बुधवार, अप्रैल 16, 2014

ये लहर क्या किसी फिल्म के सैट पर है?

ये लहर क्या किसी फिल्म के सैट पर है?  
वीरेन्द्र जैन

      हमारी व्यवस्था में किसी क्षेत्र के चुनाव परिणाम क्षेत्र विशेष में चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों के बीच सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाले को जीता हुआ दिखाते हैं। इन बहुदलीय चुनावों में कई उम्मीदवार कुल बीस प्रतिशत मत पाकर भी जीत जाते हैं और कई 40 प्रतिशत मत पाकर भी हार जाते हैं। इसके विपरीत लहर प्रबन्धित चुनाव परिणामों से नहीं अपितु जनसमर्थन की तीव्रता से जुड़ा होता है जिसमें लाखों एकजुट मतदाता उम्मीदवार की जीत हार को अपनी जीत हार से जोड़ कर देखते हैं। इस विशाल लोकतंत्र में किसी की लहर का मतलब होता है कि उस दल विशेष या नेता विशेष को उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक इतना समर्थन मिलता दिखाई दे कि जो डाले गये मतों में भी कम से कम 40 प्रतिशत मतों से अधिक हो। ऐसी लहर 1971, में श्रीमती इन्दिरा गाँधी के नेतृत्व वाली नई कांग्रेस को 43.61 प्रतिशत और सहयोगी सीपीआई को 4.73 अर्थात कुल 48.34 प्रतिशत मत मिले थे, जबकि भारतीय जनसंघ को 7.35 प्रतिशत मत मिले थे। 1977 में अनेक दलों के गठबन्धन जनता दल जिसने भारतीय लोकदल के चुनाव चिन्ह पर चुना लड़ा था को 41.32 प्रतिशत और सहयोगी सीपीएम को 4.29 प्रतिशत मत अर्थात कुल 46.61 प्रतिशत मत मिले थे। 1980 में किसी लहर का आभास नहीं था किंतु जनता दल के आपसी झगड़ों से निराश जनता ने श्रीमती गाँधी के नेत्तृत्व वाली कांग्रेस को 42.69 प्रतिशत मत दिये थे। 1984 में राजीव गाँधी वाली कांग्रेस के पक्ष में जो सहानिभूति लहर उठी थी उसमें कांग्रेस को 49.1 प्रतिशत मत मिले थे जबकि सबसे बड़े विपक्षी दल भाजपा को कुल 7.74 प्रतिशत मत मिले थे।
      यह अनेक प्रमाणों से सिद्ध हो चुका है कि भाजपा संघ की मानस पुत्री है और संघ का गठन हिटलर के सिद्धांतों से प्रेरित है व उसका संगठन और कार्य प्रणाली भी लगभग वैसे ही हैं। हिटलर के साथी गोएबल्स का कहना था कि बारम्बार बोला गया झूठ भी सच लगने लगता है और यही कारण है कि इन चुनावों में इस संगठन ने अधुनातन मीडिया का लगातार दुरुपयोग करते हुए यह झूठ फैलाने की कोशिश की है कि उनको व्यापक समर्थन प्राप्त है। इस दुष्प्रचार के लिए उसने कुख्यात नरेन्द्र मोदी की छवि को विकास पुरुष के रूप में बनाने के लिए काफी पहले से प्रयास शुरू कर दिये, अम्बानी अडानी से लेकर टाटा की नैनो कम्पनी तक को कोड़ियों के मोल पर जमीनें और अरबों रुपयों की अन्य सुविधाएं देकर गुजरात में आमंत्रित किया और बदले में मोदी के पक्ष में विकास पुरुष का प्रमाणपत्र दिलवाने लगे। गुजरात सरकार की ओर से विभिन्न सूचना माध्यमों में सरकारी विज्ञापनों और किराये के अर्थविशेषज्ञों द्वारा विकास की अतिरंजित कहानियां प्रकाशित की जाने लगीं। जो पत्रकार, लेखक और बुद्धिजीवी मोदी की निरंतर निन्दा करते रहे थे उनमें से कुछ उनका बिना किसी ठोस तर्क के रातों रात हृदय परिवर्तन ढेर सारी आशंकाओं को जन्म दे गया। भाजपा शासित अन्य राज्यों में भी लगभग ऐसी ही प्रचार योजनाएं कार्यांवित की गयीं और मीडिया को मुक्तहस्त से विज्ञापन दिये गये क्योंकि किसी भी सरकार द्वारा विज्ञापनों में खर्च की जाने वाली राशि का कोई नीति नियम नहीं है। बुन्देली में एक कहावत है कि जितने का कीर्तन नहीं हुआ उससे ज्यादा के मंजीरे फूट गये। भाजपा शासित राज्यों में भी विकास और विज्ञापन का यही हाल है। जब तक गैर भाजपा दल जागे और गुजरात के विकास की कलई खोलने की कोशिश की तब तक बहुत देर हो चुकी थी और सारी दीवारों पर लिखा जा चुका था या बुक हो गयीं थीं।
      सच्चाई तो यह है कि रामजन्मभूमि के नाम से भाजपा द्वारा चलाये गये अभियान को छोड़ कर भाजपा के पक्ष में कोई एकदम उछाल नहीं आया। उसे 1984 में उसे 7.74 प्रतिशत मत मिले थे तो 1989 में 11.36 प्रतिशत। पर रामजन्मभूमि वाले अभियान और अडवाणी की रक्तरंजित रथयात्रा के दौर के बाद 1991 में 20.11 प्रतिशत, 1996 में 20.29 प्रतिशत, 1998 में 25.59 प्रतिशत, मत मिले। 2004 में उनकी सरकार के इंडिया शाइनिंग के दौर में 22.16 प्रतिशत से घटकर 2009 में 18.80 प्रतिशत पर आ गये थे। उनके गठबन्धन के सहयोगियों को मिला कर भी वे इस समय 25 प्रतिशत के आस पास हैं। लहर के लिए उन्हें कम से कम 15 प्रतिशत और मत चाहिए पर कहानी कुछ और ही कह रही है। इस बार उन्होंने चुनाव से पूर्व ही इतने सारे अल्पज्ञात दल जोड़ लिये हैं जिससे उनकी अपनी प्रचारित लहर पर उनके अविश्वास का संकेत मिलता है। अपनी लहर के प्रचार के सहारे अब तक जिनसे समझौता कर चुके हैं वे 23 दल इस प्रकार हैं और रोचक यह है कि इन दलों को भले ही भाजपा के मत ट्रांसफर हो जायें पर उनके मत भाजपा के पक्ष में ट्रांसफर होने में संदेह है क्योंकि उनका गठन जिस आधार पर हुआ है वे भाजपा की पहचान से मेल नहीं खाते। इस गठबन्धन में हैं- भाजपा [116], शिव सेना[11] शिरोमणि अकाली दल [4]  नागा पीपुल्स फ्रंट[1] हरियाना जनहित काँग्रेस [1] स्वाभिमानी पक्ष [1] एमडीएमके[1], तेलगुदेशम पार्टी[6] रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया-अठवाले[0]महाराष्ट्रवादी गोमंतक पार्टी[0]  नैशनल पीपुल्स पार्टी[0] राष्ट्रीय समय पक्ष[0] गोरखा जनमुक्ति मोर्चा[0] केमडीके[0] आइजेके[0] राष्ट्रीय लोक समता पार्टी[0] लोकजनशक्ति पार्टी[0] डीएमडीके[0] आल इंडिया एनआर कांग्रेस [0] केरल कांग्रेस नैशनलिस्ट[0] रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी बोल्शेविक [0] पट्टाई मक्कल कच्ची[0] मणिपुर पीपुल्स पार्टी[0] यूनाइटिड डेमोक्रेटिक फ्रंट[0] अपना दल[0]  नार्थ ईस्ट रीजिनल फ्रंट[0] जनसेना पार्टी[0]। इन सब को मिला कर उन्हें नई 160 सीटें और कम से 15 प्रतिशत मत अधिक चाहिए। ये इनके आत्मविश्वास की ही कमी है कि राज्यसभा सदस्य स्मृति ईरानी और हेमा मालिनी समेत विनोद खन्ना, किरन खेर, परेश रावल, शत्रुघ्न सिन्हा, मनोज तिवारी, बप्पी लाहिरी, बाबुल सुप्रियो, और जॉय बनर्जी को चुनाव में उतारने को विवश होते हैं। पूर्वसैनिक, प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों जनरल वी के सिंह, आईएएस भागीरथ प्रसाद, आर के सिंह और मुम्बई के पूर्व पुलिस कमिश्नर समेत दर्जन भर नौकरशाहों को टिकिट बाँटे हैं। यदि मोदी अपने काम के बल पर लहर होने का दावा कर रहे हैं तो अपने कर्मठ कार्यकर्ताओं के टिकिट काट कर इतने दलबदलुओं को टिकिट देने की जरूरत क्यों पड़ी। दूसरी जगहों को छोड़ भी दें तो मोदी के मानक गुजरात की 26 सीटों में से दस पर पूर्व कांग्रेसियों को टिकिट क्यों देना पड़ा? इनमें कच्छ से विनोद चावड़ा पूर्व एन एस यु आई एवं युवक कांग्रेस नेता, पूनम मदाम - जामनगर - पूर्व गुजरात प्रदेश कांग्रेस महिला महा मंत्री, विठ्ठल रादडिया - पोरबंदर - तीन बार कांग्रेस विधायक और एक बार कांग्रेस एम पी रह चुके है,  देवजी फ़तेपरा - सुरेन्द्र नगर - पूर्व कांग्रेस विधायक हलवद, लीलाधर वाघेला –पाटन के पूर्व कांग्रेस विधायक, रामसिंह राठवा - छोटा उदेपुर  पूर्व कांग्रेस विधायक  प्रभु वसावा - बार डोली - पूर्व कांग्रेस विधायक , डॉ किरीट सोलंकी - अहमदाबाद पश्चिम – पूर्व कांग्रेस नेता, डॉ. के सी पटेल - वलसाड - पूर्व कांग्रेस नेता, जिनकी पत्नी कांग्रेस से जिल्ला पंचायत में हैं, देवसिंह चौहान - खेड़ा - पूर्व कांग्रेस संगठन मंत्री सम्मलित हैं। यही कारण है कि अडवाणी ने गाँधीनगर से अपना फार्म भरते हुए कहा कि मोदी एक अच्छे इवेंट मैनेजर हैं।
      पिछले दिनों वे अपने दो महत्वपूर्ण पुराने सहयोगियों जनता दल [यू] और बीजू जनतादल से दूर हो चुके हैं और ममता बनर्जी व मायावती दोनों ही खुल कर भाजपा की आलोचना कर रही हैं। यद्यपि आक्रामक चुनाव प्रचार और सुविधाओं के अतिरेक में उनके अपने समर्थक सक्रिय हुये हैं किंतु कुछ अवसरवादी चुके हुए नेताओं को छोड़ कर ऐसा कोई वर्ग नहीं दिख रहा है जो गैर भाजपा दलों से टूट कर भाजपा की ओर अग्रसर हुआ हो। जो नया युवा वर्ग पहली बार मतदान करने वाला है उसका भी यूपीए सरकार से निराश बड़ा हिस्सा नवोदित आम आदमी पार्टी को विकल्प के रूप में देख रहा है।
      कुल मिला कर यह लगता है कि सारी लहर केवल प्रिंट और आडियो- वीडियो मीडिया, होर्डिंग्स, बैनर, प्रायोजित रैलियों तथा बिके हुए बुद्धिजीवियों की बहसों तक सीमित है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

किताबों के बहाने राजनीतिक हमले

किताबों के बहाने राजनीतिक हमले
वीरेन्द्र जैन

       सोलहवीं लोकसभा के लिए हो रहे आम चुनाव देश में हुए पिछले आम चुनावों से भिन्न हैं जो सबसे बड़े विपक्षी दल के एक व्यक्ति की तानाशाही में बदलने और उसके द्वारा चुनाव जीतने के सारे हथकण्डे अपनाने के लिए जाने जा रहे हैं। इस राजनेता ने पहले तो अपने दल और पितृ संगठन के सक्रिय नेताओं को हाशिये पर किया और बाद में न केवल अपने विपक्षियों को दल बदलने के लिए उत्प्रेरित कर दो दर्ज़न से अधिक टिकिट तो हाल ही में दल बदल करके आने वाले लोगों को दिये हैं अपितु दूसरे दलों से टिकिट प्राप्त [भिंड] और नामांकन दाखिल करने के बाद [नोएडा] भी दलबदल करवाया है। मशहूर फिल्मी कलाकार, गायक, संगीतकार ही नहीं अपितु पूर्व राजघरानों  के सदस्यों के साथ साथ राज्य सभा सदस्यों, विधायकों. और राजनेताओं के पुत्र पुत्रियों, पूर्व सेना अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों, प्रशासनिक अधिकारियों, को टिकिट देकर किसी भी तरह से जीत सुनिश्चित करने की व्यवस्थाएं की गयी हैं। अंतर्राष्ट्रीय विज्ञापन एजेंसियों की सेवायें लेना, सोशल मीडिया पर जाली एकाउंटों के द्वारा लोकप्रियता का भ्रम पैदा करना, वीडियो कैमरों की नई तकनीक से भीड़ को अतिरंजित करके दर्शाने और उसे मीडिया घरानों तक पहुँचाने, चुनावी सर्वेक्षणों की निरपेक्षता को प्रभावित करने और विज्ञापनों के समस्त माध्यमों में विज्ञापन की बाढ लाने के उदाहरण सामने हैं। देश को सबसे पुरानी और एतिहसिक पार्टी कांग्रेस से मुक्त करने के नारे से शुरू करके साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने तक के सारे अनैतिक तरीके अपनाये जा रहे हैं।
       चुनाव को संग्राम में बदल कर हर अनैतिक काम को उचित बनाने के इस दौर में ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पूर्व सलाहकार संजय बारू और पूर्व कोयला सचिव पारख की किताब का आना केवल एक किताब का आना और उस किताब पर भाजपा नेताओं की पूर्व तैयार प्रतिक्रिया का आना उनकी रणनीति के हिस्से से अलग नहीं है। सभी जानते हैं कि हमारे यहाँ क्रमशः परिपक्वता की ओर बढ रहे लोकतंत्र में चुनाव परिणामों में अभी तक चुनाव पबन्धन की बड़ी भूमिका है और गाँधीनगर से पर्चा भरते समय अडवाणीजी ने भाजपा की ओर से घोषित प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी मोदी को एक बेहतर इवेंट मैनेजर की तरह बता कर स्थिति को और भी स्पष्ट कर दिया था।
       इसमें कोई सन्देह नहीं कि श्री मनमोहन सिंह अचानक पैदा हुयी परिस्तिथियों के कारण प्रधानमंत्री बने थे और वे चुनावी प्रबन्धन में निष्णात जननेता कभी नहीं रहे। वे एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के अर्थशास्त्री होने के बाद भी नई दिल्ली लोकसभा क्षेत्र जैसे सर्वाधिक शिक्षित मतदाताओं के बीच भी श्री जगमोहन से हार गये थे और उसके बाद असम राज्य से राज्यसभा में चुन कर आते रहे। देश की सभी गैरकांग्रेसी सरकारों के भी आर्थिक सलाहकार रहे श्री सिंह ने देश के इस सर्वोच्च पद पर आने के बारे में सोचा भी नहीं होगा। जब 2004 के लोकसभा चुनाव में अपने इंडिया शाइनिंग के भ्रम और कपोल कल्पित सर्वेक्षणों के प्रभाव में भाजपा को सच्चाई का सामना करना पड़ा और श्रीमती सोनिया गाँधी के नेतृत्व वाली काँग्रेस से पराजय झेलना पड़ी तो वह बौखला गयी थी। उसको समर्थन देने वाले अधिकांश दल 2002 में गुजरात में हुये मुसलमानो के नरसंहार के बाद एनडीए को छोड़ कर जा चुके थे। इस बौखलाहट में उसने अपने पुराने गैर राजनीतिक हथकण्डों को अपनाना शुरू कर दिया।
       2004 के चुनावों के बाद कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी काँग्रेस की स्वाभाविक नेता के रूप में उभरी थीं और देश की बहुरंगी संस्कृति की तरह सभी क्षेत्रों और रुझानों वाले काँग्रेसियों का भी उनके नेतृत्व पर मतैक्य था। बाहर से समर्थन देने वाले बामपंथियों ने भी कह दिया था कि काँग्रेस में नेतृत्व का मामला उनका अपना आंतरिक मामला है और उनका बाहर से समर्थन न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर आधारित है। काँग्रेस संसदीय दल के चुनाव में भी श्रीमती गाँधी सर्व सम्मति से नेता चुनी गयी थीं। इस बीच अपनी अप्रत्याशित पराजय की खीझ में भाजपा ने यह जानते हुए भी कि वैधानिक रूप से देश का कोई भी नागरिक किसी भी पद पर चुना जा सकता है, सोनियाजी के विदेशी मूल का मुद्दा उछाल दिया था और समानांतर रूप से ईसाई मिशनरियों द्वारा बलात धर्म परिवर्तन के शगूफे उछालना शुरू कर दिये थे। श्रीमती सुषमा स्वराज ने तो श्रीमती गाँधी के प्रधानमंत्री पद पर आने की स्थिति में अपना सिर मुड़ाने, चने खाकर रहने और ज़मीन पर सोने जैसे आचरण करने की धमकी दे डाली थी जो हिन्दू धर्मग्रंथों में भारतीय विधवा के लिए बताये गये हैं। उनकी देखादेखी भाजपा में उनकी प्रतियोगी साध्वीके भेष में रहने वाली तमाशाई नेता उमा भारती ने भी भाजपा नेतृत्व से पूछे बिना ऐसा ही आचरण करने की चेतावनी दे डाली थी। उल्लेखनीय है कि श्रीमती सोनिया गाँधी ने श्री राजीव गाँधी की दुखद हत्या के बाद काँग्रेस के सर्वसम्मत अनुरोध के बाद भी राजनीति में रुचि नहीं ली थी और लगभग एक दशक तक दूरी बनाये हुये थीं। किंतु जब काँग्रेस निरंतर कमजोर होती गयी और देश पर फासिस्ट ताकतें देश विभाजन का खतरा पैदा करने लगीं तो उन्होंने बेमन से काँग्रेसियों के अनुरोध को स्वीकार कर आम चुनाव में जनता का विश्वास भी प्राप्त कर लिया था।
       इसमें कोई सन्देह नहीं कि भाजपा के कूटनीतिक लाँछनों और अपमानजनक आरोपों से दुखी होकर ही श्रीमती गाँधी ने स्वयं को दी गयी ज़िम्मेवारी को श्री मनमोहन सिंह की ओर कर दिया था और उन्हें इस पद को ग्रहण करने के लिए मना लिया था। इस घटनाक्रम के दौरान कुछ असंतोष के स्वर भी उभरे थे जिन्हें परिस्तिथियों के सन्दर्भ में सामूहिक नेतृत्व के आश्वासन और श्रीमती सोनिया गाँधी द्वारा यूपीए की चेयरपर्सन का पद स्वीकारने के तर्क पर शांत कर दिया गया था। उल्लेखनीय यह भी है कि पिछले दिनों जब अडवाणी जी को संघ के निर्देश पर सदन में भाजपा के नेतृत्व से हटा दिया गया था और श्रीमती सुषमा स्वराज को इस पद पर प्रतिष्ठित कर दिया गया था तो उनका कहना था कि उन्होंने यह पद अडवाणीजी के इस आश्वासन के बाद ही स्वीकार किया है कि वे दोनों सदनों के नेताओं के ऊपर संसदीय दल का वास्तविक नेतृत्व करते रहेंगे। स्मरणीय है कि विपक्ष के नेता का पद भी संवैधानिक पद है और विपक्ष के नेता को केबिनेट मंत्री की सुविधाएं और अधिकार प्राप्त हैं।
       प्रधानमंत्री कार्यालय ने संजय बारू की किताब में लगाये गये सभी आरोपों से इंकार किया है किंतु ऐसी दशा में यदि पूर्ण सहमति से प्रधानमंत्री गठबन्धन की अध्यक्ष के साथ मिलकर कोई नीतिगत विमर्श करते या सलाह लेते भी हों तो वह अनैतिक तो नहीं माना जा सकता। ठीक चुनाव के बीच में किताब के आने के समय को देखते हुए इस किताब को सामान्य संस्मरण पुस्तक भी नहीं माना जा सकता जबकि प्रधानमंत्री की पुत्री का कहना है कि संजय बारू ने अपनी पुस्तक को चुनाव के बाद जारी करने की बात कही थी। भाजपा के प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी श्री नरेन्द्र मोदी देश के इस महत्वपूर्ण पद को जिस तरह की सस्ती मजमेबाज लोकप्रियता की बैशाखियों पर खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, इस समय पर इस पुस्तक का आगमन इसी की कड़ी का हिस्सा मालूम देती है और दुर्भाग्यपूर्ण है। स्मरणीय है कि विपक्ष द्वारा अपनी आलोचना के स्तर पर क्षुब्ध होकर एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने कहा था कि इन्दिरा गाँधी महत्वपूर्ण नहीं हैं किंतु देश के प्रधानमंत्री का पद महत्वपूर्ण है और इस पद की गरिमा को नीचे गिराने के काम को देश की गरिमा के साथ किये जाने वाले व्यवहार की तरह देखा जाना चाहिए।  
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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बुधवार, अप्रैल 09, 2014

फिल्म समीक्षा क्वीन- नारी चेतना की अंगड़ाई

फिल्म समीक्षा
क्वीन- नारी चेतना की अंगड़ाई
वीरेंद्र जैन
                                                                                
       अंगड़ाई, वह देह मुद्रा होती है जो कोई मनुष्य या प्राणी देर तक सोने या विश्राम के बाद शरीर को फिर से काम करने के लिए सक्रिय करने हेतु फैलाता और मरोड़ता है। दासों को यह अनुमति नहीं होती थी कि वे अपने स्वामियों के सोने के बाद जागें इसलिए उनके सामने उनके अंगड़ाई लेने को भी अनुशासनहीनता माना जाता था। यही हाल पत्नियों का भी था जो अपने थोपे गये अनुशासन में स्वयं को पति के चरणों की दासी मानने लगती थीं। किसी महिला का किसी पुरुष के सामने अंगड़ाई लेने को अश्लीलता या कामुक आचरण माना जाता था। हिन्दी की एक अश्लील कथा पत्रिका का नाम ही ‘अंगड़ाई’ था।
       पिछली सदी के पूर्वार्ध में रूस में हुयी समाजवादी क्रांति के बाद से नारियों को समान अधिकार मिलने शुरू हो गये थे। इंगलेंड जैसे देश ने हमें तो दो सौ साल गुलाम रखा ही पर अभी तक सर्वोच्च पद पर वंश परम्परा से मुक्त न हो सकने वाले इस देश ने अपने यहाँ की नारियों को भी वोटिंग का अधिकार 1925 में दिया, और फ्रांस में यह अधिकार 1944 में दिया गया। हमारे यहाँ आज़ादी के बाद संविधान के लागू होते ही महिलाओं को समान अधिकार मिल गया था पर स्विट्जरलेंड जैसे देश में यह अधिकार 1971 में मिला।
       परतंत्रता की कई ग्रंथियां होती हैं और स्वतंत्रता के लिए उन सब को खोलना होता है। कहाँ कौनसी ग्रंथि पहले खुलती है यह परिवेश पर निर्भर करता है। पिछले दिनों आयी फिल्म ‘क्वीन’ नारी वर्ग की ऐसी ही चेतना की पकती हांड़ी के एक दाने की कथा है।  1947 में देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान से आये शरणार्थियों द्वारा अपने व्यापारिक कौशल से सम्पन्न हुये पंजाबी परिवार की एक लड़की के बदलाव की कथा है। इस परिवार की एक लड़की रानी [कंग़ना रनौत]  की सगाई के बाद शादी से दो दिन पहले ही लड़का विजय [राज कुमार राव] शादी से इंकार कर देता है। शादी दोनों परिवारों की सहमति से हुयी थी और लड़की शादी से पहले लड़के से डेटिंग करती रही थी, और अपने हनीमून को पेरिस और एम्स्टर्डम में मनाने के ख्वाब सजा लिये थे। शादी की पूरी तैयारियों के बाद जब यह घटना घटती है तो नवधनाड्य परिवार के सम्मान को लगी ठेस के साथ मासूम लड़की को अपने हनीमून का ख्वाब टूटने का दुख ज्यादा रहता है। नई आर्थिक नीतियों के वैश्वीकरण ने हमारी संस्कृति का पश्चिमीकरण कर दिया है और हमारी युवा पीढी की भावनाओं में गहराई कम व सतहीकरण अधिक आ गया है। आहत लड़की अपने को कमरे में बन्द कर लेती है और आशंकाओं में डूबा परिवार अपना आहत आत्मसम्मान भूल कर उसे मनाने में जुट जाता है। बाहर परिवार को भले ही उसके चौबीस घंटे से भूखे रहने की चिंता है पर वह भूख लगने पर अन्दर रखे मिठाई के डिब्बों में से लड्डू खाती रहती है। पुरानी पीढी उसे मनाने के लिए उसकी हर माँग मानने को तैयार हो जाती है जिसमें उसके पूर्व से रिजर्व टिकिट और होटल में अकेले ही हनीमून पर जाने का प्रस्ताव है। कथा यहाँ से ही प्रारम्भ होती है जहाँ उस बेहद मासूम कबूतर सी लड़की जो सड़क पार करने में भी डरती रही थी व जिसे बाहर छोटे भाई के सात्ह ही भेजा जाता था. को एक नई दुनिया देखने को मिलती है।
       परम्परागत व्यापारी परिवार में पली लड़की को होटल में काम करने वाली एक लड़की विजयलक्ष्मी मिलती है जिसके माँ और बाप दोनों ही मिश्रित राष्ट्रीयता के थे और एक मिश्रण भारतीयता का भी था इसलिए वह टूटी फूटी हिन्दी भी जानती है। वह बिना ब्याही माँ है जो एक ओर तो बिना किसी हीन भावना के होटल में सफाई का काम करती है बच्चे की परवरिश करती है, और दूसरी ओर अपनी स्वतंत्रता को पूरी तरह जीते हुए शराब, डांस और फ्री सेक्स में डुबाये है। नायिका प्रधान इस फिल्म की कथा नायिका इस नई दुनिया को शुरू में भीगी बिल्ली की तरह असमंजस से देखती है और जब एक हादसे के बाद उसे इस अनजान देश में विजयलक्ष्मी [लिसा हिडेन] से सहारा मिलता है तो दुनिया को उसी की तरह साहस पूर्वक जीने की कोशिश करती है।  इस कोशिश में उसमें कई बदलाव आते हैं। उसे अपने अगले पड़ाव में एम्स्टर्डम जाना है जहाँ उसके पास होटल का कोई आरक्षण नहीं है। वह विजयलक्ष्मी से जिस हास्टल का पता लायी थी उसमें चार बेड वाले रूम में एक बेड ही उपलब्ध है और शेष तीन बेड पर लड़के हैं। वह उस हास्टल में न रुकने की सोचती है पर दूसरी जगह पाने में सफल नहीं होती और मजबूरी में लौट आती है। तीन लड़कों के साथ वाले कमरे में रहने से आतंकित वह सोने के लिए कमरे से बाहर बेंच पर सोने चली जाती है तो तीनों खुद बाहर सोकर उसे अन्दर सोने के लिए दे देते हैं। उनके इस मानवीय व्यवहार से वह अभिभूत हो जाती है और उनकी मित्र बन जाती है। उसके इन नये मित्रों में से एक फ्रेंच है तो दूसरा जापानी व तीसरा रशियन। सबकी अपनी अलग अलग भाषाएं और काम हैं सबके अपने अपने दुख भी हैं। फ्रेंच लड़का चौराहे पर गिटार बजाता है जिससे सुनने वाले उसे पैसे देते हैं, रशियन पैंटिंग करता है और पूरी दुनिया को पेंट कर देने के सपने देखता है ताकि दुनिया शांति से भर सके। अपने माँ बाप को खो चुके जापानी लड़के का पूरी दुनिया में कोई नहीं है और वह कोई भी सहयोगी काम कर लेता है। चे ग्वारा का पोर्ट्रेट कमरे में लगाये ये लड़के राक संगीत पसन्द करते हैं और बिन्दास जीवन जीते हैं। लड़की इन तीनों के साथ को जीने लगती है। विजयलक्ष्मी द्वारा दी गयी एक सामग्री को देने जब वह उसकी भारतीय मित्र की तलाश में जाती है जो जहाँ रहती है वह वहाँ का प्रसिद्ध रेडलाइट एरिया है, और परिस्तिथियोंवश अपनी छह बहनों व माँ को हिन्दुस्तान में पालने के लिए विदेश में काम करने आयी थी पर मन्दी के दुष्परिणामों वश उन्हें बिना बताये वहाँ सेक्सवर्कर बनना पड़ा था। खाने की तलाश करते हुए वह एक रेस्त्राँ चलाने वाले के सम्पर्क में आती है और उसके आग्रह पर भारतीय व्यंजन बना कर बेचने का प्रयोग करती है और रूम मेट्स के सहयोग से प्रयोग में सफल भी होती है। इसी बीच उसका पुराना मँगेतर अपनी गलती मनाते हुए उसे मनाने के लिए तलाशता हुआ आ जाता है पर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। वह भारत लौट कर बात करने का कह कर उसे लौटा देती है जिससे वह उम्मीद पाल लेता है, पर लौट कर वह पहला काम यही करती है कि साहस के साथ उसकी सगाई की अँगूठी लौटा देती है।
       नायिका के रूप में कँगना रानौत विजयलक्ष्मी के रूप में लिसा हिडेन और नायक के रूप में राजकुमार राव समेत सभी का अभिनय बेहतरीन है, न कहानी में कहीं झोल है और न ही विकास बहल के निर्देशन में। अच्छी फोटोग्राफी दर्शक को सीट पर बैठे बैठे ही पेरिस और एम्स्टर्डम घुमा देती है  लगातार लीक से हट कर बनती इन फिल्मों से बालीवुड के प्रति उम्मीद भरी निगाहों से देखा जा सकता है और उसके उज्जवल भविष्य की कामना की जा सकती है।   
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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मोबाइल 9425674629
                

शुक्रवार, अप्रैल 04, 2014

राजनीतिक जगत में छवियों का खेल

राजनीतिक जगत में छवियों का खेल
वीरेन्द्र जैन

       मुख्तार अब्बास नक़वी ने साबिर अली की भाजपा में भर्ती से असंतुष्ट दिख कर सार्वजनिक रूप से कहा था कि अली आतंकी भटकल के दोस्त हैं और अब तो दाउद भी भाजपा में आ जायेंगे। वे इस पार्टी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष हैं। इससे घबरा कर भाजपा ने बिना किसी तर्क वितर्क जाँच के साबिर अली को चौबीस घंटे के अन्दर बाहर का रास्ता दिखा दिया। दूसरी ओर जब अली ने माफी न माँगने की दशा में पत्नी के मुख से इस निष्कासन का विरोध करवाया और मानहानि के दावे समेत मुख्तार के घर के बाहर अनशन की धमकी दिलवायी तो उनका कहना था कि मेरी साबिर अली से कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं है पर उनकी छवि अच्छी नहीं है। उनके इस दूसरे बयान ने देश की सत्ता पाने का सपना देखने वाली भाजपा के अन्दर की कार्यप्रणाली पर ढेरों सवालिया निशान खड़े कर दिये हैं। जो पार्टी चेहरा चाल चरित्र का नारा देती थी वह केवल चुनावों की चिंता करते हुए चेहरे के आधार पर चालें चल रही है और चरित्र से उसे कोई मतलब नहीं रह गया है। राजनीतिक नेता और कार्यकर्ता उसके लिए केवल मोहरे हैं, जिन्हें कभी भी इधर से उधर किया जा सकता है।   
       उल्लेखनीय है कि इन दिनों भाजपा ने जिस व्यक्ति को चुनाव से पहले ही चुने जाने वाले सांसदों का अधिकार छीन कर प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी वाले राष्ट्रीय कार्यकारिणी के निर्णय को थोप दिया है उन नरेन्द्र मोदी की छवि देश और दुनिया में कैसी है उस पर ढेरों सामग्री उपलब्ध है। यदि छवि का ही सवाल था तो भाजपा में मोदी से वरिष्ठ दर्ज़नों दूसरे अपेक्षाकृत बेहतर छवि वाले लोग मौजूद थे जिनमें लालकृष्ण अडवाणी से लेकर सुषमा स्वराज, अरुण जैटली, जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा, शिवराज सिंह चौहान, आदि लोग मौजूद थे जिन्हें प्रशासनिक और संसदीय कार्य का अनुभव है। किंतु जिस व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया है उसकी छवि सबसे अधिक खराब थी, जिसके कर्मों से दुखी होकर भाजपा के सबसे लोकप्रिय वरिष्ठ नेता तत्कालीन प्रधान मंत्री को कहना पड़ा था कि अब मैं कौन सा मुँह लेकर विदेश जाऊंगा। दूसरी ओर किसी व्यक्ति को पार्टी में प्रवेश देने के पूर्व उसकी छवि के बारे में जानकारी करने का काम पार्लियामेंटरी बोर्ड के अंतर्गत प्रवेश देने वाली समिति का होता है और प्रवेश देने के बाद किसी सदस्य विशेष द्वारा अपनी आपत्ति को सार्वजनिक करना और उस पर आनन फानन में फैसला ले लेना पार्टी के लोकतंत्र का मजाक है जिस की बार बार दुहाई दी जाती है। जब एक बार प्रवेश दे दिया जाता है तो किसी भी निष्कासन के लिए उचित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए था।
       सच तो यह है कि भाजपा सत्ता के लिए जिस अन्धी हवस में है उसमें उसने अपने विवेक और बची खुची नैतिकिता को भी तिलांजलि दे दी है। इससे पूर्व इस पार्टी ने पिछले दिनों में जैसे लोगों को पार्टी में भर्ती किया है उससे तुलना करने पर एक चुटकला याद आ रहा है – एक व्यक्ति किसी मनोचिकित्सक के पास पहुँचा और कहा कि डाक्टर साहब मुझे बार बार एक सपना आता है कि मैं भरे बाज़ार के चौराहे पर नितांत नगा घूम रहा हूं, सिर्फ जूते पहिने हुये। डाक्टर ने उसकी ओर सहानिभूति से देखते हुए कहा कि तब तो आपको बहुत शर्म आती होगी। हाँ डाक्टर साहब शर्म की बात ही होती है क्योंकि उन जूतों पर पालिश जो नहीं की हुयी होती है। शर्म किस बात पर आना चाहिए थी और किस बात पर आ रही है।
       कुछ उदाहरण देखिये-
·         अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री गीगांग अपांग को पार्टी में सम्मलित कर लेने पर श्री नक़वी को छवि का ध्यान नहीं आया जो एक हजार करोड़ के पीडीएस घोटाले में जेल जा चुके हैं
·         बेल्लारी से श्रीरामलु को पार्टी में सम्मलित किये जाने पर लोकसभा में भाजपा की नेता सुषमा स्वराज को शर्म के मारे निर्णय से स्वयं के असहमत होने के बारे में सार्वजनिक बयान देना पड़ता है।
·         रामविलास पासवान से गठबन्धन करने के बाद उनके लिए बिहार में जो सात सीटें छोड़ी गयी हैं उनमें से एक सीट हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा पाये कुख्यात बाहुबली सूरजभान सिंह की पत्नी वीना सिंह की है
·         इसी गठबन्धन में एक सीट अनेक संगीन अपराधों के मामले दर्ज़ रमा सिंह की भी है
·         नरेन्द्र मोदी को कातिल से लेकर विभिन्न विशेषणों से सुशोभित करने वाले कल तक यूपीए सरकार में मंत्री रहे जगदम्बिका पाल को गले चिपका कर फोटो खिचवाने से कोई छवि खराब नहीं हुयी।
·         जब तक समाजवादी पार्टी का कानपुर से टिकिट घोषित रहा तब तक छप्पन इंच की छाती राक्षस की बतलाने वाले मसखरे राजू श्रीवास्तव को छवि की चिंता किये बिना सम्मलित कर लिया गया।
·         उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री और एनआरएचएम घोटाले के अभियुक्त बाबूलाल कुशवाहा को बेशर्मी के साथ सम्मलित कर देने के बाद चुनावी नुकसान का अनुमान कर बड़े सम्मान के साथ किनारे किया गया था
आधा दर्जन फिल्म स्टार, एक दर्जन साधु साध्वी वेषधारी पाखण्डी नेता, पूर्व राजा रानियां, आदि को समेट कर चुनाव के लिए जो भानुमती का कुनबा जोड़ा जा रहा है उसे पेड मीडिया लहर बता रहा है। रोचक यह है कि इस ड्रामे का नायक इतना भी आश्वस्त नहीं कि विधानसभा और मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे देता और लोकसभा के लिए किसी एक ही स्थान से चुनाव लड़ता। यदि श्री नक़वी को सचमुच ही साबिर अली के भटकल से सम्बन्धों के बारे में पता था तो देश हित में सुरक्षा से जुड़े लोगों को बता कर सावधान करना चाहिए। पर मोदी देश की सुरक्षा के मामले में देश के रक्षा मंत्री और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री पर सार्वजनिक मंच से गद्दारी का आरोप लगाते हैं और कोई सुरक्षा एजेंसी उनसे सच्चाई भी जानने की कोशिश नहीं करती।
       भाजपा को अगर देश की सचमुच कुछ फिकर हो तो देश की सुरक्षा के मामले टुच्चे राजानीतिक लाभों से ऊपर उठ कर गम्भीर मदद करना चाहिये और चाय की दुकानों जैसे हल्के फुल्के मनमाने आरोप लगाने से बचना चाहिए।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, मार्च 27, 2014

अनैतिकिता और अवसरवाद की अति तंत्र में अनास्था उपजाती है

अनैतिकिता और अवसरवाद की अति तंत्र में अनास्था उपजाती है
वीरेन्द्र जैन

                भाजपा केम्प से प्रतिदिन जो खबरें आ रही हैं वे भीड़ के नाम पर अवसरवादी भिखमंगे एकत्रित करने की खबरें हैं। उल्लेखनीय है कि एक प्रदेश की राजधानी में नगर के बीचों बीच एक पार्क है और उसके किनारे रैन बसेरा है। इस पार्क के आसपास सैकड़ों की संख्या में भिखारी रहते हैं जो अपने काम पर निकलने के अलावा अपना पूरा समय इसी पार्क में बिताते हैं और बहुत अधिक प्रतिकूल मौसम में रैन बसेरे का सहारा ले लेते हैं। यह पार्क राजनीतिक दलों और स्वयंसेवी गैर सरकारी संगठनों की रैलियों धरनों अनशन आदि के काम में भी आता है। उक्त भिखारियों का एक ठेकेदार है जो तय दर पर राजनीतिक दलों या गैर सरकारी संगठनों के लिए भीड़ सप्लाई करने का काम करता है। उस दिन ये सारे भिखारी चन्द रुपयों और भरपेट भोजन के लिए उस दल या संगठन के कार्यकर्ता बन जाते हैं। भाजपा आदि दलों में इस चुनाव के दौर में सम्मलित होने वाले राजनेता भी इन्हीं भिखमंगों का दूसरा रूप हैं।  
       नगर पालिका के स्तर पर होने वाली राजनीति का यही काम आज राष्ट्रीय स्तर पर हो रहा है और अपने लालच की पूर्ति के लिए चन्द नेता अचानक इतने विपरीत विचार के दलों या गठबन्धनों में एकत्रित हो रहे हैं कि उनकी बेशर्मी पर घृणा पैदा हो रही है। विचार परिवर्तन या दल परिवर्तन तो स्वाभाविक और स्वस्थ संकेत है बशर्ते कि यह सचमुच विचार परिवर्तन हो। किंतु जब ठीक चुनाव के समय अपने मूल दल के साथ सौदेबाजी में असफल हो जाने पर दूसरे दल में टिकिट मिलने की शर्त पर यह काम किया जाता है तो जुगुप्सा जगाता है।
       हर मोबाइल में उपलब्ध वीडियो कैमरे, सीसी कैमरे, हिडिन कैमरे और टेप रिकार्डर, मीडिया की प्रतियोगिता में हो रहे स्टिंग आपरेशन, नेट के माध्यम से तीव्र गति की सम्प्रेषण क्षमता, मोबाइल फोन से लोकेशन की जानकारी, आदि ने दुनिया को बेहद पारदर्शी बना दिया है। ऐसी दशा में नकली आचरण वाली राजनीति की उम्र लम्बी नहीं हो सकती। इन दिनों जो कुछ भी परदे के पीछे घटित होता है वह क्षणों में सामने आ जाता है। अमेरिका के राष्ट्रपति भवन के कारनामों से लेकर विकीलीक्स द्वारा एकत्रित किये गये बातचीत के टेप और इंतरनेट सन्देशों की चोरी से गोपनीयता दुर्लभ चीज हो गयी है। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों एनसीपी नेता शरद पवार पहले नकार के बाद भी मोदी से अपनी गुप्त भेंट को छुपा नहीं सके थे।  
       इस सच के बाद भी अवसरवादी अनैतिक आचरणों की भरमार जनता के विवेक को सीधी चुनौती देते लगते हैं। इससे भी अधिक चुनौतीपूर्ण उस दल का आचरण लगता है जो ऐसे लोगों को सार्वजनिक रूप से गले लगाते हुए उन्हें वे सर्वोच्च पद दे देता है जिनके लिए उनके कर्मठ कार्यकर्ता वर्षों से उम्मीद कर रहे होते हैं। ये कार्यकर्ता भले ही तुरंत अपने दल के नेताओं के प्रति विद्रोह करते नज़र न आते हों किंतु वे जिन आदर्शों के लिए उससे जुड़े होते हैं वह विश्वास डगमगा जाता है, व राजनीति का उद्देश्य स्वार्थ की येन केन प्रकारेण पूर्ति में बदल  जाता है। अपने नेताओं के पीछे पीछे क्षणों में दल बदल लेने वाले लोग कार्यकर्ता से गिरोह में बदल जाते हैं और उनका लक्ष्य भी सामाजिक परिवर्तन और विकास का न हो कर व्यक्तिगत हित साधन हो जाता है।
       ऐसी गतिविधियां लोकतंत्र में अनास्था पैदा करती हैं क्योंकि सच्चे वोटर ने जिस घोषणा पत्र से आकर्षित होकर अपना समर्थन दिया होता है वह ठगा हुआ महसूस करता है। शिक्षित क्षेत्र में कम मतदान और पहली बार पाँच विधानसभा चुनावों में नोटा की सुविधा मिलने पर अच्छी संख्या में उसका उपयोग होना इसका संकेत है। लोकतंत्र की रक्षा के लिए अब प्रत्येक दल में सदस्यता नियमों और टिकिट वितरण की आचार संहिता को अनिवार्य किया जाना चाहिए। मान्यता प्राप्त दलों द्वारा संसद और विधानसभा में टिकिट की पात्रता के लिए न्यूनतम दो साल की वरिष्ठता को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।         
       मीडिया के सामने आँखें पौंछते हुए जसवंत सिंह हों, या बार बार रूठ कर अपना असंतोष व्यक्त करते अडवाणी हों, मुरली मनोहर जोशी हों, वरिष्ठ समर्पित नेता हरेन पाठक हों, लालमुनि चौबे हों, लालजी टण्डन हों, सिद्धू हों, अपने स्वय़ं सेवकों से नमो नमो का जाप न करने की सलाह देते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत हों, सभी मोदी की आक्रमकता से आहत और असमर्थ से प्रतीत हो रहे हैं। दूसरी ओर जिस कांग्रेस मुक्त भारत का आवाहन किया जा रहा हो उसी कांग्रेस के नेताओं को बिना सदस्यता फार्म भराये भर्ती वाले दिन ही टिकिट भी दे दिया जा रहा है। सुषमा स्वराज जैसी वरिष्ठ नेता और शैडो मंत्रिमण्डल के माडल के अनुरूप प्रधानमंत्री पद की स्वाभाविक दावेदार को दुख व्यक्त करते हुए कहना पड़ रहा है कि जसवंत सिंह को टिकिट न देने का फैसला असाधारण है और संसदीय बोर्ड की बैठक से बाहर लिया गया है। देश भर में अपनी लहर का दावा करने वाले का डर इतना ज्यादा है कि दो जगहों से उम्मीदवारी घोषित कर देने के बाद भी न तो गुजरात विधानसभा की विधायकी छोड़ने को तैयार है और न ही मुख्यमंत्री पद छोड़ने को तैयार है।
       दुर्भाग्य से हमारी न्याय व्यवस्था में आस्था कमजोर होते जाने से समाज में हिंसा और जंगली न्याय जगह बनाते जा रहे हैं। संसद में कामकाज निरंतर बाधित किया जा रहा है। भ्रष्टाचार ने कार्यपालिका को नाकारा बना दिया है। दुनिया का इतिहास गवाह है कि जब जनता की आस्था लोकतंत्र से टूटती है तो अराजकता आती है या उसका स्थान तानाशाही या फौजी शासन ही लेता है। इसलिए लोकतंत्र का मखौल बनाना खतरनाक हो सकता है।    
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, मार्च 18, 2014

फिल्म समीक्षा बेवकूफियां- एक समझदारी भरी लघुकथा

फिल्म समीक्षा
बेवकूफियां- एक समझदारी भरी लघुकथा
वीरेन्द्र जैन
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       निर्देशक नुपुर अस्थाना की नई फिल्म ‘बेबकूफियां’ को हम ‘थ्री ईडियट’ की कथा का दूसरा आयाम कह सकते हैं। नब्बे के दशक से नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद देश और समाज के एक हिस्से में व्यापक बदलाव देखने को मिले हैं और उन्हीं बदलावों के अनुरूप  प्रभावित होते जीवन के ढंग और सुख दुख में परिवर्तन आये हैं। इन बदलावों का एक परिणाम फिल्म थ्री ईडियट में हमने शिक्षा व्यवस्था में आये दुष्परिणामों के रूप में देखा था तो ‘बेबकूफियां’ में उच्च वेतन किंतु नौकरी के अस्थायित्व के रूप में देखने को मिला है। मल्टी नैशनल कम्पनियों या कार्पोरेट घरानों के उच्च पदनाम और आकर्षक वेतन वाले लोग दिहाड़ी मजदूर की तरह प्रबन्धन के एक आदेश से अर्श से फर्श पर आ जाते हैं। अधिकतर निम्न मध्यम वर्ग से आये ये लोग तब तक अपने रहन सहन को लुभावने और चमकदार बाज़ार के प्रचार में फँसा कर बदल चुके होते हैं। उनके वेतन के अनुरूप ही उनके पास लाखों रुपयों की लिमिट वाले क्रेडिट कार्ड होते हैं और मासिक किश्तों के आधार पर खरीदे गये घर और कारों के नशे उन्हें समाज की सच्चाइयों से असम्पृक्त कर देते हैं। ग्लेमर से भरे नये आकर्षक और सुविधा भरे उपकरणों के सहारे वे  जीवन को एक निरंतर चलने वाले उत्सव में बदलने की कोशिश करते हैं। मँहगे मालों में खरीददारी उनकी जरूरत के लिए नहीं अपितु मार्केटिंग के शौक और स्टेटस सिम्बल के लिए की जाती है।
       जब दुनिया में अचानक मन्दी छा जाती है तो हजारों लोग नौकरी से बाहर कर दिये जाते हैं और अपनी बँधी हुयी किश्तों, क्रेडिट कार्ड से लिए उधार और मँहगी जीवन शैली के अभ्यस्त ये लोग कटी हुयी पतंग की तरह हो जाते हैं जिसका लुटेरे हाथों में पड़ कर नुचना फटना तय रहता है क्योंकि दूरदर्शिता के अभाव में ये भविष्य की सुरक्षा नहीं रखते। उक्त फिल्म की कहानी भी इसी थीम पर आधारित है। फिल्म में एक ईमानदार सनकी आईएएस अधिकारी है जो अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद अपनी इकलौती बेटी को माँ और बाप दोनों का प्यार देते हुए पालता है। वह लड़की पढ कर एक आईटी प्रोफेशनल बन जाती है जिसका प्राम्भिक पैकेज ही उनके आखिरी वेतन से टक्कर लेता है। इसी क्षेत्र में कार्यरत उस लड़की का प्रेमी है जिसका पैकेज प्रमोशनों के बेतरतीब उतार चढाव में उससे कम रह जाता है। अपनी ईमानदारी के कारण कुण्ठित पर अपने पद के अभिजात्य से भरा पिता लड़की को उसकी वंचित खुशियां देने के लिए उसकी शादी बहुत अधिक कमाने वाले से करने की तमन्ना रखता है, जिस कारण उन्हें प्रभावित करने के लिए बेरोजगार हो गये प्रेमी को एक ओर तो रोजगार में बने होने का झूठ बोलते रहना पड़ता है तो दूसरी ओर पिछले पदनाम और पैकेज से कम पर दूसरा काम न स्वीकारने के लिए मजबूर करता है।
       प्रेमिका और दोस्तों से उधार लेकर अपनी पुरानी जीवन शैली को अधिक नहीं खींच पाने के कारण तनाव पैदा होते हैं जो दोस्ती और प्रेम दोनों को ही प्रभावित कर दरार डाल देते हैं, जिसे आज के युवाओं के समाज में ब्रेक के नाम से जाना जाता है। उसे अपनी कार बेच देनी पड़ती है और घर खाली करना पड़ता है। प्रेमिका अपने प्रेमी के साथ के लिए ठुकराया हुआ दुबई का प्रमोशन स्वीकार कर लेती है तो प्रेमिका के पिता के दबाव से मुक्त होते ही नायक एक रेस्त्राँ में प्रबन्धक की उपलब्ध नौकरी स्वीकार कर लेता है। बाद के घटनाक्रम में शेष बचे हुए प्रेम की जड़ें उन्हें फिर से मिला कर कथा को सुखांत बना देते हैं।        
       चमचमाते कार्पोरेट आफिस, हाईवे पर दौड़ती कारें, मैट्रो, माल, आदि से बदले परिवेश, पश्चिमी समाज की तरह सार्वजनिक स्थलों पर लिये जा रहे चुम्बनों और आलिंगनों को बिना घूरे गये सम्पन्न होते नये सामाजिक सम्बन्ध, नई आर्थिक नीतियों के परिणामस्वरूप आये वैश्वीकरण के प्रभाव से उठते गिरते बाज़ार और चुटकियों में नौकरियॉ से निकाले जाते उच्च वेतन वाले लोगों के बीच पनपते और सिकुड़ते प्रेम और दोस्ती की छोटी सी कहानी कहती है यह फिल्म। मार्क्सवाद कहता है कि हमारा सांस्कृतिक ढाँचा [सुपर स्ट्रक्चर] हमारे आर्थिक ढाँचे का खोल [फेब्रिकेशन] होता है। इस फिल्म की कथा भी इस कथन को प्रमाणित करती है। पता नहीं कि पात्रों की  समझधारियों से भरी इस फिल्म का नाम बेवकूफियाँ क्यों रखा गया। पात्रों का चुनाव बहुत ही समझदारी से किया गया है। छरहरे बदन के आयुष्मान खुराना और सोनम कपूर अपनी भूमिकाओं के लिए जितने उपयुक्त हैं उतने ही उपयुक्त एक सेवानिवृत्त होने जा रहे आईएएस अधिकारी के रूप में ऋषि कपूर भी उपयुक्त हैं। यह एक अच्छी फिल्म है किंतु कहानी को जिस तेजी से पूरा कर दिया गया है वह खटकता है।          
       इस फिल्म की कथा बहुत छोटी है और विषय पुराना है पर नये परिवेश में उसके अलग आयाम हैं। इसे देखते हुए मुझे चित्रा मुद्गल की एक कहानी याद आयी जिसमें मुम्बई में ही जब एक प्रेमी जोड़े में से प्रेमिका को नौकरी मिल जाती है और प्रेमी बेरोजगार रह जाता है तो प्रेमी की ऊष्मा के ठंडे पड़ जाने का बहुत स्वाभाविक चित्रण है। इसी विषय पर स्वयं प्रकाश का एक बेहतरीन उपन्यास ईँधन के नाम से भी है।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, मार्च 13, 2014

1984 और 2002, कुछ विचारणीय तथ्य

1984 और 2002, कुछ विचारणीय तथ्य  
वीरेन्द्र जैन
       1984 में देश की प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गान्धी की उनके ही दो सिख सुरक्षा गार्डों द्वारा धोखे से की गयी हत्या के बाद उत्तेजित लोगों द्वारा सिखों का नरसंहार हुआ था जिसमें लगभग तीन हजार सिखों की हत्या हुयी थी। एक सूचना के अनुसार अभी भी दिल्ली गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी 2200 विधवाओं को पैंसन दे रही है। यह घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद थी। स्वतंत्र देश के इतिहास में श्रीमती गान्धी सर्वाधिक लोकप्रिय और विवादस्पद प्रधानमंत्री रही हैं जिनके कार्यकाल में एक ओर देश खाद्य उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हुआ, हमारे सबसे सक्रिय शत्रु देश के विभाजित होने से सुरक्षा व्यवस्था में कूटनीतिक लाभ मिला, पब्लिक सेक्टर का विकास हुआ, बैंकों व बीमा कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण हुआ, राजाओं के प्रिवी पर्स व विशेष अधिकारों की समाप्ति हुयी। दूसरी ओर उन्हीं के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ पैदा हुये आन्दोलन के बाद जयप्रकाश नारायण जी ने सम्पूर्ण क्रंति का नारा दिया, इमरजैंसी लगायी गयी, कांग्रेस का आंतरिक लोकतंत्र कमजोर पड़ा व पूरा संगठन अस्थायी समितियों के द्वारा संचालित होने लगा। उन्हीं के कार्यकाल में इंगलेंड व अमेरिका में रह रहे प्रवासियों की शह पर पंजाब में अलगाववादी आन्दोलन प्रारम्भ हुआ जिससे कश्मीर के अलगाववादियों को पनपने का मौका मिला। वे अपने अंतिम दिनों में विश्व के प्रमुख देशों के नेताओं में सबसे वरिष्ठ नेता थीं तथा अमेरिका इंगलेंड समेत कई साम्राज्यवादी देश उन्हें अपदस्थ किये जाने की राह तक रहे थे। उनकी मृत्यु ने देश में एक बड़ा शून्य पैदा किया था क्योंकि उस समय कोई दूसरा नेता उनके समतुल्य लोकप्रिय नहीं था। ऐसे नेता की मृत्यु पर देशव्यापी अशांति और इस अशांति का लाभ उठाने के लिए असामाजिक अवसरवादी तत्वों के सक्रिय हो जाने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता था, इसलिए सुरक्षा बलों को भी तुरंत दूर दूर तक पदस्थ कर दिया गया था।
       उल्लेखनीय है कि देश तोड़क खालिस्तानी आन्दोलन को रोकने के प्रयास में किये गये आपरेशन ब्लूस्टार के बाद पंजाब में खालिस्तान समर्थकों द्वारा सिखों और हिन्दुओं के बीच गहरी खाई पैदा करने व सैकड़ों बेकसूर हिन्दुओं को मार कर तनाव बढाने की कोशिश की गयी थी। इसका परिणाम यह हुआ था कि हिन्दुओं की राजनीति करने वाले जो संगठन सदैव कांग्रेस का विरोध करते थे वे भी आपरेशन ब्लू स्टार के बाद कांग्रेस के पक्ष में खड़े हो गये थे। यही कारण था कि श्रीमती गान्धी की हत्या के बाद हुये 1984-85 के आम चुनाव में कांग्रेस ने दिल्ली की सातों सीटों समेत देश भर में रिकार्ड विजय प्राप्त की थी व हिन्दुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा को पूरे देश में कुल दो सीटों तक सिमिट जाना पड़ा था। कहा जाता है संघ से सहानिभूति रखने वाले लोगों ने भी कांग्रेस का समर्थन किया था।  
       2002 में गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रैस की बोगी संख्या 6 में आगजनी की घटना हुयी थी जिसमें अयोध्या से लौट रहे दो कारसेवकों समेत 59 यात्री जल गये थे। बाद में इस घटना की प्रतिक्रिया के बहाने  पूरे गुजरात राज्य में मुसलमानों का नरसंहार हुआ था और तीन हजार लोग नहीं मिले जिसमें से लगभग नौ सौ लाशों के पोस्टमार्टम का रिकार्ड है व शेष को लापता बता कर उनके बारे में सरकारी आंकड़े कुछ नहीं बोलते। इस घटनाक्रम में भी करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति लूटी व जलायी गयी थी। इस नरसंहार की भी पूरी दुनिया में व्यापक निन्दा हुयी थी और भारत को एक जंगली राज्य होने के आरोप भी सहने पड़े थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तक को कहना पड़ा था कि अब मैं कौन सा मुँह लेकर विदेश जाऊंगा। उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी को राजधर्म निभाने की सलाह देना पड़ी थी। अगर जसवंत सिंह के कथन को सही माना जाये तो घटना से व्यथित वाजपेयी अपना स्तीफा देने जा रहे थे जिससे श्री सिंह ने ही रोका था। इसी हिंसा के कारण अमेरिका और इंगलेंड ने बाद में गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी को वीसा देने लायक नहीं समझा था।
       राजनीतिक रूप से जब भी कांग्रेस द्वारा गुजरात के नरसंहार की निन्दा की जाती रही है तो संघ परिवार के लोग अपनी सफाई देने के बजाय 1984 में दिल्ली की सिख विरोधी हिंसा से प्रतियोगिता दर्शाने लगते हैं। यद्यपि यह सच है कि प्रधानमंत्री इन्दिरा गान्धी की हत्या के बाद दिल्ली में हुयी सिख विरोधी हिंसा भी भयानक थी किंतु दोनों हिंसक घटनाओं का चरित्र एक जैसा नहीं है। 1984 की सिख विरोधी हिंसा देश के शिखरतम नेतृत्व पर धोखे से किये गये हमले की प्रतिक्रिया थी जिसे परोक्ष में देश पर किया गया हमला माना गया। इस मान्यता का कारण यह था क्योंकि यह हत्या राष्ट्रीय एकता की रक्षा करने के लिए किये गये आपरेशन ब्लूस्टार के विरोध में की गयी कार्यवाही की प्रतिक्रिया में योजना बना कर की गयी थी। भले ही दिल्ली में इस हिंसा में मरने वालों की संख्या सबसे अधिक थी किंतु यह हिंसा कानपुर मुरैना समेत देश के दूसरे अनेक हिस्सों में भी घटी थी, जो इस बात का प्रमाण थी कि यह हिंसा असंगठित और सहजस्फूर्त थी। इस पर शीघ्र ही काबू पा लिया गया था। उल्लेखनीय है कि उस समय देश के राष्ट्रपति के रूप में एक सिख ज्ञानी जैल सिंह पदस्थ थे व गृहमंत्री के रूप में सरदार बूटा सिंह पदस्थ थे। खालिस्तानी आन्दोलन का दुष्प्रचार रोकने के लिए उन दिनों कांग्रेस ने अपनी सभी राज्य सरकारों और कांग्रेस समितियों में यथा सम्भव सिख समुदाय को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया था। दूसरी ओर 2002 में गुजरात में हुये नरसंहार पर सबसे बड़ा आरोप यह लगता है कि उसे तत्कालीन भाजपा सरकार के मंत्रियों ने न केवल प्रोत्साहित किया था अपितु अपराधियों की मदद करते हुए उनको संरक्षण भी दिया था। भले ही दिल्ली की हिंसा में कांग्रेस के कुछ नेता सीधे तौर पर ज़िम्मेवार माने गये हैं किंतु इसे कांग्रेस संगठन की ओर से न तो कोई प्रोत्साहन दिया गया था और न ही संरक्षण दिया गया था। इसके विपरीत गुजरात में तो जानबूझ कर न केवल आरोपियों को संरक्षण दिया गया अपितु उन्हें मंत्री पद देकर बल भी प्रदान किया गया। एक स्टिंग आपरेशन में खुलासा हुआ कि किस तरह से सरकारी वकील ने आरोपियों की मदद करके उन्हें सम्भावित दण्ड से बचाने में मदद की। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और अब भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी ने इस घटना के बाद लगातार पीड़ितों के साथ भेदभाव किया। गोधरा में मारे गये लोगों अर्थात गैर मुस्लिमों को दो लाख का मुआवजा घोषित करते हुए शेष गुजरात में मारे गये लोगों को जिनमें शतप्रतिशत मुसलमान थे को एक लाख मुआवजा घोषित किया। आज बारह साल बाद भी हजारों की संख्या में पीड़ित मुसलमान सुविधाविहीन कैम्पों में रह रहे हैं और सरकार यथावत उदासीन है, जबकि दिल्ली में समुचित मुआवजा ही नहीं दिया गया अपितु पुनर्वास की अनेक योजनाएं लागू की गयीं। कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं ने क्षमा मांगी और उसके बाद सिखों और गैर सिखों के बीच कोई तनाव नहीं देखा गया।  
       1984 की सिख विरोधी हिंसा की गम्भीरता को स्वीकारते हुये यह देखना जरूरी है संघ परिवार से जन्मी भाजपा का चरित्र ही साम्प्रदायिक है और देश भर में शाखाएं लगाकर अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत का पाठ निरंतर पढाया जाता है। धर्म के नाम पर उनके आनुषांगिक संगठन केवल विवादास्पद धर्मस्थलों पर विवाद भड़काने का धर्म निबाहते हैं। गुजरात से पहले बाबरी मस्ज़िद राम जन्मभूमि मन्दिर के नाम पर देश भर में रथ घुमा कर दंगे भड़काये गये थे। सोनिया गान्धी के राजनीति में सक्रिय होते ही धर्म परिवर्तन रोकने के बहाने चर्चों और पादरियों पर हमले करवाये जाने लगे थे ताकि सोनिया गान्धी को ईसाई प्रचारित कर नया राजनीतिक ध्रुवीकरण किया जा सके। उल्लेखनीय है कि गोधरा में साबरमती एक्सप्रैस की बोगी संख्या6 में हुयी जिस आगजनी को अयोध्या से लौटने वाले कारसेवकों पर हमला बता साम्प्रदायिक आधार पर बहुसंख्यक लोगों की सहानिभूति जुटाने की कोशिश की गयी थी उसमें 59 मृतकों में कारसेवकों की संख्या कुल दो थी। यद्यपि किसी भी निर्दोष व्यक्ति की हत्या गम्भीर दुख और क्रोध का विषय होता है किंतु सच सामने आने से घटना के मूल चरित्र में बदलाव हो जाता है। उससे साफ हो जाता है कि बोगी संख्या6 में हुयी आगजनी का चरित्र साम्प्रदायिक नहीं था और आँख बन्द करके पूरे गुजरात में मुसलमानों पर हमला कर देने वाले दुष्प्रचार से भ्रमित थे व सरकार में बैठ कर उनकी मदद करने वाले अपनी राजनीतिक कुटिलिता से यह सब करवा रहे थे। पिछले दिनों नकली वीडियो अपलोड करके मुज़फ्फरनगर में दंगा भड़काने वाले विधायकों का नरेन्द्र मोदी द्वारा किया गया सार्वजनिक अभिनन्दन इनके चरित्र का याज़ा उदाहरण है।
       यह सच है कि भाजपा 1984 अलगाववादी खालिस्तानी आन्दोलन के साथ नहीं थी और सिखों को हिन्दू मानने वाली यह पार्टी हिन्दूजाति में बिखराव की आशंका में सिख उग्रवादियों के खिलाफ थी। परिणाम स्वरूप भाजपा का समर्थक वर्ग भी श्रीमती गान्धी की हत्या के बाद सिखों के खिलाफ हुयी हिंसा में सिखों की रक्षा में सक्रिय नहीं हुआ। उल्लेखनीय है कि इतनी व्यापक हिंसा और आगजनी के बाद भी किसी भाजपा समर्थक की हिंसा और आग रोकने की कोशिश में उंगलियां भी नहीं झुलसीं। जब दिल्ली में भाजपा की राज्य सरकारें रहीं तब भी उन्होंने 1984 की हिंसा की जाँच के कोई सार्थक कदम नहीं उठाये।
       स्मरणीय है कि भगत सिंह ने अदालत में कहा था कि हिंसा के पीछे का उद्देश्य महत्वपूर्ण है अन्यथा मौत की सजा देने वाला न्यायाधीश भी हत्या के लिए जिम्मेदार होगा। दिल्ली और गुजरात की हिंसा को देखते समय भी हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों का चरित्र और उनका इतिहास ध्यान में रखना होगा।
वीरेन्द्र जैन
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