत्रिमण्डल का गठन करता है जिसमें उपमुख्यमंत्री भी सम्मलित होता है। उल्लेखनीय है कि उपमुख्यमंत्री जैसा कोई पद संविधान में नहीं है और न ही उसके अधिकार कहीं वर्णित हैं, यह शुद्ध रूप से तुष्टीकरण का पद है। पर उपमुख्यमंत्री का फैसला भी नरेन्द्र मोदी के अभिन्न अमितशाह ने पहले ही कर दिया और नितिन पटेल को पहले से ही मंच पर जगह दे दी गयी। वैसे तो स्वयं विजय रूपानी को भी शपथ लेने के बाद ही राज्यपाल के बगल वाली कुर्सी पर बैठने का अधिकार बनता है किंतु वे भी पहले से बैठे हुए थे। मोदी के राजतंत्र में सारे नियमों और परम्पराओं को बदला जा रहा है।
रूपानी के मनोनयन के बाद वे आनन्दीबेन और नितिन पटेल के साथ दोनों उंगलियों से अंग्रेजी अक्षर ‘वी’ का प्रदर्शन करते नजर आये। ये चिन्ह किसी प्रतियोगिता में मिली जीत पर प्रदर्शित किया जाता है। उक्त आचरण उन खबरों को पुष्ट करता है कि आनन्दीबेन चाहती थीं कि नितिन पटेल को ही उनका उत्तराधिकार मिले किंतु मोदी से फोन पर बात करने के बाद विजय रूपानी का नाम तय हुआ, अर्थात मोदी के वीटो से वे मुख्यमंत्री बने व मीडिया को दिखाने के लिए एक साथ ‘वी’ बनाते नजर आये। 
यह सारा सत्ता परिवर्तन किसी रियासत के सत्ताधीश का अपनी गद्दी को सौंपने जैसा था। कथित गौसेवकों के दुराचरण पर, जिनके कारण यह सारा घटनाक्रम हुआ, बाद में मोदी ने माय गोव एप्प के जारी करते समय प्रतिक्रिया दी। उनकी गोलमोल प्रतिक्रिया के अनुसार गौसेवकों के असंवैधानिक आचरण तो ठीक हैं बशर्ते वे असली गौसेवक हों। अब राज्य सरकारें तय करें कि कौन असली है और कौन नकली है, जबकि सच्चाई यह है कि यह कानून व्यवस्था का मामला है। दूसरी ओर हैदराबाद के एक भाजपा विधायक ने खुले आम दलितों की पिटाई का समर्थन किया है तथा अखलाख की हत्या के मामले में भाजपा नेता हत्यारों के पक्ष में बयान देते रहे हैं। अडवाणी जी ने जिस इमरजैंसी की बात की थी वह भाजपा में निर्विरोध तानाशाही की स्वीकरोक्ति से साफ नजर आने लगी है।   
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, मई 29, 2015

क्या गुजरात एक अलग देश है?

क्या गुजरात एक अलग देश है?
वीरेन्द्र जैन 














जिन महात्मा गाँधी को देश की आज़ादी का सबसे बड़ा सिपाही माना गया है और जिन सरदार वल्लभ भाई पटेल को भारत में राज्यों के विलीनीकरण की महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण देश का सबसे बड़ा आर्कीटेक्ट माना जाता है वे गुजरात के थे, पर उन्होंने कभी सपने में भी स्वतंत्र गुजरात की कल्पना नहीं की होगी। विडम्बना है कि आज देश का प्रधानमंत्री गुजरात का है और देश में सत्तारूढ गठबन्धन के सबसे बड़े दल का अध्यक्ष भी गुजरात का है, फिर भी उनकी दृष्टि बेहद संकीर्ण है।
जब से भाजपा सरकार सत्ता में आयी है तब से आरएसएस अपना एजेंडा लागू करवाने के प्रति बेहद उतावली दिखाई दे रही थी, किंतु मोदी की लोकप्रियता में बहुत तेजी से आयी गिरावट के बाद तो वह साम्प्रदायिक दरार को बड़ी करने के लिए छटपटाने लगी है तथा पार्टी अध्यक्ष समेत सभी मंत्रियों की क्लास ली जाने लगी है। इसी क्रम में देश की हजारों महत्वपूर्ण समस्याओं को छोड़ कर अचानक ही बीफ पर प्रतिबन्ध का शगूफा उछाला गया क्योंकि आम तौर पर मांसाहारी हिन्दू उसी तरह बीफ नहीं खाते जिस तरह मुसलमान सुअर का मांस नहीं खाते। वैसे तो हिन्दुओं में वैष्णवों और जैन आदि किसी भी तरह का मांसाहार नहीं करते यहाँ तक कि इनके कई वर्गों में प्याज, लहसुन आदि खाना भी वर्जित है, पर बीफ का खाना, न खाना सीधा सीधा हिन्दू मुस्लिम, और हिन्दू ईसाई का विभाजन पैदा करता है। कुछ बुद्धिजीवी यदा कदा उनकी योजनाओं के आशयों को उजागर करने के लिए कुछ गम्भीर प्रश्न खड़े करते रहते हैं, सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायधीश मार्कण्डेय काटजू भी उनमें से एक हैं उन्होंने बीफ खाने पर प्रतिबन्ध को साम्प्रदायिक होने से रोकने के लिए बयान दिया था कि मैं बीफ खाता हूं और भोजन का चुनाव मेरा अधिकार है। उनके इस बयान के उत्तर में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने किसी इलाकाई बाहुबली की तरह कहा कि मार्कण्डेय काटजू गुजरात में आकर बीफ खाकर दिखायें तो उन्हें पता चल जायेगा।
उल्लेखनीय है कि देश और भाजपा में अमित शाह का कोई स्वतंत्र कद नहीं है। भाजपा अध्यक्ष पद अपनी जेब में रखने के लिए ही नरेन्द्र मोदी ने उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवा दिया और अपने प्रभाव से कृतज्ञ भाजपाइयों द्वारा स्वीकार भी करा लिया। वे मोदी के प्रतिनिधि के रूप में भाजपा अध्यक्ष हैं। अभी हाल ही में महाराष्ट्र और हरियाणा की भाजपा सरकारों ने बीफ खाने पर प्रतिबन्ध लगाया है जबकि गौबध देश के बहुत सारे राज्यों में प्रतिबन्धित है। अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और अगर वे अपनी पार्टी की ओर से कोई बात कहते हैं तो वह एक राज्य तक सीमित नहीं हो सकती। उल्लेखनीय है कि उन पर जब कुछ गम्भीर आरोप लगे थे तो हाई कोर्ट ने उन्हें गुजरात प्रदेशबदर कर दिया था।
 2013 में देश से गौमांस का निर्यात लगभग पन्द्रह हजार करोड़ था जिसमें पिछले वर्ष 15% की वृद्धि हुयी है। भाजपा शासित गोआ में बीफ पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है और लगाया भी नहीं जा सकता। उत्तर पूर्व से आने वाले मोदी सरकार के गृह राज्य मंत्री ने भी कहा है कि उनके प्रदेश में बीफ खाया जाता है और वे किसी के पसन्द के खान पान पर प्रतिबन्ध के खिलाफ हैं। सुप्रसिद्ध इतिहासकार राम शरण शर्मा ने हिन्दुओं के मान्य पुराणों से उद्धरण देकर साबित किया था कि प्राचीन काल में हिन्दुओं में गौमांस वर्जित नहीं था जिसका प्रतिवाद कभी संघ के इतिहासकार भी नहीं कर सके। जहाँ जो वस्तु कानूनी रूप से प्रतिबन्धित नहीं है उसके स्तेमाल पर देश के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश को धमकी देना क्या देश की सत्तारूढ पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को शोभा देता है? इस धमकी की भाषा भी जब खुद को क्षेत्र विशेष में शेर घोषित करने वाले अन्दाज में हो तो यह क्षेत्रीयवाद से अधिक कुछ नहीं है, जहाँ वे मानते हैं कि वहाँ देश का कानून नहीं उनकी मनमानी चलेगी।
भाजपा को भले ही राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त हो किंतु उसकी मानसिकता कभी भी राष्ट्रीय पार्टी जैसी नहीं रही। हिन्दी- हिन्दू- हिन्दुस्तान के विचार से पल्लवित पुष्पित यह पार्टी सत्ता मिल पाने के प्रति इतनी सशंकित रही है कि उसने कभी नहीं सोचा कि वह जिन झूठे आरोपों और वादों के सहारे जनता के पास समर्थन माँगने जा रही है उनसे सत्ता मिल जाने पर वह उन्हें कैसे पूरा करेगी। अटल बिहारी वाजपेयी ने तो स्पष्ट बहुमत न होने के बहाने समय गुजार लिया था किंतु मोदी सरकार के सामने तो स्पष्ट बहुमत ही समस्या की तरह सामने आ गया। यही कारण रहा कि बहुत सारे मामलों में उन्हें मुँह छुपाना पड़ा, यूटर्न लेना पड़ा, या साठ साल का कचरा साफ करने का बहाना लेना पड़ा। इसी तरह जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने गर्वीला गुजरात जैसा भावनात्मक नारा उछाला था, जो दूसरे राज्यों से प्रशासनिक श्रेष्ठता या औद्योगिक विकास में प्रतियोगिता न दर्शा कर, मराठा, राजपूताना की तरह जातीय श्रेष्ठता को प्रकट करता था। ये जातीय श्रेष्ठताएं देश की एकता के लिए बाधाएं हैं। इसी तरह जब मुख्यमंत्री मोदी का तत्कालीन केन्द्रीय सरकार से मिलने वाले सहयोग पर कुछ असहमतियां बनी थीं तो उन्होंने गुजरात से आयकर न चुकाये जाने की धमकी दे डाली थी। 2013 में जब केदारनाथ में प्राकृतिक आपदा आयी थी तो मोदी ने आपदा स्थल से गुजरातियों को निकाल लेने की शेखियां बघारी थीं जबकि दूसरे किसी राज्य के नेताओं ने आपदा के समय इस तरह की संकीर्णता नहीं दिखायी थी, और पूरे देश ने दिल खोल कर मदद की थी। अभी हाल ही में जब मुम्बई के मैटल व्यापारियों को कुछ समस्याएं आयीं तो मोदी के मित्र अडाणी ने उन्हें गुजरात में आकर व्यापार करने की सलाह ही नहीं दी अपितु उनके लिए अपनी ओर से जमीन भी दे दी। खीझ कर शिवसेना के सहयोग से चलने वाली महाराष्ट्र सरकार के भाजपाई मुख्यमंत्री को भी कहना पड़ा कि क्या अडाणी को महाराष्ट्र में व्यापार नहीं करना है।
जब देश में जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर के राज्य, नक्सलवाद प्रभावित आदिवासी क्षेत्र आदि में अलगाववाद सिर उठाये हुये है और राष्ट्रीय एकता पर संकट बना हुआ है तब देश के शिखर नेतृत्व की संकीर्णता देश को कहाँ ले जायेगी? इतना बड़ा देश ओखली में गुड़ फोड़ते हुए नहीं चल सकता, इसकी विविधता को देखते हुए सरकार को लोकतांत्रिक होना पड़ेगा व नेतृत्व की सामूहिकता का निर्माण करना पड़ेगा। आखिर अरुण शौरी को क्यों कहना पड़ा कि देश को एक तिकड़ी चला रही है। मोदी जनता पार्टी को भाजपा में वापिस लौटते हुए देश की अवधारणा को गुजरात की सीमा से बाहर निकालना पड़ेगा।  
वीरेन्द्र जैन                                                                          
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सोमवार, सितंबर 17, 2012

लोकतंत्र की गाड़ी को अराजकता की ओर ले जाने का प्रयास


                     लोकतंत्र की गाड़ी को अराजकता की ओर ले जाने का प्रयास  
                                                                                  वीरेन्द्र जैन
                आजकल पता ही नहीं चल रहा है कि इस देश में कोई सरकार है भी या नहीं! जिसके मन में जो आ रहा है वह बिना सोचे समझे बोले चला जा रहा है और कुछ लोग तो कानून की परवाह किये बिना उस पर अमल भी करने लगे हैं। पहले कभी खालिस्तान आन्दोलन चलाने वालों ने ऐसा किया था किंतु वे इसे विद्रोह समझ कर ही कर रहे थे और उसका खतरा उठाने के लिए तैयार भी थे, और उठाया भी। तत्कालीन सरकार और प्रधानमंत्री ने एक सीमा तक ही इसे सहा था और फिर अपरेशन ब्लू स्टार किया गया था भले ही उसके लिए देश की लोकप्रिय प्रधानमंत्री को अपनी जान देनी पड़ी हो। अगर कोई संविधान की शपथ लेकर किसी पद पर बैठता है तो उसका दायित्व हो जाता है कि वह संविधान की रक्षा करे। पर बड़े खेद की बात है कि संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए कतिपय लोग हिंसा की धमकियां दे रहे हैं और सरकार लोकतंत्र के नाम पर न देख सुन रही है और न ही कुछ कर रही है, जबकि किसी व्यक्ति के अधिकार उस सीमा तक ही हैं जब तक उसके कामों से दूसरे के अधिकारों का हनन नहीं हो रहा हो।
       पिछले दिनों मुम्बई में राज ठाकरे ने बिहारियों को खुले आम धमकी देते हुए घुसपैठिया कहा और उन्हें महाराष्ट्र से निकाल देने की धमकी दी। यह संविधान में दिये देश के नागरिकों को देश के किसी भी भाग में बसने के अधिकार को खुली चुनौती है और परोक्ष में देश के संविधान को ही चुनौती है। अगर वे ऐसा कुछ करने की कोशिश करते हैं तो यह काम वे अपने बाहुबलियों की दम पर करेंगे अर्थात उनकी सेना देश और संविधान की रक्षा के लिए नियुक्त सशस्त्र बलों से टक्कर लेगी। वैसे तो उन्होंने अपने दल का नाम महाराष्ट्र नवनिर्माण ‘सेना’ ही रख छोड़ा है और वे जिस दल से निकल कर आये हैं, उसका नाम भी शिव ‘सेना’ है जो उनकी इस धमकी का मौखिक समर्थन कर रही है। शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे भी जिस भाषा में बात करते हैं वह किसी लोकतांत्रिक समाज की भाषा नहीं है। अभी हाल ही में उन्होंने कहा कि वे पाकिस्तानी क्रिकेटरों को यहाँ नहीं खेलने देंगे। यह भाषा किसी तानाशाह की भाषा है। उन्हें किसी भी विषय पर आन्दोलन करने और सरकार को विवश करके उसको बातचीत के लिए सहमत करने का अधिकार तो है किंतु एक निर्वाचित संस्था द्वारा लिए गये फैसले के विरुद्ध धमकी की भाषा में बात करने का मतलब पूरी व्यवस्था को चुनौती देना होता है।  किसी भी संप्रभुदेश में एक ही सेना हो सकती है और ये दूसरी सेनाएं एक राजनीतिक दल की जगह एक सेना की तरह ही काम कर रही हैं और भारतीय सेना को चुनौती देती सी लगती हैं। इन दलों में दूर दूर तक आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। स्मरणीय है कि उन्होंने कुछ ही दिन पहले मुस्लिमों के एक संगठन द्वारा मुम्बई में की गयी हिंसा के खिलाफ एक बड़ी और शांत रैली निकाली थी जिसकी सबने प्रशंसा की थी। किसी भी लोकतंत्र में असहमत होने और संविधान में वांछित परिवर्तन के लिए सदन और सदन से बाहर मांग उठाने का अधिकार तो है किंतु जब तक वैसा परिवर्तन नहीं हो जाता तब तक तत्कालीन संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार ही चलना पड़ेगा, और इसका खुले आम उल्लंघन अपराध की श्रेणी में आता है। खेद है कि कुछ दल या संगठन इस तथ्य को भुला कर मनमानी करने लगते हैं। पिछले दिनों मुस्लिमों के कुछ संगठनों ने मुम्बई, लखनऊ, इलाहाबाद, आदि जगहों पर जो दृष्य उपस्थित किया उन सब को ठीक ही कानून के दायरे में लाया गया है और समुचित कठोर कार्यवाही अपेक्षित है। पर, क्या राज ठाकरे के बयानों पर सरकार चुप बैठी रहेगी? 1993 में हुए दंगों पर श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट पर सरकार ने अब तक कार्यवाही न करके कानून व्यवस्था तोड़ने वालों के हौसले बढाये हैं। बिडम्बनापूर्ण यह है कि यही सरकार एक कार्टूनिस्ट को सरकार के विरोध में एक बैनर टांगने पर देश द्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लेती है।
       गुजरात में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एक चुनी हुयी सरकार काम कर रही है। 2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रैस की बोगी संख्या 6 में घटित आगजनी के बाद सरकार द्वारा संरक्षित जो नरसंहार घटित हुआ उसके बाद नरेन्द्र मोदी को वहाँ शासन करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं रह गया था। पूरे देश व भाजपा को छोड़ कर देश की सभी राजनीतिक पार्टियों ने उनके आचरण की तीव्र निन्दा की पर उनकी सरकार को भंग करने की माँग नहीं की और लोकतंत्र के हित में उन्हें सहन करते आ रहे हैं, क्योंकि राज्य की जनता ने उन्हें आम चुनावों में बहुमत दिया है। दूसरी ओर एक विवादास्पद संत वेष में रहने वाला व्यापारी उन्हें सरेआम चुनौती देता है कि अगर उसे सोमनाथ में अपना तम्बू नहीं गाड़ने दिया गया जिसे वह सत्संग का नाम देता है तो वह मोदी सरकार को उखाड़ फेंकेगा। उल्लेखनीय है कि सम्बन्धित के आश्रम में दो बच्चों की सन्दिग्ध मृत्यु के बाद स्थानीय लोग उसके तम्बू गाड़ने का विरोध कर रहे थे और आपसी संघर्ष की आशंका के कारण अनुमति नहीं दी गयी थी। क्या किसी चुनी हुयी सरकार को उखाड़ फेंकने की धमकी देना किसी अपराध का हिस्सा नहीं है, भले ही वह एक बाबा की वेषभूषा में विचरण करता हो ?   
        कोर्ट द्वारा गुजरात सरकार की एक मंत्री को अपने क्षेत्र में कराये गये नरसंहार के लिए अपराध के बारह साल बाद सजा दी गयी है। उल्लेखनीय है कि इस दौरान मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सब कुछ जानते हुए भी न केवल उसे विधायक के लिए टिकिट दिया अपितु चुने जाने के बाद मंत्री भी बनाया। सजा मिलने के बाद विश्व हिन्दूपरिषद के स्वयंभू अध्यक्ष तीन सौ भगवा वेषधारियों के साथ फैसले के विरोध में प्रदर्शन करते हैं और उन पर अदालत की अवमानना का कोई प्रकरण दर्ज नहीं होता। ऐसा लगता है कि कुछ संगठन धर्म के नाम पर लोकतांत्रिक समाज की सभी महत्वपूर्ण संस्थाओं को ठेंगे पर रख रहे हैं। इसी संघ परिवार की राजनीतिक शाखा भाजपा ने कोयला के ब्लाक आवंटन पर आयी सीएजी रिपोर्ट के नाम पर संसद नहीं चलने दी। भाजपा देश का दूसरा बड़ा राजनीतिक दल है और उसके समुचित संख्या में सदस्य बताये जाते हैं, पर एक जनान्दोलन करने की जगह उन्होंने संसद नहीं चलने दी जो बहस और विमर्श का मंच है। ऐसा उन्होंने पहली बार किया हो ऐसा भी नहीं है अपितु गत पाँच साल में उन्होंने जनता के बीच जाने की जगह सदैव ही संसद में गतिरोध उत्पन्न किया है। ऐसा लगता है कि वे तय किये बैठे हैं कि जब तक सत्ता उन्हें नहीं मिलती तब तक वे लोकतंत्र की सारी संस्थाओं को नहीं चलने देंगे। सेना और पुलिस के सेवानिवृत्त कर्मियों को दल में शामिल करने की उन्होंने गुप्त मुहिम चला रखी है जिसके कारण उनके सदस्यों में ऐसे लोगों की संख्या बहुत है। वे न्यायिक फैसलों और विभिन्न आयोगों की जाँच रिपोर्टों को तभी मानते हैं जब वे उनके पक्ष में होती हैं अन्यथा उनका विरोध करते हैं। प्रशासन को भ्रष्ट करने में इनके द्वारा शासित राज्यों के मंत्रियों ने संकल्प ले रखा है तथा ईमानदार अधिकारियों की गलत पदस्थापना के द्वारा वे उन्हें सबक सिखाते रहते हैं।
       पंजाब में भाजपा की गठबन्धन वाली अकाली दल की सरकार है और यह सरकार प्रदेश के एक मुख्यमंत्री की हत्या के आरोप में सजा पाये व्यक्ति की फाँसी की सजा को माफ करवाने के लिए जोर डालती है और उसे ज़िन्दा शहीद घोषित करती है। बंगाल की मुख्यमंत्री केन्द्र सरकार के निर्देश के बाद भी बंगलादेश जाने से इंकार कर देती हैं और देश हित के कुछ महत्वपूर्ण फैसले नहीं हो पाते। गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी यदा कदा केन्द्र को कोई टैक्स न चुकाने की धमकी देते रहते हैं। जम्मू कश्मीर राज्य, जो निरंतर सेना की सुरक्षा में है, की सरकार तो अलगाववादियों के दबाव में कभी भी कुछ भी कहती रहती है, जो देश के हितों के विपरीत भी चला जाता है।
       कुल मिला कर कह सकते हैं कि अलगाववादी, नक्सलवादी, क्षेत्रवादी, भाषावादी, आरक्षणवादी, धार्मिक कट्टरपंथी ही नहीं अपितु पंजीकृत राष्ट्रीय दल भी ऐसे आचरण कर रहे हैं जिससे संविधान और देश की सुरक्षा पर गम्भीर खतरा महसूस किया जा रहा है। ऐसी ही स्थितियां कठोर शासन की माँग बना देती हैं जो प्रारम्भ में तो राहत देता हुआ सा लगता है पर बाद में निरंकुश, स्वार्थी और दमनकारी होने लगता है, और अंत में आंतरिक संघर्ष की स्थितियां ला देता है। इसलिए जरूरी है कि देश के सभी राजनीतिक दल अपने आचरणों को संविधान के दायरे तक सीमित करके चलें। जो दल और उसके नेता निजी स्वार्थ में इस अराजकता को पैदा कर रहे हैं उन्हें शायद इसके दुष्परिणाम की कल्पना नहीं है।   
वीरेन्द्र जैन
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शनिवार, सितंबर 15, 2012

मोदी का अहंकार रावण के समतुल्य हो गया है


                     मोदी का अहंकार रावण के समतुल्य हो गया है  
वीरेन्द्र जैन
       नरेन्द्र मोदी द्वारा गुजरात का शासन सम्हालते ही भाजपा का पराभव शुरू हो गया था और गुजरात में व्यक्ति मोदी ने पार्टी भाजपा का स्थान लेना शुरू कर दिया था। गुजरात, देश के दूसरे, विशेष कर गोबरपट्टी [काऊ बेल्ट] वाले, राज्यों की तुलना में शांति प्रिय राज्य रहा है जिसे दूसरे शब्दों में बनिया राज्य कहा जा सकता है। एक आम गुजराती का सारा ध्यान व्यापार बढाने और धन कमाने में लगा रहता है, इसलिए वह कोई लफड़ा पसन्द नहीं करता।  गुजरात के एक पत्रकार मित्र ने बताया कि वैसे तो गुजरात के मुसलमान भी आम गुजराती की तरह व्यापार में रुचि रखने वाले लोग हैं, किंतु प्रदेश में जितने भी असामाजिक तत्व रहे हैं उनमें मुसलमानों की संख्या अधिक रही। ये असामाजिक तत्व शांति पसन्द लोगों को अपनी हिंसक शक्ति और दुस्साहस से डराते धमकाते रहे हैं और एक तरह के आतंक का वातावरण बनाते रहे हैं। परिणाम यह हुआ कि अपनी अलग पहचान बनाने के लिए एक जैसा स्वरूप धारण करने वाली पूरी मुस्लिम कौम कुछ लोगों के कारण बदनाम हो गयी। 1969 में अहमदाबाद में हुए साम्प्रदायिक दंगों और 2002 में पूरे गुजरात में हुए मुसलमानों के नरसंहार ने भाजपा को खाद पानी देकर बढाया है। पूरी कौम के प्रति नफरत या दूरी का वह बीज वहाँ सहज ही उग आया था जिसे दूसरे स्थानों पर भाजपा को जबरन बोना पड़ता है। कांग्रेसी सरकारों ने भी साम्प्रदायिकता के विरोध के नाम पर सबसे स्पष्ट और मुखर हिन्दू साम्प्रादायिकता का जिस तरह विरोध किया उससे संघ परिवारियों को उन्हें मुस्लिम पक्षधर प्रचारित करने में आसानी हो गयी और अफवाहों से जनित नफरत रखने साधारण लोगों ने संघ परिवारियों को ही तारणहार मान लिया। यही कारण रहा कि गान्धी के गुजरात में भाजपा की जड़ें जम गयीं और कांग्रेस कमजोर होती गयी। दूसरी ओर 1991 से नई आर्थिक नीतियाँ लागू होने से हुए परिवर्तनों से लाभ लेने के प्रति गुजराती समाज स्वाभाविक रूप से संवेदनशील साबित हुआ, जिससे वहाँ औद्योगिक विकास का ग्राफ ही नहीं बढा, अपितु औद्योगिक विकास ही विकास का मानदण्ड बनता गया। आज गुजरात में सरकारी सहयोग से औद्योगिक लाबी इतनी सशक्त है कि श्रमिकों के संगठनों को सिर उठाने का भी अवसर नहीं मिलता। इसे ज़ीरो लेबर अनरेस्ट स्टेट कहकर प्रचारित किया जाता है।  
       सामंती सोच वाले समाज में शत्रु का संहार करने वाले को नायक मानने की परम्परा है और ऐसी ही धार्मिक पौराणिक कथाएं भी हैं। मासूम लोगों के दिमागों में पूरी मुस्लिम कौम के प्रति नफरत बोने का जो काम संघ परिवार के विभिन्न संगठन निरंतर करते रहते हैं उसे अवसर आने पर सहज रूप से भुना लेते हैं। 27 फरबरी 2002 को गोधरा रेलवे स्टेशन के पास साबरमती एक्सप्रैस की बोगी नम्बर 6 में हुयी आगजनी को
“ रामभक्तों/ कारसेवकों से भरी पूरी ट्रैन में मुसलमानों द्वारा आग लगा देने” की अफवाह फैलाने में वे सफल रहे जिसने पूर्व से संवेदनशील बना दिये गये जनमानस को क्षोभ से भर दिया था। इसी का परिणाम था कि गुजरात सरकार द्वारा प्रेरित व संरक्षित बाहुबलियों ने जो कुछ किया उसके प्रति समाज के कुछ हिस्सों से उन्हें समर्थन मिला जो बाद में आम चुनावों के परिणामों में प्रकट भी हुआ। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस जनता को यह बता पाने में असफल रही कि पूरी ट्रैन में आग नहीं लगी थी अपितु एक बोगी संख्या 6 में आग लगी थी। अगर इस सच को वे पहुँचा पाते तो संवेदनशील लोगों को पता चलता कि एक बोगी में किसी खास व्यक्ति या व्यक्ति समूहों को ही लक्षित किया गया था और उस हमले का पूरी ट्रैन में सवार कारसेवकों से कोई मतलब नहीं था। यह सम्भव कर देने पर पूरी घटना को जो साम्प्रदायिक रूप दे दिया गया था वह बदल जाता। पर कांग्रेस के पास सच बताने का कोई वैसा तंत्र नहीं है जबकि साम्प्रदायिकों के पास निरंतर दुष्प्रचार का एक बड़ा तंत्र मौजूद है। यदि वे सच बता पाते तो इस सच को जानकर भी लोगों की आँखें खुल जातीं कि इस आगजनी में मरने वाले 59 लोगों में से कारसेवकों की संख्या केवल दो थी जो इस बात का प्रमाण होता कि इस नृशंस घटना को अंजाम देने वाले अपराधियों का अयोध्या गये  कार सेवकों पर हमला करने का कोई इरादा नहीं था। अगर ऐसा हुआ होता, जो होना चाहिए था, तो लोगों की नाराजी कानून और व्यवस्था ठीक से न सम्हालने वाली राज्य सरकार या रेलवे पुलिस के प्रति होती न कि दूसरे समुदाय के मासूम लोगों के प्रति। तब लोग यह भी सोचते कि अगर हमलावरों का गुस्सा कार सेवकों के खिलाफ होता तो वे अयोध्या जाने वालों पर हमला करते न कि वहाँ से लौट कर आने वालों पर। पर यह सम्भव नहीं हुआ और एक षड़यंत्रकारी राष्ट्रव्यापी संगठन ने गुजरात राज्य में न केवल एक बड़ा नरसंहार ही किया अपितु दुष्प्रचार के सहारे उसका राजनीतिक लाभ भी उठाया।
       गुजरात में हुए नरसंहार पर गैर भाजपा दलों ने एक और भूल की कि उन्होंने अपना पूरा विरोध वहाँ के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को केन्द्रित कर के किया जबकि इसमें पूरा संघ परिवार ही सम्मिलित था। परिणाम स्वरूप साम्प्रदायिकता के प्रति संवेदनशील समाज के हिस्सों में मोदी अकेले ही नायक/खलनायक हो गये। उस समय पूरी भाजपा एक साथ मोदी के पक्ष में एकजुट हो गयी थी तथा देश के तत्कालीन गृहमंत्री अडवाणी हर कदम पर मोदी की वकालत करने लगे थे। औद्योगिक घरानों से जुड़ी सेठाश्रित पत्रकारिता का मुँह बन्द रखने के लिए तत्कालीन केन्द्र सरकार और गुजरात सरकार ने विज्ञापनों की बाढ ला दी थी जिससे सच का एक बड़ा हिस्सा लोगों तक नहीं पहुँच सका था। दूसरी ओर अधिकांश राजनीतिक दल हतप्रभ थे, एनडीए के कई दल साथ छोड़ गये थे व विपक्ष की आलोचना से घबरा कर अटल बिहारी वाजपेयी ने स्तीफा देने का मन बना लिया था जो जसवंत सिंह के हस्तक्षेप से रुका था, जिसका खुलासा उन्होंने पार्टी से न्काल दिये जाने के बाद किया था। जितने बड़े स्तर पर मोदी का राजनीतिक विरोध हुआ उतने ही बड़े स्तर पर संघ परिवार उनके प्रति रक्षात्मक हुआ जिससे पार्टी और गुजरात के बहुसंख्यक समुदाय में मोदी का कद और महत्व बढा।
       जब केन्द्र की अटल बिहारी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार से लेकर भाजपा की दूसरी राज्य सरकारें आर्थिक भ्रष्टाचार में डूबी हुयी थीं तथा उनके कारनामे दिन प्रतिदिन प्रकाश में आ रहे थे तब गुजरात से ऐसी खबरों का अकाल रहा। जब देश में भ्रष्टाचार प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनकर उभर रहा था तब मोदी और उनके मंत्रिमण्डल पर भ्रष्टाचार के आरोप कम से कम लगे। अटलबिहारी वाजपेयी की अस्वस्थता और लालकृष्ण अडवाणी के ज़िन्ना प्रशंसा प्रकरण के बाद जिस तरह से उन्हें अपमानित करके अध्यक्ष पद से हटाया गया उससे उनका कद घट गया था। जब उनको प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी बनाने का कार्ड भी नहीं चल सका और उम्र लगातार बढती जा रही थी तब भाजपा में शिखर नेतृत्व पर शून्य निर्मित होने लगा। संघ ने भाजपा के अध्यक्ष पद पर जब गडकरी जैसे सामान्य कद के नेता को थोप दिया और निर्विरोध रूप से उनका कार्यकाल पूरा ही नहीं करवाया अपितु एक कार्यकाल और बढवाने के लिए पार्टी संविधान में संशोधन भी करवा दिया तब शिखर के शून्य को भरने के लिए विख्यात और कुख्यात नरेन्द्र मोदी ने स्वय़ं को प्रस्तुत करने का विचार बनाया जिसे चन्द पूंजीपतियों और औद्योगिक घरानों ने हवा दी। अब नरेन्द्र मोदी स्वयं को भाजपा और संघ से भी ऊपर समझने लगे हैं। वे संघ की इच्छा के विपरीत संजय जोशी को पार्टी से निकलने को मजबूर कर देते हैं, प्रवीण तोगड़िया की परवाह नहीं करते, भाजपा के हित में काम करने वाले आशाराम बापू और उनके बेटे के नाम वारंट निकलवा देते हैं, उनके विरोधी हरेन पंड्या की हत्या हो जाती है, नरसंहार के बदनाम आरोपियों को मंत्री पद देते हैं, असहमत सरकारी अधिकारियों को नौकरी छोड़ना पड़ती है, उनसे असहमत जिसकी भी हत्या हो जाती है उसे वे आतंकी घोषित करवा देते हैं, अल्प संख्यक आयोग, महिला आयोग, मानव अधिकार आयोगों की उन्हें परवाह नहीं है, मुख्य चुनाव आयुक्त लिंग्दोह की अश्लील प्रतीकों से निन्दा करते हैं तथा अपने अहं में गुजरात के सभी वरिष्ठ नेताओं को पार्टी छोड़ कर दूसरी पार्टी बनाने को मजबूर कर देते हैं। न वे पार्टी में किसी की परवाह करते हैं और न ही पार्टी के बाहर संवैधानिक संस्थाओं की। पौराणिक कथाओं से प्रतीक लें तो उनका अहं रावण जैसा अहं हो गया है। उनकी पार्टी में भी अब न वे किसी नेता पर भरोसा करते हैं और न कोई बडा नेता उन पर भरोसा करता है। पार्टी में जो उनसे सहमत नहीं है वह उनका दुश्मन है। सम्भावना यही है कि यदि  उन्होंने बड़ी ज़िम्मेवारी के लिए प्रत्याशी बनने की ज़िद ठानी तो पार्टी में महाभारत  होना तय है।   
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629
   

बुधवार, जुलाई 11, 2012

आपका कथन सच नहीं है अडवाणीजी


आपका कथन सच नहीं है अडवाणीजी 

वीरेन्द्र जैन
       

 आदरणीय अडवाणीजी देश के सवसे चतुर नेताओं में से एक हैं और बहुत ही सही समय पर कूटनीतिक कदम उठाते हैं. वे कई बार ऐसे मुद्दे छेड़्ते हैं जिस पर आयी तीव्र प्रतिक्रिया का वार उनके प्रतिद्वन्दी को झेलना पड़्ता है. पिछले दिनों अडवाणीजी ने भाजपा में प्रधानमंत्री पद के अपने प्रतिद्वन्दी नरेन्द्र मोदी के पक्ष में बयान देते हुए गोलमाल तरीके से कहा कि जितना गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को बदनाम किया गया उतना इतिहास में किसी को नहीं किया गया. वैसे तो यह बयान उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की किताब की चर्चा करते हुए कहा है कि श्री कलाम का यह कथन गलत है कि मोदी 2002 में गुजरात में हुई हत्याओं के बाद उनकी यात्रा के पक्ष नें नहीं थे, क्योंकि वे उनको लेने एयरपोर्ट पर गये और जहाँ जहाँ वे गये उनका साथ दिया और सहयोग भी किया.  अडवाणीजी खुद जानते हैं कि यह तर्क कितना लचर है क्योंकि राष्ट्रपति की यात्रा के समय सम्बन्धित प्रदेश के मुख्यमन्त्री का एयरपोर्ट पर जाना और उनके सरकारी कार्यक्रमों में साथ रहना प्रोटोकाल के अंतर्गत अनिवार्य है. उस तरह साथ रहने से मोदी के किये काम धुल नहीं जाते.
       गुजरात के गान्धीनगर से संसद में पहुँचने वाले अडवाणीजी का यह कहना कि सोची समझी साजिश और राजनीति के तहत मोदी पर हमला किया जा रहा है, एक चतुराई भरा बयान है जिसे चालाकी भरा बयान भी कहा जा सकता है. सब जानते हैं कि गुजरात के गोधरा में साबरमती एक्सप्रैस की बोगी संख्या 6 में लगी आग और उसमें दो कारसेवकों समेत 59 व्यक्तियों के जल जाने के बाद पूरे गुजरात में सरकारी संरक्षण में मुसलमानों का नरसंहार हुआ था, उस समय प्रधान मंत्री तो छोड़ दीजिए, नरेन्द्र मोदी पूरी तौर पर गुजरात के मुख्यमंत्री कद के नेता भी नहीं बने थे. जब अक्टूबर 2001 में सीधे मुख्यमंत्री पद पर श्री मोदी अवतरित हुये तब विधानसभा चुनावों के लिए कुल एक वर्ष का समय शेष था और उस समय गुजरात में भाजपा की लोकप्रियता का ग्राफ बहुत नीचे जा चुका था. यही कारण था कि केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री पद से हटा कर संघ के कुशल प्रचारक व समाज में ध्रुवीकरण पैदा करने में कुशल श्री नरेन्द्र मोदी को किसी भी तरह चुनाव जीतने के लिए आजमाया गया था. उस समय भाजपा की लोकप्रियता का हाल यह था कि विधायकों के रिक्त पद भरने के लिए चार विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव हुये थे जिनमें से तीन में कांग्रेस उम्मीदवार जीते थे और चौथे में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जीते थे. यह जानना रोचक होगा कि मुख्यमन्त्री रहते हुए भी मोदी की जीत उस विधायक की जीत से आधे से भी कम मतों से हुयी थी जिससे मोदी के लिए सीट खाली करवाई गयी थी. कहने का अर्थ यह है कि मोदी को “जानबूझ कर” बदनाम करने का कोई कारण नहीं था, क्योंकि उनके प्रधानमंत्री तो क्या अगला मुख्यमंत्री बनने के बारे में भी कोई सोच भी नहीं सकता था, सच तो यह है कि श्री अडवाणीजी की रथयात्रा के दौरान भी जो हिंसा की घटनाएं हुयीं वे किसी भी तरह से कम भयावह नहीं थीं तथा बाबरी मस्ज़िद को तोड़ने के बाद मुम्बई में जो बम विस्फोट और दंगे हुए वे भी उतने ही भयंकर थे और उनका क्षेत्र अनेक राज्यों तक फैला हुआ था, ऐसा लगता है कि श्री अडवाणी. अपने प्रधानमंत्री पद प्रतियोगी के गुजरात में घटित नरसंहार को बड़ा बता कर अपने कारनामों को घटाने का खेल खेल रहे हैं, जबकि धर्मनिरपेक्ष शक्तियों ने हमेशा ही साम्प्रदायिकता का विरोध किया है चाहे वह 1992 की हो या 1984 की।
       स्मरणीय है कि मुख्यमंत्री बनने और गुजरात में मुसलमानों का नरसंहार घटित होने देने के बाद भी मोदी का व्यवहार किसी की बात पर ध्यान न देने वाले बजरंग दल के बाहुबली की तरह रहा है. उल्लेखनीय है कि संघ परिवार में संघ प्रचारक, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंगदल, भारतीय मजदूर संघ आदि 62 से अधिक संगठनों के लिए जो चयन किया जाता है उसमें बौद्धिक स्तर की विशेष भूमिका होती है. उक्त सभी संगठनों में काम लर चुके श्री मोदी ने घटनाओं के बाद मृतकों के परिवारों हेतु जो मुआवजा घोषित किया उसमें साबरमती एक्सप्रैस की बोगी नम्बर 6 में मारे गये लोगों लिए दो लाख और शेष गुजरात में मरने वालों में जिनकी लाशें मिल गयीं उनको एक एक लाख का मुआवजा घोषित किया जबकि दोनों ही मामलों में गर्वीले गुजरात के निर्दोष लोग ही मारे गये थे, अंतर केवल इतना था कि वे लोग जिस परिवार में जन्म लेने को विवश हुए थे उसी के धर्म को अपने नाम के साथ जोड़्ने लगे थे. उसी दौरान जब भारत ने ट्वेन्टी-ट्वेन्टी में विश्व कप जीता तथा राज्य सरकारों ने खिलाड़ियों को करोड़ों रूपयों के धन से पुरस्कृत कर अपनी राष्ट्रीय भावना को व्यक्त किया तब मोदी जी ने अपने भरे पूरे क्रिकेट प्रेमी राज्य के खिलाड़ियों को कुल एक एक लाख रूपये देने की घोषणा की क्योंकि उनके राज्य से खेलने वाले खिलाड़ियों के नाम इरफान पठान और यूसुफ पठान थे।
       नरेन्द्र मोदी ने हत्यारों के पक्ष नें खड़े होते हुए कहा था कि प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है जबकि यह स्पष्ट था कि शेष गुजरात में मारे गये और दूसरे दूसरे रूप में प्रताड़ित लोगों का गोधरा में घटित घटना से कोई सम्बन्ध नहीं था. जब इस तरह निर्मित ध्रुवीकरण का लाभ उठाने के लिए मोदी तुरंत चुनाव कराने के पक्षधर थे और चुनाव आयोग कानून और व्यवस्था के अनुसार चुनाव की तिथि को आगे बढाना चाहता था तब श्री मोदी तत्कालीन चुनाव आयुक्त लिंग्दोह के खिलाफ अनर्गल और अश्लील बयान देने पर उतर आये अपितु यह भी कहा कि यह सब कुछ वे सोनिया गान्धी के इशारे पर कर रहे हैं जिनसे शायद वे चर्च में मिलते होंगे. इतना ही नहीं  अडवाणी ने इसी दौरान उन्हें पिछले पचास साल का सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री बतलाया और अपने कारनामों पर उन जैसे नेता से शह पा अपनी चुनावी यात्राओं में श्रीमती सोनिया गान्धी और राहुल गान्धी को जर्सी गाय और बछड़ा कह कर सम्वोधित किया. उन्होंने मुसलमानों पर पाँच पत्नियाँ रखने और पच्चीस बच्चे पैदा करने का आरोप भी लगाया. सच तो यह है कि जब इस मामले पर राजधर्म पालने की सलाह देने वाले अटलजी त्यागपत्र देने वाले थे तब जसवंत सिंह ने उन्हें हाथ पकड़ कर रोका था. क्या अडवाणीजी अटलजी को भी मोदी की बदनामी करने वालों में सम्मलित करना चाहेंगे. इन घटनाओं के बाद ही एनडीए का पतन शुरू हो गया था और रामविलास पासवान, ममता बनर्जी, चन्द्रबाबू नायडू, फारूख अब्दुल्ला समेत उनके तमाम सहयोगी दलों के लोगों ने खुली आलोचना की थी व जनतादल(यू) बीजू जनता दल आदि भी खुल कर साथ नहीं दे पा रहे थे। आइ ए एस अधिकारी शर्म के मारे अपने पद से स्तीफा देने लगे थे व सारी दुनिया में थू थू हो रही थी। यह बदनामी नहीं सबकी सच्ची भावना थी.
       अडवाणीजी जिसे ऐतिहासिक बदनामी कह कर उस बदनामी को उकेरना चाहते हैं वह एक कटु सच्चाई है, जिसे अमेरिका और इंगलेंड जैसे देशों ने वीसा देने से इंकार करके संकेत दिया था. वे यह भूल रहे हैं कि मोदी ने सारे बड़े नेताओं के कहने के बाद भी अपने मंत्रि मण्डल के सदस्य रहे हरेन पंड्या को टिकिट नहीं दिया था, और बाद में उनकी हत्या हो गयी थी. उनके शोक में घर गये अडवाणीजी के सामने ही हरेन पंड्या के पिता ने चीख चीख कर मोदी को हत्या के लिए जिम्मेवार ठहराया था, क्या यह बदनामी के लिए था. मोदी के मंत्रिमण्डल को सुशोभित करने वाली महिला मंत्री को जेल जाना पड़ा और केबिनेट मंत्री को प्रदेश से बाहर होना पड़ा क्या ये भी अदालत ने उनकी बदनामी के लिए किया था? मोदी के सबसे विश्वस्त पुलिस अधिकारी को इशरत हत्याकांड में जेल भेजा जाना क्या किसी षड़यंत्र का हिस्सा है जबकि एक आईपीएस अधिकारी अपनी नौकरी और जान का खतरा मोल लेकर भी कह रहा है कि उसे 2002 में हत्यारों और लुटेरों के प्रति नरमी बरतने के निर्देश बैठक में दिये गये थे.
       महिला आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, मानव अधिकार आयोग आदि आदि सैकड़ों संगठनों, जाँच समितियों समाचार पत्रों, सूचना माध्यमों, राजनीतिक दलों की रिपोर्टों की बात तो छोड़ ही दीजिए उनके अपने संजय जोशी और तोगड़िया भी क्या मोदी को बदनाम करना चाहते हैं या दरी के नीचे बहुत सारी गन्दगी दबी है. एक बार यह मान भी लिया जाये कि मोदी  और उनके लोग कोई जिम्मेवार नहीं थे तो एक प्रदेश के मुख्यमंत्री होने के नाते क्या अपने प्रदेश के निर्दोष लोगों के मारे जाने, घर उजाड़े जाने, धन सम्पत्ति और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को लूट कर बरबाद कर देने के बारे में आपको चिंता क्यों नहीं हुयी? इसके विपरीत कमजोर अभियोजन के कारण आरोपियों के छूट जाने पर खुशियाँ क्यों मनायी गयीं? 
       नीतीश कुमार और शिव सेना का बयान एक बार को हथकण्डा भी हो सकता है पर, क्या केशुभाई पटेल, काशीराम राणा, सुरेश मेह्ता, गोरधन झड़पिया आदि सभी गलत हैं जो कह रहे हैं कि मोदी के शासन काल में एक लाख करोड़ से अधिक के 17 घोटाले हुए हैं.               
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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मोबाइल 9425674629

शुक्रवार, सितंबर 16, 2011

मोदी को जनता की ओर से उनके पत्र का उत्तर

मोदी को जनता की ओर से उनके पत्र का उत्तर

                                                      वीरेन्द्र जैन 
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प्रिय मोदीजी
मुख्यमंत्री गुजरात राज्य
महोदय,
      आपका पत्र मिला।
      आपके ऊपर लगे आरोपों की सुनवाई को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को यह कहते हुए वापिस कर दिया है कि इसकी सुनवाई वहीं स्थानीय कोर्ट में ही होगी। इस फैसले से आप फूले नहीं समा रहे हैं, यहाँ तक कि आपने अन्ना हजारे की नकल में तीन दिन का उपवास करने की घोषणा भी कर दी है ताकि चर्चा में आपकी ही बात रहे। इसी प्रचार के लिए आपने प्रदेश की जनता के नाम एक पत्र लिख कर उसे देश भर के अखबारों को उपलब्ध करवा दिया है क्योंकि आपके कारनामों की ख्याति न केवल पूरे देश में है अपितु अमेरिका और इंगलेंड तक आपके दर्शन नहीं करना चाहते इसलिए आपको वीजा देने से इंकार कर देते हैं। चूंकि आपने जनता के नाम पत्र लिखा है सो जनता भी आपको उसका उत्तर देना जरूरी समझती है क्योंकि जनता कोई सरकार तो होती नहीं है कि वह पत्रों को दबा कर बैठ जाये और हाँ या ना कुछ भी न कहे।
महाशयजी,
  • इस जनता का कहना है कि उसकी समझ में यह फैसला आपके पक्ष में नहीं अपितु गुजरात के ट्रायल कोर्ट के पक्ष में है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने निष्पक्ष मानते हुए कहा है कि वह सही फैसला करने में सक्षम होगी। पर हमें समझ में नहीं आता कि आपको ऐसा क्यों लग रहा है कि जीत आपकी हुयी है और आप गुजरात कोर्ट से बाइज्जत बरी ही हो जायेंगे। जनता को आशंका है कि ऐसा करके कहीं आप अदालत की मानहानि तो नहीं कर रहे!
  • आपका कहना है कि पिछले दस वर्षों से मुझे और गुजरात को सरकार को बदनाम करना फैशन बन गया था। पर महोदय गोधरा में साबरमती एक्सप्रैस की बोगी संख्या 6 में लगी आग के बाद एक ही समाज के जो तीन हजार लोग मार डाले गये थे, वे क्या आपको और आपके नेतृत्व में चलने वाली सरकार को बदनाम करने के लिए उड़ायी गयी खबर थी या सचमुच ही वैसा हुआ था। एक ही समुदाय के लगभग एक हजार लोगों का नरसंहार तो सरकार ने खुद ही माना है तथा लगभग दो हजार लोगों का अभी तक कोई पता नहीं है। इसके लिए सरकार की कमजोर जाँच और कमजोर अभियोजन के चलते अब तक किसी को कोई सजा नहीं मिली है और हत्यारे खुले आम आतंक फैलाते घूम रहे हैं।
  • उपरोक्त घटना के बाद क्रिया की प्रतिक्रिया का सन्देश आपका ही था और प्रतिक्रिया में एक ही समुदाय के घरों और दुकानों को लूटा गया था उनमें आग लगा दी गयी थी, बलात्कार ही नहीं हुए थे, अपितु पेट फाड़ कर त्रिशूल से गर्भ के बच्चे को निकाल कर भी छेद दिया गया था। अपने घर को बन्द करके छुप गये लोगों के घर में पानी भर के उसमें करेंट छोड़ दिया गया था। इन घटनाओं को कोई कितनी भी विनम्रता से लिखे, पर किसी के भी खिलाफ सजा न पाने से सरकार की नेकनामी तो नहीं हो सकती। हो सकता है कि आप और आपके लोगों पर लगाये गये आरोप गलत हों और गवाहों को निर्भय, तथा सबूतों को निर्दोष मान कर अदालतें आपको मुक्त कर दें किंतु इतनी बड़ी संख्या में एक ही समुदाय के लोगों के नरसंहार के किसी भी अपराधी को सजा नहीं मिलेगी तो जनता केरल के सरकार को दोष देने तो नहीं जायेगी। दोष तो उसी सरकार को दिया जायेगा जिसका नेतृत्व आप कर रहे हैं।
  •  आप इस फैसले से अपने ऊपर लगे आरोपों पर खतरा कम हो जाने की कल्पना से मुदित हैं और सुषमा स्वराज से बधाइयाँ पा रहे हैं पर इस अवसर पर आपको शर्म क्यों नहीं महसूस हो रही कि गुजरात में ये कैसा शासन है कि आपके राज्य में इतने बड़े बड़े नरसंहार भी हो रहे हैं और दस साल तक किसी को सजा भी नहीं मिल रही।
  • आप पर जब भी आँच आती है तब तब आप उसे गर्वीले गुजरात और उसकी पाँच करोड़ जनता की ओट लेकर अपने पाप ढकने की कोशिश करते हैं, पर गोधरा में साबरमती एक्सप्रैस की बोगी नम्बर 6 की आग में मरने वाले दो कार सेवकों समेत 59 लोग ही गुजराती नहीं थे अपितु बाद में मार डाले गये वे तीन हजार लोग भी गुजरात में पैदा हुये थे, गुजराती भाषा बोलते थे। अंतर केवल इतना था कि उनकी पूजा पद्धति और पूजा स्थल कुछ भिन्न थे। पिछले दस सालों में आपको उनका दर्द कभी क्यों नहीं सताया! यहाँ तक कि आपने साबरमती एक्सप्रैस की बोगी नम्बर 6 में मरे लोगों के परिवार वालों को दो लाख और बाकी गुजरात में मिली लाशों के परिवार वालों को एक लाख रुपये मुआवजा देने की घोषणा करके भी शर्म महसूस नहीं की थी।
  • साबरमती एक्सप्रैस की बोगी नम्बर 6 को आग लगाने वाले आक्रोशित लोगों की दृष्टि साम्प्रदायिक नहीं रही होगी क्योंकि बन्द बोगी में किसी भी जाति धर्म के लोग हो सकते थे पर शेष गुजरात में जो लोग मारे गये वे चुन चुन कर एक ही समुदाय के लोग थे। उन्हीं के घर और दुकानें लूटी गयीं थीं। अब आप शांति और सद्भाव का मुखौटा ओढ कर कह रहे हैं कि जनता के लोग आपके विरोधियों की बात का भरोसा नहीं करेंगे। महोदय आप जनता को इतना अन्धा क्यों समझ रहे हैं। वह तंत्र की कमजोरियों के कारण मजबूर हो सकती है, पर इतनी मूर्ख नहीं हो सकती जितना कि आप मान कर चल रहे हैं। क्या अमर सिंह के साथ हुए घटनाक्रम से आपने कोई सबक नहीं लिया है।
     फिर भी आपकी खुशफहमी आपको मुबारक हो। दुष्यंत कुमार ने कहा था-
वे मुतमईन हैं पत्थर पिघल नहीं सकता
                  मैं बेकरार हूं आवाज में असर के लिए
आपकी जनता


वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, अप्रैल 20, 2010

भाजपा में मोदी विकल्पहीन क्यों?

भाजपा में मोदी विकल्पहीन क्यों?
वीरेन्द्र जैन
विचारधारा पर आधारित किसी भी संगठन में यदि किसी व्यक्ति विशेष पर निर्भरता बनी रहती है तो उसके वैचारिक संगठन होने पर संदेह होना स्वाभाविक होता है। गुजरात में भाजपा की नरेन्द्र मोदी पर निर्भरता उसके वैचारिक संगठन होने के दावे की पोल खोलता है।गत वर्षों में घटे घटनाक्रमों में ऐसे समुचित आधार थे जब उनके कारण एन डी ए और भाजपा की छवि को लगातार क्षति पहुँची तब नरेन्द्र मोदी को हटा दिया जाना चाहिये था।
नरेन्द्रमोदी स्वाभाविक नेता के रूप में उभरकर मुख्यमंत्री नहीं बने थे अपितु उन्हें ऊपर से थोपा गया था। यह पद उन्होंने दिल्ली में पार्टी प्रवक्ता के रूप में कर्य करते हुए और गोबिन्दाचार्य के साथ रहते हुये जुगाड़ जमा कर पाया था। यह पद पाने के लिए उन्होंने भाजपा के ही विधिवत चुने हुये मुख्यमंत्री को विस्थापित किया था। वे उस समय विधायक भी नहीं थे तथा जब उन्होंने उपचुनाव लड़ कर विधानसभा की सदस्यता प्राप्त की उस समय विधानसभा की चार सीटों के लिए उपचुनाव हुये थे जिनमें से तीन पर भाजपा हार गयी थी व मुख्यमंत्री रहते हुये नरेन्दमोदी जिस सीट से जीते थे उसे उससे पूर्व जीते भाजपा प्रत्याशी ने उन से दुगने मतों से जीता था। यह नरेन्द्रमोदी की 'लोकप्रियता' का नमूना था कि उस सीट पर भाजपा की जीत आधी रह गयी थी।

भाजपा ने यह कभी सार्वजनिक नहीं किया कि उन्होंने केशूभाई पटेल् को किस आधार पर हटा कर नरेन्द्र मोदी को ताज सोंपा था। पर गोधरा में साबरमती एक्सप्रैस की बोगी नम्बर छह में लगी आग और उसमें अयोध्या जाने वाले दो कारसेवकों समेत 59 लोगों के जल जाने के आधार पर मुख्यमंत्री मोदी ने सरकारी मदद से निर्दोष गुजराती मुसलमान नागरिकों के खिलाफ जो नरसंहार करवाया था उससे उनको मुख्यमंत्री पद पर प्रतिष्ठित करने के कारणों को अनुमानित किया जा सकता है। उनके बाद के कदमों से भी स्पष्ट हो चुका है कि गोधरा घटनाक्रम के बाद घटी हिंसा अचानक भड़की हिंसा नहीं थी अपितु पूर्व नियोजित थी और उसके आधार भी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में तैयार हुये थे।यदि उक्त आगज़नी में राम जन्म भूमि मन्दिर में कार सेवा का कारण रहा होता तो अयोध्या से गुजरात तक तीन राज्यों से गुजरने वाली ट्रेन में यह घटना गुजरात के गोधरा पहुँचने पर ही क्यों घटती जबकि वहाँ नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व वाला भाजपा का शासन था। इस बात को जानबूझकर दबा दिया जाता रहा है कि उस एक डिब्बे बोगी नम्बर 6 में लगी आग में मरने वालों में अयोध्या गये त्रिशूलधारी कुल दो कारसेवक थे। उसके बाद पूरे गुजरात में जो हिंसा लूटपाट बलात्कार आगजनी फैलायी गयी उससे जन धन का नुकसान उठाने वालों में गोधरा की घटना का कोई आरोपी नहीं था। यह सुनियोजित हिंसा केवल अगले विधानसभा चुनाव में साम्प्रदायिक ध्रुवी करण का लाभ उठाने के लिए ही फैलायी गयी थी।
इन मौतों के साथ भी साम्प्रदायिक राजनीति करने वाले मोदी ने भेदभाव को पुष्ट करते हुये गोधरा में मरने वालों को दो लाख और शेष गुजरात में मरने वालों को एक लाख रूपये मुआवजे की घोषणा की थी। जब भारत ने ट्वेन्टी-ट्वेन्टी में विश्व कप जीता तथा राज्य सरकारों ने खिलाड़ियों को करोड़ों रूपयों के धन से पुरस्कृत कर अपनी राष्ट्रीय भावना को व्यक्त किया तब मोदी जी ने अपने भरे पूरे क्रिकेट प्रेमी राज्य के खिलाड़ियों को कुल एक एक लाख रूपये देने की घोषणा की क्योंकि उनके राज्य से खेलने वाले खिलाड़ियों के नाम इरफान पठान और यूसुफ पठान थे।

गोधरा घटनाक्रम के बाद हुयी हिंसा में जो कुछ हुआ वह अल्पसंख्यक आयोग, मानव अधिकार आयोग, महिलाआयोग, समेत सैकड़ों जनसंगठनों की जॉच समितियों, राजनीतिक दलों के प्रतिनिधिमंडलों समेत समाचार माघ्यमों द्वारा सामने लाया गया था और बाद में तो तहलका के खुलासे के बाद स्वयं आरोपियों ने कैमरे के सामने भी सच स्वीकार कर लिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी को पार्टी के तमाम दबावों के बाबजूद भी राजधर्म का पालन करने जैसे गोलमोल वाक्य बोलने को विवश होना पड़ा था क्योंकि रामविलास पासवान, ममता बनर्जी, चन्द्रबाबू नायडू, फारूख अब्दुल्ला समेत उनके तमाम सहयोगी दलों के लोगों ने खुली आलोचना की थी व जनतादल(यू) बीजू जनता दल आदि भी खुल कर साथ नहीं दे पा रहे थे। अभी हाल ही में जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेता ने खुलासा कर ही दिया है कि अटलजी स्तीफा दे रहे थे तो उन्होंने उनका हाथ पकड़ लिया था। आइ ए एस अधिकारी शर्म के मारे अपने पद से स्तीफा देने लगे थे व सारी दुनिया में थू थू हो रही थी। भाजपा के नेता केवल कुतर्क और मुंहजोरी भर कर रहे थे पर अन्दर से वे भी अपने पक्ष को कमजोर मान रहे थे। मोदी को हटा देने का वह उपयुक्त समय था। बाद में भाजपा सरकार के केन्द्र से हटने में मोदी को न हटाये जाने ने बड़ी भूमिका अदा की थी।

अवसर उसके बाद भी बहुत सारे आये। नरेन्द्रमोदी के मंत्रिमंडल में मंत्री रहे हरेनपंडया की सरे आम हत्या हुयी और उनके पिता ने सार्वजनिक रूप से नरेन्द्र मोदी को ही हत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया। यह वह परिवार था जिसने सारा जीवन संघ परिवार के लिए लगाया था। केशूभाई के समर्थन में उनके साथ विधायकों के बड़े बहुमत ने भाजपा हाई कमान से गुहार की कि उन्हें बदल देना चाहिये पर उन्हें चुप बैठने को विवश कर दिया गया। राज्यपाल रहे व भाजपा के विश्वसनीय भंडारी ने अपने अंतिम दिनों से कुछ दिनों पहले ही गुजरात घटनाक्रम पर गहरा अफसोस व्यक्त किया था।
केन्द्र में मंत्री रहे काशीराम राणा मोदी के कारनामों से गहरे असंतुष्ट रहे और उन्होंने विधानसभा चुनावों के दौरान अपने को अलग रखा था। चुनाव से ठीक पहले भाजपा के पचास साल पुराने सदस्य और भाजपा की ओर से गुजरात के मुख्यमंत्री रहे सुरेश मेहता ने पार्टी से स्तीफा दे दिया था। संयुक्त राज्य अमेरिका ने मोदी को वीसा देने से इंकार करके न केवल मोदी अपितु पूरे देश का अपमान किया पर भाजपा के नेताओं के कानों पर जूं भी नहीं रेंगी। विश्व हिंदू परिषद के प्रवीण तोगड़िया ने मोदी के लिए काम करने से साफ इंकार कर दिया था। उसके बाद हुये विधान सभा और लोक सभा के टिकिट बांटने का काम भी मोदी की मरजी से हुआ था जिसमें लोकसभा सदस्य तो कबूतरबाजी आदि में पकड़े ही गये अपितु यह सत्य भी सामने आया कि मोदी द्वारा बांटे गये टिकिटों में सत्ताइस विधायकों की एक से अधिक पत्नियाँ हैं। माना जाता रहा कि भाजपा के संगठन सचिव संजयजोशी की सीडी भी मोदी ने ही तैयार करायी थी।

सोहराबुद्दीन के हत्याकांड को खुले आम स्वीकारने और गौरव प्रर्दशन का जो दंभ मोदी ने प्रकट किया उसका उदाहरण तो रावण के चरित्र में भी नहीं मिलता। इस पर मोदी के स्वयं के वकील को भी शर्म आयी और पीढियों से संघ परिवार से जुड़े उस वकील ने त्यागपत्र देना ज्यादा ठीक समझा था।
इतने सब ही नहीं और भी बहुत कुछ के बाबजूद भी भाजपा इतनी विवश क्यों है कि वह मोदी को नेतृत्व नहीं बदलना चाहती? कहीं ऐसा तो नहीं कि मोदी के पास और भी सीडियाँ दबी पड़ी हों और वे संजयजोशी से भी ऊपर के नेताओं की हों क्योंकि नाराजी की दशा में मदन लाल खुराना ने भी एक महीने का समय देकर ऐसी पोल खोल देने की धमकी दी थी। जहाँ तक औद्योगिक विकास का सवाल तो है वह गुजरात के इतिहास में सदैव से ही रहा है चाहे जिस पार्टी या नेता का शासन रहा हो।


वीरेन्द्र जैन
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