शिव सेना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शिव सेना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, सितंबर 15, 2020

षड़यंत्रकारी राजनीति के मुकाबले आक्रामक राजनीति

 

षड़यंत्रकारी राजनीति के मुकाबले आक्रामक राजनीति 


वीरेन्द्र जैन

इस समय पूरा देश कुछ मीडिया चैनलों द्वारा प्रस्तुत राजनैतिक दंगल देख रहा है। पिछले तीस सालों में ऐसे दृश्य देखने को नहीं मिले थे जैसे इन दिनों देखे जा रहे हैं।

आजादी मिलने पर स्वतंत्रता आन्दोलन की सबसे बड़ी अहिंसक फौज के रूप में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस देशवासियों के सामने थी और उसे सरकार बनाने का पूरा नैतिक अधिकार था। दूसरे सबसे बड़े दल के रूप में कम्युनिष्ट पार्टी थी जो रूस चीन से लेकर पूरी दुनिया में चर्चित हो रहे कम्युनिष्ट आन्दोलनों की प्रतिनिधि के रूप में स्वाभाविक विपक्ष थी। इसी दौरान देश ने बंटवारे, साम्प्रदायिक हिंसा और गाँधीजी की हत्या के रूप में बड़े बड़े हादसे देख लिये थे। गाँधीजी की हत्या के बाद अपने ऊपर लगे प्रतिबन्ध को हटवाने के लिए आर एस एस ने पटेल को लिखित वादा किया था कि वे सामाजिक संगठन के रूप में ही काम करेंगे और चुनावों में भाग नहीं लेंगे। बाद में सरदार पटेल के निधन के बाद संघ ने अपने चार स्वयंसेवक भेज कर श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में भारतीय जनसंघ की स्थापना करायी थी। संघ से भेजे गये लोगों में अटल बिहारी बाजपेयी और लालकृष्ण अडवाणी प्रमुख थे। 1951 से 1971 तक  इस दल को 3% से लेकर 6% तक वोट मिलते रहे जबकि 1977 में इन्होंने अपनी पार्टी का विलय जनता पार्टी में कर दिया और सरकार बनने पर कहीं अधिक प्रतिशत में सत्ता में भागीदारी प्राप्त की। बाद में 1980 में इन्हीं के पूरे मन से विलय न करने व इनकी समानांतर रूप से संघ की सदस्यता बनाये रखने के आरोपों के कारण ही पहली बार बनी गैरकांग्रेसी जनता पार्टी सरकार टूटी और इन्हें जैसे गये थे वैसे ही वापिस होना पड़ा। बाद में इन्होंने ही दल का नाम बदल कर भारतीय जनता पार्टी रख लिया, जिसके कार्यक्रम और घोषणापत्र वही रहे जो जनसंघ के थे। उस समय से ही यह स्पष्ट हो गया था कि यह संगठन सत्ता पाने के लिए कुछ भी कर सकता है। ये लोग ही देश में दलबदल को प्रोत्साहित करने वालों और धन के सहारे वोट प्राप्त करने वालों की दुष्प्रवृत्ति के जन्मदाता के रूप में अंकित हुये हैं, जो बाद में दूसरे दलों में भी फैली। ये पार्टी व्यापारियों, उद्योगपतियों के पक्ष में खड़ी होने वाली पार्टी के रूप में जानी जाती थी इसलिए उसे धन की कमी कभी नहीं रही। बाद में तो राज छिन जाने से नाराज पूर्व राजा रानियों का भी समर्थन उसे मिलने लगा क्योंकि 1969 में कम्युनिष्टों के दबाव में इन्दिरा गाँधी ने पूर्व राजा रानियों के विशेष अधिकार व प्रिवी पर्स को खत्म कर दिया था।

साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिकता फैलाना दो अलग अलग बातें हैं। साम्प्रदायिकता तो अपने परम्परागत धर्म को सर्वश्रेष्ठ और दूसरे के धर्म को गलत मानने के भाव के कारण पैदा हो जाती है किंतु इसी भाव में जानबूझ कर गलत बातें डालकर या सूत्रों की गलत व्याख्या कर के, अपने निहित स्वार्थों के लिए साम्प्रदायिकता फैलायी जाती है और हिंसा के लिए संसाधन उपलब्ध कराये जाते हैं। संघ परिवार का यह विश्वास रहा है कि लोकतंत्र में चुनाव सिर गिनने से होते हैं और अगर चुनावों को धार्मिक आधार पर समाज को बांट कर कराये जायेंगे तो बहुसंख्यक धर्मावलम्बी ही चुनाव जीतेंगे। इसलिए देश की सत्ता पर अधिकार करने के लिए यह संस्था एक ओर तो राजतंत्र के इतिहास की गलत जानकारी व उसे अपने लक्ष्य के अनुसार व्याख्यायित करने का काम करती है, वहीं दूसरी ओर उन मुद्दों को तलाशती है जिनके आधार पर दो समाजों के बीच संघर्ष हो चुका हो या होने की सम्भावना हो। इसलिए समाजों के बीच समरसता और धर्मनिरपेक्षता की बात करने वालों को भी ये बराबर के दुश्मन मानते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जगायी गयी राष्ट्रभक्ति की भावना को भी ये एक काल्पनिक हिन्दूराष्ट्र से जोड़ कर इसका विदोहन करने का प्रयास करते हैं। वे ऊपर से शरीफ दिखते हैं और प्राकृतिक व निजी आपदाओं के समय अपने संगठन से साम्प्रदायिक आधार पर मदद करके अपना विस्तार करते हैं। देश के सबसे बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक मुसलमान हैं जिनके खिलाफ होकर इनको अपना लक्ष्य आसानी से मिल जाता है क्योंकि वे सातसौ साल तक इस देश के शासक वर्ग में रहे हैं और उनके सत्ता संघर्ष को साम्प्रदायिक रूप देकर इन्हें आसानी से अपने संघर्ष की जगह मिल जाती है। मुसलमानों के कुछ नेताओं ने धर्म के आधार पर देश को विभाजित करा के इन्हें एक मजबूत आधार दे दिया है, जबकि पाकिस्तान से अधिक मुसलमान तो धर्म निरपेक्ष भारत में रह गये थे।

भारत में रह गये मुसलमान इनकी हरकतें देख कर रक्षात्मक रूप से साम्प्रदायिक होते गये और इसी आधार पर एकजुट हो उन्हें वोट करने लगे जो भाजपा को हरा रहा होता था। बिना राजनीतिक कर्म किये सत्तारूढ होती रही कांग्रेस के लिए ये एकजुट मुसलमान बड़ी पूंजी साबित हुये। दलितों के वोट बैंक से मिलकर कांग्रेस ने दशकों तक निर्बाध शासन किया जबकि संघ परिवार बिना शोर शराबे के अपना काम करता रहा व इतिहास एवं समाज को विकृत करता रहा।

किसी राजतंत्र की तरह अपना विशेष अधिकार समझने वाले काँग्रेसी सत्ताखोर होते गये। उन्होंने सत्ता के सहारे न केवल धन संचय किया अपितु चुनावी मुकाबलों में भाजपा के साथ धन के प्रयोग की प्रतियोगिता भी करने लगे। एक ओर सरकारें जनता से धन खींचती थीं तो दूसरी ओर ये सत्ताखोर सरकारी व्यवस्था में सेंधें लगा कर उस धन को चूसते रहते थे। क्रमशः वे विलासी होते गये, उन की सम्पत्ति बेतहाशा बढती रही और  रिश्तेदार लाभ के पदों को सुशोभित करते रहे। सुरक्षित वोटों के भरोसे कांग्रेसियों ने राजनीतिक विमर्श ही बन्द कर दिया। उनकी राजनीति अपने नेता के जयकारे तक सीमित हो गयी।

बाद में जब 1969 में श्रीमती गाँधी ने काँग्रेस में विभाजन का सामना किया और उन्हें बहुमत के लिए कम्युनिष्टों की जरूरत पढी तो दबाव में उन्होंने पूर्व राजाओं के प्रिवी पर्स और विशेष अधिकार बन्द कर दिये व 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इससे मिले व्यापक समर्थन के कारण उन्होंने कुछ लोकप्रिय नारे दिये और भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी की मदद से अपनी छवि निखारी। इससे दक्षिणपंथी विपक्ष एकदम से हमलावर हो गया। परिणामस्वरूप इमरजैंसी व संजय गाँधी के उभरने जैसे संकट सामने आये। संजय गाँधी ने इमरजैंसी में भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी को दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका तब उन्हें अपनी भूल समझ में आयी, जिसे उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्वीकार की और वाममोर्चे के हिस्से बने। काँग्रेस पहली बार केन्द्रीय सत्ता से बाहर हुयी पर 1980 में जनता ने जनता पार्टी के प्रयोग को ठुकरा दिया जिससे इन्दिरा गाँधी दोबारा सत्ता में आ गयीं। संजय गाँधी का एक दुर्घटना में निधन हुआ। दलितों ने अपनी अलग पार्टी बना ली और इमरजैंसी की ज्याद्तियों के कारण मुसलमान सशंकित हो गये थे, सीपीआई उससे अलग हो चुकी थी, ऐसे में अलगाववादी खालिस्तानी आन्दोलन हिंसक हो उठा। कांग्रेसजन, जो सत्ता में लूट को ही राजनीति मानने लगा था मुकाबला करने में असमर्थ साबित हुआ। कमजोर इन्दिरा गाँधी ने स्वर्ण मन्दिर में छुपे आतंकियों पर हमला करने का दुस्साहसिक फैसला लियी जिसके परिणाम स्वरूप मिले एक धोखे में उन्हें अपनी जान गंवाना पड़ी। उसके बाद सहानिभूति की लहर में काँग्रेस ने सीटें तो जीत लीं, किन्तु अपेक्षाकृत अनुभवहीन राजीव गाँधी को उनकी प्रकृति और रुचि के विरुद्ध प्रधानमंत्री पद सौंपना पड़ा। नेतृत्व की कमजोरी से नियंत्रण ढीला पड़ता रहा, क्षेत्रीय दल मजबूत होते गये। मौका देख कर उनके वित्तमंत्री व्हीपी सिंह ने टंगड़ी मार दी, बोफोर्स कांड का वबंडर खड़ा कर दिया गया। लिट्टे भारत के ही खिलाफ उठ कर खड़ा हो गया। शाहबानो के फैसले के खिलाफ एकजुट हुये मुसलमानों ने ब्लैकमेल कर फैसले को पलटने को मजबूर कर दिया। सरकार पलट गयी और कमजोर हो चुकी काँग्रेस का एक हिस्सा व्हीपी सिंह के साथ हो लिया क्योंकि उसे तो सत्ता चाहिए थी। मध्यावधि चुनाव हुये और इसी दौरान राजीव गाँधी की हत्या हो गयी। काँग्रेस नेतृत्व विहीन हो गयी शेष बचे काँग्रेसी दूसरे को नेता मानने के लिए तैयार नहीं थे।  सब को केक में से दूसरे से बड़ा हिस्सा चाहिए था।

यह वही समय था जब भाजपा ने मौका ताड़ लिया। वैसे तो उसके पास काँग्रेस की नीतियों से अलग कोई आकर्षक और बेहतर नीतियां थी ही नहीं सो उसने साम्प्रदायिकता का सहारा लियी और उसके लिए रामजन्म भूमि मन्दिर का भूमिगत मुद्दा उछाल दिया जगह जगह दंगे करा दिये, अडवाणी जी को एक डीसीएम टोयटा वाहन को रथ का रूप देकर घुमाना शुरू किया और योजनानुसार मुस्लिम बहुल इलाकों में उत्तेजक नारे लगवाते हुये खून खराबा करते गये। उसी समय से मीडिया की खरीद शुरू हो गयी और मनमुताबिक रिपोर्टें सामने आती रहीं। पूरा देश ही ध्रुवीकृत हो गया होता अगर व्हीपी सिंह समय से मंडल कमीशन का दांव नहीं खेल देते। केवल राम जन्मभूमि मुद्दे, व्यापारियों के धन, और संघ के संगठन के सहारे उन्होंने दो से दो सौ तक का सफर किया और अंततः अटलबिहारी की सरकार बनवा ही ली। असत्य, अर्धसत्य, तोड़ेमोड़े सत्य से सफेद झूठ तक व सिद्धांतहीन गठबन्धन से लेकर सांसदों, विधायकों की खरीद फरोख्त से लगातार सत्ता से जुड़े रहे। अपने खरीदे हुये मीडिया से वे अपने सारे खोटे सिक्के चलाते रहे। इस बीच काँग्रेस निरीह सी देखती रही उसने इनके किसी भी खतरनाक प्रयोग का विरोध नहीं किया अपितु छींका टूटने की प्रतीक्षा में टकटकी लगाये रही। जब छींका टूट गया तो जय जय बरना अघाये आलसी की तरह चुपचाप लेटे रहे अथवा आफर मिला तो दल बदल लिया। वह कैंसर के मरीज की तरह धीरे धीरे घुलती रही। बीच में जो मौके आये उसमें किसी काँग्रेसी के किसी प्रयास का कोई योगदान नहीं रहा। यूपीए की दो सरकारें बनने में भाजपा के प्रति जनता की नफरत का ही नकारात्मक योगदान रहा। किंतु भाजपा केन्द्र की मुख्यधारा की राजनीति में आ चुकी थी। यूपीए सरकारों के दौरान भी राजनीतिक एजेंडा उसी ने तय किया। 

इन दिनों महाराष्ट्र में घटित घटनाक्रम इतना ही है कि भाजपा ने जिस शिवसेना नामक शेर पर इतने लम्बे समय से सवारी की थी वही पलट कर सामने आ गया। अब ना तो इन्हें निगलते बन रहा था ना ही उगलते। सुशांत सिंह की मौत के मामले में इन्होंने एक षड़यंत्र के सहारे मुम्बई पुलिस और ठाकरे सरकार को कटघरे में खड़ा किया व सीबीआई और ईडी के साथ साथ एनसीबी को भी लगा दिया। पहले दो में मुँह की खायी तो तीसरी जाँच एजेंसी को मुख्य जाँच एजेंसी की तरह बीच में ले आया गया, जिसमे अपराध तो था किंतु देश भर में चलते रहने वाला अपराध था। उसके सहारे किसी विशेष राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। इस अपराध में इससे पहले कितने लोगों को सजा हुयी? जबकि छापों में जो माल बरामद होता है उसके आधार पर ना जाने कितने लाख लोग उसका सेवन करते होंगे। इसी काम में चर्चित होने को उतावली एक हीरोइन और एक टीवी एंकर को भी लगा दिया गया। वे सोच रहे थे कि लुंज पुंज जर्जर काँग्रेस की तरह शिवसेना पूंछ दबा कर बैठ जायेगी। किंतु उनकी सोच गलत निकली। उसने भले ही राजतंत्र के तानाशाहों की तरह व्यवहार किया किंतु देखना होगा कि दुश्मन कौन था व उसका इतिहास और चरित्र क्या रहा है। ये जैसे को तैसा का सन्देश किसी हीरोइन को नहीं अपितु एक षड़यंत्रकारी पार्टी को दिया गया है।

यह भूलने की बात नहीं है कि भाजपा परिवार के सारे प्रयोग लुंज पुंज काँग्रेस के काल में ही पलते रहे हैं जो ठीक तरह रक्षात्मक भी नहीं हुयी। यदि 1995 में तत्कालीन सरकार ने और कांग्रेस पार्टी ने गणेशजी की मूर्तियों को दूध पिलाने की ही ठीक से जाँच करा के कार्यवाही की होती तो अफवाहें फैलाने के षड़यंत्रों की इतना प्रसार न हो पाता। काँग्रेस ज़िन्दा तभी बच सकती है जब वह आक्रामक होकर काम करेगी। इसके लिए काँग्रेसियों को अपना चरित्र बदलना होगा। शिवसेना ने वही किया है।

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023      

मंगलवार, नवंबर 04, 2014

शिवसेना का संकुचन ; कभी मुँहफट होना उनका गुण था



शिवसेना का संकुचन ; कभी मुँहफट होना उनका गुण था
वीरेन्द्र जैन

                एक गुर्राता हुआ शेर शिवसेना का प्रतीक था जो बाला साहब ठाकरे के बयानों और कामों से साम्य रखता था किंतु पिछले दिनों घटे घटनाक्रम को देखते हुए अपने दिन गिनता हुआ यही शेर अब शिवसेना के साथ एक व्यंगचित्र की तरह नज़र आने लगा है।
                बाला साहब ठाकरे ने अपना कैरियर एक कार्टूनिस्ट के रूप में प्रारम्भ किया था और दूसरों की गलतियों और दोहरे चरित्रों को उजागर करने का साहस उनमें था। जैसे जैसे उन्होंने राजनेता के रूप में अपना चरित्र विकसित किया यही गुण उनके लेखन और बयानों में दिखने लगा। वे इस मामले में किसी का भी लिहाज नहीं करते थे। अपने मन की बात कहने के लिए उन्होंने कभी भी लाभ-हानि की परवाह नहीं की। वे यह जानते हुए भी कि उनके बहुत सारे काम हमारे राष्ट्रीय आदर्शों से मेल नहीं खाते व इसके लिए उन्हें अपने साथियों और विरोधियों की आलोचना पड़ेगी, वे उन्हें करने में हिचकते नहीं थे। बहुत सारे लोगों को उनका यह दुस्साहस पसन्द आता था। उनकी पार्टी एक छोटी सी क्षेत्रीय पार्टी थी जो बाद में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए का हिस्सा बनी, पर उन्होंने कभी भी खुद को भाजपा का छोटा भाई नहीं बनाया, और जहाँ भी जरूरत समझी वहाँ उनकी खुल कर चुभने वाले शब्दों में आलोचना की।
       उल्लेखनीय है कि एक बार भाजपा उत्तरप्रदेश विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी किंतु उनकी सरकार बिना किसी दूसरी पार्टी की मदद के नहीं बन सकती थी इसलिए उन्होंने बहुजन समाज पार्टी से समझौता किया। बहुजन समाज पार्टी ने इसके लिए शर्त रखी कि दोनों दल क्रमशः सरकार बनायेंगे और उनसे कम सीटें जीतने वाली बहुजन समाज पार्टी की सरकार पहले बनेगी। सत्ता के लिए किसी भी तरह का समझौता करने वाली भाजपा ने यह शर्त मान ली पर यह अवधि छह-छह महीने शासन की रखी। यह एक अभूतपूर्व हास्यास्पद समझौता था जिस पर व्यंग करते हुए बाला साहब ठाकरे ने कहा था कि भाई ये छह छह महीने का समझौता क्या होता है! अरे अगर कुछ पैदा ही करना था तो कम से कम नौ नौ महीने का समझौता करना था।  
       अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते हुए जब राष्ट्रपति मुशर्रफ भारत आये थे और आगरा में द्विपक्षीय वार्ता हुयी थी तब तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज का उन्हें आदाब करता हुआ एक चित्र समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ था जिस पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा था कि ये मुजरा करने वाली मुद्रा में मियाँ मुशर्रफ के आगे झुकने की क्या जरूरत थी? प्रमोद महाजन के संचार मंत्री रहते हुए उन्होंने अपने पिता पर डाक टिकिट जारी करवा लिया। इसी तरह श्रीमती प्रतिभा पाटिल के राष्ट्रपति की उम्मीदवारी के समय उन्होंने भाजपा के उम्मीदवार की जगह काँग्रेस के उम्मीदवार का समर्थन किया था। उल्लेखनीय है कि वे शरद पवार को आलू का बोरा कहा करते थे। दिलीप कुमार उनके हमप्याला मित्र रहे तो अमिताभ बच्चन को उनका स्नेह हमेशा मिला, पर समय समय पर ये लोग भी उनकी समीक्षा से बच नहीं सके। बहुत सारी फिल्में उनके विरोध के कारण नहीं बन सकीं व कई अच्छे कलाकारों को उनके विरोध के कारण फिल्म इंडस्ट्री में काम मिलना बन्द हो गया था। श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट में वे मुम्बई की साम्प्रदायिक घटनाओं के लिए दोषी ठहराये गये थे तो बाबरी मस्ज़िद ध्वंस के समय भाजपा के लीपापोती वाले रुख से अलग उन्होंने चारों ओर से हो रही आलोचना के बीच कहा था कि इस काम के लिए उन्हें शिव सैनिकों पर गर्व है। पाकिस्तान की टीम के भारत में खेलने के विरुद्ध वे क्रिकेट मैदान की पिच खुदवा सकते थे और गुलाम अली का प्रोग्राम स्थगित करा सकते थे तहा दूसरी ओर माइकिल जैक्शन का स्वागत कर सकते थे। मीडिया के अनेक लोगों और मीडिया कार्यालयों पर शिवसैनिकों ने हमले किये जिसके लिए उन्होंने कभी खेद व्यक्त नहीं किया। वे अपने विरोधियों और सरकार दोनों पर ही अपनी मनमानी थोपते रहते थे। शायद यही निर्भीकता उनके स्थानीय क्षेत्रीयतावादी समर्थकों को बहुत भाती भी थी, और ऐसा लगता था कि बहुत सारे काम वे इसी पसन्दगी को बनाये रखने के लिए करते भी थे।
       पिछले दो दशकों से शिवसेना का जो क्षरण शुरू हुआ वह बाला साहब के निधन के बाद तेज हो गया जिसे न समझ पाने के कारण काँग्रेस एनसीपी सरकार की एंटी इनकम्बेंसी का लाभ भाजपा ने उठा लिया व शिवसेना से समझौता किये बिना ही वह विधानसभा चुनाव में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। शिवसेना से विद्रोह करके पिछड़े वर्ग के नेता छगन भुजबल बाहर निकले थे, बाद में तो नारायण राणे भी बाहर आ गये। विरासत के सवाल पर उनके भतीजे राज ठाकरे ने भी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बना ली और पुत्र मोह से ग्रस्त उम्रदराज होते बाला साहब कमजोर पड़ते गये, पर उनके वचनों में अंतर नहीं आया। उद्धव ठाकरे के अस्वस्थ होने पर उन्होंने राज ठाकरे से मार्मिक अपील करते हुए पुकार लगायी कि उद्धव को तुम्हारी जरूरत है। इस अपील पर राज ठाकरे उन्हें देखने तो आये पर उन्हें अपना नेता स्वीकार नहीं कर सके। उनकी बहू के काँग्रेस की ओर झुकाव की खबरें आयीं तो उनकी पौत्री के अंतर्धार्मिक विवाह की खबरें भी उनकी कमजोरी की प्रतीक की तरह देखी गयीं। प्रमोद महाजन और गोपीनाथ मुंडे के असामायिक निधन से भाजपा शिवसेना को जोड़े रखने वाली कड़ी क्रमशः कमजोर होती गयी।    
       इतना सब होने पर भी उद्धव ठाकरे बाला साहब की पुरानी ठसक से भरे रहे और लोकसभा चुनाव में मोदी फैक्टर के सहारे मिली जीत को उन्होंने अपनी जीत समझा। एनडीए की जीत में पाँच प्रतिशत हिस्सेदारी के बाद भी जब केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में कुल एक स्थान मिला तो यह उनके लिए संकेतक था। भाजपा के खिलाफ उन्होंने बाला साहब के पुराने अन्दाज़ में मोर्चा खोलना चाहा और शाल साड़ी डिप्लोमेसी की आलोचना कर डाली जिसके विरोध में मोदी को कठोर सन्देश भिजवाना पड़ा था कि इस मामले में उनकी माँ को न घसीटा जाये। यह वही समय था जब अपने सहयोगियों द्वारा विरोध के प्रति कठोर मोदी ने शिवसेना के पर कतरने का फैसला कर लिया। इसी बीच शिवसेना के संसद राजन विचारे ने महाराष्ट्र सदन में एक रोजेदार के मुँह में रोटी ठूंसने की घटना की जो चहुँ ओर निन्दित हुयी पर भाजपा ने अपने एनडीए के साथी का बचाव नहीं किया। शिव सैनिकों द्वारा टोल न चुकाने और माँगने पर तोड़फोड़ की जाती रही जिसे बाद में राज ठाकरे ने भी अपना लिया था।
       किंतु मोदी उद्धव ठाकरे और बाला साहब के अंतर को जानते थे और उद्धव की गलतफहमियों को दूर करना चाहते थे इसलिए उन्होंने विधानसभा चुनावों में शिव सेना की शर्तों को मानने से साफ इंकार कर दिया। न तो मुख्यमंत्री का पद देना जरूरी समझा और ना ही उनके द्वारा मांगी गयी सीटें ही उन्हें दीं। उद्धव ने भाजपा से कहा कि वह हवा में तलबारबाजी न करे व ज़मीन पर पैर रखे। गठबन्धन रहे या न रहे पर मुख्यमंत्री शिवसेना का ही होगा। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा ने राजनीतिक फायदे के लिए हिन्दुत्व का स्तेमाल किया। उन्हें अफज़ल खान बताते हुए यह भी कहा कि जो भी महाराष्ट्र को जीतने आये वे यहीं दफन हो गये। गठबन्धन टूटने के बाद भी शिवसेना के मंत्री अनंत गीते ने मोदी मंत्रिमण्डल से स्तीफा नहीं दिया। बयानों में कटु होते हुए बात नरेन्द्र मोदी के पिता तक भी पहुँची तो नफरत गहरी होती गयी पर कूटनीतिक भाजपा ने संयम बनाये रखा। शिवसेना ने भाजपा समर्थक दलित नेता रामदास अठावले को जोकर भी कहा और उन्हें शोषित जातियों के प्रति धोखा देने वाला भी बताया।
       इतना सब होने के बाद भी शिवसेना का भाजपा के साथ फिर से पींगें बढाना खतरनाक है क्योंकि जो लोग मोदी को जानते हैं वे बताते हैं कि मोदी न तो कभी माफी माँगते हैं और न करते हैं। मोदी दोस्ती या विरोध दोनों ही तरीकों से शिवसेना को मिटा कर भाजपा में समाहित कर लेंगे। वचनों में बाला साहब की तरह कठोर होना उद्धव वहन नहीं कर सकते। एनडीए के सारे ही दल क्रमशः टूटने की दशा में पहुँचा दिये गये हैं।
वीरेन्द्र जैन                                                                           
2 /1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल म.प्र. [462023]
मोबाइल 9425674629
    

सोमवार, नवंबर 19, 2012

दिवंगत बाला साहेब ठाकरे- जिन्होंने हमेशा भाजपा पर अंकुश रखा


दिवंगत बाला साहब ठाकरे -जिन्होंने हमेशा भाजपा पर अंकुश रखा
वीरेन्द्र जैन
       बाला साहब ठाकरे ने हिन्दुत्व और मराठी जातीयता की राजनीति को आधार बनाया था, व इस के आधार पर उन्होंने जो संगठन खड़ा किया था उससे देश की आर्थिक राजधानी में व्यापार कर रहे कुबेरों की नस दबाने में सफल रहे थे। जिस दौरान मुम्बई में जो बड़े स्मगलर और माफिया गिरोह थे उनके सरगना कुछ मुस्लिम थे इसलिए उन्होंने अपना संगठन बनाने के लिए हिन्दुत्व का सहारा लिया तथा कुछ साउथ इंडियन थे जिनसे टकराने के लिए उन्होंने महाराष्ट्र में मराठी का नारा उछाला। उनके काम से सुरक्षा पाने वाले धनपतियों ने उन्हें धन और साधन दोनों ही उपलब्ध कराये तथा इस तरह अर्जित धन को उन्होंने संगठन के लिए खर्च किया और पूरी मुम्बई में जगह जगह शिवसेना के स्थानीय कार्यालय बनाये जहाँ एक भयानक शेर के चित्र के नीचे कैरम व शतरंज खेलते हुए बाहुबली युवा देखे जा सकते थे। ये उनकी सेना थे और इसीलिए उन्होंने अपने संगठन का नाम शिवसेना रखा जो लगभग भारतीय पुलिस और न्याय व्यवस्था के समानांतर कार्यरत रही। प्रारम्भ में उन्होंने युवाओं को खर्च दिया पर बाद में अपनी संगठन की दम पर ये स्थानीय कार्यालय आत्म निर्भर होते गये थे। क्षेत्र में प्रत्येक अवैध काम करने वालों को इन संगठनों को वैसे ही हफ्ता देना पड़ता था जैसे कि पूरे देश की पुलिस वसूल करती है। बड़े स्तर पर व्यवसाय करने वालों को भी अपनी सुरक्षा के नाम पर मोटी रकम चुकानी पड़ती थी। क्रमशः उनकी संगठन क्षमता बढती गयी और देश के सबसे महत्वपूर्ण नगर निगम पर अधिकार करने से प्रारम्भ कर उन्होंने प्रदेश की राजनीति में अपने पैर फैला लिये, तथा भाजपा के साथ मिलकर एक बार प्रदेश में सरकार भी बनायी। गठबन्धन की राजनीति में क्षेत्रीय दलों की पूछ परख बढ जाने से राष्ट्रीय राजनीति में भी दखल देने लगे थे।
       महाराष्ट्र की राजनीति में अपना स्थान बना कर बाला साहब ठाकरे ने राष्ट्रीय दल भाजपा की राजनीति को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया क्योंकि उन्होंने जो साम्प्रदायिक आधार लिया था उसी पर भाजपा काम करती है और इस तरह वे महाराष्ट्र में भाजपा के प्रतियोगी रहे। दूसरी ओर उन्होंने भाजपा के साथ जब भी गठबन्धन किया तब अपनी शर्तों पर किया, और बड़ा हिस्सा अपने लिए सुरक्षित रखा। जल्दी से जल्दी सत्ता हथियाने के लालच में भाजपा ने स्वाभिमान बेच कर देश भर में जो समझौते किये हैं उनमें बाला साहब के साथ किये गये समझौतों में सबसे अधिक नीचा देखना पड़ा है। इसका कारण यह था कि शिवसेना की कार्यनीति और दल का आधार उन्हें महाराष्ट्र से बाहर के सपने नहीं देखने देता था, और महाराष्ट्र में उन्होंने इतना बड़ा संगठन खड़ा कर लिया था कि भाजपा को उनके साथ समझौता करने को मजबूर होना पड़ता था। दूसरी ओर बाला साहब की कोई मजबूरी नहीं होती थी कि वे झुक कर समझौता करें। उनका सिद्धांत था कि -
दोस्ती हो तो मेरे तौर पै हो
बरना ये मेहरबानी किसी और पै हो
       उल्लेखनीय है कि भाजपा ने अपनी सत्ता लोलुपता में उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबन्धन किया। यहाँ पर भी उनके गठबन्धन साथी को उस समय सत्ता में आने की बहुत जल्दी नहीं थी तथा वे भी झुकना नहीं चाहते थे इसलिए बसपा से अधिक विधायक होने के बाद भी भाजपा ने छह छह महीने मुख्यमंत्री बनने का बेहद हास्यास्पद समझौता किया। भाजपा बड़ी और राष्ट्रीय पार्टी थी फिर भी पहला मुख्यमंत्री बनने की शर्त बहुजन समाज पार्टी की मानने को मजबूर हुए। उस समय पहली बार मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और धर्म बहिन बनीं थी तथा वह जातिवाद पर आधारित बहुजन समाज पार्टी की नेतृत्व वाली पहली सरकार थी जो भाजपा की मदद से बनी थी। इस पर भाजपा का मजाक उड़ाते हुए कार्टूनिस्ट रहे बाला साहब ठाकरे ने कहा था कि यह छह छह महीने की सरकार क्या होती है? अगर कुछ पैदा ही करना था तो कम से कम नौ नौ महीने की सरकार तो बनाते।  उनके इस बयान के बाद से भाजपा की बहुत ही छीछालेदर हुयी थी और बाद में तो मायावती ने छह महीने बाद भी स्तीफा देने से इंकार कर दिया था। पाकिस्तान के प्रति अपनी नफरत का मुखर प्रदर्शन करने वाले बाला साहब ने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति मुशर्रफ की भारत यात्रा के दौरान सुषमा स्वराज का उनको आदाब करते हुए चित्र के प्रकाशन पर कहा था कि यह मुद्रा तो मुजरे की मुद्रा है तथा सुषमा जी को इसकी क्या जरूरत पड़ गयी थी। वे अपने मित्र शरद पवार को भी आलू का बोरा कहा करते थे।
       पिछले राष्ट्रपति चुनाव के दौरान उन्होंने अपने बड़े गठबन्धन पार्टनर भाजपा के उम्मीदवार के खिलाफ कांग्रेस की उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल का खुला समर्थन किया था जिसे उनकी मराठी राजनीति की मजबूरी बताया गया था किंतु इस चुनाव के दौरान भी उन्होंने कांग्रेसी उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी का समर्थन करके यह बता दिया था कि वे भाजपा के पिछ्लग्गू नहीं हैं। महाराष्ट्र में जहाँ संघ का मुख्यालय है, भाजपा की बड़त को रोक कर उन्होंने देश को भाजपा की जकड़ में आने से बहुत हद तक रोके रखा है। उनकी विचारधारा और कार्य प्रणाली से बहुत से लोगों को असहमतियां रही हैं पर कभी विषस्य विष औषधिम की तरह उनके अंकुश के परिणाम सकारात्मक भी रहे हैं। अटल बिहारी की सरकार को तो उन्होंने इतना मजबूर कर रखा था कि अपने पिता के नाम पर भी डाक टिकिट जारी करवा लिया था। आज जहाँ जहाँ भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली राज्य सरकारें हैं वहाँ की मानव अधिकारों के दमन की खबरें रोंगटे खड़े कर देती हैं, तब ऐसा लगता है कि अगर कोई सार्थक विरोध पैदा नहीं हो पा रहा हो तो कम से कम कोई प्रतियोगी ही पैदा हो जाये जो इन निरंकुश सरकारों पर लगाम लगा सके। बाला साहब के सारे दबावों के बाद भी भाजपा कभी उनके खिलाफ मुँह खोलने की हिम्मत नहीं जुटा सकी, उनके निधन से भाजपा पर लगाम लगाये रखने वाला एक महत्वपूर्ण सवार नहीं रहा है। दुखद यह है कि उनकी विरासत जिन लोगों के हाथों में जाने वाली है उनकी रीड़ मजबूत नजर नहीं आती।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629