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बुधवार, फ़रवरी 19, 2014

तमाशों और षड़यंत्रों की राजनीति

तमाशों और षड़यंत्रों की राजनीति
वीरेन्द्र जैन

       अपने शैशव काल में बच्चे कपड़ों में ही मलमूत्र विसर्जन कर देते हैं जिसे उनकी गलती नहीं माना जाता, किंतु यही काम जब वे थोड़ा बड़ा होने पर करते हैं तो यह असहनीय होता है। खेद है कि हमारा लोकतंत्र एक लम्बा समय गुजार लेने के बाद भी वैसी ही भूलें कर रहा है जैसी वह अपनी शैशव काल में करता था। प्रारम्भिक चुनावों में स्वतंत्रता आन्दोलन की सेना के रूप में कार्यरत कांग्रेस देश में लोकतांत्रिक रूप से चुनी जाने की स्वाभाविक अधिकारी थी, और कांग्रेस के अलावा कम्युनिष्ट या समाजवादी धड़ों में भी कांग्रेस के स्वतंत्रता आन्दोलन से निकले लोग थे। मुझे अपने बचपन की याद है कि 1962 में कांग्रेस का प्रचार करने आये लोगों से राष्ट्रकवि मैथली शरण गुप्त ने एक रोचक वाक्य कहा था कि वोट देने का अधिकार सबको है पर वोट लेने का अधिकार केवल कांग्रेस को है। प्रारम्भिक दिनों में हिन्दू महासभा एक प्रमुख दल हुआ करता था और उसकी लोकप्रियता जनसंघ से अधिक थी। मैंने सातवें दशक में इसके अध्यक्ष बृज नारायण बृजेश के कुछ भाषण सुने हैं जिनके अंश अब भी स्मृति में हैं। 1967 में श्रीमती विजयाराजे सिन्धिया के जनसंघ में चले जाने पर टिप्पणी करते हुये बृजेशजी का भाषण इस तरह का हुआ करता था- राजमाता ने आपको क्या दिया?
दिया [दीपक जो जनसंघ का चुनाव चिन्ह होता था]
ग्वालियर की जनता को क्या दिया?
दिया
बेटे को क्या दिया?
दिया [माधव राव सिन्धिया पहले जनसंघ के सदस्य थे]
और इस ‘दिया’ की लम्बी श्रंखला के बाद वे कहते थे कि कुछ लिया न दिया और तुम्हारे दरवाजे पर चिपका दिया। अरे तुम लोग क्या राजमाता को देखने भीड़ बना कर चले आते हो, एक पाँच रुपये की लक्स की बट्टी [साबुन] खरीदो और उससे अपनी घरवाली को नहलाओ तो वही राजमाता जैसी दिखने लगेगी।
       श्री बृजेश के भाषण आम जनता के बीच आकर्षण का केन्द्र होते थे और कहा जाता है कि इसी शैली की नकल जनसंघ के तत्कालीन नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी और हिन्दी पट्टी में उन्होंने भी भाषण की लगभग इसी परम्परा को आगे बढाया था। 1971 के आम चुनावों के दौरान उनके भाषण का एक अंश याद आता है- इन्दिरा गान्धी कैत्ती यें [कहती हैं] कि गरीबी हट्टाओ, अरे भाई हट्टान्ने का अर्थ है इधर से हट्टा कर उधर रख दी, उधर से हट्टा कर इधर रख दी। पर मैं नईं कैत्ता कि गरीबी हट्टाओ, मैं कैत्ता हूँ कि गरीबी मिट्टाओ। इन्दिराजी कैत्ती यें कि जब मैं दोनों हाथ उठाकर भाषण देता हूं तो उन्हें हिटलर की याद आती है, पर मुझे भाषण की कोई ऐसी शैली नहीं पता कि जिसमें टाँग उठाकर भाषण दिया जाता हो। इत्यादि। बाद में स्थानीय भाषा और मुहावरे के साथ विनोद के प्रयोग राजनारायण और लालू प्रसाद जैसे राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय नेताओं ने भी किये। परिणाम यह हुआ कि जिस तरह चुटकलेबाजों ने कविता के मंच से गम्भीर साहित्य को बाहर कर दिया, ठीक उसी तरह राजनीतिक मंच की इस चुटकलेबाजी ने वैचारिक राजनीति को हाशिये पर धकेल दिया।  
       देश में प्रारम्भिक आम चुनावों के बाद हम लोग एक दर्जन से अधिक आम चुनावों से गुजर चुके हैं और इस दौरान न केवल शिक्षा व साक्षरता में संख्यात्मक व गुणात्मक परिवर्तन आया है अपितु सूचना और संचार के साधनों का भी तेज विकास हुआ है किंतु हमारे कुछ राजनीतिक दल व राजनेता अभी भी जनता को तरह तरह के तमाशों और शब्द जालों में उलझा, वोट झटक कर सत्ता हथियाने की तरकीबों का प्रयोग करने में लगे हैं। दुर्भाग्य यह है कि भौतिक विकास के कई सोपान चढ जाने के बाद भी देश में राजनीतिक चेतना को विकसित करने की दिशा में समुचित काम नहीं हुआ और लटकों झटकों व तमाशों की राजनीति करने वाले व्यक्ति व दल दुनिया में हमें शर्मसार कर रहे हैं। अडवाणीजी एक डीजल चालित वाहन को रथ के रूप में परिवर्तित कराते हैं और एक विवादित मस्ज़िद को ध्वंश कराने के उद्देश्य से दशहरा आदि की शोभायात्राओं की तरह रामलीला के पात्रों जैसे पूरे देश की यात्रा करते हैं। इस तरह एकत्रित भीड़ की ओट में दूसरे समुदाय के खिलाफ अप्रिय नारे लगा उन्हें उत्तेजित कर दंगों की देशव्यापी श्रंखला बनायी जाती है। उनके उक्त वाहन पर उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह बना होता था। उनकी आम सभाओं में एक विशालकाय चित्र चलता था जिसमें वैष्णवों के आराध्य श्रीराम को सलाखों के पीछे कैद दिखाया जाता था और उनकी कल्पित मुक्ति के लिए संघर्ष का आवाहन होता था। वे एक-एक घर से मन्दिर निर्माण के लिए ईँट एकत्रित करने के बहाने अपना चुनाव प्रचार करते हैं और सर्वाधिक अविकसित बीमारू राज्यों के सीधे सरल धर्मप्राण लोगों को ध्रुवीक्रत करके लोकसभा में अपनी संख्या दो से दो सौ तक बढा लेते हैं, व क्रमशः देश की सत्ता प्राप्त करने के लिए अपने प्रमुख मुद्दों को स्थगित करने का समझौता कर लेते हैं। आज भी नेता आदिवासी पट्टी पर जाकर तीरकमान उठा कर फोटो खिंचवाते हैं या तलवार लिए मंच पर खड़े हो जाते हैं। स्थानीय लोगों से एकजुटता दुखाने के लिए वे उनकी ढीली-ढाली पोषाक पहिन कर बागड़ बिल्ले की तरह दिखते हैं।
       उक्त रथयात्रा का दौर वही दौर होता है जब देश में एक निर्माणाधीन लोकतंत्र की इमारत कमजोर होने लगती है और आन्ध्र में तेलगुदेशम, उड़ीसा में बीजू जनता दल, तामिलनाडु में डीएमके, एआईडीएमके, केरल में केरल कांग्रेस, बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, महाराष्ट्र में शिवसेना, पंजाब में अकालीदल, कश्मीर व उत्तरपूर्व में स्थानीय व अलगाववादी दल, उ,प्र, में यादववादी समाजवादी पार्टी, मुस्लिम लीग, रामदेव की स्वाभिमान पार्टी, आदि दल, राष्ट्रीय दलों और राष्ट्रीय सोच का स्थान हथियाने लगते हैं और इसके लिए वैसे ही हथकण्डे अपनाने लगते हैं जैसे कि भाजपा अपना कर सफल हो चुकी होती है। अभी नवोदित आम आदमी पार्टी भी उसी रास्ते से आगे बढने का प्रयास कर रही है। वे चलन से दूर हो चुकी गान्धीवादी टोपी को सिंथेटिक पेंट शर्ट के साथ पहिन कर अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह को अपने प्रतीक चिन्ह की तरह स्तेमाल करते हुए झाड़ू लहरा रहे हैं। मंत्रिमण्डल के सदस्य स्वयं संविधान की शपथ लेकर गैर संवैधानिक काम कर रहे हैं और जो आन्दोलन उनके दल को करना चाहिए उसे सस्ती लोकप्रियता के लिए मुख्यमंत्री कर रहे हैं। दुखद है कि अधिकांश दल फिल्मी और खेल की दुनिया से लेकर तरह तरह के लोकप्रिय गैर राजनीतिक व्यक्तियों की लोकप्रियता को वोटों में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं।         
       अगर सत्ता पाने हेतु चुनाव जीतने के लिए दंगे करवाना और तमाशे करना जरूरी लगने लगे तो हमें अपनी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर दुबारा विचार करने और अविलम्ब आवश्यक सुधार करने की जरूरत है। राजनीतिक दलों के लिए एक साझा आचार संहिता बनायी ही जाना चाहिए जिससे कि लोकतंत्र तमाशों से न चलकर राजनीति से संचालित हो।
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, जुलाई 30, 2013

मोदीमय होती भाजपा की बदलती भाषा और प्रतीक

मोदीमय होती भाजपा की बदलती भाषा और प्रतीक

वीरेन्द्र जैन
        जैसे जैसे भाजपा मोदीमय होती जा रही है वैसे वैसे उसके छोटे बड़े नेता वाणी का संयम खोते हुए ऊल जुलूल बोलने लगे हैं। उल्लेखनीय है कि भरतीय संस्कृति का मुखौटा पहिने भाजपा एक लम्बे समय तक चतुराईपूर्ण भाषा व प्रतीकों के माध्यम से साम्प्रदायिकता के कुटिल प्रयोग करती रही है, तब अनेक चालाक भाषा शास्त्री उसकी योजनाएं बनाते थे। ऐसा करते समय वे भले ही दादा कौणकेनुमा बहुअर्थी बातों का प्रयोग करते रहे हों किंतु उनकी भाषा में वक्त जरूरत के लिए एक शिष्ट अर्थ भी होता था। स्मरणीय है कि एक पैट्रोल डीजल चलित वाहन को रथ का नाम संघ परिवार की ओर से ही दिया गया और भाजपा नेता लाल कृष्ण अडवाणी जिस डीसीएम टोयटा वाहन द्वारा सोमनाथ से अयोध्या की ओर चले थे उसे रथ और उनकी इस राजनीतिक यात्रा को रथयात्रा कहा गया था। संज्ञा का यह परिवर्तन बहुत बारीक खेल था। रथ, पशुओं द्वारा खींचा जाने वाला एक प्राचीन सामंती वाहन था जिसके उपयोग के उदाहरण हमारी पुराण कथाओं में मिलते हैं। महाभारत के युद्ध में अर्जुन के रथ को श्रीकृष्ण द्वारा सारथी की भूमिका में संचालित किये जाने का वर्णन और उस आशय के अनेक चित्र लोगों की स्मृतियों में बसे हुए हैं। उड़ीसा में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा भी बहुत प्रसिद्ध है। जब अडवाणीजी द्वारा रथ का नाम देकर यात्रा निकाली गयी थी तब उस मोटर वाहन को रथ का रूप भी दिया गया था। उस दौर की पूरी राजनीतिक परिस्तिथि, साम्प्रदायिक घनत्व, को देख कर इस यात्रा की पटकथा, रास्ता, और उत्तेजक नारे तय किये गये थे। वाहन पर उनकी पार्टी का बड़ा सा चुनाव चिन्ह भी अंकित था किंतु सावधानीवश पार्टी का नाम नहीं था। आवश्यकतानुसार वे कमल के फूल को भारतीय और हिन्दू संस्कृति से जोड़ कर अर्थ बदल सकते थे। कथित राम जन्मभूमि मन्दिर के पुनर्निर्माण से शुरू करके उन्होंने चतुराई से उसे अयोध्या में भव्य राम मन्दिर निर्माण के अभियान में बदल दिया था और बड़े नाटकीय भोलेपन से सवाल करते थे कि अयोध्या में भगवान राम का मन्दिर नहीं बनेगा तो कहाँ बनेगा? जबकि सच यह था कि वे अयोध्या में रामजन्म भूमि मन्दिर के स्थान पर बनी बतायी मस्ज़िद को तोड़ने के लिए एक सम्प्रदाय की भावनायें उकसाना और दूसरे समुदाय की भावनाओं को भड़काना ही उनका लक्ष्य था, ताकि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से बहुसंख्यक वोट बटोरे जा सकें। अपने शोर शराबे भरे धुआँधार प्रचार में वे एक ऐसी विशाल तस्वीर का दुष्प्रचार कर रहे थे जिसमें भगवान राम एक सलाखों वाली कोठरी में कैद से प्रदर्शित हो रहे थे। जबकि सच यह था कि बाबरी मस्ज़िद में कई दशकों से नमाज नहीं पड़ी जा रही थी और जब से 1949 में तत्कालीन जिलाधीश द्वारा षड़यंत्र पूर्वक रामलला की मूर्ति स्थापित कर दी गयी थी तब से वहाँ उनकी पूजा हो रही थी। असंख्य अन्य मन्दिरों की तरह वहाँ भी सुरक्षा और दर्शन की सुविधा एक साथ देने के लिए सामने से सलाखों वाले पट लगे हुए थे। उक्त जिलाधीश बाद में जनसंघ के टिकिट पर लोकसभा का चुनाव भी लड़े थे।   
       उक्त उदाहरण उस दौर की, जिसे अटल-अडवाणी दौर कहा जा सकता है, की भाषागत चतुराई के उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। आज जब सब कुछ मोदी अर्पित किया जा रहा है तब आज की भाषा अपेक्षाकृत अशिष्ट और अधिक फासीवादी है। सोशल मीडिया पर अनेक बेनामी या छद्म नाम और पहचान वाले सेवक नियुक्त कर दिये गये हैं जो मोदी की अन्धभक्ति व सच को तोड़ मरोड़, झूठ का दुष्प्रचार करने के लिए अपने विरोधियों के खिलाफ जिस तरह की गन्दी भाषा, अश्लील गालियों, और प्रतीकों का प्रयोग कर रहे हैं, उसे देख कर लग रहा है कि यह भाजपा में मोदी युग का बदलाव है। नोबल पुरस्कार एक अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार है जो पुरस्कृत के कामों की अंतर्राष्ट्रीय मान्यता का संकेत होता है। इसे भाजपा ने भी स्वीकारा है जब एनडीए के शासन काल में वह इसी पुरस्कार से पुरस्कृत  होने पर भारतीय मूल के लेखक नायपाल को बुलाकर सम्मानित करती है जिनका कथन है कि माथे पर टीका लगा होना दिमाग के खोखले होने का प्रमाण होता है। यह भी एक संयोग होता है कि उस समय उनका स्वागत करने वालों में मुरली मनोहर जोशी ही प्रमुख थे जिनका माथा सदैव ही टीके से सज्जित रहता है।
       सोशल मीडिया के छद्मनामी शिखण्डियों द्वारा किये जाने अश्लील भाषायी आक्रमण को दरकिनार भी कर दें तो एक बुद्धिजीवी सम्पादक द्वारा अमृत्य सेन के बारे में जो कहा गया उसे आज की बदलती भाजपायी वृत्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। राज्य सभा का एक और कार्यकाल पाने के लिए मोदी की अन्ध चापलूसी में उनका यह कहना कि मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए पसन्द न करने पर भाजपा शासन आने पर वे उनका भारत रत्न वापिस ले लेंगे, एक ऐसा बयान था जो सोचने के तरीकों के पीछे की कहानी कहता है। मोदी के छद्मनामी सोशल मीडिया सेवकों द्वारा अमृत्य सेन ही नहीं उनकी अभिनेत्री बेटी की फिल्मी भूमिकाओं से चित्र निकाल कर उन पर अश्लील टिप्पणियां यह बताती हैं कि यह केवल चन्दन मित्रा तक ही सीमित भूल नहीं थी अपितु इस पूरे नये वर्ग को इसी मानसिकता के लिए तैयार कर दिया गया है। परोक्ष में यह मोदी को प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी के रूप में नापसन्द करने वाले शत्रुघ्न सिन्हा के लिए भी एक धमकी थी जिनकी अभिनेत्री बेटी फिल्मों में कहानी के अनुसार सभी तरह की कुशल भूमिकाएं कर रही है। कल के दिन वे उसके द्वारा अभिनीत भूमिकाओं के चित्र भी इसी तरह डाल सकते हैं। 
       गुजरात के चुनाव में रिपोर्टिंग के लिए गये भाजपा समर्थक पत्रकारों की टीम ने लौट कर अटल बिहारी और उनकी टीम के खिलाफ लगातार ऐसी ही भाषा में लिखना शुरू कर दिया जिससे कि भाजपा समर्थकों में उनकी व अडवाणी की छवि को धूसरित किया जा सके। किसी समय भाजपा के थिंक टैंक माने गये गोबिन्दाचार्य ने जब मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य घोषित किया तो मोदी की इसी टीम ने उनके चरित्र पर वैसी ही कीचड़ उछालनी शुरू कर दी जैसी वे कांग्रेस के लोकप्रिय नेताओं के खिलाफ उछालते रहते थे। जब पानी सर से ऊपर हो जाता है तो पार्टी के सत्तालोलुप नेता अपने को केवल अलग कर लेते हैं, या यह कह देते हैं कि यह पार्टी का मत नहीं है। वे सम्बन्धित और उसके कथन या कार्य की आलोचना नहीं करते और न ही कार्यवाही की माँग करते हैं, जैसा कि चन्दन मित्रा जैसे मामलों में हुआ है।
       मोदीयुग की भाजपा ने मोदी की वह भाषा और ढीठता सीख ली है जो वे 2002 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त लिंगदोह, सोनिया गान्धी, राहुल गान्धी, मुसलमानों, नरसंहार में पीड़ितों को मरहम लगाने की जगह क्रिया की प्रतिक्रिया या कार के नीचे आये पिल्ले जैसे बयानों में बोलते रहे हैं। मोदी के कार्यकाल में हुए एनकाउंटर या दूसरी हत्याएं भी संघ परिवार की साम्प्रदायिक हिंसा से वैसी ही भिन्न हैं। इसी का परिणाम है कि राज्य स्तरीय नेता भी ऐसी ही भाषा बोलने लगे हैं। गत दिनों गुना जिले के मधुसूदन गढ में मध्य प्रदेश के परिवहन मंत्री जगदीश देवड़ा ने कहा कि अगर कोई पार्टी की बुराई करे तो उसकी जुबान खींच लो।
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बुधवार, सितंबर 14, 2011

अडवाणीजी की रथयात्रा- बहुत देर कर दी मेहरवाँ आते आते


अडवाणीजी की रथयात्रा
                     बहुत देर कर दी मेहरवाँ आते आते
                                                             वीरेन्द्र जैन 

      वैसे तो अडवाणीजी पार्टी संगठन या सदन में किसी पद पर नहीं हैं, पर अटलजी को भुला दिये जाने, व मुरली मनोहर जोशी को हाशिये पर कर दिये जाने के बाद वे भाजपा के सुप्रीमो बन गये हैं। अध्यक्ष कोई भी बना रहे पर उनकी उपेक्षा करके भाजपा में कुछ भी नहीं हो सकता। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की इस घोषणा के बाद कि अगले चुनाव में किसी को भी भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश नहीं किया जायेगा, उन्होंने एक बार फिर रथयात्रा निकालने का फैसला किया है और यह रथ यात्रा भ्रष्टाचार के विरोध के नाम पर करेंगे। उल्लेखनीय है कि गत दिनों उज्जैन में आयोजित राष्ट्रीय सवयं सेवक संघ के शिखर मंडल की बैठक में भाजपा नेतृत्व से पूछा गया था कि भ्रष्टाचार के विरोध में जो राष्ट्रव्यापी हलचल अन्ना हजारे ने पैदा की वह भाजपा क्यों नहीं कर सकी। यह रथयात्रा उसी झिड़की का प्रतिफल प्रतीत होती है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अन्ना हजारे द्वारा बनाये गये माहौल का राजनीतिक लाभ उठाने की एक और अवसरवादी कोशिश है।
      भाजपा हमेशा ही दूसरों के अभियानों में घुसकर उसकी लोकप्रियता के सहारे अपना श्रंगार करने वाली पार्टी रही है क्योंकि वे जानते हैं कि उनके मूल चेहरे को देश का बहुमत पसन्द नहीं करता इसलिए वे कारवाँ में शामिल होकर उसे ही रास्ते में लूट लेने की नीति पर चलते हैं। स्मरणीय है वे अपने जनसंघ स्वरूप से ही संविद सरकारों के प्रमुख घटक रहे हैं और प्रत्येक संविद सरकार में सम्मलित होने के लिए सदैव आगे रहे हैं। इसी तरकीब से किसी समय के सक्रिय समाजवादी आन्दोलन को अब तक उन्होंने पूरी तरह पचा लिया है और बिना किसी राजनीतिक अभियान के देश में प्रमुख विपक्षी दल बन गये हैं। जनता पार्टी बनने पर उन्होंने झूठमूठ अपनी पार्टी का विलय कर दिया था और बाद में पहचान लिए जाने के बाद वैसे के वैसे समूचे बाहर आ गये थे। वह केन्द्र में देश की पहली गैरकांग्रेसवाद के आधार पर गठित सरकार थी जो इन्हीं की दुहरी सदस्यता के सवाल पर टूटी थी। बाद में 1989 में वीपी सिंह की लोकप्रियता से जुड़ कर इन्होंने उनकी सरकार में सम्मलित होने की भरपूर कोशिश की किंतु बामपंथ के विरोध के कारण इन्हें बाहर रहना पड़ा तो इन्होंने आरक्षण विरोधियों को पिछले रास्ते से मदद करके व रामजन्म भूमि के नाम साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण पैदा कर उनकी सरकार गिरवा दी क्योंकि वह सरकार बामपंथ और भाजपा दोनों के सहयोग के बिना नहीं चल सकती थी। दोनों ही स्थितियों में ये लाभ में रहे और लोकप्रिय व्यक्तियों से राजनीतिक सौदा व दलबदल को प्रोत्साहित करते करते सबसे बड़े विपक्षी दल बन गये, जिसके फलस्वरूप इन्हें छह साल केन्द्र में एक गठबन्धन सरकार चलाने का अवसर मिला।
       अपनी पिछली बहुचर्चित रथयात्रा अडवाणीजी ने किसी राजनीतिक मुद्दे पर नहीं निकाली थी अपितु वहीं राम जन्मभूमि मन्दिर बनाने के नाम अयोध्या की ऎतिहासिक बाबरी मस्जिद ध्वंस करने के लिए निकाली थी। इस यात्रा से एक ओर तो लोगों की भावनाओं को उभारने की कोशिश थी तो दूसरी ओर साम्प्रदायिकता भड़का कर धार्मिक ध्रुवीकरण करने की कोशिश थी। इनके समर्थक सोची समझी रणनीति के अंतर्गत मुसलमानों के खिलाफ उत्तेजित और अपमानजनक नारे लगाते हुए मुस्लिम बस्तियों से यात्रा निकालते थे जिससे टकराव बढता था और दंगे हो जाते थे। इन दंगों और उसके बाद की प्रतिक्रिया में दोनों ही समुदाय के सैकड़ों लोग मारे गये थे जिससे बने गैरराजनीतिक ध्रुवीकरण का इन्हें जबरदस्त लाभ मिला और संसद में इनकी संख्या दो से दोसौ तक पहुँच गयी।
      प्रस्तावित रथयात्रा उसी मानक पर निकालने की भूल है जबकि तब से अब तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है, बहुत से खुलासे हो चुके हैं, लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट आ चुकी है, और परिस्तिथियों में बहुत सारा बदलाव आ गया है।
      इसमें कोई सन्देह नहीं कि नई आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद राजनीतिक संरक्षण में प्रशासनिक भ्रष्टाचार बहुत बढ गया है और आम जनता उससे पीड़ित है। इस भ्रष्टाचार में बामपथियों के एक छोटे से हिस्से को छोड़, चुनावों में भरी राशि खर्च करने वाले भाजपा समेत सभी राजनीतिक दल लिप्त हैं। जहाँ जहाँ भाजपा की सरकारें हैं या जहाँ से उनके जनप्रतिनिधि चुने गये हैं वहाँ वहाँ ये भ्रष्टाचार में दूसरे किसी भी दल से पीछे नहीं है। ऐसी दशा में अडवाणीजी की यात्रा भ्रष्टाचार के विरोध में न होकर सीधे सीधे सत्तारूढ दल के खिलाफ एक राजनीतिक अभियान है। यह अभियान इसलिए निष्प्रभावी रहने वाला है क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ दुहरे मापदण्ड अपनाने से इनकी अपील का अन्ना हजारे की अपील से बेहतर असर नहीं होने वाला। इन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में भी स्विस बैंकों में जमा धन का मुद्दा उछाला था जिसे चुनाव के बाद बिल्कुल ही भुला दिया। अन्ना हजारे तो क्या ये तो बाबा रामदेव के आवाहन से भी पीछे रहे और अब जो कुछ भी करेंगे उसे नकल ही माना जायेगा।
      इस जनसम्पर्क यात्रा का नाम रथयात्रा रखना बिडम्बनापूर्ण है। जो यात्रा पैट्रोल या डीजल वाहन से की जा रही है उसे रथ नहीं कहा जा सकता क्योंकि रथ एक प्राचीन कालीन वाहन होता था जो पशुओं के सहारे चलता था। आखिर क्या कारण है कि वे वाहन शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहते, और उसे रथ कहते हैं। रथ पौराणिक ग्रंथों से निकला शब्द है और हमें उसी काल की याद दिला देता है जिस काल में वे ग्रन्थ रचे गये थे इस तरह रथ कहने से मामला कुछ कुछ धार्मिक सा भी हो जाता है। जब रामजन्म भूमि मन्दिर के लिए यात्रा निकाली थी तब रामलीला के मंच जैसे वाहन के लिए रथ शब्द का प्रयोग कुछ सामंजस्य भी बिठा लेता था पर एक राजनीतिक सामाजिक आन्दोलन के लिए प्रचलित भाषा और प्रतीकों का प्रयोग ही करना होता है। भाजपा का प्रयास देश के इतिहास से मुगलकाल और उस दौर में विकसित भाषा और संस्कृति को बिल्कुल मिटा देना रहा है। वे ताजमहल और कुतुबमीनार जैसी सैकड़ों इमारतों का इतिहास बदल देना चाहते हैं, वे लखनउ को लखनपुर और भोपाल को भोजपाल बना शहरों के नाम बदल देना चाहते हैं, यहाँ तक कि मुगलकाल के संज्ञा, सर्वनाम और क्रियाएं तक को नकारना चाहते हैं, ड्रैस उनके यहाँ गणवेश हो जाती है, और लाठी दंड बन जाती है, स्कूल शिशु मन्दिर बन जाते हैं ताकि उस मन्दिर में गैर हिन्दू झाँकने की भी कोशिश न करें। वे हिन्दी की जगह संस्कृत को जन भाषा बनाना चाहते हैं जो अपने समय में भी केवल पुरोहितों और अभिजात्य की ही भाषा रही है। डीजल/ पैट्रोल वाहन को रथ कहना भी उसी का हिस्सा है, जिसे अब उनके घेरे से बाहर की जनता स्वीकार करने को तैयार नहीं हो सकती।
      अडवाणीजी ने जब पिछली रथयात्रा निकाली थी तब टीवी का केवल एक ही चैनल होता था जो सरकारी था इसलिए वही बात, अलग अलग जाकर कहना पड़ती थी किंतु अब कई सैकड़ा प्राइवेट चैनल अस्तित्व में हैं जो लाइव प्रसारण करके एक साथ पूरे देश तक सन्देश दे सकते हैं। रही सही कसर पाँच करोड़ की संख्या में छपने वाले समाचार पत्र और इंटरनेट पूरी कर सकते हैं, इसलिए रथयात्रा की सफलता के लिए बहुप्रचारित सभाएं भी भीड़ नहीं जुटा सकतीं।
      यदि सचमुच भ्रष्टाचार का विरोध करना है तो उसकी शुरुआत अपने दल से करनी होगी और भ्रष्ट नेताओं को एक साथ निकालकर ही वे विश्वास पैदा कर सकते हैं पर दुर्भाग्य यह है कि उत्तराखण्ड के निशंक को हटाकर दुबारा से खण्डूरी को मुख्य मंत्री बना देने पर राजनाथ सिंह कहते हैं कि निशंक निष्कलंक हैं और उन्हें तो बिना किसी आरोप के बदला गया है। यदि मध्य प्रदेश में कार्यवाही करें तो आधा मंत्रिमण्डल पहले ही दिन बाहर हो जायेगा और संगठन में भी आधे नेता बचेंगे। इसलिए ऐसी कार्यवाही का दिन कभी नहीं आयेगा। हो सकता है कि यह यात्रा किसी बहाने से स्थगित भी हो जाये, क्योंकि नोट फार वोट मामले में उन्होंने खुद ही जिम्मेवारी ले ली है और यात्रा की घोषणा पूरी पार्टी का ध्यान आकर्षित करने का तरीका भर हो, ताकि पूछ ताछ को टाला जा सके।
वीरेन्द्र जैन
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