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सोमवार, फ़रवरी 24, 2020

राजनेताओं के बयानों और आचरण में गम्भीरता का अभाव

राजनेताओं के बयानों और आचरण में गम्भीरता का अभाव
वीरेन्द्र जैन

भारत एक बड़ा व महान देश है जिसे इन दिनों ओछे और निचले स्तर के नेता चला रहे हैं।
पिछले दिनों जब पुलवामा कांड को एक साल पूरी हुआ तब राहुल गाँधी ने एक सवाल पूछा कि उक्त घटना की जाँच रिपोर्ट में क्या निकला, व हमारे 40 जवानों को शिकार बना देने वाली घटना की खामियों के लिए किसको उत्तरदायी ठहराया गया। देश की सबसे बड़ी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष की इस बात पर मोदीशाह की भाजपा के सभी महत्वपूर्ण नेता बौखला गये| इस स्वाभाविक सवाल का सीधा जबाब देने की जगह सम्बित पात्रा टीवी की बहसों की तरह विषय को भटका कर उन्हें लश्करे-ए तैयाबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठनों के साथ सहानिभूति रखने वाला बताने लगे। उल्लेखनीय है कि घटना के ठीक बाद जम्मू कश्मीर के राज्यपाल ने सुरक्षा में खामियों की चर्चा की थी। उनके ही एक और बड़बोले प्रवक्ता जीवीएल नरसिंहाराव ने तो इसे सुरक्षा बलों पर निशाना बता दिया व राहुल गाँधी को शर्म करने की सलाह देते हुए टिप्पणी की कि वे पाकिस्तान से सवाल नहीं करेंगे, अर्थात उनकी सहानिभूति दुश्मन देश पाकिस्तान से है। ।
मैं और जिन लोगों से भी मैंने चर्चा की, वे भी यह नहीं समझ पाये कि इस उचित सवाल को करने वाले को परोक्ष में गद्दार और देशद्रोही बताना कहाँ तक उचित है? यह सही है कि पहले से संकेत मिल जाने के बाद भी हमारी सुरक्षा सम्बन्धी खामियों के कारण ही हमारे इतने जवान एक साथ मारे गये, इसलिए जरूरी था कि उन खामियों को पहचाना जाये व संकेत मिलने के बाद भी चूक करने वाले को नियमानुसार दण्डित किया जाये। इसके विपरीत जाँच रिपोर्ट को छुपाया जा रहा है जिससे लग सकता है कि दोषियों को बचाया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि इस घटना के बाद सीमा पर युद्ध का वातावरण बनाते हुए जो चुनाव सम्पन्न हुये उनके प्रचार में इस घटना का भरपूर चुनावी उपयोग किया गया। जनता की निगाह में गद्दार और देशद्रोही ठहराये जाने के खतरे से बचने के लिए देशहित में विपक्ष ने सरकार के साथ खड़े होने की घोषणा की। इसका भी सत्तारूढ दल ने चुनावी लाभ उठाया। यहाँ सवाल राहुल या किसी अन्य नेता के चरित्र चित्रण का नहीं है अपितु देश की सुरक्षा की खामियों और उसके सहारे राजनीति करने का है। सच तो यह है कि राहुल गाँधी से पहले इस सवाल को तो देशभक्ति का ढिंढोरा पीटने वाली भाजपा के ही किसी सदस्य को पूछना चाहिए था। खेदजनक है कि मोदीशाह का नेतृत्व आने के बाद भाजपा में ऐसे नेता सक्रिय नहीं हैं जो खुद सोच सकें, और सोच कर सवाल पूछने का साहस कर सकें। केवल पूर्व सांसद उदित राज ही यह सवाल उठा सके, पर वे भाजपा छोड़ चुके हैं।
केजरीवाल ने अपने चुनाव प्रचार में किसी पत्रकार के पूछने पर पूरा हनुमान चालीसा सुना दिया। पता नहीं यह घटना स्वाभाविक रूप से घटी या आपकी अदालत की तरह प्रायोजित थी, किंतु उसके बाद केजरीवाल हनुमान मन्दिर में पूजा करने गये। चुनाव परिणाम में जीतने की सूचना आने के बाद उन्होंने अपने समर्थकों को याद दिलाया कि आज मंगल है, हनुमान जी का दिन है और उनके आशीर्वाद से विजय मिली है। वे बाद में भी सपरिवार हनुमान मन्दिर गये। कहा जाता है कि इस बार चुनावों के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने उनके लिए काम किया था और बहुत सम्भव है कि चुनाव में मुख्य प्रतियोगी भाजपा के धार्मिक, राम मन्दिर, कार्ड की काट के लिए उन्हें हनुमान भक्त बनने की सलाह दी गयी हो। उल्लेखनीय है कि दो-ढाई वर्ष पूर्व केजरीवाल ने जैनमुनि तरुण सागर को अपने निवास पर आमंत्रित किया था और उसके बाद ही अरुण जैटली प्रकरण में क्षमा मांग ली थी। वैसे तो यह उनका निजी ममला है किंतु यह सब कुछ सार्वजनिक हुआ था, जिससे इसका राजनीतिक महत्व भी हो जाता है।
केजरीवाल ने जब अन्ना आदि के साथ मिल कर लोकपाल के लिए आन्दोलन किया था तब उस आन्दोलन को शुद्ध रूप से गैरराजनीतिक आन्दोलन बताया था तथा इसे हड़पने की कोशिश करने वाले राजनीतिक दलों के लोगों को जिनमें उमा भारती, और स्वभिमान दल के रामदेव आदि को धरना स्थल से बाहर करवा दिया था। बाद में जब आन्दोलन बिखर गया तब उन्होंने खुद राजनीतिक दल बनाया और भिन्न तरह की ईमानदार राजनीति का वादा किया। रामलीला मैदान में पहली बार शपथ ग्रहण करते समय जो गीत गाया, उसके बोल थे-
इंसान का इंसान से हो भाईचारा / यही पैगाम हमारा
यह गीत धरमनिरपेक्षता का पैगाम देता था। इस बार उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय शांति गीत ‘ हम होंगे कामयाब, एक दिन’ का समूह पाठ किया। उन्होंने अपना लोकसभा का चुनाव भी सीधे प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी के खिलाफ लड़ कर भी ऐसा ही सन्देश देने की कोशिश की थी। अपनी जीत को हनुमानजी की कृपा से जोड़ने के बाद उनके राजनीतिक सन्देश का सुर बदला हुआ लगता है। या तो वे भाजपा की कूटनीति की तरह आस्थावानों को बहलाने की कोशिश कर रहे हैं या वे स्वयं अपनी समाजसेवा की राजनीति से देवकृपा की चुनावी कूटनीति की ओर बढ रहे हैं। जो भी हो वे कहीं न कहीं अपने आन्दोलनकारी समर्थकों व मतदाताओं के एक हिस्से के साथ छल कर रहे हैं। केवल आर्थिक ईमानदारी ही ईमानदारी नहीं होती। अपनी चुनावी जीत के लिए चुनावी प्रबन्धकों की सलाह पर धार्मिक व्यवहार का विज्ञापन करते हुए सरकार बना लेने से आपकी राजनीति के भिन्न होने प्रचार फुस्स हो गया है। काँग्रेस से मिल कर तो सरकार बना ही चुके हैं और तीन तलाक से लेकर 370 व सीएए तक भाजपा का साथ दे ही चुके हैं, किसी दिन उसके साथ सरकार भी बना लेंगे। वे ना तो खुल कर जे एन यू और ज़ामिया के छात्रों के साथ आये ना ही शाहीन बाग के आन्दोलनकारियों का साथ देते नजर आये।
काँग्रेस के सिकुड़ जाने व भाजपा के दो लोगों की मनमानी में सिमिट कर असफल सरकार चलाने से राष्ट्रीय स्तर पर एक राजनीतिक शून्यता छा गयी है जिसे कब कौन सी उत्तेजना पर सवार कोई व्यक्ति या संगठन भर ले कहा नहीं जा सकता। साहस की कमी व नियंत्रित विवेक वाले सदस्यों के संख्या बल वाली मोदी सरकार अपनी गलत नीतियों के कारण खोखली हो चुकी है, तो काँग्रेस के सूबेदार अंतिम सांसें गिन रहे हैं। जातिवादी क्षेत्रीय दल अपने अपने कोने सम्हाल कर राष्ट्रीय एकता को भूल चुके हैं, व भाजपा की नीतियों ने हिन्दू मुस्लिम विभाजन को तेज कर दिया है। तीसरे पक्ष के पास केवल थ्योरी और बयानबाजी बची रह गयी है।
क्या हम भारत को उसके पुराने युग में धकेले दे रहे हैं जहाँ अलग अलग राज्य थे और राजे रजवाड़े थे, जिन्हें केवल अपनी चिंता थी।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

शुक्रवार, जून 06, 2014

थरूरजी विचार जरूर कीजिये



थरूरजी विचार जरूर कीजिये
वीरेन्द्र जैन

       भारतीय राजनीति में जो थोड़े से युवा, सुदर्शन, कोमल और अभिजात्य व्यक्तित्व नजर आते हैं उनमें श्री शशि थरूर भी एक हैं जो पिछले दिनों यूपीए मंत्रिमण्डल में विभिन्न जिम्मेवारी के पद सम्हालते छोड़ते रहे हैं और अन्य व्यक्तिगत घटनाओं दुर्घटनाओं समेत आईपीएल व वायुयान के यात्रियों के वर्गीकरण में भी कैटिल क्लास जैसे जुमलों के लिए भी चर्चा में रह चुके हैं। ऐसे व्यक्ति का कभी कभी कुछ कुछ भावुक और काव्यात्मक हो जाना सहज सम्भव है। इसी भावभूमि में पिछले दिनों उन्होंने एनडीए सरकार के भाजपायी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी में एक नये अवतार के दर्शन कर लिये और कांग्रेस के प्रवक्ता पद की कुर्सी से उनके समन्वित विकास के लिए राजनीतिक सहयोग के आवाहन से नई उम्मीदें बाँध लीं। ऐसा करते समय श्री थरूर यह भी भूल गये कि ये वही मोदी हैं जो कभी उनके प्रिय लोगों की कीमत भी आँक चुके हैं। पत्रकारिता के साथ साहित्य में भी रुचि के कारण मैं चाहता हूं कि थरूर जी से कविता की भाषा में ही बात करूँ।    
       हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि श्री मुकुट बिहारी सरोज की एक कविता ‘कैसे कैसे लोग रह गये’ की पंक्तियाँ कहती हैं कि – पानी पर दुनिया बहती है, आप हवा के साथ बह गये, कैसे कैसे लोग रह गये।
हवा के साथ बह जाने के कारण ही शायद थरूरजी को यह समझ में नहीं आया कि भले ही पिछला चुनाव भाजपा ने मोदी के नाम को केन्द्र में रख कर लड़ा गया था और एआईडीएमके की जयललिता, डीएमके के करुणानिधि, बीजू जनता दल के नवीन पटनायक, तेलगुदेशम के चन्द्रबाबू नायडू, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह, बहुजन समाज पार्टी की मायवती आदि की तरह ही उन्हें सजा धजा कर भाजपा का एकमात्र सुप्रीमो बना कर सामने रखा गया था फिर भी भाजपा और मोदी की डोर आरएसएस के हाथों में है, और संसद के पहले प्रवेश के दिन ही वे अडवाणी के कृपा शब्द के बहाने उस सुप्रीमो की भूमिका को नकार चुके हैं और प्रत्यक्ष में भाजपा पार्टी को और परोक्ष में संघ को अपनी माँ बता चुके हैं। स्मरणीय है कि संघ के एक इशारे पर अडवाणी जैसा सबसे शक्तिशाली और समर्थ नेता एक किनारे लगा दिया जाता है और उन्हें स्तीफा देते समय दस लोगों का साथ भी नहीं मिलता। इसलिए नेतृत्व भले ही नरेन्द्र मोदी का हो पर असल सूत्र संघ और उसकी विचारधारा के हाथ में ही होंगे। वे चुनाव जीतने के लिए मुखौटे चाहे जितने लगा लें पर उनके मूल चरित्र में कभी भी अंतर नहीं आ सकता। यह याद दिलाना जरूरी नहीं होना चाहिए कि इस देश का मानस जिन मिथकों के द्वारा निर्मित हुआ है उनमें रामकथा भी प्रमुख है जिसका सबसे शक्तिशाली खलनायक सीताहरण के लिए साधु का भेष धरकर आता है। हमारी राष्ट्रभाषा के मुहावरों में से ही एक ‘बगुला भगत’ भी है और दूसरा ‘ मुँह में राम बगल में छुरी’ भी है। इस देश के सबसे महत्वपूर्ण फिल्म निर्माता, अभिनेता राजकपूर की फिल्म के गीत की पंक्ति कहती है कि – देखे पंडित ज्ञानी ध्यानी दया धर्म के बन्दे, रामनाम ले हजम कर गये गौशाला के चन्दे’ । यही कारण है कि शशि थरूर जी की समझ पर कांग्रेस समेत सभी सुनने वाले चौंक गये और काँग्रेस पार्टी को स्पष्ट करना पड़ा कि वह शशि थरूर के उक्त व्यक्तिगत विचारों से सहमत नहीं है।
       यद्यपि यह स्वाभाविक है कि देश का सबसे बड़ा पद मिलने के बाद वे खुद को पद के योग्य सिद्ध करने का प्रयास करेंगे पर अगर नरेन्द्र मोदी जी का किंचित भी ह्रदय परिवर्तन हुआ होता तो उन्होंने सबसे पहले 2002 में हुयी गलतियों के लिए क्षमा माँगी होती और अपने गर्वीले गुजरात के पीड़ितों के पुनर्वास के लिए कदम उठाये होते।    
       असल में चुनाव प्रचार के दौरान मोदीजी ने अपनी छवि निर्माण के लिए जिस विदेशी कम्पनी का सहारा लिया उसी के द्वारा बताये गये डिजायनर कपड़े भी पहिने जो क्षेत्र विशेष के अनुसार बदलते रहे। यह उनके सलाहकारों की ही सलाह रही होगी जिसके अनुसार उन्होंने अपने संगठन के साम्प्रदायिक एजेंडे को सुविधानुसार निकाला और जहाँ जरूरत नहीं थी वहाँ नहीं निकाला। उल्लेखनीय है कि चुनाव प्रचार के दौरान ही पश्चिम बंगाल में उन्होंने कहा कि दुर्गा अष्टमी मनाने वाले तो भारत में रह सकते हैं बाकी सोलह मई के बाद बोरिया बिस्तर बाँध लें। उत्तरपूर्व में जाकर कहा कि गैंडों को मारकर उनके अभयारण्य को बंगलादेशियों के लिए खाली कराने की साजिश की जा रही है। पश्चिमी उत्तरप्रदेश में यह भी कहा कि गौपालकों की जगह बूचड़खाना चलाने वालों को अधिक महत्व दिया जा रहा है और काँग्रेस की आदत है कि वह मटर और मटन के चुनाव में मटन को प्राथमिकता देती है। वे यह कहने से भी नहीं चूके कि हरित या श्वेत क्रांति की जगह गुलाबी क्रांति की जा रही है। ये वही मोदीजी हैं जो नवाज़ शरीफ से गले मिलने से पहले कहा करते थे कि हमारे जवानों का सिर काटने वालों को बिरयानी खिलाई जाती है।
       पता नहीं कि थरूरजी मोदी के ड्रैस सैंस पर मुग्ध हो गये जो यह भी भूल गये कि मोदी से असहमत होने वालों को पाकिस्तान भेजने वाले गिरिराज सिंह के बयानों के खिलाफ मोदी ने सीधे सीधे कुछ नहीं कहा था और प्रमोद मुत्तालिक को पार्टी में सम्मलित कराने के संकेतों का लाभ लेकर फिर बाहर का रास्ता दिखा देने की योजना भी मोदी टीम की ही थी। रामदेव को गले लगा उनसे प्रचार करवाने वाले मोदी ने उनके कहने पर कई भगवा भेषधारियों को टिकिट दिये। चाँदनाथ, सुमेधानन्द, स्वामी सच्चिदानन्द, उमा भारती, निरंजन ज्योति, योगी आदित्यनाथ, आदि तो सदन की रंगत बढा ही रहे हैं। मुजफ्फरनगर दंगे के जिन संजीव बालियान पर शपथ ग्रहण समारोह वाले दिन ही दंगों के समय निषेधाज्ञा भंग करने के आरोप में मुकदमा दर्ज़ कराया गया उन्हें टिकिट देने के ही नहीं राज्यमंत्री बनाने का काम भी उन्हीं मोदीजी ने ही किया है जिन्होंने गुजरात में अमित शाह और माया कोडनानी को सब कुछ जानते हुये भी मंत्री बनाया था।
       सच तो यह है कि चुनाव प्रचार के दौरान जो संयम बरता गया उसका कारण यह रहा कि किसी को भी इतने स्पष्ट बहुमत की उम्मीद नहीं थी और एनडीए के बाहर वाले दलों से सहयोग जुटाने के लिए मुखौटा लगाने की जरूरत थी। अगर थरूर जैसे जिम्मेवार नेता ही बिना गहन विचार के भ्रमित होने लगेंगे तो सीधी सरल जनता का आक्रामक प्रचार से धोखा खा जाना तो स्वाभाविक ही है।  
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, मार्च 13, 2014

1984 और 2002, कुछ विचारणीय तथ्य

1984 और 2002, कुछ विचारणीय तथ्य  
वीरेन्द्र जैन
       1984 में देश की प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गान्धी की उनके ही दो सिख सुरक्षा गार्डों द्वारा धोखे से की गयी हत्या के बाद उत्तेजित लोगों द्वारा सिखों का नरसंहार हुआ था जिसमें लगभग तीन हजार सिखों की हत्या हुयी थी। एक सूचना के अनुसार अभी भी दिल्ली गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी 2200 विधवाओं को पैंसन दे रही है। यह घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद थी। स्वतंत्र देश के इतिहास में श्रीमती गान्धी सर्वाधिक लोकप्रिय और विवादस्पद प्रधानमंत्री रही हैं जिनके कार्यकाल में एक ओर देश खाद्य उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हुआ, हमारे सबसे सक्रिय शत्रु देश के विभाजित होने से सुरक्षा व्यवस्था में कूटनीतिक लाभ मिला, पब्लिक सेक्टर का विकास हुआ, बैंकों व बीमा कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण हुआ, राजाओं के प्रिवी पर्स व विशेष अधिकारों की समाप्ति हुयी। दूसरी ओर उन्हीं के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ पैदा हुये आन्दोलन के बाद जयप्रकाश नारायण जी ने सम्पूर्ण क्रंति का नारा दिया, इमरजैंसी लगायी गयी, कांग्रेस का आंतरिक लोकतंत्र कमजोर पड़ा व पूरा संगठन अस्थायी समितियों के द्वारा संचालित होने लगा। उन्हीं के कार्यकाल में इंगलेंड व अमेरिका में रह रहे प्रवासियों की शह पर पंजाब में अलगाववादी आन्दोलन प्रारम्भ हुआ जिससे कश्मीर के अलगाववादियों को पनपने का मौका मिला। वे अपने अंतिम दिनों में विश्व के प्रमुख देशों के नेताओं में सबसे वरिष्ठ नेता थीं तथा अमेरिका इंगलेंड समेत कई साम्राज्यवादी देश उन्हें अपदस्थ किये जाने की राह तक रहे थे। उनकी मृत्यु ने देश में एक बड़ा शून्य पैदा किया था क्योंकि उस समय कोई दूसरा नेता उनके समतुल्य लोकप्रिय नहीं था। ऐसे नेता की मृत्यु पर देशव्यापी अशांति और इस अशांति का लाभ उठाने के लिए असामाजिक अवसरवादी तत्वों के सक्रिय हो जाने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता था, इसलिए सुरक्षा बलों को भी तुरंत दूर दूर तक पदस्थ कर दिया गया था।
       उल्लेखनीय है कि देश तोड़क खालिस्तानी आन्दोलन को रोकने के प्रयास में किये गये आपरेशन ब्लूस्टार के बाद पंजाब में खालिस्तान समर्थकों द्वारा सिखों और हिन्दुओं के बीच गहरी खाई पैदा करने व सैकड़ों बेकसूर हिन्दुओं को मार कर तनाव बढाने की कोशिश की गयी थी। इसका परिणाम यह हुआ था कि हिन्दुओं की राजनीति करने वाले जो संगठन सदैव कांग्रेस का विरोध करते थे वे भी आपरेशन ब्लू स्टार के बाद कांग्रेस के पक्ष में खड़े हो गये थे। यही कारण था कि श्रीमती गान्धी की हत्या के बाद हुये 1984-85 के आम चुनाव में कांग्रेस ने दिल्ली की सातों सीटों समेत देश भर में रिकार्ड विजय प्राप्त की थी व हिन्दुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा को पूरे देश में कुल दो सीटों तक सिमिट जाना पड़ा था। कहा जाता है संघ से सहानिभूति रखने वाले लोगों ने भी कांग्रेस का समर्थन किया था।  
       2002 में गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रैस की बोगी संख्या 6 में आगजनी की घटना हुयी थी जिसमें अयोध्या से लौट रहे दो कारसेवकों समेत 59 यात्री जल गये थे। बाद में इस घटना की प्रतिक्रिया के बहाने  पूरे गुजरात राज्य में मुसलमानों का नरसंहार हुआ था और तीन हजार लोग नहीं मिले जिसमें से लगभग नौ सौ लाशों के पोस्टमार्टम का रिकार्ड है व शेष को लापता बता कर उनके बारे में सरकारी आंकड़े कुछ नहीं बोलते। इस घटनाक्रम में भी करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति लूटी व जलायी गयी थी। इस नरसंहार की भी पूरी दुनिया में व्यापक निन्दा हुयी थी और भारत को एक जंगली राज्य होने के आरोप भी सहने पड़े थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तक को कहना पड़ा था कि अब मैं कौन सा मुँह लेकर विदेश जाऊंगा। उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी को राजधर्म निभाने की सलाह देना पड़ी थी। अगर जसवंत सिंह के कथन को सही माना जाये तो घटना से व्यथित वाजपेयी अपना स्तीफा देने जा रहे थे जिससे श्री सिंह ने ही रोका था। इसी हिंसा के कारण अमेरिका और इंगलेंड ने बाद में गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी को वीसा देने लायक नहीं समझा था।
       राजनीतिक रूप से जब भी कांग्रेस द्वारा गुजरात के नरसंहार की निन्दा की जाती रही है तो संघ परिवार के लोग अपनी सफाई देने के बजाय 1984 में दिल्ली की सिख विरोधी हिंसा से प्रतियोगिता दर्शाने लगते हैं। यद्यपि यह सच है कि प्रधानमंत्री इन्दिरा गान्धी की हत्या के बाद दिल्ली में हुयी सिख विरोधी हिंसा भी भयानक थी किंतु दोनों हिंसक घटनाओं का चरित्र एक जैसा नहीं है। 1984 की सिख विरोधी हिंसा देश के शिखरतम नेतृत्व पर धोखे से किये गये हमले की प्रतिक्रिया थी जिसे परोक्ष में देश पर किया गया हमला माना गया। इस मान्यता का कारण यह था क्योंकि यह हत्या राष्ट्रीय एकता की रक्षा करने के लिए किये गये आपरेशन ब्लूस्टार के विरोध में की गयी कार्यवाही की प्रतिक्रिया में योजना बना कर की गयी थी। भले ही दिल्ली में इस हिंसा में मरने वालों की संख्या सबसे अधिक थी किंतु यह हिंसा कानपुर मुरैना समेत देश के दूसरे अनेक हिस्सों में भी घटी थी, जो इस बात का प्रमाण थी कि यह हिंसा असंगठित और सहजस्फूर्त थी। इस पर शीघ्र ही काबू पा लिया गया था। उल्लेखनीय है कि उस समय देश के राष्ट्रपति के रूप में एक सिख ज्ञानी जैल सिंह पदस्थ थे व गृहमंत्री के रूप में सरदार बूटा सिंह पदस्थ थे। खालिस्तानी आन्दोलन का दुष्प्रचार रोकने के लिए उन दिनों कांग्रेस ने अपनी सभी राज्य सरकारों और कांग्रेस समितियों में यथा सम्भव सिख समुदाय को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया था। दूसरी ओर 2002 में गुजरात में हुये नरसंहार पर सबसे बड़ा आरोप यह लगता है कि उसे तत्कालीन भाजपा सरकार के मंत्रियों ने न केवल प्रोत्साहित किया था अपितु अपराधियों की मदद करते हुए उनको संरक्षण भी दिया था। भले ही दिल्ली की हिंसा में कांग्रेस के कुछ नेता सीधे तौर पर ज़िम्मेवार माने गये हैं किंतु इसे कांग्रेस संगठन की ओर से न तो कोई प्रोत्साहन दिया गया था और न ही संरक्षण दिया गया था। इसके विपरीत गुजरात में तो जानबूझ कर न केवल आरोपियों को संरक्षण दिया गया अपितु उन्हें मंत्री पद देकर बल भी प्रदान किया गया। एक स्टिंग आपरेशन में खुलासा हुआ कि किस तरह से सरकारी वकील ने आरोपियों की मदद करके उन्हें सम्भावित दण्ड से बचाने में मदद की। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और अब भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी ने इस घटना के बाद लगातार पीड़ितों के साथ भेदभाव किया। गोधरा में मारे गये लोगों अर्थात गैर मुस्लिमों को दो लाख का मुआवजा घोषित करते हुए शेष गुजरात में मारे गये लोगों को जिनमें शतप्रतिशत मुसलमान थे को एक लाख मुआवजा घोषित किया। आज बारह साल बाद भी हजारों की संख्या में पीड़ित मुसलमान सुविधाविहीन कैम्पों में रह रहे हैं और सरकार यथावत उदासीन है, जबकि दिल्ली में समुचित मुआवजा ही नहीं दिया गया अपितु पुनर्वास की अनेक योजनाएं लागू की गयीं। कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं ने क्षमा मांगी और उसके बाद सिखों और गैर सिखों के बीच कोई तनाव नहीं देखा गया।  
       1984 की सिख विरोधी हिंसा की गम्भीरता को स्वीकारते हुये यह देखना जरूरी है संघ परिवार से जन्मी भाजपा का चरित्र ही साम्प्रदायिक है और देश भर में शाखाएं लगाकर अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत का पाठ निरंतर पढाया जाता है। धर्म के नाम पर उनके आनुषांगिक संगठन केवल विवादास्पद धर्मस्थलों पर विवाद भड़काने का धर्म निबाहते हैं। गुजरात से पहले बाबरी मस्ज़िद राम जन्मभूमि मन्दिर के नाम पर देश भर में रथ घुमा कर दंगे भड़काये गये थे। सोनिया गान्धी के राजनीति में सक्रिय होते ही धर्म परिवर्तन रोकने के बहाने चर्चों और पादरियों पर हमले करवाये जाने लगे थे ताकि सोनिया गान्धी को ईसाई प्रचारित कर नया राजनीतिक ध्रुवीकरण किया जा सके। उल्लेखनीय है कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रैस की बोगी संख्या6 में हुयी जिस आगजनी को अयोध्या से लौटने वाले कारसेवकों पर हमला बता साम्प्रदायिक आधार पर बहुसंख्यक लोगों की सहानिभूति जुटाने की कोशिश की गयी थी उसमें 59 मृतकों में कारसेवकों की संख्या कुल दो थी। यद्यपि किसी भी निर्दोष व्यक्ति की हत्या गम्भीर दुख और क्रोध का विषय होता है किंतु सच सामने आने से घटना के मूल चरित्र में बदलाव हो जाता है। उससे साफ हो जाता है कि बोगी संख्या6 में हुयी आगजनी का चरित्र साम्प्रदायिक नहीं था और आँख बन्द करके पूरे गुजरात में मुसलमानों पर हमला कर देने वाले दुष्प्रचार से भ्रमित थे व सरकार में बैठ कर उनकी मदद करने वाले अपनी राजनीतिक कुटिलिता से यह सब करवा रहे थे। पिछले दिनों नकली वीडियो अपलोड करके मुज़फ्फरनगर में दंगा भड़काने वाले विधायकों का नरेन्द्र मोदी द्वारा किया गया सार्वजनिक अभिनन्दन इनके चरित्र का याज़ा उदाहरण है।
       यह सच है कि भाजपा 1984 अलगाववादी खालिस्तानी आन्दोलन के साथ नहीं थी और सिखों को हिन्दू मानने वाली यह पार्टी हिन्दूजाति में बिखराव की आशंका में सिख उग्रवादियों के खिलाफ थी। परिणाम स्वरूप भाजपा का समर्थक वर्ग भी श्रीमती गान्धी की हत्या के बाद सिखों के खिलाफ हुयी हिंसा में सिखों की रक्षा में सक्रिय नहीं हुआ। उल्लेखनीय है कि इतनी व्यापक हिंसा और आगजनी के बाद भी किसी भाजपा समर्थक की हिंसा और आग रोकने की कोशिश में उंगलियां भी नहीं झुलसीं। जब दिल्ली में भाजपा की राज्य सरकारें रहीं तब भी उन्होंने 1984 की हिंसा की जाँच के कोई सार्थक कदम नहीं उठाये।
       स्मरणीय है कि भगत सिंह ने अदालत में कहा था कि हिंसा के पीछे का उद्देश्य महत्वपूर्ण है अन्यथा मौत की सजा देने वाला न्यायाधीश भी हत्या के लिए जिम्मेदार होगा। दिल्ली और गुजरात की हिंसा को देखते समय भी हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों का चरित्र और उनका इतिहास ध्यान में रखना होगा।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, मई 10, 2012

प्रमुख दलों में खुली अनुशसनहीनता के खतरे


प्रमुख दलों में खुली अनुशासन हीनता के खतरे
                                                                        वीरेन्द्र जैन
                वैसे फुटकर समाचार तो आते ही रहते थे किंतु जब एक साथ एक ही दिन एक ही राज्य से दो राष्ट्रीय दलों में खुली अनुशासन हीनता, रोने गाने, मारपीट और कपड़ों के फटने के समाचार मुखपृष्ठ पर एक साथ आये तो इस पर विषयगत की जगह वस्तुगत रूप में विचार करना जरूरी हो गया। गत दिनों राजस्थान से समाचार आये कि प्रदेश भाजपा में कोर कमेटी की बैठक में से बाहर निकल कर पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में विपक्ष की नेता वसन्धुरा राजे सिन्धिया ने पार्टी से त्यागपत्र देने का विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को पार्टी के सदस्यों की भावना से प्रभावित कर पाने में असमर्थ रही हूं इसलिए त्यागपत्र देने का विचार कर रही हूं। कुछ ही देर बाद पार्टी के 58 विधायकों और दो निर्दलीय विधायकों ने उन्हें अपने त्यागपत्र सौंप दिये। खबर के अनुसार इससे पहले बैठक में बहुत उत्तेजक बहस हुयी और इसी बीच राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने फोन पर संघ के नजदीकी गुलाब चन्द कटारिया की प्रस्तावित जनजागरण यात्रा का समर्थन करते हुए तिथि भी तय कर दी , इससे वसन्धुरा राजे सिन्धिया बिफर गयीं। उनका विश्वास है कि इस तरह की यात्रा का नेतृत्व करने वाला मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी बन सकता है इसलिए उनके अलावा किसी और के नेतृत्व में यह यात्रा नहीं होना चाहिए। उल्लेखनीय यह है कि भाजपा की मातृपितृ संस्था आरएसएस कटारिया के नेतृत्व में यात्रा के पक्ष में थी, क्योंके वे संघ के समर्पित स्वयं सेवकों में माने जाते हैं।
      दूसरी ओर राजस्थान के ही भरतपुर में उसी दिन कांग्रेस की सम्भागीय कार्यशाला चल रही थी जिसमें पूर्व सांसद विश्वेन्द्र सिंह और उनके समर्थकों ने कई पदाधिकारियों की लात घूंसों से पिटायी कर दी व कपड़े फाड़ दिये और प्रदेश अध्यक्ष डा. चन्द्रभान समेत मंचासीन लोग देखते ही रह गये। पूर्व राज परिवार से सम्बन्धित उक्त पूर्व सांसद ने भी पार्टी कार्यकर्ताओं के असंतुष्ट होने का बहाना बनाते हुए कहा कि भरतपुर में पार्टी के अध्यक्ष का पद एक ऐसे व्यक्ति को सौंप दिया गया है जिसकी भाजपा नेताओं से गहरी सांठ गाँठ है, व जो हत्या के मामले में आरोपी रह चुके हैं। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष को भी प्रदेश अध्यक्ष मानने से इंकार करते हुए कहा कि वे उनके नेता नहीं हैं। उनके नेता तो सोनिया गाँधी और अशोक गहलोत हैं।
      इससे कुछ दिन पूर्व ही उत्तरप्रदेश में भी नवनिर्वाचित समाजवादी पार्टी के शपथ ग्रहण समारोह के अवसर पर सैकड़ों युवा मंच पर चढ गये थे और उन्होंने जंग जीतने जैसे उत्साह में न केवल मंच की शोभा अपितु समारोह की गरिमा को भी नष्ट भ्रष्ट कर दिया था। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद से ही कानून व्यवस्था समाजवादी पार्टी के युवाओं की मर्जी से चल रही है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की अपीलें भी कुछ काम नहीं कर पा रही हैं।
      स्मरणीय है कि कुछ ही दिन पहले कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदुरप्पा ने अपने पक्ष के विधायकों की एक बैठक बुला कर स्वयं को पुनः मुख्यमंत्री बनवाने का प्रस्ताव पास किया था व राष्ट्रीय नेतृत्व को लगभग धमकाने वाले अन्दाज में चेतावनी दी थी कि एक खास तिथि तक उन्हें मुख्यमंत्री बनवा दें अन्यथा दक्षिण में भाजपा की इकलौती सरकार गिरने के लिए वे स्वयं जिम्मेवार होंगे। झारखण्ड के राज्य सभा चुनाव में भाजपा के लिए विदेश से डालरों में धन जुटाने वाले अंशुमान मिश्र की उम्मीदवारी से बौखलाये यशवंत सिन्हा ने उनकी उम्मीदवारी न बदलने की दशा में पार्टी छोड़ देने की धमकी दी थी जिससे केन्द्रीय नेतृत्व घबरा गया और प्रत्याशी बदल दिया जिसके परिणाम स्वरूप उनकी सरकार होते हुए भी उनका उम्मीदवार चुनाव हार गया। अभी हाल ही में दिल्ली नगर निगम के चुनाव में भाजपा का टिकिट चाहने वाले एक उम्मीदवार ने दूसरे को गोली मार दी थी।
      वाय एस रेड्डी की एक दुर्घटना में मृत्यु के बाद जगनमोहन रेड्डी द्वारा अपने दल के आदेशों के खुले उल्लंघन के बाद पार्टी छोड़ देने के बाद आन्ध्र प्रदेश में अस्थिरता बढ गयी है, व पहले से जारी पृथक तेलंगाना आन्दोलन और अधिक तीव्र हो गया है। कांग्रेस के सांसद भी अपनी ही सरकार के खिलाफ सदन में नारेबाजी कर रहे हैं और अनुशासनहीनता में उन्हें सदन से निलम्बित करना पड़ रहा है। उत्तराखण्ड में कांग्रेस हाईकमान द्वारा तय किये गये मुख्यमंत्री प्रत्याशी के खिलाफ कांग्रेस के ही दूसरे नेता ने खुला विद्रोह कर दिया था जिसे बमुश्किल मनाया जा सका। तृणमूल कांग्रेस ने अपने ही दल के रेल मंत्री के रेल बजट के बहाने उन्हें रेल मंत्री पद से हटाने की जिद ठान ली जिस निर्णय के विरोध में एक दूसरे सांसद ने ममता बनर्जी के खिलाफ झंडा उठा लिया और गीत लिख डाला। डीएमके में करुणानिधि के दोनों बेटों में उत्तराधिकार के लिए तीखी जंग चल रही है जो बहुधा हिंसक हो जाती है। शिवसेना तो दो भागों में विभाजित ही हो चुकी है, अकाली दल में से मनप्रीत सिंह बादल को भले ही चुनावी सफलता न मिली हो किंतु अकाली दल में रन्ध्र तो हो ही चुका है। अपने अनुशासन के लिए जाने जाने वाले बामपंथी दलों में भी राष्ट्रीय कांग्रेस के अवसर पर पोलित ब्यूरो सदस्य अनुपस्थित पाये जाने लगे हैं।
      विचारणीय यह है कि अनुशासनहीनता की यह बाढ क्यों आ गयी है, और जिन दलों या गठबन्धनों में अपना अनुशासन ही न हो उनसे अपने कार्यक्रम या घोषणाओं के पूरी होने की उम्मीद कैसे लगायी जा सकती है। इसका प्रणाम अभी हाल ही में मिला जब वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने संतुलित शब्दों में कहा कि गठबन्धन सरकारों में कार्यक्रम लागू करने में विलम्ब होता है।
      दर असल हमने अपने लोकतंत्र को लोगों की आकांक्षाओं के शासन की जगह उनके ऐसे वोटों का शासन बना दिया है जो उनकी आकांक्षाओं का प्रदर्शन नहीं करते अपितु वे वोट किसी लालच, दबाव, भ्रम, धोखे, भावुकता, या अज्ञानता से गिरवा लिये जाते हैं। ऐसा करने के लिए विचार, सिद्धांत, कार्यक्रम, या घोषणापत्रों की जगह, चुनावों के दौरान कुछ सेलीब्रिटीज, कुछ साम्प्रदायिकता, कुछ जातिवाद, कुछ भाषावाद, कुछ क्षेत्रवाद, आदि का प्रयोग कर लिया जाता है। चुने हुए प्रतिनिधि विशिष्ट प्रतिनिधि बन जाते हैं जो न केवल अपनी सुख सुविधाओं को ही बढाते रहते हैं, अपितु अपनी विशिष्ट स्थिति से नये नये धन्धे करते हैं, या पुराने धन्धों का विस्तार करते हैं। इस अर्जित विशिष्टता से वे अपनी गैरकानूनी और आपराधिक गतिविधियों में सुरक्षा पाते हैं। यही कारण है कि गैरकानूनी धन्धा करने वाले लोग ज्यादा से ज्यादा सत्ता की सम्भावनाओं वाले दलों से जुड़ने की कोशिश करने लगे हैं और ये खोटे सिक्के असली सिक्कों को बाजार से बाहर करने लगे हैं। सदनों में आज तीन चौथाई करोड़पति पहुँचने लगे हैं जो समाज सेवा की भावना से नहीं अपितु अपने व्यावसायिक लाभ या सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए वहाँ जाना चाहते हैं। चुने जाने के बाद वे सदन में नजर नहीं आते और ना ही बहसों में भाग लेने की कोशिश ही करते हैं। ऐसे लोग अपनी या अपने पक्ष के लोगों की उम्मीदवारी और चुनाव सुनिश्चित करने के लिए कुछ भी करने से नहीं चूकते। अरविन्द केजरीवाल और बाबा रामदेव द्वारा भले ही प्रतिवाद द्वारा सुर्खियों में आने के लिए सांसदों के खिलाफ निन्दनीय भाषा का प्रयोग किया गया हो, किंतु यह भी समरण रखना होगा कि ऐसा इसलिए भी किया गया है क्योंकि जनता का एक बड़ा वर्ग भी ऐसे ही विचार रखता है।
      राष्ट्रीय दलों में अनुशासनहीनता दलों में विभाजन और अधिक से अधिक गठबन्धन वाली अस्थिर सरकारों की ओर ही ले जायेगी जिसका परिणाम देश के लिए अच्छा नहीं होगा, इसके लिए जरूरी होगा कि सत्ता की चिंता किये बिना राजनीतिक दल अपने सिद्धांतों और विचारों पर दृड़ संगठनों का निर्माण करें। अनुशासनहीनता किसी भी हालत में सहनीय न हो और सभी दलों को इसके लिए किसी कानून से बाँधा जाये। सदन की उम्मीदवारी या लाभ के पद के लिए पार्टी में वरिष्ठता की सीमा तय हो ताकि एक दल से निकाला हुआ अनुशासनहीन व्यक्ति लाभ के लिए दूसरे दल में आश्रय न पा सके। विशिष्ट पद पर बैठे व्यक्तियों का जीवन पारदर्शी हो और उन्हें व्यापार व्यवसाय की अनुमति न हो। उन पर लगे आरोपों के खिलाफ त्वरित जाँच और शीघ्र न्याय की व्यवस्था हो। विशिष्ट व्यक्तियों के विचलन पर दण्ड भी विशिष्ट होना चाहिए। इस मामले में हाल ही में दिये गये बंगारू लक्ष्मण के मामले में दिये गये फैसले की भावना से प्रेरणा ली जा सकती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल ही में अधिकारियों को निष्पक्ष कठोर फैसले लेने की सलाह दी है जिसे केवल अधिकारियों तक सीमित न मान कर दलों के अध्यक्ष समेत प्रत्येक निर्णायक व्यक्ति के लिए जरूरी माना जाना चाहिए।
वीरेन्द्र जैन
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रविवार, नवंबर 20, 2011

यह फासिज्म की भाषा नहीं तो और क्या है?



यह फासिज्म की भाषा नहीं तो और क्या है                                                             
वीरेन्द्र जैन
      आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने संघ का प्रांतीय स्तर शिविर मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री और कांग्रेस के सर्वाधिक मुखर महासचिव दिग्विजय सिंह के मूल निवास क्षेत्र राजगढ में आयोजित किया। अपने मन और वचन में भेद रखने के लिए जाने जाने वाले इस संगठन के प्रमुख ने राजगढ में शिविर रखने के पीछे कारण बताया कि वहाँ पूरे प्रांत में सबसे अधिक शाखाएं हैं, इस कारण से इस स्थान का चुनाव किया गया। इस आंकड़े की सत्यता तो वे ही जानें किंतु यदि यह सच भी है तो भी प्रांतीय स्तर का शिविर आयोजित करने के लिए हमेशा यही कारण नहीं होता रहा है, और न ही वहाँ भी है। उल्लेखनीय है कि इस समय दिग्विजय सिंह के बयान न केवल सर्वाधिक सुर्खियां बटोर रहे हैं अपितु वे अफवाहों से निर्मित माहौल के गुब्बारे में सुई का काम भी करते हैं जिससे संघ परिवार द्वारा रचे गये झूठ का पर्दाफाश हो जाता है। धार्मिक आस्थाओं वाले समाज में भाजपा जिस तरह से धार्मिक भावनाओं का अपने पक्ष में विदोहन करती है, वह भी दिग्विजय सिंह के सामने नहीं चल पाता क्योंकि उनके द्वारा भी समान रूप से धार्मिक संस्थाओं और धार्मिक नेताओं से निकट सम्बन्ध रखा रखा जाता है। यहाँ तक कि बामपंथी उन पर सौफ्ट हिन्दुत्व अपनाने तक का आरोप लगाते रहे हैं। परिणाम यह निकला है कि मँहगाई, भ्रष्टाचार आदि के कारण अलोकप्रिय हो रहे यूपीए गठबन्धन में वे कूल-कूल कांग्रेस की गर्म धड़कन बने हुए हैं। कांग्रेस के विरोधी तो यह भी आरोप लगाते हैं कि राहुल गान्धी उन्हीं की सलाह पर चलते हैं। मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव हार जाने के बाद उन्होंने दस साल तक कोई पद न लेने की घोषणा की हुयी थी जिस पर उन्होंने तब से पूरी ईमानदारी से अमल किया व अब इसकी अवधि समाप्त होने के करीब है। इससे प्रदेश में सत्तारूढ भाजपा में घबराहट है। नव गठित प्रदेश कांग्रेस कमेटी में भी जिन लोगों को पद दिये गये हैं वे भी उन्हें अपेक्षाकृत अपना प्रिय और सक्षम नेता मानते हैं, व इसी कारण अपनी निष्क्रियता छोड़ चुके हैं। ऐसी दशा में संघ प्रमुख द्वारा बताया गया राजगढ में ही संघ द्वारा प्रांतीय शिविर आयोजित करने का कारण हजम नहीं होता। इसकी पृष्ठ्भूमि में अगले आम चुनावों में दिग्विजय सिंह के खिलाफ काम करने की आधारभूमि तैय्यार करने की योजना ही नजर आती है।  
      इस अवसर पर संघ प्रमुख ने कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि वे दिग्विजय जैसे नेताओं के बयानों से विचलित न हों और न उनके विरोध में भाषणबाजी करें। अपने काम को आगे बढाएं। यह बयान फासिज्म का संकेत देता है। लोकतंत्र में सारे हल बातचीत से निकाले जाते हैं और बहुमत का निर्णय स्वीकार किया जाता है। राराजनीतिक दलों के नेताओं के बयान से अगर असहमति है तो उसका विनम्र प्रतिवाद किया जा सकता है, आम सभाएं की जा सकती हैं, समाचार पत्रों में लेख लिखे जा सकते हैं किंतु किसी बात का जबाब ही न देना किस बात का संकेत है। फासिज्म में दल प्रमुख का कथन ही अंतिम होता है और वहाँ बात करने या बहस करने की अनुमति नहीं होती। असहमति की दशा में बात का जबाब लाठी से दिया जाता है या दमन के दूसरे दूसरे साधनों का उपयोग किया जाता है। आखिर क्या कारण है कि संघ के लोग दिग्विजय सिंह की बात के उत्तर में या तो अनाप शनाप गालियां बकने लगते हैं, फेसबुक या ट्वीटर पर छद्म नामों से गन्दी गन्दी भाषा में कमेंट्स करने लगते हैं, या काले झंडे दिखाने के नाम पर हिंसा करने लगते हैं। पिछले दिनों से लगातार यह फैलाया जा रहा है कि दिग्विजय सिंह के बयानों से कांग्रेस का वोट बैंक घट रहा है, या उन्हें पागलखाने भेजने की बात की जा रही है, पर उनके किसी बयान का जबाब नहीं दिया जा रहा है। यह अपराध बोध का परिणाम है क्योंकि वे जानते हैं कि दिग्विजय सिंह के बयान तथ्यात्मक रूप से गलत नहीं होते और अगर बहस में उतरे तो कहीं टिक नहीं पायेंगे। दूसरी ओर उनके बयानों का जबाब काम से देने को कहा गया है। ऊपर से देखने पर यह एक शांत बयान लगता है किंतु वैसा है नहीं। आखिर आरएसएस काम क्या करता है? घोषित रूप से यह एक सांस्कृतिक संगठन है किंतु उनके सदस्य किसी भी कला विधा के लिए वे नहीं जाने जाते। उनके संगठन में कोई भी बड़ा कलाकार या बुद्धिजीवी नहीं है। वे शाखाओं में खेल कूद के बहाने अपरिपक्व बुद्धि के बच्चों को एकत्रित करते हैं और बौद्धिक के नाम पर उनमें साम्प्रदायिकता का जहर भरने के लिए जाने जाते हैं। उनके संविधान से लेकर उनकी ड्रैस और कार्यप्रणाली सभी हिटलर की पुस्तक मीन कैम्फ और उसके संगठन से प्रभावित है। वे शाखाओं में लाठी और दूसरे अस्त्र चलाना सिखाते हैं, तलवारें लेकर पथ संचालन करवाते हैं। परिणाम यह निकलता है कि साम्प्रदायिक दंगों के दौरान इन्हीं शाखाओं से निकले लोगों को ही हिंसा में लिप्त देखा जाता है। विहिप और बजरंग दल आदि इन्हीं के अनुषांगिक संगठन हैं जिनके कारनामे आये दिन समाचार पत्रों में देखे जा सकते हैं। अगर वे किसी आपदा में काम भी करते हैं तो उसमें भी उनकी साम्प्रदायिक दृष्टि ही काम करती है, और अपने धार्मिक समुदाय के लोगों को प्राथमिकता के आधार पर सहयोग करना व दूसरों की उपेक्षा करना भी देखने में आया है। ऐसी दशा में किसी बात का जबाब अपने काम से देने के निर्देश का आशय स्वयं में ही स्पष्ट है।
      पिछले दिनों से संघ की सारी गतिविधियों का केन्द्र मध्यप्रदेश होता जा रहा है जहाँ न केवल संघ से निकला व्यक्ति मुख्यमंत्री है अपितु वह संघ के आदेशों के प्रति इतना समर्पित है कि अपने व अधिकारियों के विवेक से बाहर भी संघ के आदेशों और आशयों पर अमल करता है। जहाँ गुजरात, उत्तराखण्ड, हिमाचल आदि भाजपा शासित क्षेत्रों में मुख्यमंत्री संघ के आदेशों का पालन करते समय जन भावनाओं की उपेक्षा नहीं करते वहीं मध्यप्रदेश में आँख मून्द कर संघ के आदेशों पर अमल किया जाता है। यही कारण है कि संघ के पूर्व प्रमुख को कार्यमुक्ति के बाद पूरा हिन्दुस्तान छोड़ कर मध्यप्रदेश ही पसन्द आया। ऐसे में अगर एक क्षेत्र विशेष में शिविर करते हुए संघ के प्रमुख अपने स्वयं सेवकों को बातचीत की जगह काम से जबाब देने की बात कहते हैं तो उसमें कहीं न कहीं फासिस्ट ध्वनियां सुनायी देती हैं।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, सितंबर 22, 2011

खण्डित विश्वास को सम्हालने की चुनौती

                 खण्डित विश्वास को सम्हालने की चुनौती
                                                            वीरेन्द्र जैन 


      राज्य सभा सदस्य अमर सिंह जी जेल में हैं। भाजपा के लोकसभा सदस्यों ने परमाणु विधेयक पर हुए मतदान के दौरान उनको खरीदे जाने के लिए दिये गये नोटों के बंडलों को सदन में लहराते हुए उन्हें अमर सिंह द्वारा दिया गया बताया था। भाजपा द्वारा एक टीवी चैनल से इसका स्टिंग आपरेशन भी करवाया गया था, पर उस चैनल ने कतिपय कारणों से उसे दिखाना स्थगित कर दिया था। जिस समय इस दृष्य का टीवी पर सीधा प्रसारण चल रहा था उस समय देश के चालीस लाख शिक्षित और राजनीति में रुचि रखने वाले लोग इसे देख रहे थे। अमर सिंह जी इस लेनदेन में अपनी भूमिका से इंकार कर रहे हैं पर परिस्तिथिजन्य साक्ष्य उनकी ओर इशारा करते हैं। देश के लब्ध प्रतिष्ठित वकील श्री राम जेठमलानी, जिन्होंने भाजपा के शिखर पुरुष श्री अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ चुनाव लड़ा था, पर गुजरात के चर्चित मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की वकालत करने की शर्त पर भाजपा ने उन्हें राज्य सभा के लिए चुनवाया था, अब अमर सिंह के वकील हैं, और उन्होंने कोर्ट में अमर सिंह की ओर से कहा कि यह पैसा भाजपा का हो सकता है क्योंकि श्री लाल कृष्ण अडवाणी ने कहा है कि स्टिंग आपरेशन और सदन में धन का यह प्रदर्शन उनकी सलाह से किया गया था इसलिए मुझे भी गिरफ्तार करो। वैसे पूर्व उपप्रधानमंत्री श्री अडवाणीजी के निजी सचिव रहे सुधीर्ण कुलकर्णी से भी पुलिस ने पूछताछ की थी और वे जेल में हैं। उन्होंने पुलिस को क्या बयान दिया है यह अभी रहस्य बना हुआ है, पर इस बीच अचानक ही अडवाणीजी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी रथयात्रा निकालने की घोषणा कर दी है और यह भी बताया कि इस यात्रा के लिए उन्होंने अपने पार्टी अध्यक्ष से अनुमति ली है, पर पार्टी अध्यक्ष इस विषय पर मौन हैं। दूसरी बार श्री जेठमलानी ने धन के लेन देन का आरोप कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य श्री अहमद पटेल पर लगा दिया।
      अमर सिंह की घनिष्ठ मित्र और लोक सभा सदस्य जया प्रदा ने अमर सिंह के स्वास्थ की दुहाई देते हुए बयान दिया कि अगर उन्होंने मुँह खोल दिया तो बहुत सारे लोग मुश्किल में पड़ जायेंगे, जिसका मतलब है कि या तो श्री अमर सिंह पर लगे आरोप सही हैं या वे सच्चाई छुपाने के लिए मुँह बन्द किये हुए हैं, और उन लोगों से मुँह बन्द रखने का सौदा करना चाहते हैं जो उनके मुँह खोल देने से मुश्किल में पड़ सकते हैं। जिन मुलायम सिंह ने अमर सिंह को अपनी पार्टी से निकाल दिया था और उसके बाद से निरंतर उनकी अशालीन आलोचना झेल रहे थे, उनके पक्ष में बयान देकर कहा है कि वे निर्दोष हैं। नरेन्द्र मोदी के राज्य गुजरात के ब्रांड एम्बेसडर अमिताभ बच्चन जो कभी कांग्रेस के सांसद रहे थे और जिनकी पत्नी पिछले दिनों तक समाजवादी पार्टी की सांसद थीं, अमर सिंह से मिलने एम्स पहुँचे और अपने कीमती वक्त में से दो घण्टे साथ बिताये। अमर सिंह जी की भाजपा नेता अरुण जैटलीजी से गोपनीय मुलाकातें अखबारों की सुर्खियां बनती रही हैं।
      इस घटनाक्रम में सभी प्रमुख दल कहीं न कहीं जुड़े हुए हैं और अनेक दलों के सदस्यों ने अपनी पार्टी के निर्देश के खिलाफ मतदान किया था। सीपीएम जैसी अनुशासित पार्टी के सदस्य सोमनाथ चटर्जी ने, जो लोकसभा के अध्यक्ष पद को सुशोभित कर रहे थे अपनी पार्टी के निर्देश को न मानते हुए अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने से इंकार कर दिया था जिस की वजह से पहले मतदान होने और सदस्यों की पक्षधरता का राज उजागर होने से रह गया था।
      उपरोक्त घटना के लिए गठित की गयी जेपीसी [संयुक्त संसदीय समिति] भी किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पायी थी तब इस प्रकरण की जाँच को पुलिस को देने का फैसला हुआ था। हाई प्रोफाइल लोगों से जुड़ा होने के कारण दिल्ली पुलिस ने इसे ठंडे बस्ते में डालकर रख दिया था, पर एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को लताड़ पिलायी और समय बद्ध ढंग से जाँच करके दोषियों पर प्रकरण दर्ज करने के कठोर आदेश दिये तब ही वे आगे बड़े और सम्बन्धितों से पूछताछ की।
      जब सदन में नोट लहराये जा रहे थे उस दौरान ही राजद के श्री लालू प्रसाद ने जो उस समय देश के रेल मंत्री थे, सम्बन्धितों का नार्को टेस्ट कराने का सुझाव दिया था जिसे उनकी छवि के कारण एक मजाकिया सुझाव समझा गया था जबकि वे यह बात गम्भीरता से कह रहे थे। पूरा सदन, मीडिया ही नहीं अपितु देश के चालीस लाख लोगों ने जिस दृश्य को देखा उसके बारे में हमारी जाँच एजेंसियां अब तक यह पता नहीं लगा पायी हैं कि ये पैसा कहाँ से आया था और किस कारण से इस इतनी बड़ी रकम को इतनी उदारता से दिया गया था। अगर यह देश का ही था और लेनदेन में लग रहा था तो यह काला धन ही रहा होगा, अतः देशहित में इसका पता लगना चाहिए कि इस  काली राशि को किस काले तरीके से अर्जित किया गया था। पर यदि विदेशी पैसे से सांसदों के ईमान को खरीदा जा रहा था तो देश के लोकतंत्र और सुरक्षा को कितना बड़ा खतरा है, यह विचारणीय है।
      एक प्रदेश की मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री के साथ विदेश यात्रा पर जाने से मना कर देती हैं क्योंकि उनके अनुसार एक नदी के पानी के बँटवारे पर वे सहमत नहीं हैं जिससे देश के प्रधानमंत्री की किरकरी होती है और उस देश से कुछ बहुत जरूरी समझौते नहीं हो पाते। जनसंहार के आरोपों से घिरे एक प्रदेश के मुख्य मंत्री उस समय सद्भावना के लिए उपवास करते हैं जब उनका मामला सुप्रीम कोर्ट लोअर कोर्ट को यह कह कर भेज देता है कि उसकी निगरानी की जरूरत नहीं है, इन्हीं मुख्यमंत्री को अदालत ने तड़ीपार करने के आदेश दिये हुए हैं और एक महिला मंत्री सहित कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी जेल की हवा खा रहे हैं। एक प्रदेश के मंत्री एक नर्स के गायब होने के आरोपों से घिरे हैं।
      देश की सबसे आदरणीय संस्था के तीन सौ सदस्य करोड़पति हैं और 139 सदस्यों पर गम्भीर आरोपों के प्रकरण दर्ज हैं। सभी प्रमुख दलों के कतिपय सदस्य किन्हीं न किन्हीं कारणों से जेल की हवा खाने को मजबूर हो रहे हैं और यह तब हो सका है जब उनके जेल जाने से बचने के सारे हथकण्डे आजमाये जा चुके होते हैं। इनमें मंत्रिमण्डल के सदस्य भी हैं। कभी मंत्रिमण्डल में रहे एक सदस्य को आजीवन कारावास की सजा भी हो चुकी है और ये सजाएं किसी राजनीतिक आन्दोलन के लिए नहीं दी गयी हैं। देश के जनप्रतिनिधियों और उनके निकट के रिश्तेदारों की सम्पत्ति में तेजी से वृद्धि देखी जा रही है। जब आयकर विभाग के छापे पड़ते हैं तो इन रिश्तेदारों, उनके विभाग से जुड़े अधिकारियों के घरों से बरामद नोटों को गिनने के लिए नोट गिनने की मशीनें लगानी पड़ती हैं।
      जो भी कोई भ्रष्टाचार का विरोध करता नजर आता है उसकी जय जय कार होने लगती है चाहे वह बाबा भेषधारी उद्योगपति ही क्यों न हो। पर जब इन भ्रष्टाचार का विरोध करने वालों की पोल खुलती है तो जनता की आँखें फटी की फटी रह जाती हैं। ऐसे में जब सरकारी रिपोर्ट में पता चलता है कि देश की 74% आबादी बीस रुपये रोज पर गुजर करने को मजबूर है और उसमे से भी 39% की आमदनी तो कुल नौ रुपये रोज है, देश में दो लाख किसान प्रतिवर्ष आत्महत्या कर लेने को मजबूर हैं तब सहज सम्भव है कि आदमी सौ दो सौ रुपयों में अपना वोट बेच दे ताकि उसे इसके बदले में उधार के आश्वासनों की जगह कुछ तो नगद मिले। जब लोकतंत्र बिके हुए वोटों के बहुमत और गठबन्धन की मजबूरियों से चलता है तो ऐसे में अगर जनता का भरोसा टूट रहा है तो यह सहज सम्भव है। इस खण्डित विश्वास को सम्हालना ही आज सबसे बड़ी चुनौती है।
वीरेन्द्र जैन
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शनिवार, जुलाई 30, 2011

क्या राजनीतिक दलों में द्रोहकाल चल रहा है?


क्या राजनीतिक दलों में द्रोह काल चल रहा है?

वीरेन्द्र जैन

हम अपनी जनसंख्या की दम पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने का दम्भ भरते हैं, किंतु हमारे मुख्य धारा के राजनीतिक दलों का इन दिनों जो हाल चल रहा है उसे देखते हुए लगता है कि इन दलों के आंतारिक लोकतंत्र में कमी आयी है इसलिए बाहर आकर आलोचनाएं ज्यादा होने लगी हैं। ये आलोचनाएं और उनसे जुड़ी घटनाएं बताती हैं कि अन्दर कोई आलोचनाओं को सुनने के लिए तैयार नहीं है।

मुख्य धारा के दलों में भाजपा को अपेक्षाकृत अधिक सुसंगठित और अनुशासित समझा जाता था किंतु अब कोई सा भी राज्य ऐसा नहीं बचा जहाँ उसके संगठन में आपसी मतभेद नहीं हों और वे मतभेद बाहर अकर व्यक्त न हो रहे हों। अभी हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय पदाधिकारी और कर्नाटक के प्रभारी शांता कुमार ने सार्वजनिक रूप से अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष से मार्मिक अपील करते हुए कहा था कि कृपा करके अब तो येदुरप्पा को निकालो। उनका कहना था कि येदुरप्पा के कारनामे लोकायुक्त हेगड़े अब बता रहे हैं किंतु मैं तो पहले से जानता था और पार्टी आलाकमान को इसकी सूचना दी थी। अफसोस कि मेरी रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी। उन्होंने तो आलाकमान से यह भी कहा था कि अगर येदुरप्पा के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करना है तो उन्हें राज्य के प्रभारी पद से मुक्त कर दिया जाये। इतना ही नहीं उन्होंने संगठन के कार्यों पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि कभी भाजपा एक अलग तरह की पार्टी के रूप में सामने आयी थी, पर बाद में यहाँ भी परिवार तंत्र ने लोकतंत्र की जगह ले ली। पार्टी पहले कार्यकर्ताओं की पार्टी हुआ करती थी, लेकिन अब हिमाचल प्रदेश से कर्नाटक तक यह बेटे बेटियों और रिश्तेदारों की पार्टी बनती जा रही है। श्री शांता कुमार भाजपा के बहुत वरिष्ठ नेता हैं और उनका असंतोष पार्टी के अन्दर गहराई तक चलने वाली हालचल का संकेत देता है। स्मरणीय है कि कर्नाटक में भाजपा विधायक दल का बड़ा हिस्सा येदुरप्पा को हटाने के पक्ष में बार बार आलाकमान से गुहार कर चुका है और दल से बाहर चले गये विधायकों का प्रबन्धन किस साम दाम दंड भेद से किया गया वह जग जाहिर है। हिमाचल के मुख्य मंत्री रहे शांता कुमार के बयान से हिमाचल में संगठन की दशा के भी संकेत मिलते हैं। राजस्थान में वसुन्धरा राजे ने जिस राजशी हठ के साथ आलाकमान के आदेशों को ठुकराया और फिर उस हठ के आगे झुक कर उन्हीं को विपक्ष का नेता बनाना पड़ा जिससे राजस्थान में साफ साफ विभाजन हो गया है। प्रधानमंत्री पद के लिए अपने को अगला प्रत्याशी मानते हुए नरेन्द्र मोदी गुजरात को अपनी जागीर समझते हैं जहाँ उन्होंने भाजपा को मजबूत बनाया हुआ है, किंतु उनके कारण पूरे देश में ही नहीं पूरी दुनिया में भाजपा की जो थू थू हुयी है, और उसे अछूत मान लिया गया है उसकी उन्हें कोई परवाह नहीं है। वे अपने आप में स्वयंभू हैं और गुजरात को एक अलग देश मानते हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में योगी आदित्यनाथ की स्वतंत्र सत्ता है, संघ की ही तरह उसके दर्जनों स्वतंत्र संगठन हैं तथा भाजपा नेता उसके पास झुक कर जाते हैं। महाराष्ट्र में तो मुण्डे द्वारा पार्टी छोड़ने में कोई कसर बाकी नहीं रह गयी थी जिनका सारा झगड़ा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी से ही है। उमाभारती के प्रवेश ने तो तलवारें खींच ही दी हैं जो कभी भी बाहर आ सकती हैं। सुषमास्वराज और अरुण जैटली भी कर्नाटक के मामले पर सार्वजानिक रूप से टकरा ही चुके हैं।

कांग्रेस में तो आपस में जूतम पैजार तक सार्वजनिक होती है किंतु सोनिया गान्धी का लिहाज बचा हुआ था। उनके नाम की ढाल से तलवारें म्यानों में चली जाती थीं, पर पिछले दिनों मणिशंकर अय्यर ने पूरी कांग्रेस को सरकस ही नहीं कह दिया अपितु यह भी कह दिया कि 10 जनपथ [सोनिया गान्धी का निवास] और अहमद पटेल का आवास आल इंडिया कांग्रेस कमेटी से ज्यादा पावरफुल है। कमजोर पार्टी कार्यकर्ता कांग्रेस कार्यालय के चक्कर लगाते हैं किंतु पावर वाले लोगों की पहुँच सीधे 10 जनपथ और 23 विलिंगडन क्रिसेंट तक है। यह कथन कांग्रेस की परम्परा की दृष्टि से एक बड़ा दुस्साहस है। पिछले ही दिनों जब राज्य के एक मंत्री ने श्रीमती प्रतिभा पाटिल की ओर संकेत करते हुए कह दिया था कि वे इन्दिरा गान्धी की रसोई बनाते बनाते उक्त पद पर पहुँच गयीं तो उसे त्यागपत्र ही देना पड़ा था। यह दुस्साहस कांग्रेस के अन्दर चल रही हलचल का संकेत देता है।

बिहार में रामविलास पासवान की लोकजन शक्ति पार्टी दल के तीनों विधान परिषद के सदस्य जेडी[यू] में शामिल हो गये। लालू प्रसाद के जहाज को डूबता मानकर उसमें से प्रतिदिन लोग बाहर निकल रहे हैं पर पिछले दिनों उनके खासम खास शकील अहमद खान के छोड़ने का संकेत मिलते ही पार्टी महासचिव ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया। वे पिछले पाँच महीनों पूर्व चुनाव के भितरघातियों पर कार्यवाही किये जाने के अपने अनुरोध पर विचार न होने से दुखी थे। डीएमके को मजबूरी में ही 86 वर्षीय करुणानिधि को अध्यक्ष बनाये रखना पड़ा है बरना उनके बेटे आपस में ही मार काट मचा देते। ए. राजा मारन को नहीं चाहते और कनुमौझी को बचाने के लिए ए राजा की बलि देने को पूरी डीएमके तैयार दिखती है। मुलायम सिंह कभी भी अमर सिंह से दूर नहीं होना चाहते थे पर उनके पूरे परिवार ने उन्हें अमर सिंह का स्तीफा मंजूर करने के लिए बाध्य कर दिया था, पर वोट के बदले नोट काण्ड ने मुलायम सिंह के मन में जो डर पैदा किया है उससे लगता है कि उनके मन से अपने भाई भतीजों का भय जाता रहा है और वे अमर सिंह के पक्ष में खड़े होकर उनसे विद्रोह करने को तैयार हैं। प्रधानमंत्री का आदेश पालन न करने वाले मुकुल राय के खिलाफ ममता बनर्जी एक शब्द भी नहीं बोल सकीं हैं।

मतभेदों के बाहर आने से केवल बामपंथी दल ही बचे दिख रहे हैं, पर चुनावों में पराजय के बाद अन्दर क्या चल रहा है यह प्रतीक्षित है। लोग निगाहें लगाये बैठे हैं।

वीरेन्द्र जैन

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रविवार, मई 15, 2011

विधान सभा चुनाव परिणामों में राष्ट्रिय दल और राष्ट्रीय एकता का प्रश्न



विधानसभा चुनाव परिणामों में राष्ट्रीय दल और राष्ट्रीय एकता का प्रश्न
वीरेन्द्र जैन
पाँच राज्यों में हुए चुनाव के परिणामों से देश में किसी सुचिंतित राजनीतिक धारा का संकेत नहीं मिलता है जो देश के लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से चिंता का विषय होना चाहिए। चालू मीडिया की सतही दृष्टि भले ही इसे कांग्रेस की विजय और बामपंथ की हार के रूप में चित्रित कर रही हो किंतु यथार्थ में ऐसा नहीं है। इन चुनावों में जो मुद्दे उभरे थे वे भ्रष्टाचार, मँहगाई, बदलाव [पोरवोरतन], नक्सलवाद का उभार, विदेशी शरणार्थी, आदि थे, जिनमें से कुछ राष्ट्रीय स्तर के थे तो कुछ क्षेत्रीय स्तर की मामूली बातों, और किसी पार्टी के लम्बे शासन से उपजी ऊब से जन्मे थे। खेद की बात है कि साठ साल हो जाने के बाद लोकतंत्र में राजनीतिक परिपक्वता आनी चाहिए थी किंतु उसकी जगह सतही स्थानीयता और सतही उत्तेजना के सहारे देश का भविष्य लिखा जा रहा है।
इन चुनाव परिणामों में राष्ट्रीय दलों को हुए नुकसान में सबसे निराशा जनक प्रदर्शन बसपा और भाजपा का ही हुआ है। भाजपा जो संसद में मुख्य विपक्षी दल है और पिछले दिनों केन्द्र में जिसके नेतृत्व में सरकार बन चुकी है, की उपस्तिथि असम को छोड़ कर कहीं दर्ज नहीं हुयी। भाजपा ने कुल 824 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे पर केवल असम में उसे पाँच सीटें बहुत कम अंतर की जीत से मिल सकीं। बाकी राज्यों में यह हिन्दूवादी दल शून्य पर ही रहा। इससे भी बुरा हाल बसपा का रहा जो कोई सीट नहीं जीत सकी। बंगाल और केरल में उनके मतों के प्रतिशत में ह्रास हुआ है। शायद यही कारण है कि चिदम्बरम जैसे नेता उत्तर-पश्चिम के राज्य विहीन भारत की स्वर्णिम कल्पना करते हैं और अमेरिकन राजदूत के सामने उत्तर दक्षिण मिला कर एक देश होने का दुखड़ा रोते हैं। राष्ट्रीय कहलाने वाले जो दल अपने अपने कोने पकड़े बैठे हैं वे अपना प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी घोषित करके अपनी और अपने नेता दोनों की ही खिल्ली उड़वाते हैं।

कांग्रेस को चुनाव परिणामों से खुश बताया जा रहा है पर उसके खुश होने का कोई कारण नहीं है। तामिलनाडु में उसे कुल पाँच सीटें ही मिल सकी हैं, और उसका गठबन्धन बुरी तरह हार गया है। टीवी के चुनाव विश्लेषण में उसके नेता इसे उसके गठबन्धन के साथी डीएमके के भ्रष्टाचार को दोषी बता रहे हैं किंतु जो एआईडीएमके जीती है उसकी छवि भी इस मामले में कोई खास अच्छी नहीं है। यही हाल पद्दुचेरी[पाण्डुचेरी] राज्य में भी हुआ जहाँ उसे सत्ता से दूर होना पड़ा। केरल में जो उसका गठबन्धन जीता है वह बहुत ही कम मार्जिन से जीत पाया है। इस गठबन्धन में भी 49प्रतिशत सीटें दूसरे दलों की हैं इनमें से कई उसके साथ केवल चुनावी साथी की तरह ही गठबन्धन में सम्मिलित हुए थे और उन्हें हर अवसर पर अपनी मित्रता का नवीनीकरण कराना होगा जो उसके सहयोगी दलों की शर्तों पर ही होगा। इस गठबन्धन में भी 20 सीटें तो मुस्लिम लीग की हैं तथा उनका बैलेंस बिगाड़ सकने की क्षमता रखने वाले और भी कई दल हैं। इसके विपरीत बामपंथी मोर्चे की मजबूती यह है कि सीपीआई, सीपीएम और आरएसपी को मिला कर ही उनकी 60 सीटें होती हैं। इनको प्राप्त कुल मतों का भी यही अनुपात है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने अपनी सीटें पिछले चुनाव से दुगनी कर ली हैं किंतु वे ममता बनर्जी के जूनियर पार्टनर बन कर और बने रहकर ही रहना होगा क्योंकि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को अकेले ही 184 अर्थात 61 प्रतिशत से अधिक सीटें मिली हैं। इससे कांग्रेस को केन्द्र में भी दबाव का सामना करना पड़ेगा। स्मरणीय है कि ममता बनर्जी कभी कभी बेहद बचकानी जिद पर उतर आती हैं और स्तीफा फेंक मारने में देर नहीं लगातीं। इस तरह कांग्रेस को चाहे केरल हो या बंगाल दोनों ही राज्यों में राजनीतिक दृष्टि से कमजोर ही होना पड़ा है। उसे अगर लाभ हुआ है तो वह असम में हुआ है जहाँ पर उसकी सीटें 53 से 78 हो गयी हैं। इससे उसकी स्वतंत्रता में बढोत्तरी हुयी है। उत्तर पूर्व के इस राज्य में आल इंडिया यूनाइटिड डेमोक्रेटिक फ्रंट जो इस्लामी तत्ववादियों का दल है, अभी भी बना हुआ है जो भविष्य में कभी भी दुखदायी हो सकता है। दूसरे राज्यों के उपचुनावों में भी कांग्रेस को झटका लगा है वह आन्ध्र प्रदेश में कांग्रेस के विद्रोही जगन मोहन से लोकसभा और उसकी माँ से विधानसभा सीट हार कर आन्ध्र प्रदेश में कमजोर हुयी है तो छत्तीसगढ में लोकसभा की सीट हारकर और कर्नाटक उत्तर प्रदेश व नागालेंड में विधानसभा की सीटें हार कर पिछड़ गयी है। सीपीआई सीपीएम जैसे राष्ट्रीय दलों से बने बाम मोर्चे को दो राज्यों की सरकारों से हाथ धोना पड़ा है और चुनावी राजनीति करने वाले दलों के बीच इसे उन्हें मिले बड़े धक्के के रूप में लिया जा रहा है जबकि ये दल और इनका नेतृत्व अपने तथाकथित शुभचिंतकों से कम चिंतित है। इन दलों ने सत्ता में रहते हुए सत्ता के कम से कम लाभ लिये इसलिए सत्ता का जाना उनका व्यक्तिगत नुकसान न होकर राजनीतिक नुकसान है जब कि उनके दुश्मन और कई दोस्त चुनावी दलों की तरह से ही सोच कर खुश और दुखी होते हैं। वैसे भी कांग्रेस के 170, भाजपा के 5, बसपा के शून्य, की तुलना में उनके 150 से अधिक विधायक जीते हैं। इस चुनावी जीत हार के बाद भी अगर कोई दल राजनीतिक रूप से सर्वाधिक निरंतर सक्रिय रहेगा तो वे बामपंथी दल ही होंगे।
कुल मिला कर इन चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के 185 एआईडीएमके के 155 और डीएमके के 25 विधायक मिल कर राष्ट्रीय दलों को मुँह चिड़ा रहे हैं। यदि चुनावों में इसी तरह क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय दलों पर हावी होते गये तो राष्ट्रीय एकता को चुनौती मिलेगी क्योंकि क्षेत्रीय दलों और नेताओं की अपनी सीमित सोच और स्वार्थ होते हैं। ममता बनर्जी ने केन्द्र की राजनीति करते हुए भी कभी भी बंगाल से बाहर नहीं सोचा और जयललिता तो तामिलनाडु में रहकर भी अपने महल से दूर से दर्शन देती रही हैं। उनकी सरकार में उनके गठबन्धन सहयोगी सीपीआई और सीपीएम सम्मलित नहीं होंगे क्योंकि जब तक वे अपने फैसले लागू कराने की स्तिथि में नहीं होते तब तक सरकार में सम्मलित होना पसन्द नहीं करते। राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से राष्ट्रीय दलों को इस स्तिथि पर मंथन करना चाहिए।



वीरेन्द्र जैन
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