रविवार, सितंबर 04, 2011

सामाजिक परिवर्तन की संकेतक एक और महत्वपूर्ण फिल्म -बोल

     सामाजिक परिवर्तन की संकेतक एक और महत्वपूर्ण फिल्म बोल
                                                             वीरेन्द्र जैन
      हिन्दी के बहुत महत्वपूर्ण कवि कथाकार उदय प्रकाश की एक कविता है-
मर जाने के बाद आदमी
कुछ नहीं सोचता
मर जाने के बाद आदमी
कुछ नहीं बोलता
कुछ नहीं सोचने और
कुछ नहीं बोलने से
आदमी मर जाता है।

      पिछले चार दशक तक वह सिनेमा बाक्स आफिस पर पिटता रहा था जिसे कलात्मक, समानांतर, आफबीट या सार्थक सिनेमा जैसा ही कुछ नाम दिया जा सकता है, यह आम आदमी की जिन्दगी और उस जिन्दगी की पेचीदगियों को उजागर करने वाला सिनेमा है। हिन्दी में श्याम बेनेगल के बाद आये आमिरखान ने जिस तरह से फिल्में बनायी हैं वे न केवल जनता को सम्वेदनशीलता के साथ जागरूक बनाती हैं, अपितु बाक्स आफिस पर भी सफल होती हैं। जब कोई फिल्म अपनी लागत निकाल लेती है और उसे प्रशंसा व पुरस्कार मिलते हैं तो उसे इस दिशा में और आगे जाने का उत्साह मिलता है। जहाँ हमारे देश में रंग दे बसंती, तारे जमीं पर, थ्री ईडियट, पीपली लाइव, चक दे इंडिया, नो वन किल्लड जेसिका, स्वदेश, आदि फिल्में आयीं तो फिल्म जगत को वापिस राजकपूर, और गुरुदत्त का जमाना याद आ गया, जब सामाजिक चेतना की फिल्में बनायी जाती थीं। हमारे देश के सहोदर पाकिस्तान में भी जहाँ इन दिनों धार्मिक कट्टरवाद प्रति दिन खून की होली खेल रहा है वहाँ शोएब मंसूर ने खुदा के लिए जैसी श्रेष्ठ फिल्म बनाने के बाद बोल बना कर दुनिया भर की प्रशंसा बटोरी है।
      इस फिल्म में विभाजन के बाद पाकिस्तान गये एक हकीम जो कट्टर धार्मिक भी हैं, कठमुल्लावाद के शिकार होकर पुत्र प्राप्ति के चक्कर में निरंतर आठ बेटियां पैदा करते जाते हैं और उनकी नवीं संतान तीसरे जेंडर में पैदा होती है जो न निगलते बनती है और न उगलते। वे उसे मार देने तक का विचार मन में लाते हैं पर परिवार के कारण उसे बड़ा करना पड़ता है। जब गरीबी का शिकार होकर उसकी यह संतान जिसे वे छुपा कर रखते हैं चोरी से काम पर जाती है तो उसके साथ जो हादसा होता है उसकी शर्म से बचने के लिए वे उसकी हत्या कर देते हैं। इस अपराध से बचने में उन्हें और उनके परिवार को बड़े अर्थ संकट से गुजरना पड़ता है और उनकी बेटियां विद्रोहिणी हो जाती हैं। सदैव चुप और आतंकित रहने वाली ये बेटियां जब बोलने लगती हैं तब ही वे अपना अस्तित्व बचा पाती हैं। फिल्म में  धर्मान्धता और सामाजिक यथार्थ के बीच कंट्रास्ट दिखाया गया है जिसमें पड़ोसी ने समझदारी से अपना परिवार नियंत्रित रख कर अपने घर में खुशियां बोयी हैं व वे लोग ही इस परिवार को संकट से उबारते हैं।
      गत दिनों हंस में प्रकाशित होने वाले शीबा असलम फहमी के कुछ लेखों के बारे में दिल्ली के एक पत्रकार मित्र अनीस अहमद खान से मेरी बात हो रही थी तो उनका कहना था कि समाज को ये बहुत गलतफहमी है कि मुस्लिम समाज में सारे लोग ही कूड़मगज ही होते हैं और वहाँ प्रगतिशील चेतना काम नहीं कर रही। आज दुनिया छोटी हो गयी है और मुस्लिम समाज में भी नौजवानों का हिस्सा सवाल खड़े करके प्रगतिशील समाज में आ रहा है। पाकिस्तान में फिल्म खुदा के लिए के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति मुशर्रफ ने सहयोग किया था और इस फिल्म को भी लाहौर के नेशनल स्कूल आफ आर्ट के फिल्म डिवीजन के छात्रों ने भरपूर मदद की है। ये दोनों ही फिल्में पाकिस्तान में उग्रवादियों की धमकी के बाबजूद व्यावसायिक रूप से भी सफल हुयी हैं जो समाज की पसन्दगी का संकेत देती हैं।
      यह फिल्म जितना पाकिस्तानी समाज पर लागू होती है उतनी ही हिन्दुस्तानी समाज पर भी लागू होती है। भले ही कहानी का स्थान नाम के लिए लाहौर है, पर उसे दिल्ली या भोपाल भी कहा जा सकता है। अनियंत्रित ढंग से बच्चे पैदा करके अपनी गरीबी को न्योतने का काम केवल मुस्लिम समाज का पिछड़ा हुआ हिस्सा ही नहीं कर रहा अपितु अपने को राष्ट्रवादी कहने वाले एक हिन्दूवादी संगठन के प्रमुख ने भी बिना उनके जीवन यापन का उपाय बताये हिन्दुओं को चार चार बच्चे पैदा करने का आवाहन किया था।
      अंतर्वस्तु पहले बदलती है और उसके बाह्य परिणाम बाद में सामने आते हैं। इन फिल्मों के सफल होने से समाज के अन्दर ही अन्दर एक हलचल के संकेत मिल रहे हैं। इस फिल्म के शीर्षक में एक आवाहन भी है जो, बोल कि लव आजाद हैं तेरे, बोल मजूरा हल्ला बोल, से लेकर जोर से बोलो दिल्ली ऊंचा सुनती है की ध्वनियां भी नजर आती हैं।
वीरेन्द्र जैन
2/1   शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629
  

बुधवार, अगस्त 31, 2011

राजनीतिक दलों के सदस्यों की आचारसंहिता जरूरी


राजनीतिक दलों के सदस्यों की आचार संहिता होनी चाहिए

वीरेन्द्र जैन

गत दो दशकों के दौरान चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों और उनके परिवारीजनों के लिए कुछ उद्घोषणाओं को अनिवार्य करके बहुत अच्छा काम किया है जो हमारे लोकतंत्र की मूल भावनाओं को कार्यांवित करने की दिशा में मददगार हो रहा है। चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों को निर्वाचन फार्म भरते समय अपनी व अपने परिवार की कुल सम्पत्ति और देयताओं का विवरण देना तथा उन पर लम्बित आपराधिक प्रकरणों की जानकारी देना अनिवार्य किया है। इससे उम्मीदवार का चरित्र तो स्पष्ट हो ही जाता है, उसे टिकिट देने वाले दल का चरित्र भी उससे पता चल जाता है।

किसी राजनीतिक दल के टिकिट पर चुनाव लड़ने वाला कोई भी उम्मीदवार उस चुनाव क्षेत्र में अपने दल का प्रतिनिधित्व करता है तथा उसे जिताने में उसके दल के सदस्यों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए क्या यह जरूरी नहीं है कि प्रत्येक मान्यता प्राप्त दल के चुनाव में सक्रिय सदस्यों की भी वैसी ही पारदर्शिता हो जैसी कि उम्मीदवार के लिए जरूरी होती है। देखा गया है कि बामपंथी दलों को छोड़कर अधिकांश राजनीतिक दलों में सदस्यों के लिए कोई भी आचार संहिता घोषित नहीं है, व जहाँ घोषित है वहाँ वह व्यवहार में नहीं लायी जाती। भूखे को रोटी की तरह जो भी आकर सदस्यता माँगता उसे ये राजनीतिक दल लपक लेते हैं और सेवक बनाने की कोशिश करते हैं पर इन्हीं में से कोई कोई गुरू निकल आता है और चूना लगा देता है। जो उम्मीदवार किसी मामले में बंगारू लक्षमण जैसा बहुत बदनाम हो जाता है तो उसकी पत्नी या बेटे-बेटी को टिकिट दे दिया जाता है। ऐसे में बदनाम व्यक्ति के ऊपर चल रहे प्रकरणों की घोषणा जरूरी नहीं होती। अब जब महिला आरक्षण विधेयक और गम्भीर अपराधों के आरोपियों को चुनाव लड़ने से रोकने का कानून पास होने वाला है तो ऐसे मामले और अधिक संख्या में सामने आयेंगे। मध्य प्रदेश में तो कई पार्टियों में रहे एक बदनाम सामंत की जगह भाजपा ने उसकी पत्नी को टिकिट दे दिया, बाद में जाँच में वह भी हत्या के आरोप में सहयोगी पायी गयी जो कुछ दिन फरार रही और कुछ दिन जेल में, पर विधायकपति अभी भी जेल में है, और विधायक अभी भी पार्टी में है।

यह बात बार बार सामने आ रही है कि चुनावों में असामाजिक तत्व अपनी भूमिका से जन भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति को भटका देते हैं और अवैध ढंग से धन कमाने वाले चुनाव में धन के प्रवाह से चुनाव परिणामों की दिशा को बदल देते हैं। ये ही लोग चुनाव के बाद अपनी भूमिका के पारश्रमिक के रूप में सरकार से अनुचित लाभ लेने का दबाव बनाते हैं और नियम कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए सत्ता पक्ष के नेताओं को भ्रष्ट बनाते हैं। इसलिए भी यह जरूरी है कि जो भी चुनाव प्रक्रिया से जुड़े हों उनका चरित्र और उन्हें अपने साथ रखने वालों का चरित्र नेट पर उपलब्ध हो। परोक्ष में कह सकते हैं कि लोकतंत्र में जो राजनीतिक दल सरकार बनाते हैं और देश चलाने की जिम्मेवारी निभाते हैं उनके सदस्यों के चरित्र और आचरण की जिम्मेवारी लेने वाला भी कोई होना चाहिए, अर्थात सारे राजनीतिक दल केडर आधारित होना चाहिए।

यह खेद का विषय है कि केन्द्र में कई सरकारें बदल जाने के बाद भी 5 दिसम्बर 1993 को पूर्व गृह सचिव एन एन व्होरा की अध्यक्षता में गठित व्होरा कमेटी की रिपोर्ट लोकपाल बिल की तरह ही कई दशकों से धूल खा रही है। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि-

देश में अपराधी गिरोहों, हथियार बन्द सेनाओं, नशीली दबावों का व्यापार करने वालों, तस्कर गिरोहों, आर्थिक अपराधों में सक्रिय लाबियों का बड़ी तेजी से प्रसार हुआ है। इन लोगों ने विगत वर्षों के दौरान स्थानीय स्तर पर नौकरशाहों, सरकारी पदों पर आसीन व्यक्तियों, राजनेताओं, मीडिया से जुड़े व्यक्तियों तथा गैर-सरकारी क्षेत्रों के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन व्यक्तियों के साथ व्यापक सम्पर्क विकसित किये हैं। इनमें से कुछ सिंडीकेटों की विदेशी सूचना एजेंसियों के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रिय संबन्ध भी हैं। बिहार हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में इन गिरोहों को स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दलों के नेताओं और सरकारी पदों पर आसीन व्यक्तियों का संरक्षण हासिल है।

गत दिनों भोपाल में सीबीआई ने छापा मारकर एक बिल्डर के यहाँ से कुछ कागजात जब्त किये हैं, इन से पता चलता है कि उक्त बिल्डर ने एक बैंक के मैनेजर से मिलकर छद्म ऋणी और काल्पनिक प्लाट के झूठे कागज तैयार करके करोड़ों रुपयों के लोन ले लिये। आरोपी दो सत्तारूढ विधायकों के बहुत निकट था और मौके बेमौके उन्हीं के साथ देखा जाता था। विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं के साथ इस आरोपी का सत्तारूढ पार्टी के अध्यक्ष और एक विधायक ने पिछले दिनों ही एक समारोह में सम्मान किया था। यह एक अकेला मामला नहीं है सत्तारूढ दल के अधिकांश नेता अपने साथ जो समर्थकों की फौज रखते हैं, जिन्हें आम बोलचाल में उनके चमचे कहा जाता है, वे भी नेता के यहाँ चौबीस घंटे के बँधुआ होते हैं और उन्हें कोई वेतन नहीं मिलता। इसके बदले में उन्हें जहाँ से भी बन पड़े मुँह मारने की छूट दे दी जाती है। किसी सरकारी कर्मचारी द्वारा उनके काम में बाधा उपस्थित करने पर नेताजी अपने प्रभाव का स्तेमाल करके उस पर दबाव बना देते हैं। सत्तारूढ नेताजी के जन्मदिन पर अखबारों में उनके फोटो के साथ जो विज्ञापन छपते हैं और उसमें विज्ञापन दाता की फर्म के नाम सहित उसका फोन नम्बर भी दिया रहता है वह परोक्ष में उसके दलाल होने की सूचना होती है और सम्पर्क के लिए नम्बर छपवाया जाता है। जो नेता सत्ता से बाहर हो जाता है उसके जन्मदिन की शुभकामनाओं के विज्ञापन भी अखबारों में नहीं छपते। यह किया जा सकता है कि नेताओं, मंत्रियों के साथ रहने वाले यदि किसी अपराध में सम्मलित पाये जाते हैं तो उनका दल अपनी मान्यता बचाने के लिए उन पर नैतिक जिम्मेवारी डाले और एक सुनिश्चित समय तक उनको कोई पद न देने की कार्यवाही करे।

पिछले दिनों भ्रष्टाचार के विरोध में अन्ना हजारे के अनशन, और मीडिया द्वारा उसके व्यापक कवरेज से जो माहौल बना है वह जिन्दा बना रहना चाहिए और ऐसी सभी संस्थाओं में पल रही विकृतियों को निशाने पर लिया जाना चाहिए जिनसे भ्रष्टाचार जन्म लेता है। चुनाव सुधारों से भी पहले सर्वसम्मति से राजनीतिक दलों के सदस्यों की आचार संहिता बनाना जरूरी होना चाहिए। यह कितना बिडम्बना पूर्ण है कि सारे ही दलों ने भ्रष्टाचार के विरोध का समर्थन किया किंतु इस दौरान किसी ने भी अपने दल के अन्दर पल रहे भ्रष्टों को तलाशने की कोशिश नहीं की और निकल बाहर करने की प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं की। ऐसे दल संसद में चाहे जितना शोर करें और संसद की कार्यवाही को कितनी भी वाधित करें, पर उनसे किसी सकारात्मक कार्यवाही की उम्मीद बेकार होगी।

वीरेन्द्र जैन

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सोमवार, अगस्त 22, 2011

अन्ना का आन्दोलन आकार लेता जा रहा है


अन्ना का आन्दोलन एक आकार लेता जा रहा है

वीरेन्द्र जैन

पिछले दिनों से विभिन्न सूचना माध्यमों और राजनीतिक व गैरराजनीतिक सम्वादों में अन्ना हजारे का आन्दोलन छाया रहा है। हमारा समाज अवतारवाद में विश्वास करने वाले लोगों का समाज है जो अपनी समस्याओं के हल किसी अतिमानवीय किस्म की शक्ति में देखते हैं और किसी विशिष्ट जन के अवतरण की प्रतीक्षा करते रहते हैं। इस प्रतीक्षा में हम कई बार भ्रम के शिकार भी हो जाते हैं और हर आहट को उद्धारक के आगमन से जोड़ लेते हैं, जिससे कई बार धोखे भी हो जाते हैं। पूरे देश में सत्तारूढ से लेकर विपक्षी दलों तक सब इस बात से सहमत हैं कि भ्रष्टाचार असहनीय स्थिति तक बढ और फैल गया है और इसने सभी हिस्सों को दुष्प्रभावित करना शुरू कर दिया है। इस विश्वास को पुष्ट करने के रूप में अभी हाल ही मैं इतने बड़े बड़े भ्रष्टाचार सामने आये हैं कि प्रमुख पदों पर बैठे लोगों के बारे में कहे गये किसी भी झूठ को भी अधिकांश लोग आसानी से सच मानने लगे हैं। एक हजार करोड़ से बड़े कुछ भ्रष्टाचार इस तरह से हैं-
स्विस बैंक में मौजूद काला धन 210000 करोड़

टूजी घोटाला 176000 करोड़

स्टाम्प घोटाला 20000 करोड़,

हसन अली टैक्स व हवाला घोटाला 39120 करोड़

स्कार्पियन पनडुब्बी घोटाला 18978 करोड़

टीक प्लांटेशन घोताला 8000 करोड़

सुखराम टेलेकाम घोटाला 1500 करोड़

प्रीफेंशियल एलोटमेंट घोटाला 5000 करोड़

सत्यम घोटाला 8000 करोड़

उड़ीसा खदान घोटाला 7000 करोड़

झारखण्ड खदान घोटाला 4000 करोड़

उर्वरक आयात घोटाला 1300 करोड़

हर्षद मेहता [शेयर घोटाला] 5000 करोड़

काबलर घोटाला 1000 करोड़

इसी व्याधि का विरोध करने के लिए जब आवाज उठी और जिसका नेतृत्व एक ऐसे सहज सरल सादगी पसन्द, भूतपूर्व सैनिक व्यक्ति के हाथ में दे दिया गया, जिसके सामाजिक सेवाओं का निष्कलंक इतिहास जुड़ा है व इसके लिए उसने विवाह तक नहीं किया, तो लोगों ने उसे अवतार जैसा मान लिया। वे बिना किसी पूछ परख के उसमें वांछित बदलाव का हल देखने लगे।

अन्ना हजारे का आन्दोलन भावुकता से काम लेने वाले आम लोगों को बहुत भाया किन्तु दूरदर्शी बुद्धिजीवियों ने उसे सन्देह मिश्रित श्रद्धा की दृष्टि से ही देखा। इसका कारण यह था कि यह आन्दोलन केवल बीमारी के लक्षण दूर करने वाला तो नजर आता था पर बीमारी दूर करने वाला नहीं। अर्थात भ्रष्टाचार को दण्डित करने तक सीमित नजर आता था पर भ्रष्टाचार के लिए अनुकूलता पैदा करने वाली व्यवस्था, आर्थिक नीतियों, कमजोर न्यायिक प्रणाली, दोषपूर्ण चुनावी व्यवस्था व सामाजिक बुराइयों के बारे में मौन था। वे राजनीतिक दलों से दूरी बना कर चल रहे थे जो सामाजिक बदलाव की मुख्य संस्था हैं तथा कानून बनाने के लिए सक्षम संसद में बैठते हैं। किंतु फिर भी वे भ्रष्टाचार दूर करने के लिए इसी कानून और संविधान में ही आस्था प्रकट कर रहे थे। उनके द्वारा बनाये गये ड्राफ्ट पर संसद में बैठने वाले किसी भी राजनीतिक दल ने सहमति नहीं दी थी पर फिर भी वे अपने लोकपाल बिल के ड्राफ्ट के अनुसार ही कानून बनाने की जिद ठाने आन्दोलन कर रहे थे एवं जिसके लिए आमरण अनशन का सहारा ले रहे थे।

प्रत्येक लोकप्रिय व्यक्ति, संस्था या घटना से अपने को जोड़ कर उसका राजनीतिक लाभ उठाने के लिए उत्सुक रहने वाला संघ परिवार उनके आन्दोलन को मिले समर्थन का लाभ लेने हेतु आगे बढ कर उनका साथ दे रहा था, यही कारण था कि देश की दूसरी संस्थाएं अन्ना के आन्दोलन को भी शंका की दृष्टि से देखने लगी थीं।

यह अच्छी बात है कि अन्ना के आन्दोलन से जुड़े नेतृत्वकारी साथियों में एक लोकतांत्रिक भावना जिन्दा है इसलिए उन्होंने बुद्धिजीवियों और आमजन से मिले सुझावों को ध्यान पूर्वक सुना और उस पर अमल किया। सबसे पहले तो उन्होंने अपने आन्दोलन का आर एस एस से सम्बन्ध होने का जोरदार और मुखर खण्डन करते हुए कहा कि जो हमारे आन्दोलन को आर एस एस से जोड़ते हैं उन्हें पागल खाने भेजना चाहिए। यह वक्तव्य बताता है के संघ परिवार के बारे में उनके विचार देश के व्यापक जनमानस की भावनाओं से अलग नहीं हैं। इससे पहले जेल में रहते हुए उन्होंने मिलने के लिए आये बाबा रामदेव से मिलने से इंकार करके स्पष्ट संकेत दिया था कि संघ के साथ रहने वालों से दूरी बना के रहना चाहते हैं। अन्ना हजारे की टीम द्वारा गत रविवार को यह भी कहा गया कि यह लड़ाई केवल लोकपाल पर ही खत्म नहीं होगी बल्कि चुनाव व्यवस्था में सुधार तक जायेगी। उन्होंने अपने समर्थन में उतरे जन समुदाय से कहा कि वे अपने सांसद के घरों के बाहर धरना दें और उन्हें जनलोकपाल बिल के पक्ष में समर्थन देने के लिए कहें। भविष्य़ में इस आन्दोलन को किसानों आदिवासियों की भूमि अधिग्रहण से जोड़ने की बात कह कर कृषकों और ग्रामीण क्षेत्रों तक आन्दोलन के विस्तार की भूमिका तैयार की।

इसका परिणाम यह हुआ कि उज्जैन में चल रही संघ के कोर ग्रुप के बैठक को फैसला लेना पड़ा कि जनता के रुख को देखते हुए भाजपा अन्ना हजारे के आन्दोलन को समर्थन तो देगी पर उसमें शामिल नहीं होगी। दूसरी ओर अन्ना के आन्दोलन के समानांतर उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में एक ग्रुप का गठन किया हुआ है जिसका नाम अन्ना के आन्दोलन इंडिया अगैंस्ट करप्शन से मिलता जुलता यूथ अगेंस्ट करप्शन रखा गया है। यह ग्रुप अन्ना के आन्दोलन को समर्थन देगा। सदैव दुहरेपन में जीने वाले संघ परिवार का यह एक और वैसा ही कदम है जिसके अनुसार वे एक ओर तो साथ देते नजर आते हैं और दूसरी ओर अलग भी हैं।

अन्ना टीम और सरकार के बीच कुछ समझौते के आसार भी बन रहे हैं जिसके अनुसार वे न्याय व्यवस्था को लोकपाल के नियंत्रण में लाने की मांग छोड़ सकते हैं, और सरकार प्रधानमंत्री को लोकपाल के अंतर्गत लाने की बात पर स्वीकृत हो सकती है, जो विपक्ष भी चाहता है। यह एक शुभ लक्षण है। अभी तक अन्ना का आन्दोलन एक अमूर्तन में चल रहा था जो अब एक आकार लेता जा रहा है जिसके आधार पर उसके गुण दोषों का मूल्यांकन सम्भव हो सकता है। इस पारदर्शिता के युग में अन्ना के आन्दोलन को मिले आर्थिक सहयोग की सूची सामने आयी है, इसलिए जरूरी हो जाता है कि देश का प्रत्येक आन्दोलन और गैर सरकारी संगठनों समेत सभी जन संगठन अपने धन प्राप्ति के श्रोतों की जानकारी दें। आर एस एस को भी स्पष्ट करना चाहिए कि जब वह अपने आप को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है तो सहयोग राशि को गुरु दक्षिणा का नाम देकर गुप्त तरीके से क्यों लेता है?

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

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गुरुवार, अगस्त 18, 2011

अन्ना हजारे के नाम खुला खत


अन्ना हजारे के नाम खुला खत

वीरेन्द्र जैन

आदरणीय हजारेजी

सादर प्रणाम

दरअसल यह खत आपकी टीम के नाम है जिनकी सलाह से आपके वक्तव्य सामने आते हैं, किंतु किसी भी संस्था को जब कोई पत्र दिया जाता है तो वह संस्था के प्रमुख को सम्बोधित किया जाता है जैसे कि ठेकों के टेंडर तक सम्बन्धित बाबू को नहीं अपितु राष्ट्रपति भारत सरकार को सम्बोधित होते हैं।

आपके अभियान के समांतर चलने वाले मायावान बाबा रामदेव के आचरण के विपरीत आपने अपने निश्चय और आचरण में जो दृड़ता दिखायी है उसके लिए देश में उन लोगों ने भी आपकी सराहना की है जो आपके जनलोकपाल से असहमत हैं। वैसे भी आपके जनलोकपाल से तो पूरी तरह कोई भी सहमत नहीं है, यहाँ तक कि इसे तैयार करने वालों ने भी इसे इसी तरह तैयार किया है ताकि सरकार से टकराव के अवसर आयें। वे इसमें सफल रहे हैं। इससे जनता के पास यह सन्देश पहुँचा है कि आपकी टीम देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाना चाहती है और देश की चुनी हुयी सरकार ऐसा नहीं चाहती। देश के विपक्षी दल भी सरकार की विकृत छवि के और विकृत होने से प्रसन्न हैं और आपके जनलोकपाल बिल के समर्थन में न होते हुए भी वे सरकार की छवि बिगाड़ने के अभियान में समानधर्मी महसूस करते हैं। आपके समर्थन में जो भीड़ उमड़ती दिख रही है वह भी विपक्षी दलों को सम्भावनाओं से भरी हुयी दिख रही है क्योंकि वह सतारूढ दल के विरोध में खड़ी नजर आ रही है। इन्हीं दिनों उज्जैन में चल रही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चिंतन व समंवय बैठक ने अपने संगठनों को सन्देश दिया है कि भले ही अन्ना हजारे भाजपा और संघ से दूरी बना कर चल रहे हैं, लेकिन उनकी गिरफ्तारी और आन्दोलन से बने माहौल का फायदा उठाया जाना चाहिए। भाजपा अध्यक्ष गडकरी को बैठक में आने के बजाय अन्ना की गिरफ्तारी के खिलाफ आन्दोलन आदि का नेतृत्व करने को कह दिया गया है। विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय नेत्तृत्व ने भी यूथ अगैंस्ट करप्शन फोरम के आन्दोलन में कूदने को कहा है [दैनिक भास्कर भोपाल दिनांक 18 अगस्त 2011 में उज्जैन से मनोज जोशी की रिपोर्ट] टालस्टाय के एक उपन्यास में नायक कहता है कि- वो मुझे चाहती है या नहीं चाहती यह जरूरी नहीं पर मैं उसे चाहता हूं यह मेरे लिए काफी है। इसी तरह आप भले ही राजनीतिक दलों से दूरी बनाये रखने की बात करते हों पर राजनीतिक दल तो भीड़ पर भिनभिनाने से नहीं चूक सकते क्योंकि यह गुड़ और मक्खियों जैसा रिश्ता है। श्रीमती इन्दिरा गान्धी ने प्रेमधवन को दिये अपने आखिरी साक्षात्कार में विभिन्न धर्मस्थलों पर जाने का यही कारण बताया था कि वे जनता के आस्था स्थल हैं और बड़ी संख्या में जनता वहाँ पर जाती है।

राजनीतिक दलों ने आपकी बात का लिहाज रखा है इसलिए वे अपनी पार्टी के झंडे बैनर लेकर आपके आन्दोलन में सम्मलित नहीं हुए किंतु सब ने अपने अपने झंडे बैनरों के साथ आपकी गिरफ्तारी पर विरोध किया। रिन्द के रिन्द रहे हाथ से जन्नत न गयी।

आइए उस भीड़ का विश्लेषण करें जो 15 अगस्त को सड़कों पर नाबालिग बाल मजदूरों द्वारा बेचे गये झंडे लेकर आपके समर्थन में उतरी। इस भीड़ में बहुत बड़ी संख्या युवाओं की थी जो कालेजों में पढते हैं, या पढने के बाद नौकरी की तलाश में हैं। कुछ संख्या उन वकीलों की थी जो युवा हैं और जिनकी प्रैक्टिस नहीं चलती। आपकी टीम का आवाहन था कि पूरा देश 16 अगस्त से एक सप्ताह की छुट्टी ले और तिरंगा लेकर सड़कों गलियों में घूमे व अपने अपने मन से चयनित भ्रष्टाचारियों का विरोध करे। मुझे प्राप्त जानकारी के अनुसार 16 अगस्त को कहीं किसी ने छुट्टी नहीं ली, सारे दफ्तर सारे स्कूल भरे रहे यहाँ तक कि दुकानें भी खुली रहीं। जो युवा अलग अलग पार्कों, फास्ट फूड सेंटरों, या पिकनिक स्पाटों पर जेंडर मुक्त मित्रों के साथ मौसम का मजा लेते थे वे यही काम कुछ चौराहों या तयशुदा प्रदर्शन स्थलों पर कर रहे थे। उनके साथ कई जगह पैंट पर कुर्ता पहिनकर गान्धी थैला लटकाने वाले कुछ एनजियो नुमा लड़के और वैसी ही खिलखिलाती बिन्दास लड़कियां थीं। सारा माहौल एक उत्सव की तरह आल्हाद से भरा हुआ था, कहीं कोई गुस्सा नहीं था। कृप्या इसे अपने अहिंसा के सन्देश की शांति समझने की भूल न करें, क्योंकि इसमें एक रूमान छलक रहा था। हाथ उठा कर नारे लगाने में नृत्य था गीत था, आनन्द था।

इन लड़कों में से अधिकांश गरीब परिवारों से नहीं आये थे क्योंकि जो जितना गरीब है वह उतना ही प्रत्यक्ष भ्रष्टाचार से कम पीड़ित है। इनमें पिछड़े परिवारों के बच्चे भी नहीं थे क्योंकि वे बड़ी नौकरी न मिलने पर कोई छोटी नौकरी भी कर लेते हैं। इनमें अधिकांश उन परिवारों से आये बच्चे थे जिन परिवारों के मुखिया कहीं न कहीं स्वयं तो भ्रष्टाचार करते हैं किंतु उनके साथ दूसरे जो भ्रष्टाचार करते हैं उसको दूर करना चाहते हैं। इन्हें सत्ता पर बैठे व्यक्ति को गाली देने में और सरकार पलटने में अपनी भूमिका की कल्पना में एडवेंचर महसूस होता है। इनके पास भी आपकी टीम की तरह वैकल्पिक व्यवस्था का कोई ढांचा [विजन] नहीं है। ये कारों, मोटर साइकिलों वाले हैं, इनको पर्याप्त जेबखर्च मिलता है।

आदरणीय,

इसका मतलब यह नहीं कि मैं आपको अनशन न करने देने वाली और आपको गिरफ्तार करने वाली सरकार के पक्ष में हूं। मैं तो केवल यह बताना चाह रहा हूं कि आप जिनके सहारे बड़े परिवर्तन की उम्मीद कर रहे हैं वे वही लोग हैं जिनके खिलाफ लड़ाई लड़ी जानी है। आपसे उम्मीद पाले जो निरीह लोग आशा से तक रहे हैं उनके वोट लूटने के लिए स्थापित राजनीतिक दलों ने कमर कस ली है, इसलिए जरूरी है कि आप स्पष्ट करें कि भ्रष्टाचार के लिए आप जिस व्यवस्था को जिम्मेवार मानते हैं उसको हटाने के बाद नई व्यवस्था का आपका अगला खाका क्या है? क्या आपने अपने समर्थकों के लिए कुछ न्यूनतम पात्रताएं और आचार संहिताएं बनायी हैं, जिनके बिना किसी परिवर्तन की दशा में जार्ज की जगह जमुनाप्रसाद आ जायेंगे। यदि आप दल की सीमाओं में नहीं बँधना चाहते तो क्या उम्मीदवारों में कुछ न्यूनतम पात्रताएं, और कुछ न्यूनतम नकार बताना चाहेंगे, कि ये गुण होने चाहिए और ये अवगुण नहीं होने चाहिए। क्या आप चाहेंगे कि चयनित जन प्रतिनिधि पर लम्बित प्रकरणों की सुनवाई विशेष अदालतें दिन-प्रतिदिन के आधार पर करें और निश्चित समय में फैसला सुनाएं। क्या आप चाहेंगे कि एक बार चयनित होने के बाद विधायक, सांसद पेंशन पाकर सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित कर चुका जनप्रतिनिधि अपनी सारी चल अचल सम्पत्ति त्याग दे तब शपथ ग्रहण करे।

आदरणीय, भ्रष्टाचार दोषयुक्त व्यवस्था की पैदाइश होता है और इसे दूर करने के लिए व्यवस्था को बदलना ही होगा। कृपा करके इस सम्बन्ध में आपने जो सपना देखा होगा उससे देश को परिचित कराइए अन्यथा यह सब एक तमाशा होकर रह जायेगा।

आपका एक प्रशंसक

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