विवाह लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विवाह लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, जून 02, 2015

क्रांतिकारी बदलाव चाहती विवाह संस्था



क्रांतिकारी बदलाव चाहती विवाह संस्था
वीरेन्द्र जैन

विवाह के बारे में पहले से कुछ कहावतें प्रचलित रही हैं जैसे कि शादी एक ऐसा लड्डू है जिसे खाने वाला और न खाने वाला दोनों ही पछताते हैं, या तुलसी गाय बाजाय के, देत काठ में पाँव। पहले इन कहावतों में एक मीठी सी शिकायत रहती थी जो अब कढुवाहट में बदल गयी है और प्रचलित लतीफों का बड़ा हिस्सा दाम्पत्य जीवन की कटुताओं से सम्बन्धित लतीफों से भरा रहता है और वे दूसरों के बारे में होने के कारण लोग हँसते तो हैं, पर अपने दाम्पत्य जीवन के बारे में सोच कर उन लतीफों को कढुवी सच्चाई की तरह भी देखते हैं। आचार्य रजनीश [ओशो] ने एक संस्मरण में बताया है कि वे अपने विवाह के पक्ष में नहीं थे इसलिए उनके पिता ने अपने एक परिचित मित्र को दूर से इसलिए बुलवाया ताकि वे उन्हें विवाह के लिए तैयार कर सकें। रजनीश कहते हैं कि मैंने पिता के मित्र से केवल इतना कहा कि आप सुबह तक सोच कर बतायें कि क्या आप अपनी शादी से खुश हैं। सुबह रजनीश के सो कर उठने से पूर्व ही पिता के मित्र अपने नगर वापिस लौट गये थे। बाद में उनके सम्बोधनों को संकलित करके जो पुस्तकें प्रकाशित हुयीं उनमें से एक है- प्रेम और विवाह। इसमें वे सिद्ध करते हैं कि प्रेम स्वाभाविक है और विवाह कृत्रिम व्यवस्था है, इसलिए प्रेम परमात्मा से जुड़ा है अतः पवित्र है।
                साहित्य और जीवन से जुड़े विभिन्न कला रूप विवाह और उससे सम्बन्धित विभिन्न समस्याओं से भरे पड़े हैं तथा बहुत सारी फिल्में या कहानियां विवाह के बाद ‘दि एंड’ [समाप्ति] दिखाती रही हैं, इससे पता चलता है आत्मनिर्णय के विवाह तक पहुँचने में कितने तरह की समस्याएं विद्यमान हैं। परम्परागत विवाहों में भी विवाह के तय होने से लेकर उसके आयोजन और उन आयोजनों से जुड़ी कुप्रथाएं आदि ढेर सारी समस्याएं पैदा करते हैं। रिश्वत लेते हुए पकड़े गये कुछ लोगों से अंतरंग बात करने पर पता चला कि कभी आदर्श की बातें करने वाले इन लोगों ने बेटियों के विवाह हेतु दहेज जुटाने के लिए रिश्वत लेना सीखा। देश में कुल बाज़ार का तेइस प्रतिशत सौन्दर्यीकरण से जुड़ा हुआ है जो स्वास्थ के बाज़ार से अधिक है। खाप पंचायतों जैसी संस्थाएं जो अपने सदस्यों की शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ आदि की कोई चिंता नहीं करतीं किंतु विवाह के लिए कानून के समानांतर न्याय व्यवस्था चलाते हुए फाँसी देने तक के फैसले दे देती हैं, और गैर कानूनी होने के बाद भी उन फैसलों पर अमल भी करवाती हैं। जातिवादी संस्थाओं का सबसे प्रमुख काम विवाहों पर निरीक्षण रखना हो गया है। विवाह के असफल होने पर अलगाव से सम्बन्धित जो मान्यताएं तथा नये व पुराने कानून अस्तित्व में हैं, उनके व उनके दुरुपयोग के कारण या तो अनेक दम्पत्ति घुट घुट कर जीते हैं या अलग होकर अपना बहुत कुछ लुटा देने की स्थिति में पहुँच जाते हैं। कभी घुटना केवल स्त्रियों के हिस्से में आता था जो महिला समानता के आन्दोलन व सशक्तीकरण के कुछ कानूनों के कारण दोनों के हिस्सों में बँट गया है, जिसका असर बच्चों के विकास पर भी पड़ता है। अपने कर्म के प्रति समर्पित देश दुनिया के प्रमुख संस्कृतिकर्मी और राजनेता या तो अविवाहित रहे हैं या उनके वैवाहिक जीवन की नैतिकताओं में विचलन की सूचनाएं आम हैं। ये संकेतक हैं कि विवाह संस्था सुधार चाह रही है।
       हमारे समाज में जो बदलाव बताये जाते हैं वे मूल ढाँचे को छेड़े बिना केवल आवरण में होते हैं। पिछली सदियों में जिस गति से राजनीतिक आर्थिक ढाँचे में बदलाव आये हैं उस गति से सामाजिक ढाँचे में बदलाव नहीं आ रहे हैं। विज्ञान की डिग्री रखने वाले, टैक्नोक्रेट व प्रबन्धन वाले अधिकांश युवा भी घर के बुजुर्गों की मर्जी से अपनी जाति में पत्रिका मिलान कर सड़क पर बारात निकालते हुए ही शादी कर रहे हैं। लड़कों को तो किसी हद तक लड़की के रंग रूप को चुनने का अवसर मिलने भी लगा है, किंतु सुशिक्षित लड़कियों को भी यह अधिकार बहुत ही कम मिल पाया है। सम्पन्नता के अनुसार विवाह परम्पराओं के वैभव में भले ही अंतर आया हो किंतु परम्पराएं वही पुरानी निभायी जा रही हैं, जिनके अनेक दोषों से वे स्वयं परिचित हैं। अपने सबसे अच्छे बेमौसमी वस्त्रों में लिपटे स्त्री पुरुष और बच्चे, बीच सड़क पर बेतरतीब ढंग से शराब पीकर उछलते नृत्य समझकर चक्कर खाते युवा, आतिशबाजियां, जनरेटर और बैंड के बीच मुकाबला करते शोर के बीच में से निकलती हार्न बजाती मोटर साइकिलें, बिजली का हंडा सिर पर रखे बाल मजदूर और इस युग में घोड़े पर सवार दूल्हा जो दृश्य उपस्थित करते हैं वह जुगुप्सा जगाने वाला होता है। पता नहीं उसमें कौन लोग कैसे आनन्द लेते चले आ रहे हैं। दुखी परेशान होते हुये, बिना आरक्षण के यात्रा में भागते रिश्तेदारों का विवाह समारोहों में भाग लेना क्यों जरूरी होता है, जिनमें उम्रदराज बुजुर्ग ही नहीं दूध पीते बच्चे भी होते हैं। उनके रहने, सोने और शौचालय स्नान की उचित व्यवस्था तक नहीं होती पर अधिक से अधिक स्वादिष्ट गरिष्ठ भोजन लेना जरूरी होता है। यह यात्रा कई बार वे उधार लेकर भी करते हैं। आखिर हम क्यों अपनी और दूसरों की सुख सुविधा को ध्यान में रखते हुए इसे उस स्तर तक सीमित नहीं कर पा रहे हैं जिसमें पूरी घटना सिर्फ और सिर्फ आनन्द बन सके। भोपाल के प्रोफेसर डा. आफाक अहमद ने एक संस्मरण सुनाया था। सुप्रसिद्ध व्यंग्य लेखक शरद जोशी की बेटी की शादी की दावत थी और जब उन्होंने अपने हाथ में पकड़े हुए गुलदस्ते और उपहार को भेंट करने के लिए उनसे पूछा कि दूल्हा दुल्हिन कहाँ है? तो उन्होंने कहा कि यहीं लोगों के बीच आशीर्वाद लेते घूम रहे हैं, आइये बैठिये वे खुद आपके पास आ जायेंगे। पूरा जीवन प्रगतिशील मूल्यों के लिए बिताने वाले शरद जोशी ने बच्चों को किसी महाराजा कुर्सी पर बिठा कर वरिष्ठजनों को उन तक जाने की खराब परम्परा नहीं स्वीकारी थी। पिछले दिनों एक सुबह मित्र का बेटा अपनी नवविवाहिता के साथ मिठाई और ड्राईफ्रूट का डिब्बा लिए उपस्थित हुआ और पैर छूते हुये कहा कि हम लोगों ने विवाह कर लिया है व तय किया है कि वरिष्ठजनों को तकलीफ देने की जगह उनके घर पर जाकर ही आशीर्वाद लिया जाये। मन सचमुच गदगद हो गया। युवा होने का अर्थ ही है सार्थक परिवर्तन का साहस।
ऐसा नहीं है कि व्यक्तिगत स्तर पर छुटपुट बदलाव नहीं हो रहे हैं किंतु संगठित संस्थाओं द्वारा उन्हें समाज से विद्रोह माना जा रहा है व उन विद्रोहियों को समाज के हाशिए पर जाना होता है या दण्डित होना पड़ता है। कभी किसी जमाने में इक्के दुक्के लैला मज़नू, शीरी फरहाद की कहानियां सुनने को मिलती थीं किंतु इन दिनों प्रति सप्ताह दो तीन युवा जोड़े आत्महत्या कर रहे हैं किंतु समाज के कान पर जूं भी नहीं रेंग रही। बिना संगठन के कोई भी बदलाव सामजिक बदलाव का सूत्रपात नहीं कर पाता और बुझती चिनगारी की तरह चमक कर रह जाता है।
       विवाह संस्था में बदलाव के कुछ लक्षण युवाओं के अविवाहित रहने, या ‘लिव इन रिलेशन’ में देखने को मिल रहे थे किंतु पिछले दिनों आये उच्चतम न्यायालय के फैसलों से ऐसा लगता है कि इस तरह के रिश्तों को भी विवाह की पुरानी सीमाओं में बाँध कर वहीं लाया जा रहा है। लिव इन रिलेशन में रहने का मतलब ही यह था कि दो युवाओं ने परम्परागत विवाह से हट कर एक तयशुदा समय के लिए ज़िन्दगी बिताने का समझौता किया हुआ है। यह उनकी स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वे इस समझौते की अवधि कब तक रखें या अलग होने के लिए अपनी सम्पत्ति को किस तरह से बाँटें। इसको विवाह के कानूनों के हिसाब से तय करना इसकी प्रकृति को बदलना है। प्रगतिशील समाज को बदलते समय में बदलते सम्बन्धों का स्वागत करना चाहिये और सहयोगी बन कर उनके प्रयोगों को परखना चाहिये। यह नहीं भूलना चाहिए कि हम लोग मातृ प्रधान समाज से प्रारम्भ कर के परिवार की वर्तमान व्यवस्था तक पहुँचे हैं और विवाह संस्था पुनः कुछ बड़े परिवर्तन चाह रही है।
              जातियां काम की किस्म के कारण बनी थीं और जाति विवाह इसलिए उपयोगी थे ताकि समानधर्मा कुटीर उद्योग, गृह उद्योग, और कारीगरी के कौशल में विकसित हुए बच्चे अपने उस काम को सहयोगपूर्वक कर सकें जिसमें उन्हें पूर्व से ही प्रशिक्षण प्राप्त है। किंतु राजतंत्र की समाप्ति, सरकारी सेवाओं के नये वर्गों का उदय, उद्योगों की स्थापना, नगरी सभ्यता का विकास आदि ऐसी घटनाएं हुयी हैं जिनके कारण हमें विवाह को जाति तक सीमित रखने के नियम में परिवर्तन लाना चाहिए था, जो नहीं लाया गया है। अगर लोग जाति विवाह के पक्ष में ही हैं तो अब जातियां, डाक्टर, इंजीनियर, किसान, व्यापारी, पुलिस, फौजी, सरकारी सेवक, पत्रकार, औद्योगिक श्रमिक, आदि के आधार पर बदलना चाहिए।     
    मृत देहों की तरह मृत हो चुकी परम्पराओं को भी विसर्जित करने का साहस जुटाना होगा नहीं तो हमारा समाज किसी कबाड़खाने में बदल कर रह जायेगा। सुन्दरता के लिए बेतरतीब ढंग से बढ चुके अपने बालों और नाखूनों को उचित स्थान से काटना ही होता है। सामाजिक सौन्दर्य के लिए वंछित बदलाव का बीड़ा युवा ही उठा सकते हैं और उन्हें उठाना भी चाहिए।
वीरेन्द्र जैन                                                                          
2 /1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल म.प्र. [462023]
मोबाइल 9425674629

बुधवार, मार्च 13, 2013

कितने युवाओं की बलियां और लेगा यह समाज?


कितने युवाओं की बलियां और लेगा यह समाज
वीरेन्द्र जैन
       मैंने अपने एक परिचित के पारिवारिक मामले में दखल देते हुए उसकी बेटी की शादी ऐसे परिवार में करवायी थी जो उनकी जाति के ही थे पर गोत्र में छोटे माने जाते थे। शादी के लगभग दो साल बाद जब उनके घर जाने का संयोग निकला तो स्वाभाविक रूप से बेटी की कुशलता भी पूछी। उन्होंने गम्भीर होकर कहा कि लड़की का ससुराल उनकी तुलना में कई गुना सम्पन्न है, कोठी है गाड़ियां हैं अच्छा व्यापार है और घर में सामंजस्य है पर शादी के बाद उन्होंने एक बार भी बेटी को उनके घर नहीं भेजा। जब भी बेटी को बुलाते हैं तो दामाद स्वयं ही गाड़ी लेकर आते हैं और शाम को उसे लेकर वापिस लौट जाते हैं।
       उनकी बात में एक ओर तो संतोष झलकता था तो दूसरी ओर वे दुखी भी थे। जब मैंने पूछा कि क्या उनके पास उनकी निगाह में उनके ही समान गोत्र में इससे भी अच्छा कोई रिश्ता था, तो उन्होंने इंकार में सिर हिला दिया। जब मैंने कहा कि यह स्थिति तो समान गोत्र की शादी में भी आ सकती थी तो उन्होंने सहमति जताते हुए कहा कि आम तौर पर समान गोत्र में स्थितियां अपेक्षाकृत बुरी ही हो सकती थीं। सच तो यह है कि हमारे समाज ने अनावश्यक रूप से बेटी की शादी को अपनी इज्जत से जोड़ लिया है जबकि उसका ‘कन्यादान’ कर देने के बाद उसके पिता के घर आने के अवसर बहुत ही कम होते हैं। तब भी हम यह नहीं सोचते कि विवाह में केवल संतानों के सुखी भविष्य के अलावा दूसरा कोई मापदण्ड नहीं होना चाहिए। समान धर्म, जातियों, गोत्रों, उपगोत्रों में जन्मपत्रिका मिलवा कर व महूर्त देख कर किये गये विवाहों के बाद भी परिवार उतने सुखी और स्वतंत्र नहीं हो पाते जितना वे आत्मनिर्णय से किये गये विवाहों में हो सकते हैं। आइए देखें कि पिछले दो तीन वर्षों में ही अपने कितने सम्भावनाशील युवाओं को अपनी मूर्खताओंवश मौत दे दी है। यह सूची तो कुछ छुटपुट अखबारी कतरनों से इंगित संकेत तक सीमित है जबकि इससे कई गुना अधिक घटनाएं तो पुलिस प्रशासन और मीडिया की निगाहों में आने के पहले ही दब जाती हैं।
2010- दैनिक भास्कर  बिजनौर जिला-हल्दौर थाना- ग्राम खासपुरा पहले प्रेमी की हत्या की, फिर बेटी को जलाया
2010- दैनिक भास्कर  फिरोज़पुर- ग्राम नूरपुर सेठा- प्रेमी प्रेमिका की पीट पीट कर हत्या
20-9-10 दैनिक भास्कर  विदिशा- ग्राम मिर्ज़ापुर- विदिशा में प्रेमी प्रेमिका ने की खुदकुशी
7-11-10- पीपुल्स समाचार  भटनी देवरिया जिला- तीन छात्राओं को मारकर खेत में गाड़ा  और फिर उनकी हत्या, मामले को रफा दफा करने की कोशिश
2010 पीपुल्स समाचार  भोपाल- कोलर क्षेत्र बहन के नाबालिग प्रेमी की बेरहमी से हत्या- पीटा फिर डेम में फेंक दिया
2010 पी. समा. बरेली-यूपी- पेमी युगल ने खाया जहर, लड़की की मौत- लड़का गम्भीर्
2011-पीपुल्स समाचार  सिरसा-फुलकन गाँव-रुई के खेतों में एक युवक और युवती का शव मिला
2011- पीपुल्स समाचार -मुम्बई-विरार- एक महिला ने अपनी 21 साल की बेटी के तीन टुकड़े कर दिये फिर उसे जलाने की कोशिश की
2011 -पीपुल्स समाचार -भोपाल बैरसिया तहसील में प्रेम प्रसंग के चलते एक युवक की बस से उतार कर नृशंस ह्त्या कर दी गयी
2011- पीपुल्स समाचार -भोपाल छोला मन्दिर इलाके में बहिन के प्रेमी की हत्या
2011- पीपुल्स समाचार  गाजियाबाद- मोदीनगर क्षेत्र में प्रेम सम्बन्धों के सन्देह में बाप ने बेटी की जान ले ली
2011- पीपुल्स समाचार  भिंड देहात क्षेत्र-प्रेमी की आत्महत्या के बाद प्रेमिका ने लगायी फाँसी
13-11-11-दैनिक भास्कर  कांगड़ा ग्राम नगरौटा बगवाँ- 20 वर्षीय युवक की हत्या कर शव पेड़ से लटका दिया गया
29-7-11 पी.समा-दतिया- पलवल हरियाणा के प्रेमी युगल ने दी ट्रैन से कट कर जान दी
18-8-11-मुरैना- महुआ थाना क्षेत्र के बड़ापुरा गांव में झूठी शान के लिए भतीजी की हत्या
27-8-11-पीपुल्स समाचार  सीहोर युवक को जिन्दा जलाया
00-8-11- पीपुल्स समाचार  कानपुर घाटमपुर इलाके में एक व्यक्ति ने प्रेम प्रसंग के चलते आपनी दस्वीं में पढ रही लड़की की हत्या कर दी और शव को खेत में गाड़ दिया।
00-8-11- दैनिक भास्कर  नासिक – भद्रकाली पुलिस स्टेशन परिसर ने प्रेम सम्बन्धों के सन्देह में एक माँ ने अपनी 18 वर्षीय लड़की को ज़िन्दा जला दिया
2011- पीपुल्स समाचार  मुजफ्फरनगर- 48 घंटों में आनर किलिंग में तीन लड़कियों की हत्या कर दी गयी
2011- पीपुल्स समाचार  मथुरा- कोलाहर गाँव- प्रेमीयुगल को गांव वालों ने खेत में ही फूंका
12-8-11- जन.स. नोएडा- सूरजपुर थाना क्षेत्र में भाई ने प्रेम करने के आरोप में अपनी बहिन की जान ले ली और  गंग नहर में लाश बहा दी
24-10-11 दैनिक भास्कर  मुरैना ग्राम लहर- दिमनी थाना क्षेत्र- दो बार पेड़ पर लटकाया, डंडों से पीटा, केरोसिन डाला... फिर चिता पर लिटाकर ज़िन्दा जला दिया, दलित के साथ प्रेम करने की सजा
28-10-11 दैनिक भास्कर  टीकमगढ- दिगौड़ा- प्रेमी युगल की हत्या कर शव फाँसी पर लटकाए
10-11-11-पत्रिका-भिंड बरासों थाना क्षेत्र ग्राम गोपालपुरा- बेटी की गोली मार कर हत्या, शव नदी में बहाया
5-11-11 जन. स. मुज़फ्फरनगर किशोरी की झूठी शान के लिए उसके दो भाइयों द्वारा की गयी हत्या के बाद परिवार वालों ने शव भी स्वीकार करने से मना कर दिया
6-11-11-जन.स. मुज़फ्फरनगर बागपत जिला- दार्कवदा गाँव- झूठी शान के लिए बेटी की हत्या
00-11-11 पत्रिका- भोपाल- दो छात्राओं ने ट्रैन से कटकर दी जान- घटनास्थल से बरामद किया
12-11-11-जन.स. बुलन्द शहर- प्रेमिका और प्रेमी के भाई का शव मिला
26-11-11-जन.स. मुरादाबाद- मवई ठुकरान इलाके में नाराज पिता ने बेटी को मार डाला
4-1-12- जन.स. मेरठ- गाँव- हर्रा- प्रेम प्रसंग से नाराज भाई ने बहन की जान ली
18-4-12- दैनिक भास्कर  सागर जिले के बीना में आनर अटैक – युवक को पैट्रोल डाल कर जला दिया- प्यार की सजा, हालत गम्भीर,
25-4-12-दै भा.- मुम्बई- आनर किलिंग में पिता ने बेटी की हत्या की
2012-  दैनिक भास्कर  हरियाणा –रोड़ी- सिरसा- प्रेमी और प्रेमिका दोनों एक साथ जले , सिरसा के शमशान घाट में युवती की जलती चिता पर कूद कर युवक ने किया आत्मदाह
2012-  दैनिक भास्कर  रांची – प्रेमी प्रेमिका चौथी मंज़िल से कूदे, प्रेमिका मरी
10-5-12 दैनिक भास्कर  –सहारनपुर – डीआइजी ने कहा कि भागने वाली लड़की अगर मेरी बहिन होती तो मैं उसे मार डालता
19-6-12 दैनिक भास्कर  सूरत- पैट्रोल छिड़क बेटी को ज़िन्दा जलाया
9-9-12 जन, स. इन्दौर हीरानगर थाना क्षेत्र-इन्दौर में भाई ने बड़ी बहिन को जिन्दा जलाया
नवम्बर 12- पत्रिका- अम्बाह – मुरैना- नखती गाँव- किशोरी को जला कर मारा
15-9-12 डीबी स्टार- भोपाल- भोपाल- पहले उन्होंने अपनी बेटी को मार डाला फिर मेरे बेटे को मरवा दिया और एक्सीडेंट बता दिया। प्रेमी की माँ ने की शिकायत।
अक्टूबर 12-  इटारसी- दैनिक भास्कर, आनर किलिंग में युवक की हत्या गोली मार कर जलाया शव
2/12/12- शाजापुर- दैनिक भास्कर बड़ौद में प्रेमिका के भाइयों ने बहिन को मार डाला और प्रेमी की हत्या की। दोनों ने विवाह कर  लिया था।
9/12/12 कोलकता- दैनिक भास्कर दक्षिण परगना में बड़े भाई ने अपनी छोटी बहिन को मार डाला और कटा सिर लेकर थाने पहुँचा, उसकी बहिन अपने प्रेमी के साथ रह रही थी।
21/12/12 नई दिल्ली- पत्रिका- गृह राज्य मंत्री आरपीएन सिंह ने कहा कि चालू वित्तीय वर्ष में पीड़ित की शिकायत पर आनर किलिंग के 333 मामले दर्ज किये गये।
21/12/12 शिवपुरी दैनिक भास्कर, -प्रेम विवाह करने पर बेटी को गोली मारी
26/12/12 कौशाम्बी- दैनिक भास्कर- पिता ने रात्रि में प्रेमी से मिलने गयी पुत्री की कुल्हाड़ी मार कर हत्या की
26/12/12 मुज़फ्फरनगर –दैनिक भास्कर बुढाना कस्बे में पिता ने अपनी बेटी और उसके प्रेमी की गोला मार कर हत्या कर दी
11/1/13 राजकोट दिव्य भास्कर – भावनगर जिले के सादरिका गाँव में 24 वर्षीय अमराबेन को प्रेमी के साथ जाने पर उसके परिजनों ने मार डाला
13/1/13 मेरठ- दैनिक भास्कर ओएनजीसी के सुपरिंडेंट इंजीनियर ने अपनी बेटी को बाठरूम्के टब में डुबो कर मार डाला
22/1/13 भोपाल- दैनिक भास्कर- आरक्षक की बेटी ने फाँसी लगाने से पहिले अपने प्रेमी से शादी कर ली थी   
       सह शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, आरक्षण से मिटता जातिगत भेदभाव, घरेलू कार्यों का मशीनीकरण, परिवार नियोजन के साधनों के प्रसार से आये नैतिक परिवर्तनों, के बाद भी हम कब तक विवाह के लिए जातियों के घेरों में सीमित रह कर अपने ही युवाओं को मौत के मुँह में धकेलते रहेंगे? जब इनमें से अधिकांश युवा हैं तो फिर राजनीतिक दलों के युवा संगठनों को इनकी मौत की चिंता क्यों नहीं है? इनमें से बहुत सारे छात्र हैं तो छात्र संगठनों को इनकी म्रत्यु पर आक्रोश क्यों नहीं आता जो छोटी छोटी बात पर आ जाता है। सच तो यह है कि हम वृद्धों के देश में रह रहे हैं क्योंकि जो मौलिक रूप से नहीं सोचता और मृत परम्परा को ढोता चला जाता है वह युवा है ही नहीं। इन असमय की मौतों पर न साहित्य जगत संवेदनशील हो रहा है और न ही मीडिया इसे वस्तुनिष्ठ रूप में ले रहा है। इनमें से अधिकांश जाति समाज से ग्रस्त हिन्दू हैं पर हिन्दू युवा अभी भी ‘कुम्भ’ से बाहर नहीं निकल पा रहा। संघ के प्रमुख पद पर आते ही मोहन भागवत ने अपना पहला चर्चित बयान अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित करने के सम्बन्ध में दिया था, पर उसके बाद उनके मुखारबिन्द से कभी कोई बोल नहीं फूटे।
आखिर हम कब तक शुतुरमुर्ग बने रहेंगे?
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629
  

सोमवार, मार्च 14, 2011

विवाह की परम्पराओं में व्यापक सुधार की जरूरत

विवाह की परम्पराओं में व्यापक सुधार की जरूरत
वीरेन्द्र जैन
गत दिनों में हरियाणा के पूर्व विधायक सुखवीर सिंह जौनपुरिया की बेटे की शादी दिल्ली के कांग्रेस के नेता कंवर सिंह तंवर के बेटे ललित कंवर से हुयी और इस शादी में व्यय किये गये धन ने इसे देश के अखबारों की प्रथम पृष्ठ की घटना बना दिया। इस शादी में कुल 250 करोड़ रुपये खर्च किये गये। बारात में आये 18 प्रमुख बारातियों का टीका एक एक करोड़ से किया गया और दूसरे 2000 बरातियों को 30-30 ग्राम के चांदी के बिस्कुट और नैनो कार भेंट में दी गयी। राजस्थान के सालासर बालाजी मन्दिर को 71 लाख रुपयों का दान दिया गया। इस को देखते हुए बारातियों के लिए की गयी शेष व्यवस्था की बात करना ही फिजूल होगी।
हमारे समाज में जब पुत्रियों को पैतृक सम्पत्ति में हिस्सा नहीं दिया जाता था इसलिए उनके विवाह के अवसर पर उनके हिस्से की राशि एक नये परिवार के काम आने वाली दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं, और गहनों के रूप में दहेज की तरह दे दी जाती थी। यह एक स्वीकार्य प्रथा थी जो बाद में सम्भवतः कन्या पक्ष के पक्षपात आदि के कारण वर पक्ष द्वारा पहले से तय की जाने वाली राशि में बदल दी गयी व बाद में तो यह एक सौदेबाजी की बुराई में बदल गयी। इस बुराई में दहेज में नकदी भी ली जाने लगी। इस तरह की माँग कन्या के पिता की हैसियत देखे बिना भी की जाने लगी जिससे अनेक लड़कियां दहेज की कारण कुँवारी रह जाती रहीं या उनके पिता को कर्ज लेना पड़ा जो परोक्ष में उनके घर-जमीनें बिकने और आत्म हत्याओं तक का कारण भी बना। प्रकारांतर में दहेज का कागजी विरोध भी होता रहा किंतु पूंजीवादी समाज, जिसे प्रेमचन्द ने महाजनी सभ्यता कहा है, के विकास ने धन प्राप्त होने वाली इस परम्परा को दूर होने नहीं दिया। भले ही बेमन से इसके लिए कानून बने और सामाजिक सुधारों की बातें होती रहीं, पर सुधार कुछ भी नहीं हुआ क्योंकि इसकी जड़ पर कभी प्रहार ही नहीं किया गया। धर्म जाति, उपजाति और गोत्र के अनुसार विवाह की परम्परा ने वर वधू के चयन के क्षेत्र को सिकोड़ दिया जिससे दहेज माँगने वालों को अनुकूलता हुयी। स्वतः चयन पर समाज के ठेकेदारों ने न केवल ऐसे विवाहों को अस्वीकार करते हुये नवदम्पति के साथ असहयोग किया अपितु कई मामलों में इन नवविवाहितों की हत्याएं तक कर दी गयीं।
पिछले दो तीन दशकों से हमारे देश में किसी भी तरह के कोई बड़े आन्दोलन नहीं हुये। ये न तो राजनीति के क्षेत्र में हुये और ना ही समाज सुधार के क्षेत्र में। राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता में इस तरह की कमी आयी है कि लोगों ने उनसे किसी सुधार की उम्मीद करना ही छोड़ दी है। किसी भी दल की रैली या विरोध प्रदर्शन में केवल उस दल के बँधुआ कार्यकर्ता, झूठे आश्वासनों से बहकाये मजबूर लोग या किराये से ले जाये गये लोग ही सम्मलित होते हैं। जनता का कोई व्यक्ति स्वतःस्फूर्त ढंग से इन दलों के आवाहन पर रैलियों में नहीं जाता भले ही वह कितनी भी जनहितैषी माँग के लिए बुलायी गयी हो। इसी तरह सामाज सुधार आन्दोलन तो सिरे से गायब हो गये। शायद जयप्रकाश नारायण राजनीतिक क्षेत्र के राष्ट्रीय आन्दोलनों वाले अंतिम नेता थे और समाज सुधार के आन्दोलनों के लिए तो महात्मा गान्धी के बाद कोई नहीं हुआ। काँशीराम जी ने संगठन तो बड़ा खड़ा किया किंतु उसका उपयोग केवल धन और राजनैतिक सत्ता हासिल करने के लिए किया, जिससे सम्बन्धित समाज का कोई भला नहीं हुआ। एकाध सफल किसान आन्दोलन के बाद महेन्द्र सिंह टिकैत ने शादी में कुल ग्यारह बाराती ले जाने और मामूली राशि से रस्में पूरी करने के आदेश निकाले थे किंतु उनको आर्थिक माँगों पर समर्थन देने वालों की भीड़ ने उनके सुझावों की बुरी तरह उपेक्षा कर दी थी, जिससे बाद में उभोंने ऐसे कोई प्रयास नहीं किये। संघ के सर संघ चालक बनते ही मोहन भागवत ने हिन्दुओं में अंतर्जातीय विवाह हेतु अभियान शुरू करने की बात की थी पर अपने राजनीतिक दल पर पड़ने वाले प्रभाव को अनुमानित कर जल्दी ही वे भी पूंछ दबा कर चुप बैठ गये।
सवाल यह है कि ऐसा दूध का धुला कौन है जो जनता को आवाज दे और उसकी आवाज का असर हो। यही सवाल शायद कभी भवानी प्रसाद मिश्र के मन में घुमड़ रहा होगा जब उन्होंने लिखा- कोई है? कोई है ? कोई है? जिसकी जिन्दगी दूध की धोई है।
संस्था के रूप में राष्ट्रव्यापी आज कुछ राजनीतिक दल हैं जिनकी आवाज उनके सदस्यों के लिए बाध्यकारी हो सकती है, किंतु सीपीएम को छोड़ कर कोई भी अन्य दल सामाजिक कुरीतियों को पार्टी अनुशासन का दोषी नहीं मानती। अधिकांश राजनीतिक दलों के सदस्य कुरीतियों से घिरे होते हुए भी उस दल के सदस्य रह सकते हैं। दहेज शादी से जुड़ी कुरीतियों का एक हिस्सा बन गया है और इसके कारण भी समाज में बहुत सारी बुराइयाँ पैदा होती हैं। धन संग्रह की वृत्तियों को बढाने में इसका बहुत बड़ा हाथ है और प्रशासनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार का कारण बनता है। इसके कारण ही लड़की के जन्म को बुरा माना जाता है और भ्रूण हत्या से लेकर बाल विवाह और बहू दहन के पीछे भी इसी का हाथ होता है। लड़कियों में हीनता बोध और कुपोषण आदि के पीछे भी इसकी भूमिका है और यही हमारे समाज में नारी को दोयम दर्जे का नागरिक माने जाने का एक कारण बनता है।
जनता के लिए बड़े बड़े वादे करने वाले राजनीतिक दल यदि अपने सदस्यों को सदस्य बनाते समय सामाजिक सुधारों की कुछ शर्तें अनिवार्य कर दें एक बहुत बड़ी आबादी सामाजिक बुराइयों से दूर हो सकेगी। राजनीतिक दलों को यह समझना पड़ेगा कि सभी दल सत्ता में नहीं आ सकते और ना ही सत्तारूढ दलों के सभी सदस्य मंत्री, सांसद, या विधायक या पंचायती राज नगर निगमों के पदाधिकारी बन सकते हैं, किंतु उन्हें बिना पद पाये हुए भी समाज के लिए कुछ तो करना पड़ेगा अन्यथा वे फिर कभी भी सत्ता में नहीं आ सकेंगे। आज जब भ्रष्टाचार के खुलासों के कारण पूरा देश आन्दोलित है और सुप्रीम कोर्ट को अपने क्षेत्र से बाहर निर्देश देने को विवश होना पड़ रहा है, तब यह सही समय है जब राजनीतिक दल एक साझी आचार संहिता लागू करें और सामाजिक कुरीतियों को अपनाने वाले व्यक्तियों को सदस्यता देने से इंकार कर दें।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629