सोमवार, फ़रवरी 27, 2017

फिल्म समीक्षा जौल्ली एलएलबी-2

फिल्म समीक्षा जौल्ली एलएलबी-2
मकीम कौन हुआ है मकाम किसका था
वीरेन्द्र जैन

किसी भी फिल्म का सिक्विल बनने का एक मतलब यह भी होता है कि उससे पहले बनी फिल्म सफल रही थी और उसी सफलता की पूंछ से बँध कर नई फिल्म की वैतरिणी पार की जा सकती है। जौल्ली एलएलबी-2 भी ऐसी ही कोशिश की गई, जो रचनात्मक स्तर पर बड़ी लकीर नहीं खींच सकी। दोनों फिल्मों में एक ही चीज साझा है और वह है हमारी न्याय व्यवस्था का यथार्थवादी चित्रण। दोनों ही फिल्मों में न्यायाधीश की भूमिका सौरभ शुक्ला ने निभायी है। न्यायालयों के बारे में जो आदर्शवादी भ्रम व्यावसायिक फिल्मों ने रच दिया था उसे इन जैसी कुछ फिल्मों ने तोड़ दिया है।
अधिकारों और जिम्मेवारियों के विपरीत कम वेतन और सुविधाओं वाले न्यायाधीश बड़े बड़े पैसे और सुविधाओं वाले वाक्पटु वकीलों के आतंक में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं। इस फिल्म में तो न्यायाधीश [सौरभ शुक्ला], वकील प्रमोद माथुर [अन्नू कपूर] से कहते भी हैं कि अपनी बेटी की शाही शादी करने के लिए उन्हें उनके जैसा बनना होगा। उल्लेखनीय है कि हमारे देश की समकालीन राजनीति में भी जो वकील संसदीय राजनीति में आये हैं उन्हें निर्वाचन के समय अपनी आय का शपथपत्र देना पड़ता है। दो चुनावों के बीच उनके द्वारा दिये गये शपथपत्रों में जो उनकी आयवृद्धि प्रदर्शित होती है वह चौंकाने वाली होती है। यह आय केवल उनकी प्रतिभा के कारण ही नहीं होती अपितु इसमें उनकी राजनीतिक हैसियत की भूमिका भी होती है। इस फिल्म में यह सच भी जनता के सामने आया है कि न्याय में बार एसोशिएशन का दुरुपयोग भी सम्भव है। अपने मुकदमे के लिए न केवल गवाहों को ही धमकाया जाता है अपितु कुछ स्थानों पर तो वकीलों पर भी हमले करवाये जाते हैं।
न्याय व्यवस्था के साथ फिल्म की कहानी वकालत के कार्य में जूनियर वकीलों की दशा या कहें दुर्दशा भी बताती है जिसमें मुख्य पात्र जगदीश्वर मिश्रा [अक्षय कुमार] को वकालत की डिग्री होने के बावजूद मुंशीपुत्र होने के कारण मुंशी से अधिक नहीं समझा जाता और बड़े वकील रिज़वी साब आम तौर पर उससे बस्ता ढोने व उनकी अपनी दावतों में खानसामा का काम ही सौंपते हैं। न्याय व्यवस्था के साथ ही इस फिल्म का कथानक पूरी व्यवस्था की कमजोरियों को भी कई कोनों से छूता है। अपने प्रमोशन और धन के लिए पुलिस अधिकारी असली आतंकवादी को छोड़ देता है व उसके हमनाम को आरोपी बना देता है व राज खुलने से बचने के लिए उसे नकली एनकाउंटर में मार देता है। इस नकली एनकाउंटर को विश्वसनीय बनाने के लिए वह अपने ही एक कानिस्टबिल की जांघ में भी गोली मार देता है जो डायबिटीज का मरीज होने व ज्यादा खून बह जाने के कारण मर जाता है। [ ऐसा ही दृश्य फिल्म वेडनसडे में भी रचा गया था, जो नकली एनकाउंटरों में पुलिस वालों के घायल होने का राज खोलता है। नकली एनकाउंटर पर ‘अब तक 56’ जैसी फिल्में भी बनी हैं। परोक्ष में इनका सम्बन्ध भी न्याय व्यवस्था की कमजोरियों से है जिनके कारण पुलिस को दण्ड दिलाने में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है और कुछ लोग नकली सबूत जुटाते जुटाते सौदागर बन जाते हैं ] पुलिस अधिकारी सूर्यवीर सिंह [कुमुद मिश्रा] सस्पेन्ड होने के बाद अपने वरिष्ठ अधिकारी को भी धमकाता है कि उसने भी पैसठ नकली एनकाउंटर करके ही प्रमोशन पाया है तथा अगर वह फँसता है तो उसकी भी पोल खोल सकता है। सीबीआई अधिकारी भी वरिष्ठ अधिकारी के आश्वासन पर जाँच में समय दे देते हैं और उन्हें भी इसकी कोई चिंता नहीं होती कि इस बीच में आरोपी सबूतों के साथ छेड़छाड़ भी कर सकते हैं।
छठे दशक की फिल्मों तक देश में जो वातावरण बना था उसमें समाज सुधार के लिए भी कुछ होता था। जनता को मूर्ख बना कर धन ऎंठने वाले पंडित पुरोहित हास्य के पात्र होते थे और गाँव के साहुकारों का पतन दिखाया जाता था। राजकपूर की फिल्म में ऐसे गीत होते थे जिसमें कहा जाता था कि – देखे पंडित ज्ञानी ध्यानी दया धरम के वन्दे, राम नाम ले हजम कर गये गौशाला के चन्दे, अजी में झूठ बोल्यां, अजी में कुफ्र तौल्यां कुई ना, हो कुई ना, हो कुई ना........। बाद में चीन के साथ हुए सीमा विवाद के साथ ही फिल्मों में हालीवुड घुस आया व राजकपूर, गुरुदत्त, बलराज साहनी की जगह शम्मी कपूर, धर्मेन्द्र, मनोज कुमार, जाय मुखर्जी जितेन्द्र की फिल्में सतही संवेदना और क्षणिक उत्तेजना के सहारे से बाज़ार पर छा गयीं। श्याम बेनेगल आदि की फिल्मों के चर्चित और पुरस्कृत होने के बाद बाजारू फिल्मों को आइना दिखाया गया पर बेशर्म बाज़ार अपना काम करता रहा। अब जरूर ऐसा समय आ गया है कि हर फिल्म में सामंती अवशेषों पर चुटकियां ली जाती हैं, भले ही मुक्का न मारा जाता हो।
जगदीश्वर मिश्रा भी माथे पर तिलक लगाता है पर रिजवी साहब के यहाँ कबाब भी बनाता है तथा शराब पिला कर अपनी रूठी पत्नी को मनाता है। इसके साथ साथ अपने छोटे बच्चे को भी जनेऊ पहनाता है और पेशाब कराते समय उसके कान पर लपेट भी देता है। न्यायाधीश महोदय अपनी मेज पर तुलसी का पौधा रखते हैं और उसमें पानी डालते रहते हैं। उन्हें पता है कि अदालत से बाहर वकील उन्हें टैडी बियर कह कर बुलाते हैं।
न्याय व्यवस्था की कमजोरियों को इसी नाम की पहली फिल्म में दिखाया जा चुका है, और उसमें कुछ भी नया नहीं जोड़ा जा सका है जबकि इससे अधिक तो शाहिद नामक फिल्म अधिक स्पष्ट थी। सच तो यह है कि यह कलात्मक फिल्म के कथानक पर बनी व्यावसायिक फिल्म है। अक्षय कुमार केवल टार्जन जैसी फिल्मों के नायक हैं, उन्हें छलांगें लगाना आता है पर अभिनय नहीं आता। हुमा कुरेशी की भूमिका केवल सौन्दर्य प्रदर्शन के लिए जोड़ी गई लगती है। चींटी की तरह रेंगते न्याय की यात्रा को व्यावसायिक फिल्मों की तरह फास्ट फूड बना दिया है जो इसको यथार्थवादी फिल्म होने से रोकता है। एक लम्पट, लालची और महात्वाकांक्षी वकील का इतनी जल्दी एक्टविस्ट के रूप में बदल जाना भी अस्वाभाविक लगता है। फिल्म के स्वरूप के अनुसार गाने अनावश्यक हैं और मेल नहीं खाते।
व्यावसायिक फिल्मों के बीच यह अपेक्षाकृत एक बेहतर फिल्म है व इसके कथानक में और अच्छी फिल्म हो सकने की सम्भावनाएं थीं। अच्छा रहा कि फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल रही है जिससे सुधार की सम्भावनाएं बची रह गयी हैं। 
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

          

मंगलवार, फ़रवरी 21, 2017

पुस्तक समीक्षा भारतीय संस्कृति और बुंदेलखण्ड

पुस्तक समीक्षा
भारतीय संस्कृति और बुंदेलखण्ड
वीरेन्द्र जैन

कुछ लोग होते हैं जो अपने ज्ञान रूपी कुन्दन के गहने बनवा लेते हैं, और उनका दिखावा करते हैं, किंतु इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो उस कुन्दन की भस्म बना कर समाज के स्वास्थ को सुधारने के लिए वितरित कर देते हैं। बुन्देलखण्ड के एक छोर दतिया में बसने वाले श्री राधारमण वैद्य ऐसे ही अध्येता, विद्वान, शिक्षक रहे हैं जिन्होंने अपने ज्ञान को एक पूरी पीढी के लिए अर्पित कर दिया व अपने लिए कभी कुछ नहीं चाहा। उन्होंने प्रगतिशीलता को किसी आयतित विचार के रूप में नहीं देखा अपितु उसे अपनी संस्कृति में ही पहचाना और अपने आस पास के लोगों को उसकी पहचान करायी। उनकी शिक्षा ने साहित्य और कला जगत में एक पूरी पीढी को प्रेरणा दी है जिनमें डा. सीता किशोर खरे, डा. कामिनी, श्री राज नारायण बोहरे, स्व. कामता प्रसाद सड़ैया समेत सैकड़ों लोग हिन्दी व बुन्देलखण्डी में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके हैं।
श्रेय लेने में सदैव पीछे रहने वाले वैद्यजी ने सम्पादकों आदि के आग्रह पर समय समय पर जो लेख लिखे हैं उनका एक संकलन गत दिनों शुभदा प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया है। इस पुस्तक में, मानस की पृष्ठभूमि, हनुमान बाहुक पर एक दृष्टि, केशव का युग और शाक्त मत, समय और समाज सापेक्ष रीतिकाल, स्कन्दगुप्त विक्रमादित्य में एतिहासिकता के ब्याज से,  बाणकालीन पाराशरी भिक्षु, जैसे प्राचीन साहित्य पर विद्वतापूर्ण लेख संकलित हैं, और दूसरी ओर हजारी प्रसाद द्विवेदी के आलोकपर्व, सुधाकर शुक्ल और देवेदूतम, उर्दू साहित्य की परम्परा पर एक दृष्टि, हिन्दी की गोद में तामिलपुत्री बरगुण्डी, आज का कथा साहित्य : कहानी और आलोचना के नोट्स, जैसे लेख भी सम्मलित हैं।
इसी पुस्तक में भारतीय संस्कृति और भक्ति, समसामायिकता का चित्रण, बुन्देलखण्ड की प्राचीन मूर्ति व वास्तुकला, एतिहासिक एवं भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में सनकादि सम्प्रदाय, ग्राम अभियान और पुरातत्व, व दतिया के अध्यात्म, साहित्य और दर्शनीयता के वातायन, इतिहास का भूला –विसरा पृष्ठ भर्रोली शीर्षक से लिखे गये खोजपूर्ण लेख भी सम्मलित हैं।
डा. कृष्ण बिहारी लाल पाण्डेय ने पुस्तक के फ्लेप पर बहुत सही लिखा है कि श्री वैद्यजी के पूरे लेखन के सभी रूपों में संवेदना का एक ही प्रभाव मिलता है और विचार को एक सजग संचेतना मिलती है। उनका सही विचार और सार्थक दृष्टि गद्य को निरर्थक वाचालता के दोष से बचा लेती है। उनके पास विचार की विशाल सम्पदा के साथ अनुभवों का विशाल अंतरिक्ष है। वे केवल कथ्य और विवेचन में ही नहीं अपितु भाषा में भी बेहद रचनात्मक हैं। पुस्तक की भूमिका में प्रसिद्ध कथा लेखक राज नारायण बोहरे लिखते हैं कि यह पुस्तक भारतीय संस्कृति और बुन्देलखण्ड अंचल के गहन अध्य्यन पर किये गये सुदीर्घ गम्भीर अनुशीलन का परिणाम है।
मेरा सौभाग्य रहा कि मैं भी उनका छात्र रहा हूं।  
वीरेन्द्र जैन
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संलग्न- पुस्तक का आवरण पृष्ठ      

शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2017

फिर राम मन्दिर राग

फिर राम मन्दिर राग
वीरेन्द्र जैन

अब तक यह बात बहुत साधारणजन को भी समझ में आ चुकी है कि अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण से वोटों की राजनीति का क्या और कैसा सम्बन्ध है, फिर भी भाजपा ने चौदहवीं बार अपने घोषणापत्र में राम मन्दिर का मुद्दा उछाल कर बची खुची भावनाओं को भुनाने का प्रयास किया है।
भाजपा सांसद और केन्द्र सरकार में मंत्री गिरिराज सिंह ने एक बार फिर से वह जुमला उछाला है कि राम मन्दिर अगर अयोध्या में नहीं बनेगा तो क्या पाकिस्तान में बनेगा। यह सूत न कपास, जुलाहों में लठम लठा जैसा है। अयोध्या में राम के अनगिनित मन्दिर होंगे और नये मन्दिर के निर्माण पर भी कोई प्रतिबन्ध नहीं है। वहाँ मस्ज़िदें भी हैं व जैन और बौद्ध मन्दिर भी हैं। जो विवाद था वह ‘राम जन्मभूमि मन्दिर’ से सम्बन्धित था /है, न कि राम मन्दिर निर्माण से सम्बन्धित है जैसा गिरिराज सिंह और अन्य नेता चुनावों के समय उठाने लगते हैं। उनके बयानों से अति साधारण धर्मभीरु व्यक्ति को सचमुच लग सकता है कि हिन्दू बहुल देश के एक पौराणिक तीर्थ में उसके आराध्य का मन्दिर न बनने देना तो बड़ा अत्याचार है। धर्म की राजनीति से लाभ उठाने वालों ने बहुत सफाई से जानबूझ कर रामजन्मभूमि मन्दिर के न्यायालय में लम्बित मामले को अयोध्या में किसी राम मन्दिर का निर्माण न होने देने में बदल दिया है, और उसकी जिम्मेवारी अपने विपक्षियों पर डालते रहते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि वे जनता के बीच में अपने पक्ष को ले जाने में खुद को कमजोर मानते हैं इसलिए असत्य/अर्धसत्य का सहारा लेते हैं।
रामजन्मभूमि मन्दिर अभियान के शिखर पुरुष लालकृष्ण अडवाणी थे, जो बहुत चतुर राजनेता हैं। वे शब्दों का ऐसा सतर्क प्रयोग करते हैं कि उन पर कभी अनर्गल बोलने का आरोप सिद्ध नहीं हुआ। इस अभियान के दौरान जब विभिन्न विद्वानों ने ठीक उसी स्थान पर राम के जन्म होने से सम्बन्धित प्रमाण मांगने शुरू किये तो उन्होंने कहा था कि मैं नहीं कहता कि राम का जन्म उसी स्थान पर हुआ था किंतु मेरा कहना है कि लोगों का ऐसा विश्वास है कि राम का जन्म उसी स्थान पर हुआ था इसलिए उनकी भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। इससे पूर्व मुम्बई के एक वास्तुशास्त्री ने कहा था कि वह ऐसा नक्शा बना सकता है कि बाबरी मस्ज़िद उसी स्थल पर रहेगी और उसके ऊपर राम जन्मभूमि मन्दिर बन जायेगा, या बिना मस्ज़िद गिराये उसके नीचे भी भव्य मन्दिर का निर्माण हो सकता है। इसके उत्तर में मन्दिर अभियान से जुड़े लोगों का कहना था कि उन्हें ठीक उसी स्थान पर राम जन्मभूमि मन्दिर चाहिए जहाँ अभी बाबरी मस्ज़िद का ढांचा खड़ा हुआ है। स्पष्ट था कि उनका मतलब वोटों की राजनीति के लिए ध्रुवीकरण करना रहा था।
उल्लेखनीय है कि 1984-85 के लोकसभा चुनावों में कुल दो सदस्यों की संख्या तक सिमिट गई भाजपा को देश की राजनीति में स्थान बनाने के लिए कोई सहारा चाहिए था जो यह अभियान बना। वे अचानक ही दो से 180 और फिर दो सौ की संख्या तक पहुँच गये। इस अभियान के अलावा उनकी राजनीति ने ऐसा कुछ भी ठोस नहीं किया था जिससे वे लोकसभा में अपनी संख्या इस हद तक बढा पाते। भाजपा के इतिहास में यही वह मोड़ था जब उन्होंने विचारों और संघर्षों की जगह हथकण्डों, और षड़यंत्रों को अपनी राजनीति का जरूरी हिस्सा बना लिया। स्मरणीय है सर्वाधिक दलबदलुओं को टिकिट देने के सौदों के साथ सम्मलित करने का रिकार्ड इसी पार्टी के पास है और उसका यह खेल अभी भी जारी है। इस पार्टी से जुड़े बुद्धिजीवी और पत्रकार लगातार दलबदल कानून की कमियों के बहाने इसको समाप्त करने के लिए तर्क देते रहते हैं।   
कौन नहीं जानता कि भाजपा संघ परिवार का ही एक संगठन है व उसके चौंसठ विभिन्न संगठनों की परस्पर निर्भरता है, किंतु समय समय पर वे कहने लगते हैं कि राम मन्दिर अभियान उनका एजेंडा नहीं विश्व हिन्दू परिषद का एजेंडा है और वे तो उनकी मांग का समर्थन करते हैं। बाबरी मस्ज़िद ध्वंस की जाँच के लिए बैठा लिब्राहन आयोग तो जैसे बैठने के लिए ही बना था। न तो भाजपा चाह्ती थी कि वह कोई रिपोर्ट दे और न ही तत्कालीन सरकारों में यह क्षमता थी कि रिपोर्ट आ जाने पर वह दोषियों को दण्डित करा सके, इसलिए उसके बैठे रहने पर ही सहमति रही। आरोपियों में से एक उमा भारती ने अपने बयान में एक बार कहा कि वे भूल गयी हैं कि 6 दिसम्बर 1992 को क्या हुआ था। दूसरी बार के बयान में उन्होंने कहा कि मस्ज़िद तो भगवान ने तोड़ी। गत 25 सालों से ऐसे ही मखौल के वातावरण में जाँच चली व उस दौर के किसी व्यक्ति के जीवन काल में कोई फैसला सम्भव नहीं दीखता।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के घोषणा पत्र में भाजपा ने कहा है कि वह कानून के अन्दर जल्दी मन्दिर निर्माण के लिए प्रयास करेगी तो इसके उलट इसी अभियान से जुड़े उनके बड़े नेता विनय कटियार कह रहे हैं कि जैसे बाबरी मस्ज़िद तोड़ी वैसे ही मन्दिर भी बना देंगे। यह परोक्ष में बाबरी मस्ज़िद तोड़ने का इकबालिया बयान भी है।
सत्ता प्राप्ति के इस अभियान में कितना आर्थिक सामाजिक भावनात्मक नुकसान हुआ उसका हिसाब लगाना मुश्किल है, दूसरी ओर यह भी इतना ही सच है कि यह कोई भावनात्मक उफान नहीं था अपितु सोचे समझे तरीके से इतिहास को तोड़ने मरोरड़ने और अपने राजनीतिक हित में स्तेमाल करने का गन्दा खेल है। यह सहज ढंग से फूटा साम्प्रदायिक विस्फोट नहीं था अपितु उसे योजनाबद्ध ढंग से झूठ और दुष्प्रचार के सहारे विकसित किया गया था।
वे जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं। हमको जानना चाहिए कि वे देश के लिए ठीक नहीं कर रहे हैं।
 वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, जनवरी 18, 2017

शीर्ष राजनेताओं के दल से इतर विचार


शीर्ष राजनेताओं के दल से इतर विचार

वीरेन्द्र जैन


यह इकलौता मामला नहीं है, और न ही किसी एक दल के नेता से जुड़ा है। इसे हाल ही में हरियाणा सरकार के मंत्री और संघ से प्रारम्भ करने वाले भाजपा के नेता श्री अनिल विज के बयान से समझा जाये। प्रत्येक सफल व्यक्ति की लोकप्रियता के साधनों को आत्मसात करने वाले नरेन्द्र मोदी का गाँधी जी की तरह चरखा कातने वाला चित्र जब खादी ग्रामोद्योग की पत्रिका और कलेन्डर पर प्रकाशित हुआ तो स्वाभाविक रूप से विरोध में भारी शोर हुआ। उसी समय श्री अनिल विज ने बयान दिया कि महात्मा गाँधी का नाम खादी से जोड़ने पर खादी का महत्व बढा नहीं है और उसकी बिक्री घट गई थी। गाँधी का चित्र हटा कर मोदी का चित्र लगाना एक अच्छा कदम है। मोदी गान्धीजी की तुलना में बेहतर ब्रान्ड हैं, इससे खादी की बिक्री 14% बढ गई है। जब से महात्मा गाँधी का फोटो रुपयों पर आया तब से रुपये की कीमत गिरती गई इसलिए कुछ दिनों बाद वे नोटों पर से भी गायब होने वाले हैं।

श्री विज के इस अनावश्यक बयान को भाजपा संगठन ने उनका निजी विचार बता कर अपनी जिम्मेवारियों से पल्ला झाड़ लिया। बाद में विज ने भी बिना कोई खेद प्रकट किये इसे वापिस लेने की घोषणा भी कर दी किंतु क्या यह सब कुछ इतना सरल है? सवाल यह है कि किसी संगठन के महत्वपूर्ण नेता का सार्वजनिक जीवन से सम्बन्धित संगठन से अलग निजी विचार सामने आने पर उसके दल की क्या भूमिका होना चाहिए। क्या वह व्यक्ति दल से भिन्न विचार रख कर भी संगठन में यथावत अपने पद पर बना रह सकता है?

आइए इन्हीं अनिल विज के जीवन को देख कर कुछ और समझने की कोशिश करें। 63 वर्षीय अनिल विज का राजनीतिक जीवन संघ परिवार के जन संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से प्रारम्भ हुआ जिसमें वे 1970 में ही जनरल सेक्रेटरी चुन लिये गये। 1974 में स्टेट बैंक आफ इंडिया में नौकरी करने वाले विज को 1990 में नौकरी छुड़वा कर अम्बाला कैंट सीट से चुनाव लड़वाया गया जिसमें वे जीत गये। यह सीट श्रीमती सुषमा स्वराज के राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद खाली हुयी थी। भाजपा की निगाह में श्री विज का महत्व इसी से समझा जा सकता है। अपने विचार के लिए आजीवन अविवाहित रहने का फैसला करने वाले विज हरियाणा में संघ के कद्दावर, ईमानदार और समर्पित नेता माने जाते रहे हैं। रणनीतिक रूप से दो बार उन्हें निर्दलीय रूप से भी संघ ने चुनाव लड़वाया व जिताया गया और दो बार भाजपा के उम्मीदवार के रूप में भी वे जीते, पर संघ से उनके रिश्ते अटूट रहे। 2014 के विधानसभा चुनावों के बाद पहली बार भाजपा हरियाणा में स्वतंत्र रूप से सरकार बनाने की स्थिति में आयी और विज के मुख्यमंत्री बनने की सम्भावनाएं व्यापक रूप से चर्चा में रहीं। उनकी जगह खट्टर के मुख्य मंत्री बनने पर राजनीतिक क्षेत्रों में आश्चर्य व्यक्त किया गया था। उन्हें केबिनेट मंत्री बनाया गया व तीन प्रमुख विभाग दिये गये जिनेमें स्वास्थ, निर्वाचन व खेलकूद विभाग शामिल थे। वे साक्षी महाराज की तरह विवादास्पद बयान देकर चर्चा में बने रहते हैं। पिछले वर्ष ही उन्होंने कहा था कि जो लोग बिना बीफ खाये नहीं रह सकते उन्हें हरियाणा आने की जरूरत नहीं है। वे महिला आईपीएस अधिकारी के साथ टकराव वाले मामले में भी चर्चा में रहे, डेरा सच्चा सौदा को बड़ी रकम देने व रियो ओलम्पिक में भी चर्चा में रहे हैं।

विज का उक्त विवादास्पद बयान गाँधीजी की विचारधारा और व्यक्तित्व के प्रति संघ के रुख से भिन्न नहीं है। किंतु भाजपा अपने चुनावी लाभों के लिए समय समय पर गाँधीजी के प्रति जिस नकली श्रद्धा का दिखावा करती है उससे भिन्न अवश्य है। विज को स्वतंत्रता है कि वे देश के किसी भी राजनेता के प्रति अपने स्वतंत्र विचार रखें और यदि उनके विचार उनकी पार्टी के विचारों या रणनीतियों से भिन्न है तो वे पार्टी छोड़ दें या पार्टी उन्हें महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेवारियों से हटा दे। निजी विचार रखने वालों को भिन्न विचारों की पार्टी के पद पर बैठ कर फैसले लेते रहने का अधिकार नहीं हो सकता। भले ही ऐसी घटनाएं भाजपा में बहुतायत से होती रहती हैं किंतु दूसरे बड़े दल भी इससे मुक्त नहीं है। देखा गया है कि भाजपा सबसे अधिक दोहरे चरित्र की पार्टी है।

कोई व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में जितने बड़े पद पर रहता है, उसका विचार उस समूह के विचार अनुशासन से बँधता जाता है जिस समूह का वह प्रतिनिधि होता है। किसी भी वकील को अपने वादी द्वारा बतायी गयी कहानी में से ही अपने तर्क तलाशने होते हैं। जब से प्रधानमंत्री पद पर सुशोभित व्यक्ति अपने वादों को चुनावी जुमला कहलवाने लगता है तो वह उस महान पद की गरिमा गिरा रहा होता है। नरेन्द्र मोदी को छोड़ कर कोई प्रधानमंत्री ऐसा नहीं हुआ है जिसने भाषा में अमिधा की जगह व्यंजना का प्रयोग किया हो। अटल बिहारी वाजपेयी ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद भाषण शैली बदल दी थी। श्री विज खुद त्यागपत्र देकर आदर्श कायम कर सकते हैं, या भाजपा उन्हें कुछ समय के लिए पद मुक्त कर के संकेत दे सकती है। खेद है कि ऐसा कुछ भी नहीं होने जा रहा और भारतीय लोकतंत्र में सक्रिय दलों के प्रति लोगों की घृणा बढती जा रही है जो लोकतंत्र के लिए घातक है।

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड

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मो. 09425674629

   

       

शुक्रवार, जनवरी 06, 2017

बंगलरु छेड़छाड़ मामला – सामाजिक विविधिता में छुपे बीज

बंगलरु छेड़छाड़ मामला – सामाजिक विविधिता में छुपे बीज
वीरेन्द्र जैन

आज से लगभग पचास साल पहले कलकत्ता [आज का कोलकता] के रवीन्द्र सरोवर में आयोजित किसी बड़े मनोरंजन कार्यक्रम के दौरान अचानक ही बिजली चली गयी थी जिसके बाद वहाँ उपस्थित कुछ पुरुष महिलाओं पर जंगलियों की तरह टूट पड़े थे और सुबह के अखबारों में साड़ी सेंडिलें ही नहीं ब्लाउज और ब्रेजरी के टुकड़ों का ढेर नजर आ रहा था। चर्चा में कुछ सच्ची और झूठी कहानियां भी थीं। शर्म के मारे पीड़ित पक्ष कुल कर सामने नहीं आया था। 31 दिसम्बर 2016 की रात्रि में नये वर्ष के कार्यक्रम के दौरान जो कुछ घटित हुआ उससे रवीन्द्र सरोवर कांड की याद आना स्वाभाविक है। विचारणीय यह है कि तब से अब तक समाज की मानसिकता में यह बदलाव आया है, कि अब लोगों को बिजली जाने की प्रतीक्षा भी नहीं करना पड़ती।
इस घटना को कई कोणों से देखा जा रहा है, जिनमें कानून व्यवस्था, बदलती जीवनशैली, और राजनीतिक प्रतिद्वन्दी की प्रतिक्रिया, से लेकर नशाखोरी, पश्चिमीकरण, महिला विमर्श आदि भी शामिल हैं। सच तो यह है कि ये सारे दृष्टिकोण इस घटनाक्रम में विद्यमान हैं और इन सब के सम्मलित प्रभाव देखे जा सकते हैं। महाराष्ट्र के एक मुस्लिम नेता ने इस अवसर पर मुस्लिम महिलाओं के लिए तय किये गये इस्लामी नियमों की श्रेष्ठता का मौका तलाश लिया और महिलाओं को ढके मुंदे रह कर चूल्हा चौका करते हुए बच्चे पैदा करने की मशीन तक सीमित हो जाने को ही, उनके बचाव का उपाय बताने लगे। वे कुछ दिनों पहले लगे उन पोस्टरों के सन्देशों को भूल गये जिनमें लिखा हुआ था कि नज़रें तेरी बुरी, और बुरका मैं पहनूं, पर्दा मैं करूं। आधुनिक सोच के एक मित्र को तो पौराणिक जीवनशैली पर टिप्पणी का मौका मिल गया और वे यह कहते हुए मिले कि आज का बंगलरु तो द्वापर का वृन्दावन हो गया लगता है।
सच्चाई यह है कि आज हमारे समाज को किसी एक सांस्कृतिक पहचान से नहीं जाना जा सकता है। हम आधे तीतर आधे बटेर से लेकर चूं चूं के मुरब्बे तक हो गये हैं। पुराना हमसे छूटता नहीं है और नया ललचाता है। न हम पश्चिमी हुये और न ही भारतीय रह गये, न हम ग्रामीण और कस्बाई रहे और न ही महानगरीय बन पाये। वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्र में नौकरी के लिए हम मन्दिरों में पूजा पाठ कराते हैं। लड़कियां जींस और पायलें एक साथ पहिनती हैं व आई टी वाली लड़कियां मांग भर कर करवा चौथ का व्रत रखती हैं। हमारे यहाँ पुरुषों की नैतिकिताएं अपने घर की महिलाओं के लिए भिन्न हैं, और सहपाठिनों तथा महिला सहकर्मियों के लिए भिन्न होती हैं। जरा मालूम करके देखिए कि उस रात उस नये वर्ष के कथित उत्सव में सम्मलित होने वाले कितने पुरुष अपनी बहिनों को साथ में लाये थे! यदि इस आयोजन या उत्सव में सम्मलित होने वाले पुरुष अपनी बहिनों या घर की दूसरी महिला सदस्यों के साथ आये होते तो शायद वैसी घटनाएं नहीं घटीं होतीं। लोग दूसरे के घर की महिलाओं को आधुनिक व खुले विचारों की बनना चाहते हैं ताकि वे उन्हें आसानी से दोस्त बना सकें, पर अपनी बहिनों के लिए चाहते हैं कि घर की चार दीवारी के अन्दर रहते हुए जल्दी से जल्दी उनके बुजुर्गों द्वारा तय किये गये पुरुषों से विवाहित होकर घर बसा लें। ऐसे लोग आधुनिकता के नाम पर अपनी कामुकता के लिए सहज उपलब्धता तलाशने वाले लोग हैं। एक युवक ने मुझ से ‘फ्रीडम आफ सेक्स’ पर विचार जानने चाहे तो मैंने कह दिया कि अगर आप अपनी बहिन को यह स्वतंत्रता देना पसन्द करें तो ठीक हो सकती है। उसके बाद उसने कोई दूसरा सवाल नहीं पूछा। मेरा एक तमिल सहकर्मी कानपुर को ‘ बिगेस्ट विलेज आफ इंडिया’ कहा करता था, और वह गलत भी नहीं था।  
इस तरह की घटनाओं के लिए कुछ लोग कम वस्त्रों की पोषाकों को ज़िम्मेवार मानते हैं तो कुछ ऐसे विचार को बहुत दकियानूसी मानते हैं। मैं दोनों से ही पूरा सहमत नहीं हो पाता। किसी भी महिला या पुरुष को अपनी पसन्द के पहनावे की स्वतंत्रता होना चाहिए। पर इसमें पेंच यह है कि वस्त्र केवल देह को मौसमों से सुरक्षित रखने के लिए ही नहीं पहिने जाते अपितु वस्त्र सामाजिक धारणाओं के अनुसार सामने पड़ने वाले के साथ संवाद भी करते हैं। किसी समाज में दुल्हिन के लिए खास पोषाक तय होती है और साध्वी के लिए अलग तरह की होती है। श्रंगार से ही कोई महिला अभिसारिका बनती है। गोआ या उत्तरपूर्व में महिलाएं स्कर्ट पहिनती हैं किंतु राजस्थान और उत्तर प्रदेश के किसी गाँव में जवान या अधेड़ महिला अगर स्कर्ट पहिनने लगे तो उसका कुछ अलग ही अर्थ प्रकट होगा। दूसरी ओर उतने ही कम वस्त्रों में अगर कोई गरीब और अभावग्रस्त या आदिवासी महिला की देह उघड़ी रहती है तो भिन्न भाव प्रकट होते हैं। अगर महिलाएं किसी समाज में बैड रूम में पहिने जाने वाले कपड़ों को पहिन कर बाज़ार में आयेंगी तो देखने वालों में बैड रूम का खयाल आ सकता है। शराब व्यक्ति को वर्जनाएं तोड़ कर सहज होने के लिए प्रेरित करती है और आम तौर पर संकुचित व अपनी भावनाओं को नियंत्रित रखने के लिए पहचानी जाने वाली महिलाएं जब शराब पीते हुए दिख जाती हैं तो नशे में खुद उन्मुक्त हो चुका व्यक्ति गलतफहमी का शिकार हो जाता है।
जब श्रीराम सेने वाले मुताल्लिक पब में घुस कर लड़कियों पर हमला करते हैं तो वे बड़ा अपराध करते हैं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन करते हैं, किंतु जब नशा करते हुए लड़के लड़कियों में से कुछ बहक जाते हैं, या उन्हें गलतफहमी हो जाती है तब वहाँ उपस्थित होश वालों, या कानून व्यवस्था को हस्तक्षेप करना चाहिए था। ऐसी स्थिति से निबटने के लिए आयोजन के प्रबन्धकों को व्यवस्था रखनी चाहिए। मेरे कहने का मतलब यह है कि श्रीराम सेने वालों और मदिरायल में बहक गये लोगों को एक ही तराजू पर नहीं तौला जा सकता।
ऐसे समाज के बीच न तो यह पहली घटना है और न ही आखिरी। यह संक्रमण काल है और नई आर्थिक नीतियों के बाद पूरा समाज एक नये युग में प्रवेश कर के नये तरह का समाज बनाने का प्रयास कर रहा है। आज पैसा एक खास तरह के लोगों को नवधनाड्य बना रहा है और सीमाओं से मुक्त पूंजी का प्रवाह नई नई आदतें विकसित करेगा। अपना माल बेचने के लिए मांग पैदा की जाती है और इसके लिए आदतें बदली जाती हैं, सांस्कृतिक मूल्य बदले जाते हैं। इस दौर में पुराने मूल्य टूटेंगे नये गठित होंगे। जो इस बदलाव से दूर होंगे उनके साथ नई पीढी का टकराव स्वाभाविक है। इसके अच्छे या बुरे परिणाम बाद में समझ में आयेंगे। कानून अपनी गति से अपना काम करेगा। जब विमुद्रीकरण में 150 से अधिक लोगों की असामायिक मृत्यु पर भी समाज चुप रहता है तो नये वर्ष के जश्न में हुई छेड़छाड़ों में से न जाने कितनी तो ऐसी होंगीं जिनके बारे में किसी को कुछ भी न बताया गया होगा। समाज के मूल्य बहुत विविध होते जा रहे हैं, और एक तरह के मूल्यों के साथ दूसरे तरह के मूल्यों से टकराव बढेगा ही बढेगा। तरस उन पर आता है जिन्हें कम वस्त्र पहिन कर स्वेच्छा से शराबखानों में झूमती अच्छे पैकेज की युवतियों को पुराने तरह की लड़कियों से नापने की आदत है।
नई आर्थिक नीतियों का स्वागत करने वालों को नई से नई नैतिकितओं का सामना करना पड़ेगा। इन नीतियों के लागू रहते इस बदलाव को रोका नहीं जा सकता। इन बदलावों में अपराधों की किस्में भी नई नई होंगीं।   
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629


तिकड़मी राजनीति के शिखर पुरुष अमर सिंह का पराभव

तिकड़मी राजनीति के शिखर पुरुष अमर सिंह का पराभव
वीरेन्द्र जैन

उत्तर प्रदेश के यादव कुनबे में दिन प्रतिदिन की कलह और भरत मिलाप के बीच किसी गुप्त या प्रकट समझौते के आसार तय माने जाते रहे हैं, किंतु इस पूरे ड्रामे के परिणाम स्वरूप सबसे अधिक नुकसान राजनीतिक व्यापारी अमर सिंह का हुआ है। जब विवादों के एपीसोड में मुलायम सिंह ने भावुक होकर अपने परिवारियों से कहा था कि अमर सिंह ने मुझे जेल जाने से बचाया था जिसमें सात साल की जेल हो सकती थी तो उसी समय स्पष्ट हो गया था कि इस अमर प्रेम के पीछे कौनसी ब्लैकमेलिंग काम कर रही थी। अमर सिंह के काम करने का तरीका तो उसी समय साफ हो गया था जब अन्ना आन्दोलन के दौरान उन्होंने प्रशांत भूषण की बातचीत का टेप होने का दावा किया था जो उनके पक्ष के ही वकील थे। इस बारे में उन्होंने खुद ही बताया था कि एक प्रकरण में विरोधी पक्ष को कोई बड़ा वकील न मिले इसलिए उन्होंने प्रदेश के सारे बड़े वकीलों को अपने पक्ष के वकील के रूप में नियुक्त कर लिया था व अपने ही वकील की बातचीत भी रिकार्ड करके सुरक्षित कर ली थी। जो व्यक्ति अपने ही पक्ष के लोगों की बात को रिकार्ड कर के रखता हो वह किसी का भी मित्र कैसे हो सकता है? इस घटना समेत दूसरी अनेक घटनाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि वे किसी के भी बफादार नहीं हो सकते। उनकी तुलना उस मोनिका लेवेंस्की से की जा सकती है जिसने क्लिंटन से प्रेमालाप के दौरान बिना भावुक हुये सारे प्रमाण वक्त जरूरत के लिए सम्हाल कर रख छोड़े थे।
मुस्लिम वोटों के लिए रणनीतिक रूप से मुलायम सिंह ने जब आज़म खान को गले लगाया था और अमर सिंह को पार्टी से बाहर बैठा दिया था, पर तब भी वे उन्हें दिल में बैठाये रहे थे जैसा कि उन्होंने बाद में प्रकट भी किया था। सच तो यह है कि राजनीति के नाम पर मुलायम सिंह ने अनेक लोगों के साथ धोखा किया है किंतु इनमें से अधिकांश बड़े धोखे उन्होंने अमर सिंह का साथ मिलने के बाद ही किये हैं। यह भी तय है कि ज़मीनी नेता मुलायम सिंह की वाक्पटु अमर सिंह के साथ सफल जोड़ी थी। जिस कूटनीति के ज्ञान और व्यवहार की मुलायम सिंह के पास कमी थी वही अमर सिंह में कूट कूट कर भरा हुआ था किंतु वे ठाकुरवाद, पूर्वांचलवाद, उभारने के बाद भी कहीं से विधायक का चुनाव तक जीत सकने में भी सक्षम नहीं हैं। अन्धे और लंगड़े के साथ की बोधकथा के सटीक उदाहरण हैं। मैंने कभी सहज हास्य में दो पंक्तियां कही थीं –
राजनीति ने आज व्यवस्था ऐसी कायम की
अमर सिंह जी दूध बेचते, भैंस मुलायम की
अमर सिंह हमेशा उस व्यक्ति को ही प्रभाव में लेने की कोशिश करते हैं जो कम स्मार्ट या बौद्धिक रूप से थोड़े कमजोर होते हैं। मुलायम सिंह के बाद शिवपाल यादव उनके नये चेले बने थे जिन्हें मुख्यमंत्री बनवाने के लिए उन्होंने पार्टी में दुबारा आने के बाद चालें चलना शुरू कर दी थीं। कभी अखिलेश को पढने के लिए विदेश भेजने से लेकर उनकी मनपसन्द शादी करवाने तक उन्होंने अपनी सेवाएं दी थीं पर अखिलेश के सामने यह बहुत जल्दी स्पष्ट हो गया कि यह सब उनकी कूटनीति का हिस्सा था। अखिलेश को पता लग गया था कि शिवपाल को मुख्यमंत्री बनवाने के लिए अमर सिंह तिकड़म भिड़ा रहे हैं, प्रदेश में महत्वपूर्ण पदों पर अपने अधिकारी पदस्थ करा रहे हैं और सारे सूत्र अपने हाथ में ले रहे हैं। यही कारण रहा कि उनके मन में अमर सिंह के लिए तीव्र प्रतिरोध की भावना पैदा हुई, जबकि अमर सिंह को पता लग गया था कि अखिलेश उन्हें दलाल कहते और मानते हैं। बार बार दल की समस्याओं के लिए जिस बाहरी व्यक्ति का नाम आया वे अमर सिंह ही थे।  
अमर सिंह ने मुलायम सिंह की पावर आफ अटार्नी लेकर राजनीति में सबके साथ सौदा किया जिसमें दोनों पक्षों को ही फायदा हुआ, पर सब कुछ इतना व्यापारिक रहा कि कोई भी उनका अहसानमन्द नहीं हुआ। परमाणु समझौते के सवाल पर उन्होंने बामपंथियों के साथ धोखा करवाया और मनमोहन सिंह के खिलाफ आया अविश्वास प्रस्ताव गिर गया किंतु उसके बाद काँग्रेस ने उन पर कभी भरोसा नहीं किया। इससे पूर्व भी जब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह को समर्थन की जरूरत पड़ी थी तो भाजपा के साथ गुप्त सौदा अमर सिंह के माध्यम से ही सम्भव हुआ था। रात्रि में बारह बजे के बाद अरुण जैटली से मिलने जाने वाले व इसे एक वकील और क्लाइंट की मुलाकात बताने वाले अमर सिंह ही थे। लोकप्रिय अभिनेता अमिताभ बच्चन को कर्जों से उभारने के लिए विज्ञापन का माडल बनने के लिए अमर सिंह ने ही प्रेरित किया था व जया बच्चन को राज्यसभा में भेजने व अमिताभ को उत्तर प्रदेश का ब्रांड एम्बेसडर बनवाने का काम अमर सिंह का ही था जिनकी लोकप्रियता के सहारे उन्होंने अपनी लोकप्रियता भी उभारी थी। बाद में अमिताभ भी उनसे उकता गये थे, और किसान बनने से तौबा कर ली थी। इन्हीं अमिताभ के लिए उन्होंने इलाहाबाद के आयकर कार्यालय में तोड़फोड़ करा दी थी।
अब यह लगभग तय हो चुका है कि समाजवादी पार्टी जो और जितनी भी शेष रहेगी उसमें मुलायम की भूमिका अडवाणी से अधिक नहीं रहने वाली है। अखिलेश युवा है, संसदीय दल का बहुमत उनके साथ है, उनका रिकार्ड साफ सुथरा है, उन्होंने एक बार डीपी यादव और दूसरी बार मुख्तार अंसारी के दल में प्रवेश का विरोध करके अपने नेतृत्व की समाजवादी पार्टी को अपराधियों की पार्टी होने की छवि से मुक्त कराया है। शासन में विकासोन्मुख राजनीति के नेता की तरह पहचान बनाने की कोशिश की है। प्रदेश में मुस्लिम नेतृत्व का प्रमुख चेहरा आज़म खान उनके साथ हैं व काँग्रेस समेत वामपंथी पार्टियों ने उन्हें समाजवादी पार्टी के नेता के रूप में मान्यता देकर उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि को समर्थन दिया है। दूसरी ओर शिवपाल और मुलायम की छवि आधुनिक राजनीति के साथ मेल नहीं खाती। अमर सिंह, डीपी यादव, फूलन देवी, मुख्तार अंसारी, बाबू लाल कुश्वाहा, आदि अनेकों बाहुबलियों व आदर्शच्युत लोगों को पार्टी के साथ जोड़ने का कलंक शिवपाल मुलायम के साथ है।
अखिलेश को मुख्यमंत्री मुलायम ने ही कुछ दूरगामी सोच के आधार पर बनाया था जिसको अमर सिंह षड़यंत्र रच के बदलना चाहते थे अर्थात वे उनके फैसले के खिलाफ ही काम कर रहे थे। इसलिए अब अगर किसी को बाहर होना है तो अमर सिंह को ही होना है। मुलायम के खिलाफ सीबीआई की भी कोई कार्यवाही होती है तो उसका नुकसान भी समाजवादी पार्टी के खाते में नहीं जाने वाला। दूसरी ओर अमर सिंह का मूल चरित्र इतना प्रकट हो चुका है कि कोई भी दूसरी पार्टी उनका उपयोग भले ही कर ले पर उनकी हैसियत के अनुसार पद देकर पार्टी में भर्ती नहीं करेगी। अपनी पार्टी बना कर वे देख ही चुके हैं। वे ज्ञानी हैं, वाक्पटु हैं, हाज़िर जबाब हैं, रणनीति कुशल हैं पर अब मैदान से बाहर हो चुके हैं। अब अगर वे सर्वश्रेष्ठ कर सकते हैं तो यह कि वे सच्चे संस्मरणों की कोई किताब लिखें। यह किताब भारतीय राजनीति को दिशा देगी व जनता को चेतना देगी।
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, दिसंबर 26, 2016

फिल्म समीक्षा दंगल - लैंगिक भेदभाव पर एक और बेहतरीन फिल्म

फिल्म समीक्षा
दंगल - लैंगिक भेदभाव पर एक और बेहतरीन फिल्म

वीरेन्द्र जैन
पिछले दो दशकों से साहित्य में महिला विमर्श को केन्द्र में लाया गया था जिसके प्रभाव में पिछले दिनों लैंगिक भेदभाव को चुनौती देने वाली कई फिल्में बनी हैं जिनमें से कुछ बैंडिट क्वीन, गुलाबी गैंग, नो वन किल्लिड जेसिका, क्वीन, पिंक, बोल, खुदा के लिए, आदि तो बहुत अच्छी हैं। आमिर खान की दंगल भी बिना कोई ऐसा दावा किये उनमें से एक है। इसमें यह भी जोड़ा जा सकता है कि जब कोई विषय किसी परिपक्व कलाकार के हाथ लगता है तो उसका निर्माण उसके सौन्दर्य और प्रभाव को कई गुना बढा देता है। पिछले दिनों खेल और उसकी समस्याओं को लेकर भी कुछ कथा फिल्में व बायोपिक जैसे चक दे इंडिया, भाग मिल्खा भाग, मैरी काम, पान सिंह तोमर आदि बनी हैं और सफल हुयी हैं, पर यह फिल्म दोनों का मेल है। यह फिल्म हरियाना जैसे राज्य में जहाँ पुरुषवादी मानसिकता इस तरह सवार है कि कन्या भ्रूण के गर्भपात के कारण लैंगिक अनुपात खराब हो गया है, की सच्ची घटना से जन्मी है और एक प्रेरक फिल्म है। जो लोग देश के आमजन को, स्वार्थी, गैरसंवेदनशील, अनपढ, और कूपमंडूप मान कर चलते हैं, इस फिल्म की व्यवसायिक सफलता उन लोगों को भी आइना दिखाती है। उल्लेखनीय है कि प्रफुल्लित स्कूटर, कार- स्टेंड वाले ने बताया कि नोटबन्दी के बाद आने वाली यह पहली फिल्म है जो लगातार तीन दिन से हाउसफुल चल रही है और उसका घाटा पूरा कर रही है।
व्यावसायिक स्तर पर सफल यह आम व्यावसायिक फिल्मों से इसलिए अलग है कि इसमें स्टार के नाम पर केवल आमिरखान हैं, और चार नई लड़कियां, फातिमा साना शेख, ज़ाइरा वसीम, सान्या मल्होत्रा, और सुहानी भटनागर हैं। इसमें न तो प्रेम कहानी है और न ही आइटम सोंग जैसे भड़कीले बदन दिखाऊ दृश्य हैं। इसमें न तो फूहड़ कामेडी है और न धाँय धायँ करती व्यवस्था को नकारती हिंसक घटनाएं हैं। यह किसी पाक शास्त्र में कुशल ऐसे रसोइये की कला है जो बिना मसाले के भी स्वादिष्ट और पोषक रसोई बनाना जानता है। इस फिल्म में अगर खून बहता हुआ नजर आता है तो वह आँखों से बहता हुआ नजर आता है, बकौल गालिब – जो आँख से ही न टपका तो फिर लहू क्या है। पूरी फिल्म में पात्रों की आँखें भरी हुई नजर आती हैं, कभी खुशी से तो कभी परिस्तिथिजन्य दुखों से। यही स्थिति दर्शकों की आँखों को भी बार बार भर देती है, पर न पात्रों की भरी आँखें छलकती हैं, न ही दर्शकों की। दिल का भर आना इसीको कहते हैं।    
छोटी सी कहानी में भी कितनी बातें समेटी जा सकती हैं यह बात राजकपूर की कला के सही उत्तराधिकारी आमिर खान से ही सीखी जा सकती है। एक खिलाड़ी जो देश के लिए खेलने की क्षमता और भावना रखता था उसे खेल छोड़ कर केवल इसलिए नौकरी करना पड़ती है क्योंकि उसके पिता का मानना है कि जिन्दा रहने के लिए रोटी जरूरी होती है, मेडलों को थाली में डाल कर नहीं खाया जा सकता। वह अपना सपना अगली पीढी के माध्यम से पूरा करना चाहता है किंतु उसके घर कोई लड़का पैदा नहीं होता जिसकी प्रतीक्षा में वह चार लड़कियां पैदा कर लेता है। मैडलों के न मिलने पर दुखी होते देश में मैडल जीतने वाले देशों की तरह खिलाड़ियों की देखभाल की उचित व्यवस्था नहीं है। खेल अधिकारी उसे बताता है कि खेल के लिए कुल कितना बज़ट आवंटित है और उसमें से भी कुश्ती के लिए इतना भी नहीं बचता कि जिससे गद्दे तो दूर एक मिठाई का डिब्बा भी न आ सके। लड़कियों की कुश्ती की तैयारी कराने के लिए भी दूसरी लड़कियां नहीं मिलतीं जिस कारण लड़की को अपने दूर के रिश्ते के भाई के साथ ही कुश्ती करके सीखना पड़ता है और पहली जीत किसी लड़के को पराजित करके ही जीतना पड़ती है। पुरुषवादी समाज में जब पिता कोच का काम करता है तो परम्परागत अनुभवों से सिखाता है और जिस कारण से उसका स्पोर्ट कालेज के कोच से टकराव भी होता है जो आधुनिक किताबी ज्ञान से सिखा रहा होता है। अंततः दोनों के समन्वय से खिलाड़ी लड़की द्वारा अपने विवेक से लिया गया फैसला ही जीत दिलाता है।
खेल के क्षेत्र में आगे बढने के लिए किसी लड़की का टकराव उसके मन में भर दिये गये एक कमजोर ज़ेन्डर होने की भावना से ही नहीं होता अपितु सहपाठियों और सामाजिक तानों बानों से भी होता है, पहनावा व हेयर स्टाइल बदलने के कारण भिन्न दिखने से भी होता है। उनके लिए तय कर दी गई कलाओं तक सीमित रहने की परम्परा से भी होता है। सामाजिक विरोध के साथ साथ जाति समाज के विरोध का सामना कोई पहलवान ही कर सकता है। किसी महिला के खिलाड़ी बनने के लिए उसे अपने परम्परागत सौन्दर्य बोध को मारना होता है। मैत्रीय पुष्पा अपने आत्मकथात्मक उपन्यास ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ में लिखती हैं कि उनकी माँ सरकारी नौकरी में एक साधारण सी कर्मचारी थीं जिन्हें गाँव गाँव की यात्रा करना पड़ती थी। इस नौकरी में सम्भवतः अपनी सुरक्षा के लिए वे रूखे सूखे रहने को अपना कवच मानती थीं, और केवल छुट्टियों में ही अपने बालों में तेल लगवाती थीं। इस फिल्म में खिलाड़ी लड़की द्वारा टीवी देखने, अपने बाल बढाये जाने और नेल पालिश लगाये जाने को भी उसका लक्ष्य विचलित होना माना जाना भी एक मार्मिक प्रसंग बन गया है।
हाउस फुल हाल में फिल्म प्रारम्भ होने के पहले राष्ट्रगीत बजाये जाते समय तक दर्शक अपनी सीट ही तलाश रहे होते हैं और अनचाहे भी वे राष्ट्रगीत के लिए तय मानकों का उल्लंघन कर रहे होते हैं, दूसरी ओर जब फिल्म की कहानी में राष्ट्रगीत बज रहा होता है, वे तब भी खड़े हो जाते हैं।   
वीरेन्द्र जैन
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