शनिवार, जून 18, 2016

फिल्म समीक्षा उड़ता पंजाब – सेंसर बोर्ड विवाद से पूर्ण हुयी फिल्म

फिल्म समीक्षा
उड़ता पंजाब – सेंसर बोर्ड विवाद से पूर्ण हुयी फिल्म
वीरेन्द्र जैन

विवाद से प्रचार का ऐसा नाता जुड़ गया है कि फिल्मों से जुड़े अनेक विवाद सन्देहास्पद और नकली लगते हुए उसके व्यापार का एक हिस्सा लगते हैं। किंतु अनुराग कश्यप की फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ का विवाद पूर्व नियोजित नहीं था। फिल्मी दुनिया के साथ साथ बाहर के लोगों को भी लगा, और सही लगा कि अपनी पद स्थापना से ही कमतरी का आरोप झेल रहे सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष ने अपने राजनीतिक आकाओं के हित में एक बड़ी समस्या पर बनी फिल्म की रिलीज में अड़ंगा लगाने की कोशिश की है। इसी विवाद के बीच सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रह्लाद निहलानी ने इस बहस में खुद को नरेन्द्र मोदी का चमचा होने का आरोप स्वीकारते हुए इस आशंका को बल दिया कि फिल्म में दिखायी गई सच्चाई से भाजपा-अकाली दल की आगामी चुनावी सम्भावनाएं प्रभावित हो सकती हैं। फिल्म के काटे गये हिस्सों को दिखाने की अनुमति देकर न्यायालय ने विवाद को समाप्त कर दिया। पीड़ित के पक्ष में न्याय के साथ खड़े होने वाले बहुत सारे लोगों ने अपना समर्थन व्यक्त करने के लिए फिल्म को पहले दिन ही देखने का फैसला किया जिनमें से मैं भी एक हूं।
 सच तो यह है कि फिल्म में ऐसा कुछ भी नया उद्घाटित नही किया गया है जिसका विभिन्न मीडिया माध्यमों द्वारा पहले से खुलासा नहीं किया जा चुका हो। फिल्म की जिम्मेवारी थी कि उन जानकारियों को एक कथा के माध्यम से प्रस्तुत कर के संवेदनाओं से जोड़े। खेद है कि इस फिल्म में सूचनाएं तो हैं किंतु उन सूचनाओं को देने के लिए रची गयी कथा बालीवुड की चालू फिल्मों की तरह है। जरूरत यह थी कि इस विषय पर कलात्मक फिल्म बनायी जाती। कथा में इतने फूहड़ संयोग हैं जिनसे विषय को बल मिलने की जगह वह कमजोर होता है। यह तो ठीक रहा कि न्यायालय ने इसे बिना किसी कट के जारी करने का आदेश दे दिया बरना फिल्म कथा की सारी कमजोरियों का दोष भी सेंसर बोर्ड की कटौतियों के सिर जाता।
पंजाब में कृषि क्रांति के बाद आई सम्पन्नता से जन्मा अतिरिक्त धन नशे की भेंट चढ गया। शराब पर लगने वाले टैक्स साल दर साल बढते गये जिससे नशे के आदी हो चुके कमजोर आर्थिक वर्ग ने अपेक्षाकृत सस्ते नशों का उपयोग प्रारम्भ किया और इस चक्कर में हेरोइन जैसे किस्म किस्म के नशे वाले रासायनिक पदार्थ समाज में आने लगे। ये सब पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे देशों से स्मगल हो कर आते हैं जिसके बदले में उन्हें अवैध हथियारों की सप्लाई आदि की व्यवस्थाएं भी की जाती हैं जिसके लिए देश हित को नुकसान पहुँचाने वाला एक बड़ा तंत्र स्थापित हो चुका है। इस तंत्र में सत्तारूढ दल के मंत्री, नेता, पुलिस आदि सुरक्षा एजेंसियां भी भागीदार बन चुकी हैं। इस नशे की तासीर ऐसी होती है कि जल्दी ही इसका सेवन करने वाला इसका आदी बन जाता है व इस एडिक्शन की गुलामी में वह कुछ भी करने को तैयार हो जाता है। इस तरह से जुझारू कौम की एक पूरी पीढी के तेवरों को ढीला कर उन्हें गुलाम बना लिया गया है। कहा जाता है कि पंजाब में खालिस्तानी आन्दोलन के दुष्प्रचार से भटके नौजवानों को एक दूसरे भटकाव में धकेलने के लिए तत्कालीन सरकार के जिम्मेवार लोगों ने इसे प्रारम्भ में ही रोकने की गम्भीर कोशिशें नहीं कीं। बाद में लाभान्वित पुलिस आदि सुरक्षा बलों के लोगों की दाढों में खून  लग चुका था जिन्होंने अगली सरकारों को भी उसी रंग में रंग दिया। कुछ दिनों बाद तो वे पिछलों से बहुत आगे निकल गये।
फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ में तीन अध्याय हैं। एक में पुलिस की मिली भगत से राजनीतिक संरक्षण पाये हुए एक माफिया से एक सोशल एक्टविस्ट लेडी डाक्टर के टकराने की कहानी है। यह लेडी डाक्टर [करीना कपूर] नशे के उन्मूलन के लिए चिकित्सकीय सेवायें दे रही है, पर वह इस रैकिट का खुलासा कर उसका खात्मा भी चाहती है। नशे के कारोबार से ऊपरी कमाई करने वाले पुलिस के एक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर का छोटा भाई नशे का एडिक्ट हो जाता है तब उसे इसकी गम्भीरता का पता चलता है और वह उस लेडी डाक्टर का सहयोगी हो जाता है। दूसरा अध्याय एक राक स्टार [शाहिद कपूर] के नशे की गिरफ्त में आने का है जो गिरफ्तार होने के बाद नशा छोड़ने के साथ अपनी कलात्मकता भी खो देता है और कभी युवाओं की आँखों का सितारा रहा होने के बाद उनके आक्रोश का शिकार होता है। तीसरे अध्ययाय में बिहार में कभी हाकी खिलाड़ी रही एक लड़की [आलिया भट्ट] को मजदूरी करने के लिए पंजाब में आना पड़ता है जिसके हाथ नशे के पाउडर की एक थैली लग जाती है और उसे बेचने के चक्कर में वह नशे के माफिया की गिरफ्त में आ जाती है जो उसको न केवल कैद रखते हैं अपितु उसे नशे का इंजैक्शन दे दे कर उसका दैहिक शोषण भी करते हैं। बाद में इन तीनों अध्यायों को बालीवुड अन्दाज में बेतरतीब ढंग से जोड़ दिया गया है व रक्त रंजित अंत दिखा कर फिल्म निबटा दी गई है। अनुभवी कलाकारों ने अपनी भूमिका का यथोचित निर्वाह किया है क्योंकि कथा में ज्यादा कुछ करने की गुंजाइश ही नहीं थी।
पुलिस, राजनेता, के कारनामे सहित नशे की भयावहता के एक अंश को संकेत के रूप में दिखाने का काम तो फिल्म ने किया है पर उसकी व्यापकता और गम्भीरता को उससे पहले उठे सेंसर बोर्ड के विवाद ने कर दिया जिसे फिल्म का ही एक हिस्सा माना जा सकता है। इस विवाद के बिना यह बहुत साधारण फिल्मों में ही गिनी जाती।   
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, मई 20, 2016

पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम ; उर्फ अन्धों का हाथी

पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम ; उर्फ अन्धों का हाथी
वीरेन्द्र जैन
बहुत सावधानी और सुरक्षा के लिए दो महीनों तक खींचे गये पाँच राज्यों की विधानसभाओं के चुना परिणाम तय तिथि पर घोषित हो गये। यद्यपि चुनाव सर्वेक्षण सामने दिखाई दे रहे माहौल से लगाये जा रहे अनुमान से अधिक कुछ नहीं होते हैं, सो लगभग वैसे ही परिणाम सामने आये जैसी सम्भावना सूंघी जा रही थी। ये चुनाव इस विशाल और विविधिताओं से भरे देश के उत्तर पूर्व से लेकर धुर दक्षिण तक के राज्यों में हो रहे थे और परिणाम भी वैसे ही आये। इन परिणामों से देश के मिजाज का कोई अनुमान निकालना नामुमकिन है।
चुनावों में छह मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दल और अनेक राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त दल चुनाव लड़ रहे थे, जिनमें से असम में भाजपा, पादुचेरि [पाण्डुचेरी] में काँग्रेस, केरल में सीपीएम-सीपीआई के नेतृत्व वाला वाममोर्चा सरकार गठित करने जा रहा है तो दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में तृणमूल काँग्रेस और तामिलनाडु में एआईडीएमके की सरकार बनने जा रही है जो राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त व्यक्ति केन्द्रित दल हैं। इन सभी दलों की विचार धाराओं और संगठनों में कोई साम्य नहीं है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि जनता ने इसके पक्ष में, या उस विचार या कार्य के विरोध में अपना मत व्यक्त किया है।
भाजपा इसलिए खुशी का मुखौटा लगा रही है क्योंकि उसे पहली बार उत्तरपूर्व के किसी राज्य में सरकार बनाने का मौका मिला है और देश के पश्चिमी राज्यों की पार्टी होने की उसकी पहचान में बदलाव आया है। अब वह तकनीकी आधार से बाहर जाकर भी खुद को राष्ट्रीय पार्टी कह सकती है, भले ही उसके आलोचक कह रहे हों कि यह उसकी विचारधारा की जीत नहीं अपितु यह अवसर काँग्रेस के कुछ महात्वाकांक्षी विधायकों के दल बदलने से उसे मिल पाया है। आंकड़े वाले लोग कह रहे हैं कि उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों में ही 36.5% मत मिल चुके थे पर इन विधानसभा चुनावों में 29.8% रह गये। इसी प्रतिशत के आधार पर भाजपा पश्चिम बंगाल और केरल में सीटों की संख्या में पिछड़ने के बाद भी अपने दल का विकास दिखा रही है। जीत के इस अहंकार में कोई नहीं देख रहा कि असम में दूसरे साम्प्रदायिक और अलगाववादी दलों ने भी अपना समर्थन और सीटों दोनों में वृद्धि की है। एआईयूडीएफ ने 12.4% प्रतिशत मत लेकर 12 सीटें जीती हैं, तो बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट ने भी 3.8% प्रतिशत मत लेकर 12 सीटें जीती हैं। भाजपा ने केरल में एक सीट से प्रवेश कर के बंगाल में दो सीटें जीती हैं। गुजरात के एक् उपचुनाव में भी भाजपा ने ही जीत हासिल कर ली, भले ही काँग्रेस ने बराबर की टक्कर दी।
वाम मोर्चा बंगाल में 26 सीटों तक सिमिट कर रह गया जबकि उसके चुनावी सहयोगी काँग्रेस को 45 सीटें मिल गयीं। दूसरी ओर वह इस बात से खुश है कि उसने सबसे शिक्षित, सबसे प्रगतिशील राज्य केरल में दुबारा से सत्ता प्राप्त कर ली है। वहीं तमिलनाडु में 10% से भी अधिक मत पाकर भी पिछली विधान सभा में जीती अपनी 20 सीटें नहीं बचा सकी। उसकी ऐसी क्षति उसकी राष्ट्रीय मान्यता पर भी खतरा ला सकती है। वामपंथी दल भारतीय राजनीति के सबसे अधिक संवैधानिक नियमों का पालन करने वाले, अनुशासित और ईमानदार दल हैं जो अपने अध्य्यन और वैज्ञानिक चिंतन व व्यवहार से लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखे हुए हैं। उनकी कमजोर उपस्थिति भी महत्वपूर्ण होती है।
तामिलनाडु में व्यक्ति केन्द्रित दो दलों ने अपना वर्चस्व बना रखा है। इस इक्कीसवीं शताब्दी के लोकतंत्र में भी ऐसी अन्धभक्ति अचम्भित करती है जिसमे जयललिता के जेल जाने पर वैकल्पिक मुख्यमंत्री साष्टांग दण्डवत करता नजर आता हो और उनके जेल से बाहर आने के बाद रामकथा के भरत की तरह अपना राज पाठ जस का तस सौंप देने में रत्ती भर संकोच न करता हो। उल्लेखनीय है कि भाजपा में जब जब किसी मुख्यमंत्री को बदलने की कोशिश हाई कमान ने की वह विद्रोही हो गया व दूसरा दल बना लिया। कल्याण सिंह, उमा भारती, येदुरप्पा, मदनलाल खुराना, जैसे अनेक उदाहरण हैं। वसुन्धरा राजे ने हाई कमान की लाख कोशिशों के बाद भी पद नहीं छोड़ा था। पुराणों में वर्णित भगवानों की भूमिका करने वाले फिल्मी अभिनेता की पहचान ही दक्षिण की राजनीति का प्रवेश द्वार माना जाता है। भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल जाने के बाद भी सस्ता चावल व उपहार देने वाली पूर्व अभिनेत्री जयललिता का जादू बरकरार है भले ही वैसे ही आरोपों वाले उनके प्रतिद्वन्दी ने बराबर की टक्कर दे कर् ठीक ठाक सीटें प्राप्त कर लीं।
काँग्रेस भले ही सब ओर से पराजित नजर आ रही हो किंतु आंकड़ों के चश्मे से देखने पर वह भी आत्मसंतोष का घूंट पी सकती है। भले ही 30 सीटों वाले एक छोटे से राज्य में सरकार बनाने का अवसर मिला हो किंतु जो कभी सबसे बड़ी पार्टी रही हो उसे शून्य से मुक्ति तो मिल ही गयी है। भले ही काँग्रेस ने असम की सत्ता खो दी हो किंतु उसने अकेले चुनाव लड़ कर 31.1% मत प्राप्त किये जबकि उसकी प्रतिद्वन्दी भाजपा को कुल 29.8% मत ही मिले हैं जिसने असम गण संग्राम परिषद से समझौता करके चुनाव लड़ा था। काँग्रेस गर्व के साथ कह रही है कि उसने साम्प्रदायिक माने जाने वाले एआईयूडीएफ के आग्रह के बाद भी समझौता नहीं किया। आज के आंकड़े बता रहे हैं कि ऐसा करके वह चुनाव जीत सकती थी। बंगाल में उसने लेफ्ट फ्रंट से अधिक सीटें जीत कर विरोधी दल का हक प्राप्त कर लिया। केरल में उसके कुल 5% वोट ही कम हुये हैं, ये बात अलग है कि वहाँ एक सीट के अंतर से ही उसने पिछली सत्ता पायी थी।
सास भी कभी बहू थी की तरह तृणमूल काँग्रेस भी कभी काँग्रेस ही थी और उसी से निकली ममता बनर्जी ने काँग्रेसियों के आचरणों से अलग अपने अथक संघर्ष और कम्युनिष्टों जैसी सादगी के स्वरूप से ऐसी लोकप्रियता प्राप्त कर ली कि गुरु गुड़ ही रह गया और चेला शक्कर हो गया। वामपंथ के शासन काल में काँग्रेस की जगह तृणमूल काँग्रेस ने विपक्ष का पद हथिया लिया और एंटी इंकम्बेंसी का लाभ भी उसे ही मिला। भक्ति अन्धी ही होती है इसलिए शारदा घोटाले में उसके नेताओं के जेल जाने, और स्टिंग आपरेशन में पकड़े जाने के बाद भी उनके समर्थन में कमी नहीं आयी। माल्दा जैसी हिंसक घटनाएं भी उनका समर्थन कम नहीं कर सकीं, भले ही भाजपा ने फिल्मी कलाकारों, सुभाष बोस की फाइलों का तूमार बाँध कर उनके पड़पोते को उनके खिलाफ खड़ा कर दिया हो। संघर्षशील बौद्धिक बंगाल में ममता बनर्जी ने अपना जो स्थान बनाये रखा है वह अचम्भित करता है, पर सच है।  
चुनाव परिणामों में किसी के हाथ में हाथी का कान आया है और किसी के हाथ में उसका पांव आया है। वे उसी आधार पर अपने निष्कर्ष निकाल रहे हैं जबकि सच तो यह है कि ये चुनाव परिणाम आगे की ओर नहीं ले जाते।   
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
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मंगलवार, मई 17, 2016

सिंहस्थ के विचार महाकुम्भ में मोदी

सिंहस्थ के विचार महाकुम्भ में मोदी
वीरेन्द्र जैन

किसी अवसर पर परम्परागत रूप से जुटने वाले जनसमुदाय को अगर सामाजिक परिवर्तन का साधन बनाया जा सके तो उससे लोगों को जुटाने की आधी समस्या तो वैसे ही हल हो जाती है। इसलिए सिंहस्थ में विचार महाकुम्भ के विचार को एक अच्छा कदम माना जा सकता था बशर्ते इसका वैसा ही स्तेमाल हुआ होता। जब उज्जैन में आयोजित होने वाले कुम्भ मेले में विचार कुम्भ की योजना के संकेत मिले थे तो उसके प्रति प्रशंसा के भाव उभरे थे। किंतु इसे एक राजनीतिक प्रचार का अवसर बना देने से इसका पावन उद्देश्य खो गया व जनता से टैक्स के रूप में वसूले गये धन के अपव्यय का एक और साधन बना दिया गया जैसा कि दिशाहीन सांस्कृतिक आयोजनों के नाम के नाम पर चीन्ह चीन्ह के रेवड़ियां बांटने का काम दशकों से चल रहा है।
उल्लेखनीय है कि तीन दिवसीय विचार महाकुम्भ के पहले दिन सबसे अधिक सर्कुलेशन का दावा करने वाले सूचना [समाचार] पत्र ने लिखा “तीस करोड़ व्यय वाले वातानुकूलित पंडाल में सरकारी अधिकारी - कर्मचारियों की फौज के साथ संघ के बहुसंख्यक कार्यकर्ताओं की उपस्थिति से प्रारंभ में ही यह अनुभूति होती है कि आप संघ के कार्यक्रम में हैं”। पहले सत्र में मोहन भागवत की अध्यक्षता में तो कुर्सियां भरी भी थीं किंतु बाद के सत्र में जब राम माधव वाले सत्र में किसी ने रुचि नहीं ली तो कुर्सियां खाली रहीं। छत्तीसगढ की एक भाजपा महिला नेत्री ने कहा कि इस कार्यक्रम के लिए वह दो बसें भर कर लायी है। देश और प्रदेश के स्वतंत्र विचारकों को आमंत्रण भेजने की बजाय भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं को ही बुलाया गया था। केवल वन्दना शिवा का नाम अपवाद था।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषण उनके पिछली चुनावी सभाओं में दिये गये भाषणों से पक चुके लोगों को ताज़ा हवा की तरह लगा होगा। उन्होंने भारतीय समाज की जागरूकता और परिवर्तनशीलता को कुम्भ से जोड़ते हुए कहा कि “पहले कुम्भ के दौरान संत और समाजवेत्ता समाज की चिंता करते थे और भविष्य के लिए नई विधाओं का अन्वेषण करते थे। अगले बारह साल के लिए समाज की दिशा और कार्य योजना तय होती थी। पर धीरे धीरे इस परम्परा के प्राण खो गये”। अगर वे चाहते तो अपने वक्तव्य में नेहरू की पंचवर्षीय योजना को भी ला सकते थे जिसके सहारे ही आज़ादी के बाद इस देश ने विकास के मूल आधार स्थापित किये थे। खेद की बात तो यह है कि उन्होंने खुद ही योजना आयोग को समाप्त कर दिया है और उसकी जगह नीति आयोग बना दिया है। 
कभी तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने परमाणु परीक्षण के बाद शास्त्री जी के नारे ‘जय जवान, जय किसान’ में ‘जय विज्ञान’ जोड़ा था किंतु बाद में वह केवल जुमला बन कर रह गया था। मोदी जी ने मुम्बई में मुकेश अम्बानी के एक अस्पताल का उद्घाटन करते हुए गणेश मूर्तियों की कथा के माध्यम से शल्य चिकित्सा के पुराने ज्ञान का जो उल्लेख किया था उससे उनकी वैज्ञानिक समझ पर प्रश्न चिन्ह लगे थे। उससे जुड़ी आलोचनाओं के बाद उन्होंने वैसे तर्क बाद में नहीं दिये भले ही इतिहास के ज्ञान सम्बन्धी कुछ भूलें अवश्य चर्चा में आयीं। इस विचार कुम्भ में उन्होंने कहा कि भारतीय मूल्यों और ज्ञान को वैज्ञानिक आधार पर दुनिया के सामने रखना होगा। विचार को कर्म से जोड़ने के सफल उदाहरण के रूप में उन्होंने शास्त्री जी द्वारा प्रति सोमवार को उपवास का आवाहन और हाल ही में गैस सब्सिडी छोड़ने को बताया। उन्होंने कहा कि हमारे सामने चुनौती है कि समय की कसौटी पर खरे उतरें। श्री मोदी ने सिहस्थ मेले को विमान से देखा। न तो उन्होंने नदी में स्नान किया और न ही महाकाल मन्दिर में दर्शानार्थ गये।  
इस विचार महाकुम्भ में  विचार को कर्म से जोड़ने के कुछ प्रयास हो सकते थे जो नहीं हुये। जैसे एक बार आनन्द्पुर साहब में प्रत्येक आगुंतक को प्रसाद के रूप में एक एक पौधा दिया गया था और इस पौधे को रोपने के लिए कहा गया था। प्रसाद के पौधे को सबने अपना कर्तव्य समझ कर रोपा और इस प्रयास से लाखों पौधे रोपे गये। अच्छा होता यदि ऐसा ही कोई प्रयास इस कुम्भ में भी किया गया होता। जिस तरह से स्वतंत्रता संग्राम के समय तिलक ने गणेश पंडालों के माध्यम से स्वतंत्रता के प्रति जागरूकता बढायी थी वैसा ही कोई प्रयास इस दौरान हो सकता था। अगर लाखों लोग नियत तिथि पर बिना आमन्त्रण के कुम्भ में पहुँच सकते हैं तो उनकी इस ऊर्जा का देश के हित में सार्थक स्तेमाल भी हो सकता है, बशर्ते इसे एक संगठन या दल के हित में कार्यक्रम बनाने की जगह राष्ट्रीय हित के कार्यक्रम में बदला जाये। इस बार के कुम्भ में बहुत बड़ी राशि व्यय की गयी है जबकि देश और प्रदेश अनेक प्राकृतिक संकटों से जूझ रहा है। इसलिए जरूरी है कि ऐसा लगे कि उक्त राशि किसी समुदाय विशेष की भावनाओं के तुष्टिकरण के लिए नहीं अपितु ‘सब जन हिताय’ व्यय हुयी है। दूसरी ओर विभिन्न धार्मिक संस्थानों में अटूट धन राशि एकत्रित होती जा रही है जिसका अगर योजनाबद्ध ढंग से उचित स्तेमाल नहीं होगा तो वह हिंसक टकराव का कारण बन सकती है। इस अवसर पर यदि इसकी कोई योजना बन सकती तो अच्छा था। उम्मीद की जाना चाहिए कि अगले कुम्भ सरकारी धन की जगह आस्थावानों और धार्मिक संस्थानों में जमा दौलत से संचालित होंगे। 
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, मई 12, 2016

उत्तराखण्ड प्रकरण - यह काँग्रेस की जीत भी है हार भी है

उत्तराखण्ड प्रकरण -  यह काँग्रेस की जीत भी है हार भी है
वीरेन्द्र जैन
पहले हाई कोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के प्रकाश में उत्तराखण्ड की रावत सरकार ने सदन में बहुमत साबित कर दिया है जिसे काँग्रेस के नेता लोकतंत्र की जीत बता रहे हैं।
पर क्या सचमुच ऐसा है?
यह सच है कि षड़यंत्रों, शगूफों, सत्य को तोड़-मरोड़ करने के साथ जोड़-तोड़ करने, कैलाश विजयवर्गीय को चार्टर्ड प्लेन से चक्कर लगवाने वाली भाजपा की राजनीति सफल नहीं हो सकी है। राज्यों की सत्ता पर अधिकार जमाने की उसकी फूहड़ जल्दबाजी की सर्वत्र निन्दा हो रही है व न्यायालयों ने उसके इन प्रयासों पर कठोर टिप्पणियां की हैं। केन्द्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार चलाते हुए भी वह विपक्ष की तरह बचकाने व्यवहार कर रही है व चुनाव में कमजोर साबित हो चुके विपक्षी दल को ऎन केन प्रकारेण और कमजोर करने की अनावश्यक प्रशासकीय कोशिशें कर रही है। इन कोशिशों की असफलता से भाजपा का सीधे सीधे कोई राजनीतिक नुकसान नहीं हुआ है और नैतिकता की उसने कभी चिंता नहीं की। अगर नैतिकता की चिंता की होती तो अपने इतिहास में अब तक कई बार डूब मरी होती। अमित शाह को निर्विरोध अध्यक्ष स्वीकार कर लेने वाले भाजपा के प्रमुख सदस्यों में से किसी में भी यह साहस नहीं बचा है कि वह अनैतिक कदमों का वैसा विरोध कर सके जैसा कि उनके गठबन्धन साथी शिवसेना वाले कर रहे हैं।
सत्ता के लाभ पाने को ही राजनीति मानने वाले काँग्रेसी सदन के पटल पर बहुमत मिलने पर, भले ही फूले नहीं समा रहे हों किंतु यह बहुमत तो उन्हें चुनाव से ही प्राप्त था जिसे उनके ही कारनामों ने खतरे में डाला था। मूल समस्या तो यह थी कि मुख्यमंत्री ने अपने कुछ सदस्यों का विश्वास खो दिया था। खुशी केवल इस बात की हो सकती है कि किसी तरह उनकी सरकार फिर से बन गई। काँग्रेसियों को यह सोचने की फुरसत नहीं है कि ऐसी नौबत क्यों आई, और क्यों उसके अपने ही वरिष्ठ विधायकों ने विद्रोह  किया। घोषित नीतियों के अनुसार काँग्रेस और भाजपा ऐसे दो ध्रुवों पर खड़े हैं जो कभी मिल नहीं सकते किंतु अपने नेता और संगठन से नाराज होकर काँग्रेसी भाजपा की ओर ही भागते हैं। अपने काँग्रेसी होने के कार्यकाल में वे जिन बातों के लिए भाजपा की निन्दा करते रहते हैं उससे लगता है कि अपने नेता, संगठन और गुट से उन्हें कितना भी असंतोष हो किंतु वे भाजपा में कभी नहीं जायेंगे। किंतु होता इसका उल्टा ही है, काँग्रेसी, जहाज के चूहों की तरह मौका देख कर कूद जाता है और सीधे भाजपा में दिखाई देता है। भाजपा को भी उसे जस का तस ले लेने में कोई नैतिक संकट महसूस नहीं होता। विधायक को विधायकी और केबिनेट मंत्री को केबिनेट मंत्री का पद वहाँ भी दे दिया जाता है। संसद में भाजपा के 116 सदस्य ऐसे हैं जो किन्हीं दूसरे दलों से आये हैं।  
काँग्रेस के सामने संकट यह है कि उसकी अपनी कोई पहचान नहीं रह गयी है। न पोषाक में, न रहन सहन में, न खान-पान में। किसी भी अन्य बाहरी स्वरूप को देख कर किसी के काँग्रेसी होने की पहचान नहीं बनती। भाजपाइयों के भगवे गमछे की नकल में तिरंगा गमछा भी कुछ ही कांग्रेसी कभी कभी डालते हैं। टोपियों की वपिसी तो अन्ना आन्दोलन के बाद हुयी जिसमें छुपे भाजपाइयों ने भी सफेद टोपी लगाई थी जो बाद में केवल आम आदमी वालों तक सीमित होकर रह गई थी। दिल्ली विधानसभा चुनाव में तो भाजपाइयों तक को नकल में भगवा टोपी पहिनना पड़ी थी पर उसका कोई लाभ नहीं हुआ सो उन्होंने उतर दी फिर बिहार विधानसभा चुनाव में नहीं पहनी। जो भी व्यक्ति अपने निजी स्वार्थ के लिए सत्ता से जुड़ना चाहता है या पूरे हो रहे स्वार्थ में वृद्धि के लिए अपनी ही पार्टी के समकक्ष लोगों से टकरा रहा होता है वह ‘काँग्रेसी’ होता है। पुस्तिकाओं में लिखे गये विचारों का न तो उन्हें पता होता है, न ही उन पर अमल करने की कोई बाध्यता होती है। धर्म निरपेक्षता केवल संघ से भयभीत मुस्लिम वोट बटोरने हेतु दिखावा है। साम्प्रदायिक दंगों के समय काँग्रेसी हिन्दू या मुसलमान हो जाता है। दंगे रोकने के लिए जान न्योछावर करने वाले काँग्रेसियों की कहीं कोई खबर नहीं मिलती, जबकि अपने उस्ताद नेता के लिए पट्ठों की जान कभी कभी जाती भी रहती है। न आप किसी की बैठक [ड्राइंग रूम] से उसके काँग्रेसी होने का पता चला सकते हैं और न ही फर्नीचर आदि से। शादी ब्याह आदि में भी उनकी कोई अलग पहचान नहीं बनती जबकि अपने अंतिम वर्षों में गाँधीजी ने सिर्फ अंतर्जातीय विवाहों में ही भाग लेने का फैसला लिया था व उसे निभाया भी था। आज का काँग्रेसी वोटों की खातिर दहेज विवाह से लेकर बालविवाह तक सब में भाग लेता है। जातियों के सम्मेलन में जाता है और विवादास्पद पाखंडी साधु संतों के आश्रमों में भी दिखाई दे जाता है। 
विधानसभा चुनाव के बाद जब उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री का चयन हुआ था तब भी उसका फैसला दिल्ली में हुआ था। मंत्रिमण्डल का गठन भी निर्विवाद नहीं था तथा इससे शुरू हुआ विवाद लगातार पलता रहा था। लोकसभा चुनावों में काँग्रेस पाँचों सीटें भाजपा से हार गयी थी। जब ताजा असंतोष सामने आया तब भी असंतोष का कोई स्पष्ट मुद्दा नहीं अपितु वैसे ही अस्पष्ट आरोप थे जैसे कि आम तौर पर सभी मुख्यमंत्रियों के खिलाफ लगते रहते हैं। हरीश रावत की कुर्सी के बचाव में विधानसभा अध्यक्ष की चतुराई पूर्ण समझदारी की भी बड़ी भूमिका रही है व निष्पक्ष न्यायधीशों के मजबूत सही फैसले भी उनके मददगार हुये। कहा जाता है कि भाजपा में पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोशियारी की सहानिभूति हरीश रावत के साथ रही है। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि हार दोनों तरफ है पर हरीश रावत कुछ और दिनों तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे।
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, मई 02, 2016

यह केवल आर्थिक अपराध भर नहीं है

यह केवल आर्थिक अपराध भर नहीं है

वीरेन्द्र जैन
पिछले दिनों आन्ध्र प्रदेश की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा ने एक आई ए एस अधिकारी के यहाँ छापा मारा जो उप परिवहन आयुक्त के पद पर नियुक्त था। उसके यहाँ से छापे में आठ सौ करोड़ से अधिक की सम्पत्ति बरामद की गई, जिसमें दो किलो सोना, पाँच किलो चाँदी, चौदह फ्लैटों के कागजात, 4700 मीटर जमीन, हैदराबाद के पाश जुबली हिल्स इलाके में चार मंजिला इमारत, दर्जनों बैंक एकाउंट आदि सम्मलित हैं। उसकी बड़ी बेटी के नाम आठ कम्पनियां हैं जिनकी कीमत सौ से एक सौ बीस करोड़ के बीच आंकी गई है।
मध्य प्रदेश में ऐसे छापे लगभग प्रति सप्ताह पड़ते रहते हैं और आईएएस ही नहीं पटवारियों, चपरासियों ड्राइवरों तक के यहाँ से बड़ी बड़ी रकमें बरामद होती रहती हैं। इस तरह के मामलों में सरकार और समाज की जो उदासीनता देखने को मिल रही है उससे लगता है कि यह आखिरी मामला भी नहीं होगा। यह धारणा है कि जो राशि पकड़ी जाती है वह सम्बन्धित के वास्तविक भ्रष्टाचार से बहुत कम होती है और उसका एक बड़ा हिस्सा वह पहले ही खर्च कर चुका होता है। मुझे एक आयकर अधिकारी ने  बताया था कि राजनेताओं के जनप्रतिनिधि रहते हुए उन पर छापा न मारने की एक अलिखित नीति सी है इसलिए वे लोग बहुत कुछ जानते हुए भी राजनेताओं के यहाँ छापा नहीं मारते। विजीलेंस आयुक्त ने कभी कहा था कि सौ में से केवल चार मामले पकड़े जाते हैं और उनमें से केवल एक को ही सजा हो पाती है। मैंने एक व्यापारी से सवाल पूछा था कि किसी अधिकारी के रंगे हाथों पकड़े जाने के कुछ महीने तक तो उसका उत्तराधिकारी साफ सुथरा व्यवहार करता होगा। मेरी इस बात पर उसने हँसते हुए कहा था कि अगले दिन से ही उसका उत्तराधिकारी बँधे हुए रेट से पैसे लेने लगता है और अपने पूर्वाधिकारी को अकुशल मानता है जिस कारण वह पकड़ा गया। उसका अपनी भाषा में कहना था कि यह व्यक्ति का नहीं व्यवस्था का मामला है।
भूल यह हो रही है कि हम ऐसे प्रत्येक मामले को व्यक्ति तक सीमित करके देखते हैं और उसको सजा दिलवाने की कमजोर सी कोशिश का दिखावा ही हमारा लक्ष्य बन कर रह जाता है। जाँच करने से लेकर सजा दिलाने तक अनेक कमजोर कड़ियां होती हैं जो अपनी कीमत लेकर आरोपी को मुक्त कर देने में रुचि रखती हैं। यही कारण है कि ऐसे कुछ पदों पर नियुक्तियों, प्रमोशनों, और पदस्थापनाओं के लिए बड़ी बड़ी बोलियां लगने की बातें बाहर तक सुनी जाती हैं। पकड़े गये ज्यादातर मामलों में जमानत मिल जाती है, और निलम्बन के दौरान पहले छह महीने तक आधा और फिर तीन चौथाई वेतन पाने वाला अधिकारी/ कर्मचारी तनावमुक्त होकर पूर्ण विलासता का जीवन गुजारते हुए समाज को जीभ चिढाता रहता है, क्योंकि न्याय की प्रक्रिया बहुत लम्बी होती है।  
भ्रष्टाचार के कुछ दूसरे आयाम भी हैं, क्योंकि सरकारी स्तर पर किया गया भ्रष्टाचार पूरे समाज पर् दूरगामी मार करता है। सबसे पहले तो वह सरकार के विकास सम्बन्धी आंकड़ों को कटघरे में खड़ा करता है क्योंकि अधिकांश भ्रष्टाचार तो कार्य व विकास के झूठे आंकड़े बना कर, लक्ष्य से कम काम कराके ज्यादा दिखाने, या काम की गुणवत्ता खराब करके किया जाता है। सड़कें जल्दी उखड़ जाती हैं, पुल जल्दी गिर जाते हैं भवन रहने और काम करने लायक नहीं रहते। खेत असिंचित रह जाते हैं, सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं मिल पाने के कारण प्रतिवर्ष हजारों लोग अकाल मृत्यु के शिकार हो जाते हैं, पर्याप्त टीकाकरण और स्वच्छता न मिल पाने के कारण लाखों करोड़ों लोग अपना स्वास्थ गिरा लेते हैं, उम्र घटा लेते हैं। न्याय की उम्मीद न होने के कारण लोग कानून अपने हाथ में लेने लगते हैं और अपराधी खुले आम अपराध करने लगते हैं। राजनीति में लोग पैसा कमाने के लिए आने लगते हैं व समाज सेवा के उद्देश्य से राजनीति से जुड़ने वालों को हाशिए पर खिसका देते हैं। कहने का अर्थ यह है सारा भ्रष्टाचार जनता की सुख सुविधाओं में कटौती करके किया जाता है व विकास के झूठे प्रचार में करोड़ों रुपये फूंके जाते हैं। इसके विपरीत हमारी व्यवस्था धन सम्पत्ति के साथ पकड़ में आये व्यक्ति को सजा दिलवाने की जिम्मेदारी से अधिक नहीं सोचती। भ्रष्टाचार से हो रहे दूसरे नुकसानों, जिसमें लोकतांत्रिक व्यवस्था में घटती जाती आस्था भी सम्मलित है की कोई गिनती ही नहीं होती। निरीह आम जनता भी केवल उत्सुकता और आश्चर्य से तमाशा सा देख कर सब कुछ भुला देती है। लोग भ्रष्टाचारियों को यथावत सम्मान देते हैं व उनकी धन सम्पत्ति के प्रभाव में अपने परिवार का रिश्ता जोड़ने में कोई संकोच नहीं करते। विभिन्न तरह के चुनावों में उन्हें विजय दिलाते हैं, पद देते हैं, और उनके अधीन बने रहते हैं।
चीन में पिछले दिनों एक बैंक मैनेजर और उसे भ्रष्टाचार के लिए प्रोत्साहित करने वाली उसकी पत्नी को मौत की सजा सुनायी गई थी, क्योंकि वे उसको भ्रष्टाचार के लिए प्रोत्साहित करती थी। हमें यह सजा बहुत कठोर लग सकती है किंतु कानून के पालन का वातावरण बनाने का प्रभाव यह हुआ था कि हिदुस्तान के लोगों तक में उसकी धमक माहसूस की गई थी।
जब कोई भ्रष्टाचार में पकड़ा जाता है तो सम्बन्धित कार्यालय के कामकाज की कमजोरियां भी सामने आनी चाहिए किन्तु कभी नहीं सुना जाता कि उन कमजोरियों को रेखांकित किया गया है और दूर करने के कोई उपाय किये गये हैं, ना ही उसी सीट पर उससे पहले हुए वैसे ही काम या पूर्व पदस्थ रहे अधिकारियों के कार्यों व उनकी सम्पत्तियों को परखने की कोशिश की जाती है। यदि मध्यप्रदेश सरकार की कन्यादान योजना में नकली मंगलसूत्र पाये गये हैं तो क्यों नहीं अब तक के सभी हजारों विवाहों में दिये मंगलसूत्रों की कैरिटोमीटर से जाँच के आदेश दिये गये, जबकि यह तय है कि ये हरकतें पुराने समय से चली आ रही होंगीं। जब प्रदेश की लाखों भांजियों को यह पता कलेगा कि उनके कन्यादान के नाम पर किसका घर भरा जा रहा है तब क्या होगा? पर ऐसी जाँच सरकारी स्तर पर कभी नहीं होगी न ही प्रदेश में ऐसा कोई विपक्ष मौजूद है जो यह काम कराये। भ्रष्टाचार की पकड़ में आये लोग जिन स्थनों से सोना चाँदी खरीदते हैं, उनके यहाँ से दूसरे भ्रष्टाचारी भी खरीदते होंगे। फिर क्यों नहीं उनसे गहन पूछ्ताछ की जाती जबकि साइकिल चोरों को मार मार कर उससे सारी पिछली चोरियां कुबूल करा ली जाती हैं।
भ्रष्टाचारी कर्मचारी कभी अपने वर्ग की सेवा शर्तों में सुधार के लिए आन्दोलन नहीं करते और न ही किसी हड़ताल में मन से सम्मलित होते हैं। इस तरह वे अपने समकक्षों की सेवा शर्तों के सुधार हेतु सामूहिकता स्थापित नहीं होने देते जिस कारण मांगें पूरी नहीं हो पातीं। ट्रेड यूनियनों के बल में आने वाली कमजोरियों में भ्रष्टाचार की भी भूमिका रहती है।
हर भ्रष्टाचार जनता की जेब से कुछ चुरा रहा है और जनता यह समझ कर सो रही है चोरी दूसरे के यहाँ हो रही है। 
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

      

सोमवार, अप्रैल 04, 2016

“की एंड का” - ज़ेंडर समानता के मामलों पर एक नई दृष्टि

फिल्म समीक्षा
“की एंड का” - ज़ेंडर समानता के मामलों पर एक नई दृष्टि

वीरेन्द्र जैन
जब से लैंगिक समानता के सवाल दुनिया में मुख्य सामाजिक विषयों में सम्मलित हुए हैं तब से स्त्री पुरुष के परम्परागत सम्बन्धों में सम्भावित बदलावों के विभिन्न आयामों पर अलग अलग तरह से विचार करने की कोशिशें हुयी हैं। इस दिशा में  हिन्दी कथा साहित्य व फिल्मों ने भी परम्परागत विषयों से हट कर अपनी कृतियों में नये नये विषयों का चयन किया है। ‘शुद्ध देसी रोमांस’ ‘रांझणा’, ‘डौली की डोली’ ‘चीनी कम’ ‘क्वीन’ ‘तनु वेड्स मनु’ ‘पीकू’  आदि कई हिन्दी फिल्में पिछले दो तीन सालों में ही सामने आयी हैं।
“की एंड का” उन्हीं आर. बाल्की की फिल्म है जिन्होंने ‘चीनी कम’ बनायी थी। फिल्म की कहानी आगामी समय की कल्पना पर बुनी गयी है। जानीमानी फेमनिस्ट कमला भसीन की एक कविता है जिसमें वे कहती हैं कि अगर महिला खाना बना सकती है तो पुरुष क्यों नहीं बना सकता, खाना बनाने के लिए बच्चेदानी की जरूरत थोड़े ही पड़ती है।  लैंगिक समानता के बाद समाज के बीच महिला-पुरुषों के तयशुदा काम विभाजन में भी परिवर्तन आना स्वाभाविक है। अभी हमारे परम्परागत समाज में स्त्री और पुरुषों के न केवल काम बंटे हुए हैं अपितु उन कामों के अनुसार ही उनकी हैसियत अनुसार श्रेष्ठता और हीनता बोध भी व्याप्त है। मध्यमवर्गीय महिलाओं का काम घर का प्रबन्धन, खाना बनाना, बच्चे पैदा करना, उन्हें पालना पोसना होता है और फिर भी जनगणना आदि  सर्वेक्षणों में उन्हें कोई काम न करने वाली गृहणी की तरह दर्ज़ किया जाता है। दम्पत्तियों के यौनिक सम्बन्धों में भी असमानता है, जहाँ आम तौर पर पुरुष अपनी मर्जी से उन सम्बन्धों का उपयोग करने का अधिकारी होता है वहीं पर महिलाओं की इच्छाओं का कोई महत्व नहीं होता। पिछले दिनों हमारे देश में थर्ड ज़ेन्डर को अलग ज़ेंडर को मान्यता दी गयी है  उनकी समस्याओं पर भी ‘शबनम मौसी’ के नाम से फिल्म पहले ही बन चुकी है।
इस फिल्म की कथा दिल्ली के एक बड़े बिल्डर के इकलौते शिक्षित बेटे [अर्जुन कपूर] की अपने पिता के काम में रुचि न लेने और अपनी माँ की असमय मृत्यु से उपजी पिता की सम्पत्ति से वितृष्णा से प्रारम्भ होती है। उसका मानना है कि उसके पिता की प्रगति में उसकी माँ द्वारा घर सम्हालने की भी उतनी ही बड़ी भूमिका है क्योंकि घर सम्हालना एक आर्ट है। शिक्षा में प्रबन्धन की डिग्री लेकर भी इस युवा को अनावश्यक धन कमाने और कथित विकास की निरर्थकता का अहसास है। इतिहास बताता है कि धन के मोह से वह व्यक्ति दूर हो पाया है जिनके पास समुचित मात्रा में धन की उपलब्धता होती है। महावीर और बुद्ध से लेकर नेहरू, गाँधी, ज्योति बसु आदि भी इसी श्रेणी के लोग माने जा सकते हैं। वह अपने पिता के मापदण्डों से अलग अपनी माँ द्वारा घर सम्हालने वाली आर्ट को जेंडर मुक्त देखना और  अपनाना चाहता है। वह अपने पिता से किसी भी तरह की सहायता लेने से इंकार कर देता है। घर से निकलते समय वह केवल मोटर ड्रिविन स्केटिंग इंस्ट्रूमेंट लेकर आता है और वह भी इसलिए क्योंकि वह उसके पिता के पैसे का नहीं है अपितु उसके चाचा ने यह उसके बर्थडे पर भेंट किया था। जब घर सम्हालने का उसका यह प्रयोग असामान्य होने के कारण मीडिया में चर्चा का विषय बनता है और नये विषयों का भूखा मीडिया उसके प्रयोग को व्यापक महत्व देता है तो उसकी जीवन साथी [करीना कपूर] को लगता है कि किसी भी तरह बड़े बनने की उसकी इच्छा मरी नहीं है अपितु वह अपने पिता की सम्पत्ति ठुकरा कर महान बनने की नौटंकी कर रहा था। यहाँ उनके अहं टकराते हैं व विश्वासों को धक्का लगता है। उनके बीच का प्रेम नायिका की माँ की समझाइश पर फिर से अंकुरित हो जाता है व नायक का पिता भी अपने अकेलेपन के अहसास से घबराकर उसके पास आ जाता है। यह कहानी का सुखांत है।
यह कहानी निश्चित रूप से आज से बीस वर्ष बाद की कहानी है। अभी भी हमारे यहाँ समाज मेट्रो, नगर, कस्बे और गाँवों में बंटा हुआ है जिनमें लोग अलग अलग सामाजिक सम्बन्धों में जी रहे हैं। विवाह जो व्यक्तिगत घटना होना चाहिए थी उस पर अभी भी जाति, समाज, रिश्तेदारों और परिवार का हस्तक्षेप है। परिवार में पैसा कमा कर लाने वाले व उसका प्रबन्धन करने वालों की भूमिका में स्वामी और श्रमिक जैसे सम्बन्ध विद्यमान हैं। नर को पौरुषवान उसकी देह नहीं अपितु समाज बनाता है और वही समाज अभी भी नारी को दोयम दर्जे की नागरिक बनाने की कोशिश करता है। एक महिला आई ए एस ने बताया था कि अभी भी उनसे पूछा जाता है कि उनके पति क्या करते हैं! पर किसी पुरुष से यह सवाल नहीं पूछा जाता कि उसकी पत्नी क्या करती है!
इस कहानी का नायक क्या सचमुच कोई ऐसा पुरुष हो सकता था जिसे आड़े समय में अपनी पैतृक सम्पत्ति का भरोसा न हो। क्या अच्छे कैरियर के बिना कोई स्वस्थ दम्पत्ति बच्चे पैदा न करने  के निर्णय पर आज अडिग रह सकता है! क्या आज पारिवारिक मिलन समारोहों में विवाह और बच्चों की बात के बिना सम्वाद सम्भव है! ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो इस अच्छी कहानी को भविष्य की कहानी बनाते हैं।         
फिल्म में प्रेम व प्रणय के अंतरंग दृश्यों में स्वाभाविकता है, जो सामान्य दर्शकों को भी सिनेमा हाल तक आकर्षित कर सकती है, जिसके सहारे यदि फिल्म अपनी लागत निकाल ले तो यह लीक से हट कर फिल्में बनाने वाले निर्माता निर्देशकों की हिम्मत बनाये रख सकती है। मेहमान कलाकार के रूप में अमिताभ बच्चन और जया बच्चन की उपस्थिति शायद इसमें कुछ मदद कर सके। फिल्म को एक बार देखा जा सकता है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
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मो. 09425674629

  

मंगलवार, मार्च 29, 2016

ट्वेंटी-ट्वेंटी में निजता हनन करता सोशल मीडिया

 ट्वेंटी-ट्वेंटी में निजता हनन करता सोशल मीडिया

वीरेन्द्र जैन

टेस्ट मैच से वन डे और उसके बाद ट्वेंटी-ट्वेंटी तक आ गये क्रिकेट में, खेल व मनोरंजन के साथ जुए का सम्मिश्रण अधिक हो गया है। खेल में एक खास अनुशासन के अंतर्गत शारीरिक मानसिक श्रम और कौशल को विकसित करने की प्रवृत्ति होती है जिसमें अपने व सार्वजनिक मनोरंजन के साथ एक स्वस्थ प्रतियोगी भाव भी रहता है। इस प्रतियोगिता के बीच जो परिणाम की अनिश्चितता रहती है उसके पूर्वानुमान के आधार पर जब शर्तें प्रारम्भ हुयीं वे आगे चलकर जुए का आधार बनती गयीं। जब इस खेल को जुआ खिलाने वाले प्रायोजित करने लगे तो उन्होंने इसकी समय सीमा को उसी तरह संकुचित करना प्रारम्भ किया जिस तरह से रमी खेलने वाले मांग पत्ता खेलने लगें। टीवी चनलों के प्रसार ने इसे दुनिया के किसी भी हिस्से से सीधे प्रसारण की सुविधा दी और दुनिया का एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग इससे एक साथ सीधे जुड़ने लगा। इस बड़े दर्शक वर्ग के सम्पर्क का लाभ उठाने के कारण विभिन्न उत्पादकों ने विज्ञापन देकर इसके प्रायोजकों को आर्थिक मजबूती प्रदान की जिसका लाभ खिलाड़ियों तक भी पहुँचा। कुछ मामलों में जब इसके परिणामों को तय करने के सौदे हुए तो जुआरियों के साथ व्यापारी भी जुड़ गये जिन्होंने खिलाड़ियों को अपने अनैतिक व्यापार का भागीदार बना लिया।
बड़े दर्शक वर्ग के कारण इस खेल के खिलाड़ी सितारे बने और किसी भी तरह सत्ता हासिल करने के लिए उतावले राजनीतिक दलों ने इन खिलाड़ियों को चुनाव में प्रचार करने के लिए उतारा। कई मामलों में तो उन्हें सीधे उम्मीदवार ही बना दिया। चयन समितियों तथा खेल पुरस्कारों को तय करने में सत्तारूढ दल के राजनेता अपना लाभ देख कर हस्तक्षेप करने लगे। लोकप्रियता पर आधारित फिल्म उद्योग की कई अभिनेत्रियां लोकप्रिय क्रिकेट खिलाड़ियों से जुड़ कर चर्चा में बने रहने का खेल खेलने लगीं। इसी क्रम में उनकी मित्रता और ‘ब्रेक-अप’ भी लम्पट समाज के बीच उन्हें खबरों में रखने लगा। फिल्म निर्माताओं को भी उनकी नायिकाओं का चर्चा में बने रहना लाभ का सौदा दिखा इसलिए उन्होंने भी खबरों की खेती को सिंचित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
पिछले वन डे मैचों के दौरान जब अभिनेत्री अनुष्का शर्मा, विराट कोहली के साथ दिखायी दीं व उन मैचों में वे अपने खेल का अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सके तो खबरें गढने वालों ने इसको उनके साथ से जोड़ा जिसे बड़ी रुचि के साथ पढा गया और आपसी बात चीत में चुभलाया गया। इसके विपरीत जब ट्वेंटी-ट्वेंटी वर्ल्ड कप 2016 के दौरान विराट ने अच्छा प्रदर्शन किया और अनुष्का शर्मा वहाँ नहीं दिखीं तो मनोरंजन प्रेमी दर्शकों के एक वर्ग ने तरह तरह के मजाक गढ कर सोशल मीडिया के माध्यम से इसे फैलाया। अमर्यादित सोशल मीडिया ने कुछ अशालीन टिप्पणियां भी कीं। जब ये टिप्पणियां अपनी सीमा तोड़ गयीं तो दुखी होकर विराट कोहली ने अपने इन्हीं प्रशंसकों के खिलाफ कटु टिप्पणी करते हुए लिखा- “ उन लोगों को शर्म आनी चाहिए, जो हर गलत और नकारात्मक चीज को अनुष्का से जोड़ रहे हैं। उन लोगों को खुद को पढा-लिखा कहने में शर्म आनी चाहिए। खेल में मैं कैसा प्रदर्शन करता हूं, उसका अनुष्का से से कोई लेना देना नहीं है, तो उसे दोषी क्यों ठहराया जाता है? अगर उन्होंने [अनुष्का] कुछ किया है, तो वह है कि मुझे मोटीवेट किया, और हमेशा मुझे सकारात्मकता दी। यह बात मैं बहुत पहले कह देना चाहता था। ...... और हाँ मुझे इस पोस्ट के लिए किसी का सम्मान नहीं चाहिए, बल्कि तरस खाइये और उनका सम्मान कीजिए। अपनी बहन, गर्ल फ्रैंड, या पत्नी के बारे में सोचिए, वो कैसा महसूस करेंगी, जब कोई उनके पीछे पड़ा रहे और सहजता से किसी भी समय सार्वजनिक रूप से उनका मजाक उड़ाए।“
मैंने सोशल मीडिया पर उपरोक्त आलोच्य टिप्पणियों के लिखने वालों को परखने की कोशिश की तो पाया कि ये अशालीन टिप्पणियां लिखने वालों का बहुमत उन लोगों में से था जिन्होंने जे एन यू में चल रहे छात्र आन्दोलन का विरोध किया था। इनमें से अधिकांश अपनी मौलिक टिप्पणियां नहीं लिखते अपितु किसी केन्द्र से आने वाली टिप्पणियों को ही कापी पेस्ट करके फारवर्ड कर देते हैं। एक ने तो कह ही दिया कि सोशल मीडिया में विराट अनुष्का प्रकरण चल निकलने से कन्हैया का प्रकरण गुम हो गया और देख लेना वह भी हार्दिक पटेल की तरह गुम हो जायेगा।
ट्वेंटी-ट्वेंटी का यह खेल जिस सक्रिय मध्यम वर्ग को मनोरंजन और अपने उत्पादन की बिक्री के लिए सम्बोधित करता है, उसी मध्यम वर्ग का एक बड़ा हिस्सा भाजपा और मोदी समर्थक रहा है। इसी हिस्से को पिछले दिनों सबसे ज्यादा निराशा भी हुयी थी जो विभिन्न चुनाव परिणामों में दिखायी भी दी। अलग अलग समय पर सिद्धू, चेतन चौहान, कीर्ति आज़ाद, आदि के बाद अब केरल में फिक्सिंग का आरोप झेल चुके श्रीसंत को उम्मीदवार बनाने वाली भाजपा के सोशल मीडिया केन्द्रों और उनके सन्देशों को फैलाने वाली भीड़ को विराट की खरी खरी से धक्का लगा होगा। अगर उनमें जरा भी शर्म होगी तो वे वैसे ही पूरे खेल जगत से क्षमा मांगने का साहस दिखायेंगे जिस तरह गन्दे सन्देश फैलाने का काम करते हैं।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
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