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गुरुवार, जून 07, 2012

पाँचजन्य और आर्गनाइजर, मुखपत्र या मुखौटापत्र






पाँचजन्य और आर्गनाइजर, मुख पत्र या मुखौटा पत्र

वीरेन्द्र जैन
       

 गत दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सम्पर्क प्रमुख राम माधव ने भोपाल में कहा कि पांचजन्य और आर्गनाइजर का संचालन स्वयंसेवक करते हैं लेकिन उनमें प्रकाशित लेखों में व्यक्त विचार संघ के विचारों से मेल खाएं यह जरूरी नहीं है। वे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के बारे में आरएसएस के दो मुखपत्रों में छपे अलग अलग विचारों के बारे में सफाई दे रहे थे।
       विकीपीडिया पर बताया गया है कि आर्गनाइजर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का “इन-हाउस पब्लिकेशन/न्यूज पेपर” है, जिसे ही हिन्दी में मुख पत्र कहा जाता है। यही सूचना पांचजन्य के बारे में है। दोनों ही साप्ताहिक पत्र एक ही स्थान से मुद्रित व प्रकाशित होते हैं और दोनों का कार्यालय संस्कृति भवन देशबन्धु गुप्ता मार्ग झंडेवालान दिल्ली में स्थित है। जो संघ के दिल्ली कार्यालय के समीप है। दोनों साप्ताहिकों के समाचारों के सूचना माध्यम एक ही होते हैं, व दोनों के ही लेखों के लेखक भले ही अलग अलग होते हों किंतु विषय और विचार एक ही होते रहे हैं। दोनों साप्ताहिकों का पाठक वर्ग भी संघ समर्थक मध्यम वर्ग है। महात्मा गान्धी की हत्या के बाद और इमरजैंसी में जब संघ पर प्रतिबन्ध लगाया गया तब इन समाचार पत्रों का प्रकाशन भी प्रभावित हुआ और ये डूबा साध कर बैठ गये। दोनों के सम्पादक संघ से जुड़े लोग रहे हैं।
       देश के स्वतंत्र होने के बाद प्रकाशित इन दोनों साप्ताहिकों के जीवन में यह पहली बार हुआ है जब इनके सम्पादकीय लेखों के विचारों में वैसा ही भेद नजर आया जैसा कि संघ समर्थित अडवाणी और मोदी के विचारों में दृष्टिगोचर हुआ। अपनी कमजोरी पर विचार करने, उसे समझने, भूल स्वीकारने व उसके लिए क्षमाप्रार्थी होने, की परम्परा संघ में नहीं रही है। वे दोषी व्यक्ति से अपने सम्बन्ध को ही नकार देते रहे हैं, जैसा कि महात्मा गान्धी के हत्यारे गोडसे के मामले में किया था। इन्हीं से प्रशिक्षित होकर निकले भाजपा के नेता भी इसी तरकीब का अनुसरण करते हैं। अडवाणीजी ने बाबरी मस्ज़िद ध्वंस के बाद कहा था कि उसे तोड़ने वाले तो मराठी लोग थे जिन्हें मैं रोकता रहा पर मेरी भाषा न समझने के कारण मेरी अपील का कोई असर नहीं हुआ। कर्नाटक के खनन माफिया रेड्डी बन्धुओं से उपकृत और उन्हें आशीर्वाद देने वाली सुषमा स्वराज उनके फँस जाने के बाद उनसे कोई भी सम्बन्ध होने से इंकार कर देती हैं। मध्य प्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष रोहाणी से लेकर ऐसे सैकड़ों अन्य प्रकरण गिनाये जा सकते हैं। साध्वी की वेषभूषा धारण करने वाली प्रज्ञा सिंह और उसकी टीम से अपने सम्बन्ध भी संघ परिवार ने साफ नकार दिये थे और सीडी सामने आने के बाद संजय जोशी से तुरंत दूरी बना ली थी। इसलिए पाँचजन्य और आर्गनाइजर को संघ का मुख पत्र होने से इंकार करने पर अचम्भित लोगों को सम्पादकों  से संघ के विचारों की असहमति वाले बयान से कोई आश्चर्य नहीं हुआ होगा।
        विडम्बनापूर्ण स्थिति आ जाने पर संघ के बयानवीर कहने लगते हैं कि हम भाजपा के कार्यों में कोई दखल नहीं देते, केवल माँगने पर उन्हें सलाह देते हैं। इसके विपरीत सच यह है कि भाजपा में संघ की अनुमति के बिना कुछ भी नहीं होता रहा और उसकी छोटी से छोटी घटना पर भी उसकी निगाह रहती रही है, जिसके लिए प्रत्येक स्तर के संगठन मंत्री का पद संघ प्रचारक के लिए आरक्षित रखा गया है। भारतीय लोकतंत्र में इस दूसरे सबसे बड़े दल की कार्यप्रणाली में संघ ही सबसे बड़ी बाधा रहा है। जनसंघ के सबसे पहले अध्यक्ष मौल्लिचन्द्र शर्मा ने संघ के अनावश्यक हस्तक्षेप से दुखी होकर ही स्तीफा दिया था। देश की पहली गैर कांग्रेसी सरकार संघ के साथ दुहरी सदस्यता के कारण ही बिखरी थी जिससे विकसित हो रही लोकतांत्रिक प्रणाली को बड़ा धक्का लगा था। एनडीए के गठबन्धन में और बाद में उसके निरंतर कमजोर होते जाने में सबसे बड़ा कारण संघ का हस्तक्षेप ही रहा है। संघ के कारण ही तेलगुदेशम अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार में सम्मलित नहीं हुयी थी अपितु उसे अपनी शर्तों पर बाहर से समर्थन देना मंजूर किया था जिससे सरकार लगातार अस्थिरचित्त रही। लाल कृष्ण अडवाणी जैसे वरिष्ठ नेता को अपना अध्यक्ष पद संघ के दबाव में ही छोड़ना पड़ा था जबकि कार्यकारिणी के दस प्रतिशत सदस्य भी ऐसा नहीं चाहते थे। यही कारण रहा कि
आडवाणी ने 2005 सितंबर में चेन्नई में आयोजित बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में ये कहते हुए संघ को आईना दिखाने की कोशिश की थी कि, “बीजेपी के बारे में ये धारणा बन गई है कि इसके कोई राजनीतिक या सांगठनिक निर्णय आरएसएस की सहमति के बगैर नहीं होते, ऐसी धारणा से बीजेपी के साथ संघ का भी नुकसान हो रहा है।” भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के अध्यक्ष बनने की कल्पना तक किसी भाजपा सदस्य ने नहीं की थी किंतु उन्हें न केवल संघ ने पूरी पार्टी पर थोप दिया अपितु राज्यों के चुनावों में खराब प्रदर्शन की बाबजूद दुबारा अध्यक्ष बनाये जाने का रास्ता साफ कर दिया गया है।
      संघ परिवार का इस समय मूल संकट ही यह है कि इस अति का विरोध प्रारम्भ हो गया है राजस्थान में वसुन्धरा राजे ने संघ के सबसे चहेते गुलाब चन्द्र कटारिया की प्रस्तावित जनजागरण यात्रा को धूल चटा दी व संघ को अपनी हरी झंडी को लाल में बदलना पड़ा। नरेन्द्र मोदी स्वयं को गुजरात का प्रधानमंत्री समझते हैं और कुछ उद्योगपतियों द्वारा स्वार्थवश उनकी अतिरंजित प्रशंसा कर देने के कारण वे अपने काल्पनिक पद का विस्तार करने के सपने देखने लगे हैं। वे भी अपनी उम्मीदवारी में पहली चुनौती संघ को मान रहे हैं इसीलिए उन्होंने समय रहते उसे चुनौती दे दी है व उसके द्वारा नियुक्त संजय जोशी को निकालने के लिए अपने वीटो का प्रयोग कर दिया। उत्तर प्रदेश में तो योगी आदित्यनाथ अपने क्षेत्र में अपने स्वयं की “आरएसएस” चलाते हैं। उत्तराखण्ड और हिमाचल में भी सुगबुगाहट है क्योंकि इन क्षेत्रों में साम्प्रदायिकता का असर कमजोर है जो आरएसएस की जीवनी शक्ति है। मध्यप्रदेश जैसे राज्य में भी किसान संगठन के लोग संघ की पकड़ से निकल भागे हैं।
      प्रत्येक मतभेद को आंतरिक लोकतंत्र कहने का तरीका अब घिस चुका है और प्रभावित नहीं करता। संघ के लोगों को स्पष्ट करना चाहिए कि जिस विषय पर ये “आंतरिक लोकतंत्र” कौंध रहा है उस विषय पर उनका कहना क्या है और वे किस तरफ हैं। उन्हें यह भी बताना चाहिए कि अगर ये दोनों पत्र केवल मुखौटापत्र हैं त्तो उनके संगठन के मूल फैसले कहाँ पर उपलब्ध होते हैं।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629




शुक्रवार, मई 18, 2012

भाजपा में मनमानी से संघ की अकड़ ढीली पड़ गयी है


    भाजपा में मनमानी से संघ की अकड़ ढीली हो गयी है
                                                                        वीरेन्द्र जैन
        आरएसएस और भाजपा के सम्बन्ध कुछ कुछ अवैध सम्बन्धों जैसे हैं जिन्हें दिन के उजाले में छुपाये रखा जाता है किंतु अँधेरे में बनाये रखा जाता है। किंतु इनका यह सत्य भी ऐसे ही जग जाहिर है जैसा कि रहीम ने एक दोहे में कहा है-
                खैर, खून, खाँसी, खुशी, बैर, प्रीति, मदपान
                रहिमन दाबे न दबे, जानत सकल जहान
      स्मरणीय है कि जब महात्मा गान्धी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था तब इस प्रतिबन्ध से मुक्ति के लिए उसके पदाधिकारियों ने केन्द्र सरकार के समक्ष अपने संगठन को शुद्ध सांस्कृतिक संगठन बताते हुए वादा किया था कि वह कभी राजनीति में भाग नहीं लेगा। जब इस आश्वासन के बाद उस पर से प्रतिबन्ध हटा लिया गया तो उसने कुछ ही दिन बाद राजनीतिक दल गठन करने के लिए अपने स्वयं सेवक भेज दिये जिनमें दीनदयाल उपाध्याय, कुशा भाऊ ठाकरे, सुन्दर सिंह भंडारी, कैलाशपति मिश्र, अटल बिहारी वाजपेयी, व लाल कृष्ण आडवाणी भी सम्मलित थे। तब से ही संघ दुहरा खेल खेल रहा है। जहाँ एक ओर वह कहता है कि उसे जनसंघ, जिसका परिवर्तित नाम भारतीय जनता पार्टी है, की कार्यप्रणाली से कोई मतलब नहीं है और उसके स्वयं सेवकों में तो सभी दलों के सदस्य हैं, वहीं दूसरी ओर वह केवल भाजपा की छोटी से छोटी बात में दखल देता रहा है व सारी गतिविधियां उसके निर्देश में ही चलती हैं। इतना ही नहीं नियंत्रण बनाये रखने के लिए भाजपा में ब्लाक से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक संगठन मंत्री के सारे पद केवल संघ प्रचारकों के लिए आरक्षित कर रखे हैं। संघ के स्वयं सेवक ही चुनावों में भाजपा की रीढ रहे हैं और अपने प्रारम्भिक चुनाव उन्होंने इसी पूंजी की दम पर लड़े हैं, और इसी के प्रभाव के अनुपात में सीटें जीती हैं। भाजपा के सारे बड़े नेता मौके ब मौके अपने को स्वयं सेवक बतलाते रहते हैं और उनके गणवेष में समारोहों में शामिल होते रहते हैं। असंतुष्ट होने पर संघ के एक निर्देश पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से अडवाणी जैसे वरिष्ठतम नेता को दूध में पड़ी मक्खी की तरह अलग कर दिया जाता है, और संघ के निर्देश पर ही राष्ट्रीय स्तर पर अज्ञात नितिन गडकरी को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया जाता है। दोनों ही मामलों में कार्यकारिणी अचम्भे से देखती हुयी केवल सहमति देने को विवश होती है। संघ के निर्देश पर ही जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेता को विपक्षी नेता का पद नहीं दिया जाता और संघ के आदेश पर ही पार्टी से खुला विद्रोह करने वाली उमा भारती को पार्टी में पुनर्प्रवेश दिया जाया है।
राष्ट्रीय समाचार पत्रों में पिछले दो एक महीने में छपे समाचारों के शीर्षक सारी कहानी कहते हैं
·         21मार्च 2012- संघ प्रमुख ने लगाई गडकरी की क्लास , भागवत का आदेश, कर्नाटक संकट जल्द निपटाएं। नागपुर/नई दिल्ली संघ के प्रमुख मोहन भागवत और सरकार्यवाह भैय्याजी जोशी ने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी की क्लास ली। मंगलवार को तीन घंटे चली मैराथन बैठक में दोनों शीर्ष पदाधिकारियों ने लम्बे समय से चले आ रहे कर्नाटक को सुलझाने में असफल रहने पर गडकरी से स्पष्टीकण मांगा और इस मामले को जल्दी ही पटाक्षेप करने को कहा। राज्यसभा के उम्मीदवारों में नागपुर के अजय संचेती, और म.प्र. में नजमा हेपतुल्ला के चयन पर भी असंतोष जताया।...........
·         18मार्च2012- संघ ने दी भाजपा को नसीहत, विधानसभा चुनावों में मिला हार से नाखुश। नईदिल्ली, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भाजपा के विधानसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन से खासा नाखुश है। उन्होंने कहा है कि भाजपा को इस सवाल का जबाब ढूंढना चाहिए कि सांगठनिक ढांचा और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के एक मजबूत सीरीज होने के बाबजूद मतदाताओं की नजर में वह क्यों नहीं चढ सकी। ...............
·         18मार्च2012- गडकरी पर नहीं बनी सहमति। नागपुर/ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में नितिन गडकरी को फिर से भाजपा की कमान सौंपने की संघ मंशा रास नहीं आ रही है। वे संजय जोशी को संगठन महामंत्री का मौका देने के भी खिलाफ हैं।...................
·         16मार्च 2012- संघ म.प्र. सरकार की कार्यशैली से नाराज। नागपुर / भाजपा शासित राज्यों के संघ प्रचारकों ने पार्टी नेताओं की कार्यशैली पर और खासतौर पर मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार को लेकर जिस तरह से नाराजगी जाहिर की, उससे इस बात की प्रबल सम्भावना है कि संघ इस बार भाजपा को लेकर बड़े फैसले ले सकता है। ...........
·         13मार्च2012- जनसत्ता सम्पादकीय- संघ का शिकंजा.........लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद संघ के सरसंघ संचालक मोहन भागवत ने पार्टी नेताओं को तलब करने से पहले सीधे संवाददाता सम्मेलन बुला कर नसीहत दी थी, और पार्टी अध्यक्ष को बदलने की जरूरत रेखांकित ही नहीं की थी अपितु बदल भी दिया था। विधानसभा चुनावों में मिली ताजा हार के बाद उन्होंने फिर से सार्वजनिक रूप से नेतृत्व बदलने की जरूरत बतायी। ...... गुजरात भाजपा इकाई में खींचतान और विद्रोह के बाबजूद भी मोदी बचे रहे तो उसकी बड़ी वजह संघ का उन पर वरद हस्त का होना था।  
इन समाचारों और विचारों से भाजपा पर संघ के नियंत्रण का पता चलता है, पर भाजपा में उफन रहे भ्रष्टाचार और दौलत से चुनाव संचालन के कारण भाजपा के नेताओं की संघ पर निर्भरता कम होती जा रही है और उनमें संघ से स्वतंत्र होने की छटपहाटें दिखायी देने लगी हैं।
कुछ नमूने देखिए-  
·         राजस्थान में वसन्धुरा राजे ने जिन गुलाब चन्द्र कटारिया की जन जागरण यात्रा को रुकवाया वे संघ के कट्टर स्वयं सेवक रहे हैं और राजस्थान में सरकार बनने के बाद भले ही दिखावटी मुख्यमंत्री का पद वसन्धुरा राजे को दिया गया था पर गृहमंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद संघ ने उन्हें ही दिलवाया था। भैरोंसिंह शेखावत के उपराष्ट्रपति पद पर चुने जाने के बाद विपक्ष के नेता पद पर उन्हें ही प्रतिष्ठित किया गया था। भाजपा सरकार के दौर में वे मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार माने जाते थे। उनकी यात्रा पहले संघ और फिर पार्टी से अनुमति लेने के बाद ही निकाली जा रही थी पर पद जाने की आशंकाओं से ग्रस्त वसुंधरा ने उन्हें चुनौती देकर और 59 विधायकों से त्यागपत्र लिखवा कर सीधे सीधे संघ को चुनौती दे दी है। वसन्धुरा की माँ विजयाराजे सिन्धिया ने काँग्रेस से नाराज होने के कारण बदला लेने के लिए भाजपा को अटूट साधन उपलब्ध कराये थे जिसकी बदौलत ही भाजपा[पूर्व जनसंघ] अपना आधार तैयार कर पायी थी। अडवाणी पीढी के लोग अब भी उनसे उपकृत महसूस करते हैं। विधानसभा में विपक्ष के नेता पद पर नियुक्ति के संघर्ष में वे पहले ही भाजपा और संघ नेताओं को नाकों चने चबवा चुकी हैं।
·         मध्यप्रदेश में आरएसएस के आनुषांगिक संगठन किसान संघ ने संघ से अनुमति लिये बिना पहले ही मुख्यमंत्री निवास घेर लिया था, और कुछ आश्वासन लेकर ही वापिस लौटे थे। इस बार पहले तो एक धरने के दौरान किसान संघ और आरएसएस कार्यकर्ताओं के बीच बकायदा मारपीट हुयी और एक दूसरे के खिलाफ रिपोर्टें लिखवायी गयीं वहीं गैंहू खरीद के मामले में किये गये चक्काजाम के बाद पुलिस ने न केवल गोली चलायी अपितु एक किसान को गोली मार कर उसकी लाश का आनन फानन में अंतिम संस्कार भी करवा दिया। इसके साथ ही किसान संघ के अध्यक्ष और महासचिव को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। इस बीच भले ही उन्होंने एक जेबी पदाधिकारी बना कर भ्रम उत्पन्न करने की कोशिश की हो, किंतु प्रदेश में किसान संघ के संघर्षशील नेता ही अभी भी किसान संघ के किसानों की पहली पसन्द के नेता हैं। संघ के इशारों पर प्रदेश अध्यक्ष द्वारा किसान संघ के लोकप्रिय अध्यक्ष को ब्लेकमेलर कहा गया और संघ में कई अनियमितताओं के आरोप लगाये। ऐसे में संघ और किसानों के बीच टकराव तय है।
·         कर्नाटक में येदुरप्पा ने स्वयं को मुख्यमंत्री बनाने की माँग लेकर न केवल धमकी दी अपितु अपने पक्ष के विधायकों और मंत्रियों के त्यागपत्र भी ले के रख लिये। येदुरप्पा पहले कभी संघ के स्वयं सेवक रहे थे किंतु सत्ता का स्वाद चखने के बाद वे रेड्डी बन्धुओं की शह पर खुली बगावत पर उतारू हैं। संघ सत्ता की ओट में काम करने का अभ्यस्त हो चुका है और वह किसी भी तरह दक्षिण के इकलौते राज्य में संकीर्ण और जुटाये गये बहुमत से प्राप्त सत्ता खोना नहीं चाहता। यदि वह सैद्धांतिक आधार पर सत्ता दाँव पर लगाता है तो विभाजन तय है। इसके विपरीत जाने पर देश भर में स्वयं सेवक और समर्थक संघ में आस्था खो देंगे।
·         गुजरात में नरेन्द्र मोदी को केशुभाई ने खुली चुनौती दी है जबकि संघ मोदी के साथ है। संघ के कृपापात्र भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी और स्वयं को प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी समझने वाले नरेन्द्र मोदी एक दूसरे को फूटी आँख नहीं देखना चाहते। ऐसे में संघ को अपनी पक्षधरता तय करनी पड़ेगी।
      इसी तरह हिमाचल में शांता कुमार बनाम धूमल, उत्तराखण्ड में निशंक बनाम खण्डूरी बनाम कोशियारी उत्तरप्रदेश में योगी, बनाम, राजनाथ सिंह, बनाम लालजी टण्डन, बनाम कटियार, बनाम कलराज मिश्र के साथ अब मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और चुनावों में मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित उमाभारती के साथ वरुण गान्धी मनेका गान्धी के बीच चल रहे द्वन्द में संघ को चुनाव करना पड़ रहा है और इस चुनाव के बाद उसकी ताकत का कमजोर होना तय है। गठबन्धन वाली सरकारों में तो क्षेत्रीय दल इस राष्ट्रीय दल के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते हैं और संघ की छाया से भी बचते हैं। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि संघ की कूटनीति अब संकट में घिर गयी है। तभी पिछले दिनों संघ ने विधानसभा चुनावों के पूर्व झुंझला कर कहा था कि भाजपा हार जाये तो अच्छा और बिल्कुल से हार जाये तो बहुत अच्छा।  
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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सोमवार, फ़रवरी 27, 2012

आरएसएस और पारदर्शिता


सूप तो सूप छलनी भी बोले जिसमें सौ छेद
               आरएसएस और पारदर्शिता
                                                                          वीरेन्द्र जैन
      राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने गत दिनों यूपीए अध्यक्ष सोनिया गान्धी पर आरोप लगाया कि वे  इमरजेंसी वाली मानसिकता की है जो निरंकुश शासन और अलोकतांत्रिक प्रवृत्ति का परिचायक है। उनका कहना है कि श्रीमती गान्धी ने अलोकतांत्रिक तरीके से राष्ट्रीय सलाहकार परिषद का गठन किया है जो कि एक समानांतर सत्ता केन्द्र है। आर्गनाइजर और पाँचजन्य के ताजा अंकों के माध्यम से संघ का कहना है कि वे इसी मानसिकता के के चलते वे देश  की जनता से अपना धर्म, बीमारी और आयकर सम्बन्धी जानकारी भी छुपाती हैं।
      रोचक यह है यह व्यक्तिगत जानकारियों को सार्वजनिक न करने का यह प्रश्न एक ऐसे संगठन ने उठाया है जो स्वयं में ही न केवल झूठ की नींव पर खड़ा है अपितु जिसके सारे के सारे काम गोपनीय होते हैं और जिसके लोग अपनी सच्चाई छुपाने के लिए हमेशा निरर्थक प्रतिक्रियावादी सवाल उठा कर अपनी कमजोरियां छुपाने की कोशिश करते रहते हैं। स्मरणीय है कि संघ अपने आप को सांस्कृतिक संगठन की तरह पंजीकृत कराये हुए हैं जबकि वे न केवल हर कोण से राजनीतिक हैं अपितु सांस्कृतिक कार्यों से उनका दूर का भी नाता नहीं है। 1948 में महात्मा गान्धी की हत्या के बाद जब संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था तब उसे उठाने के लिए दिये गये प्रार्थना पत्र में संघ के नेतृत्व ने तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल को आश्वस्त करते हुए कहा था कि संघ कभी भी राजनीति में भाग नहीं लेगा। पर संघ ने इस वादे पर कभी अमल नहीं किया और अपने स्वयं सेवक भेज कर जनसंघ पार्टी का गठन करा दिया। उस समय से लेकर अब तक जनसंघ, जिसने बाद में अपना नाम भारतीय जनता पार्टी रख लिया है, के सभी स्तर के संगठन सचिव अनिवार्य रूप से आरएसएस के प्रचारक ही होते हैं। भारतीय जनता पार्टी अपने सारे नीतिगत मुद्दों की पुष्टि संघ के नेतृत्व से लेता है तथा संगठन से लेकर सरकार तक की सारी नियुक्तियां संघ से पूछ कर ही की जाती हैं। जनसंघ के सबसे पहले अध्यक्ष मोल्लि चन्द्र शर्मा ने संघ के अनावश्यक हस्तक्षेप के कारण ही अपने पद से त्यागपत्र दिया था व उसके बाद कोई अध्यक्ष संघ से टकराने की हिम्मत नहीं कर सका।  संघ के पदाधिकारियों की नियुक्ति में किसी लोकतांत्रिक तरीके का प्रयोग नहीं होता है पर वे दूसरे को अलोकतांत्रिक बता कर निन्दा करने में सबसे आगे रहते हैं और ऐसा करने में उन्हें कोई शर्म महसूस नहीं होती। पाकिस्तान जाकर ज़िन्ना के मजार पर फूल चढाने के बाद उनकी प्रशंसा करने के आरोप में अडवाणी जैसे वरिष्ठतम नेता को पार्टी अध्यक्ष का पद संघ के आदेश पर छोड़ना पड़ता है, और संघ की नापसन्दगी के कारण जसवंत सिंह जैसे वरिष्ठ नेता को लोकसभा में विपक्ष के नेतापद से वंचित करने के लिए निकालने का ड्रामा किया जाता है। गडकरी जैसे साधारण और दोयम दर्जे के नेता को देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी अपना अध्यक्ष संघ के आदेश पर ही चुनती है तथा उपलब्धिहीन कार्यकाल के बाद भी दूसरी बार अध्यक्ष बनाने के लिए तैयार बैठी है। अपने इन फैसलों के लिए देश तो क्या अपनी बगल बच्चा पार्टी के लोगों को भी वे विश्वास में लेने की जरूरत नहीं समझते।
      स्मरणीय है कि संघ अपने विशाल संगठन को संचालित करने के लिए धन संचय करता है और यह धन गुरु दक्षिणा के रूप में बन्द लिफाफों में लेने का ढोंग करता है। इन बन्द लिफाफों के पीछे का राज यह है कि उन्हें काले सफेद देशी विदेशी धन को ग्रहण करने के बारे में कोई जबाब नहीं देना पड़े। उल्लेखनीय है कि उनके पास एकत्रित धन की पवित्रता के बारे में समय समय पर सन्देह व्यक्त किये जाते रहे हैं। यही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ किसी के व्यक्तिगत धन के बारे में  अतिरिक्त चिंताएं दर्शा रहा है जिसने स्वयं द्वारा प्रसूत राजनीतिक दल के नेताओं की सम्पत्ति और आय को घोषित करने के बारे में  तब भी आग्रह नहीं किया जब कि उनकी राजनीतिक पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष खुले आम नोटों के बंडल लेता हुआ कैमरे की कैद में आ जाता है और उसके एक दूसरे बड़े नेता को उसके भाई ने अतिरिक्त धन के लालच में गोली मार दी थी व उसका सुपुत्र इसी धन के मद में ‘जवानी की भूल’ कर रहा था।
      उल्लेखनीय है कि संघ की सदस्यता का कोई रजिस्टर नहीं होता और वे अपनी सुविधा अनुसार किसी को भी अपना सदस्य घोषित कर देते हैं या उससे इंकार कर देते हैं। नाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गान्धी की हत्या कर देने के बाद संघ ने कह दिया था कि गोडसे ने गान्धीजी को मारने से पहले संघ को छोड़ दिया था। यही बात पिछले दिनों कई आतंकी बम विस्फोटों के लिए आरोपी बनायी गयी प्रज्ञा सिंह व उसके साथियों की गिरफ्तारी के बाद कही गयी थी। स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जो संगठन अपनी सदस्यता के लिए किसी भी फार्म या रजिस्टर के न होने का दावा करता है वह कुछ ही घंटों में यह कैसे बता देता है कि कौन अब उसके संगठन का सदस्य नहीं है।

                यद्यपि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्तियों के जीवन में पारदर्शिता को उनके विशेष गुण के रूप में देखा जाना चाहिए किंतु किसी दूसरे व्यक्ति विशेष से इसका आग्रह करते समय भूमि के कानून से अधिक की अपेक्षा करना न्याय संगत नहीं है। इसकी जगह ऐसी माँग रखने वाले लोगों को अपनी सम्पत्ति और आय की घोषणा करके एक बड़ी लकीर खींच कर दिखाना चाहिए। वैसे चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार चुनाव लड़ने वाले प्रत्येक प्रत्याशी को अपनी सम्पत्ति की घोषणा करना अनिवार्य है और उनके द्वारा दिया गया शपथपत्र चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध होता है। सन 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान श्रीमती सोनिया गान्धी ने जो शपथ पत्र प्रस्तुत किया था उसके अनुसार उनके पास कुल एक करोड़ सैंतीस लाख की कुल सम्पत्ति है जिसमें से एक करोड़ सत्तरह लाख की चल सम्पत्ति और बीस लाख की अचल सम्पत्ति है। चल सम्पत्ति बैंक जमा, म्यूचल फंड आदि के रूप में है।
      किसी की बीमारी और धर्म के बारे में जानने का दुराग्रह नितांत अनैतिक और अशालीन है। एक धर्म निरपेक्ष देश में जहाँ प्रत्येक धर्म, जाति, लिंग, को समान नागरिक अधिकार प्राप्त हैं वहाँ किसी के धर्म को जानने की अनाधिकार कोशिश कोई साम्प्रदायिक सोच का व्यक्ति या संगठन ही करना चाहेगा। स्मरणीय है कि पिछले दिनों संघ के पूर्व प्रमुख सुदर्शन ने श्रीमती सोनिया गान्धी के विरुद्ध जब अनर्गल बयान दिया था तब उन्हीं के संगठन के लोगों ने उनके मानसिक स्वास्थ ठीक न होने के बहाने अपना मान बचाया था, पर यदि कोई उनके मानसिक स्वास्थ के बारे में अतिरिक्त जिज्ञासा करता तो क्या संघ के लोगों को अच्छा लगता?
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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रविवार, नवंबर 20, 2011

यह फासिज्म की भाषा नहीं तो और क्या है?



यह फासिज्म की भाषा नहीं तो और क्या है                                                             
वीरेन्द्र जैन
      आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने संघ का प्रांतीय स्तर शिविर मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री और कांग्रेस के सर्वाधिक मुखर महासचिव दिग्विजय सिंह के मूल निवास क्षेत्र राजगढ में आयोजित किया। अपने मन और वचन में भेद रखने के लिए जाने जाने वाले इस संगठन के प्रमुख ने राजगढ में शिविर रखने के पीछे कारण बताया कि वहाँ पूरे प्रांत में सबसे अधिक शाखाएं हैं, इस कारण से इस स्थान का चुनाव किया गया। इस आंकड़े की सत्यता तो वे ही जानें किंतु यदि यह सच भी है तो भी प्रांतीय स्तर का शिविर आयोजित करने के लिए हमेशा यही कारण नहीं होता रहा है, और न ही वहाँ भी है। उल्लेखनीय है कि इस समय दिग्विजय सिंह के बयान न केवल सर्वाधिक सुर्खियां बटोर रहे हैं अपितु वे अफवाहों से निर्मित माहौल के गुब्बारे में सुई का काम भी करते हैं जिससे संघ परिवार द्वारा रचे गये झूठ का पर्दाफाश हो जाता है। धार्मिक आस्थाओं वाले समाज में भाजपा जिस तरह से धार्मिक भावनाओं का अपने पक्ष में विदोहन करती है, वह भी दिग्विजय सिंह के सामने नहीं चल पाता क्योंकि उनके द्वारा भी समान रूप से धार्मिक संस्थाओं और धार्मिक नेताओं से निकट सम्बन्ध रखा रखा जाता है। यहाँ तक कि बामपंथी उन पर सौफ्ट हिन्दुत्व अपनाने तक का आरोप लगाते रहे हैं। परिणाम यह निकला है कि मँहगाई, भ्रष्टाचार आदि के कारण अलोकप्रिय हो रहे यूपीए गठबन्धन में वे ‘कूल-कूल’ कांग्रेस की गर्म धड़कन बने हुए हैं। कांग्रेस के विरोधी तो यह भी आरोप लगाते हैं कि राहुल गान्धी उन्हीं की सलाह पर चलते हैं। मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव हार जाने के बाद उन्होंने दस साल तक कोई पद न लेने की घोषणा की हुयी थी जिस पर उन्होंने तब से पूरी ईमानदारी से अमल किया व अब इसकी अवधि समाप्त होने के करीब है। इससे प्रदेश में सत्तारूढ भाजपा में घबराहट है। नव गठित प्रदेश कांग्रेस कमेटी में भी जिन लोगों को पद दिये गये हैं वे भी उन्हें अपेक्षाकृत अपना प्रिय और सक्षम नेता मानते हैं, व इसी कारण अपनी निष्क्रियता छोड़ चुके हैं। ऐसी दशा में संघ प्रमुख द्वारा बताया गया राजगढ में ही संघ द्वारा प्रांतीय शिविर आयोजित करने का कारण हजम नहीं होता। इसकी पृष्ठ्भूमि में अगले आम चुनावों में दिग्विजय सिंह के खिलाफ काम करने की आधारभूमि तैय्यार करने की योजना ही नजर आती है।  
      इस अवसर पर संघ प्रमुख ने कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि वे दिग्विजय जैसे नेताओं के बयानों से विचलित न हों और न उनके विरोध में भाषणबाजी करें। अपने काम को आगे बढाएं। यह बयान फासिज्म का संकेत देता है। लोकतंत्र में सारे हल बातचीत से निकाले जाते हैं और बहुमत का निर्णय स्वीकार किया जाता है। राराजनीतिक दलों के नेताओं के बयान से अगर असहमति है तो उसका विनम्र प्रतिवाद किया जा सकता है, आम सभाएं की जा सकती हैं, समाचार पत्रों में लेख लिखे जा सकते हैं किंतु किसी बात का जबाब ही न देना किस बात का संकेत है। फासिज्म में दल प्रमुख का कथन ही अंतिम होता है और वहाँ बात करने या बहस करने की अनुमति नहीं होती। असहमति की दशा में बात का जबाब लाठी से दिया जाता है या दमन के दूसरे दूसरे साधनों का उपयोग किया जाता है। आखिर क्या कारण है कि संघ के लोग दिग्विजय सिंह की बात के उत्तर में या तो अनाप शनाप गालियां बकने लगते हैं, फेसबुक या ट्वीटर पर छद्म नामों से गन्दी गन्दी भाषा में कमेंट्स करने लगते हैं, या काले झंडे दिखाने के नाम पर हिंसा करने लगते हैं। पिछले दिनों से लगातार यह फैलाया जा रहा है कि दिग्विजय सिंह के बयानों से कांग्रेस का वोट बैंक घट रहा है, या उन्हें पागलखाने भेजने की बात की जा रही है, पर उनके किसी बयान का जबाब नहीं दिया जा रहा है। यह अपराध बोध का परिणाम है क्योंकि वे जानते हैं कि दिग्विजय सिंह के बयान तथ्यात्मक रूप से गलत नहीं होते और अगर बहस में उतरे तो कहीं टिक नहीं पायेंगे। दूसरी ओर उनके बयानों का जबाब काम से देने को कहा गया है। ऊपर से देखने पर यह एक शांत बयान लगता है किंतु वैसा है नहीं। आखिर आरएसएस काम क्या करता है? घोषित रूप से यह एक सांस्कृतिक संगठन है किंतु उनके सदस्य किसी भी कला विधा के लिए वे नहीं जाने जाते। उनके संगठन में कोई भी बड़ा कलाकार या बुद्धिजीवी नहीं है। वे शाखाओं में खेल कूद के बहाने अपरिपक्व बुद्धि के बच्चों को एकत्रित करते हैं और बौद्धिक के नाम पर उनमें साम्प्रदायिकता का जहर भरने के लिए जाने जाते हैं। उनके संविधान से लेकर उनकी ड्रैस और कार्यप्रणाली सभी हिटलर की पुस्तक मीन कैम्फ और उसके संगठन से प्रभावित है। वे शाखाओं में लाठी और दूसरे अस्त्र चलाना सिखाते हैं, तलवारें लेकर पथ संचालन करवाते हैं। परिणाम यह निकलता है कि साम्प्रदायिक दंगों के दौरान इन्हीं शाखाओं से निकले लोगों को ही हिंसा में लिप्त देखा जाता है। विहिप और बजरंग दल आदि इन्हीं के अनुषांगिक संगठन हैं जिनके कारनामे आये दिन समाचार पत्रों में देखे जा सकते हैं। अगर वे किसी आपदा में काम भी करते हैं तो उसमें भी उनकी साम्प्रदायिक दृष्टि ही काम करती है, और अपने धार्मिक समुदाय के लोगों को प्राथमिकता के आधार पर सहयोग करना व दूसरों की उपेक्षा करना भी देखने में आया है। ऐसी दशा में किसी बात का जबाब ‘अपने’ काम से देने के निर्देश का आशय स्वयं में ही स्पष्ट है।
      पिछले दिनों से संघ की सारी गतिविधियों का केन्द्र मध्यप्रदेश होता जा रहा है जहाँ न केवल संघ से निकला व्यक्ति मुख्यमंत्री है अपितु वह संघ के आदेशों के प्रति इतना समर्पित है कि अपने व अधिकारियों के विवेक से बाहर भी संघ के आदेशों और आशयों पर अमल करता है। जहाँ गुजरात, उत्तराखण्ड, हिमाचल आदि भाजपा शासित क्षेत्रों में मुख्यमंत्री संघ के आदेशों का पालन करते समय जन भावनाओं की उपेक्षा नहीं करते वहीं मध्यप्रदेश में आँख मून्द कर संघ के आदेशों पर अमल किया जाता है। यही कारण है कि संघ के पूर्व प्रमुख को कार्यमुक्ति के बाद पूरा हिन्दुस्तान छोड़ कर मध्यप्रदेश ही पसन्द आया। ऐसे में अगर एक क्षेत्र विशेष में शिविर करते हुए संघ के प्रमुख अपने स्वयं सेवकों को बातचीत की जगह ‘काम’ से जबाब देने की बात कहते हैं तो उसमें कहीं न कहीं फासिस्ट ध्वनियां सुनायी देती हैं।
वीरेन्द्र जैन
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