भ्रष्टाचार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
भ्रष्टाचार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, मई 26, 2017

आज़ादी के बाद के आन्दोलन, और भ्रष्टाचार

आज़ादी के बाद के आन्दोलन, और भ्रष्टाचार
वीरेन्द्र जैन

हमने पिछले कुछ वर्षों में जन आन्दोलनों से उभरे समूहों को पार्टी में बदलते, दिवा स्वप्न देख कर चुनावों में भाग लेते और फिर असफल होते देखा है। इनकी संख्या बहुत है किंतु तात्कालिक रूप से बहुजन समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी इसकी ताजा शिकार दिखायी दे रही हैं।
आज़ादी के बाद पंचवर्षीय योजनायें बनायी गयीं और क्षमतानुसार विकास से जुड़े असंख्य कार्य हुये। देश की आज़ादी से पहले स्वास्थ सेवाओं का यह हाल था कि हैजा, प्लेग. चेचक आदि महामारियों में हजारों लोग एक साथ मारे जाते थे, और इन्हें दैवीय प्रकोप माना जाता था। उल्लेखनीय है कि उस दौरान मिशनरी अस्पतालों ने अपने सेवा कार्यों से लाखों जिन्दगियां बचायी हैं, क्योंकि ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित अस्पताल न तो सवर्ण व दलितों में कोई भेद मानते थे और न ही हिन्दू मुसलमान में भेद मान कर चलते थे। धर्म का आदेश मान कर इस दिशा में जो काम ईसाई मिशनरियों ने किया है वह हिन्दू मुसलमान किसी धर्म समाज ने नहीं किया क्योंकि नियति या कर्मफल मानने के करण उनके यहाँ पीड़ित मानवता की सेवा का कोई विचार ही नहीं था। आज़ादी के आन्दोलन के दौरान गाँधीजी ने, जो दक्षिण अफ्रीका से रेडक्रास में काम करने का अनुभव लेकर आये थे, दलितों और कुष्ट रोगियों के लिए अपने आन्दोलन के साथियों को लगाया, दूसरी ओर अपनी साम्प्रदायिक प्रतियोगिया से प्रेरित होकर आर्य समाज आदि ने शिक्षा के क्षेत्र में कुछ अलग काम किया। आज़ादी के बाद स्वप्नदर्शी कहे जाने वाले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देश की क्षमता के अनुरूप तेजी से विकास योजनाएं बनायीं, और देश के मूलभूत ढाँचे को स्थापित करने का काम किया। इसी परम्परा को बाद में शास्त्री जी, जिन्हें कम समय मिला और बाद में इन्दिरा गाँधी ने आगे बढाया। बिना मांग के किये गये इसी विकास के साथ साथ भ्रष्टाचार का भी विकास होता गया जो सुविधा शुल्क से बढ कर कमीशनखोरी, हिस्सेदारी और अंत में बिना काम किये हुए ही भुगतान तक पहुँच गया। भ्रष्टाचार के इसी विकास ने आम जन को व्यथित किया और आज़ादी के बाद कई बड़े राष्ट्रव्यापी आन्दोलन भ्रष्टाचार के सवाल पर ही खड़े हुए व जनता की उम्मीदों का समर्थन पाकर सत्ता में भी बदलाव हुआ।
1974 में चिमन भाई पटेल की गुजरात सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ छात्रों का आन्दोलन प्रारम्भ हुआ जिसे देख कर खुद को रिटायर्ड मान चुके जय प्रकाश नारायण फिर से मैदान में कूद पड़े और सम्पूर्ण क्रांति के नारे के साथ जो आन्दोलन प्रारम्भ हुआ उसकी परिणिति पहले इमरजैंसी और बाद में जनता पार्टी के गठन व उसकी सरकार बनने तक जा पहुँची। अपनी सारी ऊर्जा सरकार बनाने में लगा देने के कारण जनता पार्टी भ्रष्टाचार उन्मूलन का लक्ष्य ही भूल गयी। 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार के नाम पर ही काँग्रेस छोड़ी व कम्युनिष्टों और भाजपा दोनों से बाहरी समर्थन ले कर सरकार बनायी। काँग्रेस और भाजपा के बीच झूलती सरकारों के बीच विरोध का नहीं अपितु प्रतियोगिता का रिश्ता रहा है और उनके बीच आलोचना का प्रमुख मुद्दा भ्रष्टाचार ही रहा है। अटल बिहारी सरकार से लेकर मनमोहन सिंह के कार्यकाल की दोनों सरकारों ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये हैं, पर दोनों ने ही नई आर्थिक नीतियों का समर्थन किया है। उल्लेखनीय है कि वित्त मंत्री के रूप में जब मनमोहन सिंह नई आर्थिक नीति लेकर आये थे तब भाजपा ने कहा था कि इन्होंने हमारी नीति का अपहरण कर लिया है।
2010 के बाद अरविंद केजरीवाल ‘इंडिया अगेंस्ट करप्पशन’ आन्दोलन लेकर आये और महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करके कुछ मंत्रियों को हटवाने वाले अन्ना हजारे को आगे कर दिया था। अन्ना हजारे भावनात्मक अधिक और बौद्धिक कम थे, इसलिए भाजपा के चंगुल में फँस गये, जिन्होंने आन्दोलन के दौरान अनेक तरह की व्यवस्थाएं की थीं। बाद में इसी आन्दोलन से निकल कर किरन बेदी व जनरल वी के सिंह, भाजपा में शामिल हो गये, अरविन्द केजरीवाल ने अलग पार्टी बना ली और दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गये। इसी दौरान रामदेव ने भारतीय स्वाभिमान पार्टी भी बना ली थी और इंडिया अगैंस्ट करप्पशन को भी हड़प लेना चाहा पर उनकी सन्दिग्ध गतिविधियों के कारण उन्हें आन्दोलन में प्रवेश नहीं दिया गया। परिणाम स्वरूप उन्होंने अलग से आन्दोलन किया जिसमें वे असफल रहे और अलग पार्टी का विचार छोड़ भाजपा के शरणागत हो गये।   
काँग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार के विरोध के आधार पर ही भाजपा ने 2014 का आम चुनाव लड़ा और कामन वैल्थ, टूजी, थ्रीजी की रिपोर्टों के साथ जमीनों के सौदे आदि के साथ पुराने नेताओं को छोड़ कर मोदी को प्रत्याशी बनाया गया जो 2002 के गुजरात नरसंहार के साथ ऐसी राज्य सरकार चलाने के लिए भी जाने जाते रहे थे, जिस पर आर्थिक भ्रष्टाचार का कोई बड़ा आरोप नहीं था। साम्प्रदायिक हिंसा के गम्भीर आरोपों के बाद भी उन्हें प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी इसी छवि के कारण से बनाया गया था।
कम्युनिष्ट पार्टियां भ्रष्टाचार को पूंजीवाद की अनिवार्य बुराई मान कर चलती हैं व उनका मानना है कि यह रोग पूंजीवाद के साथ ही जायेगा इसलिए जड़ पर प्रहार करना ही इसका हल है। विभिन्न सरकारें बदलने पर भी भ्रष्टाचार का बने रहना उनकी बात के पक्ष में जाता है। यही कारण है कि भले ही वे खुद ईमानदार रहे हों किंतु उन्होंने स्थापित सत्ता का विरोध करने के लिए भ्रष्टाचार को इकलौता मुद्दा नहीं बनाया। यह अलग बात है कि उनके वर्ग शत्रु द्वारा भ्रष्टाचार से अर्जित संसाधनों के कारण वे अपनी आवाज को जनता तक पहुंचाने व संघर्ष में पिछड़ते रहे हों। 
हाल ही में जब अरविन्द केजरीवाल ने अपनी पार्टी की औकात से अधिक सपने देखे और सीधे सीधे मोदी सरकार को चुनौती दी तो उसने उनकी सरकार को गिराने के लिए हर सम्भव उपाय शुरू कर दिये। उपराज्यपाल, पुलिस कमिश्नर, का दुरुपयोग, विधायकों की त्रुटियों से लेकर उनकी पारिवारिक कमजोरियों तक से भी जब बात नहीं बनी तो उनकी ईमानदार छवि के मूल आधार पर ही हमला करा दिया। मीडिया को पहले ही अपने अधिकार में कर चुके थे।
हम कह सकते हैं कि आज़ादी के बाद देश की केन्द्र व राज्य सरकारों को बदलने के जो आन्दोलन हुये हैं वे भ्रष्टाचार के आसपास ही घूमते रहे हैं। मजदूरों, किसानों, दलितों, पिछड़ों, महिलाओं, आदि द्वारा सत्ता बदलवाने वाला राष्ट्रव्यापी कोई बड़ा आन्दोलन नहीं हुआ। मोदी के नियंत्रण व नेतृत्व वाली भाजपा की राज्य सरकारों में व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार है किंतु केन्द्र सरकार की छवि पर कोई सीधा दाग नहीं लगा। यही छवि मोदी को अगले दो साल तक बनाये रहेगी, भले ही उतार चढाव बने रहेंगे।     
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

   

शनिवार, अगस्त 16, 2014

खाने और न खाने देने के मध्य म.प्र. सरकार



खाने और न खाने देने के मध्य म.प्र. सरकार
वीरेन्द्र जैन

       श्री नरेन्द्र मोदी सिर्फ देश के प्रधानमंत्री पद पर ही पदारूढ नहीं हैं, अपितु वे सत्तारूढ दल भाजपा के भी सर्वेसर्वा बन गये हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री काल में अपने कनिष्ठ मंत्री रहे अमित शाह को पार्टी के अध्यक्ष पद पर पदासीन करवा दिया है, और इस तरह पूरी पार्टी भी उनकी मुट्ठी में है। उल्लेखनीय है कि अनेक गम्भीर आरोपों से घिरे श्री शाह को अध्यक्ष पर बैठाने के फैसले का विरोध करने का साहस भी किसी भाजपा नेता ने नहीं किया जबकि उनके पूज्य श्री मोदी को प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी बनाये जाने तक का विरोध श्री लाल कृष्ण अडवाणी, और सुषमा स्वराज जैसे वरिष्ठ नेताओं ने किया था और वे मुम्बई अधिवेशन से आमसभा को सम्बोधित किये बिना ही दिल्ली लौट आये थे। यह जानकारी चौंकाने वाली है कि देश के सबसे मुखर नेता रहे श्री अडवाणी ने इस लोकसभा में एक बार भी मुँह नहीं खोला, और यही दशा दूसरे वरिष्ठ नेता श्री मुरली मनोहर जोशी की भी है। ऐसा लगता है जैसे कि भाजपा में आपातकाल लागू कर दिया गया है।
       दो महीने के लम्बे मौन के बाद नरेन्द्र मोदी ने पिछले दिनों अपना मुँह खोला तो चुनावी घोषणाओं की तरह दहाड़ भरी कि वे न खायेंगे और न खाने देंगे। प्रधानमंत्री कार्यालय के भरेपूरे स्टाफ से सुसज्जित श्री मोदी ने अपना वक्तव्य अनौपचारिक ढंग से दिया जिस कारण उनके शब्द किसी प्रधानमंत्री की कार्यालयीन भाषा की तरह न होकर एक राजनेता की भाषा की तरह बाहर आये। उनकी भाषा के अभ्यस्त लोग समझ गये कि यह वक्तव्य पद का दुरुपयोग कर भ्रष्टाचार करने वालों को सावधान करने वाला वक्तव्य है और विशेष रूप से सत्तारूढ दल के लोगों के लिए दिया गया है। उल्लेखनीय है कि श्री मोदी ने बाराबंकी की सांसद द्वारा अपने पिता को सांसद प्रतिनिधि बनाये जाने और दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी द्वारा अपने मौसेरे भाई को अपने पर्सनल स्टाफ में लेने के खिलाफ अपना असंतोष प्रकट किया था। दिल्ली में आगामी चुनावों को देखते हुए ऐसे तेवर उनकी राजनीतिक जरूरतों में भी शामिल हैं क्योंकि दिल्ली में उनका मुख्य मुकाबला आम आदमी पार्टी से है जिसका गठन ही प्रशासनिक सुधार और लोकतंत्र के स्तम्भों में ईमानदारी लाने हेतु लोकपाल की स्थापना के नाम पर हुआ है। श्री मोदी के इस वक्तव्य का समय भी इसी बात की ओर इशारा करता है, क्योंकि यह किसी घटना, व्यक्ति, या दल विशेष से सम्बन्धित न होकर एक आम घोषणा जैसा है, और प्रत्येक पदासीन व्यक्ति के कर्तव्य का हिस्सा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ देश में कुछ कानून है और राज्यों में लोकायुक्त हैं और घोषित रूप से कोई भी पदासीन नहीं कहता कि वह खा रहा है या किसी को खाने दे रहा है। जहाँ जहाँ भी भ्रष्टाचार प्रकट हुये हैं वहाँ वहाँ उस क्षेत्र विशेष की सरकारों को कार्यवाही करनी पड़ी है। दूसरे राज्यों के मुकाबले मोदी शासित गुजरात राज्य में ही लोकायुक्त की नियुक्ति में विलम्ब हुआ है और बाबूलाल बुखारिया जैसे मंत्रियों को निचली अदालत से दोषी पाये जाने के बाद भी मंत्री बना कर रखा गया। अच्छा होता कि वे अपने इस नये वक्तव्य के समय पिछली भूलों के बारे में भी स्पष्ट करते ताकि लोगों में आशा बँधती।
       भाजपा शासित एक राज्य मध्य प्रदेश भी है जो आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है। कोई सप्ताह ऐसा नहीं जाता जब आयकर, सीबीआई, या लोकायुक्त द्वारा कहीं न कहीं छापा न मारा जाता हो और इन छापों में करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति, गहने, या नगदी न बरामद होती हो। अधिकारियों, बाबुओं, पटवारियों से लेकर नेताओं के रिश्तेदारों के यहाँ ही ये छापे डाले जा रहे हैं और जनप्रतिनिधियों के प्रति सावधानी बरती जा रही है। शासन और प्रशासन से जुड़े लोगों का कहना है कि यह सम्भव ही नहीं है कि सम्बन्धित मंत्रियों की जानकारी और जुड़ाव के बिना इतने लम्बे समय तक इतनी बड़ी बड़ी राशियों के भ्रष्टाचार होते रहें। यदि ऐसा होता भी हो तो भी सम्बन्धित विभाग के मंत्रियों की नैतिक जिम्मेवारी तो बनती ही है और उन्हें उस पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं होता है। उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश सरकार के जो पूर्व वरिष्ठ मंत्री इन दिनों जेल में हैं वे मुख्य मंत्री के इतने विश्वसनीय और कृपापात्र थे कि उनके पास संस्कृति, जनसम्पर्क, उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा और कौशल विकास, धार्मिक न्यास और धर्मस्व, विभाग की जिम्मेवारी एक साथ थी। पूर्व में उनके पास खनिज विभाग भी रहा है। व्यापम के भ्रष्टाचार प्रगट हो जाने और उनकी संलिप्तता के संकेत मिल जाने के बाद भी उन्हें टिकिट दिया गया था और मामले की उच्च न्यायालय की निगरानी में चले जाने के बाद ही उन्हें गिरफ्तार किया गया। अपनी गिरफ्तारी के समय उक्त मंत्री ने बयान दिया था कि बड़े लोगों को बचाने के लिए उनका गिरफ्तार हो जाना ही ठीक है। अब क्या यह बताने की जरूरत है कि बड़े लोग कौन हैं और उनके पद पर जमे रहते हुए भी क्या उनके मातहत अधिकारी जाँच के साथ न्याय कर सकते है! क्या यह सीबीआई की जाँच के लिए उपयुक्त मामला नहीं है! गुड़ न खाने का उपदेश देने वाले बाबाजी ने पहले खुद गुड़ खाना छोड़ा था तब उन्होंने खुद को दूसरों को सलाह देने का पात्र माना था। इस पारदर्शी समय में ओखली में गुड़ फोड़ते रहना सम्भव नहीं है इसलिए जरूरी हो जाता है कि ऐसे आदर्श सन्देशों को देने के साथ साथ स्वयं के दल को साफ सुथरा करके सन्देश देने की पात्रता अर्जित करें। मोदीजी यह जरूरी क्यों नहीं समझते कि व्यापम की जाँच के परिणाम आने तक वे उन राजनेताओं को पद से अलग होने को कहें जिनके ऊपर सन्देह बना हुआ है! विडम्बना यह है कि जब भाजपा के ही विधायक प्रदेश के मंत्री के खिलाफ सार्वजनिक आरोप लगाते हैं तो उन्हें ही चुप रहने की सलाह दी जाती है।
       इसमें कोई सन्देह नहीं कि लोकसभा चुनाव के दौरान जनता के बीच जो उम्मीदें बोयी गयी थीं वे सूखती जा रही हैं और अभी तक केवक ज़ुबानी जमा खर्च चल रहा है। आम लोगों और मीडिया में अच्छे दिन आने की बात फील-गुड की तरह मजाक में बदल चुकी है और न खाने व न खाने देने की बात भी इसी निराशा की भावना से देखी जा सकती है। मध्य प्रदेश समेत सभी भाजपा शासित राज्यों में एक कामराज योजना जैसी योजना लाने की जरूरत है तब ही सही रूप में यह सन्देश जायेगा।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629
          

शुक्रवार, अगस्त 03, 2012

अगर अन्ना हजारे अपने शब्दों पर सचमुच गम्भीर हैं तो .................


अगर अन्ना अपने शब्दों पर सचमुच गम्भीर हैं तो......
वीरेन्द्र जैन
[यह लेख अन्नाटीम द्वारा अनशन त्यागने और चुनावी समर में उतरने कीघोषणा से कुछ दिन पूर्व ही लिखा गया था]  
       यह अविश्वास का समय है। किसी भी क्षेत्र के नेतृत्वकारी लोगों पर पूर्ण भरोसा करने वाले लोगों की संख्या दिनों दिन घटती जा रही है। गान्धी नेहरू के बाद शायद जयप्रकाश नारायण वह अंतिम व्यक्ति थे जिन पर देश के एक बड़े वर्ग ने भरोसा किया था। यही कारण है कि देश में परिवर्तन चाहने वाले लोगों को पुराने प्रतीकों से काम चलाना पड़ता है। सम्भवतः इसी समझ के कारण केजरीवाल-सिसोदिया ग्रुप ने अपने आन्दोलन की विश्वसनीयता के लिए एक गान्धीनुमा प्रतीक का चयन किया जिन्हें लोग अन्ना हजारे के नाम से जानते हैं। फौज की साधारण नौकरी छोड़ कर आये अन्ना हजारे ने अपना परिवार नहीं बनाया, अपने गाँव में जनसहयोग के माध्यम से उन्होंने समाज सुधार के कुछ सफल काम किये और गान्धी के अनशन अस्त्र का प्रयोग करके महाराष्ट्र राज्य में कुछ दागी मंत्रियों को पद से मुक्त कराने में सफलता का श्रेय प्राप्त किया,[भले ही इसमें सत्तारूढों की दलीय गुटबाजी की भी एक भूमिका रही हो]।
       पर अन्ना हजारे, गान्धी जैसे सुशिक्षित, अनुभवी, चतुर और समझदार नहीं हैं। एक लोकप्रिय शायर का शे’र है- ‘ये जाफरानी पुलोवर, उसी का हिस्सा है/ दूसरा कोई जो पहिने तो दूसरा ही लगे’। गान्धी के इस पुराने अस्त्र का प्रयोग करते समय यह ध्यान रखना होगा कि अनशन दुश्मन को नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं अपितु अपने लोगों की सम्वेदनाओं को झकझोरने के लिए किया जाता है। नेहरूजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मैं कई बार गान्धीजी से सहमत नहीं था, पर वे अनशन पर बैठ गये थे और मैं नहीं चाहता था कि गान्धीजी को कुछ नुकसान हो इसलिए मुझे उनकी बात माननी पड़ी। अम्बेडकर को मनाने के लिए भी उन्होंने यर्वदा जेल में अनशन किया था जिस कारण असहमत होते हुए भी अम्बेडकर को अपनी माँगों से पीछे हटना पड़ा था। यह गान्धीजी के व्यक्तित्व का ही प्रभाव था कि उनके जीवन को बचाने के लिए लोग जिस तरह से सहमत हो जाते थे या उदासीनता त्याग कर आन्दोलन में सम्मलित होते जाते थे, आज न वैसे लोग हैं और न ही अनशनकारियों का वैसा व्यक्तित्व ही है। व्यक्तियों में बदल चुके समाज और बाज़ारवादी संस्कृति ने सबसे बड़ा हमला हमारी सम्वेदना पर ही किया है। आज दुर्घटना में घायल हुए व्यक्ति के पास से सैकड़ों वाहन गुजर जाते हैं पर कोई उसकी सहायता के लिए नहीं रुकता। भोपाल के पास मंडीदीप में शराब की बोतलों से भरा एक ट्रक उलट गया तो लोग शराब की बोतलें तो लूट ले गये किंतु दबे हुए ड्राइवर क्लीनर को किसी ने नहीं निकाला और उनकी मृत्यु हो गयी। भोपाल से ही एक क्रिकेट खिलाड़ी को अचानक राष्ट्रीय स्तर पर खेल के लिए बुलावा आ गया तो उसके लिए किसी ने भी अपनी फ्लाइट कैंसिल करके अपनी सीट उसे नहीं दी जिससे उसका मैच चूक गया, जबकि ऐसा नहीं हो सकता कि सारे ही लोग ऐसे काम से जा रहे हों जिसे एक दिन टाला नहीं जा सकता हो। ऐसी असंख्य घटनाएं प्रतिदिन हमारे चारों ओर घट रही हैं। यह समय गान्धीजी के समय की सम्वेदना से बहुत भिन्न है, इसलिए पिछले दस वर्षों से लगातार अनशन कर रही इरोम शर्मिला के अनशन से न तो सरकार और न ही समाज में कोई हलचल देखने को नहीं मिली।
       गान्धीजी के कटुतम आलोचकों ने भी इस बात को स्वीकारा है कि उन से असहमतियां हो सकती हैं पर  वे एक सच बोलने वाले आदमी थे। इन दिनों दूरदर्शन पर एक सन्देश विज्ञापन आता है जिसमें भी गान्धीजी कहते हुए दिखाये गये हैं कि मैं तो सच्ची सच्ची बात कहने वाला आदमी हूं.................। उनकी आत्म कथा का नाम भी ‘सत्य के प्रयोग’ ही है। अन्नाजी जब गान्धी जी के तरीके का स्तेमाल कर रहे हैं तो उन्हें अपने व्यक्तित्व को एक सच्चे आदमी की तरह मान्य बनाना होगा। यह उल्लेख करना गलत नहीं होगा कि आज देश में प्रतिवर्ष सैकड़ों की संख्या में ‘आमरण अनशन’ होते हैं जिनकी अवधि भी पहले से तय होती है। इन ‘आमरण अनशनों’ को एक दिन की स्थानीय कवरेज से अधिक का महत्व नहीं मिलता क्योंकि सब मानते हैं कि यह ड्रामा अपना व्यक्तिगत स्वार्थ हल कराने के लिए मामले को सार्वजनिक सा दिखाने की कोशिश है। परिणाम स्वरूप इस सम्वेदनहीन समय में यदि कोई सचमुच गम्भीर भी है तो भी लोग सन्देह करते हैं। ऐसे में अगर अन्ना हजारे अपेक्षाकृत बड़े समुदाय का ध्यान आकर्षित करने में सफल हुए हैं तो उसका कारण गान्धी की छवि का प्रभाव है। दूसरी ओर वे जैसे जैसे गान्धी की छवि से दूर जाते हैं वसे ही वैसे उनकी विश्वसनीयता घटती है। दुर्भाग्य यह है कि वे आज की असत्य पर आधारित राजनीति के चंगुल में फँसते जा रहे हैं और उनकी विश्वसनीयता दिनों दिन घटती जा रही है।
       अन्ना से उम्मीद रखने वाले लोगों के लिए यह जानना एक बड़े धक्के की तरह था कि गान्धी की छवि को आधार बनाने वाला व्यक्ति गान्धी की हत्या के विचार के जनक संगठन से गलबहियां कर रहा है जिनकी प्रचार सामग्री में आज भी गान्धी की हत्या को ‘गान्धी वध’ और गोडसे की किताबें बिकती हैं। जब अन्ना अनशन करते हैं तो भीड़ जुटाने के लिए इसी संगठन के लोग अपनी पहचान छुपा और अपना खजाना खोल कर हजारों लोगों के लंगर की व्यवस्था करते हैं और बाद में दावे के साथ लोगों को बताते भी हैं। अन्ना की जगह अगर गान्धीजी होते तो वे शुरू से ही इसे छुपाने की कोशिश नहीं करते पर अन्ना हजारे और उनकी टीम ने उस पर परदा डालने का काम किया। लोगों को यह सन्देह होना स्वाभाविक ही है कि अभी जो बातें सामने नहीं आयी हैं वे न जाने कितनी होंगीं। स्मरणीय है कि गान्धीजी की हत्या से जुड़े संग़ठन की भाषा भले ही बदल गयी हो पर न तो आज तक उसने कभी अपने किये का खेद व्यक्त किया और न ही अपने विचार ही बदले हैं। उन्हें जब भी मौका मिलता है वे राष्ट्र की धर्मनिरपेक्षता को चोट पहुँचाने से गुरेज नहीं करते और केन्द्र तथा गुजरात राज्य में सत्ता होने पर तो उन्होंने अपना असली स्वरूप ही दिखा दिया जिसके बाद उनके साथ हाथ मिलाना तक एक राष्ट्रीय शर्म बन चुकी है। उनके साथ गठबन्धन करने वाले दल तक उनके साथ बैठने को एक मजबूरी बताते हैं। दूसरी ओर जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आन्दोलन कर रहे हैं उनके ये सहयोगी उसमें आकंठ लिप्त हैं, इसे देश का बच्चा बच्चा जानता है। उक्त संग़ठन अगर किसी के साथ सहयोग करते हैं तो उसके अस्तित्व और उसके समर्थन को हड़पने के लिए करते हैं, इसलिए यह उम्मीद करना कि उनका सहयोग लेकर अपने आन्दोलन की घोषित भावना को बचा कर रखा जा सकता है, समझदारी नहीं कही जा सकती। वे या तो मौका देख कर अपना आधार खींच लेंगे या गुलाम बना लेंगे और ये दोनों ही बातें अन्ना के आन्दोलन और स्वयं अन्ना के हित में नहीं होंगीं। लगभग ऐसा ही हाल आयुर्वेदिक दवाओं के व्यापारी बाबा भेषधारी रामदेव के साथ सहयोग का भी है जो अपनी व्यापारिक अनियमिताओं के कारण कानून की नजर में है और बिना किसी द्वेष के भी कानूनी कार्यवाही से उनका साम्राज्य ध्वस्त हो सकता है। एक ओर तो उनकी राजनीतिक महात्वाकांक्षाएं हैं और दूसरी ओर अपने व्यावसायिक हितों के संरक्षण के लिए उन्हें ग्राहिकी और जनसमर्थन चाहिए।
       गान्धीजी इस समझदारी के लिए विख्यात थे कि वे अपनी विचारधारा से विचलन को स्वीकार नहीं करते थे और तात्कालिक सफलता के लिए किसी भी तरह का समझौता करना पसन्द नहीं करते थे। स्मरणीय है कि चौरी चौरा कांड में घटित हिंसा के बाद गान्धीजी ने व्यापक रूप से सफल हो रहे अपने आन्दोलन को वापिस ले लिया था। यही कारण है कि उनके विचारों और सन्देशों में एक ताकत थी और उनका अनशन एक आन्दोलन बन जाता था।
       भीड़ की चिंता करना चुनावी पार्टियों का काम है और गलत दोस्तों की तुलना में समझदार दुश्मन ज्यादा अच्छा होता है। अन्ना अगर बार बार दिखावटी अनशन करते रहे तो वे क्रमशः अपनी धार खोते जायेंगे और  वीकेंड मनाने वाली भीड़ के नेता होकर रह जायेंगे, पर यदि वे किसी ज़िद में आकर सचमुच ही लम्बा अनशन कर बैठे तो इस सम्वेदनहीन समाज में इरोम शर्मीला होकर रह जायेंगे। उन्होंने देश के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण समस्या को हल करने के आन्दोलन का प्रतीक पुरुष बनना स्वीकार किया है, पर यह समस्या सचमुच हल भी हो सके इसके लिए समयानुकूल व्यवहारिक समाधान की तलाश की ओर बढना चाहिए। विचार करने की जरूरत यह भी है क्यों कुछ प्रमुख लोग उनके आन्दोलन को छोड़ कर चले गये हैं क्योंकि उनमें से सभी नकली नहीं थे। 
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629
        

रविवार, मार्च 25, 2012

जेल अधिकारियों के पास दौलत के खजाने - एक विचारणीय प्रश्न


जेल अधिकारी के पास दौलत के खजाने – एक विचारणीय प्रश्न  
वीरेन्द्र जैन
                मध्य प्रदेश में शायद ही कोई सप्ताह ऐसा जाता हो जब किसी अफसर, इंस्पेक्टर, क्लर्क, चपरासी, ठेकेदार, व्यापारी, नेताओं के दलाल आदि के यहाँ आयकर या लोकायुक्त का छापा न पड़ता हो या और उस छापे में अकूत धन सम्पत्ति आदि न बरामद होती हो। बरामद की गयी ये अनुपातहीन सम्पत्ति रिश्वत, कमीशन, आदि के द्वारा अर्जित की जाती है जो या तो अदालत दर अदालत लम्बे चले मुकदमों के बाद वापिस उसी व्यक्ति के पास पहुँच जाती है, या मामूली जुर्माने आदि लगा कर मामले को रफा दफा कर दिया जाता है। प्रदेश की जेलें अभी तक दण्डित भ्रष्टाचारियों को कैद रखने के लिए तरस रही हैं। वह सम्पत्ति कैसे कैसे और किस किस के गलत काम कर कर के अर्जित की गयी होती है उसकी कोई पूछ परख नहीं की जाती ताकि भविष्य में उसके रोकने की व्यवस्थाएं की जा सकें। दण्ड देने के पीछे एक दृष्टिकोण यह भी होता है कि दूसरा कोई व्यक्ति वैसी ही गलती करने से डरे, किंतु रोचक यह है कि पकड़े गये व्यक्ति के बाद आने वाला उसका उत्तराधिकारी भी वैसे ही कामों में संलग्न हो जाता है और यदा कदा कुछ समय बाद उनमें से कुछ ऐसे ही पकड़े भी जाते हैं, जिसे वे खेल भावना की तरह लेते हुए कानून के छिद्रों से बच निकलने के रास्ते तलाशने कोई बड़ा वकील करने लगते हैं। स्मरणीय है कि देश के मुख्य सतर्कता आयुक्त ने सेवा निवृत्ति के अगले दिन ही कहा था कि देश का हर तीसरा आदमी [सरकारी कर्मचारी] भ्रष्ट है। उन्होंने यह भी कहा था कि कुल तीन प्रतिशत भ्रष्टाचारी ही जाँच के दायरे में आ पाते हैं और उनमें से भी कुल चार प्रतिशत पर कानूनी कार्यवाही होती है।
      पिछले दिनों जिन आईएएस आफीसर्स, डिप्टी कलेक्टर्स्, इंजीनियर्स, रजिस्ट्रार, आरटीओ, निरीक्षक, आडीटर्स, स्टोरकीपर्स, एकाउंटेंट, पटवारी, चपरासी, आदि के यहाँ से छापों में जो करोड़ों की रकमें और सम्पत्तियाँ मिली हैं उनके बारे में तो एक अनुमान सा रहता है कि ये सम्पत्तियां कैसे भुगतान की फाइलें रोकने, काम में अड़ंगा लगाने, गलत फैसले लेने, झूठे बिल बनाने आदि के द्वारा बनायी जाती हैं। अगर कोई सरकार चाहे तो पूरा हिसाब करके सारे लेने और देने वालों को एक घेरे में ला सकती है पर ये काम सरकार के कामों की प्राथमिकताओं में नहीं आता जिसका कारण भी मंत्रियों की अनुपात हीन सम्पत्ति वृद्धि को देख कर अनुमानित किया जा सकता है।
       पिछले दिनों इन्दौर की सेन्ट्रल जेल अधीक्षक के यहाँ छापे में जितनी बड़ी मात्रा में सम्पत्तियां मिली हैं वे चौंकाने वाली हैं। इस छापे में पकड़ में आयी सम्पत्ति की कुल कीमत लगभग पन्द्रह करोड़ है। इनमें भोपाल की पाश कालोनी में तीन आलीशान मकान, एक गर्ल्स हास्टल, चार दुकानें पाँच प्लाट, 14 एकड़ कृषि भूमि व इन्दौर के विकास प्राधिकरण की योजनाओं में दो प्लाट सम्मलित हैं। छापे के दौरान ही सम्बन्धित अधीक्षक के लड़के ने दो लाख रुपयों की पोटली बना कर खिड़की से सड़क पर फेंक दिये जिसे दो पुलिस कानिस्टबलों द्वारा देख लिये जाने से वे बरामद हो गये। अगले दिन जब उनका लाकर खोला गया तो उसमें ग्यारह लाख रुपये बरामद हुये। सवाल उठता है कि जिस जेल अधीक्षक द्वारा कुल अर्जित वेतन 39 लाख के आस पास ही बैठता हो उसके पास 15 करोड़ कीमत की सम्पत्तियां सरकार और कानून को किस तरह से चूना लगा कर एकत्रित हो गयीं!
      जेल जाने के अनुभवों से सम्पन्न विभिन्न व्यक्तियों से जानकारी करने पर ज्ञात हुआ है कि अदालतों द्वारा बमुश्किल दी गयी सजा को धता बता कर ही ये सम्पत्तियां अर्जित की जाती हैं। मुकदमों को लम्बे समय तक टालने के बाद जो भी व्यक्ति जेल पहुँचता है वह अगर पैसे वाला या प्रभावशील हुआ तो जेल में जाते ही बीमार बन जाता है जिससे उसे सिक यूनिट में भेज दिया जाता है जहाँ उसे लेटने के लिए पलंग, कूलर, तथा डाक्टरों द्वारा बताया गया खाना मिलने लगता है, जो जेल में मिलने वाले पशुओं के भोजन के समतुल्य भोजन की तुलना में बहुत शानदार होता है। इस सुविधा की कीमत चुकायी जाती है जो किसी भी पाँच सितारा होटल के कमरे व भोजन से कई कई गुना होती है। पद और पैसे वाले व्यक्ति को जेल के कैदियों से अपनी सुरक्षा भी करना पड़ती है क्योंकि जेल अधिकारियों की मिली भगत से ऐसी परिस्तिथियां बना दी जाती हैं जिस कारण वे ऐसी सुरक्षा लेने के लिए विवश हो जाते हैं। बताया गया है कि जब पुराने खूंखार कैदी गालियां बकते हैं या उन पर हमला कर देते हैं तो जेलर की भाषा में इसे कैदियों की आपसी लड़ाई माना जाता है। अपने खूंखार तरीके से आतंक पैदा करने वाले कुछ कैदी हर जेल में जेलर द्वारा पाले जाते हैं जिनके साथ समझौता करा के जेलर उचित सुविधा शुल्क लेकर अमीर कैदी को, सुरुचिपूर्ण भोजन घर या होटल से मँगवाने की सुविधा दे कर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करता है। पैसा मिलने पर आदतन अपराधी कैदियों को मोबाइल भी उपलब्ध करा दिया जाता है जिससे वे जेल में बैठे हुए ही जेल से बाहर के दौलतवानों को डराते धमकाते रहते हैं और धर्मस्थल बनवाने आदि के नाम पर पैसे वसूल करते रहते हैं। जाहिर है कि इस वसूली के लिए अपराधी का एजेंट जेलर साहब के लिए भी उचित व्यवस्था करता है। कुछ जिलों में तो अपराधियों को रहजनी करने के लिए रात में छोड़ा भी जाता है ताकि वे कमाई करके ला सकें और पुलिस उन्हें गिरफ्तार भी नहीं कर सके। गाँव के कई लाइसेंसधारी तो अपनी बन्दूक भी इस काम के लिए किराये पर चलवाते हैं। जब जेलर अपराधी के जेल के अन्दर होने की पुष्टि कर रहा हो तब उसके खिलाफ रिपोर्ट कैसे हो सकती है। सर्वसुविधा सम्पन्न जेल उनकी सुरक्षागाह बनी रहती है।
      कैदियों के भोजन से खूब कमाई की जाती है क्योंकि उन्हें जेल के नियामानुसार भोजन नहीं दिया जाता। बहुत सारे न्यायाधीश तो जेल में गये बिना ही सब ठीक होने की निरीक्षण रिपोर्ट दे देते हैं, जो कैदियों द्वारा बतायी गयी दशा से मेल नहीं खाती।  कैदियों द्वारा किये गये काम का पूरा भुगतान उनके जेल से छूटने पर दिया गया बताया जाता है पर जो आम तौर पर कैदी से दस्तखत लेने के बाद जेल अधिकारियों के पास ही रह जाता है। प्रभावशाली कैदियों को सुविधा शुल्क चुका कर बिना अदालती अनुमति के छुट्टियां मिलती रहती हैं। जो जितना खूंखार अपराधी होता है उसकी छुट्टी उतनी ही मँहगी होती है। देश विरोधी आतंकी घटनाओं के सम्बन्ध में कैद लोगों की उनके लोगों से मुलाकात करा देने की कीमत भी बहुत होती है।       
      एक जेलर का भ्रष्टाचार इसलिए अधिक गम्भीर है क्योंकि इससे समाज में जेल जाने के प्रति भय कम हो जाता है। जब पैसे से जेल में सारी असुविधाओं को निर्मूल किया जा सकता है तो व्यक्ति नैतिक होने की जगह सारा ध्यान किसी भी वैध अवैध तरीके से धन कमाने में लगा देता है। आंकड़े गवाह हैं कि सवर्ण जातियों और आर्थिक रूप से सम्पन्न लोगों को कम से कम सजाएं मिल सकी हैं तथा जिन्हें कभी भूले भटके मिलती भी हैं उन्हें उनके घर जैसी सुविधाएं मिलती रही हैं। कभी किसी ने मजाक में जेल को ससुराल कहा था किंतु उपरोक्त घटना बताती है कि पैसा होने पर यह सचमुच ससुराल जैसी बन सकती है। बताया गया है कि कतिपय कारागारों में तो सतत जुआ चलता रहता है और सट्टे के नम्बर भी लगते रहते हैं।
      जिस जेल के जेलर के यहाँ छापा मारकर इतनी बड़ी रकम पकड़ी जाती है उसमें ही कुछ खूंखार आतंकी भी बन्द रहते आये हैं। यदि पैसे की दम पर कोई आतंकी जेल से भागने में सफल हो जायेगा तो हमारे जाँबाज सुरक्षा बलों के सदप्रयासों को ठेस लग सकती है । इसलिए जरूरी है कि इस तरह के भ्रष्टाचार के अपराध में पकड़े गये आरोपियों से कठोर तरीके पूछताछ हो ताकि लोकतंत्र के तल में बैठ रही गन्ध से मुक्ति पायी जा सके। 
  ohjsUnz tSu
2@1 ’kkyhekj LVfyZax jk;lsu jksM
vIljk Vkdht ds ikl  Hkksiky e-iz-
Qksu 9425674629  





     

शनिवार, दिसंबर 31, 2011

दलों में उद्योगपति, भूमाफिया, बिल्डर और् शिक्षा माफिया,


राजनीतिक दलों में उद्योगपति, भूमाफिया, बिल्डर, और शिक्षामाफिया
                                                               वीरेन्द्र जैन
      कोई भी भारतीय नागरिक देश में चुनाव आयोग के पास  पंजीकृत डेढ हजार दलों में से [कैडर आधारित एक बामपंथी दल को छोड़ कर] किसी भी दल की सदस्यता सरलता पूर्वक ग्रहण कर सकता है और शायद ही किसी दल ने सदस्यता के लिए आवेदन करने वाले नागरिक को साधारण सदस्य बनाने से इंकार किया हो। जो दल साम्प्रदायिक समझे जाते हैं वे भी दूसरे समुदाय के सदस्य मिलने पर अपने ऊपर लगे दाग को धोने का नमूना बनाते हुए उसे खुशी खुशी सदस्यता देते हैं, और अन्यथा न जीतने की सम्भावना वाली सीटों से टिकिट भी देते हैं।
      पिछले कुछ वर्षों के दौरान चुनाव आयोग ने स्वच्छ चुनाव कराने की दृष्टि से कुछ  नियमों का पालन करना अनिवार्य तो किया है पर दलों पर ऐसी कोई आचार संहिता लागू नहीं की गयी है जिससे वे हमारे संविधान निर्माताओं के सपनों के अनुसार ही आचरण कर के एक आदर्श लोकतंत्र स्थापित करने में मदद करें। आज हमारे अधिकांश प्रमुख राजनीतिक दल अनेकानेक विकृत्तियों के शिकार हैं और ऎन केन प्रकारेण सत्ता हथियाने व उसका दुरुपयोग करने का प्रयास करने वालों के गिरोह बन गये हैं। किसी दल का व्यय कैसे चलता है इसकी जानकारी ना तो चुनाव आयोग को होती है और ना ही यह जानकारी सार्वजनिक  होती है। आज जब चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को अपनी सम्पत्ति घोषित करना और चुनाव खर्च का दैनिक अडिट होना अनिवार्य कर दिया गया है तो उन उम्मीदवारों को टिकिट देने वाले राजनीतिक दलों के आय व्यय को गोपनीय क्यों रहना चाहिए। जो दल देश के शासक बन सकते हैं उन्हें पारदर्शी होना चाहिए।
      किसी उद्योग द्वारा किसी दल को चन्दा देना कहाँ तक उचित है? यह काम अगर कोई व्यक्ति करता है तो एक मतदाता के रूप में यह उसकी व्यक्तिगत पसन्दगी नापसन्दगी का सवाल होता है किंतु प्रतिष्ठान के रूप में किसी कम्पनी द्वारा किसी दल को चन्दा देने का सीधा सीधा मतलब होता है कि वह एक अनुचित पक्षधरता की चाह में दी गयी रिश्वत है, ताकि सरकार बनने की स्तिथि में उक्त दल उनका मददगार हो। ऐसा होता भी है। रोचक यह है कि एक ही औद्योगिक संस्थान एक से अधिक दलों को चुनावी चन्दा देते हैं जो निश्चित रूप से चुनावी चन्दा नहीं हो सकता क्योंकि एक वोट देने की क्षमता रखने वाला कोई व्यक्ति या कम्पनी का निदेशक भिन्न विचारधारा वाले एक से अधिक दलों में विश्वास कैसे व्यक्त कर सकता है। यह परोक्ष में एक व्यापारिक सौदेबाजी ही होती है। नीरा राडिया के टेप्स और जनार्दन रेड्डी द्वारा अपनी जेब का मुख्य मंत्री बनवाने के बाद वैसे ही प्रधानमंत्री बनवाने का सपना देखने की खबरें इसका ज्वलंत उदाहरण है। यह बात आज पूरा देश जानता है कि भूमाफिया. खननमाफिया, बिल्डर, शिक्षामाफिया, शासकीय सप्लायर, ठेकेदार, आयातक निर्यातक, उद्योगापति आदि ही सरकारें बनवाने में भूमिकाएं निभा रहे हैं अपने पक्ष में नीतियां बनवा रहे हैं। मंत्री और जनप्रतिनिधि इनसे घिरे रहते हैं तथा उनके दस्तखत किये हुए खाली लैटरहैड उनके ब्रीफकेस में पड़े रहते हैं।
      आम तौर पर दल अपने सिद्धांत और घोषणाएं कुछ और बताते हैं तथा चुनाव के बाद आचरण कुछ और करते हैं। जब कोई छोटी मोटी चीज बेचने वाला अपने पैकिट पर  लिखी सामग्री से कुछ भिन्न बेचती पाया जाता है तो अपराधी माना जाता है किंतु पूरे देश की जनता को धोखा देने वाला किसी कानून के अंतर्गत नहीं आता। चुनाव आयोग के पास दलों को अपने चुनावी लाभ के लिए अपने घोषित सिद्धांतों से विचलित होने को रोकने के कोई अधिकार नहीं हैं और न ही इसके लिए ऐसी ही कोई अन्य संस्था या विभाग कार्यरत है। कुछ दलों को छोड़ कर अधिकतर दल किसी नेता की अपनी महात्वाकांक्षा, उसके जातीय, क्षेत्रीय सम्पर्क या गैर राजनैतिक कारणों से अर्जित लोकप्रियता को भुनाने के उद्देश्य से बना लिए जाते हैं। ऐसा कोई नियम नहीं है कि चुनाव आयोग में पंजीकृत कराते समय उसके कार्यक्रम और घोषणा पत्र पर आयोग द्वारा उससे पूछा जाये कि जब उसके दल के घोषणा पत्र में वे ही सारे विन्दु हैं जो पहले से पंजीकृत दूसरे दल में भी हैं तो वह उस दल के साथ मिलकर काम क्यों नहीं कर सकता! बहुत सारे छोटे दल दूसरे बड़े दलों को चुनावी नुकसान पहुँचाने अर्थात लोकतंत्र की भावना को विचलित करने के लिए बना लिये जाते हैं, जिन्हें परोक्ष में उनके विपक्षी मदद कर रहे होते हैं। कुल मिलाकर सारी कवायद लोकतंत्र के नाम पर शासन को कुछ निहित स्वार्थों तक केन्द्रित कर देने के लिए होती है। यह बात पहले कभी दबी छुपी रहती थी पर अब जग जाहिर हो चुकी है। किसी भी व्यवस्था में अगर समय रहते सुधार नहीं होते हैं तो फिर विकृतियों से जनित दुर्व्यवस्था के खिलाफ कभी भी अचानक गुस्सा फूट पड़ता है जो सुधार तो नहीं कर पाता पर स्थापित व्यवस्था को नुकसान अवश्य पहुँचा देता है। इसलिए जरूरी है कि उभरती विकृतियों के समानांतर उसके उपचार भी किये जायें। कुछ उपाय निम्न बिन्दुओं पर केन्द्रित किये जा सकते हैं-
  • राजनीतिक दलों और उनके सदस्यों को एक घोषित आचार संहिता में बाँधा जाये, तथा उस का पालन अनिवार्य किया जाय।
  • दलों की सदस्यता को बेकामों, बेरोजगारों की फौज बनाने की जगह अपने दल की घोषणाओं के लिए काम करने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं के रूप में अनिवार्य बनाये जाने के उपाय किये जायें। इसके लिए दलों में पदोन्नति के लिए राजनीतिक प्रशिक्षण की कक्षाओं को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
  • दलों द्वारा अपनाये गये सामाजिक सुधार के कुछ निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराया जाना चाहिए, जैसे कि सक्षम सदस्यों द्वारा रक्तदान, नेत्र दान, परिवार में टीकाकरण, परिवार नियोजन के आदर्शों का पालन, अपने द्वारा पालित बच्चों को अनिवार्य शिक्षा, सती प्रथा, दहेज प्रथा, साम्प्रदायिकता का सक्रिय विरोध आदि
  • प्रत्येक सदस्य से आय के अनुपात में लेवी तय की जाना चाहिए।
  • चुनाव के लिए टिकिट दिये जाने के सम्बन्ध में कुछ न्यूनतम पात्रताएं तय की जाना चाहिए। इसमें दल में सदस्यता की अवधि भी एक प्रमुख पात्रता होना चाहिए।
  • किसी दल का सदस्य यदि कोई अपराध करता है तो उसके मूल में दल की सामूहिकता का बल भी उसके ध्यान में रहता है। इसलिए आरोप लगने पर दल द्वारा तुरंत जाँच और उसके अनुसार कार्यवाही का किया जाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए ताकि उसकी आँच दल तक न पहुँचे और कोई दल के भरोसे अपराध करने से बचे।
सभी पंजीकृत दलों में आंतरिक लोकतंत्र को बढावा देकर भी दलों और परोक्ष में देश की शासन व्यवस्था में सुधार लाया जा सकता है। इससे कुकरमुत्तों की तरह उग आये जेबी दल भी कम हो कर सच्चे लोकतंत्र को स्थापित होने में सहयोग करेंगे।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629

बुधवार, सितंबर 14, 2011

अडवाणीजी की रथयात्रा- बहुत देर कर दी मेहरवाँ आते आते


अडवाणीजी की रथयात्रा
                     बहुत देर कर दी मेहरवाँ आते आते
                                                             वीरेन्द्र जैन 

      वैसे तो अडवाणीजी पार्टी संगठन या सदन में किसी पद पर नहीं हैं, पर अटलजी को भुला दिये जाने, व मुरली मनोहर जोशी को हाशिये पर कर दिये जाने के बाद वे भाजपा के सुप्रीमो बन गये हैं। अध्यक्ष कोई भी बना रहे पर उनकी उपेक्षा करके भाजपा में कुछ भी नहीं हो सकता। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की इस घोषणा के बाद कि अगले चुनाव में किसी को भी भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश नहीं किया जायेगा, उन्होंने एक बार फिर रथयात्रा निकालने का फैसला किया है और यह रथ यात्रा भ्रष्टाचार के विरोध के नाम पर करेंगे। उल्लेखनीय है कि गत दिनों उज्जैन में आयोजित राष्ट्रीय सवयं सेवक संघ के शिखर मंडल की बैठक में भाजपा नेतृत्व से पूछा गया था कि भ्रष्टाचार के विरोध में जो राष्ट्रव्यापी हलचल अन्ना हजारे ने पैदा की वह भाजपा क्यों नहीं कर सकी। यह रथयात्रा उसी झिड़की का प्रतिफल प्रतीत होती है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अन्ना हजारे द्वारा बनाये गये माहौल का राजनीतिक लाभ उठाने की एक और अवसरवादी कोशिश है।
      भाजपा हमेशा ही दूसरों के अभियानों में घुसकर उसकी लोकप्रियता के सहारे अपना श्रंगार करने वाली पार्टी रही है क्योंकि वे जानते हैं कि उनके मूल चेहरे को देश का बहुमत पसन्द नहीं करता इसलिए वे कारवाँ में शामिल होकर उसे ही रास्ते में लूट लेने की नीति पर चलते हैं। स्मरणीय है वे अपने जनसंघ स्वरूप से ही संविद सरकारों के प्रमुख घटक रहे हैं और प्रत्येक संविद सरकार में सम्मलित होने के लिए सदैव आगे रहे हैं। इसी तरकीब से किसी समय के सक्रिय समाजवादी आन्दोलन को अब तक उन्होंने पूरी तरह पचा लिया है और बिना किसी राजनीतिक अभियान के देश में प्रमुख विपक्षी दल बन गये हैं। जनता पार्टी बनने पर उन्होंने झूठमूठ अपनी पार्टी का विलय कर दिया था और बाद में पहचान लिए जाने के बाद वैसे के वैसे समूचे बाहर आ गये थे। वह केन्द्र में देश की पहली गैरकांग्रेसवाद के आधार पर गठित सरकार थी जो इन्हीं की दुहरी सदस्यता के सवाल पर टूटी थी। बाद में 1989 में वीपी सिंह की लोकप्रियता से जुड़ कर इन्होंने उनकी सरकार में सम्मलित होने की भरपूर कोशिश की किंतु बामपंथ के विरोध के कारण इन्हें बाहर रहना पड़ा तो इन्होंने आरक्षण विरोधियों को पिछले रास्ते से मदद करके व रामजन्म भूमि के नाम साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण पैदा कर उनकी सरकार गिरवा दी क्योंकि वह सरकार बामपंथ और भाजपा दोनों के सहयोग के बिना नहीं चल सकती थी। दोनों ही स्थितियों में ये लाभ में रहे और लोकप्रिय व्यक्तियों से राजनीतिक सौदा व दलबदल को प्रोत्साहित करते करते सबसे बड़े विपक्षी दल बन गये, जिसके फलस्वरूप इन्हें छह साल केन्द्र में एक गठबन्धन सरकार चलाने का अवसर मिला।
       अपनी पिछली बहुचर्चित रथयात्रा अडवाणीजी ने किसी राजनीतिक मुद्दे पर नहीं निकाली थी अपितु वहीं राम जन्मभूमि मन्दिर बनाने के नाम अयोध्या की ऎतिहासिक बाबरी मस्जिद ध्वंस करने के लिए निकाली थी। इस यात्रा से एक ओर तो लोगों की भावनाओं को उभारने की कोशिश थी तो दूसरी ओर साम्प्रदायिकता भड़का कर धार्मिक ध्रुवीकरण करने की कोशिश थी। इनके समर्थक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत मुसलमानों के खिलाफ उत्तेजित और अपमानजनक नारे लगाते हुए मुस्लिम बस्तियों से यात्रा निकालते थे जिससे टकराव बढता था और दंगे हो जाते थे। इन दंगों और उसके बाद की प्रतिक्रिया में दोनों ही समुदाय के सैकड़ों लोग मारे गये थे जिससे बने गैरराजनीतिक ध्रुवीकरण का इन्हें जबरदस्त लाभ मिला और संसद में इनकी संख्या दो से दोसौ तक पहुँच गयी।
      प्रस्तावित रथयात्रा उसी मानक पर निकालने की भूल है जबकि तब से अब तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है, बहुत से खुलासे हो चुके हैं, लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट आ चुकी है, और परिस्तिथियों में बहुत सारा बदलाव आ गया है।
      इसमें कोई सन्देह नहीं कि नई आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद राजनीतिक संरक्षण में प्रशासनिक भ्रष्टाचार बहुत बढ गया है और आम जनता उससे पीड़ित है। इस भ्रष्टाचार में बामपथियों के एक छोटे से हिस्से को छोड़, चुनावों में भरी राशि खर्च करने वाले भाजपा समेत सभी राजनीतिक दल लिप्त हैं। जहाँ जहाँ भाजपा की सरकारें हैं या जहाँ से उनके जनप्रतिनिधि चुने गये हैं वहाँ वहाँ ये भ्रष्टाचार में दूसरे किसी भी दल से पीछे नहीं है। ऐसी दशा में अडवाणीजी की यात्रा भ्रष्टाचार के विरोध में न होकर सीधे सीधे सत्तारूढ दल के खिलाफ एक राजनीतिक अभियान है। यह अभियान इसलिए निष्प्रभावी रहने वाला है क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ दुहरे मापदण्ड अपनाने से इनकी अपील का अन्ना हजारे की अपील से बेहतर असर नहीं होने वाला। इन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में भी स्विस बैंकों में जमा धन का मुद्दा उछाला था जिसे चुनाव के बाद बिल्कुल ही भुला दिया। अन्ना हजारे तो क्या ये तो बाबा रामदेव के आवाहन से भी पीछे रहे और अब जो कुछ भी करेंगे उसे नकल ही माना जायेगा।
      इस जनसम्पर्क यात्रा का नाम रथयात्रा रखना बिडम्बनापूर्ण है। जो यात्रा पैट्रोल या डीजल वाहन से की जा रही है उसे रथ नहीं कहा जा सकता क्योंकि रथ एक प्राचीन कालीन वाहन होता था जो पशुओं के सहारे चलता था। आखिर क्या कारण है कि वे वाहन शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहते, और उसे रथ कहते हैं। रथ पौराणिक ग्रंथों से निकला शब्द है और हमें उसी काल की याद दिला देता है जिस काल में वे ग्रन्थ रचे गये थे इस तरह रथ कहने से मामला कुछ कुछ धार्मिक सा भी हो जाता है। जब रामजन्म भूमि मन्दिर के लिए यात्रा निकाली थी तब रामलीला के मंच जैसे वाहन के लिए रथ शब्द का प्रयोग कुछ सामंजस्य भी बिठा लेता था पर एक राजनीतिक सामाजिक आन्दोलन के लिए प्रचलित भाषा और प्रतीकों का प्रयोग ही करना होता है। भाजपा का प्रयास देश के इतिहास से मुगलकाल और उस दौर में विकसित भाषा और संस्कृति को बिल्कुल मिटा देना रहा है। वे ताजमहल और कुतुबमीनार जैसी सैकड़ों इमारतों का इतिहास बदल देना चाहते हैं, वे लखनउ को लखनपुर और भोपाल को भोजपाल बना शहरों के नाम बदल देना चाहते हैं, यहाँ तक कि मुगलकाल के संज्ञा, सर्वनाम और क्रियाएं तक को नकारना चाहते हैं, ड्रैस उनके यहाँ गणवेश हो जाती है, और लाठी दंड बन जाती है, स्कूल शिशु मन्दिर बन जाते हैं ताकि उस मन्दिर में गैर हिन्दू झाँकने की भी कोशिश न करें। वे हिन्दी की जगह संस्कृत को जन भाषा बनाना चाहते हैं जो अपने समय में भी केवल पुरोहितों और अभिजात्य की ही भाषा रही है। डीजल/ पैट्रोल वाहन को रथ कहना भी उसी का हिस्सा है, जिसे अब उनके घेरे से बाहर की जनता स्वीकार करने को तैयार नहीं हो सकती।
      अडवाणीजी ने जब पिछली रथयात्रा निकाली थी तब टीवी का केवल एक ही चैनल होता था जो सरकारी था इसलिए वही बात, अलग अलग जाकर कहना पड़ती थी किंतु अब कई सैकड़ा प्राइवेट चैनल अस्तित्व में हैं जो लाइव प्रसारण करके एक साथ पूरे देश तक सन्देश दे सकते हैं। रही सही कसर पाँच करोड़ की संख्या में छपने वाले समाचार पत्र और इंटरनेट पूरी कर सकते हैं, इसलिए रथयात्रा की सफलता के लिए बहुप्रचारित सभाएं भी भीड़ नहीं जुटा सकतीं।
      यदि सचमुच भ्रष्टाचार का विरोध करना है तो उसकी शुरुआत अपने दल से करनी होगी और भ्रष्ट नेताओं को एक साथ निकालकर ही वे विश्वास पैदा कर सकते हैं पर दुर्भाग्य यह है कि उत्तराखण्ड के निशंक को हटाकर दुबारा से खण्डूरी को मुख्य मंत्री बना देने पर राजनाथ सिंह कहते हैं कि निशंक निष्कलंक हैं और उन्हें तो बिना किसी आरोप के बदला गया है। यदि मध्य प्रदेश में कार्यवाही करें तो आधा मंत्रिमण्डल पहले ही दिन बाहर हो जायेगा और संगठन में भी आधे नेता बचेंगे। इसलिए ऐसी कार्यवाही का दिन कभी नहीं आयेगा। हो सकता है कि यह यात्रा किसी बहाने से स्थगित भी हो जाये, क्योंकि नोट फार वोट मामले में उन्होंने खुद ही जिम्मेवारी ले ली है और यात्रा की घोषणा पूरी पार्टी का ध्यान आकर्षित करने का तरीका भर हो, ताकि पूछ ताछ को टाला जा सके।
वीरेन्द्र जैन
2/1   शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

मोबाइल 9425674629

सोमवार, अगस्त 22, 2011

अन्ना का आन्दोलन आकार लेता जा रहा है


अन्ना का आन्दोलन एक आकार लेता जा रहा है

वीरेन्द्र जैन

पिछले दिनों से विभिन्न सूचना माध्यमों और राजनीतिक व गैरराजनीतिक सम्वादों में अन्ना हजारे का आन्दोलन छाया रहा है। हमारा समाज अवतारवाद में विश्वास करने वाले लोगों का समाज है जो अपनी समस्याओं के हल किसी अतिमानवीय किस्म की शक्ति में देखते हैं और किसी विशिष्ट जन के अवतरण की प्रतीक्षा करते रहते हैं। इस प्रतीक्षा में हम कई बार भ्रम के शिकार भी हो जाते हैं और हर आहट को उद्धारक के आगमन से जोड़ लेते हैं, जिससे कई बार धोखे भी हो जाते हैं। पूरे देश में सत्तारूढ से लेकर विपक्षी दलों तक सब इस बात से सहमत हैं कि भ्रष्टाचार असहनीय स्थिति तक बढ और फैल गया है और इसने सभी हिस्सों को दुष्प्रभावित करना शुरू कर दिया है। इस विश्वास को पुष्ट करने के रूप में अभी हाल ही मैं इतने बड़े बड़े भ्रष्टाचार सामने आये हैं कि प्रमुख पदों पर बैठे लोगों के बारे में कहे गये किसी भी झूठ को भी अधिकांश लोग आसानी से सच मानने लगे हैं। एक हजार करोड़ से बड़े कुछ भ्रष्टाचार इस तरह से हैं-
स्विस बैंक में मौजूद काला धन 210000 करोड़

टूजी घोटाला 176000 करोड़

स्टाम्प घोटाला 20000 करोड़,

हसन अली टैक्स व हवाला घोटाला 39120 करोड़

स्कार्पियन पनडुब्बी घोटाला 18978 करोड़

टीक प्लांटेशन घोताला 8000 करोड़

सुखराम टेलेकाम घोटाला 1500 करोड़

प्रीफेंशियल एलोटमेंट घोटाला 5000 करोड़

सत्यम घोटाला 8000 करोड़

उड़ीसा खदान घोटाला 7000 करोड़

झारखण्ड खदान घोटाला 4000 करोड़

उर्वरक आयात घोटाला 1300 करोड़

हर्षद मेहता [शेयर घोटाला] 5000 करोड़

काबलर घोटाला 1000 करोड़

इसी व्याधि का विरोध करने के लिए जब आवाज उठी और जिसका नेतृत्व एक ऐसे सहज सरल सादगी पसन्द, भूतपूर्व सैनिक व्यक्ति के हाथ में दे दिया गया, जिसके सामाजिक सेवाओं का निष्कलंक इतिहास जुड़ा है व इसके लिए उसने विवाह तक नहीं किया, तो लोगों ने उसे अवतार जैसा मान लिया। वे बिना किसी पूछ परख के उसमें वांछित बदलाव का हल देखने लगे।

अन्ना हजारे का आन्दोलन भावुकता से काम लेने वाले आम लोगों को बहुत भाया किन्तु दूरदर्शी बुद्धिजीवियों ने उसे सन्देह मिश्रित श्रद्धा की दृष्टि से ही देखा। इसका कारण यह था कि यह आन्दोलन केवल बीमारी के लक्षण दूर करने वाला तो नजर आता था पर बीमारी दूर करने वाला नहीं। अर्थात भ्रष्टाचार को दण्डित करने तक सीमित नजर आता था पर भ्रष्टाचार के लिए अनुकूलता पैदा करने वाली व्यवस्था, आर्थिक नीतियों, कमजोर न्यायिक प्रणाली, दोषपूर्ण चुनावी व्यवस्था व सामाजिक बुराइयों के बारे में मौन था। वे राजनीतिक दलों से दूरी बना कर चल रहे थे जो सामाजिक बदलाव की मुख्य संस्था हैं तथा कानून बनाने के लिए सक्षम संसद में बैठते हैं। किंतु फिर भी वे भ्रष्टाचार दूर करने के लिए इसी कानून और संविधान में ही आस्था प्रकट कर रहे थे। उनके द्वारा बनाये गये ड्राफ्ट पर संसद में बैठने वाले किसी भी राजनीतिक दल ने सहमति नहीं दी थी पर फिर भी वे अपने लोकपाल बिल के ड्राफ्ट के अनुसार ही कानून बनाने की जिद ठाने आन्दोलन कर रहे थे एवं जिसके लिए आमरण अनशन का सहारा ले रहे थे।

प्रत्येक लोकप्रिय व्यक्ति, संस्था या घटना से अपने को जोड़ कर उसका राजनीतिक लाभ उठाने के लिए उत्सुक रहने वाला संघ परिवार उनके आन्दोलन को मिले समर्थन का लाभ लेने हेतु आगे बढ कर उनका साथ दे रहा था, यही कारण था कि देश की दूसरी संस्थाएं अन्ना के आन्दोलन को भी शंका की दृष्टि से देखने लगी थीं।

यह अच्छी बात है कि अन्ना के आन्दोलन से जुड़े नेतृत्वकारी साथियों में एक लोकतांत्रिक भावना जिन्दा है इसलिए उन्होंने बुद्धिजीवियों और आमजन से मिले सुझावों को ध्यान पूर्वक सुना और उस पर अमल किया। सबसे पहले तो उन्होंने अपने आन्दोलन का आर एस एस से सम्बन्ध होने का जोरदार और मुखर खण्डन करते हुए कहा कि जो हमारे आन्दोलन को आर एस एस से जोड़ते हैं उन्हें पागल खाने भेजना चाहिए। यह वक्तव्य बताता है के संघ परिवार के बारे में उनके विचार देश के व्यापक जनमानस की भावनाओं से अलग नहीं हैं। इससे पहले जेल में रहते हुए उन्होंने मिलने के लिए आये बाबा रामदेव से मिलने से इंकार करके स्पष्ट संकेत दिया था कि संघ के साथ रहने वालों से दूरी बना के रहना चाहते हैं। अन्ना हजारे की टीम द्वारा गत रविवार को यह भी कहा गया कि यह लड़ाई केवल लोकपाल पर ही खत्म नहीं होगी बल्कि चुनाव व्यवस्था में सुधार तक जायेगी। उन्होंने अपने समर्थन में उतरे जन समुदाय से कहा कि वे अपने सांसद के घरों के बाहर धरना दें और उन्हें जनलोकपाल बिल के पक्ष में समर्थन देने के लिए कहें। भविष्य़ में इस आन्दोलन को किसानों आदिवासियों की भूमि अधिग्रहण से जोड़ने की बात कह कर कृषकों और ग्रामीण क्षेत्रों तक आन्दोलन के विस्तार की भूमिका तैयार की।

इसका परिणाम यह हुआ कि उज्जैन में चल रही संघ के कोर ग्रुप के बैठक को फैसला लेना पड़ा कि जनता के रुख को देखते हुए भाजपा अन्ना हजारे के आन्दोलन को समर्थन तो देगी पर उसमें शामिल नहीं होगी। दूसरी ओर अन्ना के आन्दोलन के समानांतर उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में एक ग्रुप का गठन किया हुआ है जिसका नाम अन्ना के आन्दोलन इंडिया अगैंस्ट करप्शन से मिलता जुलता यूथ अगेंस्ट करप्शन रखा गया है। यह ग्रुप अन्ना के आन्दोलन को समर्थन देगा। सदैव दुहरेपन में जीने वाले संघ परिवार का यह एक और वैसा ही कदम है जिसके अनुसार वे एक ओर तो साथ देते नजर आते हैं और दूसरी ओर अलग भी हैं।

अन्ना टीम और सरकार के बीच कुछ समझौते के आसार भी बन रहे हैं जिसके अनुसार वे न्याय व्यवस्था को लोकपाल के नियंत्रण में लाने की मांग छोड़ सकते हैं, और सरकार प्रधानमंत्री को लोकपाल के अंतर्गत लाने की बात पर स्वीकृत हो सकती है, जो विपक्ष भी चाहता है। यह एक शुभ लक्षण है। अभी तक अन्ना का आन्दोलन एक अमूर्तन में चल रहा था जो अब एक आकार लेता जा रहा है जिसके आधार पर उसके गुण दोषों का मूल्यांकन सम्भव हो सकता है। इस पारदर्शिता के युग में अन्ना के आन्दोलन को मिले आर्थिक सहयोग की सूची सामने आयी है, इसलिए जरूरी हो जाता है कि देश का प्रत्येक आन्दोलन और गैर सरकारी संगठनों समेत सभी जन संगठन अपने धन प्राप्ति के श्रोतों की जानकारी दें। आर एस एस को भी स्पष्ट करना चाहिए कि जब वह अपने आप को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है तो सहयोग राशि को गुरु दक्षिणा का नाम देकर गुप्त तरीके से क्यों लेता है?

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

मोबाइल 9425674629