रविवार, मार्च 25, 2018

सूर्य भानु गुप्त : जिन्हें कमलेश्वर नहीं धर्मवीर भारती मिले


सूर्य भानु गुप्त : जिन्हें कमलेश्वर नहीं धर्मवीर भारती मिले
वीरेन्द्र जैन
एक दिन की यात्रा के बाद रात बारह बजे लौटा। थकान तो थी किंतु दिन भर अखबार नहीं पढ पाया था और अखबार पलटे बिना शायद नींद नहीं आती। एक अखबार के स्थानीय संस्करण में खबर थी कि सुप्रसिद्ध गीतकार और शायर सूर्य भानु गुप्त को जावेद अख्तर सम्मान 25 मार्च को दिया जायेगा। खबर पढते ही नींद दूर खिसक गयी। स्मृतियों ने कुरेदना शुरू कर दिया।
अपने एक सहपाठी मित्र शिव मोहन लाल श्रीवास्तव के सम्पर्क में आने के बाद मुझे भी पत्र व्यवहार का रोग लग चुका था भले ही उनकी तुलना में यह दो चार प्रतिशत ही था। उन दिनों युवाओं का पत्रिकाओं में प्रकाशन भी बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी, पुस्तकाकार रूप में आना तो और बड़ी बात थी क्योंकि आज की तरह पैसे खर्च करके सब कुछ नहीं मिल जाता था। मैंने जल्दी ही धर्मयुग और कादम्बिनी, आदि में, जो उस समय की प्रमुख पत्रिकाएं थीं, में  प्रकाशन का गौरव पा लिया था और उसे बड़ी उपलब्धि समझने के भ्रम में था।
उन दिनों जो लोग धर्मयुग में प्रमुखता से छपते थे उनमें से एक नाम सूर्य भानु गुप्त का भी था। उनकी गज़लें और गीत मुझे बहुत पसन्द आते थे। मैं अपने छुटपुट प्रकाशन का हवाला देकर लोकप्रिय लेखकों से वैसे ही पत्र व्यवहार शुरू कर देता जिसके लिए चूहे के हल्दी की गांठ पाकर पंसारी बनने का मुहावरा बना होगा।
इमरजैंसी लग चुकी थी व ‘मुनादी’ छापने के उत्साह को भूल कर भारती जी धर्मयुग का एक छप चुका अंक वापिस ले चुके थे। कई स्वीकृत रचनाएं लौटायी जा चुकी थीं, जो इस बात का संकेत थीं कि अब धर्मयुग में क्या क्या नहीं छप सकता। थोड़ा समय गुजरने के बाद धर्मयुग में सूर्यभानु गुप्त की एक गज़ल छपी जिसका शीर्षक था ‘खामोशी’। यह इमरजैंसी की खामोशी का बयान करते हुए भी प्रकट में गैरराजनीतिक कविता/ गज़ल थी। मैंने धर्मयुग के रंग और व्यंग्य स्तम्भ में इस रचना पर एक पैरोडीनुमा रचना लिखी जो वैसे तो बहुत साधारण थी किंतु उसके साथ में एक टिप्पणी थी कि सूर्यभानु गुप्त की उक्त रचना पर यह एक प्रतिक्रिया है पर स्पष्ट कर दूं कि इन पंक्तियों का लेखक प्रतिक्रियावादी नहीं है। उन दिनों अनेक लोगों को प्रतिक्रियावादी बता कर जेल में डाल दिया गया था इसलिए यह एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी थी। भारतीजी ने टिप्पणी के साथ रचना छाप दी। स्मृति के अनुसार कुछ पंक्तिया इस प्रकार थीं-
गुप्तजी की गज़ल है खामोशी
खूब ऊंची अकल है खामोशी
एक दर्जन भर शेर मारे हैं
खूब प्यारा कतल है खामोशी
मेरे समुदाय में सभी के लिए
ढेर सा कौतुहल है खामोशी
और इसी तरह के साधारण सी तुकबन्दियों की कुछ पंक्तियां और थीं। बाद में मुझे लगा कि एक अच्छी खासी  रचना पर धर्मयुग में पैरोडी लिखना ठीक नहीं हुआ। मैंने लगभग क्षमाप्रार्थी भाव में गुप्तजी को पत्र लिखा। किसी उत्साह में उस पत्र में कई बार ‘सु’ शब्द का अतिरेक हो गया। लगभग उसी भाव में उनका उत्तर भी मिला जो दिया जा रहा है।
सूर्य भानु गुप्त
प्रिय भाई
पत्र मिला आपका, धन्यवाद।
आपका [सु] नाम मेरे लिए [सु] परिचित है क्योंकि आप इतना अधिक [सु] प्रकाशित होते रहते हैं - [सु] पत्रिकाओं में कि कोई भी , माफ कीजिएगा [सु] [के लिए] पाठक आपके [सु] नाम से [सु] अपरिचित नहीं रह सकता.
मैं पत्रों के उत्तर बहुत नहीं दे पाता, यह सही है, मगर एक बार अवश्य देता हूं, अब ये आप पर [सु] निर्भर है कि मेरे न चाह्ते हुए भी आप मुझसे [सु] पत्र लिखवा लें . [सु] वास्तविकता यह है कि बम्बई में [सु] समय क्या [कु] समय भी मुश्किल से मिलता है. एक इंजीनियरिंग कम्पनी में वरिष्ठ सांख्यकी सहायक हूं, अर्थात विशुद्ध क्लर्की समझिए. सुबह 7 बजे पर निकला शाम 7 बजे घर पहुँच पाता हूं. दफ्तर घर से 25 मील है , लिहाजा अब घंटे दो घंटे जो [सु] समय बचता है उसमें बहुत से काम होते हैं- थोड़ा आराम, पढना, लिखना, घर, दोस्त, और सामाजिक दायित्व, लिहाजा पत्र व्यवहार ज्यादा चल नहीं पाता . आप किसी [सु] गलतफहमी के शिकार न हो जाएं इसलिए [सु] स्पष्टीकरण कर दिया. मैं साफगोई का कायल हूं, इससे उम्र भर को आराम मिलता है.
किताबें या किताब अभी तक नहीं निकल पाई कोई. अविवाहित हूं, मगर घर की कुछ ऐसी जिम्मेवारियां सर पर हैं कि विवाहित से भी गयी गुजरी दशा है। संक्षेप में इतना ही . सानन्द होंगे सस्नेह आपका
सूर्यभानु गुप्त
24 अप्रैल 76 दो बजे 

इसके बाद 1977 मैं बम्बई [ तब मुम्बई का यही नाम था] प्रवास के दौरान उनके निवास पर भी गया जो दादर में था और सोजपाल काया बिल्डिंग का नाम मुझे लगभग रटा हुआ था। मुझे लगता था कि देश व्यापी ख्याति के इस कवि के फ्लैट का नम्बर बिल्डिंग का कोई भी बता देगा पर कोई नहीं जानता था। वे शायद अपनी बड़ी बहिन के साथ उनके ही फ्लेट में रहते थे। एक जगह दो लोग बैठे हुए थे तो सोचा आखिरी बार उनसे पूछ लिया जाये। दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा और कहा कि अरे वह तो नहीं , ऊषा का भाई, फिर अनुमान से एक फ्लेट नम्बर बताया तब मैं उनके निवास पर पहुंचा। उस दिन मुझे अपनी लघुता का अहसास हुआ कि जब इतने बड़े कवि को उसके पड़ोसी नहीं जानते तो मुझे कौन जानेगा। गुब्बारे की गैस निकली और मैं जमीन पर आ गया।
सूर्यभानु गुप्त के पुराने परिचय में लिखा है जो कई वर्षों से अद्यतन नहीं हुआ कि
जन्म : 22 सितम्बर, 1940, नाथूखेड़ा (बिंदकी), जिला : फ़तेहपुर ( उ.प्र.)। बचपन से ही मुंबई में । 12 वर्ष की उम्र से कविता लेखन की शुरुआत।

प्रकाशन  : पिछले 50 वर्षो के बीच विभिन्न काव्य-विधाओं में 600 से अधिक रचनाओं के अतिरिक्त 200 बालोपयोगी कविताएँ प्रमुख प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। समवेत काव्य-संग्रहों में संकलित एवं गुजराती, पंजाबी, अंग्रेजी में अनूदित ।

फ़िल्म गीत-लेखन : ‘गोधूलि’ (निर्देशक गिरीश कर्नाड ) एवं आक्रोशतथा संशोधन’ (निर्देशक गोविन्द निहलानी ) जैसी प्रयोगधर्मा फ़िल्मों के अतिरिक्त कुछ नाटकों तथा आधा दर्जन दूरदर्शन- धारवाहिकों में गीत शामिल।

प्रथम काव्य-संकलन : एक हाथ की ताली (1997), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली – 110 002

पुरस्कार : 1. भारतीय बाल-कल्याण संस्थान, कानपुर । 2. परिवार पुरस्कार (1995), मुम्बई ।

पेशा : 1961 से 1993 तक विभिन्न नौकरियाँ । सम्प्रति स्वतंत्र लेखन । 

हिन्दी गज़ल के क्षेत्र में गुप्तजी ने दुष्यंत कुमार से पहले लिखना और छपना शुरू कर दिया था किंतु ऐसा लगता है कि उन्हें कोई कमलेश्वर नहीं मिले जिनके बारे में दुष्य़ंतजी ने लिखा है कि
मैं हाथों में अंगार लिए सोच रहा था
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताये
और यह तासीर उनके परम मित्र कमलेश्वर जी ने बतायी व सारिका में छाप कर उनकी कालजयी रचनाओं को देशव्यापी बना दिया। वहीं भारतीजी अपनी गुण ग्राहकता के अनुसार रचना की गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं करते थे। वे अपनी पसन्द के रचनाकारों की श्रेष्ठ रचनाओं को भी एक तयशुदा संख्या से अधिक का अवसर नहीं देते थे। उन्होंने किसी से कहा था कि काका हाथरसी वाली भूल अब धर्मयुग दुहराना नहीं चाहता।
सूर्यभानु गुप्त की गज़ल ‘खामोशी’
इश्क़ की इब्तिदा है ख़ामोशी
आहटों का पता है ख़ामोशी

चाँदनी है, घटा है ख़ामोशी
भीगने का मज़ा है ख़ामोशी

काम आती नहीं कोई छतरी
बारिशों की हवा है ख़ामोशी

इस के क़ाइल हैं आज भी पत्थर
सौ नशे का नशा है ख़ामोशी

कंघियाँ टूटती हैं लफ़्ज़ों की
जोगियों की जटा है ख़ामोशी

इश्क़ की कुण्डली में छुरियाँ हैं
हर छुरी पर लिखा है ख़ामोशी

एक आवाज़ बन गयी चेहरा
कान का आईना है ख़ामोशी

नैन भूले पलक झपकना भी
सोच का केमेरा है ख़ामोशी

भीगती रात की हथेली पर
जैसे रंगे-हिना है ख़ामोशी

पेड़ जिस दिन से बे-लिबास हुये
बर्फ़ का क़हक़हा है ख़ामोशी

घर की एक-एक ईंट रोती है
बेटियों की विदा है ख़ामोशी

रूह तो दी बदन नहीं बख़्शा
किस ख़ता की सज़ा है ख़ामोशी

घर में दुख झेलती हर इक माँ की
आतमा की दुआ है ख़ामोशी

गुफ़्तेगु के सिरे हैं हम दौनों
बीच का फ़ासला है ख़ामोशी

दे गई हर ज़ुबान इस्तीफ़ा
इस क़दर लब-कुशा है ख़ामोशी

बस्तियों की हरिक अदालत में
इक रुका फ़ैसला है ख़ामोशी

रात-दिन भीड़-भाड़, हंगामे
इस सदी की दवा है ख़ामोशी

लफ़्ज़ मत फेंक ग़म के दरिया में
सब से ऊँची दुआ है ख़ामोशी

देवता सब नशे के आदी हैं
और उन का नशा है ख़ामोशी

ख़ुद से लड़ने का हौसला हो अगर
जंग का तज़्रिबा है ख़ामोशी

दोसतो! ख़ुद तलक पहुँचने का
मुख़्तसर रासता है ख़ामोशी

हम तो क़ातिल हैं अपने ख़ुद साहिब
तीन सौ दो दफ़ा है ख़ामोशी

हर मुसाफ़िर का बस ख़ुदा-हाफ़िज़
डाकुओं का ज़िला है ख़ामोशी

ढूँढ ली जिस ने अपनी कस्तूरी
उस हिरण की दिशा है ख़ामोशी

लोग तस्वीर बन गये मर कर
ज़िन्दगी का सिला है ख़ामोशी

कितनी ही बार हम गये-आये
हर जनम की कथा है ख़ामोशी

कैफ़ियत है बयान के बाहर
क्या बताएँ कि क्या है ख़ामोशी

थक के लौट आईं सारी भाषाएँ
लापतों का पता है ख़ामोशी
  वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629



         

सोमवार, मार्च 19, 2018

आम आदमी पार्टी का संकट ; पारदर्शिता का सवाल


आम आदमी पार्टी का संकट ; पारदर्शिता का सवाल

वीरेन्द्र जैन
धुर वामपंथ और धुर दक्षिणपंथ को ना पसन्द करने वाले देश में मध्यममार्गी दलों को ही सत्ता सौंपने की परम्परा रही है इनमें से ही एक केन्द्र से कुछ वाम दिखने की कोशिश करता रहा है तो दूसरा केन्द्र से कुछ दक्षिण दिखने की कोशिश करता रहा है। प्रमुख दो दलों के कमजोर हो जाने पर तीसरा मध्यममार्गी दल या गठबन्धन  उभर कर आ जाता है जो कभी जनता पार्टी, कभी जनमोर्चा, कभी सन्युक्त मोर्चा, कभी आम आदमी पार्टी आदि के रूप में सामने आता रहा है। भ्रष्टाचार के आरोपों से बदनाम कर दी गयी काँग्रेस और साम्प्रदायिकता के आरोपों से घिरी भाजपा के बीच आम आदमी पार्टी ने अपनी ज़मीन तलाशी थी व हार की आशंकाओं के बीच भी शिखर के नेताओं के खिलाफ चुनाव लड़ कर अपने को राष्ट्रव्यापी चर्चा में ले आये थे। उल्लेखनीय है कि भाजपा और काँग्रेस दोनों ही दल नवउदारवाद के पक्ष में रहे हैं और आम आदमी पार्टी ने भी कभी नवउदारवाद की आलोचना नहीं की। जब वित्तमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह ने पहली बार नई आर्थिक नीतियों की घोषणा की थी तब भाजपा ने कहा था कि इन्होंने हमारी नीतियों को हाईजैक कर लिया है।  
आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ उठे एक जन आन्दोलन से उभर कर आयी थी। इस आन्दोलन के सूत्रधार अरविन्द केजरीवाल ही थे जिन्होंने प्रतीक के रूप में अन्ना हजारे को आगे कर दिया था जो अनशन के द्वारा महाराष्ट्र में कुछ मंत्रियों को त्यागपत्र के लिए विवश कर चुके थे। अन्ना ने कभी सेना में साधारण सी नौकरी की थी और राजनीतिक दाव पेंचों से दूर रह कर अपने क्षेत्र में कुछ सुधारात्मक काम किये थे। केजरीवाल आयकर विभाग में अधिकारी थे और एक सोशल एक्टविस्ट के रूप में उन्होंने सूचना के अधिकार के लिए लम्बी लड़ाई लड़ी थी और सरकार को कानून बनाने के लिए विवश कर दिया था। अनावश्यक गोपनीयता के नाम पर जनता से तथ्य छुपाने के विरोध में किये गये प्रयासों के खिलाफ सूचना का अधिकार सरकार हासिल किया गया था। इस गोपनीयता के सहारे सरकारों के अनेक भ्रष्टाचार छुपे रह जाते थे। इस कानून के सहारे भ्रष्टाचार को खत्म करने व जनलोकपाल लाने का आन्दोलन चलाया गया जिसे अनेक गैर सरकारी संगठनों समेत आम जन का दिली समर्थन मिला। इस आन्दोलन के लोकप्रिय हो जाने के बाद  उन्हीं अरविन्द केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के नाम से राजनीतिक दल की स्थापना की थी, जिन्होंने कभी आन्दोलन को हड़पने के लिए आये भाजपा नेताओं समेत स्वाभिमान पार्टी बना चुके रामदेव को राजनीतिक दलों से दूरी के नाम पर आन्दोलन स्थल से भगा दिया था। यह बात अलग है कि आन्दोलन में भाग लेने दूर दूर से आये लोगों को पूड़ी सब्जी खिलाने का काम आरएसएस बिना सामने आये कर रही थी, और हरियाणा के कुछ पूंजीपति उसे सहयोग कर रहे थे।
अरविन्द केजरीवाल ने संघ परिवार से काम निकालने के बाद दूरदृष्टि से संघ परिवार को वैसे ही छिटक दिया जैसा कभी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किया था जब उनकी समझ में आ गया था कि साम्प्रदायिक नीतियों के लिए बदनाम संघ अपने छुपे एजेंडे को लागू करने के लिए दूसरे लोकप्रिय आन्दोलनों को हड़पने की योजना रचता है। जनता पार्टी नामक पहली गैर काँग्रेसी सरकार इसी के कारण भंग हुयी थी।
भीड़ को दल समझने वाले केजरीवाल के सामने जब दल का पिरामिड बनाने का अवसर आया तो पता चला कि अनेक लोग तो आन्दोलन की लोकप्रियता के सहारे अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए जुट आये  थे और वे नींव की जगह शिखर पर पहुंचना व बने रहना चाहते थे। इस भीड़ को दल के रूप में संवारने के प्रयास में कुछ अच्छे लोग भी छूटते गये और जाते जाते वे केजरीवाल के साथ उनके दल को भी नुकसान पहुँचाते गये। सुप्रसिद्ध राजनीतिक कवि मुकुट बिहारी सरोज के शब्दों में कहा जा सकता है-
जिनके पांव पराये हैं, जो मन से पास नहीं
घटना बन सकते हैं वे, लेकिन इतिहास नहीं
इसी तरह अरविन्द और उनकी आम आदमी पार्टी एक घटना बन कर रह गयी, भले ही विधानसभा चुनाव में उसे दो तिहाई से अधिक का बहुमत मिल गया हो। दल से प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, प्रोफेसर आनन्द एडमिरल रामदास समेत अनेक लोग छिटक गये। इसी बीच केजरीवाल ने कैडर आधारित पार्टी बनाने की जगह चर्चित और पदासीन लोगों की सीधी और कटु आलोचनाओं के सहारे अपनी लोकप्रियता बढाने का फार्मूला चलाया व काँग्रेस समेत सत्तारूढ भाजपा को तीखी भाषा में चुनौती दी। भाजपा ने इसे बचकानी हरकत मान कर हँस कर नहीं टाला अपितु पार्टी की जड़ों में मट्ठा डालते हुए इसकी सारी कमजोरियों पर भरपूर वार किया। विधायकों की नकली डिग्रियों से लेकर उनके दाम्पत्य जीवन तक को निशाना बनाया व पूर्ण राज्य का दर्जा न होने के कारण उपराज्यपाल का भरपूर उपयोग करवा के इनकी हैसियत का अहसास करवा दिया। संसदीय सचिव के नाम पर 20 विधायकों की विधायकी पर तलवार लटकवा दी। कभी खास रहे कपिल मिश्रा ने किसी भी तरह के आरोप लगाते हुए उनकी छवि को गिराने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। राज्यसभा चुनावों में टिकिट न मिलने के कारण उनके खास मित्र और लोकप्रिय प्रचारक कुमार विश्वास भी विरोधी बन गये। परिणाम यह निकला कि केजरीवाल को मौन धारण करना पड़ा व राजनीति छोड़ एक प्रशासनिक अधिकारी की तरह आधी अधूरी सरकार चलाने को विवश होना पड़ा।  
उल्लेखनीय है कि कपिल मिश्रा द्वारा भ्रष्टाचार के आरोप लगाये जाने पर पार्टी से दूर चले गये योगेन्द्र यादव ने कहा कि मेरे कितने भी मतभेद हों किंतु मैं केजरीवाल को भ्रष्ट नहीं मान सकता। किंतु राज्यसभा के तीन टिकिटों में से दो बाहर के लोगों को देने और अपनी पार्टी तक के लोगों को ऐसा करने के कारण न बताने पर उनकी छवि में गिरावट आयी। कुमार विश्वास जैसे उनके निजी मित्र और पार्टी के स्टार प्रचारक उनके स्टार आलोचक बन गये। सूचना का अधिकार लाने वाले व्यक्ति से ऐसी उम्मीद नहीं थी। यद्यपि यह सच है कि परेशान करने के उद्देश्य से उन पर मानहानि के अनेक मुकदमे लाद दिये गये हैं किंतु अचानक फिर से शिरोमणि अकाली दल के मजीठिया से क्षमा याचना करना पंजाब के विधायकों समेत किसी को समझ में नहीं आया व वे विद्रोही हो गये। पंजाब इकाई के अध्यक्ष ने स्तीफा दे दिया।
उनसे उम्मीदें लगाये लोग यह तो नहीं मानते कि वे बेईमान हो गये हैं और न ही उन्हें पद से दूर होते देखना चाहते हैं किन्तु जिस पारदर्शिता के नारे के साथ वे आये थे, उससे खुद ही दूर जाते दिख रहे हैं, इसलिए अपने प्रशंसकों की निगाह में सन्दिग्ध हो रहे हैं। अगर वे सच को बता कर अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगते हैं तो बहुत सम्भव है कि लोग फिर से उन्हें अपना मन दे दें। देखना होगा कि इसमें देर न हो जाये।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629




       


बुधवार, मार्च 14, 2018

समीक्षा निमकी मुखिया सीरियल दूसरा राग दरबारी है


समीक्षा
निमकी मुखिया सीरियल दूसरा राग दरबारी है

वीरेन्द्र जैन
हिन्दी टीवी चैनल स्टार भारत पर इन दिनों  ‘निमकी मुखिया’ नाम से एक सीरियल चल रहा है। इस सीरियल के लेखक निर्देशक है ज़मा हबीब जो वैसे तो थियेटर आर्टिस्ट से लेकर अनेक चर्चित भोजपुरी फिल्मों और सीरियलों के लेखक रहे हैं किंतु उक्त सीरियल के बाद उनकी ख्याति बहुत फैलने वाली है। मैं बहुत जिम्मेवारी के साथ कह रहा हूं कि इस सीरियल की कहानी को दूसरी राग दरबारी कहा जा सकता है और 48 वर्षीय ज़मा हबीब को मनोहर श्याम जोशी की तरह का पटकथा लेखक माना जा सकता है। ‘बुनियाद’ ‘हमलोग’ और ‘कक्काजी कहिन’ जैसे सीरियलों में जो स्थानीयता के सहारे देश व व्यवस्था के दर्शन हुये हैं, वही गुण ‘निमकी मुखिया’ में विद्यमान हैं।
इस सीरियल में यथार्थ के साथ ऐसे घटनाक्रमों से कहानी आगे बढती है जो कल्पनातीत हैं और दर्शक की जिज्ञासा को एपीसोड दर एपीसोड बढाते रहते हैं। कहानी का विषय तो अब अज्ञात नहीं है किंतु उस पर कथा का विषय मोड़ दर मोड़ ऐसे बुना गया है कि रागदरबारी उपन्यास की तरह पेज दर पेज व्यंग्य आता रहता है। कहानी एक ऐसी लड़की को केन्द्रित कर के बुनी गयी है जिसकी मां किसी के बहकावे में आकर अपने तीन छोटे बच्चों को छोड़ कर फिल्मों में गाने के लिए मुम्बई चली जाती है, और असफल हो जाने पर आत्महत्या कर लेती है। लड़की का भावुक और भला पिता रामवचन जो छोटी मानी जाने वाली जाति का है, उन जातियों के हासिये पर बनाये गये मुहल्ले में रहता है व किराये से यूटिलिटी वाहन चलाने का काम करता है। वह अपने बच्चों को बेहद प्यार से पालता है जिसमें बड़ी बेटी निमकी तो बहुत ही लाड़ली है जिसकी हर इच्छा पूरी करने में वह कोई कोर कसर नहीं छोड़ता। आज के युवाओं की तरह निमकी के सपने भी हिन्दी फिल्मों से प्रभावित होकर बने हैं और वह खुद को दीपिका पाडुकोण समझती है व किसी सम्पन्न परिवार के इमरान हाशमी जैसे सुन्दर युवा से शादी का हैसियत से बाहर का सपना पालती रहती है। शोले की बसंती की तरह मुँहफट और मुखर निमकी बीमारू राज्यों की शिक्षा व्यव्स्था की तरह नकल और सिफारिश से डिग्री अर्जित करती है, व अपने मुहल्ले के गरीब पड़ौसी सहपाठी से अपने काम निकलवाती है किंतु अपनी महात्वाकांक्षाओं के कारण उसे प्रेम के योग्य नहीं समझती।
पंचायती राज आने के बाद आम गांव की तरह क्षेत्र के मुखिया पद के दो दावेदार है जिनमें एक वर्तमान मुखिया तेतर सिंह और दूसरा नाहर सिंह। भूमिहार जाति के तेतर सिंह पूर्व जमींदार जैसे परिवार से हैं व बड़ी कोठी में समस्त आधुनिक सुख सुविधाओं के साथ दबंगई से रहते हैं। वे अपनी कम शिक्षा के कारण अपने वकील दामाद को घर जमाई बना कर सरकारी लिखा पड़ी का काम करवाने के साथ विधायक बनने की महात्वाकांक्षा पूरी करने के इंतज़ाम में भी लगाये हुए हैं। उनके तीन लड़के हैं जिनमें से एक जो विवाहित है ईमानदारी से कोई धन्धा करना चाहता है किंतु अनुभवहीन होने के कारण असफल रहता है इसलिए तेतर सिंह उसे कोई भाव नहीं देते। दूसरा लड़का बब्बू सिंह ऐसे परिवारों में विकसित होने वाले आज के युवाओं की तरह ही लम्पट और गुस्सैल है व अपनी पारिवारिक परम्परा के अनुसार सारा काम बन्दूक व पिस्तौल से हल होने में भरोसा करता है। राजधानी के नेता से संकेत मिलता है कि विधायक का पद उसे ही मिलेगा जिसके पास मुखिया का पद होगा इसलिए वे बब्बू सिंह को मुखिया बनवा कर खुद विधायक का पद जुगाड़ना चाहते हैं। अपनी सम्पन्नता, दबंगई, ऊंची जाति, और वर्षों से जमींदारी व मुखिया पद भोगते वे इसे सहज भी समझते हैं। चुनाव घोषित होने से पहले ही वे क्षेत्र में बब्बू सिंह के बड़े बड़े पोस्टर और कट आउट लगवाते हैं जिसे देख कर निमकी उनमें अपनी कल्पना के नायक की छवि देखती है।
दूसरी ओर तेतर सिंह के विरोधी गुट का नाहर सिंह इस बार मुखिया पद हथियाने के प्रयास में जुटा हुआ है और वह राजनीतिक कौशल से मुखिया बनना चाहता है, इसलिए छोटी जाति के मुहल्ले में भी अपने सम्पर्क बनाये हुए है। इसी बीच एक विधुर बीडीओ जिसके एक छोटी बच्ची है, गाँव में पदस्थ होता है व रामवचन के वाहन को कार्यालय हेतु स्तेमाल करने के अहसान के बदले अपने घर का इंतजाम करने की सेवाएं लेता है। इसमें खाना पहुंचाने का काम निमकी को करना होता है। वह एक ओर तो आधुनिक सुख सुविधाओं वाले घर में जाकर अपने सपनों को दुलराती है तो दूसरी ओर बीडीओ की छह सात वर्ष की मासूम अकेली बच्ची के साथ परस्पर स्नेह बन्धन में बँध जाती है।
घटनाक्रम इस तरह आगे बढता है कि मुखिया का पद छोटी जाति की महिला के लिए आरक्षित हो जाता है और तेतर सिंह अपनी घरेलू नौकरानी को पद के लिए उम्मीदवार बना देता है। दूसरी ओर उसका विरोधी नाहर सिंह अपनी ओर से निमकी को मुखिया पद के लिए उम्मीदवार बनवा देता है व अपनी ओर से पैसा खर्च करता है। उसे छोटी जाति के घाट टोला के लोग एकमुश्त समर्थन देते हैं व बीडीओ भी उनका साथ देता है। परिणामस्वरूप निमकी मुखिया बन जाती है व तेतर सिंह के सपनों को ठेस लगती है और वह लगभग विक्षिप्त सा हो जाता है क्योंकि उसके टिकिट मिलने की सम्भावनाएं भी थम जाती हैं। आवेश में वह मुखिया पद घर में बनाये रखने के लिए अपने बेटे बब्बू सिंह की शादी निमिकी से करने का फैसला कर लेता है जिसका भरपूर विरोध उसके घर के सारे सदस्य करते हैं किंतु बन्दूक के जोर पर वह अपनी बात इस आधार पर मनवा लेता है कि निमकी केवल मुखिया पद को घर में रखने व विधायक का टिकिट लेने भर के लिए बहू बना रहे हैं। निमकी और उसके परिवार को यह कह कर बहला देता है कि बब्बू सिंह को निमकी से प्यार हो गया है, व वे जिद कर रहे हैं इसलिए वह छोटी जाति में शादी कर रहे हैं व शादी का पूरा खर्च भी उठा रहे हैं।
सीरियल में हर घटनाक्रम चौंकाता है, व हँसाता है। पात्रों के अनुरूप कलाकारों का चयन और उनके द्वारा भूमिका का निर्वहन इतना परिपूर्ण है कि कथा यथार्थ नजर आती है। भोजपुरी भाषा, मधुबनी की शूटिंग, पात्रों का चयन, पारिवारिक सम्बन्धों, प्रशासन व व्यवस्था की सच्चाइयां, क्रोध, जुगुप्सा, और हास्य तीनों पैदा करती हैं। बीडीओ की छोटी बच्ची समेत सबका अभिनय इतना मंजा हुआ है कि किसी कलाकार विशेष की प्रशंसा की जगह निर्देशक की प्रशंसा ही बार बार उभरती है। इतना जरूर है कि केवल हिन्दी फिल्मों के प्रभाव में गाँव को कुछ अधिक ही चमकीला प्रस्तुत कर दिया गया है जहाँ पर गरीबी और बेरोजगारी दिखायी नहीं देती। सीरियल देखने लायक है और इसमें फिल्म के रूप में रूपांतरण की सम्भावनाएं मौजूद हैं।  
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629


                   

सोमवार, मार्च 05, 2018

लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल उठाते त्रिपुरा विधानसभा चुनाव परिणाम


लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल उठाते त्रिपुरा विधानसभा चुनाव परिणाम
वीरेन्द्र जैन
prashant kishor and amit shah के लिए इमेज परिणाम
त्रिपुरा विधानसभा के चुनाव परिणामों ने वहाँ 25 साल से लगातार चली आ रही वामपंथी सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया है। उससे सत्ता भारतीय जनता पार्टी ने छीनी है। उल्लेखनीय यह भी है यह काम तब हुआ है जब मोदी शाह के नेतृत्व वाली भाजपा सबसे अधिक आलोचना की शिकार हो रही थी। न केवल विपक्षी दल अपितु सोशल मीडिया के साथ एक निष्पक्ष मीडिया भी उनकी तीव्र आलोचना कर रहा था व समर्थक हतप्रभ नजर आ रहे थे। चुनाव प्रचार में सीमा को मुद्दा बना कर तत्कालीन सरकार की आलोचना करने वाले इस् दल के शासन में सीमा पर गहरी हलचल थी व प्रति सप्ताह सैनिक शहीद हो रहे थे। न्यायाधीश अपना असंतोष व्यक्त कर रहे थे और साफ संकेत दे रहे थे कि न्यायालय में न्यायिक स्वतंत्रता शेष नहीं रह गयी है। नोटबन्दी से जनित अनेक समस्याओं के बाद व्यवसायियों द्वारा बैंकों को चूना लगा कर विदेश भाग जाने समेत अनेक आर्थिक अपराधों की  घटनाएं प्रकाश में आयी थीं और उनको सहयोग देने के आरोप सत्तारूढ दल पर लग रहे थे। इससे बैंकों में भरोसा कम हुआ था जिससे गहरे आर्थिक संकट की आशंका महसूस की जा रही थी। बैंकों के शेयर गिरने के कारण बाज़ार लुढक रहा थ। साम्प्रदायिक टकराव की घटनाएं वृद्धि पर थीं, तथा दकियानूसी बयानों से बुद्धिजीवी वर्ग सरकार के खिलाफ क्षोभ से भरा हुआ था। बेरोजगारी अपने चरम पर थी और हर वर्ष दो करोड़ रोजगार देने के वादे के जबाब में पकोड़े बनाने जैसे स्वरोजगार की सलाह मिलनेसे युवा ठगा हुआ महसूस कर रहा था। भाजपा के छुटभैए नेताओं से लेकर बड़े बड़े नेता इसे वामपंथी विचारधारा का पतन बता कर सामान्यजन को एक और धोखा देने में लग गये हैं।
इसके विपरीत वामपंथ देश में एक बेहद जिम्मेवार और अनुशासित विपक्ष की तरह सामने था और उसकी त्रिपुरा राज्य में सरकार थी। इसके नेता की ईमानदारी और सादगी के चर्चे दंतकथाओं की तरह प्रचलित थे। उनकी एकमात्र कमजोरी व्यापक जन समर्थन से उनका लगातार पिछले 25 वर्षों से सत्ता में बने रहना था। यही कारण रहा कि वामपंथ ने पिछले चुनावों में प्राप्त साढे दस लाख मतों में से कुल 69000 मत कम पाये। उनकी चुनावी पराजय उनकी लोकप्रियता में कमी नहीं दर्शाती है, अपितु विपक्षी वोटों को एकजुट करने के प्रबन्धन का परिणाम है।
       चुनाव परिणाम आने से पहले सोशल मीडिया पर एक लेखक ने लिखा था कि “अगर मानिक सरकार हार गये तो लोगों का विश्वास इस लोकतांत्रिक प्रणाली से उठ जायेगा”। उक्त सरकार हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली के आदर्श का नमूना थी और उसकी हार उन आदर्शों के समक्ष चुनावी प्रबन्धन के कौशल का नमूना है। यह ठीक उसी तरह है कि कोई छात्र परीक्षा से पहले सलेक्टेड क्वेश्चन पेपर पढ, नकल और सिफारिश के सहारे प्रथम श्रेणी की डिग्री का जुगाड़ कर ले व शिक्षा को ज्ञानार्जन मान कर मेरिट में आने वाला छात्र पीछे रह जाये। एक समर्पित मतदाता और प्रलोभन ग्रस्त मतदाता में फर्क किया जाना चाहिए। वामपंथियों पर कभी यह आरोप नहीं लगा कि उन्होंने चुनाव में धन बांटा या दलबदल का सहारा लिया। उल्लेखनीय है कि चुनावों में अवैध रूप से अर्जित धन ही बांटा जाता है और उसका सीधा सम्बन्ध ऐसा करने वाले दल से प्रत्यक्ष या परोक्ष जुड़ा होता है। शायद ही कोई ऐसा चुनाव रहा होगा जिसमें भाजपा पर पैसा बांटने का आरोप न लगा हो। उनके गठबन्धन की बहुत सारी सरकारें प्रलोभन के द्वारा दलबदल से बनी हैं। भाजपा के मुख्यालय से धन के गबन किये जाने और उसकी रिपोर्ट न कराके किसी प्राईवेट जासूस से जाँच कराने की खबरें अखबारों में प्रमुख रूप से छायी रही हैं। इतनी सारी नकदी का एकत्रित रहना और उसके गायब होने को सामने न ला पाने से ही स्पष्ट है कि वह अवैध ही होगा। पता नहीं वह नकदी नोटबन्दी से पहले बदलवा ली गयी थी या बाद में बदलवायी गयी। जो नोट संसद में लहराये गये थे वे कहाँ से आये थे उसके बारे में देश अब तक अनजान है।
त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में जो भी जीत हार हुयी है वह नियम से ही हुयी होगी। पराजितों द्वारा एवीएम आदि पर बिना प्रमाण के आशंका करना गलत परम्परा है, भले ही भाजपा खुद भी 2004 और 2009 में चुनाव हारने पर ऐसे ही आरोप लगाने की भूल करती रही है। फिर भी कुछ सूचनाएं आशंकाओं को जन्म देती हैं जैसे जब गुजरात विधान सभा, तथा राजस्थान, और मध्य प्रदेश में हुए उपचुनावों के परिणाम से कांग्रेस के पुनर्जीवित होने की उम्मीद बँध रही थी तब उसके वोट आठ लाख से घट कर इकतालीस हजार पर आना जो 36.53% से 1.8% होना है, सीधे सीधे हजम नहीं होता। उसी तरह वहाँ के दो अलगाववादी दलों के मतों के विचलन से संकेत मिलता है आईएनपीटी को पिछले चुनाव में मिले 167078 वोटों की तुलना में इस बार कुल 17568 मत मिले जबकि पहले 10147 वोट पाने वाली भाजपा की सहयोगी आईपीएफटी को इस बार 173603 वोट मिले। यह मात्र संयोग भी हो सकता है किंतु जब दलित नेता जिग्नेश मेवाणी सवाल पूछते है कि हर चुनाव में भाजपा को 41% के आसपास मत ही क्यों मिलते हैं तो ध्यान जाता ही है। स्वयं भाजपा द्वारा पिछले चुनावों में 33808 मतों के साथ छठे नम्बर से उठ, व  999053 वोट प्राप्त कर पहले नम्बर पर आना भी ध्यानाकर्षित करता है। मतों का यह उछाल अभूतपूर्व है, अस्वाभाविक है।
मोदी और शाह के नेतृत्व में लड़े गये पहले लोकसभा चुनाव में ही खुले आम चुनावी इवेंट मैनेजर प्रशांत किशोर को लाया गया था जिनकी सेवाएं बाद में काँग्रेस, जेडीयू, वायएसआर रेड्डी काँग्रेस ने भी लीं जो बताता है कि इन दलों के लिए चुनाव एक इवेंट हैं जिसकी सफलता से सत्ता के सारे सूत्र हाथ में आ जाते हैं। इसी प्रबन्धन ने इस बार त्रिपुरा जैसे छोटे राज्य से भ्रष्टाचार मुक्त, एक आदर्श सरकार और चुनाव संहिता के अनुसार संचालित दल को पराजित कर दिया है। भाजपा प्रबन्धन के हाथों मिली इस पराजय से लोकतंत्र की आत्मा को दुख पहुंचा है क्योंकि यह जीत हार दूसरी जीत हारों से भिन्न है।   
वीरेन्द्र जैन
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