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मंगलवार, नवंबर 07, 2017

गैंग रेप, समस्याओं की जड़ों तक जाने की जरूरत

गैंग रेप, समस्याओं की जड़ों तक जाने की जरूरत
वीरेन्द्र जैन
भोपाल की राजधानी के मध्य में सबसे प्रमुख स्थान के निकट एक 19 वर्षीय छात्रा के साथ गेंग रेप हुआ। उल्लेखनीय यह भी है कि छात्रा जिस पद के लिए कोचिंग कर रही थी उसमें सफल होने पर वह राज्य प्रशासनिक सेवा और भविष्य में आईएएस तक भी पहुँच सकती थी। उल्लेखनीय यह भी है कि पीड़िता के माँ बाप दोनों ही पुलिस की नौकरी में हैं और फिर भी उन्हें रिपोर्ट तक लिखाने में लम्बा समय लग गया व उन्हें उस आधार पर झुलाया जाता रहा जिसके बारे में अनेक बार स्पष्ट किया जा चुका है कि थाने के क्षेत्र के चक्कर में न पड़ कर रिपोर्ट को तुरंत लिखा जाना चाहिए।
अब यह घटना कोई अनोखी घटना नहीं है क्योंकि यह आये दिन की बात हो गयी है। यह ठीक है कि मध्य प्रदेश इस तरह के अपराधों के मामले में बहुत आगे है किंतु दूसरे राज्य भी बहुत पीछे नहीं है, और यह बात किसी प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं होना चाहिए। हर घटना के बाद कुछ राजनीतिक आलोचनाएं और प्रदर्शन हो जाते हैं तथा कुछ समय के लिए कुछ प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों का निलम्बन हो जाता है जिन्हें जनता की याद्दाश्त की सीमा समाप्त होने के बाद रद्द कर दिया जाता है। यही सब कुछ इस मामले में भी हो रहा है। खेद है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए न तो समस्या की जड़ों तक पहुँचने का कोई प्रयास होता है और न ही किसी स्थायी समाधान की ओर ही बढा जा रहा है।
वोटों की राजनीति ने जो तुष्टीकरण की कूटनीति अपनायी है उसमें आम जनता के हिस्से में कोरे वादे आये हैं जबकि हर तरह के कानून भंजकों को सरकारी संरक्षण और मदद मिलने लगी है। देशभक्ति का ढंढोरा पीटने वाली पार्टी चन्दे के लिए व भीड़ जुटाने के लिए देशद्रोहियों को अच्छे अच्छे पद दे देती है और वे सरकार के मंत्रियों के साथ मंचों पर गलबहियां डाल कर फोटो खिंचवाते हैं जिससे पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी दबाव में आ जाते हैं। अभी तक किसी भी राजनीतिक दल ने अपने उन नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की है जिनकी लापरवाहियों के कारण अपराधी पार्टी में आते हैं और संरक्षण पाते रहे हैं। दो एक वामपंथी पार्टियों को छोड़ कर किसी भी प्रमुख पार्टी में प्रवेश के लिए कोई छलनी नहीं है और जो ज्यादा से ज्यादा संसाधन उपलब्ध करा सकता है वह स्वयं या अपने किसी व्यक्ति के माध्यम से पार्टी, सरकार, और देश के संसाधनों पर अधिकार करने में लग जाता है। इस तरह एक दुष्चक्र का निर्माण होता है जिससे राष्ट्रीय संसाधन व्यक्तियों और पार्टियों के संसाधनों में बदलते जाते हैं। क्या कारण है कि किसी भी पार्टी में आदर्श आचार संहिता के आधार पर सदस्यों की समीक्षा नहीं होती और इस आधार पर पार्टी से निकाले जाने की घटनाएं नहीं सुनी जातीं। पार्टी से तब निकाला जाता है जब कोई सदस्य दूसरी पार्टी में जा चुका होता है। पार्टी का टिकिट देने में जब किसी सदस्य की पार्टी में वरिष्ठता पर ध्यान नहीं दिया जाता व दो दिन पहले दल बदल कर आये हुए व्यक्ति को टिकिट दे दिया जाता है तो उस दल की आदर्श आचार संहिता पर निगाह डालने का तो सवाल ही नहीं उठता। एक पुलिस अधिकारी ने बताया था कि लगभग प्रत्येक अपराध में आरोपी को पकड़ने पर राजनेताओं के सिफारिशी फोन जरूर आते हैं जिनमें से कुछ तो ऐसे होते हैं जिन पर विचार करना ही पड़ता है। जिस दिन उपरोक्त घटना घटी उसी दिन के अखबार में खबर है कि बड़े अधिकारियों के आदेश पर जब भोपाल के ढाबों पर शराब पीने वालों पर दबिश दी गयी तो पकड़ में आये 27 लोगों के पक्ष में लगातार फोन आते गये कि एक एक करके अंततः सब को छोड़ देनी पड़ा। भोपाल में ही हेल्मेट चैकिंग के दौरान रोके गये एक व्यक्ति ने सम्बन्धित इंस्पेक्टर की बात मुख्यमंत्री के पिता से करायी व इंस्पेक्टर ने हाथ जोड़ कर उसे छोड़ दिया। यह खबर भी अखबारों में छप गयी थी। वैसे तो सार्वजनिक जीवन में आये प्रत्येक व्यक्ति को व अधिकारी को संविधान की शपथ लेनी चाहिए किंतु सरकार में बैठा प्रत्येक व्यक्ति जो संविधान की शपथ ले चुका है, अगर किसी कानून तोड़ने वाले के लिए सिफारिश करता है तो वह तो सीधा सीधा अपराध में भागीदारी करके शपथ का उल्लंघन कर रहा होता है।
न्याय का दायित्व होना चाहिए कि या तो वह अपराधी को सजा दे या अपराधी को सजा न दिला पाने वाली व्यवस्था के कारिन्दों को सजा दे क्योंकि आमजन व्यवस्था कायम रखने के लिए भरपूर भुगतान कर रहा है। खेद की बात है कि बहुत सारे मामले न केवल लम्बे समय तक अनिर्णीत पड़े रहते हैं अपितु बिना किसी को सजा दिये हुए समाप्त भी कर दिये जाते हैं। यह दशा कानून का भय समाप्त करती है और अपराधियों को निर्भय होकर मनमानी करने की प्रेरणा देती है। जो लोग पहले से ही सामंती सोच के कारण स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझते हैं वे दूसरों को कमतर इंसान मान कर व्यवहार करते हैं। सत्ता की ताकत या संरक्षण उन्हें और अधिक निर्मम बना देता है। बलात्कार और हिंसा इसी का परिणाम है।
यौन अपराधों के अधिकतर मामले बदनामी के डर से सामने नहीं आने पाते क्योंकि समाज पीड़िता को न केवल कमजोर व जिम्मेवार मानकर व्यवहार करती है अपितु हेय दृष्टि से देखती है। इसके लिए बड़े सामाजिक आन्दोलन की जरूरत है जिसमें पूरा समाज एक साथ उठ खड़े हो कर अपने साथ हुए अपराध की स्वीकरोक्ति करते हुए पीड़ितों के साथ हो व आपस में हमदर्दी प्रकट करे। गाँधीजी के बाद ऐसे प्रयोग बन्द हो चुके हैं।  अपराधियों के खिलाफ खड़े होने के लिए अकेले व्यक्ति की कमजोरी को स्वीकारना जरूरी होता है और पीड़ितों की एकता बनाने का आवाहन होना चाहिए। पीड़िता को दोषी मानना अपने आप में अपराध घोषित होना चाहिए।
अपराधों की रिपोर्ट दर्ज न करके अपना रिकार्ड ठीक करना भी समाज के खिलाफ पुलिस का अपराध है जिसे करने के लिए देश के बड़े बड़े पुलिस अधिकारी अपने थानेदारों को प्रेरित करते हैं। किसी क्षेत्र में अपराधों की संख्या का अधिक होना पुलिस अधिकारियों की जिम्मेवारी नहीं होना चाहिए अपितु अपराधियों को पकड़ना और सजा दिलाने के आधार पर उनका कार्य मूल्यांकन होना चाहिए, जिसके अभाव में रिपोर्ट न लिख व सच को छुपा कर बड़ा अपराध किया जा रहा है।
कानून के शासन का अभाव जंगली न्याय की ओर अग्रसर करता है जिसकी ओर बढते जाने के संकेत उक्त घटनाओं में हो रही वृद्धि से मिलने लगे हैं।  देखना होगा कि निर्भया कांड की तरह घटनाएं व्यवस्था को किस बदलाव की प्रेरणा दे पाती हैं।          
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023 [मो. 09425674629] 

मंगलवार, जनवरी 15, 2013

कानून के ढांचे में सुधार के साथ पालन भी सुनिश्चित कराना जरूरी


कानून के ढाँचे में सुधार के साथ पालन भी सुनिश्चित करना जरूरी 



वीरेन्द्र जैन
                प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने प्रवासी भारतीय दिवस का उद्घाटन करते हुए गत 8 जनवरी को कोचीन में कहा कि जनता की उम्मीदों को पूरा करने के लिए कानूनी ढांचे में सुधार करना होगा। ऐसा कहते हुए वे परोक्ष में अपने समय के कानूनी ढाँचे की सीमाओं के संकेत दे रहे थे कि इन सीमाओं के अंतर्गत काम करते हुए सरकार/ सरकारें वे सारे काम नहीं कर पा रही हैं जिन्हें  वे जनता के हित में करना जरूरी समझती हैं। तय है कि प्रधानमंत्री की यह टिप्पणी दिल्ली में हाल ही में हुए गैंग रेप या भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल की स्थापना को लेकर पिछले साल हुए आन्दोलनों की पृष्ठभूमि में आयी है।

       स्मरणीय है कि कानूनी ढाँचे में परिवर्तन करने की लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक तयशुदा प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत संसद के कम से कम तीन चौथाई सदस्यों की सहमति जरूरी होती है। इसके विपरीत हाल यह है कि पिछले बीस वर्षों से देश में गठबन्धन सरकारें चल रही हैं और गठबन्धन के सबसे बड़े दल को भी कानूनों का पालन कराने या जनहित में वांछित परिवर्तन करने के लिए छोटे छोटे व्यक्तिवादी दलों की चिरौरी करनी पड़ती है। यही कारण है कि सीएजी की रिपोर्ट के आधार पर बड़े भ्रष्टाचार की सम्भावनाएं व्यक्त किये जाने से बने माहौल पर प्रधानमंत्री को प्रैस कांफ्रेंस बुला कर कहना पड़ा था कि गठबन्धन की कुछ मजबूरियां होती हैं। स्मरणीय है कि डीएमके के दबाव में ही संचार मंत्री का पद ए.राजा को देना पड़ा था। 2004 के चुनावों में सत्ता से बाहर किये जाने के बाद भाजपा लगातार इतने फ्रस्ट्रेशन में रही है कि उसने तब से इस या उस बहाने लगातार संसद की कार्यवाही को ठप्प करने में ही रुचि ली है और कोई भी सत्र ठीक से नहीं चलने दिया। सवाल है कि जब तक दल सदन को ठीक से  चलाने के प्रति गम्भीर नहीं होंगे तब तक कानूनी ढाँचे में सुधार कैसे सम्भव है?
       शायद यह हमारी प्रणाली की मजबूरी है कि देश के कुल मतदाताओं में से पचास से साठ प्रतिशत ही मतदान करते हैं और बहुदलीय प्रणाली में उसमें से भी जो पैंतीस से चालीस प्रतिशत के बीच मत प्राप्त कर लेता है वह सरकार का नेतृत्व करने का पात्र बन जाता है। बिडम्बना यह है कि इस तरह से कुल मतदाताओं के 18% से 20% प्रतिशत तक मत प्राप्त कर लेने वाला ही सत्तारूढ हो जाता है, और शेष सब या तो निष्क्रय रहते हैं या उसका विरोध करते रहते हैं। परिणाम यह होता है कि सरकार के किसी भी काम की निष्पक्ष समीक्षा नहीं हो पाती चाहे वह जनहितैषी हो या जनविरोधी हो। सत्तारूढ पक्ष सदा जनता के हित में काम करने का दवा करता है पर कभी भी किसी काम के लिए विरोधी पक्ष द्वारा सरकार की प्रशंसा एक दुर्लभ वस्तु हो गयी है। इस तरह जनहित के सारे कामों को भी अवरोधों से गुजरना पड़ता है
       नया कानून तो क्या, पूर्व से ही बने बनाये नियमों कानूनों का पालन करना भी सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है। विरोध पक्ष का काम केवल विरोध करना हो जाता है और वे कानून के पालन कराने में भी गलत हस्तक्षेप करते रहते हैं। बिना हेल्मेट चलने वाली सवारी का चालान न बनाने के लिए भी नेताओं का फोन आता है, जबकि ऐसे नेताओं पर तो कार्यावाही होना चाहिए। दिल्ली जैसी राजधानी में हम अभी तक टू-सीटर वालों को मीटर से चलने के लिए अनुशासित नहीं कर पाये हैं और न ही उन्हें ड्रैस में रहने को जरूरी बना पाये हैं। बहुमंजिला इमारतों में बेसमेंट की अनुमति पार्किंग के लिए दी जाती है पर पूरे देश में अधिकतर व्यावसायिक स्थानों पर बेसमेंट में स्टोर या दुकानें खुली हुयी हैं और एकाध दिन की दिखावटी कार्यवाही के बाद वे फिर से वहीं की वहीं बनी रहती हैं। आवासीय कालोनियां व्यावसायिक में बदल दी गयी हैं, नगर निगम से अनुमति के बिना अतिरिक्त ऊपरी मंजिलें बना ली गयी हैं पर वोट बैंक की राजनीति नियमों के ऐसे उल्लंघनकर्ताओं के घर गिरवी रहती है। सत्तारूढ दल को डर रहता है कि कहीं विपक्ष इसका लाभ उठाकर उनकी जमीन ही न खिसका दे, इसलिए वे चुप रहते हैं। ट्रैफिक नियमों को तो कोई मानता ही नहीं है और जो भी मान रहे हैं वे ट्रैफिक की सुरक्षा के लिए नहीं अपितु अपनी सुरक्षा के लिए, उसी हद तक मान रहे हैं। पुलिस थानों में राज्य के सत्तारूढ दल का कानून चलता है। कई राज्यों में तो दल विशेष या जाति विशेष के नेता से अनुमति लेकर ही रिपोर्ट लिखे जाने के निर्देश हैं। इसलिए नये कानून बनाने के साथ साथ बने हुए कानूनों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए राजनीतिक सहमति की भी जरूरत है।
       सामाजिक सुधारों के लिए बने कानूनों का तो बहुत ही बुरा हाल है, बाल-विवाह व सती प्रथा जैसी हत्यारी प्रथाएं तक जारी हैं और उनके महिमा मंडन में भाजपा की राजमाता और राजस्थान के जनता दल के वरिष्ठ नेता तक जलूस में निकलते हैं। गाँवों में जहाँ व्यक्ति की पहचान बनी हुयी है वहाँ अनेक कानूनों के बाद भी वे अपनी जाति और उसके जातिवादी स्तर से ही पहचाने जाते हैं। भ्रष्टाचार के मूल कारणों में गिनी जाने वाली दहेज प्रथा और मृत्युभोज धड़ल्ले से चल रही हैं। एकाध बामपंथी दल को छोड़ कर किसी भी राजनीतिक दल ने अपने सदस्यों के लिए कोई सामाजिक आचार संहिता नहीं बनायी है और अगर किसी ने कहीं कागजों पर बना भी ली हो तो समर्थन की चिंता में वे उसके परिपालन के प्रति कतई गम्भीर नहीं हैं। दलों में भर्ती करते समय सदस्य का केवल राजनीतिक लाभ ही अनुमान किया जाता है उसके चरित्र का चिट्ठा नहीं देखा जाता। सभी दलों में आज ऐसे सदस्यों की समुचित संख्या है जिन्होंने चुनाव में प्रत्याशी बनते समय दिये जाने वाले अपने शपथ पत्र में चल रहे गम्भीर अपराधों के आरोपों का खुलासा किया है। पर इनमें से कई टिकिट भी पा चुके हैं और जनप्रतिनिधि भी बन चुके हैं। जब ऐसे राजनीतिक दल निर्बल वर्ग के सशक्तिकरण के लिए कोई कानून या योजना बनाते हैं तो वह हाथी के दाँतों की तरह दिखावटी ही होता है, इससे किसी का भी भला नहीं होने वाला ।
       हमारी न्यायव्यवस्था दो वकीलों की वाद विवाद प्रतियोगिता का फैसला भर करती है, वह स्वाभाविक न्याय के प्रति चिंतित नहीं है। उज्जैन के सभ्भरवाल प्रकरण को न्याय की प्रत्याशा में राज्य से बाहर ले जाया गया पर अभियोजन तो राज्य का ही था और सम्बन्धित न्यायाधीश ने न्यायव्यवस्था के अनुरूप फैसला देते हुए कहा कि गवाह बदल चुके थे और अभियोजन अपना पक्ष रखने में कमजोर रहा। बहुत सारे आपराधिक मामलों में किसी को सजा नहीं मिलती। इसी न्याय व्यवस्था पर टिप्पणी करती हुयी पिछले दिनों सच्ची घटना पर एक फिल्म आयी थी जिसमें सैकड़ों लोगों के सामने हुयी हत्या में गवाहों के मुकर जाने से प्रभावशाली परिवार का आरोपी छूट जाता है तो फिल्मकार उस फिल्म का नाम देता है ‘नो वन किल्ड जेसिका[ मृतका]’ । सच तो यह है कि ऐसे मामलों में सम्बन्धित पुलिस अधिकारियों, गवाहों और अभियोजन पर जिम्मेवारी डाली जाना चाहिए। अगर अपराध हुआ है और अपराधी को सजा नहीं मिली है तो कानून व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों को ही किसी हद तक जिम्मेवार होना चाहिए। नये कानून बनाने के साथ साथ न्याय को बिलम्वित करने के लिए जिम्मेवार वादी- प्रतिवादी, वकील, गवाह, पुलिस की जिम्मेवारी तय की जानी चाहिए और न्यायिक प्रक्रिया में जानबूझ कर देर करने वालों के प्रति अदालत का रुख कठोर होना सुनिश्चित किया जाना चाहिए। कानून का गलत स्तेमाल करते हुए झूठा आरोप लगाने वालों पर आरोप के बराबर दण्ड दिया जाना भी निश्चित किया जाना जरूरी है क्योंकि दहेज जैसे कानूनों के नब्बे प्रतिशत मामले झूठे पाये गये हैं। यही हाल दलित महिलाओं के प्रति दर्ज किये गये यौन अपराधों का भी है, जो घटित तो बहुत अधिक संख्या में होते हैं पर दर्ज होने वाले ज्यादातर झूठे व स्थानीय राजनीतिक बदले की भावना से प्रभावित होते हैं। अदालतों द्वारा अँधाधुंध स्टे देना भी अपराधियों को लाभ पहुँचाता है, अनेक सार्वजनिक कार्य और योजनाएं इसी कारण से लम्बित होकर अपना बज़ट कई गुना बढा चुकी हैं। जिस विकल्पहीन जगह पर कोई सार्वजनिक हित का निर्माण होना होता है तो फिर केवल मुआवजे की राशि ही विवादित रहती है। होना तो यह चाहिए कि उसमें सरकारी नियम से तुरंत भुगतान करने के बाद अतिरिक्त दावा राशि का भुगतान तय समय में हल करने के निर्देश दिये जा सकते हैं, इसलिए स्टे की कोई जरूरत ही नहीं रह जायेगी, और योजना बजट में ही आगे बढेगी।      
       सच तो यह है कि सभी राजनीतिक दलों को कानून व्यवस्था से लाभ उठाने की प्रवृत्ति को बदलना पड़ेगा और देश की विदेश व रक्षा नीति पर मतैक्य की तरह मतैक्य बनाना पड़ेगा क्योंकि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था और देश की रक्षा का सवाल है। अपराधों व अपराधियों को राजनीति से बाहर करने के प्रति सभी दलों को कमर कसनी होगी व देश के भले के लिए राजनीतिक नुकसानों का खतरा उठाने को तैयार होना पड़ेगा। किसी राजनेता पर आपराधिक आरोप लगने के बाद यदि उसका दल निष्कासित कर देता है तो दूसरे दल का सदस्य बनने पर प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए। ऐसी सहमतियां राजनीतिक दलों की देश के प्रति सच्ची सेवा होगी।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629

सोमवार, दिसंबर 31, 2012

असली दोषी का सुधार कौन करेगा!


असली दोषी का सुधार कौन करेगा?
वीरेन्द्र जैन

       दिल्ली की बस में गैंग रेप की शिकार युवती की मृत्यु के बाद भड़की जनभावनाओं को देखते न्याय व्यवस्था द्वारा उस पर हमला करने वालों को जल्दी से जल्दी कानून सम्मत कठोरतम सजा देने का दायित्व बनता है। भले ही फाँसी की सजा से मृतक की वापिसी नहीं होती किंतु कठोर सजा से समाज में वह माहौल बनता है जिसके डर से दूसरा कोई वैसा अपराध करने से पहले कुछ क्षण सोचने को विवश हो सकता है। किसी एक मामले में दी गयी सजा उस पीड़ित को न्याय देने तक ही सीमित नहीं रहती अपितु वह सम्भावित अपराधों को रोकने का भी काम करती है। पर जब न्याय व्यवस्था इस या उस कारण से लम्बे समय तक आरोपियों को सजा नहीं दे पाती तो वह अपराधों को बढाने के लिए भी जिम्मेदार होती है। उल्लेखनीय है कि जब सराकारी और गैरसरकारी लोग इस मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की माँग कर रहे थे तब वे देर से न्याय मिलने के दोष पर भी परोक्ष में टिप्पणी कर रहे थे जिसमें न्याय को अन्याय के समकक्ष रख दिया जाता है। किसी लोकतांत्रिक समाज में बढती हिंसा उस समाज में न्याय व्यवस्था के कमजोर होने का प्रतीक भी होती है।
       संवैधानिक न्याय के समानांतर सामाजिक न्याय भी चलता है और कई बार वह संवैधानिक न्याय से भिन्न अधिक कठोर या कमजोर होता है। हमारे समाज में स्त्रियों के खिलाफ होने वाले अपराधों में संवैधानिक न्याय और सामाजिक न्याय में बहुत भेद हैं। जहाँ किसी भी वालिग स्त्री या पुरुष को बिना जाति, धर्म, गोत्र, या भाषा पर विचार किये [शादी की तय उम्र पर] विवाह करने का अधिकार है वहीं समाज में विधर्मी से, दूसरी जाति वाले से ही नहीं अपितु अपने गोत्र में विवाह करने पर भी हजारों सम्भावनाशील नौजवानों, नवयुवतियों की हत्याएं प्रति दिन हो रही हैं और इन हत्यारों को सजा देने के लिए कोई फास्ट ट्रैक कोर्ट नहीं बनाये जा रहे। मैं पिछले कुछ वर्षों से हिन्दी भाषी क्षेत्र में हुयी इन हत्याओं का रिकार्ड रख रहा हूं और पाता हूं कि कोई सप्ताह ऐसा नहीं जाता जब किसी न किसी आनर किलिंग का समाचार सामने न आये। इन प्रकरणों में भी घर की बेटी बहिन को अधिक सरलता से मार देने की घटनाएं ज्यादा घट रही हैं। बिडम्बनापूर्ण यह है कि वोटों के चक्कर में इन हत्यारों की खिलाफत करने का काम राजनेता या राजनीतिक दल नहीं कर रहे हैं क्योंकि इन हत्यारों को अपने जाति समाज का समर्थन प्राप्त है।    
       नारी के खिलाफ यौन अपराधों के पीछे सबसे बड़ा दोष हमारी सामाजिक सोच का है जिसके अनुसार अपराध से पीड़ित महिला के साथ सहानिभूति की जगह लोग उसी को दोषी ही नहीं अपितु चरित्रहीन भी समझते हैं और वह सामाजिक उपहास का पात्र भी बनती है। यही कारण होता है कि पीड़ित महिलाएं इन अपराधों को छुपाने का प्रयास करती हैं और अपराधी समाज में सम्मानित घूमते हैं। घर परिवार के कमजोर लोग भी अपना गुस्सा महिला पर ही उतारते हैं क्योंकि समाज में उक्त अपराध के लिए उस परिवार को भी जिम्मेवार माना जाता है जो अपने घर की महिलाओं को स्वतंत्रता पूर्वक विचरण करने की अनुमति देते हैं। सामाजिक मान्यता यह है कि महिलाओं को पुरुष या घर के नियंत्रण में रहना चाहिए और कम से कम बाहर निकलना चाहिए। पर्दा और घूंघट प्रथा ही नहीं अपितु अभिजात्य वर्ग में ‘असूर्यपश्या’ [जिसको सूरज भी नहीं देख सके] होना ही उसकी सुरक्षा का आधार माना गया था। बिडम्बना पूर्ण स्थिति यह है कि कुल अपराध का बहुत कम हिस्सा ही सामने आ पाता है जिससे अपराधियों के हौसले बुलन्द होते रहते हैं। मजदूर जातियों और वर्गों की महिलाओं को अपने जीवन यापन के लिए बाहर निकलने की मजबूरी रही है जिससे सबसे अधिक यौन अपराध उन्हीं जातियों की महिलाओं के खिलाफ होते रहे हैं जो प्रयास करने के बाद भी उच्च वर्ग और वर्ण के खिलाफ न्याय भी पा सकने में समर्थ नहीं हो पातीं। यदि कोई अविवाहित लड़की  बलात्कार की शिकार हो जाती है तो यौन शुचिता को विवाह की शर्त मानने वाले हमारे समाज का कोई भी व्यक्ति उससे विवाह करने के लिए तैयार नहीं होता और न ही उसके परिवार के लोग उस लड़की को बहू बनाने के लिए तैयार होते हैं। यही कारण है कि कुँवारी लड़कियों के खिलाफ सबसे अधिक यौन अपराध होते हैं और उन्हें ही सबसे अधिक छुपाया जाता है। इसलिए यौन अपराधों के खिलाफ कोई भी कानूनी मुहिम शुरू करने के साथ साथ जरूरी है कि समाज में कुछ धारणाओं को बदलने का अभियान चलाया जाये। यौन अपराधों के खिलाफ आगे आने वाले पुरुषों को बड़े स्तर पर यह घोषित करना होगा कि वे स्वयं या परिवार में ऐसी किसी लड़की को विवाह के लिए अपात्र नहीं समझेंगे जिसके खिलाफ कभी यौन अपराध हुआ हो। समाज में प्रतिष्ठित महिलाओं समेत उन सारी महिलाओं को इस बात के लिए प्रेरित करना होगा कि उनके जीवन में जब भी कोई किसी भी तरह के यौन अपराध का प्रयास हुआ हो तो वे उसका खुलासा करें ताकि निर्दोष पीड़िताएं किसी हीन भावना का शिकार न हो सकें। बंगलादेश की प्रसिद्ध लेखिका तस्लीमा नसरीन ने अपने लेखन में इस तरह का प्रयास किया है और समाज के कुछ जाने माने लोगों के चेहरों की असलियत को उजागर किया है। पिछले दिनों विख्यात पत्रिका हंस में भी कुछ लेखिकाओं ने आत्मस्वीकार श्रंखला के अंतर्गत हमारे दोहरे समाज की सच्चाईयों को सामने लाने का प्रयास किया था। जब से सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की भागीदारी बढी है तब से उनका घर से निकलना भी जरूरी हुआ है और स्वतंत्र महिला को घरेलू महिला की तरह सम्मान की दृष्टि से न देखने वाला समाज उनके घर से बाहर निकलने को उनकी कमजोरी समझ कर आक्रामक हो जाता रहा है। इस सोच में अपेक्षित बदलाव की गति बहुत धीमी है।
       परिवार नियोजन के संसाधन विकसित होने के बाद यौन सम्बन्धों के बहुत से नये आयाम सामने आये हैं, क्योंकि यौन सम्बन्धों से गर्भधारण का परिणाम स्वैच्छिक हो गया है। यही कारण है कि बिना विवाह के यौन सम्बन्धों में बढोत्तरी हुयी है और लिव इन रिलेशन जैसे नये तरह के सम्बन्धों को कानूनी मान्यताएं मिली हैं भले ही समाज ने अभी उन्हें पूरी तरह से मान्यता न दी हो। इस मामले में स्वाभाविक रूप से पुरुषों द्वारा ही प्रस्ताव किये जाते रहे हैं और नारी के मौन को या कमजोर इंकार को उसकी स्वीकृति माना जाता रहा है। परिवर्तन के दौर में समाज कई स्तरों पर काम करता है और नारी के इंकार के बारे में भ्रम होना सहज सम्भव है। इसे ठीक से न समझने वाले लोग भी इंकार को लज्जा समझ कर ज्याद्ती कर जाते हैं। अधिक खुले समाज की समझ में भी अब यह बात आ जानी चाहिए कि नारी के इंकार का मतलब इंकार ही है। 
       जो राजनीति पूरे तंत्र पर नियंत्रण करती है उसका एक बड़ा हिस्सा सिद्धांतहीन होकर उसे सत्ता, सम्पत्ति पाने का साधन बना बैठा है। यौन अपराधों के बड़े बड़े मामले इसी क्षेत्र में घटित हो रहे हैं जिनमें से अनेक तो सार्वजनिक हो चुके हैं जब कि दबावों में अधिकांश सामने नहीं आ पाते। कैसी बिडम्बना है कि जो लोग स्वयं ही शपथ पत्र देकर कह रहे हैं कि उन पर यौन अपराधों के प्रकरण दर्ज हैं उनको भी राजनीतिक दल संसद या विधान सभा के लिए टिकिट दे रहे हैं। पिछले दिनों सांसदों और विधायकों की ऐसी सूची मीडिया में सामने आयी है पर बड़े बड़े वक्तव्य देने वाले किसी भी राजनीतिक दल ने अपने ऐसे सदस्यों से स्तीफा नहीं माँगना तो दूर उनके लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट में प्रकरण चलाने की माँग भी नहीं की है।
       कानूनी परिवर्तन के साथ सामाजिक परिवर्तनों का बीड़ा उठाना भी बहुत जरूरी है और उसके लिए वे ही व्यक्ति या संस्थाएं आगे आ सकती हैं जिनका समाज में कुछ प्रभाव है। जिन युवाओं ने आगे आकर इस घटना पर अपने गुस्से की अभिव्यक्ति दी है उन्हीं पर यह जिम्मेवारी भी आती है कि वे सामाजिक परिवर्तन के लिए भी पहल करें। स्मरणीय है कि अपने अछूतोद्धार और साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए ही गान्धीजी पुरातनपंथियों की नफरत के शिकार बने थे और उन्हें अपनी जान गँवानी पड़ी थी। उनकी मूर्ति लगाने वालों ने उनके आदर्शों और कामों को छोड़ दिया है जबकि सच यह है कि बिना सामाजिक परिवर्तन के समानांतर कोई भी राजनीतिक परिवर्तन सफल नहीं हो सकता। देखना होगा कि समाज के दोषों में सुधार लाने का बीड़ा कौन उठाता है!
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629