शुक्रवार, जून 12, 2020

रवीन्द्रनाथ त्यागी हिन्दी व्यंग्य के चतुर्थ स्तम्भ


रवीन्द्रनाथ त्यागी हिन्दी व्यंग्य के चतुर्थ स्तम्भ


वीरेन्द्र जैनरवीन्द्रनाथ त्यागी: 'जिसने देखा नहीं ...
आजादी के बाद जो हिन्दी व्यंग्य लिखा गया, उसके बारे में परसाई जी ने कहा कि साहित्य की दुनिया में जो व्यंग्य पहले शूद्र समझा जाता था अब उसकी जाति बदल गयी है और वह ठाकुर की श्रेणी में आ गया है। हिन्दी व्यंग्य की जाति बदलने के पचास साल में जिन लोगों के कारण यह घटना सम्भव हुयी उसमें प्रमुख रूप से चार लोगों का योगदान माना जाता है। वे हैं, हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, शरद जोशी, और रवीन्द्रनाथ त्यागी। इनमें परसाईजी और शरद जोशी तो कलमजीवी रहे हैं [भले ही इन्होंने भी छोटी मोटी सरकारी नौकरी कर के देखी है] , पर बाद में वे जीवन भर पूर्णकालिक लेखक रहे।  इसके विपरीत अपने लेखन काल में श्रीलाल शुक्ल और रवीन्द्रनाथ त्यागी दोनों ही अफसर रहे हैं।  श्रीलाल जी ने अपनी अफसरी के दौरान ही गहराई से लोक को देखा और उसका यथार्थ चित्रण कर रागदरबारी जैसी कालजयी कृति दी।
      त्यागी जी ने बचपन में भयंकर गरीबी देखी थी और संघर्ष से अपना स्थान प्राप्त किया। इस जीवन संघर्ष में उन्होंने जो खोया उसने उन्हें त्यागी से वैरागी बना दिया था। उन्होंने अपने पिता के भाई बन्धुओं की बेईमानियों व गैर जिम्मेवार, गुस्सैल, व आलसी पिता  की लापरवाही देखी। परिणाम स्वरूप पूरे परिवार का बेघर होना और इस सब से जनित जो दारुण गरीबी मिली उसका चित्रण अपने आत्मकथात्मक उपन्यास ‘अपूर्ण कथा’ में साफ साफ किया है। पिता भागकर ससुराल  के कच्चे मकान में आ गये थे। इस समय उनकी दो बड़ी बहिनें साथ थीं, व एक का विवाह हो चुका था। इस गरीबी में भी उनके कई बच्चे पैदा हुये जो अर्थाभाव के कारण जिन्दा नहीं बच सके थे व कफन के रूप में भी उन्हें कोई पुराना कपड़ा ही नसीब होता था। पिता ने घर के जेवर और बर्तन धीरे धीरे बेच दिये थे। वे उधार लेने के भी आदी थे, उसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। ऐसी भी दिवाली गुजरी थी जब मिठाई तो क्या घर में एक भी दिया नहीं जला था। आये दिन भूखे रहने की नौबत आती थी। पिता वैसे तो लाहौर में पढे हुये डाक्टर थे जहाँ उन्होंने साहित्य भी पढा था किंतु आलसी और गुस्सैल होने के कारण प्रैक्टिस नहीं चलती थी। त्यागीजी ने उनके लिए अकर्मण्य, स्वार्थी, निर्दयी, क्रूर और बेईमान जैसे विशेषणों का प्रयोग किया है। वे उधार न चुकाने के कारण वसूली वालों से भी अपमानित होते रहते थे। त्यागीजी ने जो चित्रण किया है वह रोंगटे खड़े कर देने वाला है, बहिन की शादी एक ऐसे उम्रदराज अमीर से करना जिसकी दो पत्नियां पहले से ही मर चुकी हों, फिर उसकी बीमारी जिसमें उसके पति ने मायके भेज दिया हो और इलाज के लिए जो खर्चा वह भेजता था उससे इनके घर का खर्च चलना आदि। किसी तरह वे पड़ोसियों आदि की मदद से बिना फीस वाले संस्कृत स्कूल जाने लगे थे। कुछ स्कूल अध्यापकों और पड़ोसियों की मदद से उन्हें सीधे आठवी कक्षा में प्रवेश मिल गया। बाद में उनकी प्रतिभा के कारण उन्हें बजीफा मिलने लगा था जिससे घर का खर्च चलता था। वे पढने में तेज थे जिससे हाईस्कूल में प्रदेश में मेरिट में बाइसवें नम्बर पर आये। गरीबी के कारण मजबूरन किसी कस्बे के कालेज में प्रवेश लेना पड़ा जहाँ ट्यूशन करके व अधपेट रह कर उन्होंने पढाई की। इंटरमीडिएट में वे मेरिट में सातवें नम्बर पर आये, अतः अपने अध्यापकों की सलाह और सहयोग से उनके पत्र लेकर वे प्रयाग विश्व विद्यालय में प्रवेश लेने चले गये। उनकी इस पढाई के लिए उनकी मां और बहिन ने सूत कात कात कर पैसे जुटाये थे।
मुफ्त के संस्कृत स्कूल में पढने और घर में उनके पिता द्वारा संकलित संस्कृत साहित्य ने उन्हें विशिष्टता दिलायी। प्रयाग में उनके सहपाठी दुष्यंत कुमार, कमलेश्वर, रामावतार चेतन, रमेश कुंतल मेघ आदि रहे। यह वही समय था जब हिन्दी उर्दू साहित्य के दिग्गज निराला, पंत, पदुमलाल पन्नालाल बख्शी, महादेवी वर्मा, अश्क, धर्मवीर भारती, फिराक, बच्चन, और जगदीश गुप्त वहां होते थे। वाचस्पति पाठक, प्रकाश चन्द गुप्त, अमृत राय, सुरेन्द्रपाल जैसे लोगों ने उन्हें प्रोत्साहन दिया।
त्यागी जी के गद्य लेखन में व्यंग्य की जो बुनावट रहती है उसका एक उदाहरण देखें जो उन्होंने अपने साहित्यिक योगदान के बारे में बताते हुए कहा। वे कहते हैं कि मैं मूलतः कवि ही रहा। आषाड़ के मेघ, भाद्रपद की सांझ,शरद की पूर्णिमा, पलाश के दहकते फूल और सुन्दर कम उम्र लड़कियों के होंठ मुझे भयानक परेशानियों में भी हमेशा अपनी ओर आकृष्ट करते रहे। व्यंग्य और हास्य का लिखना तो महज एक इत्तफाक ही रहा जिसका सारा श्रेय सम्पादकों को जाता है जिन्होंने कविताएं नहीं छापीं। ‘उनको दुआएं दो मुझे कातिल बना दिया’।   
जिस पराग प्रकाशन ने मेरा पहला व्यंग्य संग्रह छापा था, उसी ने उन दिनों कमल किशोर गोयनका के सम्पादन में ‘रवीन्द्रनाथ त्यागी की प्रतिनिधि रचनाएं’ नाम से एक संकलन छापा था जिसमें न केवल उनकी कविताएं थीं अपितु व्यंग्य, लेख, समीक्षाएं, साक्षात्कार, आत्म रचना आदि भी थे। सन्दर्भ आ गया तो बता ही दूं कि जिस समय मेरी पुस्तक आयी थी उसी समय उसी प्रकाशन से अभिनेत्री दीप्ति नवल की भी कविता की किताब आयी थी, और रायल्टी के लिए कहने पर प्रकाशक कहता था हमलोग पहले अपनी लागत निकालते हैं; देखिए आपकी पुस्तक अभी रायल्टी देने लायक नहीं बिकी है, जबकि दीप्ति जी की किताब तो खत्म भी हो गयी। सो रायल्टी की जगह सावधानी की दृष्टि से हम उसके प्रकाशन की किताबे लें आते थे। रवीन्द्रनाथ त्यागी की उक्त किताब भी मैं इसी योजना के अंतर्गत 25% कमीशन पर ले आया था। इसी में उनके आत्मकथात्मक उपन्यास अपूर्ण कथा का पहला भाग छपा था। त्यागी जी ने अपनी आत्मकथा का दूसरा भाग भी लिखा था जो लोगों के सामने नहीं आ पाया। वह मुझे पेपरबैक में देखने को मिला था। इसमें उनके जीवन के दुखों से आगे की कथा मौजूद थी।
त्यागी जी गुदगुदा कर ज्ञान देने वाले लेखकों में रहे हैं इसलिए पसन्दीदा लेखकों में शामिल थे। कुछ उनके आत्मकथात्मक उपन्यास ‘अपूर्ण कथा’ व ‘आत्मकथ्य गर्दिश के दिन’ का प्रभाव और कुछ यहाँ वहाँ से मिली जानकारियों से मेरे दिमाग में जो कथा बनी वह यह थी कि “ जब वे प्रयाग पहुंचे तो उन्हें एक और कृपालु मिल गये। उन्होंने इस प्रतिभावान युवा को न केवल अपने घर में शरण दी अपितु उनकी पढाई का खर्च उठाना भी मंजूर कर लिया। उनकी प्रतिभा ने विश्व विद्यालय में भी अपना असर दिखाया और धर्मवीर भारती तक उनके मुरीद हो गये व अपनी साहित्यिक संस्था परिमल में शामिल किया। इसी दौरान उन्हें अपनी सहपाठी से प्रेम हुआ और बात शिक्षा व नौकरी के बाद शादी के वादे तक पहुंची। किंतु इसी समय जिन सज्जन ने उन्हें अभिभावक की तरह मदद दी थी उनके मन में कुछ दूसरा ही सपना पल रहा था। उन्होंने अपनी भांजी का विवाह उनके साथ करने का तय कर रखा था। उपकृत त्यागीजी को उनका फैसला मानना पड़ा। संवेदनशील त्यागी जी के मन पर इसका गहरा आघात लगा।  अपनी शैक्षणिक योग्यता व प्रतिभाके कारण यूपी पीएससी परीक्षा उत्तीर्ण की व 1955 में इंडियन डिफेंस सर्विस एकाउंट ज्वाइन की। बड़े पद पर नौकरी मिली किंतु वे डिप्रैशन के शिकार हो जाते थे। जब 1979-80 में मैं गाजियाबाद में पदस्थ था तब मेरे आफिस नवयुग मार्केट के बगल में एक फाइनेंस कम्पनी का कार्यालय था जिसके मैनेजर मिस्टर मलिक कभी डिफेंस में त्यागी जी के साथ काम करते थे। उन्होंने भी त्यागी जी की अस्वस्थता और उसके सुने हुए कारणों के बारे में बताया था।“  [ यह बाद में पता चला कि यह कहानी सच नहीं थी]
2004 में उनका निधन हुआ और उसकी खबर भी साहित्य जगत को उनके निधन से दो दिन बाद लगी। तब तक किसी अखबार में खबर नहीं छपी थी। वे फौज के उस एकाउंट्स विभाग के बड़े अफसर के रूप में सेवानिवृत हुये थे जो पूरे पश्चिम कमांड के फौजियों के वेतन पेंशन और एकाउंट के निरीक्षण का काम देखता था। मेरी उनसे कभी आमने सामने मुलाकात नहीं हुयी किंतु ज्ञान चतुर्वेदी के एक लेख से उनकी अफसरी की भव्यता का अनुमान किया जा सकता है। वे लिखते हैं कि वे जब देहरादून उनसे मिलने गये थे तो दो तीन फर्लांग पहले तो गाड़ी छोड़ना पड़ी थी और प्रवेश से पहले गार्ड ने परमीशन के लिए जो फोन किया था उसमें कहा था कि कोई “चतूरवेदी जी” आये हैं, और खुद को आपका फिरेंड बता रहे हैं।
मैं उन दिनों समाचार पत्रों में नियमित लेखन कर रहा था इसलिए न केवल साहित्यिक पत्रकारिता के रूप में अपितु अपने उस लेखक पर जिसे खूब पढता और निर्मल हास्य के लिए भरपूर पसन्द करता रहा हूं, श्रद्धांजलि लेख लिखना जरूरी था। उनका जीवन संघर्ष और उसके बारे में उनकी स्पष्टवादिता भी मुझे बहुत प्रभावित करती रही है। अपने गर्दिश के दिनों को बिना अतिरंजना के साफ साफ लिख देने वाला कोई छद्म नहीं ओढ सकता। त्यागीजी का यह पक्ष मुझे सदैव आकर्षित करता रहा है। असल में उनका व्यंग्य भी उस सच को कह देने से पैदा होता है, जिसे लोग छुपाते हैं।   
यहीं से कहानी शुरू होती है। मैंने लोकमत समाचार नागपुर और नई दुनिया के भोपाल संस्करण “राज्य की नई दुनिया’ में तुरंत श्रद्धांजलि लेख लिख दिया। इसी समय भोपाल से प्रकाशित होने वाली एक पत्रिका अक्षरा ने डा. ज्ञान चतुर्वेदी से आग्रह किया कि त्यागी जी पर एक विशेषांक का सम्पादन करें, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। उन्होंने मुझे फोन कर के पूछा कि क्या तुम्हारा प्रकाशित लेख शामिल कर लें, तो मैंने खुशी जाहिर की। विशेषांक निकला और उसमें लेख सम्मलित हुआ। लेख में त्यागी जी की वह कथा लिख दी गयी जिसकी धारणा मैं ऊपर बताये अनुसार बना चुका था और जिसमें दबाव में किये गये विवाह को डिप्रैशन का कारण बताया गया था। भ्रम में उनकी पत्नी को उन पर अहसान करने वालों का पिता भी लिख दिया गया था जबकि वे उनके मामा या चाचा होते थे।
पत्रिका श्रीमती त्यागी तक भी पहुंची और स्वाभाविक रूप से उन्हें बुरा लगा। जो लगना ही चाहिए था। उन्होंने प्रेम जनमेजय, हरीश नवल और डा. ज्ञान चतुर्वेदी से बात की। हिन्दी व्यंग्य की अगली पीढी के इन तीनों प्रमुख लोगों ने अपूर्ण कथा के दूसरे भाग के प्रकाशित होने व मेरी कहानी से अनभिज्ञता व्यक्त की। मेरे पास भी अपूर्ण कथा भाग दो के प्रकाशित होने का कोई प्रमाण नहीं था पर ये विश्वास था कि ये मेरी कपोल कल्पना नहीं, भले ही गलतफहमी कुछ भी रही हो।  
श्रीमती त्यागी ने अपनी नाराजी व्यक्त करते हुए पत्रिका को निम्नांकित पत्र लिखा-
माननीय सम्पादक जी व श्री ज्ञान जी,
अक्षरा अभी शाम को मिली। फौरन पूरी की पूरी पढ कर ही रात को सोई। इतनी शानदार छपी है कि वास्तव में यादगार अंक है। सबके संस्मरण बहुत ही अच्छे हैं। मेरे पास आपको धन्यवाद देने के लिए शब्द नहीं हैं।
पर अब शिकायत की बात है। श्री वीरेन्द्र जैन का लेख जो पृष्ठ एक सौ साठ पर छपा है, उसमें पृष्ठ की अंतिम सात आठ पंक्तियां इतनी गलत व भ्रामक तथा चरित्र हनन करने वाली हैं कि मुझे बेहद दुख व क्रोध हुआ। सारे तथ्य वीरेन्द्र जी ने इतने तोड़ मरोड़ कर व न जाने कैसे लिख दियेहैं। [अ] पहली बात तो यह है कि त्यागी जी इतने दृढ प्रतिज्ञ व सच्चे आदमी थे कि यदि उन्होंने कभी किसी से शादी की बात तय की होती तो वे कभी भी पीछे हटने वाले नहीं थे। [ब] त्यागी जी ने कभी किसी का आश्रय नहीं लिया और वह अपने ही बल बूते पर प्रयाग गये और शिक्षा प्राप्त की। अतः किसी का भी प्रतिदान मांगने का प्रश्न ही नहीं था। [स] शायद वीरेन्द्र जी को मालूम ही नहीं है कि हम दोनों की सगाई पूरे साढे चार वर्ष पहिले ही हो चुकी थी। [द] त्यागी जी को डिप्रेशन विवाह के पूरे पन्द्रह वर्ष बाद हुआ ना कि वीरेन्द्र जी के लिखे हुए कारणों से। [घ] त्यागी जी को प्रयाग विश्वविद्यालय में लेक्चरर का पद नहीं मिला था क्योंकि उस समय के विभागाध्यक्ष व त्यागीजी के विचार नहीं मिलते थे। उन्होंने किसी मजबूरी में फौज के दफ्तर में एकाउंट्स आफीसर की सविस नहीं ज्वाइन की थी अपितु यूपी पीएससी के सिविल सर्विसेज की परीक्षा में बैठे तथा उसमें चुन लिये गये व 1955 में इंडियन डिफेंस एकांउट्स सर्विस ज्वाइन की थी जो कि देश की सर्वोच्च सेवाओं में से एक है।
अब मेरा अनुरोध है कि निम्न गलत तथ्य के बारे में इसे सही करवाइए- पृष्ठ 160 अंतिम छह सात लाइन हैं – ऐसे में उनकी प्रतिभा देख कर किसी ने उन्हें सहारा दिया अपने घर में रखा और पढाया लिखाया। पर वह व्यक्ति अपनी इस कृपा का प्रतिदान चाहता था। इस बीच इस युवा प्रतिभा का एक लड़की से प्रेम हो जाता है और अपने पैरों पर खड़े होकर शादी की बात भी तय हो जाती है किंतु जिसने उसे आश्रय दिया था उसने कुछ और ही सोच रखा था। प्रोफेसर बनने की इच्छा रखने वाले रवीन्द्रनाथ त्यागी को फौज के दफ्तर में एकाउंट आफीसर बनना पड़ा और आश्रयदाता की लड़की से शादी करने को विवश होना पड़ा। दिल और दिमाग पर इस अघात से वे डिप्रेशन के शिकार हो गये और बहुत दिनों तक उनको मानसिक चिकित्सक की देख रेख में रहना पड़ा।‘
श्री वीरेन्द्र जी लिखित में मुझ से क्षमा मांगें तथा पत्रिका के अगले अंक में सुधार छापें।
कष्ट के लिए क्षमाप्रार्थी हूं पर वास्तव में मैं इतनी आहत हूं कि अपने को रोक नहीं पाई। अपूर्ण कथा आत्मकथात्मक उपन्यास है शतप्रतिशत आत्मकथा नहीं, और उसमें भी उन्होंने ठीक से पढा नहीं। कुछ पढा और कुछ समझा है।
                                                      शुभाकांक्षी
                                                      शारदा त्यागी 
मेरा कोई इरादा त्यागी जी का चरित्र हनन या श्रीमती त्यागी को भावनात्मक ठेस पहुंचाना नहीं था इसलिए मैंने तुरंत निम्नांकित खेद पत्र लिख कर पत्रिका को भेज दिया जिसने दोनों पत्रों को अपने नोट के साथ अगले अंक में छाप दिया।
आदरणीया शारदा जी
      सादर अभिवादन
प्रस्तुत लेख गत तीस वर्षों में अपने प्रिय लेखक के सम्बन्ध में पढी सुनी गयी जानकारी पर आधारित श्रद्धांजलि और अपने समय की निर्ममता को पहचानने की दृष्टि से लिखा गया था।
यद्यपि मेरे द्वारा हुयी तथ्यात्मक त्रुटि मुझे मिली गलत सूचनाओं और निष्कर्षों पर आधारित है जिसके लिए मैं ह्रदय से दुखी और क्षमा प्रार्थी हूं तथा चाहता हूं कि मेरी यह क्षमा याचना, सम्बन्धित पत्रिका समेत अधिकतम माध्यमों में सार्वजनिक हो। उनके लघु उपन्यास अपूर्ण कथा पर नफीस आफरीदी की टिप्पणी [प्रतिनिधि रचनाएं पृष्ठ 336] तथा हिन्द पाकेट बुक में  अपूर्ण कथा में से याद रह गये अंश तथा त्यागी जी के दफ्तर में कार्यरत एक कोई मलिक नामक स्टाफ [जो बाद में [1979 में] गाजियाबाद के नवयुग मार्केट की किसी प्राईवेट फर्म में प्रबन्धक थे जो मेरी बैंक शाखा के निकट थी] से हुयी बातचीत के आधार पर निकाले निष्कर्षों के कारण यह भूल हुयी है। पर भूल निश्चित रूप से मेरी है जो मेरे ऊपर अधिक विश्वास होने के कारण ज्ञान चतुर्वेदी सहित कई सम्पादकों की नजरों से भी गुजर गयी। मैं इस भूल के लिए सचमुच बेहद दुखी हूं और यथाशीघ्र आपसे मिलकर भी क्षमा याचना करना चाहूंगा। मुझे विश्वास है कि आप अपने विशाल ह्रदय से मुझे क्षमा करेंगीं। मैं उपरोक्त प्रकाशित लेखों में से अपनी भूलवश की गयी टिप्पणी को वापिस लेता हूं। मुझे अफसोस इस बात का हो रहा है कि अपने उस प्रिय लेखक के परिवार के हित में मैं कुछ नहीं कर सका जिसने मेरे लेखन के लिए आदर्श ढांचा दिया था, उल्टे उसके निधन के बाद उसके परिवार को पीड़ा पहुंचायी।
मुझे सचमुच बेहद दुख है।
                                                      क्षमाप्रार्थी
                                                      वीरेन्द्र जैन
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शारदा जी ने बड़ी बहिन और भाभी की तरह मुझे क्षमा कर दिया और निम्नांकित पत्र भेजा –
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शारदा त्यागी
w/o स्व. श्री रवीन्द्रनाथ त्यागी
दूरभाष : 0133-2679133
मो. 9897288095 
                                                                  17-7-2005
                                                      ‘शमशेर हाउस’
                                                      1/1 तेग बहादुर रोड II
                                                                                                                                                देहरादून. 248001
                                                      उत्तरांचल
माननीय भाई वीरेन्द्र जी,
                  नमस्कार,
मेरे पत्र के उत्तर में अक्षरा के नए अंक में आपका उत्तर पढा। पढ कर ही मालूम हुआ कि आप मेरे पति के इतने सच्चे प्रशंसक हैं। जान कर मन को कुछ ढांढस बँधा।
            आप कभी इधर आएं तो अवश्य दर्शन दीजिए, या यदि कभी देहली आएं तो इधर दूर नहीं है, आप सपरिवार आएं तो और भी हर्ष होगा। मेरे लिए अब यह घर मेरा नहीं है, बल्कि मेरे पति की यादों व साथ बिताए हुए दिनों का एक स्थान है जो मेरे लिए एक मन्दिर की भांति है। यह मैं आपको इसलिए लिख रही हूं कि आप स्वयं देखें और विश्वास कर सकें तथा मन से गलत भ्रांतियां निकाल सकें।
           मैं आपको डा. गोयनका की पुस्तक के पृष्ठ 336 की फोटो कापी भेज रही हूँ। उसमें ऐसा कुछ नहीं है जैसा कि आपने समझा। हाँ मैं मि. मलिक के बारे में कुछ नहीं जानती कि वह कौन बेबकूफ सज्जन थे पर हाँ यदि आप जानते हैं तो उनका पता अवश्य दें। मैं आपको छोटे भाई की भाँति मान कर यह पत्र लिख रही हूं, अतः अन्यथा न लें। श्रीमती शर्मा को नमस्कार। बच्चों को स्नेहाशीष।
[* शायद वे जल्दी में श्रीमती जैन की जगह श्रीमती शर्मा लिख गयी थीं]
      स्वस्थ व सानन्द होंगे.
            उत्तर अवश्य देंगे।
                                          आपकी भाभी
                                                शारदा त्यागी
                                    पत्नी. स्व. श्री रवीन्द्र नाथ त्यागी
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मैंने लौटती डाक से पृष्ठ 336 की वे पंक्तियां अन्डरलाइन कर के भेज दीं जिसमें श्री अफरीदी ने लिखा था कि -
“यतीन [कथा नायक का नाम] अपनी पत्नी के प्रति अनंत प्रेम रखता है और विनीता के प्रेम में भी डूबा है। पर फिर भी सच्चाई से नहीं मुकरता, ईमानदारी का दामन नहीं छोड़ता...”
अपूर्णकथा भाग-2 के बिना ये पंक्तियां कैसे आ सकती हैं! बहरहाल शारदा जी पहले ही लिख चुकी थीं कि अपूर्णकथा आत्मकथात्मक उपन्यास है, शत प्रतिशत आत्मकथा नहीं।
बाद में श्रीमती शारदा त्यागी ने व्य्ंग्य यात्रा [अप्रैल- सितम्बर 2006] अंक में एक लेख में लिखा  –
‘इसी प्रकार एक बहुत ही शानदार विशेषांक निकला जो कि त्यागी जी की स्मृति को समर्पित है। वह वास्तव में संग्रहणीय अंक है। परंतु उसमें एक लेखक ने बहुत शानदार लेख लिखा उसमें ऐसी बातें उनके जीवन के बारे में लिखीं जो पूर्ण रूप से गलत थीं। जब मैंने उन्हें पत्र लिख कर सब बातों के बारे में लिखा तो उन्होंने माफी मांगते हुए लिखा कि मुझे कुछ भ्रांति हो गई और खेद है कि मैंने आपको कष्ट व मानसिक वेदना पहुंचाई। वे सज्जन पुरुष हैं, मैं उनका सम्मान करती हूं परंतु यह दुख होता है कि हम पूरी सच्चाई जाने बिना ही लिख देते हैं।‘
******************  
 मैंने अपने भ्रम की जड़ें तलाशने के लिए त्यागी जी के उपलब्ध साहित्य से कुछ और सामग्री तलाशी। बहुत प्रयास के बाद भी अपूर्ण कथा भाग-2 की प्रति तो नहीं मिल सकी, किंतु उनके लेखों से कुछ ऐसे संकेत मिले जिन्होंने अनजाने में मेरे मन में कथित धारणा बनायी होगी जैसे-
 मुझे त्यागी जी के एक व्यंग्य जो प्रयाग पर लिखा गया था, में यह टिप्पणी मिली-
“ मेरी पहली संतान भी [जो पुल्लिंग थी और है] भी मुझे वहीं प्राप्त हुई। सिविल सर्विस की परीक्षा भी मैंने प्रयाग केन्द्र से ही उत्तीर्ण की और जीवन में प्रथम प्रेम का अनुभव भी मैंने वहीं प्राप्त किया। मेरे दुर्भाग्य से यह प्रेम अंत तक पवित्र ही रहा।“
पर यह भी व्यंग्य लेख का हिस्सा है।
कमल किशोर गोयनका को दिये अपने साक्षात्कार में उन्होंने अपने कष्ट बताये थे। इनमें अन्य के अलावा प्रोफेसर न हो पाने की पीड़ा और मानसिक रोगी होने को भी गिनाया है। [प्रतिनिधि रचनाएं पृष्ठ 325]  
इसी साक्षात्कार में अपने उपन्यास ‘अपूर्ण कथा’ के बारे में पूछे गये सवाल के उत्तर में वे कहते हैं कि अपूर्ण कथा आत्मकथात्मक उपन्यास होने पर भी पूर्ण रूप से हो नहीं पाया। मैं आपके इस विचार से सहमत हूं। मैं जब इसे दुबारा लिखूंगा तो इसमें आत्मकथात्मक अंश कम करूंगा। [वही पृष्ठ 330]
अपूर्णकथा की समीक्षा में देवेश ठाकुर लिखते हैं “ इस प्रकार यतीन बाह्य संघर्षों से तो जीत जाता है, लेकिन प्रणय की एक छोटी सी घटना उसे कचोटती रहती है। लेखक ने इस घटना को जितनी सहजता, सच्चाई, और संजीदगी से अपनी मूल संघर्ष-गाथा से जोड़ा है उससे अंत में जाकर यह घटना ही मूल कथा बन गई है और पाठक को देर तक अपने से बाँधे रखती है। .......... हम कहना चाहते हैं कि स्त्री पुरुष सम्बन्धों के सन्दर्भ में जैनेन्द्र साहित्य का कोई भी पुरुष पात्र इतना ईमानदार साहसी और सच्चा नहीं है जितना कि अपूर्ण कथा का यतीन। “
त्यागी जी में सच कहने का साहस है इसलिए वे जिस वैराग भाव से लेखन करते थे उसमें झूठ कहने की गुंजाइश ही नहीं रहती क्योंकि लेखन को उन्होंने कभी यश प्राप्त करने का साधन नहीं बनाया और बाद के दिनों में पद व धन तो उनके पास पेट भर था।
त्यागी जी साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का साधन नहीं मानते थे और ना ही ऐसे किसी विचार से जुड़े थे। वे जो देखते थे उसे अपनी दृष्टि से प्रस्तुत करते थे। एक निर्मोही की तरह दुनिया के लोभ लालच पर हँसते हुये और दूसरों को हँसा कर दुनिया के लोभ लालच को उजागर करते हुये। उन्होंने इतनी मौतों को इतने निकट से देखा है कि उनके व्यग्यों में मृत्यु के दृश्य बार बार आये हैं। मैंने तो एक बार किसी पत्रिका में लिखा भी था कि अगर मुझे कभी त्यागी जी की सभी पुस्तकें एक साथ मिल जायेंगीं तो मैं उनके मृत्यु पर लिखे हुए पर ही एक शोध पेपर लिख दूंगा। मुझे समय मिला तो मैं त्यागीजी को दुबारा सम्पूर्ण पढना चाहूंगा व उन पर और लिखना चाहूंगा।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629        








मंगलवार, जून 09, 2020

हरि शंकर परसाई और मैं उनका एकलव्य


हरि शंकर परसाई और मैं उनका एकलव्य
वीरेन्द्र जैन

याद नहीं कि कब पहली बार उनकी रचना कहाँ पढी थी, किंतु जब भी पढी हो उसके बाद जब भी उनके नाम के साथ कोई रचना देखी तो बिना पढे नहीं छोड़ सका, और कभी भी ऐसा नहीं लगा कि यह रचना पहले पढी रचना से कमजोर है।
विचार और व्यंग्य के युग्म को पढने का शौक तो ख्वाजा अहमद अब्बास के हिन्दी ब्लिट्ज़ में प्रकाशित स्तम्भ ‘आज़ाद कलम’ और कृश्न चन्दर की पुस्तक ‘जामुन का पेड़” से लग चुका था जो हिन्द पाकेट बुक्स ने भी प्रकाशित की थी। [उन दिनों हिन्द पाकेट बुक्स की किताबें एक या दो रुपये में आती थीं और खरीदी जा सकती थीं]। परसाई जी मेरे लिए जामुन का पेड़ की परम्परा की अगली कड़ी थे। वे मेरे लिए कब आदर्श बन गये यह कह नहीं सकता, किंतु इतना याद है कि जब 1984 में मेरी पहली किताब ‘एक लुहार की’ पर एक गोष्ठी हुयी तो उसमें एक वक्ता ने कहा था कि ये परसाई की गैलेक्सी के सितारे हैं। यह वाक्य बुरा भी लग सकता था किंतु मेरी उस समय की रचनाओं में परसाई जी के प्रभाव को अनुभव करना मेरे लिए खुशी की बात थी। मैंने भी व्यंग्य के लिए वही विषय चुने थे जो परसाई जी के विषय रहे थे।
वैसे तो लगभग सभी ने उन्हें हिन्दी व्यंग्य का पितामह माना है किंतु मेरे मन में उनके प्रति किसी देवता की तरह के सम्मान का भाव था। मुझे मेरे पिता से जो प्रगतिशील मूल्य मिले थे, उन्हें मैं परसाई जी की रचनाओं में हू बहू देखता था, इससे मुझे अपनी सोच और विचारधारा को बल मिलता महसूस होता था। मिर्जा गालिब ने कहा है-
देखना तकरीर की लज्जत कि उसने जो कहा
मैं ने ये जाना कि गोया ये भी मेरे दिल में है
कुछ ऐसा ही मेरा हाल था। शायद इसका कारण नेहरू मंत्रिमण्डल में वी के कृष्ण मेनन का समर्थन करने वाला और मोरारजी देसाई का विरोध करने वाले ब्लिट्ज़ का नियमित पाठक होना भी हो।
कला व राजनीति से जुड़े जिन लोगों ने विवाह न करना तय किया था उनके प्रति मेरे मन में बहुत आदर का भाव रहा था। भगत सिंह, लोहिया, अटल बिहारी, लता मंगेशकर, डेविड, रजनीश आदि की श्रंखला में परसाई जी भी आते थे। उनकी मयनोशी के बारे में भी किस्से तो बहुत सुने थे, और इन्हीं किस्सों का असर हुआ था कि गालिब, नीरज, सरोज, रंग, परसाई आदि आदि के कारण मेरे मध्यम वर्गीय मूल्यों में साहित्यकार कलाकार की मयनोशी बुरी बात नहीं रह गयी थी। इसे मैं कलाकार का डिठौना मानता रहा। कभी राजेन्द्र यादव ने कहा था कि यह विद्रोह की भाषा भी है।
मेरा सपना था कि काश कभी परसाई जी से मुलाकात हो सके। पत्र पत्रिकाओं में छपने और कवि सम्मेलनों में जाने की तीव्र वासना ने मुझ में जो कुछ बुरे तरीके पैदा किये थे, उनमें से एक यह भी था कि हर उत्सव के अवसर पर सम्पादकों और अपने प्रिय लेखकों, कवियों को शुभकामना सन्देश भेजना। याद तो नहीं पर उनमें परसाई जी का नाम भी सूची में रहा होगा। उत्तर आने पर खुशी होती थी, पर दूसरे अनेकों के विपरीत शुभकामना पत्र पर परसाई जी का कभी उत्तर नहीं आया।
1976-77 में जब वे सारिका में स्तम्भ लिख रहे थे तब मुझे उसमें एकाध लघु कथा और कुछ पत्रप्रतिक्रियाएं लिखने का मौका मिला था जो किसी पहचान का अधिकार नहीं देता था। किंतु जब देश में जनता पार्टी सरकार आयी और महावीर अधिकारी के सम्पादन में साप्ताहिक करंट [जो ब्लिट्ज़ की तरह का एक टेबुलाइज्ड अखबार था ] ने अपना हिन्दी संस्करण प्रारम्भ किया तो उसमें कमलेश्वर, राही मासूम रजा, और परसाई जी ने अपने पूरे पेज के स्तम्भ लिखने प्रारम्भ किये। उसी अखबार में मेरी भी छोटी छोटी व्यंग्य कविताएं छपने लगीं। सच कहूं तो मुझे अपनी रचनाओं के प्रकाशन से मिलने वाली खुशी से ज्यादा इस बात की खुशी थी कि मैं परसाई जी के साथ छप रहा हूं। वह अखबार दो तीन साल ही चल सका।
परसाई जी ने स्तम्भ के रूप में नियमित लेखन बहुत किया है, कह सकते हैं कि वे मुख्य रूप से स्तम्भ लेखक ही थे और तात्कालिक विषयों पर खूब लिखते थे। 1976 से 1980 तक मेरे पास भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी समर्थक दैनिक अखबार ‘जनयुग’ आता रहा, जिसमें परसाई जी आदम के नाम से दैनिक स्तम्भ लिखते थे। कह सकता हूं कि उस स्तम्भ ने मुझे ट्यूटोरियल दिये, मैंने राजनीतिक व्यंग्य लिखना सीखा। इससे पहले भी परसाई जी अपने समय की प्रमुख पत्रिका कल्पना में ‘और अंत में’ नामक स्तम्भ लिखा करते थे जिसने साहित्य में व्यंग्य को प्रमुख स्थान दिलाया, जो कभी हाशिए की चीज हुआ करती थी। शायद इसी आधार पर उन्होंने लिखा था कि व्यंग्य अब शूद्र से ठाकुर बन गया है। उन्होंने मध्य प्रदेश क्या, कभी देश के प्रमुख अखबार रहे ‘नई दुनिया’ में भी ‘सुनो भाई साधो’ नाम से स्तम्भ लिखा जिसने हिन्दी क्षेत्र के पाठकों के बीच प्रगतिशील मूल्यों को प्रतिष्ठित किया। उनके स्तम्भों के नाम कबीर के दोहों में से ही चुने जाते रहे, जैसे ‘माटी कहे कुम्हार से’ ‘कबिरा खड़ा बजार में’ सुनो भई साधो’ आदि। साहित्य के बाजार में वे खुद भी लुकाठी लिये ही खड़े रहे। जब वे धर्म के नाम पर चल रहे धन्धे का मजाक बनाते थे या मिथकों के सहारे राजनीतिक टिप्पणियां करते थे तो वह मुझे बहुत भाता था।
      दक्षिणपंथी, जातिवादी, जड़तावादियों ने व्यक्ति परसाई का तो विरोध किया किन्तु वे ना तो उनके बराबर का कोई लेखक पैदा कर सके और ना ही उनके लेखन का कोई उत्तर ही तलाश सके। आर एस एस ने उनके ऊपर एक बार हमला करा दिया था तो उन्होंने उस हमले पर ही कई व्यंग्य लिख दिये जिससे पूरे देश में संघ का चरित्र उजागर हुआ और उसकी भरपूर निन्दा हुयी। बाद में जब संघ वालों ने क्षमा मांगते हुए कहा कि आगे से ऐसा नहीं होगा, तब भी उन्होंने लिखा कि देखो इन्होंने स्वीकार कर लिया कि हमला इन्होंने ही कराया था। जब व्यावसायिक पत्रिकाओं ने शरद जोशी को अधिक प्रोत्साहन देकर उनके मुकाबले स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया तब भी उन्होंने परसाई जी के मूल्यों के खिलाफ कभी कुछ नहीं लिखा क्योंकि कोई ईमानदार लेखक उन मानव मूल्यों के खिलाफ कुछ लिख ही नहीं सकता।
1981 के अंत में जब मेरा ट्रांसफर हैदराबाद से नागपुर हो गया तो अपनी सोच और परसाई के प्रति अपनी पक्षधरता के कारण मुझे उनका सिपाही समझ लिया गया जबकि तब तक ना तो मेरा उनसे पत्र व्यवहार था और ना ही कभी मुलाकात हुयी थी। इतना जरूर था कि बहसों में मैं उनका पक्ष लेते हुए  लोगों से टकरा जाता था। नागपुर में रिजर्व बैंक में अधिकारी एक लेखक थे रमेश डी गाडे, उन्होंने मुझ से कहा कि गुजराती और मराठी में परसाई जी की रचनाओं का अनुवाद कर के कुछ लेखक अपने नाम से प्रकाशित करा रहे हैं व इस विषय पर मैंने मराठी के अखबार में एक पत्र लिखा है जिसकी कटिंग आप परसाई जी तक पहुंचा दें। उनके इस प्रस्ताव पर मुझे खुशी हुयी कि मुझे परसाई जी के लिए कुछ करने का अवसर मिला है तो इसी बहाने शायद उनसे सम्पर्क हो सके। मैंने उनसे वह कटिंग लेकर परसाई जी को भेज दी । दो महीने गुजर गये किंतु परसाई जी की ओर से कोई उत्तर नहीं आया। फिर संयोग ऐसा बना कि मुझे प्रमोशन मिला और बैंक मैनेजर के रूप में मेरा ट्रांसफर जबलपुर हो गया। मैं खुश था कि परसाईजी और ज्ञानरंजन जी के शहर में रहने व मेल मुलाकात का मौका मिलेगा।
फरबरी 1982 में जबलपुर पहुंचने के पहले ही सप्ताह में मैंने परसाई जी से भेंट का कार्यक्रम बनाया। मैं अपना परिचय देने के मामले में बहुत संकोची रहा हूं और हर बार ऐसी स्थिति में मुझे दूसरे का सहारा लेना ही सही लगता रहा है। जबलपुर से 1977 में ‘व्यंग्यम’ नामक एक पत्रिका निकली थी जिसमें मेरे कई व्यंग्य छपे थे, इसके सम्पादक रमेश शर्मा, महेश शुक्ल, और श्रीराम आयंगार थे। उस समय रमेश शर्मा ही उपलब्ध थे जो नेपियर टाउन में ही रहते थे सो उनका ही सहारा लिया। उन्होंने बताया कि परसाई जी कमर में चोट के कारण बिस्तर तक सीमित होकर रह गये हैं इसलिए लेटे हुए ही मिलेंगे, पर वे पैर छुलाना पसन्द नहीं करते इसका ध्यान रखना। यद्यपि मैंने हामी तो भर दी थी किंतु अपने भक्तिभाव के कारण इस सावधानी को भूल गया और मैंने लेटे हुए परसाई जी के पैर छू ही लिये। गनीमत रही कि उनकी नाराजगी नहीं झेलना पड़ी। रमेश जी ने मेरा परिचय दिया तो कम बोलने वाले परसाई जी ने बिना विशेषण के एक वाक्य बोला- मैंने भी आपका लिखा पढा है। मैं गदगद हो गया था।
जब मैंने रमेश डी गाडे वाले पत्र की चर्चा की तो उन्होंने पूछा कि आपको मराठी आती है? मेरे  नहीं में सिर हिलाने पर वे बोले तभी आपको नहीं पता कि रमेश गाडे के उस प्रकाशित पत्र में क्या लिखा है। उसमें लिखा था कि गुजराती मराठी के इन लेखकों ने परसाई जी की रचनाएं ली है, पर परसाई जी किन विदेशी लेखकों की रचनाएं लेते हैं यह नहीं पता। मुझे तेज गुस्सा आया जो जल्दी ही अफसोस में बदल गया कि मैंने यह नहीं सोचा कि श्री गाडे ने इस काम के लिए मेरा स्तेमाल क्यों किया। वे चाहते तो खुद भी उस पत्र को परसाई जी तक भेज सकते थे।
रमेश जी पहले ही चेता चुके थे कि ज्यादा देर नहीं रुकना है सो भविष्य में फिर आने की उम्मीद में मैं लौट आया। विभागीय जटिलताओं के कारण मैं जबलपुर में भी ज्यादा दिन तक नहीं टिक सका और मेरा ट्रांसफर हो गया। मेरे जीवन में परसाई जी से यही एक मुलाकात हुयी किंतु रचनाओं के आधार पर तो मैं उनसे जीवन भर मिलता रहा सीखता रहा। उनके लेखन का ही प्रभाव था कि किसी भी व्यक्ति का बनावटीपन मुझे स्वीकार नहीं हुआ जिसने कई बार मुझे धोखे खाने से बचाया।
1985 में जब परसाई जी को चकल्लस पुरस्कार घोषित किया गया तब् संयोग से मैं मुम्बई गया हुआ था तो चेतन जी ने मुझे यह जानकारी दी। मैंने पूरे विश्वास के साथ कह दिया कि वे स्वस्थ नहीं हैं इसलिए आयेंगे नहीं। चेतन जी को बुरा लगा। बोले मैंने उनके कहे अनुसार आने जाने के प्रथम श्रेणी के दो दो टिकिट भेजे हैं , इसलिए उन्हें किसी के साथ आना तो चाहिए। बाद में यही हुआ कि चक्कलस पुरस्कार  लेने वे नहीं आये व उनके स्थान पर सुरेश उपाध्याय ने उनकी ओर से वह पुरस्कार ग्रहण किया था।
उनके लेखन से लगता था कि वे भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य होंगे, किंतु ऐसा नहीं था। उन्होंने कभी भी पार्टी की सदस्यता नहीं ली। काँग्रेस नेता श्रीकांत वर्मा एक बार उन्हें राज्यसभा में भेजना चाहते थे किंतु उन्होंने जिससे सिफारिश की उसने श्रीकांत वर्मा को ही राज्यसभा का सदस्य बनने के लिए तैयार कर लिया, परसाई जी रह गये। उन्होंने लिखा कि मैंने इकलौती बार किसी के सामने हाथ फैलाया तो उसने मेरी हथेली पर थूक दिया। यह अच्छा ही रहा, दोबारा कहीं किसी के आगे हाथ फैलाने से बच गया। 
मैं कह सकता हूं कि मैं उनका एकलव्य रहा हूं जिसने उनकी मूर्ति बना कर दीक्षा ली। पर ना तो मैं धनुर्धर बन सका और ना ही उन्होंने कभी दक्षिणा चाही।           
        वीरेन्द्र जैन
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सोमवार, जून 01, 2020

लोकतंत्र और पारदर्शिता

लोकतंत्र और पारदर्शिता
वीरेन्द्र जैन

किसी देश की शासन प्रणाली में जो महत्व लोकतंत्र का है, वही महत्व लोकतंत्र में पारदर्शिता का है। अगर लोक को सच्चाई का पता ही नहीं होगा तो वह अपना विचार क्या बनायेगा! विडम्बना यह है कि लोकतंत्र के बड़े बड़े दावे करने वाले लोग प्राइवेसी के अधिकार की बात तो करते हैं किंतु पारदर्शिता की बात नहीं करते, जबकि पारदर्शिता से लोकतंत्र मजबूत होता है। जब भी किसी सरकार में मंत्री पद की शपथ ली जाती है, तब गोपनीयता की शपथ तो लेते हैं, पारदर्शिता की नहीं। सूचना के अधिकार को प्राप्त करने के लिए देश के जागरूक संगठनों को लम्बा संघर्ष करना पड़ा और कुछ ही दिनों बाद उस कानून में जगह जगह से कतर ब्योंत कर दी गयी। इसके महत्व को समझने के लिए उल्लेखनीय है कि उक्त अधिकार के बाद दर्जनों आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुयीं जिनका आरोप विभिन्न सत्तारूढ राजनेताओं व उनके दरबारियों पर ही लगा, जिन्हें सजा नहीं मिल सकी। पुलिस, फौज, प्रशासन, राजनेता, और न्याय कोई भी पारदर्शिता को प्रोत्साहित नहीं करना चाहता, जबकि जब जब पारदर्शिता बढी है तब तब सत्ता के समक्ष खड़ी जनता को ताकत मिली है।  
 किसी शासन, प्रशासन को देश की सुरक्षा के लिए जितनी गोपनीयता की जहाँ जहाँ जरूरत है वहाँ वहाँ  छोड़ कर शेष क्षेत्रों में पारदर्शिता होना चाहिए। हम जनता के द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन चलाते हैं तो यह शासन जनता को व्यवस्था का सच बताये बिना कैसे पूरा हो सकता है।
सबसे पहले तो जो राजनीतिक दल जनता से समर्थन प्राप्त कर विभिन्न सदनों में अपने प्रतिनिधियों को भेज कर सरकार बनाने व सदन चलाने में मदद करते हैं उनकी कार्यप्रणाली में ही पारदर्शिता नहीं है। उनके संगठन में पदाधिकारी चयन में लोकतंत्र नहीं, केवल दिखावा है और अधिकांश दलों में वंशानुगत नेतृत्व ही चल रहा है। पुराने राज परिवारों में से लगभग सभी के वंशज अपने पुराने प्रभाव व दबाव से  किसी न किसी पद पर चुनाव जीत कर सत्ता पर पुनः कब्जा जमा चुके हैं, या अपने गुलामों को बैठा चुके हैं। असहमतों की हत्याएं कर दी गयी हैं और ऐसी अनगिनित हत्याओं को दबा दिया गया है या उनकी जांच रिपोर्टों को बदल दिया गया है।
जो राम रहीम किसी पत्रकार की सरे आम हत्या के लिए जिम्मेवार माना जाता है उसके आगे हरियाणा में सत्तारूढ दल के सारे विधायक किसी समय दण्डवत करने जाते हैं और मंत्रिमण्डल उसे विभिन्न बहानों से करोड़ों रुपयों का अनुदान स्वीकृत करता है। अगर एक न्यायाधीश साहस नहीं जुटाता तो उसे कभी सजा नहीं मिलती। देश भर में सैकड़ों पत्रकारों को सच सामने लाने के कारण शहीद होना पड़ा है। जब किसी एक ज्ञात हत्यारे को सजा नहीं मिल पाती तो हजारों पत्रकार दबाव में आकर सच लिखने का साहस नहीं जुटा पाते व लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ मिट्टी का लौंदा बन कर रह जाता है। अखबार, व्यापार और सरकार का जो गठजोड़ बना है उसका परिणाम यह है कि सारा बड़ा मीडिया उन कार्पोरेट घरानों का हिस्सा बन चुका है, जो सरकार चलाते हैं। ऐसे में कथित जनता के शासन की जनता के सामने पारदर्शिता कठिन होती है। कभी कमलेश्वर जी ने सारिका के एक सम्पादकीय में लिखा था कि प्रैस की आजादी का मतलब प्रैस मालिकों की आजादी नहीं होती अपितु पत्रकार की आजादी होता है। 
किसी दल में जनप्रतिनिधि हेतु प्रत्याशी चयन की कोई घोषित नीति और न्यूनतम पात्रता घोषित नहीं है। सदस्यता की वरिष्ठता या दल के घोषित कार्यक्रमों में दिये गये योगदान, सम्बन्धित पद के कार्य सम्पादन में योग्यता आदि का कोई रिकार्ड नहीं रखा जाता। यदि प्रत्याशी बनने के लिए मांगे गये आवेदनों में कभी कुछ पूछा भी जाता है तो अंतिम चयन में उसका कोई महत्व नहीं होता। प्रत्याशी चयन की बैठकें गोपनीय स्थानों पर होती हैं व चयन समिति के लोग छुपे फिरते हैं, क्योंकि चयन का आधार मैरिट नहीं होता। यही कारण होता है कि दलबदलू पुराने सदस्यों से बेहतर स्थान पा लेते हैं।
सरकार में आने या जनप्रतिनिधि चुने जाने के बाद आय में अप्रत्याशित वृद्धि देखी जती है, इस वृद्धि को सन्देह की दृष्टि से देखे जाने की जगह प्रमुख दलों में उसे अगले चुनाव में प्रत्याशी बनाये जाने के गुण की तरह देखा जाता है। जिन जिन पदों पर भ्रष्टाचार की सम्भावनाएं हैं व अतीत में उन पदों पर पदस्थ लोगों के भ्रष्टाचार कभी सामने आ चुके हों तो उन पदों पर बैठने वालों को सर्विलेंस में रखा जाना चाहिए। इसके विपरीत मंत्रिमण्डल में विभाग वितरण के दौरान मलाईदार विभागों को हथियाने की नंगी दौड़ देखी जाती है। इस बात की कोई वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की जाती कि गत वर्ष जो लोग भ्रष्ट आचरण के कारण विभिन्न जाँच एजेंसियों की पकड़ में आये थे, उन के प्रकरणों में क्या प्रगति है, ना ही सरकार की उपलब्धियों के बड़े बड़े विज्ञापनों में जाँच की प्रगति दर्शायी जाती हौ। नहीं बताया जाता कि मामले कहाँ अटके हुए हैं! धीरे धीरे लोग उन्हें भूल जाते हैं।
मंत्रिमण्डल गठन की कोई घोषित नीति नहीं है। कहीं यह स्पष्ट नहीं किया जाता कि फलां को क्यों मंत्री बनाया गया है और फलां विभाग ही क्यों दिया गया है। जनता के काम को योग्यता अनुसार सुचारु रूप से करने की क्षमता की जगह मंत्री का दबाव, उसका वंश, जाति, और वफादारी आदि के आधार पर चयन किया जाता है। यही कारण है कि अक्षम मंत्रियों के विभाग नौकरशाह चलाते हैं।
केन्द्र में नरेन्द्र मोदी के सत्तारूढ होने के बाद तो पारदर्शिता जैसी कोई चीज नहीं रह गयी। मंत्रिमण्डल के सदस्यों तक को लोग नहीं जानते। समाचारों में उनका नाम यदा कदा ही सामने आता है, यहाँ तक कि सांसद तक जरूरत पड़ने पर डायरी तलाशने लगते हैं कि किस विभाग में कौन मंत्री है। पूरा मंत्रिमण्डल दो लोग चला रहे हैं। नोटबन्दी से लेकर लाकडाउन तक सबसे छुपा कर ऐसे घोषित किये जाते हैं जैसे जनता के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक की जा रही हो। आवश्यक, अनावश्यक हर मामला गोपनीय रखा जाता है।
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री कौन होगा ये सात चरणों वाले चुनाव के छठे चरण तक घोषित नहीं किया जाता और अंतिम चरण में योगी को घोषित किया जाता है। उससे पहले ही समाजवादी पार्टी की सरकार के समय में भी चुनाव पूरे हो जाने के बाद बताया जाता है कि जीत की स्थिति में अखिलेश मुख्यमंत्री होंगे।  मुख्यमंत्री को विधायक नहीं चुनते अपितु हाईकमान चुनता है, जिस के नाम पर मोहर लगाने को विधायक बाध्य होते हैं। हाईकमान ने किन किन नामों के बीच किस आधार पर चयन किया है यह कहीं स्पष्ट नहीं होता। जब कोई दल त्यागता है तो उस तिथि के एक दिन पहले तक वह पार्टी के प्रति बफादार दिखने की कोशिश करता है और बाद में वह अपने मतभेदों को राजनीतिक बतलाते हुए लम्बे लम्बे बयान देता है। अगर राजनीतिक मतभेद हैं तो उसे अपने समर्थकों के बीच लगातार सामने रखा जाना चाहिए।
मेरठ के प्रसिद्ध वकील के के गर्ग ने राष्ट्रपति द्वारा फांसी की सजा माफ करने के विशेष अधिकार को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए मांग की थी कि राष्ट्रपति किस की सजा को माफ करते हैं और किसकी नहीं, इस बात का अन्धा अधिकार उन्हें नहीं है, अपितु इसका प्रयोग करते समय लिये गये फैसले के गुणदोषों को स्पष्ट किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को स्वीकार किया था।
 नवाज शरीफ की बेटी की शादी में अचानक से अवतरण करने से क्या लाभ हुआ। नागा विद्रोहियों को मारने और म्यांमार में अन्दर प्रवेश कर मृतकों की गलत संख्या बताने या सर्जिकल स्ट्राइक या बालाकोट के बारे में बताये गये तथ्य विवादास्पद क्यों रहे। यह सैटेलाइट निरीक्षण ड्रान कैमरों से वीडियोग्राफी, डिजिटल कर्यालयों और जगह जगह सीसीटीवी कैमरों का युग है। हर हाथ में पहुंच गये मोबाइल कैमरों से दृश्य समाचार तक मिनिटों में विश्वव्यापी हो सकते हैं, होते भी रहते हैं, किंतु हम फिर भी महाभारत के ‘अश्वत्थामा हतो’ जैसे झूठ लगातार बोल रहे हैं, और जनता के बीच लोकतंत्र में आस्था को कम कर रहे हैं।
      प्रशासकीय पारदर्शिता को मौलिक अधिकारों में शामिल करना चाहिए।
वीरेन्द्र जैन
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