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शनिवार, मई 18, 2019

चुनाव अनुमान और मोदी का भविष्य


चुनाव अनुमान और मोदी का भविष्य  
वीरेन्द्र जैन
2019 के आम चुनाव लगभग समाप्ति की ओर हैं, और परिणामों की उत्सुकता से प्रतीक्षा की जा रही है। किसी भी पार्टी की जीत की संभावना के सन्देशों पर भरोसा हो जाने से चुनाव में गुणात्मक प्रभाव पड़ता है, इसलिए सरकार बनाने के लिए संघर्षरत हर दल या गठबन्धन अपनी जीत का वातावरण बनाने में लगे रहते हैं। क्रमशः नेताओं की विश्वसनीयता घटने के बाद अब पार्टियां तरह तरह के झूठे सर्वेक्षणों, मीडिया की प्रायोजित बहसों, आलेखों आदि से अपनी लोकप्रियता और जीत का भ्रम पैदा करते हैं। दूसरी ओर कुछ भिन्न महसूस करने वाला मतदाता सोचता है कि या तो इन्हें साफ साफ परिदृश्य नहीं दिखता या ये हमें जानबूझ कर धोखा देने की कोशिश कर रहे हैं। पिछले दिनों दिल्ली विधानसभा के चुनावों में काँग्रेस, भाजपा ही नहीं अपितु जीतने वाली आम आदमी पार्टी के नेता भी जीतने वाले प्रत्याशियों की संख्या के प्रति जितने भ्रमित थे, उससे उनके जनता के मूड को समझने की क्षमता का पता चलता है। 2014 के आम चुनावों में भी किसी को यह अनुमान नहीं था कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व के बाद भी भाजपा और एनडीए को स्पष्ट बहुमत मिलेगा व यूपीए के दलों की सीटें इतनी कम रहेंगीं कि विपक्षी नेता पद के लिए जरूरी सीटें भी नहीं मिल पायेंगीं।
चुनाव के दौरान भाजपा के नेताओं ने अपनी जीत के आंकड़े बालाकोट में मृतकों की संख्या की तरह प्रस्तुत किये। ऐसे आंकड़े देने में न केवल अमित शाह ही थे अपितु नरेन्द्र मोदी स्वयं भी बार बार किसी भी सैफोलोजिस्ट या राजनीतिक संवाददाता के अनुमानों से कई गुना अधिक आंकड़े दे रहे थे। दूसरी ओर वे अपना सारा जोर पश्चिम बंगाल और उड़ीसा पर लगा रहे थे। साथ ही अंतिम प्रायोजित साक्षात्कार में उन्होंने यह भी कहा कि गठबन्धन सरकार चलाने में भी वे अनाड़ी नहीं हैं।
कोई कुछ भी कहे पर 2019 का आम चुनाव मोदी केन्द्रित चुनाव था जिसमें अपने गठबन्धन और पार्टी के विरोधी गुटों से अलग नरेन्द्र मोदी अकेले विचर रहे थे। अमित शाह उनकी ही परछांई की तरह दो जिस्म एक जान हैं। वैसे  भाजपा ने भगवा भेषधारी अजय सिंह बिष्ट उर्फ योगी अदित्यनाथ को छोड़कर किसी को स्टार प्रचारक नहीं माना। जो पार्टी विधानसभा चुनावों में बिना मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित किये चुनाव लड़ती रही है, वह शुरू से ही प्रधानमंत्री प्रत्याशी के रूप में मोदी का नाम प्रस्तावित करती रही क्योंकि अपने सबसे बड़े समर्पित भक्त को पार्टी अध्यक्ष बनवा कर और सरकार में सबका मुँह बन्द करके वे जो चाहें वह कर सकने में सक्षम रहे। जब चुनाव व्यक्ति केन्द्रित हो जाता है तो विरोध भी व्यक्ति केन्द्रित हो जाता है और छवि बनाने के लिए जितना मेकअप किया जाता है, उतना ही प्रयास छवि को उघाड़ने और विकृत करने के लिए होता है। इसलिए दोनों ओर मोदी ही मोदी रहा।
मोदी ने जो पिछली बार करना चाहा था वह काम इस बार उन्होंने प्रत्याशी चयन में कर दिखाया। एक भी प्रत्याशी ऐसा नहीं है जिसका कद मोदी से बड़ा हो या जिसकी कमीज के दाग दबे छुपे रह गये हों। लालकृष्ण अडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, येदुरप्पा, शांता कुमार, सुमित्रा महाजन, कलराज मिश्रा, नज़मा हेपतुल्ला आदि को उम्र के नाम पर टिकिट वंचित कर दिया गया तो राम जेठमलानी, सुषमा स्वराज, उमा भारती, शत्रुघ्न सिन्हा, कीर्ति आज़ाद, परेश रावल आदि ने दूरदर्शिता से स्वयं को बेइज्जत होने से बचा लिया। जिन्हें प्रत्याशी बनाया गया उनकी एक मात्र योग्यता या तो गैर राजनीतिक कारणों से उनकी निजी लोकप्रियता रही जैसे हेमा मालिनी, सनी देवल, किरण खेर, जयाप्रदा, मनोज तिवारी, रवि किशन, निरहुआ, बाबुल सुप्रियो, राज्यवर्धन सिंह राठौर, गौतम गम्भीर, निरंजन ज्योति, साक्षी महाराज, प्रज्ञा ठाकुर या पार्टी के रिटायर्ड राजनेताओं के वंशज रहे। युवा चेहरों की सबसे प्रमुख प्रतिभा उनकी अतार्किकता और मोदी भक्ति ही रही। उनमें से कोई भी ऐसा नहीं है जो कन्हैया कुमार जैसी प्रतिभा का धनी हो। अपनी लगन और वैचरिक समर्पण के कारण साधारण परिवार से निकले नरेन्द्र मोदी या शिवराज सिंह चौहान को अब इस मोदी जनता पार्टी में प्रवेश नहीं मिल सकता। मोदी राज्यसभा के चयनित सदस्यों के सहारे सरकार चलाने में भरोसा रखते हैं।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि बड़ी घटौत्री के बाद भी मोदी अब भी अन्य सब नेताओं से अधिक स्वीकार्य नेता हैं, किंतु यह भी सच है कि वे अब लोकप्रिय नेता नहीं हैं। उन्होंने जिन नकली प्रयासों से अपने कद को ऊंचा करने का प्रबन्धन किया उनमें से ज्यादातर की कलई खुल गयी है। भाजपा में शेष बचे जो लोग हैं वे उनकी चुनाव जिता सकने की क्षमता से चमत्कृत लोग हैं जो अटल बिहारी वाजपेयी की कमजोर गठबन्धन वाली सरकार के बाद पहली बार पूर्ण बहुमत वाली सत्ता का सुख भोग सके हैं। इसलिए नरेन्द्र मोदी तब तक ही उनके नेता हैं जब तक वे उन्हें और पार्टी को जिताने की क्षमता रखते हैं। कार्पोरेट जगत भी तब तक ही पीछे से बल देता है। चुनाव हारने के बाद मोदी केवल अमित शाह के नेता बने रह सकते हैं। चुनाव से पहले एनडीए में सम्मलित शिवसेना ने जिस भाषा में मोदी को याद किया था उसके बाद मोदी की उनसे गलबहियां इस बात का संकेत थीं कि मोदी खुद को कमजोर समझ रहे हैं और दूसरे लाख फुंकार भरते रहने के बाद भी वे स्वाभिमानी नेता नहीं हैं। उ,प्र, में राजभर की पार्टी छोड़ कर जा चुकी है, अपना दल भी आँखें दिखा कर अपना हिस्सा ले जा चुकी है। सावित्री बाई फुले ने खुद और उदितराज ने टिकिट कटने के बाद भाजपा छोड़ दी  थी। लाख कोशिशों के बाद भी एनसीपी, बीजू जनता दल, ममता बनर्जी, चन्द्रबाबू नायडू, वायएसआर काँग्रेस केसीआर आदि ने इनसे समझौता नहीं किया और आगे भी कोई करेगा तो बड़ा हिस्सा वसूलने के बाद करेगा। पंजाब, दिल्ली, बिहार, राजस्थान. म.प्र., छत्तीसगढ, गुजरात आदि में सीटों की संख्या पर मतभेद हो सकता है किंतु उनका घटना तय है।
जैसा कि शरद पवार ने कहा है वह सच है कि स्पष्ट बहुमत न आने की दशा में एनडीए के घटक दलों की पसन्द मोदी नहीं होंगे और भाजपा वाले भी उन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल बाहर करेंगे। जब वे कार्पोरेट जगत के काम के नहीं होंगे तो मुकेश अम्बानी जैसे लोग तो बीच चुनाव में ही देवड़ा परिवार का समर्थन कर संकेत देने लगते हैं। पराजय के संकेत केवल भाजपा के ही नहीं हैं अपितु मोदी की विदाई के भी हैं। 
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629     

मंगलवार, फ़रवरी 06, 2018

पकौड़ा - एक कटाक्ष का विश्लेषण

पकौड़ा - एक कटाक्ष का विश्लेषण  
वीरेन्द्र जैन
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      प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चुनावों के दौरान ऐसे भाषण दिये और चुनावी वादे किये थे जो अव्याहारिक थे और किसी भी तरह से चुनाव जीतने का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये थे। उन्होंने मुहल्ले के बाहुबलियों जैसा 56 इंची सीना वाला बयान दिया था जो लगातार मजाक का विषय बना रहा। हर खाते में 15 लाख आने की बात को तो उनके व्यक्तित्व के अटूट हिस्से अमित शाह ने जुमला बता कर दुहरे मजाक का विषय बना दिया और उनके हर वादे को जुमले होने या न होने से तौला जाने लगा। पाकिस्तान के सैनिकों के दस सिर लाने वाली शेखी और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के वास्तविक दबाव में सम्भव सैनिक कार्यवाही में बहुत फर्क होता है जो प्रकट होकर मजाक बनता रहा। इसी तरह के अन्य ढेर सारे बयान और वादों के बीच रोजगार पैदा करने वाली अर्थ व्यवस्था न बना पाने के कारण प्रति वर्ष दो करोड़ रोजगार देने के वादे का भी हुआ, जिसे बाद में उन्होंने एक करोड़ कर दिया था और इस बजट में उसे सत्तर लाख तक ले आये। जब शिक्षित बेरोजगारों को नौकरी न मिलने से जनित असंतोष के व्यापक होते जाने की सूचनाएं उन तक पहुंचीं तो उन्होंने किसी भी मीडिया को साक्षात्कार न देने के संकल्प को बदलते हुए ऐसे चैनल से साक्षात्कार के बहाने अपने मन की बात कही जो उन्हीं के द्वारा बतायी जाने वाली बात को सवालों की तरह पूछने के लिए सहमत हो सकता था। इसमें उन्होंने रोजगार सम्बन्धी अपने वादे को सरकारी नौकरियों से अलग करते हुए कहा कि स्वरोजगार भी तो रोजगार है जैसे आपके टीवी चैनल के आगे पकौड़े की दुकान भी कोई खोलता है तो वह भी तो रोजगार है। उनके इस बयान को नौकरी की आस में मोदी-मोदी चिल्लाने वाले शिक्षित बेरोजगारों ने तो एक विश्वासघात की तरह लिया ही, सोशल मीडिया और विपक्ष ने भी खूब जम कर मजाक बनाया। यह मजाक अब न केवल सत्तारूढ दल को अपितु स्वयं मोदी-शाह जोड़ी को भी खूब अखर रहा है। राज्यसभा में दूसरे वरिष्ठ सदस्यों का समय काट कर विश्वसनीय अमित शाह को समय दिया गया, जिन्होंने पकौड़े के प्रतीक को मूल विषय मान कर उसी तरह बचाव किया जैसे कि मणि शंकर अय्यर के चाय वाले बयान को चाय बेचने वालों पर आक्षेप बना कर चाय पर चर्चा करा डाली थी।
सच तो यह है कि पकौड़े के रूप में जो कटाक्ष किये गये वे पकौड़े बेचने या उस जैसे दूसरे श्रमजीवी काम को निम्नतर मानने के कटाक्ष नहीं थे। पकौड़े बेचने के लिए किसी भी बेरोजगार को मोदी सरकार की जरूरत नहीं थी, वह तो काँग्रेस या दूसरे गठबन्धनों की सरकार में किया जा सकता था या लोग करते चले आ रहे थे। एक कहावत है कि ‘ बासी रोटी में खुदा के बाप का क्या!’ उसी तरह पकौड़े बेचने के लिए सरकार बदलने की जरूरत नहीं पड़ती। एक आम बेरोजगार ने मोदी सरकार से यह उम्मीद लगायी थी कि दो करोड़ रोजगार में उसे भी उसकी क्षमतानुसार नौकरी मिल सकेगी। पकौड़े बनाने जैसी सलाह से उसका विश्वास टूटा है। किसी भी कटाक्ष का पसन्द किया जाना समाज की दशा और दिशा का संकेतक भी होता है। यही कारण था कि न मुस्काराने के लिए जाने जाने वाले अमित शाह की भाव भंगिमा और भी तीखी थी। हो सकता है उसके कुछ अन्य कारण भी रहे हों।
पकौड़े के प्रसंग से एक घटना याद आ गयी। मैं कुछ वर्ष पहले बैंक में अधिकारी था और बैंक के लीड बैंक आफिस में पदस्थ था। यह कार्यालय बैंक ऋण के माध्यम से लागू होने वाली सरकारी योजनाओं के लिए बैंक शाखाओं और सरकारी कार्यालयों के बीच समन्वय का काम करता है। उन दिनों आई आर डी पी नाम से एक योजना चल रही थी जो गाँव के ग्रामीणों को पलायन से रोकने के लिए उन्हें स्थानीय स्तर पर रोजगार देने के प्रयास की योजना थी। इस योजना में सरकार की ओर से अनुदान उपलब्ध था जो अनुसूचित जाति- जनजाति के लिए 50% तक था। कलैक्टर के पास एक शिकायत पहुंची कि एक हितग्राही को बैंक मैनेजर ऋण देने में हीला हवाली कर रहा है। इस शिकायत को देखने के लिए उन्होंने उसे हमारे कार्यालय को भेज दिया। सम्बन्धित बैंक मैनेजर से बात करने पर उसने बताया कि उक्त आवेदन मिठाई की दुकान के लिए था और हितग्राही दलित [बिहारी भाषा में कहें तो महादलित] था। उसका कहना था कि उसकी दुकान से उस छोटे से गाँव में मिठाई कोई नहीं खरीदेगा, इसलिए योजना व्यवहारिक नहीं है। पकौड़ा योजना भी दलितों के हित में नहीं होगी क्योंकि इसमें कोई आरक्षण नहीं चलता।
इसी तरह अगर पकौड़ा बेचने तक केन्द्रित रहा जाये तो गाँवों और कस्बों में इस तरह की दुकानें आज भी इन जाति वर्गों की नहीं मिलतीं। आचार्य रजनीश ने गाँधी जन्म शताब्दी में गाँधीवाद की समीक्षा करते हुए कहा था कि गाँधीजी जाति प्रथा और बड़े उद्योगों के एक साथ खिलाफ थे, किंतु जाति प्रथा तो बड़े उद्योगों के आने से ही टूटेगी। बाटा के कारखाने में काम करने वाला मजदूर होता है जबकि गाँव में जूता बनाने वाला अछूत जाति में गिना जाता है। जातिवाद की समाप्ति के लिए कोई भी राजनीतिक सामाजिक दल कुछ नहीं कर रहा अपितु इसके उलट वोटों की राजनीति के चक्कर में सभी और ज्यादा जातिवादी संगठनों को मजबूत बनाने में सहयोगी हो रहे हैं। दुष्यंत ने लिखा है -
जले जो रेत में तलुवे तो हमने यह देखा
बहुत से लोग वहीं छटपटा के बैठ गये 
बेरोजगारी की स्थिति भयंकर है और बिना उचित नीति के किसी भी पार्टी की सरकार इतने शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार नहीं दे सकती स्टार्ट-अप, स्किल इंडिया, आदि के प्रयोग फलदायी नहीं हो रहे। इसके उलट सत्तारूढ दल चुनावी सोच से आगे नहीं निकल पाता, मोदीजी हमेशा चुनावी मूड में रहते हैं जिसे अभी हाल ही में हमने आसियान सम्मेलन के दौरन असम में दिये उद्बोधन के दौरान देखा। दावोस और बैंग्लुरु में तो वो बहुत ही गलत आंकड़े बोल गये जिससे पद की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची। वोटों की राजनीति पारम्परिक कुरीतियों को मिटाने की जगह उन्हें सहेजने का काम कर रही है। यह अच्छा संकेत नहीं है।  
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, दिसंबर 26, 2017

नरेन्द्र मोदी को अटल जी की याद आना

नरेन्द्र मोदी को अटल जी की याद आना

वीरेन्द्र जैन
नरेन्द्र मोदी ने गत 20 दिसम्बर को संसदीय बोर्ड की बैठक में कैमरे की उपस्थिति में दो-तीन बार अपनी आँखें गीली होने जैसी प्रतीति दी। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि अगर आज अटलजी स्वस्थ होते तो वे मेरी जगह बैठे होते और कितने खुश होते। जब 1999 के लोकसभा चुनाव में मैंने गुजरात से बीस सीटें जीत कर दी थीं तो अटल जी ने मुझ से खुश होकर कहा था कि यह तुमने क्या कर दिया।
अपनी सोच और कठोर कार्यप्रणाली वाली छवि के विपरीत जब मोदी भरे गले और नम आँखों से बात करते हैं तो विरोधियों को वे नकली लगते हैं। राहुल गाँधी ने तो पिछले दिनों स्मरण भी दिलाया था कि वे अमिताभ बच्चन से भी अच्छे अभिनेता हैं, और किसी दिन सभा में आँसू बहा कर दिखा सकते हैं। उन्होंने तब भी आंसू दिखाये थे जब पहली बार संसद भवन में आये थे और अडवाणीजी ने भाजपा के पूर्ण बहुमत लाने की कृपा करने के लिए उन्हें बधाई दी थी। उन्होंने अमेरिका में जुकरवर्ग को साक्षात्कार देते हुए अपनी मां के श्रम को याद करते हुए भी आंसू बहाये थे, और नोटबन्दी पर हो रहे व्यापक विरोध को शांत करने के लिए भी आंसू बहाये थे।  
गुजरात का चुनाव मोदी के लिए बड़ा धक्का इसलिए है क्योंकि उनके प्रधानमंत्री बनने तक लोगों को यह भरोसा नहीं था कि गुजरात माडल को सामने रखे बिना साम्प्रदायिकता की दाग झेल रही भाजपा स्वतंत्र रूप से सत्ता में आ सकती है। उसी गुजरात में जीत कमजोर पड़ने से नींव कमजोर होने जैसा आभास हो रहा है। सच यह भी है कि 2014 में उनकी सरकार बनने में एंटी इंकम्बेंसी के साथ दलबदल कर आये नेता, क्रीतदास मीडिया, सेवानिवृत्त अधिकारी, कार्पोरेट प्रदत्त अटूट धन का प्रवाह, जातिवाद व साम्प्रयदायिकता, सैलीब्रिटीज आदि रहे थे फिर भी उन्होंने दो जगह से चुनाव लड़ा था और प्रधानमंत्री पद के चयन तक मुख्यमंत्री पद से स्तीफा नहीं दिया था।
प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने भाजपा के नाम को छोड़ कर पार्टी में वह सब कुछ बदलने की मुहिम छेड़ दी थी जो पुराने लोगों को महत्व देती थी। वैसे तो अटल बिहारी वाजपेयी जी उम्रगत अस्वस्थता के कारण सक्रिय राजनीति में वापिस नहीं आ सकते थे, पर फिर भी मोदी ने अटल बिहारी के समय के और उनके साथ के सारे लोगों को मुख्यधारा से हाशिए पर धकेल दिया। उनके जो दो एक रिश्तेदार सक्रिय राजनीति में थे उन्हें बाहर कर दिया या निष्क्रिय कर दिया। मोदी ने अटल बिहारी के शासन के दौर को कभी अच्छा नहीं बतलाया व सत्तर साल तक चली पिछली सरकारों की आलोचना करते हुए उन्होंने अटल जी के समय की एनडीए को भी कुशासन बतलाने में सम्मलित किया। उल्लेखनीय है कि 2002 में गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रैस की बोगी नम्बर 6 में हुयी आगजनी के बाद गुजरात में जो नरसंहार हुआ था उसके विरोध में अटल जी ने मीडिया के सामने राजधर्म के पालन की सलाह दी थी। आज के समय आंसू बहाते हुए प्रदर्शित होने वाले मोदी अटलजी की सलाह के समय हँस रहे थे जिसका वीडियो उपलब्ध है। भुला दिये गये भाजपा के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह ने अपनी किताब में लिखा है कि गुजरात में हुए नरसंहार से जन्मी आलोचनाओं से दुखी होकर जब अटल जी स्तीफा देने जा रहे थे तब उन्हीं ने उन्हें रोका था।
गुजरात विधानसभा चुनाव में हुयी दुर्दशा से पूर्व मोदी ने कभी अटल जी के नाम को आदर से याद नहीं किया और अब जब याद किया तब भी अपने योगदान की प्रशंसा के साथ याद किया। मेरे नैटपरिचित एक ब्लागर जिन्हें बाद में ट्रालर के रूप में ही पहचाना गया ने अपने तब के ब्लाक में लिखा था कि बहुत सारे ब्लागर्स का लम्बा प्रशिक्षण शिविर गुजरात में आयोजित किया गया था जिसमें समय समय पर मोदी स्वयं आते रहे थे। यह वही समय था जब मोदी को प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी बनाने की प्रक्रिया चल रही थी। इस शिविर से लौट कर आने के बाद उन्होंने उन्होंने अपनी पोस्टों में जो प्रमुख परिवर्तन किया था वह था अटल बिहारी शासन काल की भी आलोचना करना। उनके इस बदले रुख से तब मैं अचम्भित हुआ था। कन्धार में आतंकवादियों को छोड़ कर आने से लेकर मुशर्र्फ से वार्ता तक उन्होंने  निन्दा करना शुरू कर दिया था। किसी विरोधी की तरह उनके कमजोर हिन्दुत्व और गलत धर्मनिरपेक्षता की आलोचना भी वे करने लगे थे। पार्टी के पोस्टरों में अटल बिहारी वाजपेयी और अडवाणी जी के फोटुओं का स्तेमाल कठोरता से रोक दिया गया था।
जब मोदी जी प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी चुन लिये गये थे तब राजनाथ सिंह नाम मात्र के अध्यक्ष रह गये थे और प्रत्याशी चयन से लेकर चुनाव प्रबन्धन का सारा काम नरेन्द्र मोदी और अमित शाह देखने लगे थे। अडवाणी जी तक का टिकिट उन्होंने अंतिम समय तक लटकाये रखा था। लोकसभा चुनाव में जीत के बाद जब मंत्रिमण्डल गठन का सवाल आया तब उन्होंने अटल मंत्रिमण्डल के प्रमुख सदस्यों को दूर ही रखा। अडवाणी जी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार, यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा, विनोद खन्ना, आदि तो दूर ही रखे गये सुषमा स्वराज को भी उनकी रुचि से भिन्न और वरिष्ठता से अलग विभाग दिया। रक्षा विभाग को भले ही अरुण जैटली को वित्त मंत्रालय जैसे भारी भरकम मंत्रालय के साथ नत्थी किये रहे पर किसी वरिष्ठ को उसके आसपास फटकने भी नहीं दिया। उमा भारती को ऐसा विभाग दे दिया जिसमें उनके कर सकने लायक कुछ भी नहीं था। जो मंत्री बनाये गये वे सब उपकृत लोग थे जो बाबुओं की तरह उनके वाक्य को अंतिम मान कर चलते थे।
अगले लोकसभा चुनावों से पहले जब कुछ विधानसभाओं के चुनाव सामने हैं, और नोटबन्दी, जीएसटी, से लेकर निष्प्रभावी आर्थिक नीतियों के कारण न काला धन वापिस आने और न रोजगार का सृजन होने के कारण असंतोष चरम की ओर बढ रहा है तब अटल जी की याद आ रही है। कट्टर हिन्दुत्ववादियों के प्रति जनता के बढते गुस्से को थामने के लिए अपेक्षाकृत उदार अटल बिहारी की फोटो में उम्मीदें देख रहे हैं। अटलजी इस अवसरवाद का उत्तर दे पाने की स्थिति में भी नहीं हैं।
वीरेन्द्र जैन
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शनिवार, मार्च 04, 2017

नारियल और पाइनएप्पल के बहाने इतिहास के झरोखे से

नारियल और पाइनएप्पल के बहाने इतिहास के झरोखे से  
वीरेन्द्र जैन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूर्व घोषित कम सभाएं करने के अपने इरादे को बदलते हुए उत्तर प्रदेश में भी बिहार विधानसभा चुनावों की तरह जरूरत से ज्यादा आम सभाएं कीं। ये चुनाव भी भाजपा ने मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित किये बिना ही लड़े हैं जिसका मतलब होता है कि या तो उन्हें जीत की कोई उम्मीद नहीं थी या पद के लिए आपस में बड़ी तकरार थी। इससे पूर्व किसी प्रधानमंत्री ने विधान सभा चुनावों के लिए इतना समय नहीं दिया क्योंकि एक आमसभा में ही दिया गया उनका भाषण पूरे देश में प्रचारित हो जाता है। जैसा कि देश और दुनिया के सूचना माध्यमों ने महसूस किया व व्यक्त भी किया है कि अपने भाषणों में मोदी ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण पद की गरिमा के अनुरूप भाषण नहीं दिये व भाषा में बहुत नीचे उतर गये। उनके चुनावी विरोधियों ने भी उसी अन्दाज में उनके उत्तर भी दिये।
भाजपा अब भी बहुत कमजोर हो चुकी काँग्रेस के साथ ऐसे व्यवहार करती है जैसे वह सत्तारूढ दल हो और भाजपा विपक्ष में हो। इसका कारण यह है कि उन्हें सत्ता दिलाने में उनकी अपनी भूमिका से ज्यादा काँग्रेस की कमजोरियों ने काम किया है। काँग्रेस का भूत अब भी उन्हें सताता है और लगता है कि उनके मन में यह आशंका बनी हुयी है कि जाने कब काँग्रेस अपने अर्जे पुर्जे जोड़ कर फिर से खड़ी हो जाये। काँग्रेस की एकता का इकलौता सूत्र काँग्रेसियों को सत्ता सुख की आदत हो जाना है, जिसे पाने के लिए वे आपस में लड़ते झगड़ते हुए भी थक हार कर एक हो जाते हैं या तत्कालीन सत्तारूढ दल में सम्मलित हो जाते हैं। इस एकता में गाँधी नेहरू परिवार इकलौता सूत्र है जिसके सहारे उनकी माला बिखरने से बार बार बच जाती है।
स्मरणीय है कि इमरजैंसी के बाद जब जनता पार्टी ने श्रीमती गाँधी को घेरना शुरू किया था और शाह आयोग की जाँच के दौरान उन्हें गिरफ्तार भी किया था तब समाचार आया था कि श्रीमती सोनिया गाँधी ने अपने पायलट पति राजीव गाँधी को देश छोड़ने की सलाह दी थी ताकि उनका परिवार झंझटों से बचा रह सके। श्रीमती इन्दिरा गाँधी की विरासत सम्हालने के लिए संजय गाँधी जरूरत से ज्यादा सक्रिय थे और उनके पुनः सत्तारूढ होने में इस सक्रियता की भी प्रमुख भूमिका रही थी। 1980 में संजय गाँधी की असमय मृत्यु के बाद ही राजनीति से उदासीन राजीव गाँधी को श्रीमती गाँधी के विश्वासपात्र की जगह भरने के लिए राजनीति में अनचाहे आना पड़ा था। उन दिनों सुप्रसिद्ध व्यंग्य कवि प्रदीप चौबे ने एक कविता में कहा था-
संजय गाँधी जबरदस्त नेता थे
और
राजीव गाँधी जबरदस्ती नेता हैं
खालिस्तान आन्दोलन के उग्र होने और उसके धर्मस्थलों के दुरुपयोग के विरोध में जब श्रीमती गाँधी ने स्वर्ण मन्दिर में छुपे उग्रवादियों के खिलाफ कार्यवाही की तो उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं थीं। इन धमकियों की गम्भीरता को समझते हुए और काँग्रेस संगठन की दशा देखते हुए उन्होंने राजीव गाँधी पर जिम्मेवारियां बढा दी थीं। अंततः सुरक्षा बलों के भितरघात से श्रीमती गाँधी की हत्या हुयी और पद की जिम्मेवारियां उठाने में कमजोर व उदासीन राजीव गाँधी को आगे आना पड़ा और पद सम्हालना पड़ा। उनकी कमजोरियों के कारण ही त्यागमूर्ति की तरह प्रकट हुये विश्वनाथ प्रताप सिंह ने विद्रोह कर दिया और विपक्षी दलों के सहयोग से चुनाव में उतर गये। संयोग से चुनाव में उनके जनता दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। वे सीपीएम व भाजपा के सहयोग से ही सत्तारूढ हो सकते थे। सीपीएम की नीति है कि वह किसी ऐसी सरकार में सम्मलित नहीं होती जिसकी नीतियां उसकी नीतियों से भिन्न हों, भले ही वह न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर बाहर से समर्थन दे दे। यही कारण रहा कि उन्होंने कहा कि हम तो सरकार में शामिल नहीं होंगे और समर्थन भी तब ही देंगे जब भाजपा को सरकार में सम्मलित न किया जाये। वी पी सिंह को ऐसा ही करना पड़ा व सत्ता में आने की योजनाएं बना चुके भाजपा नेतृत्व को बड़ी ठेस लगी, क्योंकि वीपी सिंह की विजय के लिए उन्होंने बहुत मेहनत की थी। यही कारण रहा कि ग्यारह महीने के अन्दर भाजपा ने काँग्रेस के साथ मिल कर मण्डल कमीशन के खिलाफ छात्र आन्दोलन खड़ा कर दिया व छात्रों के आत्मदाह की अनेक बनावटी कहानियां प्रचारित करके पिछड़ों में लोकप्रिय हो चुके वीपी सिंह की छवि को कलंकित करा दिया।
वीपी सिंह के हटने के बाद चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री बने व उनसे समर्थन वापिस लेकर काँग्रेस ने मध्याविधि चुनाव करा दिये व इन्हीं चुनावों के दौरान राजीव गाँधी की हत्या हो गई। काँग्रेस की एकता को बनाये रखने के लिए काँग्रेसियों ने सोनिया गाँधी को आगे लाना चाहा किंतु उन्होंने साफ इंकार कर दिया। उस समय राहुल और प्रियंका बहुत छोटे थे। मजबूरन अस्वस्थ नरसिंह राव को काँग्रेस का नेता चुना गया जबकि सही उत्तराधिकारी राजीव गाँधी के प्रमुख सलाहकार रहे प्रतिभाशाली अर्जुन सिंह थे पर उनके पास काँग्रेसजनों का पूर्ण समर्थन नहीं था। कमलापति त्रिपाठी और नारायन दत्त त्रिपाठी के समर्थक उस समय उनके विरोधी थे। प्रधानमंत्री बनते समय नरसिंह राव किसी सदन के सदस्य नहीं थे और सदन के नेता अर्जुन सिंह ही थे। गाँधी नेहरू परिवार की चुम्बक के बिना काँग्रेस बिखरने लगी और कई साल खिचड़ी सरकारों का नेतृत्व देवगौड़ा, इन्द्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी आदि ने किया। थक हार कर काँग्रेस को नेहरू गाँधी परिवार के नाम का सहारा लेकर काँग्रेस को बचाने के लिए सोनिया गाँधी के पास जाना पड़ा। उल्लेखनीय है उस समय तक भी वे राजनीति से यथावत उदासीन थीं और देश के प्रधानमंत्री जैसे अति जिम्मेवारी और महत्व के पद को सम्हालने के लिए न तो योग्य थीं और न तैयार थीं। अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार में सत्ता सुख भोग चुके भाजपायी इस शून्य को भरने के लिए उतावले थे। इसी बीच सोनिया गाँधी को बदनाम करने के लिए संघ परिवार ने ईसाइयों पर धर्म परिवर्तन का आरोप लगाते हुए चर्चों पर हमले शुरू कर दिये। ईसाई मिशनरियां वही काम कर रही थीं जो वे गत तीन सौ सालों से भारत में करती आ रही थीं। इस अभियान में ईसाई परिवार से आयी सोनिया के काँग्रेस अध्यक्ष बनने को छोड़ कर नया कुछ भी नहीं था। उचित अवसर महसूस करके अटल बिहारी सरकार ने समय से कुछ महीने पहले ही चुनाव करा लिये। दुर्भाग्यवश उनका पांसा गलत पड़ा और एनडीए चुनाव हार गया। उधर काँग्रेस समेत उनके विरोधी दल चुनाव जीत गये व उन्होंने यूपीए का गठन कर लिया। पहले विरोध करने वाले वामपंथियों ने अंततः काँग्रेस के नेतृत्व को उनका आंतरिक मामला मानते हुए सोनिया गाँधी के नाम पर एतराज को वापिस ले लिया। काँग्रेस के पुनुरोद्धार से आशंकित भाजपा ने सोनिया गाँधी के विदेशी मूल का मुद्दा उछाल कर सुषमा स्वराज को सिर घुटाने, चने खाकर रहने, जमीन पर सोने जैसे भावुक तमाशे के लिए तैयार कर लिया तो उनकी तर्ज पर ऐसा करने के लिए उमा भारती भी आगे आ गयीं। देशी विदेशी भावना के नाम पर वे राम जन्मभूमि मन्दिर जैसा कुछ षड़यंत्र रच पाते उससे पहले ही सोनिया गाँधी ने स्थिति की नजाकत को समझते हुए अपनी पगड़ी मनमोहन सिंह को पहना दी। उसके बाद दस साल मनमोहन सिंह कुर्सी सम्हाले रहे जब तक कि राहुल गाँधी एक उम्र तक नहीं पहुंच गये।
राहुल की सम्भावनाओं को देखते हुए उसके खिलाफ भी चरित्र हत्या का सिलसिला बहुत पहले से चलने लगा। कहा जाता है कि मुख्यधारा की प्रैस से लेकर सोशल मीडिया पर भाजपा के कई हजार ट्रोलर वेतनभोगी निरंतर काम करते हैं, जो विरोधियों का मजाक बनाने और गलत अफवाहें फैलाने में सक्रिय रहते हैं। इन्होंने ही पिछले कई वर्षों से राहुल गाँधी को अपरिपक्व, मासूम, खानदानी, आदि आदि के रूप में अयोग्य सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। 2014 के आम चुनाव में राहुल गाँधी काँग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं थे पर भाजपा से जुड़ा मीडिया उन्हें ऐसा प्रस्तुत कर रहा था व उनकी हास्यास्पद छवि की तुलना मोदी से करके मोदी का कद उभार रहा था। पिछले दिनों नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि गूगल सर्च करने पर सबसे ज्यादा चुटकले राहुल गाँधी पर मिलते हैं जबकि सच तो यह है कि उससे आगे सर्च करें तो पता चलेगा कि उन चुटकलों का उद्गम भाजपा के आईटी सैल से ही हुआ है।
‘नारियल का जूस’ भी उसी अभियान का हिस्सा था जिसमें गलत सूचना के कारण मोदी गच्चा खा गये। एक राजनीयिक के रूप में मोदी राहुल से अधिक चतुर अनुभवी और वाक्पटु हैं किंतु उनकी दलीय विचारधारा, संगठन के घोषित अघोषित षड़यंत्रकारी साम्प्रदायिक विभाजनकारी कार्यक्रम और कार्यप्रणाली देश की मेधा को अच्छी नहीं लगती। अगर गूगल पर ईमानदार बुद्धिजीवियों के विचारों को सर्च किया जायेगा तो बहुमत उनके विरुद्ध ही मिलेगा।
चुनाव परिणाम केवल वोटों की संख्या का पता देते हैं।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629


सोमवार, दिसंबर 05, 2016

मौलिक मोदी के बेलिबास बोल

मौलिक मोदी के बेलिबास बोल










वीरेन्द्र जैन
गत दिवस मोरादाबाद में आयोजित परिवर्तन रैली में मोदी का भाषण सुनने के बाद वह सज्जन भी निराश दिखे जो उन्हें भाजपा और भारत का एक मात्र उद्धारक मानने लगे थे। उनका कहना था कि असल मोदी और प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी से लेकर प्रधानमंत्री के रूप में अपनी बात कहने वाले मोदी अलग अलग हैं। चुनावी भाषणों के समय मूल मोदी सामने आ जाते हैं। सम्बन्धित व्यक्ति की नाराजी उनके उस कथन को लेकर थी जिसमें उन्होंने जनधन वाले खातों में विमुद्रीकरण के बाद जमा किये गये काले धन को वापिस न करने का आवाहन किया था। इस सम्बन्ध में मोदी जी ने कहा था कि जिनके खातों में किन्हीं सम्पन्न लोगों ने अपना काला धन जमा करवाया है वे उसे वापिस न करें। सरकार उसे कानूनी रूप देकर उसी व्यक्ति का धन बनाने के बारे में दिमाग लगा रही है।
तकनीकी रूप से मोदी का उक्त कथन न केवल गैरकानूनी था अपितु अनैतिक भी था। सरकार कानूनी कार्यवाही करके अवैध धन को जब्त कर सकती है, सम्बन्धित पर उचित करारोपण करके दण्ड वसूल सकती है, सजा दे सकती है, किंतु संविधान की शपथ लिए हुये प्रधानमंत्री जैसा कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से अमानत में खयानत करने जैसा बयान नहीं दे सकता। नैतिकता का तकाजा भी यही है कि लिये हुए धन को जिन शर्तों पर लिया गया हो उसी के अनुसार वापिस किया जाये। जो काम सरकार का है वह सरकार करे। विमुद्रीकरण योजना घोषित करते समय भी इस बात के लिए सावधान किया गया था कि कोई भी व्यक्ति यदि दूसरे के धन को अपने खाते में जमा करायेगा तो वह दण्ड का भागी होगा। यदि किसी ने जानबूझ कर ऐसा किया है तो उसे नियमानुसार दण्डित किया जा सकता है, न कि उस धन को वापिस न देने की सलाह देकर दबंगों से द्वन्द की सलाह देनी चाहिए।
इसी अवसर पर उन्होंने अपने विरोधियों के आरोपों का उत्तर देने के बजाय अपने गैर जिम्मेवार होने का प्रमाण यह कहते हुए दिया कि मेरा कोई क्या बिगाड़ सकता है मैं तो फकीर हूं, अपना थैला लेकर चल पड़ूंगा। किसी देश के जिम्मेवार पद पर पहुँचने के बाद क्या ऐसी वापिसी सम्भव है? यदि युद्ध के समय कोई सैनिक अपनी नौकरी छोड़ कर जाने लगे तो क्या उसे जाने दिया जा सकता है। स्मरणीय है कि राजीव गाँधी की हत्या के बाद बहुत सारे काँग्रेसजनों ने सोनिया गाँधी को काँग्रेस की कमान सम्हालने का आग्रह किया था किंतु उन्होंने दस साल तक इस जिम्मेवारी को लेने से इंकार किया पर एक बार जिम्मेवारी लेने के बाद आये अनेक संकटों के बाद भी पीछे नहीं हटीं। इसी तरह मनमोहन सिंह जो स्वभाव से एक ब्यूरोक्रेट हैं, ने प्रधानमंत्री पद की जिम्मेवारी सौंप दिये जीने के बाद उसे पूरी ईमानदारी और जिम्मेवारी से निभाया व गठबन्धन के दबावों और विपक्षियों की आलोचना के परिणाम स्वरूप जन्मी विपरीत परिस्तिथियों में भी पीछे नहीं हटे, भले ही उनकी गैर जिम्मेवार आलोचना भी की गई।
श्री नरेन्द्र मोदी एक लोकप्रिय वक्ता हैं किंतु यह लोकप्रियता आज के कवि सम्मेलनों के चुटकलेबाज कवियों की लोकप्रियता जैसी शैली के कारण है। किंतु जब उक्त शैली में प्रधानमंत्री पद के साथ भाषण देते हैं तो वे पद की गरिमा को गिरा रहे होते हैं। उल्लेखनीय है कि गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद घटित प्रायोजित दंगों में उनकी भूमिका पर कई आरोप लगे थे और जब उस समय की उत्तेजना के प्रभाव से चुनाव को बचाने के लिए तत्कालीन चुनाव आयुक्त लिग्दोह ने चुनावों को स्थगित किया था तब श्री मोदी ने उनकी जिस भाषा में सार्वजनिक मंचों से आलोचना की थी, वह बहुत असंसदीय भाषा में थी। अपनी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के लिए विख्यात उस अधिकारी पर साम्प्रदायिक आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा था कि शायद वे सोनिया गाँधी से चर्च में मिलते होंगे। स्वयं सोनिया गाँधी पर आरोप लगाते हुए उन्होंने उनके विदेशी मूल पर सवाल उठाने के लिए जर्सी गाय जैसी उपमा का प्रयोग किया था। इसी दौरान मुसलमानों के खिलाफ बोलते हुए उन्होंने पाँच बीबियां पच्चीस बच्चे जैसा जुमला उछाला था। गुजरात के नरसंहार की पक्षधरता करते हुए उन्होंने क्रिया की प्रतिक्रिया जैसा बयान भी दिया था, क्योंकि उनकी भाषा ही यही रही है।
गुजरात नरसंहार पर अटलबिहारी वाजपेयी द्वारा राजधर्म के पालन का बयान देने के बाद उनसे उम्मीद की गई थी कि वे केवल सुशासन पर ध्यान देंगे। संयोग से उसके बाद उनके सामने कोई कठिन चुनौती नहीं आयी इसलिए बयान चर्चा में नहीं रहे, जब तक कि उन्हें प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित नहीं कर दिया गया। लोकसभा चुनावों के दौरान उन्होंने विदेशी मीडिया को दिये इकलौते साक्षात्कार के बाद चुनावी तिथि से ठीक पहले दिये कुछ फिक्स साक्षात्कारों को छोड़ कर कोई साक्षात्कार नहीं दिया। उक्त इकलौते साक्षात्कार में उन्होंने 2002 के दंगों की हिंसा में मारे गये लोगों की तुलना कुत्ते के पिल्ले से कर दी थी।
माना जाता है कि जब वे सहज होकर बोलते हैं तो भाषा और प्रतीकों में आदर्श मानकों से डिग जाते हैं। पिछले दिनों उन्होंने आमसभाओं में जो कहा उसका नमूना देखिए-
·         अगर में सौ दिन में काला धन नहीं लाया तो मुझे फाँसी पर चढा देना
·         मैं इतना बुरा था तो मुझे थप्पड़ मार लेते
·         अगर मैं वादा तोड़ूं तो मुझे लात मार देना
·         दलितों को कुछ मत कहो चाहे मुझे गोली मार दो
·         अगर पचास दिन में सब ठीक नहीं किया तो मुझे ज़िन्दा जला देना
नोटबन्दी के लिए जो कारण गिनाये गये थे उनमें से कोई भी पूरा होता दिखाई नहीं दे रहा है तथा समर्थक वर्ग में उनकी छवि खराब हो चुकी है। वे देश के महत्वपूर्ण पद पर हैं और पार्टी व गठबन्धन में उन्हें कोई चुनौती देने का साहस नहीं कर पा रहा है।
   पाकिस्तानी सीमा पर हो रही गोलीबारी, और तथा गुर्जर, जाट, पटेल, मराठाओं के आन्दोलनों व उन आन्दोलनों के प्रति सरकार का रवैया देखते हुए कहा जा सकता है कि देश के लिए यह कठिन समय है।    
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

   

मंगलवार, नवंबर 22, 2016

नोटबन्दी पर विश्वसनीयता का सवाल

नोटबन्दी पर विश्वसनीयता का सवाल
वीरेन्द्र जैन

नोटबन्दी के कारण हुयी पचास से अधिक मौतों, मुद्रा के संकट से उत्पन्न बाजार के लकवाग्रस्त होने, अर्थव्यवस्था और बैंकिंग व्यवस्था पर तरह तरह के संकट आने से घबराहट का जो माहौल बना उस घटनाक्रम से नरेन्द्र मोदी की बची खुची छवि पर गहरा दाग लगा है। उससे पहले उन्हें भूमि अधिग्रहण पर अपनी सरकार का फैसला वापिस लेना पड़ा था, और जीएसटी आदि मुद्दों पर भी समझौता करना पड़ा था। अपने वादों को चुनावी जुमला बता कर उन्होंने अपनी विश्वसनीयता को कम किया था व सीमा पर घोषित शत्रु से निबटने में पिछली सरकार जैसा ही काम करने से उनका बहादुरी का मेकअप धुल चुका था। असम के उग्रवादियों पर वर्मा की सीमा में घुस कर हमला करने की अतिरंजना से लेकर जे एन यू, सर्जिकल स्ट्राइक आदि के सरकारी सच में असत्य के अंश पकड़े जाने से उनके समर्थकों को ठेस लग चुकी थी। लोकसभा चुनाव के ठीक बाद दिल्ली और बिहार के चुनावों में मिली पराजय से जन भावनाओं में आये बदलाव के संकेत मिल गये थे। कहने की जरूरत नहीं कि लोकसभा चुनावों के दौरान मोदी की प्रचार एजेंसियों ने उनकी छवि एक राबिनहुड की बनायी थी जो 56 इंच के सीने वाला था और आते ही सारे संकटों को दूर कर देने वाला था। पिछली केन्द्र सरकार के कारनामों से परेशान अवतारवाद में भरोसा करने वाले समाज के एक हिस्से ने उन्हें अवतार की तरह देखा भी था जो लोकसभा में उनकी जीत का कारण बना था।
उल्लेखनीय है कि मोदी और अमितशाह की जोड़ी ने भारतीय जनता पार्टी को मोदी जनता पार्टी में बदल दिया था व भाजपा के सारे पुराने प्रमुख नेताओं को हाशिए पर धकेल दिया था। इसलिए जिम्मेवारी भी पूरी तरह से सिर्फ और सिर्फ नरेन्द्र मोदी पर आती है क्योंकि यह उनका ही फैसला था जिसे उन्होंने अपने दल ही नहीं अपितु अपने मंत्रिमण्डल के सदस्यों तक से साझा नहीं किया। शरद यादव ने तो संसद में सदन के पटल पर आरोप लगाया कि मोदी ने इस कार्यवाही को वित्त मंत्री अरुण जैटली तक से छुपाये रखा। समाचार के अनुसार जिन छह सदस्यों के साथ अंतिम दौर की बैठक हुयी उन्हें भी तब तक कमरे से बाहर नहीं आने दिया गया जब तक कि श्री मोदी ने टेलीविजन पर राष्ट्र के नाम सन्देश प्रसारित नहीं कर दिया।
नोटबन्दी के फैसले के तीन प्रमुख उद्देश्य बताये गये थे जिन पर पूरे देश और सभी राजनीतिक दलों की लगभग सहमति थी किंतु जैसा कि कोलकता हाईकोर्ट ने कहा है कि योजना लागू करने से पहले पूरा होमवर्क नहीं किया गया जिससे पूरे देश को तकलीफ हुयी व व्यवस्था के प्रति इतना अविश्वास पैदा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने देश की सड़कों पर हिंसा फैलने की सम्भावना व्यक्त की। बाद में राजनीतिक दलों ने इस कमजोरी का पूरा लाभ लिया जो उनकी जिम्मेवारी का हिस्सा था और जिसका उन्हें हक भी था।
एक बार विश्वास भंग हो जाने के बाद अब मोदी समर्थक भी कहने लगे हैं कि इस सरकार का इरादा काले धन से मुक्ति पाने का इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि इसका जन्म भी काले धन के सहारे ही हुआ था। चुनावी खर्चों पर ध्यान रखने वाली संस्थाओं ने बताया था कि इन्होंने लोकसभा में कम से कम दस हजार करोड़ रुपये खर्च किये थे जिसका बड़ा हिस्सा काले धन का ही था। दूसरे जो इनका समर्थक वर्ग है उसी के पास काले धन का बड़ा हिस्सा है और उसे भरोसा रहा है कि उनकी सरकार काले धन के खिलाफ कुछ नहीं करेगी। शत्रु देश से नकली करेंसी आने के सवाल पर लोगों का सोचना है कि यह मुख्य रूप से शत्रुता पर निर्भर है और जो देश एक तरह की नकली करेंसी भेज सकता है वह कुछ समय बाद दूसरे तरह की नई करेंसी भी भेज सकता है, इसलिए इससे निबटने के लिए सुरक्षातंत्र को मजबूत करना ज्यादा जरूरी है। देश में बाजार, शिक्षा और चेतना का स्तर देखते हुए प्लास्टिक मनी व इलैक्ट्रोनिक ट्रांसफर में मामूली सी वृद्धि ही सम्भव है। जहाँ तक कश्मीर जैसे अलगाववादी आन्दोलन में अवैध करेंसी के स्तेमाल का सवाल है तो इसमें कितना सच है और कितना अनुमान है यह तय होना शेष है।
अब समस्या यह है कि बिल्ली बोरे में कैसे जायेगी? कुछ राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए राजनीतिक दल असंतोष को भुनाने के लिए तैयार हैं इस बहाने वे अपने पक्ष के काले धन को निबटाने के उपाय भी तलाश रहे हैं क्योंकि उनका अपना भविष्य भी इन्हीं चुनावों पर निर्भर है। समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री तो मन्दी के समय में काले धन के लाभ भी गिनाने लगे हैं। मोदी के गठबन्धन में शामिल शिव सेना जैसे दल तो मुखर विरोध कर रहे हैं किंतु अकाली दल भी संतुष्ट नजर नहीं आ रहा। अरुण जैटली कह चुके हैं कि फैसले को वापिस नहीं लिया जा सकता। अगर फैसला वापिस लिया गया तो एक बड़ा वर्ग जो परेशानियां सह कर भी घोषित उद्देश्यों के कारण समर्थन कर रहा था, असंतुष्ट हो सकता है।
सब कुछ मिला कर नीतियों की कमजोरियां, कार्यांवयन में ढुलमुलपन, नेतृत्व में सामूहिकता की कमी, निहित स्वार्थों का दबाव, जनता की समस्याओं के प्रति उदासीनता आदि ही सामने आ रहा है। इस पर भी साम्प्रदायिकता फैलाने वाले संगठनों का दबाव भी सरकार की छवि को निरंतर बिगाड़ता रहता है। मोदी जी ने अपने सांसदों को जनता को समझाने की जिम्मेवारी सौंपी थी जिसे उन्होंने बेमन से स्वीकार किया है। निदा फाज़ली के शब्दों में कहा जाये तो-
कभी कभी यूं भी हमने अपने मन को समझाया है
जिन बातों को खुद नहिं समझे, औरों को समझाया है
देश की सरकार विश्वास के गहरे संकट से जूझ रही है 
वीरेन्द्र जैन
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