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मंगलवार, जुलाई 02, 2013

राष्ट्रीय दल की मान्यता और संकीर्ण चरित्र

राष्ट्रीय दल की मान्यता और संकीर्ण चरित्र
वीरेन्द्र जैन     
       इसे देश की बिडम्बना ही कहा जायेगा कि भारतीय जनता पार्टी जैसा दल आज एक राष्ट्रीय दल ही नहीं अपितु जोड़ तोड़ के सहारे मुख्य विपक्षी दल भी बना हुआ है, जिसके साथ यह आशंका निहित रहती है कि सत्तारूढ दल की अलोकप्रियता की स्थिति में वह केन्द्र में सरकार बनाने के लिए किसी गठबन्धन का नेतृत्व कर सकता है। वैसे यह एक सुखद संयोग ही है कि कभी इस दल को स्वतंत्र रूप से केन्द्र की सरकार चलाने का मौका नहीं मिला, और न ही भविष्य में ऐसी कोई सम्भावनाएं हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के आनुषंगिक संगठनों में चुनावी राजनीति के लिए बनाये गये इस संगठन के विस्तार की अपनी सीमाएं रही हैं जिनके चलते इसे कभी भी व्यापक समर्थन नहीं मिला क्योंकि भिन्न भिन्न संस्कृतियों के इस देश की जनता अवैज्ञनिक और संकीर्ण सोच के किसी कट्टर साम्प्रदायिक संगठन को सत्ता नहीं सौंपना चाहती। सत्ता पाने के लिए संघ ने इसे तरह तरह के समझौते करने के लिए अनुमतियां दीं जिसके परिणाम स्वरूप इसने एक भिन्न तरह की पार्टी होने के दावे को केवल एक खोखला दावा ही रखा है। सत्ता पाने के लिए इसने देश के दूसरे सत्तारूढ दलों और सहयोगियों की अच्छाइयां तो ग्रहण नहीं कीं पर उनकी सारी बुराइयों को आत्मसात कर लिया। इन बुराइयों को अपनाने के लिए संघ ने कभी भी इनकी आलोचना नहीं की जबकि वह इसके छोटे से छोटे काम पर निगाह रख कर अपना नियंत्रण बनाये रखता है।  
       अभी हाल ही में उत्तराखण्ड में भयानक त्रासदी घटित हुयी जिसमें मृतकों की संख्या का अनुमान दस हजार से अधिक लगाया जा रहा है। इसके अलावा सैकड़ों भवनों, होटलों, धर्मशालाओं के अलावा हजारों गाँवों सड़कों व पुलों को व्यापक नुकसान हुआ। इस त्रासदी के लिए प्राकृतिक प्रकोप के अलावा अनियंत्रित अविवेकपूर्ण विकास और पर्यावरण को पहुँचाये गये नुकसान को भी जिम्मेवार माना जा रहा है। इसमें से अनेक योजनाएं पिछले दिनों रहे भाजपा शासनकाल में भी या तो प्रारम्भ हुयीं अथवा पूर्ण हुयीं हैं। यद्यपि इस त्रासदी के कारणों पर विचार विमर्श अभी जारी है और उम्मीद है कि जल्दी ही कोई जाँच समिति भी स्थापित होगी जो भविष्य में ऐसी दुर्घटनाओं को रोकने के लिए कुछ सुधारात्मक उपाय भी सुझायेगी। किंतु दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इस राष्ट्रीय पार्टी ने अपनी वरिष्ठ उपाध्यक्ष उमा भारती के माध्यम से दुर्घटना के बाद बयान दिलवाया कि यह त्रासदी उत्तराखण्ड में धारादेवी के मन्दिर को विस्थापित करने के पाप से जनित दैवीय कोप के कारण घटित हुयी। तीन साल पहले भी जब उत्तराखण्ड में ऐसी ही त्रासदी घटित हुयी थी तब भी पाँच सौ गाँव प्रभावित हुये थे जिनके पुनर्वास के लिए अबतक भी कुछ सार्थक नहीं किया गया, उल्टे तत्कालीन भाजपायी मुख्यमंत्री ने तबाही से पीड़ित लोगों को भजन-संकीर्तन करने की सलाह दी थी। स्मरणीय है कि परमाणु परीक्षण करते समय भाजपा के तत्कालीन प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लाल बहादुर शास्त्री के प्रसिद्ध नारे ‘जय जवान जय किसान’ में ‘जय विज्ञान’ जोड़ते हुए वैज्ञानिक सोच को नमन किया था, जिस पर संघ परिवार ने कभी अमल नहीं किया। इस पार्टी ने सदैव ही अन्धविश्वास को बढा कर उसका चुनावी लाभ लेने की कोशिश की है।      
       भाजपा के ही एक दूसरे बड़े नेता सांसद योगी आदित्यनाथ ने कहा कि यह त्रासदी चीन द्वारा हिमालय में की गयी छेड़छाड़ का परिणाम हो सकती है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1998-99 के दौरान हिमाचल प्रदेश में इसी तरह की तबाही लाने के लिए चीन इस तरह की हरकतें पहले भी कर चुका है। कोई आश्चर्य नहीं कि उसने केदारनाथ से ऊपर पहाड़ियों में प्राकृतिक संसाधनों से छेड़छाड़ कर प्राकृतिक आपदा जैसे हालात पैदा कर दिए हों। वैसे भी केदारनाथ धाम से थोड़ी ऊंचाई पर वासुकी झील स्थित है, जहां कोई भी छेड़छाड़ होने से आपदा जैसे हालात पैदा हो सकते हैं। भाजपा के विद्वान सांसद यह भूल गये कि 1998-99 के दौरान देश में किसकी सरकार थी और इस तरह के हास्यास्पद आरोपों के बारे में उस सरकार के क्या विचार थे!
       भाजपा के नेता यदाकदा ऐसे बयान देते ही रहते हैं जिससे उनके सोच विचार का स्तर प्रकट होता रहता है। एनडीए के शासन काल में ही अस्पतालों में मंत्र चिकित्सा स्थापित करने का विचार सामने आया था और विश्वविद्यालयों में ज्योतिष के पाठ्यक्रम प्रारम्भ किये गये थे। अभी भी वे धर्मस्थलों में जमा बेशुमार दौलत को जनहित या धार्मिक आयोजनों की व्यवस्था में लगाने की मांग के साथ खड़े दिखाई नहीं देते, न ही इसका उपयोग शिक्षा और स्वास्थ के लिए किये जाने के पक्षधर हैं। नदियों की सुरक्षा और स्वच्छता की जगह वे केवल धार्मिक महत्व की नदियों के प्रति भावनात्मक आन्दोलन उभारने के लिए पार्टी के कुछ अनचाहे लोगों को जिम्मेवारी सौंप कर अलग हो जाते हैं व उन्हीं की सरकारें उन नदियों को प्रदूषित करवाती रहती हैं। उनकी पूरी पार्टी ने मिलकर कभी भी निरंतर गन्दे नाले में बदलती जा रही गंगा नदी की स्वच्छता के लिए कोई अभियान नहीं छेड़ा, अपितु उसे उमाभारती को सौंप कर मुक्त हो गयी।
       जब हत्या आदि अपराधों के प्रकरण भगवा भेषधारियों पर चलते हैं तो पूर्व प्रधानमंत्री समेत भाजपा के वरिष्ठ नेता न्याय पर भरोसा न कर धरने पर बैठ जाते हैं और जब आतंकवाद के खिलाफ भगवा धार्मिक भेष में छुपे लोग पकड़े जाते हैं तो आतंकवाद को देश की मुख्य समस्या बताने वाले इस दल के नेता उमा भारती और राजनाथ सिंह उनसे मिलने के लिए जेल में जाते हैं। दूसरी ओर दूसरे धर्मों से जुड़े अनेक निर्दोष लोगों के जेल में रहने के खिलाफ कभी आवाज़ भी नहीं उठाते।
       पिछले वर्षों में भाजपा शासित मध्य प्रदेश में कम वर्षा से निबटने के लिए सरकारी खर्च पर यज्ञों का आयोजन करवाया गया था। इसी प्रदेश में कानून व्यवस्था के लिए पुलिस हैड क़्वार्टर में यज्ञों का आयोजन होता है व ज्यादातर थानों में मन्दिर बनवा दिये गये हैं, पर कानून व्यवस्था की हालत दिन प्रति दिन खराब होती जा रही है। हिन्दू विधि से भूमि पूजन और शिलान्यास आदि प्रत्येक सरकारी कार्यक्रम का हिस्सा बन चुका है जिसमें बड़ी राशि व्यय की जाती है। सरकारी स्कूलों में प्रवेश से पूर्व तिलक लगाने की नई परम्परा डाली जा रही है जिससे दूसरे धर्म के छात्रों को या तो अनचाहे सम्मलित होना पड़ता है या स्कूल से ही छात्रों-छात्रों के बीच धार्मिक आधार पर भेद पैदा हो जाते हैं। प्रदेश में मुफ्त तीर्थयात्रा योजना के पीछे भी ऐसी ही सोच रही है।     
       किसी भी राष्ट्रीय दल को संविधान की मूल भावना अर्थात धर्म, जाति, रंग, भाषा, और लिंग भेद के बिना कार्य करना चाहिए किंतु राष्ट्रीय दलों में भाजपा एक ऐसा दल है जो सत्ता पाने की जल्दी में सभी तरह के अनैतिक कदमों को अपनाने और फिर आरोपों को कुतर्कों के सहारे गलत वकालत करने के लिए जाना जाता है। उनके बड़े बड़े नेताओं के बयान किसी मुहल्ले स्तर के नेताओं की तरह उद्दण्ड और गैरज़िम्मेवार होते हैं जिसके लिए वे कभी खेद भी प्रकट नहीं करते।   
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629



रविवार, मई 15, 2011

विधान सभा चुनाव परिणामों में राष्ट्रिय दल और राष्ट्रीय एकता का प्रश्न



विधानसभा चुनाव परिणामों में राष्ट्रीय दल और राष्ट्रीय एकता का प्रश्न
वीरेन्द्र जैन
पाँच राज्यों में हुए चुनाव के परिणामों से देश में किसी सुचिंतित राजनीतिक धारा का संकेत नहीं मिलता है जो देश के लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से चिंता का विषय होना चाहिए। चालू मीडिया की सतही दृष्टि भले ही इसे कांग्रेस की विजय और बामपंथ की हार के रूप में चित्रित कर रही हो किंतु यथार्थ में ऐसा नहीं है। इन चुनावों में जो मुद्दे उभरे थे वे भ्रष्टाचार, मँहगाई, बदलाव [पोरवोरतन], नक्सलवाद का उभार, विदेशी शरणार्थी, आदि थे, जिनमें से कुछ राष्ट्रीय स्तर के थे तो कुछ क्षेत्रीय स्तर की मामूली बातों, और किसी पार्टी के लम्बे शासन से उपजी ऊब से जन्मे थे। खेद की बात है कि साठ साल हो जाने के बाद लोकतंत्र में राजनीतिक परिपक्वता आनी चाहिए थी किंतु उसकी जगह सतही स्थानीयता और सतही उत्तेजना के सहारे देश का भविष्य लिखा जा रहा है।
इन चुनाव परिणामों में राष्ट्रीय दलों को हुए नुकसान में सबसे निराशा जनक प्रदर्शन बसपा और भाजपा का ही हुआ है। भाजपा जो संसद में मुख्य विपक्षी दल है और पिछले दिनों केन्द्र में जिसके नेतृत्व में सरकार बन चुकी है, की उपस्तिथि असम को छोड़ कर कहीं दर्ज नहीं हुयी। भाजपा ने कुल 824 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे पर केवल असम में उसे पाँच सीटें बहुत कम अंतर की जीत से मिल सकीं। बाकी राज्यों में यह हिन्दूवादी दल शून्य पर ही रहा। इससे भी बुरा हाल बसपा का रहा जो कोई सीट नहीं जीत सकी। बंगाल और केरल में उनके मतों के प्रतिशत में ह्रास हुआ है। शायद यही कारण है कि चिदम्बरम जैसे नेता उत्तर-पश्चिम के राज्य विहीन भारत की स्वर्णिम कल्पना करते हैं और अमेरिकन राजदूत के सामने उत्तर दक्षिण मिला कर एक देश होने का दुखड़ा रोते हैं। राष्ट्रीय कहलाने वाले जो दल अपने अपने कोने पकड़े बैठे हैं वे अपना प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित करके अपनी और अपने नेता दोनों की ही खिल्ली उड़वाते हैं।

कांग्रेस को चुनाव परिणामों से खुश बताया जा रहा है पर उसके खुश होने का कोई कारण नहीं है। तामिलनाडु में उसे कुल पाँच सीटें ही मिल सकी हैं, और उसका गठबन्धन बुरी तरह हार गया है। टीवी के चुनाव विश्लेषण में उसके नेता इसे उसके गठबन्धन के साथी डीएमके के भ्रष्टाचार को दोषी बता रहे हैं किंतु जो एआईडीएमके जीती है उसकी छवि भी इस मामले में कोई खास अच्छी नहीं है। यही हाल पद्दुचेरी[पाण्डुचेरी] राज्य में भी हुआ जहाँ उसे सत्ता से दूर होना पड़ा। केरल में जो उसका गठबन्धन जीता है वह बहुत ही कम मार्जिन से जीत पाया है। इस गठबन्धन में भी 49प्रतिशत सीटें दूसरे दलों की हैं इनमें से कई उसके साथ केवल चुनावी साथी की तरह ही गठबन्धन में सम्मिलित हुए थे और उन्हें हर अवसर पर अपनी मित्रता का नवीनीकरण कराना होगा जो उसके सहयोगी दलों की शर्तों पर ही होगा। इस गठबन्धन में भी 20 सीटें तो मुस्लिम लीग की हैं तथा उनका बैलेंस बिगाड़ सकने की क्षमता रखने वाले और भी कई दल हैं। इसके विपरीत बामपंथी मोर्चे की मजबूती यह है कि सीपीआई, सीपीएम और आरएसपी को मिला कर ही उनकी 60 सीटें होती हैं। इनको प्राप्त कुल मतों का भी यही अनुपात है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने अपनी सीटें पिछले चुनाव से दुगनी कर ली हैं किंतु वे ममता बनर्जी के जूनियर पार्टनर बन कर और बने रहकर ही रहना होगा क्योंकि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को अकेले ही 184 अर्थात 61 प्रतिशत से अधिक सीटें मिली हैं। इससे कांग्रेस को केन्द्र में भी दबाव का सामना करना पड़ेगा। स्मरणीय है कि ममता बनर्जी कभी कभी बेहद बचकानी जिद पर उतर आती हैं और स्तीफा फेंक मारने में देर नहीं लगातीं। इस तरह कांग्रेस को चाहे केरल हो या बंगाल दोनों ही राज्यों में राजनीतिक दृष्टि से कमजोर ही होना पड़ा है। उसे अगर लाभ हुआ है तो वह असम में हुआ है जहाँ पर उसकी सीटें 53 से 78 हो गयी हैं। इससे उसकी स्वतंत्रता में बढोत्तरी हुयी है। उत्तर पूर्व के इस राज्य में आल इंडिया यूनाइटिड डेमोक्रेटिक फ्रंट जो इस्लामी तत्ववादियों का दल है, अभी भी बना हुआ है जो भविष्य में कभी भी दुखदायी हो सकता है। दूसरे राज्यों के उपचुनावों में भी कांग्रेस को झटका लगा है वह आन्ध्र प्रदेश में कांग्रेस के विद्रोही जगन मोहन से लोकसभा और उसकी माँ से विधानसभा सीट हार कर आन्ध्र प्रदेश में कमजोर हुयी है तो छत्तीसगढ में लोकसभा की सीट हारकर और कर्नाटक उत्तर प्रदेश व नागालेंड में विधानसभा की सीटें हार कर पिछड़ गयी है। सीपीआई सीपीएम जैसे राष्ट्रीय दलों से बने बाम मोर्चे को दो राज्यों की सरकारों से हाथ धोना पड़ा है और चुनावी राजनीति करने वाले दलों के बीच इसे उन्हें मिले बड़े धक्के के रूप में लिया जा रहा है जबकि ये दल और इनका नेतृत्व अपने तथाकथित शुभचिंतकों से कम चिंतित है। इन दलों ने सत्ता में रहते हुए सत्ता के कम से कम लाभ लिये इसलिए सत्ता का जाना उनका व्यक्तिगत नुकसान न होकर राजनीतिक नुकसान है जब कि उनके दुश्मन और कई दोस्त चुनावी दलों की तरह से ही सोच कर खुश और दुखी होते हैं। वैसे भी कांग्रेस के 170, भाजपा के 5, बसपा के शून्य, की तुलना में उनके 150 से अधिक विधायक जीते हैं। इस चुनावी जीत हार के बाद भी अगर कोई दल राजनीतिक रूप से सर्वाधिक निरंतर सक्रिय रहेगा तो वे बामपंथी दल ही होंगे।
कुल मिला कर इन चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के 185 एआईडीएमके के 155 और डीएमके के 25 विधायक मिल कर राष्ट्रीय दलों को मुँह चिड़ा रहे हैं। यदि चुनावों में इसी तरह क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय दलों पर हावी होते गये तो राष्ट्रीय एकता को चुनौती मिलेगी क्योंकि क्षेत्रीय दलों और नेताओं की अपनी सीमित सोच और स्वार्थ होते हैं। ममता बनर्जी ने केन्द्र की राजनीति करते हुए भी कभी भी बंगाल से बाहर नहीं सोचा और जयललिता तो तामिलनाडु में रहकर भी अपने महल से दूर से दर्शन देती रही हैं। उनकी सरकार में उनके गठबन्धन सहयोगी सीपीआई और सीपीएम सम्मलित नहीं होंगे क्योंकि जब तक वे अपने फैसले लागू कराने की स्तिथि में नहीं होते तब तक सरकार में सम्मलित होना पसन्द नहीं करते। राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से राष्ट्रीय दलों को इस स्तिथि पर मंथन करना चाहिए।



वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629