शुक्रवार, अप्रैल 08, 2011

आज के समय में विश्वसनीयता

आज के समय में विश्वसनीयता
वीरेन्द्र जैन
आज मेरे एक मित्र ने मुझे फोन करके बताया कि उन्होंने जब एक सुपरिचित भ्रष्ट व्यक्ति को अन्ना के समर्थन अनशन करते देखा तो आश्चर्य से पूछा- आप भी.......? उत्तर के लिए वे मुझे एकांत में ले गये और बोले कि तुम्हें पता है कि नवरात्रि को तो मैं वैसे ही प्रतिवर्ष पूरे नौ दिन उपवास करता हूं सो सोचा के एक पंथ दो काज हो जायेंगे इसलिए आगे बढ कर बैठ गया। इतना बताने के बाद उस मित्र ने मुझ से पूछा कि अनशन की यह तारीख तय करने में आयोजकों की दृष्टि भी कहीं नवरात्रि वाली तो नहीं थी!
उसकी बात का उत्तर तो मेरे पास नहीं था किंतु आज की पाखण्डी राजनीति ने लोगों को कितना शंकालु बना दिया है कि वे हर बात में सन्देह करने लगे हैं। और हों भी क्यों न, जब भाजपा नेताओं और अमेरिका के दूतावास के लोगों की बातचीत का जो खुलासा विक्कीलीक्स ने किया है उससे अगर लोग शंकालु होकर सारी आस्थाएं भुला दें तो क्या आश्चर्य है! आज अगर गान्धीजी भी होते तो उन को भी विश्वास का संकट झेलना पड़ता
वीरेन्द्र जैन
मो. 9425674629

बुधवार, अप्रैल 06, 2011

जनाकांक्षा का प्रतिनिधित्व किंतु जनयुद्ध की रणनीति नहीं


अन्ना हजारे का अनशन
जनाकांक्षा का प्रतिनिधित्व किंतु जनयुद्ध की रणनीति नहीं
वीरेन्द्र जैन
अन्ना हजारे ने अपने पूर्व घोषित निर्णय के अनुसार जन लोकपाल विधेयक लाने हेतु सरकार पर दबाव बनाने और जन समर्थन को जुटाने के लिए गत 5 अप्रैल से दिल्ली के जंतर मंतर पर आमरण अनशन शुरू कर दिया। उनके बैनरों पर लिख हुआ है- भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनयुद्ध- । अन्ना हजारे ने इससे पहले भी महाराष्ट्र राज्य में भ्रष्टाचार के विरोध में इस गान्धीवादी तरीके का सफल प्रयोग किया है और उस राज्य के कई मंत्रियों को उनके पद से हटने के लिए मजबूर किया है। श्री हजारे सत्ता की राजनीति नहीं करते और उनका साफ सुथरा जीवन इतिहास उनको गान्धीवाद का सच्चा प्रतिनिधि दर्शाता है। पता नहीं कि उनके अहिंसक आन्दोलन के बैनरों पर जनयुद्ध लिखवाने वाले कौन हैं और क्या चाहते हैं।
पिछले अभियानों के विपरीत, इस बार अन्ना हजारे का उक्त अनशन किसी व्यक्ति विशेष के भ्रष्टाचार या किसी काण्ड विशेष के खिलाफ नहीं है, अपितु यह अनशन भ्रष्टाचार के पहचाने गये आरोपियों को सजा सुनिश्चित करने के लिए है। उनकी माँगों के मुख्य बिन्दु हैं –
1- निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार से स्वतंत्र केन्द्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन जो किसी भी मुकदमे की जाँच को एक साल में पूरी करके दो साल के अन्दर सम्बन्धित को जेल भेजना सुनिश्चित करे। इनके सदस्यों की नियुक्ति पारदर्शी तरीके से नागरिकों और संवैधानिक संस्थाओं द्वारा की जाये। वर्तमान की संस्थाएं जैसे सीवीसी, सीबीआई, भ्रष्टाचार निरोधक विभाग, आदि का विलय भी लोकपाल में कर दिया जाये।
2- अपराध सिद्ध होने पर सरकार को हुए घाटे को सम्बन्धित से वसूल किया जाये।
3- किसी सरकारी कार्यालय से अगर किसी नागरिक का काम तय समय सीमा में नहीं हो तो दोषी पर जुर्माना लगाया जाये जो पीड़ित को मुआवजे के रूप में मिले।
दरअसल अन्ना हजारे की ये माँगें ऐसी जरूर हैं जिनके पूरे होने की इच्छा आज देश के सभी नागरिकों के मन में है किंतु ये माँगें एक शुभेक्षा से अधिक कुछ भी सिद्ध नहीं होने जा रही हैं क्योंकि ये भ्रष्टाचार की जड़ पर कोई विचार नहीं करतीं अपितु हो चुके भ्रष्टाचार के पकड़ में आये अपराधियों को सजा दिलाने के लिए एक नया कानून और एक नयी संस्था के गठन से आगे नहीं जातीं। ऐसा लगता है कि वे मानते हैं कि जाँच एजेंसियों के काम करने के सुस्त तरीके और दण्ड प्रक्रिया की त्रुटियों के कारण भ्रष्टाचार हो रहा है, जबकि ऐसा नहीं है। उन्होंने महाराष्ट्र राज्य में कतिपय मंत्रियों को पद त्याग का जो दण्ड दिलवाया क्या उससे महाराष्ट्र में मंत्री स्तर का भ्रष्टाचार रुक गया? सूचनाएं बताती हैं कि उसके बाद भी भ्रष्टाचार यथावत रहा अपितु कई मामलों में तो और बढ गया। सीबीआई जैसी जाँच एजेंसी के बारे में भी आरोप लगता है कि वो केन्द्र सरकार के हाथ का खिलोना होकर रह गयी है। परमाणु विधेयक पास होने के दौरान सदन में जो नोटों के बण्डल दिखाये जाने की शर्मनाक घटना हुयी थी उसकी जाँच के लिए संसदीय जाँच समिति बनी थी जो किसी निर्णय पर नहीं पहुँच सकी थी।
किसी भी लोकतंत्र में कानून बनाने और उन कानूनों को पालन कराने के लिए सरकार के गठन का काम जनता से चुने हुए जनप्रतिनिधि करते हैं, और जब तक जनता सही और ईमानदार प्रतिनिधि चुनने के लिए सुशिक्षित, संकल्पित और सक्षम नहीं होती तब तक न तो सही कानून बन सकते हैं और ना ही उनको पालन कराने वाली संस्थाएं ही सही काम कर सकती हैं। अदालत में वकीलों के द्वारा प्रत्येक घटना की व्याख्या अपने मुवक्किल के हितानुसार की जा सकती है, और न्यायालय एक पसंदीदा बहस के पक्ष में फैसला सुना सकता है। सबूत तो सरकार की एजेंसियाँ ही जुटाती और प्रस्तुत करती हैं तथा गवाहों को किसी भी स्तर पर अपने बयानों से मुकरने की सुविधा उपलब्ध है। लाखों मुकदमों में गवाहों ने कहा होगा कि जो बयान पुलिस ने प्रस्तुत किया है वह उसने दिया ही नहीं या पुलिस ने उससे दबाव डालकर जबरदस्ती दिलवा दिया था। रोचक यह होता है कि गवाह की बात को स्वीकार करने वाली अदालतें सम्बन्धित पुलिस अधिकारी के खिलाफ कोई आदेश पारित नहीं करतीं जिसके द्वारा ऐसा गैर कानूनी काम अगर किया गया है तो एक गम्भीर अपराध है। पिछले दिनों एक सच्ची घटना पर बनी फिल्म का नाम अदालती व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य करने वाला था। फिल्म का नाम था- नो वन किल्लड् जेसिका। देश की राजधानी में सैकड़ों सम्भ्रांत लोगों के बीच एक काम करने वाली लड़की की हत्या हो जाती है। हत्यारे के प्रभाव के कारण उपस्थित सम्भ्रांत लोग गवाही नहीं देते और जिन साधरण लोगों ने दी होती है वे बदल जाते हैं, परिणामस्वरूप अदालत किसी को भी जिम्मेवार नहीं ठहरा पाती। इसलिए फिल्मकार उसका नाम देता है, नो वन किल्ल्ड जेसिका।
हमारी अदालतों में एक नहीं अपितु किसी को भी जिम्मेवार न ठहराने वाले हजारों फैसले प्रति माह होते हैं। गुजरात में सरे आम हजारों मुसलमानों का नरसंहार कर दिया गया किंतु अदालत से किसी को भी सजा नहीं मिल सकी। मध्य प्रदेश में टीवी कैमरों के सामने हुए सव्वरवाल हत्याकाण्ड के प्रकरण में मुकदमे को प्रदेश से बाहर ले जाकर भी न्याय नहीं हो सका क्योंकि प्रकरण को प्रस्तुत करने वाले सजा दिलाना ही नहीं चाहते थे। इसलिए सवाल एक नये कानून के बनने या नई जाँच एजेंसी खड़ी करने भर का नहीं है अपितु एक जन चेतना पैदा करने और उस चेतना के लोकतांत्रिक प्रभाव को सफल बनाने का भी है। अन्ना हजारे का उक्त अभियान उस दिशा में कुछ नहीं कर रहा। सत्त्ता और विपक्ष दोनों ही अपने चुनावी मुद्दे के रूप में एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाते हैं किंतु सरकार बदलने के बाद नई सरकार पिछली सरकार के खिलाफ कुछ भी नहीं करती। पूर्व सता पक्ष जो अब विपक्ष में आ चुका होता है तत्कालीन सत्तापक्ष पर वैसे ही आरोप दुहराने लगता है। वे सत्ता में रहते हुए एक जैसे काम करते हैं। विपक्ष में बैठे हुए जो लोग भी अन्ना हजारे के पक्ष में दिखने की कोशिश कर रहे हैं वे भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए नहीं अपितु उसके नाम पर अपने लिए सत्ता का रास्ता सुगम करने के लिए ऐसा कर रहे हैं।
भ्रष्टाचार इस व्यवस्था का सहज उत्पादन है और जब तक व्यवस्था को आमूलचूल बदलने का अभियान नहीं छेड़ा जायेगा तब तक भ्रष्टाचार का कुछ नहीं बिगड़ने वाला।
अन्ना हजारे का यह अभियान भले ही वह लक्ष्य न प्राप्त कर सके जिसके लिए यह छेड़ा गया है किंतु व्यवस्था परिवर्तन के लिए होने वाले भावी आन्दोलन की पहली सीड़ी तो बन ही सकता है। इसकी असफलता यदि उत्साह को कम नहीं करे तो अगले अभियान का सूत्रपात करेगी। अभी यह जनयुद्ध नहीं है किंतु जनयुद्ध की शुरुआत ऐसे भी हो सकती है।




वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

शनिवार, अप्रैल 02, 2011

मध्यप्रदेश की दुर्दशा : अभाव से या अव्यवस्था से ?


मध्य प्रदेश की दुर्दशा: अभाव से या अव्यवस्था से?
वीरेन्द्र जैन
मध्यप्रदेश में रामभक्त होने का दावा करने वाली पार्टी की सरकार ने प्रदेश को स्वर्णिम मध्य प्रदेश बनाने की घोषणा की हुयी है। यह बात अलग है कि जिस राम कथा से वे अपने सारे मुखौटे बनाते हैं उस रामकथा में सोने की तो रावण की लंका थी। इसी कथा के अनुसार अयोध्या में तो रामराज्य आने के बाद की स्तिथि- दैहिक दैविक भौतिक तापा, राम राज्य नहिं काहुई व्यापा- वाली थी जहाँ – सब नर करें परस्पर प्रीती, चलहिं सुधर्म नेक और नीती- वाला मामला था।
आइए देखें कि इस रामभक्ति का दिखावा करने वाली सरकार में प्रदेश की दशा कैसी है, जिससे तय करें कि यहाँ राम राज्य चल रहा है या रावण राज्य चल रहा है। हाल ही में प्रकाश में आई ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2010 की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि यह प्रदेश अफ्रीकी देशों से भी ज्यादा भूखा है। पिछले वर्ष भी भारत के कुपोषित 17 प्रदेशों में मध्य प्रदेश की हालत सबसे अधिक चिंता जनक थी। इस प्रदेश ने अंतर्राष्ट्रीय नक्शे पर अपनी बदनामी को चमकाया है। इस प्रदेश में 50% बच्चे औसत से कम वजन के पैदा हो रहे हैं इनमें पाँच साल तक के 48% प्रतिशत बच्चे गम्भीर रूप से कुपोषित हैं। बचपन में ही मौत के मुँह में समा जाने वाले बच्चों में से 30% की मौत का कारण यह कुपोषण ही है। संसद में महिलाओं के लिए जितने प्रतिशत आरक्षण की माँग की गयी है वह कब पूरी होगी यह तो पता नहीं किंतु प्रदेश की 33% महिलाओं में कुपोषण पाया गया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है क्या यह प्रदेश अपनी गरीबी के कारण इस दशा को पहुँचा है या प्रदेश के शासन प्रशासन में ही कोई दोष है। इस प्रदेश की सरकार सदैव ही केन्द्र सरकार के सामने कटोरा लिए खड़ी रहती है और इतनी असंगत माँग करती है जो किसी भी मापदण्ड से स्वीकार योग्य नहीं होती किंतु जो पैसा उसे केन्द्र सरकार की योजनाओं के रूप में मिलता है उसे वह पूरी तरह खर्च ही नहीं कर पाती। इस सरकार ने वित्तीय वर्ष 2009-10 में 3000 करोड़ और वर्ष 2010-11 के लिए 3090 करोड़ उपयोग न कर पाने के कारण सरेंडर किये हैं। जिस प्रदेश में तीन सौ से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हों उस प्रदेश ने राष्ट्रीय कृषि योजना के लिए मिले 1109 करोड़ में से कुल 363 करोड़ ही खर्च कर पाये। विकास मिशन के लिए प्राप्त 34 करोड़ में से कुल 14 करोड़ ही खर्च कर पाये। ग्रामीण विकास विभाग को 2421 करोड़ रुपये मिले जिसमें से कुल 1830 करोड़ ही खर्च कर पाये। सिंचाई विभाग को 1861 करोड़ रुपये मिले जिसमें से 1421 करोड़ ही खर्च कर पाये। महिला बाल विकास को 1622 करोड़ मिले जिसमें से 1340 करोड़ ही खर्च हुये। नगरीय प्रशासन विभाग को मिले 880 करोड़ में से 655 करोड़ ही खर्च किये गये। जहाँ शिक्षा के लिए मिली राशि में से 930 करोड़ रुपये लेप्स हुये वहीं ऊर्जा के लिए मिली राशि में से 271 करोड़ लेप्स हुये। राजनीतिक दबाओं से त्रस्त नौकरशाही की उदासीनता के कारण प्रदेश को 3400 करोड़ की हानि हुयी है। विभिन्न विभाग प्रदेश में 2618 करोड़ की वसूली नहीं कर पाये। विभिन्न विभागों में चल रही अनियमतताओं और लापरवाही के कारण 34 करोड़ से ज्यादा का नुकसान हुआ। वाणिज्यिक कर, राज्य उत्पाद शुल्क, मोटर वाहन कर, स्टाम्प ड्यूटी एवं रजिस्ट्रेशन फीस, मनोरंजन कर आदि में 3366 करोड़ की राजस्व हानि अनुमानित की गयी है। प्रदेश की नौकरशाही जिस तरह से काम कर रही है उससे स्थानीय निधि आडिट में ही 289 करोड़ के घपले सामने आये हैं। लगभग 46लाख के गबन, दो करोड़ चालीस लाख से अधिक के दुहरे भुगतान, तेइस करोड़ से अधिक के अनियमित भुगतान, तीन करोड़ सोलह लाख से अधिक के सन्दिग्ध खर्चे, बीस करोड़ छियानवे लाख से अधिक की आर्थिक क्षतियां, दो करोड़ तिरेपन लाख से अधिक की निर्माण कार्य में अनियमितताएं, 58 करोड़ से अधिक की अपेक्षित वसूली, 173 करोड़ से अधिक की अन्य अनियमितताएं और पाँच करोड़ से अधिक के अनियमित भुगतान के प्रकरण सामने आ चुके हैं। सब जानते हैं कि लम्बी जाँच के बाद इनको दाखिल दफ्तर कर दिया जायेगा। प्रदेश की सरकार की केवल दो चिंताएं हैं, पहली तो यह कि सरकार के रहते किस तरह संघ परिवार के संगठनों को और नेताओं को माला माल कर दिया जाये, और दूसरी कि किस तरह से तरह तरह के भावनात्मक मुद्दे उछाल, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण कर के विभिन्न चुनावों में मतदाताओं से वोट निकलवा लिया जाये। पिछले दिनों इस सरकार ने लगभग मुफ्त के भाव संघ परिवार से जुड़ी संस्थाओं को बेशकीमती जमीनें सौंप दी हैं जिनमें से अधिकांश में दुकानें बनवा कर संस्थाओं की आय को सुनिश्चित किया जा रहा है तथा प्राप्त पगड़ी की राशि से पूरा भवन बन कर तैयार हो जाता है। भोपाल के सबसे कीमती स्थल शाहपुरा में ग्राम भारती शिक्षा समिति मध्य भारत को 8.375 हेक्टेयर और सेवा भारती समिति मध्यभारत आनन्दधाम को 51680 वर्गफीट जमीन आवंटित की गयी। सेवा भारती को ही उमरिया में 4000 वर्गफीट, अनूपपुर में 11745 वर्गफीट, जमीन आवंटित की गयी है। शाजापुर के मदाना में बप्पा रावल शिक्षा समिति को 0.418 हेक्टेयर, राजगड़ के पिप्ल्याकुर्मी में ग्रामभारती शिक्षा समिति को 0.325 हेक्टेयर, बलाघाट के बैहर में आदिवासी विकास परिषद को 5000 वर्गफीट, श्योपुर में सेवाभारती को 5बीघा 6 डिसिमल, जबलपुर के सुभाषनगर जैसे क्षेत्र में विद्यार्थी परिषद को 6983 वर्गफीट, उज्जैन के सरदारपुरा में हेडगेवार जन्म शताब्दी स्मृति समिति को 450 वर्गफीट, तथा आष्टा में माधव स्मृति शिक्षा समिति को 130680 वर्गफीट जमीन आवंटित की गयी है। जमीनों की लूट का यह सिलसिला कहीं भी रुकने का नाम नहीं ले रहा। अकेले सरस्वती शिशु मन्दिर को ही धमनार मन्दसौर में एक हेक्टेयर, शिवाजी नगर भोपाल में साथ एकड़, नौगाँव छतरपुर में 0.672 हेक्टेयर, उम्हेल उज्जैन में 0.40 हेक्टेयर, बालागुड़ा मन्दसौर में 10000 वर्गफीट, चन्देरी अशोकनगर में 1.04 हेक्टेयर पृथ्वीपुर टीकमगढ में 0.609 हेक्टेयर, मोहगाँव मंडला में 0.10 हेक्टेयर, सोनारा सतना में 7.14 एकड़, हरदा में 14350 वर्गफीट, मल्हारगढ मन्दसौर में 0.819 हेक्टेयर, अनूपपुर में 1.54 एकड़, जयेन्द्र नगर ग्वालियर में 96125 वर्गफीट, बर्डिया मन्दसौर में 1.10 हेक्टेयर, होशंगाबाद में 2 एकड़, अमरकंटक रीवा में 7.5 एकड़, मलिया खेरखेड़ा मन्दसौर में 2 हेक्टेयर, बनीखेड़ा मन्दसौर में 95538 वर्गफीट,रहेली सागर में 86111 वर्गफीट, पिप्ल्या मंडी मन्दसौर में 1000 वर्गफीट, और राजेन्द्र ग्राम अनूपपुर में 1.54 एकड़ जमीन आवंटित की गयी है।
प्रदेश का ढेर सारा पैसा राजनीतिक कामों में खर्च हो रहा है, विभिन्न कार्य व्यापार करने वालों की पंचायतें, किसान सम्मेलन, मुख्यमंत्री के पाँच साल पूरे होने पर बड़ा तमाशा, आदिवासी कुम्भ आदि में करोड़ों रुपया फूंका गया है। इतना ही नहीं सन्दिग्ध इतिहास के नायक राजा भोज की मूर्ति लगाने, भोपाल के बड़े ताल का नाम भोजताल करने और भोपाल का नाम बदल कर भोजपाल करने के प्रयास और उसके आधार पर समाज में ध्रुवीकरण पैदा करने के लिए भी सरकारी पैसा फूंका जा रहा है जबकि कभी सौ आदमियों के प्रतिनिधि मण्डल ने भी राजा भोज का पुतला लगाने या भोपाल का नाम बदलने के लिए आवेदन नहीं दिया। मुख्यमंत्री के विज्ञापन, पोस्टर और होर्डिंग लगवाने में जन सम्पर्क का पूरा बजट फूंक दिया जाता है किंतु सरकार स्वतंत्र प्रैस को विकसित करने या ईमानदार पत्रकारिता को प्रोत्साहित करने की कोई कोशिश नहीं करती जबकि केन्द्रीय सरकार तो रेल किराये में राहत देकर कुछ मदद भी करती है। दूसरी ओर चापलूस और दलाल कोटि के पत्रकारों को समाचारों को दबाने के लिए सरकार का खजाना खुला रहता है।
प्रदेश बीमार है किंतु यह कहने वाली कोई अवाज शेष नहीं है। विपक्ष है ही नहीं। प्रैस मालिकों के मुँह या तो बन्द कर दिये गये हैं, या सिल दिये गये हैं। केवल अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के आंकड़े सरकारी प्रचार का मुँह चिढा रहे हैं।


वीरेन्द्र जैन
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रविवार, मार्च 27, 2011

क्या यह साध्वी शब्द का अपमान नहीं है?


क्या यह साध्वी शब्द का अपमान नहीं है? वीरेन्द्र जैन
आज के हिन्दी मीडिया में तकनीकी ज्ञान से सुसज्जित जो नई फौज भरती हुयी है वह भाषा प्रयोग के प्रति लापरवाह है जिसके परिणाम स्वरूप उनके कहे का वही मतलब सम्प्रेषित नहीं होता जिसे वे सम्प्रेषित करना चाहते हैं। दूसरी ओर कुछ गैरईमानदार संगठन अनजाने में ही उन्हें वे शब्द थमा देते हैं जिससे उनके पक्ष का मतलब निकलता है। वे शब्दों की ऐसी लकीर पीटते हैं जैसे कि उन शब्दों के कुछ अर्थ ही नहीं होते हों। लम्बे समय तक महिला दस्युओं को दस्यु सुन्दरी शब्द से विभूषित किया जाता रहा जबकि फूलन देवी समेत अनेक महिला दस्यु जिस संघर्षमय परिवेश में विकसित हुयी थीं उसमें उनका स्वरूप एक जुझारू श्रमिक महिला से मिलता था और परम्परागत रूप से प्रयुक्त होने वाला सौन्दर्य शब्द का विशेषण उनके लिए फिट नहीं बैठता। इसी तरह पीले कपड़ों में रहने वाली महिला को साध्वी कहने का चलन चल पड़ा है, भले ही उसके धार्मिक ज्ञान या दीक्षा की कोई जानकारी किसी को न हो। इस शब्द के प्रयोग से सम्बन्धित के प्रति एक सहज श्रद्धा का भाव आमजन के मन में पैदा हो जाता है, जिसकी ओट में कई तरह के अपराध लम्बे समय तक छुपे रहते हैं। इसी भ्रम का प्रभाव था कि प्रज्ञा ठाकुर को साध्वी की तरह सम्बोधित करने का जो सिलसिला प्रारम्भ हुआ वह अभी तक जारी है, भले ही समाचार पत्रों में ही प्रकाशित समाचारों से यह सुस्पष्ट हो गया हो कि पीले कपड़ों की ओट में रहने वाली यह युवती भाजपा के छात्र संगठन से निकल, किसी व्यक्तिगत कुंठा का शिकार हो एक उग्रवादी बन गयी व इसने साम्प्रदायिक दंगे भड़काने के लिए न केवल मुस्लिम समूहों के बीच बम विस्फोट कराये अपितु हिन्दू समूहों को उत्तेजित करने के लिए उनके बीच भी बम विस्फोट कराये और इसे मुस्लिम उग्रवादियों द्वारा किये गये बतलाने के लिए नकली सबूत भी छोड़े। इसका परिणाम यह हुआ कि शार्टकट से काम चलाने वाला मीडिया उनके द्वारा वांछित राग अलापने लगा। उसके सहयोगियों द्वारा की गयी स्वीकरोक्ति से सामने आया है कि नफरत की आग से धधकती इस युवती ने न केवल अपने ही साथियों की हत्या कराने में गुरेज नहीं किया अपितु सन्देह के आधार पर अपने पितृ संगठन आर एस एस के पदाधिकारियों की हत्या कराने की योजना भी बनायी। बम विष्फोटों के बाद इस युवती का अपने साथियों से यह सवाल करना कि इतने कम लोग क्यों मरे, अपने आप में उसके निर्मम और अमानवीय सोच की कहानी कहता है।
इस युवती को राजद्रोही जैसे शब्दों से भी नहीं पुकारा जा सकता क्योंकि इसने अभी तक सीना ठोक कर अपने कृत्यों को स्वीकार करने का साहस भी नहीं दिखाया है, जैसा कि नक्सलवादी जैसे उग्रवादी संगठन करते हैं। ऐसी दशा में उसकी छवि एक ऐसे अपराधी की बन रही है जो बड़े से बड़ा अपराध करने के बाद भी अदालत से बचने के लिए हर हथकण्डा अपनाता है। यदि ऐसा नहीं होता तो बहुत सम्भव था कि कम से कम हिन्दू साम्प्रदायिकता के दुष्प्रभाव में आये लोग ही उसे नायकत्व दे देते। दूसरी ओर उसका संगठन, उसमें सम्मलित विभिन्न त्तरह के लोग, और उन्हीं में से कुछ के कबूलनामों से यह साफ है कि वह एक हिन्दू साम्प्रदायिकता से दुष्प्रभावित उग्रवादी के रूप में पहचानी जा रही है, और दर्जनों निरपराध लोगों की मौतें उस पर लगे आरोपों के खाते में दर्ज हैं। जेल में उससे मुलाकात करने के लिए कोई भक्त नहीं अपितु हिन्दूवादी दल भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ही पहुँचते हैं। ऐसी दशा में मीडिया द्वारा उसके नाम के आगे साध्वी शब्द का प्रयोग करना उसके मुखौटे को बल प्रदान करना है, जिससे जनित श्रद्धा की ओट में उसके जनविरोधी काम छुप सकते हैं।
जन आस्था से जुड़े शब्द सुपरिभाषित होने चाहिए और उनके प्रयोग के कुछ नियम होने चाहिए। पीले कपड़ों को छोड़कर प्रज्ञा ठाकुर को साध्वी पुकारे जाने का कोई आधार न पहले था और न अब बचा है। उसके एक साध्वी के रूप में किये जाने वाले कार्यों और आचरण के बारे में कोई इतिहास नहीं मिलता, न ही उसके धार्मिक ज्ञान या पुराणकथाओं पर आधारित प्रवचनों का कोई अता पता है, पर फिर भी मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री और उनके परिवार के साथ उसके फोटो अखबारों में छपे हैं। आडवाणीजी ने भी अयोध्या में बाबरी मस्जिद की जगह राम मन्दिर बनवाने के लिए जो यात्रा निकाली थी उसमें प्रयुक्त डीजल चलित वाहन डीसीएम टोयटा को रथ कहलवाया था। रथ एक पौराणिक काल का घोड़ों से चलने वाला वाहन होता था इस एक शब्द ने ऐसा प्रचार पाया कि उनकी राजनीतिक यात्रा धार्मिक यात्रा की तरह लगने लगी। यह भाषा से दिया गया धोखा था। अपात्र और आचरण विमुख लोगों को साधु या साध्वी के नाम से पुकारा जाना भी कुछ कुछ ऐसा ही है। कबीर दास ने बहुत पहले यह कह कर सावधान किया था-
मन न रंगायो, रंगायो जोगी कपड़ा............. शब्द के इसी दुरुपयोग के कारण साम्प्रदायिक लोग इस आधार पर वैमनस्य फैलाने की कोशिश कर रहे हैं कि सरकारी जाँच एजेंसी बेचारी साध्वी को सींखचों में बन्द करके उससे कठोर पूछताछ कर रही है, जिसके कारण वह अस्वस्थ हो गयी है। इस आधार पर कुछ लोगों के मन में उसके प्रति सहानिभूति भी पैदा हो रही है। भ्रष्टाचार के निरंतर हो रहे खुलासों से प्रभावित लोग उपरोक्त दुष्प्रचार के आधार पर गलत फैसले भी ले सकते हैं, जिससे देश अपने मार्ग़ से भटक सकता है। जरूरत इस बात की है धर्म की ओट में छुपे अपराधियों की पहचान की जाये और इन्हें अलग थलग किया जाये।
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, मार्च 25, 2011

श्रद्धांजलि कमला प्रसाद


एक कार्यकर्ता के प्रतिमान बने रहेंगे कमला प्रसादजी
वीरेन्द्र जैन
भोपाल में यह कामरेड प्रकाश करात की सभा थी जिसमें से अचानक उठ कर कमला प्रसादजी घर चले गये थे और हमारे सामने एक प्रश्न वाचक सवाल छोड़ गये थे। अगले दिन भी जब उन्हें केदारनाथ अग्रवाल के कृतित्व पर आयोजित एक साहित्य सभा में मुख्य भाषण देना था और उसमें भी नहीं आये थे तब जानकारी करने पर पर पता चला था कि उस दिन उन्हें अचानक ही कुछ ऐसा मानसिक झटका लगा था और उनकी बाँयीं आंख में कुछ ऐसा दोष उभर आया था कि उन्हें एक से अधिक छवियाँ दिखने लगी थीं। बाद में पता चला था कि उन्हें ब्लड कैंसर है। कुछ दिनों बाद जब उन्हें दुबारा देखने का अवसर आया था तो डाक्टरों ने उनकी बाँयीं आँख पर काला शीशा लगवा दिया था व वे यथावत उसी लगन और उत्साह से काम कर रहे थे। अपने स्टेनो से उन्होंने पत्र लिखवाये थे जिन्हें डिस्पैच करने का अंतिम समय था अतः उन्होंने हम लोगों से बात करने से पहले तेजी में लिफाफों पर पते लिखे और पत्रों को डिस्पेच के लिए समय से दे दिये। बाद में उन्होंने बताया कि वे अब ठीक हैं और कैंसर की जिस बीमारी की आशंका थी वह प्रथम स्टेज में ही सामने आ जाने के कारण ठीक हो रही, कैमीथेरेपी से कुछ कमजोरी आती है, पर चिंता की कोई बात नहीं। अपने स्वास्थ से सम्बन्धित इतनी सी बात करने के बाद वे बाद साहित्य, संगठन और विभिन्न समकालीन घटनाओं के बारे में चर्चा करने लगे थे, जैसे कि उन्हें केवल जुकाम हुआ हो और जो ठीक होने वाला हो। चलते चलते उन्होंने खुद उठ कर वसुधा के ताजा अंक हमें भेंट किये। उनकी जीवट को देख कर हमें सन्देह हुआ कि कहीं हमारी सूचना में ही कोई कमी रही है अन्यथा ऐसी बीमारी की सूचना ही आदमी को आधा मार देती है। अगले पखवाड़े अखबार में उनका नियमित स्तम्भ यथावत छपा था और पता चला था कि वे प्रगतिशील लेखक संघ की कार्यकारिणी की बैठक में भाग लेने के लिए केरल भी होकर आ गये हैं। उसके बाद वे विनोद तिवारी जी की अंतिम किताब के विमोचन के अवसर पर स्वयं आये थे और उस पर अपने विचार व्यक्त किये थे। कुछ ही दिन बाद विनोदजी के अंतिम संस्कार के दिन भी वे सुभाषनगर विश्राम घाट पर आये थे और बातचीत में पुनः दुहराया था कि थोड़ी कमजोरी जरूर है पर कैंसर का कोई दुष्प्रभाव नहीं है।
कमला प्रसादजी ने जब से पहल का सयुंक्त सम्पादन और प्रगतिशील लेखक संघ के संगठन का काम हाथ में लिया तो फिर पूरी तरह से समर्पित होकर किया। पहल के बाद वसुधा के सम्पादन से लेकर प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव बनने तक वे शायद इससे बाहर कुछ सोचते ही नहीं थे। आपसी बातचीत का सिलसिला कहीं से शुरू हो समाप्त उनके संगठन की चिंता से ही होती थी। समर्पित भाव से किये गये इस काम से वे हजारों लोगों से जुड़े और उतने ही शत्रु भी बनाये जो उन्हें अपने लक्ष्य से डिगा नहीं सके। अपने विचार से जुड़े सैकड़ों प्रतिबद्ध रचनाकारों और नवोदितों को उन्होंने पुरस्कारों और सम्मानों से प्रोत्साहित किया। जब भी इसका इतिहास लिखा जायेगा तो पता लगेगा कि देश में जिन महत्वपूर्ण हिन्दी लेखकों ने अपना स्थान बनाया है उसमें से कितने उनके कन्धों पर खड़े होकर शिखर को छू सके थे। किसी भी संगठन के कार्यकर्ता के लिए कमला प्रसादजी का जीवन एक प्रतिमान हो सकता है।
बाद में पता चला कि उन्हें चिरायु अस्पताल में भरती करना पड़ा है और आईसीयू में हैं। लोगों ने वहाँ बात करने से मना किया और बात नहीं हो सकी। होती तो शायद वे यही कह रहे होते कि कोई गम्भीर बात नहीं है और में ठीक हो रहा हूं, फिर अपुन मीटिंग करेंगे।



वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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सोमवार, मार्च 14, 2011

विवाह की परम्पराओं में व्यापक सुधार की जरूरत

विवाह की परम्पराओं में व्यापक सुधार की जरूरत
वीरेन्द्र जैन
गत दिनों में हरियाणा के पूर्व विधायक सुखवीर सिंह जौनपुरिया की बेटे की शादी दिल्ली के कांग्रेस के नेता कंवर सिंह तंवर के बेटे ललित कंवर से हुयी और इस शादी में व्यय किये गये धन ने इसे देश के अखबारों की प्रथम पृष्ठ की घटना बना दिया। इस शादी में कुल 250 करोड़ रुपये खर्च किये गये। बारात में आये 18 प्रमुख बारातियों का टीका एक एक करोड़ से किया गया और दूसरे 2000 बरातियों को 30-30 ग्राम के चांदी के बिस्कुट और नैनो कार भेंट में दी गयी। राजस्थान के सालासर बालाजी मन्दिर को 71 लाख रुपयों का दान दिया गया। इस को देखते हुए बारातियों के लिए की गयी शेष व्यवस्था की बात करना ही फिजूल होगी।
हमारे समाज में जब पुत्रियों को पैतृक सम्पत्ति में हिस्सा नहीं दिया जाता था इसलिए उनके विवाह के अवसर पर उनके हिस्से की राशि एक नये परिवार के काम आने वाली दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं, और गहनों के रूप में दहेज की तरह दे दी जाती थी। यह एक स्वीकार्य प्रथा थी जो बाद में सम्भवतः कन्या पक्ष के पक्षपात आदि के कारण वर पक्ष द्वारा पहले से तय की जाने वाली राशि में बदल दी गयी व बाद में तो यह एक सौदेबाजी की बुराई में बदल गयी। इस बुराई में दहेज में नकदी भी ली जाने लगी। इस तरह की माँग कन्या के पिता की हैसियत देखे बिना भी की जाने लगी जिससे अनेक लड़कियां दहेज की कारण कुँवारी रह जाती रहीं या उनके पिता को कर्ज लेना पड़ा जो परोक्ष में उनके घर-जमीनें बिकने और आत्म हत्याओं तक का कारण भी बना। प्रकारांतर में दहेज का कागजी विरोध भी होता रहा किंतु पूंजीवादी समाज, जिसे प्रेमचन्द ने महाजनी सभ्यता कहा है, के विकास ने धन प्राप्त होने वाली इस परम्परा को दूर होने नहीं दिया। भले ही बेमन से इसके लिए कानून बने और सामाजिक सुधारों की बातें होती रहीं, पर सुधार कुछ भी नहीं हुआ क्योंकि इसकी जड़ पर कभी प्रहार ही नहीं किया गया। धर्म जाति, उपजाति और गोत्र के अनुसार विवाह की परम्परा ने वर वधू के चयन के क्षेत्र को सिकोड़ दिया जिससे दहेज माँगने वालों को अनुकूलता हुयी। स्वतः चयन पर समाज के ठेकेदारों ने न केवल ऐसे विवाहों को अस्वीकार करते हुये नवदम्पति के साथ असहयोग किया अपितु कई मामलों में इन नवविवाहितों की हत्याएं तक कर दी गयीं।
पिछले दो तीन दशकों से हमारे देश में किसी भी तरह के कोई बड़े आन्दोलन नहीं हुये। ये न तो राजनीति के क्षेत्र में हुये और ना ही समाज सुधार के क्षेत्र में। राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता में इस तरह की कमी आयी है कि लोगों ने उनसे किसी सुधार की उम्मीद करना ही छोड़ दी है। किसी भी दल की रैली या विरोध प्रदर्शन में केवल उस दल के बँधुआ कार्यकर्ता, झूठे आश्वासनों से बहकाये मजबूर लोग या किराये से ले जाये गये लोग ही सम्मलित होते हैं। जनता का कोई व्यक्ति स्वतःस्फूर्त ढंग से इन दलों के आवाहन पर रैलियों में नहीं जाता भले ही वह कितनी भी जनहितैषी माँग के लिए बुलायी गयी हो। इसी तरह सामाज सुधार आन्दोलन तो सिरे से गायब हो गये। शायद जयप्रकाश नारायण राजनीतिक क्षेत्र के राष्ट्रीय आन्दोलनों वाले अंतिम नेता थे और समाज सुधार के आन्दोलनों के लिए तो महात्मा गान्धी के बाद कोई नहीं हुआ। काँशीराम जी ने संगठन तो बड़ा खड़ा किया किंतु उसका उपयोग केवल धन और राजनैतिक सत्ता हासिल करने के लिए किया, जिससे सम्बन्धित समाज का कोई भला नहीं हुआ। एकाध सफल किसान आन्दोलन के बाद महेन्द्र सिंह टिकैत ने शादी में कुल ग्यारह बाराती ले जाने और मामूली राशि से रस्में पूरी करने के आदेश निकाले थे किंतु उनको आर्थिक माँगों पर समर्थन देने वालों की भीड़ ने उनके सुझावों की बुरी तरह उपेक्षा कर दी थी, जिससे बाद में उभोंने ऐसे कोई प्रयास नहीं किये। संघ के सर संघ चालक बनते ही मोहन भागवत ने हिन्दुओं में अंतर्जातीय विवाह हेतु अभियान शुरू करने की बात की थी पर अपने राजनीतिक दल पर पड़ने वाले प्रभाव को अनुमानित कर जल्दी ही वे भी पूंछ दबा कर चुप बैठ गये।
सवाल यह है कि ऐसा दूध का धुला कौन है जो जनता को आवाज दे और उसकी आवाज का असर हो। यही सवाल शायद कभी भवानी प्रसाद मिश्र के मन में घुमड़ रहा होगा जब उन्होंने लिखा- कोई है? कोई है ? कोई है? जिसकी जिन्दगी दूध की धोई है।
संस्था के रूप में राष्ट्रव्यापी आज कुछ राजनीतिक दल हैं जिनकी आवाज उनके सदस्यों के लिए बाध्यकारी हो सकती है, किंतु सीपीएम को छोड़ कर कोई भी अन्य दल सामाजिक कुरीतियों को पार्टी अनुशासन का दोषी नहीं मानती। अधिकांश राजनीतिक दलों के सदस्य कुरीतियों से घिरे होते हुए भी उस दल के सदस्य रह सकते हैं। दहेज शादी से जुड़ी कुरीतियों का एक हिस्सा बन गया है और इसके कारण भी समाज में बहुत सारी बुराइयाँ पैदा होती हैं। धन संग्रह की वृत्तियों को बढाने में इसका बहुत बड़ा हाथ है और प्रशासनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार का कारण बनता है। इसके कारण ही लड़की के जन्म को बुरा माना जाता है और भ्रूण हत्या से लेकर बाल विवाह और बहू दहन के पीछे भी इसी का हाथ होता है। लड़कियों में हीनता बोध और कुपोषण आदि के पीछे भी इसकी भूमिका है और यही हमारे समाज में नारी को दोयम दर्जे का नागरिक माने जाने का एक कारण बनता है।
जनता के लिए बड़े बड़े वादे करने वाले राजनीतिक दल यदि अपने सदस्यों को सदस्य बनाते समय सामाजिक सुधारों की कुछ शर्तें अनिवार्य कर दें एक बहुत बड़ी आबादी सामाजिक बुराइयों से दूर हो सकेगी। राजनीतिक दलों को यह समझना पड़ेगा कि सभी दल सत्ता में नहीं आ सकते और ना ही सत्तारूढ दलों के सभी सदस्य मंत्री, सांसद, या विधायक या पंचायती राज नगर निगमों के पदाधिकारी बन सकते हैं, किंतु उन्हें बिना पद पाये हुए भी समाज के लिए कुछ तो करना पड़ेगा अन्यथा वे फिर कभी भी सत्ता में नहीं आ सकेंगे। आज जब भ्रष्टाचार के खुलासों के कारण पूरा देश आन्दोलित है और सुप्रीम कोर्ट को अपने क्षेत्र से बाहर निर्देश देने को विवश होना पड़ रहा है, तब यह सही समय है जब राजनीतिक दल एक साझी आचार संहिता लागू करें और सामाजिक कुरीतियों को अपनाने वाले व्यक्तियों को सदस्यता देने से इंकार कर दें।
वीरेन्द्र जैन
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जाति समुदाय के संगठनों की हैसियत

जाति समुदायों के संगठनों की हैसियत
वीरेन्द्र जैन
यद्यपि हमने अपने संविधान में रंग धर्म लिंग जाति भाषा क्षेत्र आदि के भेद भाव के बिना सभी नागरिकों को समान अधिकार का वादा किया हुआ है पर इसके साथ सामाजिक आर्थिक रूप से दलित व पिछड़ी जातियों को समान स्तर पर लाने की दृष्टि से कुछ ऐसे उपाय भी किये हैं जिससे वे समान धरातल पर खड़े हो सकें। इसके लिए न केवल शिक्षा आदि में कुछ विशेष प्रोत्साहन ही दिये हैं अपितु कई क्षेत्रों में आरक्षण देकर भी उन्हें समान स्तर देने का प्रयास किया है।
जातियों के बीच समानता लाने के इस प्रयास में आरक्षण अनेक त्रुटियों से भरा कदम है किंतु जब तक हम इससे अधिक अच्छा कदम नहीं नहीं ला पाते तब तक इसे ही सर्वोंत्तम मानना हमारी बाध्यता है। आरक्षण में सबसे बड़ी त्रुटि यह है कि हमने जाति उत्थान के प्रयासों में व्यक्तियों को सुविधाएं दी हैं और फिर यह समझने की भूल की है कि इससे समाज का उत्थान हो जायेगा। गत पचास साल का हमारा अनुभव बताता है कि ऐसा नहीं हो पाया। जिन व्यक्तियों को ये सुविधाएं मिलीं उन्होंने अपनी जाति का उत्थान करने की जगह स्वयं की जाति छुपाना प्रारम्भ कर दी व अपनी जाति के लोगों से स्वयं को काटना प्रारम्भ कर दिया। एक बार आरक्षण के लाभ से लाभान्वित लोगों ने अपनी विशेष स्थिति का लाभ लेते हुये इन सुविधाओं को अपने परिवारियों परिचितों को प्राथमिकता देकर सामाजिक विकास के लक्ष्य को और दूर कर दिया।
आरक्षण नीति के अन्तर्गत विभिन्न सदनों नगरनिगमों नगर पालिकाओं पंचायतों आदि के निर्वाचन क्षेत्रों के लिए जो स्थान आरक्षित किये गये उनसे भी भले ही कुछ व्यक्तियों को मौद्रिक लाभ पहुंचा हो पर बिना उचित राजनीतिक कार्यों के वोट समूह जुटाने के प्रयास में दलों ने जातियों के संगठन बनवाने और उसके नेतृत्व को विकसित करने के प्रयास किये जिसमें वे सफल भी रहे। इसने जातियों की बीमारी को समाप्त करने की जगह उसे मजबूत करने, उसकी पहचान को बनाये रखने, और अपने अपने प्रतीक पुरूष खोज कर उनके महिमामंडन द्वारा जाति अस्मिता पैदा करने की कोशिश की। एक ओर जहां उनके जातीय पिछड़ेपन के आधार पर उन्हें प्रोत्साहन की सरकारी नीति थी वहीं दूसरी ओर उनकी यथा स्थिति को गौरवान्वित करने के प्रयास प्रारम्भ हो गये थे जो उन्हें दूसरों के समान ही नहीं उनसे श्रेष्ठ साबित करने में लग गये थे। यह ऐसा ही था जैसे किसी बीमार और कमजोर व्यक्ति को कोई चन्दबरदाई दुनिया का सबसे बड़ा शूरमा सिद्ध करने में जुट जाये जिसका परिणाम यह निकले कि वह अपनी बीमारी की खोज और इलाज की जगह तलवार भांजने में अपनी ऊर्जा नष्ट करने लगे। जाति संगठनों के मजबूत होते जाने ने उन्हें अपनी जाति समाज की उन बुराइयों को पहचानने व उन्हें दूर करने की सम्भावनाओं कों बाधा पहुंचायी जो उनके सामाजिक आर्थिक पिछड़ेपन के लिए जिम्मेवार रहीं थीं।
राजनीतिज्ञों की चुनावी सम्भावनाओं से जनित जाति-संगठनों का नेतृत्व भी लोकतांत्रिक ढंग से चुना नेतृत्व नहीं था अपितु क्षेत्र के प्रभावी नेता के चुनावी हितों हेतु रोपा गया नेतृत्व था। इस नेतृत्व ने एक ओर अपने जाति समाज को महान बताने की कोशिश की और दूसरी ओर सरकार से सुविधाएं दिलवाने की फुसलाहटें दीं। समाज के स्वत: उत्थान या उसमें घर कर गयी कमजोरियों के उन्मूलन के कोई प्रभावी प्रयास इस नेतृत्व ने नहीं किये।

चुनावी राजनीतिज्ञों के बहकावे में सरकारों से अतिरिक्त लाभ प्राप्त करने की जो प्रवृत्ति आरक्षण के कारण पैदा हुयी उसमें जातिवादी संगठनों के स्वयं भू नेता सरकारों से बात करने पहुंचे जबकि यह कहीं प्रमाणित नहीं था कि वे सचमुच उस बातचीत के लिए उस समाज से अधिकृत भी हैं या नहीं। मीडिया मेनेजमैंट के द्वारा उन्हें ही समाज का नेता बताने का डंका बजा दिया गया और इस नक्कारखानें में तूतियों की आवाजें दब कर रह गयीं। संविधान ने भले ही कुछ जाति समूहों के व्यक्तियों को आरक्षण की सुविधा दी हो पर उनके जातिवादी संगठनों के गठन या नेतृत्व की कोई व्यवस्था वहां नहीं है। सम्भवत: संविधान निर्माताओं का यह विश्वास रहा होगा कि किसी जाति समूह के लिए कुछ सुविधाएं हासिल करने की मांगें राजनीतिक दलों के माघ्यम से ही रखी जायेंगीं।
गत दिनों राजस्थान में गुर्जरों के आन्दोलन में व्यक्त की गयी मांगों के समर्थन में एक भी राजनीतिक दल खुलकर आगे नहीं आया, पर किसी ने खुले पैमाने पर उनके हिंसक आन्दोलन व अव्यवहारकि मांगों का विरोध करने की हिम्मत भी नहीं जुटाई। यह स्थिति दो बातों की ओर इशारा करती है, पहली तो यह कि समाज में इतने बड़े पैमाने पर हो रही हलचलों के बारे में राजनीतिक दल उदासीन हैं और जनता से उनका सम्बन्ध केवल वोट हथियाने भर का है और दूसरी यह कि गैर राजनीतिक आघार पर संचालित लोकतंत्र भविष्य में भी ऐसी अनेक समस्याओं से जूझ सकता है। यह समय है कि जब राजनीतिक दलों को अपने गरेबां में झांक कर देखना चाहिये और विश्लेषित करना चाहिये कि क्यों जगह जगह इतने क्षेत्रीय दल विकसित होकर लोकतंत्र का क्षरण कर सकने में सफल हो रहे हैं।

वीरेन्द्र जैन
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