राजनीतिक सामाजिक और साहित्यिक रंगमंच के नेपथ्य में चल रही घात प्रतिघातों का खुलासा
शुक्रवार, मई 26, 2017
आज़ादी के बाद के आन्दोलन, और भ्रष्टाचार
शनिवार, अगस्त 16, 2014
खाने और न खाने देने के मध्य म.प्र. सरकार
शुक्रवार, अगस्त 03, 2012
अगर अन्ना हजारे अपने शब्दों पर सचमुच गम्भीर हैं तो .................
अन्ना से उम्मीद रखने वाले लोगों के लिए यह जानना एक बड़े धक्के की तरह था कि गान्धी की छवि को आधार बनाने वाला व्यक्ति गान्धी की हत्या के विचार के जनक संगठन से गलबहियां कर रहा है जिनकी प्रचार सामग्री में आज भी गान्धी की हत्या को ‘गान्धी वध’ और गोडसे की किताबें बिकती हैं। जब अन्ना अनशन करते हैं तो भीड़ जुटाने के लिए इसी संगठन के लोग अपनी पहचान छुपा और अपना खजाना खोल कर हजारों लोगों के लंगर की व्यवस्था करते हैं और बाद में दावे के साथ लोगों को बताते भी हैं। अन्ना की जगह अगर गान्धीजी होते तो वे शुरू से ही इसे छुपाने की कोशिश नहीं करते पर अन्ना हजारे और उनकी टीम ने उस पर परदा डालने का काम किया। लोगों को यह सन्देह होना स्वाभाविक ही है कि अभी जो बातें सामने नहीं आयी हैं वे न जाने कितनी होंगीं। स्मरणीय है कि गान्धीजी की हत्या से जुड़े संग़ठन की भाषा भले ही बदल गयी हो पर न तो आज तक उसने कभी अपने किये का खेद व्यक्त किया और न ही अपने विचार ही बदले हैं। उन्हें जब भी मौका मिलता है वे राष्ट्र की धर्मनिरपेक्षता को चोट पहुँचाने से गुरेज नहीं करते और केन्द्र तथा गुजरात राज्य में सत्ता होने पर तो उन्होंने अपना असली स्वरूप ही दिखा दिया जिसके बाद उनके साथ हाथ मिलाना तक एक राष्ट्रीय शर्म बन चुकी है। उनके साथ गठबन्धन करने वाले दल तक उनके साथ बैठने को एक मजबूरी बताते हैं। दूसरी ओर जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आन्दोलन कर रहे हैं उनके ये सहयोगी उसमें आकंठ लिप्त हैं, इसे देश का बच्चा बच्चा जानता है। उक्त संग़ठन अगर किसी के साथ सहयोग करते हैं तो उसके अस्तित्व और उसके समर्थन को हड़पने के लिए करते हैं, इसलिए यह उम्मीद करना कि उनका सहयोग लेकर अपने आन्दोलन की घोषित भावना को बचा कर रखा जा सकता है, समझदारी नहीं कही जा सकती। वे या तो मौका देख कर अपना आधार खींच लेंगे या गुलाम बना लेंगे और ये दोनों ही बातें अन्ना के आन्दोलन और स्वयं अन्ना के हित में नहीं होंगीं। लगभग ऐसा ही हाल आयुर्वेदिक दवाओं के व्यापारी बाबा भेषधारी रामदेव के साथ सहयोग का भी है जो अपनी व्यापारिक अनियमिताओं के कारण कानून की नजर में है और बिना किसी द्वेष के भी कानूनी कार्यवाही से उनका साम्राज्य ध्वस्त हो सकता है। एक ओर तो उनकी राजनीतिक महात्वाकांक्षाएं हैं और दूसरी ओर अपने व्यावसायिक हितों के संरक्षण के लिए उन्हें ग्राहिकी और जनसमर्थन चाहिए।
रविवार, मार्च 25, 2012
जेल अधिकारियों के पास दौलत के खजाने - एक विचारणीय प्रश्न
पिछले दिनों जिन आईएएस आफीसर्स, डिप्टी कलेक्टर्स्, इंजीनियर्स, रजिस्ट्रार, आरटीओ, निरीक्षक, आडीटर्स, स्टोरकीपर्स, एकाउंटेंट, पटवारी, चपरासी, आदि के यहाँ से छापों में जो करोड़ों की रकमें और सम्पत्तियाँ मिली हैं उनके बारे में तो एक अनुमान सा रहता है कि ये सम्पत्तियां कैसे भुगतान की फाइलें रोकने, काम में अड़ंगा लगाने, गलत फैसले लेने, झूठे बिल बनाने आदि के द्वारा बनायी जाती हैं। अगर कोई सरकार चाहे तो पूरा हिसाब करके सारे लेने और देने वालों को एक घेरे में ला सकती है पर ये काम सरकार के कामों की प्राथमिकताओं में नहीं आता जिसका कारण भी मंत्रियों की अनुपात हीन सम्पत्ति वृद्धि को देख कर अनुमानित किया जा सकता है।
शनिवार, दिसंबर 31, 2011
दलों में उद्योगपति, भूमाफिया, बिल्डर और् शिक्षा माफिया,
- राजनीतिक दलों और उनके सदस्यों को एक घोषित आचार संहिता में बाँधा जाये, तथा उस का पालन अनिवार्य किया जाय।
- दलों की सदस्यता को बेकामों, बेरोजगारों की फौज बनाने की जगह अपने दल की घोषणाओं के लिए काम करने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं के रूप में अनिवार्य बनाये जाने के उपाय किये जायें। इसके लिए दलों में पदोन्नति के लिए राजनीतिक प्रशिक्षण की कक्षाओं को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
- दलों द्वारा अपनाये गये सामाजिक सुधार के कुछ निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराया जाना चाहिए, जैसे कि सक्षम सदस्यों द्वारा रक्तदान, नेत्र दान, परिवार में टीकाकरण, परिवार नियोजन के आदर्शों का पालन, अपने द्वारा पालित बच्चों को अनिवार्य शिक्षा, सती प्रथा, दहेज प्रथा, साम्प्रदायिकता का सक्रिय विरोध आदि
- प्रत्येक सदस्य से आय के अनुपात में लेवी तय की जाना चाहिए।
- चुनाव के लिए टिकिट दिये जाने के सम्बन्ध में कुछ न्यूनतम पात्रताएं तय की जाना चाहिए। इसमें दल में सदस्यता की अवधि भी एक प्रमुख पात्रता होना चाहिए।
- किसी दल का सदस्य यदि कोई अपराध करता है तो उसके मूल में दल की सामूहिकता का बल भी उसके ध्यान में रहता है। इसलिए आरोप लगने पर दल द्वारा तुरंत जाँच और उसके अनुसार कार्यवाही का किया जाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए ताकि उसकी आँच दल तक न पहुँचे और कोई दल के भरोसे अपराध करने से बचे।
बुधवार, सितंबर 14, 2011
अडवाणीजी की रथयात्रा- बहुत देर कर दी मेहरवाँ आते आते
सोमवार, अगस्त 22, 2011
अन्ना का आन्दोलन आकार लेता जा रहा है
अन्ना का आन्दोलन एक आकार लेता जा रहा है
वीरेन्द्र जैन
पिछले दिनों से विभिन्न सूचना माध्यमों और राजनीतिक व गैरराजनीतिक सम्वादों में अन्ना हजारे का आन्दोलन छाया रहा है। हमारा समाज अवतारवाद में विश्वास करने वाले लोगों का समाज है जो अपनी समस्याओं के हल किसी अतिमानवीय किस्म की शक्ति में देखते हैं और किसी विशिष्ट जन के अवतरण की प्रतीक्षा करते रहते हैं। इस प्रतीक्षा में हम कई बार भ्रम के शिकार भी हो जाते हैं और हर आहट को उद्धारक के आगमन से जोड़ लेते हैं, जिससे कई बार धोखे भी हो जाते हैं। पूरे देश में सत्तारूढ से लेकर विपक्षी दलों तक सब इस बात से सहमत हैं कि भ्रष्टाचार असहनीय स्थिति तक बढ और फैल गया है और इसने सभी हिस्सों को दुष्प्रभावित करना शुरू कर दिया है। इस विश्वास को पुष्ट करने के रूप में अभी हाल ही मैं इतने बड़े बड़े भ्रष्टाचार सामने आये हैं कि प्रमुख पदों पर बैठे लोगों के बारे में कहे गये किसी भी झूठ को भी अधिकांश लोग आसानी से सच मानने लगे हैं। एक हजार करोड़ से बड़े कुछ भ्रष्टाचार इस तरह से हैं-
स्विस बैंक में मौजूद काला धन 210000 करोड़
टूजी घोटाला 176000 करोड़
स्टाम्प घोटाला 20000 करोड़,
हसन अली टैक्स व हवाला घोटाला 39120 करोड़
स्कार्पियन पनडुब्बी घोटाला 18978 करोड़
टीक प्लांटेशन घोताला 8000 करोड़
सुखराम टेलेकाम घोटाला 1500 करोड़
प्रीफेंशियल एलोटमेंट घोटाला 5000 करोड़
सत्यम घोटाला 8000 करोड़
उड़ीसा खदान घोटाला 7000 करोड़
झारखण्ड खदान घोटाला 4000 करोड़
उर्वरक आयात घोटाला 1300 करोड़
हर्षद मेहता [शेयर घोटाला] 5000 करोड़
काबलर घोटाला 1000 करोड़
इसी व्याधि का विरोध करने के लिए जब आवाज उठी और जिसका नेतृत्व एक ऐसे सहज सरल सादगी पसन्द, भूतपूर्व सैनिक व्यक्ति के हाथ में दे दिया गया, जिसके सामाजिक सेवाओं का निष्कलंक इतिहास जुड़ा है व इसके लिए उसने विवाह तक नहीं किया, तो लोगों ने उसे अवतार जैसा मान लिया। वे बिना किसी पूछ परख के उसमें वांछित बदलाव का हल देखने लगे।
अन्ना हजारे का आन्दोलन भावुकता से काम लेने वाले आम लोगों को बहुत भाया किन्तु दूरदर्शी बुद्धिजीवियों ने उसे सन्देह मिश्रित श्रद्धा की दृष्टि से ही देखा। इसका कारण यह था कि यह आन्दोलन केवल बीमारी के लक्षण दूर करने वाला तो नजर आता था पर बीमारी दूर करने वाला नहीं। अर्थात भ्रष्टाचार को दण्डित करने तक सीमित नजर आता था पर भ्रष्टाचार के लिए अनुकूलता पैदा करने वाली व्यवस्था, आर्थिक नीतियों, कमजोर न्यायिक प्रणाली, दोषपूर्ण चुनावी व्यवस्था व सामाजिक बुराइयों के बारे में मौन था। वे राजनीतिक दलों से दूरी बना कर चल रहे थे जो सामाजिक बदलाव की मुख्य संस्था हैं तथा कानून बनाने के लिए सक्षम संसद में बैठते हैं। किंतु फिर भी वे भ्रष्टाचार दूर करने के लिए इसी कानून और संविधान में ही आस्था प्रकट कर रहे थे। उनके द्वारा बनाये गये ड्राफ्ट पर संसद में बैठने वाले किसी भी राजनीतिक दल ने सहमति नहीं दी थी पर फिर भी वे अपने लोकपाल बिल के ड्राफ्ट के अनुसार ही कानून बनाने की जिद ठाने आन्दोलन कर रहे थे एवं जिसके लिए आमरण अनशन का सहारा ले रहे थे।
प्रत्येक लोकप्रिय व्यक्ति, संस्था या घटना से अपने को जोड़ कर उसका राजनीतिक लाभ उठाने के लिए उत्सुक रहने वाला संघ परिवार उनके आन्दोलन को मिले समर्थन का लाभ लेने हेतु आगे बढ कर उनका साथ दे रहा था, यही कारण था कि देश की दूसरी संस्थाएं अन्ना के आन्दोलन को भी शंका की दृष्टि से देखने लगी थीं।
यह अच्छी बात है कि अन्ना के आन्दोलन से जुड़े नेतृत्वकारी साथियों में एक लोकतांत्रिक भावना जिन्दा है इसलिए उन्होंने बुद्धिजीवियों और आमजन से मिले सुझावों को ध्यान पूर्वक सुना और उस पर अमल किया। सबसे पहले तो उन्होंने अपने आन्दोलन का आर एस एस से सम्बन्ध होने का जोरदार और मुखर खण्डन करते हुए कहा कि जो हमारे आन्दोलन को आर एस एस से जोड़ते हैं उन्हें पागल खाने भेजना चाहिए। यह वक्तव्य बताता है के संघ परिवार के बारे में उनके विचार देश के व्यापक जनमानस की भावनाओं से अलग नहीं हैं। इससे पहले जेल में रहते हुए उन्होंने मिलने के लिए आये बाबा रामदेव से मिलने से इंकार करके स्पष्ट संकेत दिया था कि संघ के साथ रहने वालों से दूरी बना के रहना चाहते हैं। अन्ना हजारे की टीम द्वारा गत रविवार को यह भी कहा गया कि यह लड़ाई केवल लोकपाल पर ही खत्म नहीं होगी बल्कि चुनाव व्यवस्था में सुधार तक जायेगी। उन्होंने अपने समर्थन में उतरे जन समुदाय से कहा कि वे अपने सांसद के घरों के बाहर धरना दें और उन्हें जनलोकपाल बिल के पक्ष में समर्थन देने के लिए कहें। भविष्य़ में इस आन्दोलन को किसानों आदिवासियों की भूमि अधिग्रहण से जोड़ने की बात कह कर कृषकों और ग्रामीण क्षेत्रों तक आन्दोलन के विस्तार की भूमिका तैयार की।
इसका परिणाम यह हुआ कि उज्जैन में चल रही संघ के कोर ग्रुप के बैठक को फैसला लेना पड़ा कि जनता के रुख को देखते हुए भाजपा अन्ना हजारे के आन्दोलन को समर्थन तो देगी पर उसमें शामिल नहीं होगी। दूसरी ओर अन्ना के आन्दोलन के समानांतर उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में एक ग्रुप का गठन किया हुआ है जिसका नाम अन्ना के आन्दोलन इंडिया अगैंस्ट करप्शन से मिलता जुलता यूथ अगेंस्ट करप्शन रखा गया है। यह ग्रुप अन्ना के आन्दोलन को समर्थन देगा। सदैव दुहरेपन में जीने वाले संघ परिवार का यह एक और वैसा ही कदम है जिसके अनुसार वे एक ओर तो साथ देते नजर आते हैं और दूसरी ओर अलग भी हैं।
अन्ना टीम और सरकार के बीच कुछ समझौते के आसार भी बन रहे हैं जिसके अनुसार वे न्याय व्यवस्था को लोकपाल के नियंत्रण में लाने की मांग छोड़ सकते हैं, और सरकार प्रधानमंत्री को लोकपाल के अंतर्गत लाने की बात पर स्वीकृत हो सकती है, जो विपक्ष भी चाहता है। यह एक शुभ लक्षण है। अभी तक अन्ना का आन्दोलन एक अमूर्तन में चल रहा था जो अब एक आकार लेता जा रहा है जिसके आधार पर उसके गुण दोषों का मूल्यांकन सम्भव हो सकता है। इस पारदर्शिता के युग में अन्ना के आन्दोलन को मिले आर्थिक सहयोग की सूची सामने आयी है, इसलिए जरूरी हो जाता है कि देश का प्रत्येक आन्दोलन और गैर सरकारी संगठनों समेत सभी जन संगठन अपने धन प्राप्ति के श्रोतों की जानकारी दें। आर एस एस को भी स्पष्ट करना चाहिए कि जब वह अपने आप को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है तो सहयोग राशि को गुरु दक्षिणा का नाम देकर गुप्त तरीके से क्यों लेता है?
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629





