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सोमवार, फ़रवरी 27, 2017

फिल्म समीक्षा जौल्ली एलएलबी-2

फिल्म समीक्षा जौल्ली एलएलबी-2
मकीम कौन हुआ है मकाम किसका था
वीरेन्द्र जैन

किसी भी फिल्म का सिक्विल बनने का एक मतलब यह भी होता है कि उससे पहले बनी फिल्म सफल रही थी और उसी सफलता की पूंछ से बँध कर नई फिल्म की वैतरिणी पार की जा सकती है। जौल्ली एलएलबी-2 भी ऐसी ही कोशिश की गई, जो रचनात्मक स्तर पर बड़ी लकीर नहीं खींच सकी। दोनों फिल्मों में एक ही चीज साझा है और वह है हमारी न्याय व्यवस्था का यथार्थवादी चित्रण। दोनों ही फिल्मों में न्यायाधीश की भूमिका सौरभ शुक्ला ने निभायी है। न्यायालयों के बारे में जो आदर्शवादी भ्रम व्यावसायिक फिल्मों ने रच दिया था उसे इन जैसी कुछ फिल्मों ने तोड़ दिया है।
अधिकारों और जिम्मेवारियों के विपरीत कम वेतन और सुविधाओं वाले न्यायाधीश बड़े बड़े पैसे और सुविधाओं वाले वाक्पटु वकीलों के आतंक में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं। इस फिल्म में तो न्यायाधीश [सौरभ शुक्ला], वकील प्रमोद माथुर [अन्नू कपूर] से कहते भी हैं कि अपनी बेटी की शाही शादी करने के लिए उन्हें उनके जैसा बनना होगा। उल्लेखनीय है कि हमारे देश की समकालीन राजनीति में भी जो वकील संसदीय राजनीति में आये हैं उन्हें निर्वाचन के समय अपनी आय का शपथपत्र देना पड़ता है। दो चुनावों के बीच उनके द्वारा दिये गये शपथपत्रों में जो उनकी आयवृद्धि प्रदर्शित होती है वह चौंकाने वाली होती है। यह आय केवल उनकी प्रतिभा के कारण ही नहीं होती अपितु इसमें उनकी राजनीतिक हैसियत की भूमिका भी होती है। इस फिल्म में यह सच भी जनता के सामने आया है कि न्याय में बार एसोशिएशन का दुरुपयोग भी सम्भव है। अपने मुकदमे के लिए न केवल गवाहों को ही धमकाया जाता है अपितु कुछ स्थानों पर तो वकीलों पर भी हमले करवाये जाते हैं।
न्याय व्यवस्था के साथ फिल्म की कहानी वकालत के कार्य में जूनियर वकीलों की दशा या कहें दुर्दशा भी बताती है जिसमें मुख्य पात्र जगदीश्वर मिश्रा [अक्षय कुमार] को वकालत की डिग्री होने के बावजूद मुंशीपुत्र होने के कारण मुंशी से अधिक नहीं समझा जाता और बड़े वकील रिज़वी साब आम तौर पर उससे बस्ता ढोने व उनकी अपनी दावतों में खानसामा का काम ही सौंपते हैं। न्याय व्यवस्था के साथ ही इस फिल्म का कथानक पूरी व्यवस्था की कमजोरियों को भी कई कोनों से छूता है। अपने प्रमोशन और धन के लिए पुलिस अधिकारी असली आतंकवादी को छोड़ देता है व उसके हमनाम को आरोपी बना देता है व राज खुलने से बचने के लिए उसे नकली एनकाउंटर में मार देता है। इस नकली एनकाउंटर को विश्वसनीय बनाने के लिए वह अपने ही एक कानिस्टबिल की जांघ में भी गोली मार देता है जो डायबिटीज का मरीज होने व ज्यादा खून बह जाने के कारण मर जाता है। [ ऐसा ही दृश्य फिल्म वेडनसडे में भी रचा गया था, जो नकली एनकाउंटरों में पुलिस वालों के घायल होने का राज खोलता है। नकली एनकाउंटर पर ‘अब तक 56’ जैसी फिल्में भी बनी हैं। परोक्ष में इनका सम्बन्ध भी न्याय व्यवस्था की कमजोरियों से है जिनके कारण पुलिस को दण्ड दिलाने में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है और कुछ लोग नकली सबूत जुटाते जुटाते सौदागर बन जाते हैं ] पुलिस अधिकारी सूर्यवीर सिंह [कुमुद मिश्रा] सस्पेन्ड होने के बाद अपने वरिष्ठ अधिकारी को भी धमकाता है कि उसने भी पैसठ नकली एनकाउंटर करके ही प्रमोशन पाया है तथा अगर वह फँसता है तो उसकी भी पोल खोल सकता है। सीबीआई अधिकारी भी वरिष्ठ अधिकारी के आश्वासन पर जाँच में समय दे देते हैं और उन्हें भी इसकी कोई चिंता नहीं होती कि इस बीच में आरोपी सबूतों के साथ छेड़छाड़ भी कर सकते हैं।
छठे दशक की फिल्मों तक देश में जो वातावरण बना था उसमें समाज सुधार के लिए भी कुछ होता था। जनता को मूर्ख बना कर धन ऎंठने वाले पंडित पुरोहित हास्य के पात्र होते थे और गाँव के साहुकारों का पतन दिखाया जाता था। राजकपूर की फिल्म में ऐसे गीत होते थे जिसमें कहा जाता था कि – देखे पंडित ज्ञानी ध्यानी दया धरम के वन्दे, राम नाम ले हजम कर गये गौशाला के चन्दे, अजी में झूठ बोल्यां, अजी में कुफ्र तौल्यां कुई ना, हो कुई ना, हो कुई ना........। बाद में चीन के साथ हुए सीमा विवाद के साथ ही फिल्मों में हालीवुड घुस आया व राजकपूर, गुरुदत्त, बलराज साहनी की जगह शम्मी कपूर, धर्मेन्द्र, मनोज कुमार, जाय मुखर्जी जितेन्द्र की फिल्में सतही संवेदना और क्षणिक उत्तेजना के सहारे से बाज़ार पर छा गयीं। श्याम बेनेगल आदि की फिल्मों के चर्चित और पुरस्कृत होने के बाद बाजारू फिल्मों को आइना दिखाया गया पर बेशर्म बाज़ार अपना काम करता रहा। अब जरूर ऐसा समय आ गया है कि हर फिल्म में सामंती अवशेषों पर चुटकियां ली जाती हैं, भले ही मुक्का न मारा जाता हो।
जगदीश्वर मिश्रा भी माथे पर तिलक लगाता है पर रिजवी साहब के यहाँ कबाब भी बनाता है तथा शराब पिला कर अपनी रूठी पत्नी को मनाता है। इसके साथ साथ अपने छोटे बच्चे को भी जनेऊ पहनाता है और पेशाब कराते समय उसके कान पर लपेट भी देता है। न्यायाधीश महोदय अपनी मेज पर तुलसी का पौधा रखते हैं और उसमें पानी डालते रहते हैं। उन्हें पता है कि अदालत से बाहर वकील उन्हें टैडी बियर कह कर बुलाते हैं।
न्याय व्यवस्था की कमजोरियों को इसी नाम की पहली फिल्म में दिखाया जा चुका है, और उसमें कुछ भी नया नहीं जोड़ा जा सका है जबकि इससे अधिक तो शाहिद नामक फिल्म अधिक स्पष्ट थी। सच तो यह है कि यह कलात्मक फिल्म के कथानक पर बनी व्यावसायिक फिल्म है। अक्षय कुमार केवल टार्जन जैसी फिल्मों के नायक हैं, उन्हें छलांगें लगाना आता है पर अभिनय नहीं आता। हुमा कुरेशी की भूमिका केवल सौन्दर्य प्रदर्शन के लिए जोड़ी गई लगती है। चींटी की तरह रेंगते न्याय की यात्रा को व्यावसायिक फिल्मों की तरह फास्ट फूड बना दिया है जो इसको यथार्थवादी फिल्म होने से रोकता है। एक लम्पट, लालची और महात्वाकांक्षी वकील का इतनी जल्दी एक्टविस्ट के रूप में बदल जाना भी अस्वाभाविक लगता है। फिल्म के स्वरूप के अनुसार गाने अनावश्यक हैं और मेल नहीं खाते।
व्यावसायिक फिल्मों के बीच यह अपेक्षाकृत एक बेहतर फिल्म है व इसके कथानक में और अच्छी फिल्म हो सकने की सम्भावनाएं थीं। अच्छा रहा कि फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल रही है जिससे सुधार की सम्भावनाएं बची रह गयी हैं। 
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

          

बुधवार, अक्टूबर 30, 2013

फिल्म समीक्षा शाहिद – न्याय के लिए शहीद एक नौजवान राष्ट्रभक्त वकील की सच्ची कहानी

फिल्म समीक्षा
शाहिद – न्याय के लिए शहीद एक नौजवान राष्ट्रभक्त वकील की सच्ची कहानी
वीरेन्द्र जैन

       भोपाल में यह फिल्म केवल माल के मँहगे सिनेमाहालों के कुछ शो तक ही सीमित थी और मैं जब मैंटिनी शो में इसे देखने गया तो फिल्म शुरू होने के समय पूरे सिनेमा हाल में अकेला दर्शक था। बाद में कालेज के छात्र छात्रा के दो जोड़े और आ गये जो सम्भवतयः इस फिल्म को देखने नहीं अपितु कम दर्शकों वाले हाल में साथ बैठने के लिए ही आये थे। यह देश की एक ऎतिहासिक घटना से जुड़ी सच्ची कथा पर आधारित फिल्म है और बिडम्बना यह है कि इस इतनी महत्वपूर्ण घटना पर न तो हमपेशा वकीलों ने सम्वेदनशीलता से ध्यान दिया और न ही हमारी प्रैस और मीडिया ने इसे अपेक्षित स्थान दिया। ऐसी दशा में फिल्म निर्देशक हंशल मेहता ने व्यावसायिक खतरा उठा कर भी इस विषय पर फिल्म बना कर एक बड़ी सामाजिक जिम्मेवारी का काम किया है जिसके लिए उनकी जितनी भी प्रशंसा की जाये वह कम है।
       एडवोकेट शाहिद आजमी की हत्या की खबर प्रतिदिन कई अखबार पढने वाले मेरे जैसे पाठक ने भी एक पत्रिका में लिखे लेख में पढी थी और जब उसके बारे में अपने अनेक वकील मित्रों से बातचीत की तो उनमें से किसी को भी न तो उस घटना की जानकारी ही थी और न ही उनके किसी संगठन ने शाहिद की हत्या का विरोध करते हुए उसके हत्यारों को पकड़ने के लिए कोई अभियान चलाने की कभी कोई जरूरत ही समझी। बाबरी मस्ज़िद को तोड़े जाने के विरोध में मुम्बई में उत्तेजित मुस्लिमों द्वारा किये गये विरोध के बाद उन पर संगठित हिंसक हमले हुए थे। उन हमलों के प्रत्यक्षदर्शी शाहिद के किशोर मन पर गहरा असर हुआ और वह प्रतिरोध में पाक घुसपैठियों द्वारा संचालित आतंकी प्रशिक्षण शिविर में पहुँच गया था किंतु जब वहाँ भी उसने आतंकियों को वैसा ही जुल्म करते देखा तो वह वहाँ से भाग आता है और लौट कर आने पर पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया जाता है। पुलिस के दमन से टूटकर वह उनके द्वारा बताये गये इकबालिया बयान पर दस्तखत कर देता है जिससे उसे सजा हो जाती है। जेल में जहाँ एक ओर कैदियों को आतंकी बनाने वाले कट्टरवादी सक्रिय हैं तो दूसरी ओर व्यवस्था के विरोध का राजनीतिक पाठ पढाने वाले एक्टविस्ट भी सक्रिय हैं। वह कट्टरवादियों के प्रभाव से बच कर एक्टविस्टों के विचारों से प्रभावित होता है जो उसे जेल में न केवल ऎतिहासिक भौतिकवाद ही पढाते ही हैं अपितु वकील बन कर दूसरों को न्याय दिलाने के लिए भी प्रोत्साहित करते हैं। उनकी बातों का उस पर गहरा असर होता है और वह जेल से बाहर निकल कर कानून  की पढाई में जुट जाता है। वकील बन कर वह बेसहारा लोगों की मदद के लिए जुटता है जिसके लिए उसे अपने सीनियर से अलग होकर अपना अलग चैम्बर खोलना पड़ता है।
       इस कठोर सच को प्रैस परिषद के अध्यक्ष बनने के बाद न्यायमूर्ति काटजू ने भी बताया था कि किसी भी आतंकी घटना की जिम्मेवारी किसी अज्ञात केन्द्र की सूचना द्वारा किसी कथित मुस्लिम संगठन द्वारा ले ली जाती है जिसे मीडिया उचाल देता है। पुलिस उसी के सहारे कुछ मुस्लिमों को गिरफ्तार कर दमन से मनवांछित स्वीकार करा के उन्हें जेल में सड़ाती रहती है। इसके दुष्परिणाम यह होते हैं कि असली अपराधी सुरक्षित रहते हैं और बेकसूर और उनके परिवारीजन प्रताड़ित होकर व्यवस्था पर भरोसा खोते जाते हैं। ऐसे लोग भावावेश में ध्रुवीकरण की राजनीति करने वाले साम्प्रदायिक दलों का ही हित साधने का साधन बनते हैं, व इससे बहुसंख्यकों की साम्प्रदायिकता करने वाले दल चुनावी लाभ में रहते हैं। यह शाहिद आज़मी ही था जिसने फीस की चिंता किये बिना ऐसे अनेक निर्दोषों का केस लड़ा और उन्हें ससम्मान मुक्ति दिलायी। इसी कारण से मिली ख्याति के कारण 26/11/08 को हुए मुम्बई हमलों के आरोपियों का केस भी उसके पास आया जिसे उसने इसलिए स्वीकार कर लिया कि उसमें कुछ निर्दोष भारतीय मुसलमानों को आतंकियों का सहयोगी बता कर पुलिस जबरदस्ती फँसा रही थी। शाहिद की पेशागत मेहनत और अकाट्य तर्कों के कारण देश के निर्दोष मुसलमान बाइज्जत बरी हुये व कसाव को फाँसी की सजा मिली। एक वकील के रूप में शाहिद आज़मी न केवल प्रशंसा का ही हकदार था अपितु उसके प्रयासों से देश के अल्पसंख्यकों के मन में न्याय व्यवस्था के प्रति जो भरोसा पैदा हुआ होगा उसका मूल्यांकन भी जरूरी है। किंतु दुर्भाग्य यह है कि उसके इस पवित्र काम के बदले उसे मौत मिली। कुछ अज्ञात लोगों ने देर रात को बुला कर उसे गोली मार दी थी। खेद की बात यह भी रही कि वकीलों के संगठन जो रेल में बिना टिकिट पकड़े गये वकीलों पर की गयी कार्यवाही के खिलाफ रेलवे स्टेशन फूंक देते हैं [जबलपुर 2010] उनमें से किसी ने कभी एक सम्भावनाशील वकील के साथ हुये ऐसे परिणाम के विरोध में कुछ भी नहीं किया और अगर यह फिल्म न बनी होती तो यह घटना तो किसी सामान्य घटना की तरह भुला ही दी गयी होती।
       राष्ट्रभक्ति केवल भारतमाता की जय के नारे या बन्दे मातरम गाने से ही प्रकट नहीं होती है अपितु वे सारे काम जिनसे देश के सारे नागरिकों में देश, संविधान, व संवैधानिक संस्थाओं के प्रति भरोसा पैदा होता हो, राष्ट्रभक्ति की कोटि में आते हैं। शाहिद ने अपनी जान की परवाह किये बिना न्याय दिलाने का काम किया है जिसके लिए वह एक शहीद के गौरव का सच्चा हकदार था। उसकी जीवन गाथा को फिल्म के माध्यम से सामने लाने के लिए हंसल मेहता ने सही काम किया है। हंशल मेहता को इस बात के लिए भी बधाई दी जानी चाहिए कि उन्होंने इस कहानी में बहुत सारे तत्वों को सामने लाने या रेखांकित करने का काम किया है। जिस तरह ‘दिल्ली वैली’ में दिल्ली का, ‘कहानी’ में कोलकाता का, ‘रांझणा’ में बनारस का, ‘शुद्ध देसी रोमांस’ में जयपुर के असली शहर और जीवनशैली का चित्रण है, उसी तरह ‘धोबीघाट’ के बाद ‘शाहिद’ में मुम्बई के घने बसे इलाकों का यथार्थवादी चित्रण है। शाहिद के निम्न मध्यमवर्गीय मुस्लिम परिवार के रहन सहन की कठिन स्थितियां जिनमें बच्चों को पढने के लिए देर रात तक बिजली जलाने की भी सुविधा नहीं है। घने बसे होने और एक स्थान पर सीमित हो जाने के कारण सहजता से साम्प्रदायिक हिंसा का शिकार हो जाना भी प्रदर्शित किया गया है। पुलिस के आम आदमी के साथ व्यवहार और अपराध स्वीकार कराने के लिए किये जाने वाले दमन के दृश्यों के साथ अदालतों द्वारा मुकदमों के लम्बन के कारण निर्दोषों को जेल में रहने की विवशता के दृश्य भी मार्मिक हैं। फिल्म के सारे कलाकारों ने बहुत ही स्वाभाविक अभिनय किया है और कहानी के साथ पूरा न्याय किया है। फिल्म बताती है कि साम्प्रदायिक सोच के लोग ही दुष्प्रचार से प्रभावित हो आरोपियों को अपराधी मान कर उनका मुकदमा लड़ने वाले वकीलों पर हमले नहीं करते, अपितु उनके परिवार के लोग भी घबरा कर उनका साथ छोड़ देते हैं। यह बताता है कि न्याय के पक्ष में लगातार खड़ा होना कितना कठिन होता जा रहा है, और एक साथ कितने स्तरों पर लड़ाइयां लड़ना पड़ती हैं।
       आतंकवाद और कट्टरतावाद से लड़ाई केवल बन्दूक और गोलियों के द्वारा ही नहीं लड़ी जा सकती अपितु उन्हें पैदा करने वाली परिस्थितियों को बदल कर व शीघ्र न्याय से भरोसा दिला कर भी लड़ी जा सकती है। इस सच्ची कथा के नायक की लड़ाई ऐसी ही लड़ाई है जो इसके हत्यारों को सजा दिला कर ही आगे बढाई जा सकती है। ऐसी फिल्मों को न केवल पुरस्कृत व मनोरंजन कर से मुक्त किया जाना चाहिए था अपितु टीवी के लोकप्रिय माध्यमों द्वारा जन जन तक पहुँकाने का काम भी सरकारी स्तर पर किया जाना चाहिए था। 
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629
           


रविवार, मार्च 17, 2013

फिल्म समीक्षा जोल्ली एलएलबी - न्याय व्यवस्था का यथार्थ


फिल्म-समीक्षा
ज़ोल्ली एलएलबी – न्याय व्यवस्था का यथार्थ
वीरेन्द्र जैन

       बेहतरीन कलाकार बोमन ईरानी के कन्धों पर टिकी ‘जोल्ली एलएलबी’ हमें हमारी न्याय व्यवस्था के यथार्थ से साक्षात्कार कराती है। इस फिल्म में एक सच्ची घटना से गूंथ कर कहानी रची गयी है, जो एक अमीरज़ादे द्वारा शराब और पैसे के नशे में मदमत्त होकर फुटपाथ पर सोने के लिए मजबूर मजदूरों पर अपनी नई कार चढा देने और पैसे वाले वकील की मदद से न्याय को अपनी जेब में डाल लेने की गाथा से जोड़ी गयी है। अदालतों में यदा कदा आते जाते रहने वाले जो लोग फिल्मी अदालतों के नकलीपन से परिचित हैं वे इस फिल्म की अदालत, वकीलों की दशा, उनके लटके झटके, आदि को देख कर असली जैसी अदालत जैसे यथार्थसुख की अनुभूति पा सकते हैं। अदालतों के अहाते में बैठकर मक्खी मारने वाले वकील हैं जो अपने पुराने जमाने के टाइपराइटर को अपने साइन बोर्ड से ढककर उस पर ताला लगा कर जाते हैं। वे मुवक्किल को पटाने के लिए हस्तरेखा विशेषज्ञ भी बनते हैं, और कान से मैल निकालने वालों की तरह एक एक व्यक्ति में ग्राहक की सम्भावना तलाशते हैं,तथा पार्टटाइम में किसी आर्केस्ट्रा में गाना भी गाते हैं। एक निरीह सी अदालत है जो मौसम की मार से ही परेशान नहीं है अपितु न्यायव्यवस्था से भी परेशान है जिसमें ढेरों केस लटक रहे हैं।  राजधानी का एक बहुत बड़ा वकील कहता है कि नये वकील जल्दबाजी में बहुत हैं जबकि अदालत में जल्दी कुछ नहीं होता। न्यायाधीश कहता है कि न्याय अन्धा होता है पर न्यायाधीश नहीं और दूसरी ओर उसकी व्यथा यह भी है कि जिस मामले में वह व पूरा परिवेश पहले दिन से जानता है कि दोषी कौन है, उसे गवाहों सबूतों के अभाव में वर्षों बाद तक सजा नहीं दे पाता। बड़े वकील का खौफ ही अदालत का पलड़ा झुका देता है तो दूसरी ओर उनकी द्वारा उपलब्ध करायी गयी सुविधाएं भी न्यायाधीश को डगमग कर सकती हैं। बड़ा वकील अपने धनी ग्राहक से कहता है कि उसे दी गयी राशि में से उसे कुछ और भी मैनेज करना होता है। पैसेवाले लोगों के फँस जाने पर उसका अपना वकील भी उससे और रुपया ऎंठने के लिए उसके विरोध में नकली गवाह भी पैदा कर देता है व प्रतिपक्ष के वकील को भी मिलाने का काम करता है। वकील के पैसे से न मानने पर उसे पिटवाया भी जाता है। पुलिस के लोग पैसे के लालच में कार दुर्घटना को ट्रक दुर्घटना में बदल देते हैं और ज़िन्दा को भी मुर्दा बता देते हैं। सबकुछ मिला कर पूरी फिल्म न्याय व्यवस्था का कच्चा चिट्ठा खोलती है। यह फिल्म यह भी बताती है कि आजकल वकालत का पेशा शिक्षित लोगों के बीच अंतिम शेष पेशे में से एक है और शेष सभी जगह से निराश हो चुके लोग ही इसमें आ रहे हैं जिनकी शिक्षा का स्तर यह है कि वे प्रोसीक्यूशन को प्रोस्टीट्यूशन लिखते हैं।
 एक ओर तो यह फिल्म आदर्शवादी है वहीं दूसरी ओर कहानी को आगे बढाने के लिए बहुत सारे नकली आदर्शों और संयोगों का सहारा लिया गया है। मेरठ से आने वाले वकील, अर्थात फिल्म के नायक को दिल्ली में बड़े वकील से बदला लेने को उतारू एक कैंटीन संचालक, मुफ्त में चेम्बर दे देता है क्योंकि यही बड़ा वकील उसकी बेटी के खिलाफ हुए अपराध के अपराधियों को बचा चुका है। पुलिस के डर से बिहार भाग गया गवाह नायक के कहने भर से वापिस दिल्ली लौट आता है और निर्भय होकर गवाही देता है। एक पुलिस इंस्पेक्टर को बड़ा वकील उसकी भूल के लिए स्वयं पीटता है और वह घरेलू पत्नी की तरह पिटता रहता है। नायक की प्रेमिका/पत्नी भी भिन्न प्रकृति  की आदर्शवादी है जो अभावों में रहते हुए भी अपने पति को ईमानदारी से भटकने पर लताड़ लगाती है और बीस लाख रुपयों के सम्भावनाओं को ठुकरा देने के लिए प्रेरित करती है।
कुल मिलाकर अपनी हास्य भूमिकाओं के लिए प्रसिद्ध बोमन ईरानी, अरशद वारिसी और सौरभ शुक्ला के अभिनय से ओतप्रोत यह सुखांत फिल्म देखने लायक है, जिसे ‘नो वन किल्लिड जेसिका’ की अगली कड़ी कहा जा सकता है। इस फिल्म को न्याय व्यवस्था से जुड़े लोगों को दिखाये जाने की विशेष व्यवस्था होना चाहिए।
वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, दिसंबर 31, 2012

असली दोषी का सुधार कौन करेगा!


असली दोषी का सुधार कौन करेगा?
वीरेन्द्र जैन

       दिल्ली की बस में गैंग रेप की शिकार युवती की मृत्यु के बाद भड़की जनभावनाओं को देखते न्याय व्यवस्था द्वारा उस पर हमला करने वालों को जल्दी से जल्दी कानून सम्मत कठोरतम सजा देने का दायित्व बनता है। भले ही फाँसी की सजा से मृतक की वापिसी नहीं होती किंतु कठोर सजा से समाज में वह माहौल बनता है जिसके डर से दूसरा कोई वैसा अपराध करने से पहले कुछ क्षण सोचने को विवश हो सकता है। किसी एक मामले में दी गयी सजा उस पीड़ित को न्याय देने तक ही सीमित नहीं रहती अपितु वह सम्भावित अपराधों को रोकने का भी काम करती है। पर जब न्याय व्यवस्था इस या उस कारण से लम्बे समय तक आरोपियों को सजा नहीं दे पाती तो वह अपराधों को बढाने के लिए भी जिम्मेदार होती है। उल्लेखनीय है कि जब सराकारी और गैरसरकारी लोग इस मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की माँग कर रहे थे तब वे देर से न्याय मिलने के दोष पर भी परोक्ष में टिप्पणी कर रहे थे जिसमें न्याय को अन्याय के समकक्ष रख दिया जाता है। किसी लोकतांत्रिक समाज में बढती हिंसा उस समाज में न्याय व्यवस्था के कमजोर होने का प्रतीक भी होती है।
       संवैधानिक न्याय के समानांतर सामाजिक न्याय भी चलता है और कई बार वह संवैधानिक न्याय से भिन्न अधिक कठोर या कमजोर होता है। हमारे समाज में स्त्रियों के खिलाफ होने वाले अपराधों में संवैधानिक न्याय और सामाजिक न्याय में बहुत भेद हैं। जहाँ किसी भी वालिग स्त्री या पुरुष को बिना जाति, धर्म, गोत्र, या भाषा पर विचार किये [शादी की तय उम्र पर] विवाह करने का अधिकार है वहीं समाज में विधर्मी से, दूसरी जाति वाले से ही नहीं अपितु अपने गोत्र में विवाह करने पर भी हजारों सम्भावनाशील नौजवानों, नवयुवतियों की हत्याएं प्रति दिन हो रही हैं और इन हत्यारों को सजा देने के लिए कोई फास्ट ट्रैक कोर्ट नहीं बनाये जा रहे। मैं पिछले कुछ वर्षों से हिन्दी भाषी क्षेत्र में हुयी इन हत्याओं का रिकार्ड रख रहा हूं और पाता हूं कि कोई सप्ताह ऐसा नहीं जाता जब किसी न किसी आनर किलिंग का समाचार सामने न आये। इन प्रकरणों में भी घर की बेटी बहिन को अधिक सरलता से मार देने की घटनाएं ज्यादा घट रही हैं। बिडम्बनापूर्ण यह है कि वोटों के चक्कर में इन हत्यारों की खिलाफत करने का काम राजनेता या राजनीतिक दल नहीं कर रहे हैं क्योंकि इन हत्यारों को अपने जाति समाज का समर्थन प्राप्त है।    
       नारी के खिलाफ यौन अपराधों के पीछे सबसे बड़ा दोष हमारी सामाजिक सोच का है जिसके अनुसार अपराध से पीड़ित महिला के साथ सहानिभूति की जगह लोग उसी को दोषी ही नहीं अपितु चरित्रहीन भी समझते हैं और वह सामाजिक उपहास का पात्र भी बनती है। यही कारण होता है कि पीड़ित महिलाएं इन अपराधों को छुपाने का प्रयास करती हैं और अपराधी समाज में सम्मानित घूमते हैं। घर परिवार के कमजोर लोग भी अपना गुस्सा महिला पर ही उतारते हैं क्योंकि समाज में उक्त अपराध के लिए उस परिवार को भी जिम्मेवार माना जाता है जो अपने घर की महिलाओं को स्वतंत्रता पूर्वक विचरण करने की अनुमति देते हैं। सामाजिक मान्यता यह है कि महिलाओं को पुरुष या घर के नियंत्रण में रहना चाहिए और कम से कम बाहर निकलना चाहिए। पर्दा और घूंघट प्रथा ही नहीं अपितु अभिजात्य वर्ग में ‘असूर्यपश्या’ [जिसको सूरज भी नहीं देख सके] होना ही उसकी सुरक्षा का आधार माना गया था। बिडम्बना पूर्ण स्थिति यह है कि कुल अपराध का बहुत कम हिस्सा ही सामने आ पाता है जिससे अपराधियों के हौसले बुलन्द होते रहते हैं। मजदूर जातियों और वर्गों की महिलाओं को अपने जीवन यापन के लिए बाहर निकलने की मजबूरी रही है जिससे सबसे अधिक यौन अपराध उन्हीं जातियों की महिलाओं के खिलाफ होते रहे हैं जो प्रयास करने के बाद भी उच्च वर्ग और वर्ण के खिलाफ न्याय भी पा सकने में समर्थ नहीं हो पातीं। यदि कोई अविवाहित लड़की  बलात्कार की शिकार हो जाती है तो यौन शुचिता को विवाह की शर्त मानने वाले हमारे समाज का कोई भी व्यक्ति उससे विवाह करने के लिए तैयार नहीं होता और न ही उसके परिवार के लोग उस लड़की को बहू बनाने के लिए तैयार होते हैं। यही कारण है कि कुँवारी लड़कियों के खिलाफ सबसे अधिक यौन अपराध होते हैं और उन्हें ही सबसे अधिक छुपाया जाता है। इसलिए यौन अपराधों के खिलाफ कोई भी कानूनी मुहिम शुरू करने के साथ साथ जरूरी है कि समाज में कुछ धारणाओं को बदलने का अभियान चलाया जाये। यौन अपराधों के खिलाफ आगे आने वाले पुरुषों को बड़े स्तर पर यह घोषित करना होगा कि वे स्वयं या परिवार में ऐसी किसी लड़की को विवाह के लिए अपात्र नहीं समझेंगे जिसके खिलाफ कभी यौन अपराध हुआ हो। समाज में प्रतिष्ठित महिलाओं समेत उन सारी महिलाओं को इस बात के लिए प्रेरित करना होगा कि उनके जीवन में जब भी कोई किसी भी तरह के यौन अपराध का प्रयास हुआ हो तो वे उसका खुलासा करें ताकि निर्दोष पीड़िताएं किसी हीन भावना का शिकार न हो सकें। बंगलादेश की प्रसिद्ध लेखिका तस्लीमा नसरीन ने अपने लेखन में इस तरह का प्रयास किया है और समाज के कुछ जाने माने लोगों के चेहरों की असलियत को उजागर किया है। पिछले दिनों विख्यात पत्रिका हंस में भी कुछ लेखिकाओं ने आत्मस्वीकार श्रंखला के अंतर्गत हमारे दोहरे समाज की सच्चाईयों को सामने लाने का प्रयास किया था। जब से सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी बढी है तब से उनका घर से निकलना भी जरूरी हुआ है और स्वतंत्र महिला को घरेलू महिला की तरह सम्मान की दृष्टि से न देखने वाला समाज उनके घर से बाहर निकलने को उनकी कमजोरी समझ कर आक्रामक हो जाता रहा है। इस सोच में अपेक्षित बदलाव की गति बहुत धीमी है।
       परिवार नियोजन के संसाधन विकसित होने के बाद यौन सम्बन्धों के बहुत से नये आयाम सामने आये हैं, क्योंकि यौन सम्बन्धों से गर्भधारण का परिणाम स्वैच्छिक हो गया है। यही कारण है कि बिना विवाह के यौन सम्बन्धों में बढोत्तरी हुयी है और लिव इन रिलेशन जैसे नये तरह के सम्बन्धों को कानूनी मान्यताएं मिली हैं भले ही समाज ने अभी उन्हें पूरी तरह से मान्यता न दी हो। इस मामले में स्वाभाविक रूप से पुरुषों द्वारा ही प्रस्ताव किये जाते रहे हैं और नारी के मौन को या कमजोर इंकार को उसकी स्वीकृति माना जाता रहा है। परिवर्तन के दौर में समाज कई स्तरों पर काम करता है और नारी के इंकार के बारे में भ्रम होना सहज सम्भव है। इसे ठीक से न समझने वाले लोग भी इंकार को लज्जा समझ कर ज्याद्ती कर जाते हैं। अधिक खुले समाज की समझ में भी अब यह बात आ जानी चाहिए कि नारी के इंकार का मतलब इंकार ही है। 
       जो राजनीति पूरे तंत्र पर नियंत्रण करती है उसका एक बड़ा हिस्सा सिद्धांतहीन होकर उसे सत्ता, सम्पत्ति पाने का साधन बना बैठा है। यौन अपराधों के बड़े बड़े मामले इसी क्षेत्र में घटित हो रहे हैं जिनमें से अनेक तो सार्वजनिक हो चुके हैं जब कि दबावों में अधिकांश सामने नहीं आ पाते। कैसी बिडम्बना है कि जो लोग स्वयं ही शपथ पत्र देकर कह रहे हैं कि उन पर यौन अपराधों के प्रकरण दर्ज हैं उनको भी राजनीतिक दल संसद या विधान सभा के लिए टिकिट दे रहे हैं। पिछले दिनों सांसदों और विधायकों की ऐसी सूची मीडिया में सामने आयी है पर बड़े बड़े वक्तव्य देने वाले किसी भी राजनीतिक दल ने अपने ऐसे सदस्यों से स्तीफा नहीं माँगना तो दूर उनके लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट में प्रकरण चलाने की माँग भी नहीं की है।
       कानूनी परिवर्तन के साथ सामाजिक परिवर्तनों का बीड़ा उठाना भी बहुत जरूरी है और उसके लिए वे ही व्यक्ति या संस्थाएं आगे आ सकती हैं जिनका समाज में कुछ प्रभाव है। जिन युवाओं ने आगे आकर इस घटना पर अपने गुस्से की अभिव्यक्ति दी है उन्हीं पर यह जिम्मेवारी भी आती है कि वे सामाजिक परिवर्तन के लिए भी पहल करें। स्मरणीय है कि अपने अछूतोद्धार और साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए ही गान्धीजी पुरातनपंथियों की नफरत के शिकार बने थे और उन्हें अपनी जान गँवानी पड़ी थी। उनकी मूर्ति लगाने वालों ने उनके आदर्शों और कामों को छोड़ दिया है जबकि सच यह है कि बिना सामाजिक परिवर्तन के समानांतर कोई भी राजनीतिक परिवर्तन सफल नहीं हो सकता। देखना होगा कि समाज के दोषों में सुधार लाने का बीड़ा कौन उठाता है!
वीरेन्द्र जैन
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