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शनिवार, जून 16, 2018

चमत्कार की उम्मीद से भ्रमित समाज में बाबा


चमत्कार की उम्मीद से भ्रमित समाज में बाबा  

वीरेन्द्र जैन
लगभग एक दशक पहले मीडिया में एक फोटो आयी थी जिसमें भगवा वस्त्रों में प्रज्ञा सिंह जिन्हें बाद में साध्वी प्रज्ञा के नाम से प्रचारित किया गया, बीच में विराजमान हैं और उनके दोनों तरफ क्रमशः राजनाथ सिंह और शिवराज सिंह चौहान अपनी पत्नी सहित श्रद्धा की मुद्रा में बैठे हैं। यह फोटो तब ज्यादा प्रसारित हुयी जब प्रज्ञा सिंह को आतंकी गतिविधियों और उससे जुड़ी हत्याओं के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। अनेक लोगों से पूछने पर भी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला कि देश के इतने बड़े बड़े नेता जो देश के प्रतिष्ठित धर्म गुरुओं के सम्पर्क में भी रहते हैं, इन कथित साध्वी की किस प्रतिभा से प्रभावित होकर श्रद्धानवत बैठे दिख रहे हैं। क्या केवल वस्त्रों के रंग और माथे पर लगे तिलक टीके ही श्रद्धा का आधार बन जाते हैं!
तब से अब तक गंगा में बहुत पानी बह चुका है व हर दूसरे तीसरे महीने कोई न कोई बाबा, स्वामी, संत, महंत कहलाने वाला व्यक्ति किसी न किसी अनैतिक कर्म से जुड़ा पाया जा रहा है। इसके साथ ही यह बात भी प्रकाश में आती है कि उसके पास कितनी जमीन, बंगले, बगीचे, आश्रम, और दौलत के खजाने मौजूद हैं, व उनके पास कितने नामी गिरामी लोग श्रद्धापूर्वक आते हैं। जब इतने सारे धर्म हैं और उनकी अनेक शाखाएं उपशाखाएं हैं तो उनके गुरु तो होंगे ही किंतु उन सब के अलग होने के पीछे कुछ सिद्धांत, नीति नियम भी होंगे, उपासना की भिन्न विधियां भी होंगीं। अनेक मामलों में ऐसा है भी। किंतु जब अस्पष्ट दर्शन, सिद्धांतों, या आचरणों के बाबजूद कोई धर्मगुरु बहुत बड़ी संख्या में अनुयायी बना लेता है, उनसे ढेर सारा धन निकलवा लेता है व संदिग्ध जीवन जीता है तब सरकार और उसके अनुयायियों को सन्देह क्यों नहीं होता! धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को धर्म की ओट में मनमानी करने का अधिकार क्यों बना लिया गया है। धर्मस्थलों की पवित्रता अपराधियों के प्रवेश से भंग नहीं होती किंतु पुलिस के प्रवेश से भंग हो जाती है।  
महेश योगी, ओशो रजनीश, श्री श्री रविशंकर, गायत्री पीठ के श्रीराम शर्मा, रामदेव, आदि की स्थापनाएं समझ में आती हैं जिन्होंने विचारों, आचरणों, या प्रयोगों में कुछ नया कर के अपने अभियान को मौलिक रूप देकर आगे बढाया है, किंतु आसाराम, राम रहीम, रामपाल, निर्मल बाबा, राधे माँ, आदि आदि से लेकर दाती महाराज तक अपने अनुयायी किस आधार पर बना लेते हैं जो अपने मूल इष्ट को छोड़ कर नई आस्था की भीड़ बना लेते हैं। इस भीड़ के लोग  किसी भी सामान्य बुद्धि के व्यक्ति को प्रथम दृष्ट्या हास्यास्पद लगने वाला आचरण करते हुए लगते हैं। उनके इन गुरुओं के आपराधिक कृत्य सामने आने, उनके गिरफ्तार हो जाने के बाद भी कुछ भक्तों की आस्था कम नहीं होती। रोचक यह है कि वे इस विषय पर बात भी नहीं करना चाहते हैं। खेद इस बात का भी है कि इस अन्ध आस्था से होने वाले खतरों के प्रति शासन प्रशासन भी उदासीन है और कोई भी जनता को तब भी शिक्षित नहीं करना चाहता, जब कि सम्बन्धित धर्मगुरु के भेष में रहने वाला पुलिस की गिरफ्त में आ चुका होता है। इन कथित आश्रमों या धार्मिक संस्थानों में एकत्रित धन का बड़ा हिस्सा काला धन होता है और बहुत सारे मामलों में अवैध ढंग से कमाया हुआ होता है। घटनाक्रम बताता है कि लगभग सभी डाकुओं ने मन्दिर बनवाये हैं और पुजारियों व बाबाओं को पाला है, भले ही यह काम उन्होंने अपनी भयमुक्ति के लिए किया हो। समस्त काले धन वाले लोग अपनी कमाई का एक हिस्सा धार्मिक संस्थानों को देते हैं। इस प्रकार ये संस्थान देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं और सरकार की सतत निगाह इन पर रहनी चाहिए।
 धार्मिक संस्थानों की वित्तीय व्यवस्था को पारदर्शी बनाये बिना अर्थव्यवस्था में सुधार सम्भव नहीं है। जिस तरह बड़े कार्पोरेट घरानों, पब्लिक सेक्टर आदि को अपनी आडिट की हुयी बैलेंस शीट को सार्वजनिक करना अनिवार्य होता है उसी तरह एक निश्चित राशि से अधिक लेन देन वाली हर सार्वजनिक संस्था को अपनी बैलेंस शीट सार्वजनिक करना जरूरी होना चाहिए।  
साधु भेष में धोखा देने की परम्परा सबसे प्रसिद्ध रामकथा से शुरू होती है जिसमें रावण ने साधु भेष रख कर ही सीता का हरण किया था। इसी कथा में कालनेमि ने ही साधु का भेष रख कर हनुमान को धोखा देने का प्रयास किया था। कबीर ने झूठे साधुओं के लिए ही कहा है कि मन न रंगायो, रंगायो जोगी कपड़ा। “पानी पीजे छान कर और गुरु कीजे जानकर” भी इसीलिए कहा गया है क्योंकि गलत लोग भी धर्मगुरु के रूप में आ जाते हैं और लूट कर चल देते हैं। “ मुँह में राम, बगल में छुरी’ भी ऐसे ही नकली भक्तों के लिए कहा गया होगा, जैसे कि “बगुला भगत” शब्द आया है।
सच यह भी है कि बिना श्रम किये उपलब्धि पाने की इच्छा रखने वाले लोग चमत्कार की उम्मीदों में ऐसे बाबाओं के चक्कर में फँस जाते हैं और संयोगवश लाभ हो जाने से वे उनके स्थायी गुलाम बन जाते हैं। दूसरे जिन कार्यों में परिणाम अनिश्चित होता है या कहें कि जहाँ दाँव होता है वहाँ भी लोग अन्धविश्वासी हो जाते हैं और बाजी जीतने पर वे गलत विश्वासों के शिकार हो जाते हैं। सभी राजनीतिक दलों, मीडिया व सामाजिक संस्थाओं सहित सच्ची धार्मिक संस्थाओं को चाहिए कि प्रत्येक धार्मिक संस्थानों पर निगाह रखे जाने की मांग करें, व उसका समर्थन करें।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629
    
    

गुरुवार, दिसंबर 22, 2016

वाहनों पर विशिष्टता वाले प्रतीक चिन्हों के खतरे

वाहनों पर विशिष्टता वाले प्रतीक चिन्हों के खतरे
वीरेन्द्र जैन

        गत दिनों होशंगाबाद में 43 लाख के नये और पुराने नोटों के साथ एक व्यक्ति पकड़ा गया था जिसकी गाड़ी पर एंटी करप्शन सोसाइटी की प्लेट लगी हुयी थी। जिस दिन दिल्ली निर्भया कांड की तीसरी बर्सी मना रही ठीक उसी दिन एक और गैंग रेप हुआ तथा यह अपराध जिस वाहन से घटित हुआ उस पर गृह मंत्रालय की [नकली] प्लेट लगी हुई थी। अतीत को याद करें तो पटियाला में एक ऐसा अफीम तस्कर पकड़ा गया था जो पंजाब के डिप्टी सीएम का स्टिकर के साथ ही वीआईपी लिखा स्टिकर लगाकर पुलिस को चकमा देता रहा था। उसके पास से से 22 किलो अफीम मिली थी। एसएसपी गुरप्रीत गिल ने बाद में सम्वाददाताओं को बताया था कि पकड़े गये अवतार सिंह का मध्यप्रदेश के रतलाम इलाके में ढाबा है जिसे उसका पुत्र चलाता है। इससे पहले भी पुलिस मध्यप्रदेश में ही उसे 17 किलो अफीम के साथ पकड़ चुकी थी।
दिल्ली में काल सैन्टर में काम करने वाली एक लड़की जिगिशा घोष की हत्या कर दी गयी थी जिसकी जाँच में न केवल जिगिषा के हत्यारे ही पकड़े गये अपितु एक पत्रकार सौम्या विशवनाथन की हत्या का राज भी खुल गया था। दोनों ही हत्याएं उन्ही अपराधियों ने की थीं। जाँच में सबसे उल्लेखनीय बात यह सामने आयी कि अपराधियों के पास से अतिविशिष्ट व्यक्तियों द्वारा प्रयोग के लिए अधिकृत लाल बत्ती, पुलिस विभाग के प्रतीक चिन्ह, जज और प्रैस के स्टिकर, पुलिस महानिदेशक और उपमहानिरीक्षक की गाड़ियों पर लगने वाली नीली प्लेट, पुलिस की वर्दी तथा वायरलैस सैट भी मिले थे। प्रति दिन वांछित अवांछित आलोचना सुनने वाली पुलिस को इस कार्यवाही के लिए साधुवाद देने के साथ वाहनों पर लगाये जाने वाले प्रतीक चिन्हों की उपयोगिताएं आवश्यकताएं और दुरूपयोग की संभावनाओं पर विचार करना जरूरी है।
        आज प्रदेश की राजधानियों में सैकड़ों ऐसे वाहन पुलिस की आंखों के सामने से गुजरते रहते हैं जिनमें नम्बर प्लेट की जगह उस राज्य की सत्तारूढ पार्टी के झन्डे के रंग की प्लेट लगी होती है व उस पर दल के किसी प्रकोष्ठ के पदाधिकारी का नाम लिखा होता है। असल में ऐसी प्लेटें ट्रैफिक पुलिस कर्मचारियों को चेतावनी देने के लिए लगायी गयी होती हैं कि वे ट्रैफिक नियमों को धता बताते हुये उक्त वाहनों को किसी भी तरह की चैकिंग के लिए रोकने का दुस्साहस न करें। अपने भविष्य और सुविधाओं के बारे में सोच कर आम तौर पर पुलिस के लोग ऐसे वाहनों को रोकते भी नहीं हैं व कानून के पालन की ‘गलती’ कर देने पर ‘दण्डित’ भी होते हैं। यही विशेष सुविधा अपराधियों को इन विशिष्ट प्रतीक चिन्हों के दुरूपयोग को प्रोत्साहित करती है। आज सारे बड़े बड़े अपराध इन्हीं विशिष्ट चिन्हों से मण्डित वाहनों के सहारे किये जा रहे हैं। वाहनों पर पुलिस और प्रैस लिखवाने का फैशन चल गया है। अखबार में प्रिटिंग का काम करने से लेकर अखबार बांटने का काम करने वाले हॉकर तक अपनी साइकिलों बाइकों पर प्रैस लिखवाये हुये मिल जाते हैं जबकि यह पहचान अधिक से अधिक केवल डयूटी पर काम के लिए निकले अखबार के संवाददाता तक ही सहनीय होना चाहिये। भोपाल जैसे नगर में सिटी बसों सामान ढोने वाले ट्रकों आटो ही नहीं ट्रैक्टरों तक पर प्रैस लिखा देखा जा सकता है। डाक्टरों और मरीज वाहन को प्राथमिकता देने के लिए अनुशंसित रैडक्रास का निशान भी नर्सों वार्ड ब्वाय कम्पाउण्डरों, लैब तकनीशियनों से लेकर अस्पतालों के सफाईकर्मी तक प्रयोग में लाते हैं। पुलिस के सिपाहियों की साइकिलों पर भी पुलिस लिखा होता है जो परोक्ष रूप से उन चोरों को सावधान करने के लिए लिखवाया जाता है जो साइकिलें चुराते हैं। साइकिल पर अंकित ‘पुलिस’ संदेश देती है कि यह पुलिस वाले की साइकिल है इसे तो मत चुराओ। इतना ही नहीं सांसद विधायक से लेकर गांव के पंच सरपंच तक अपने वाहनों पर अपना पद लिखवाने लगे हैं। सरकारी अधिकारी ही नहीं कर्मचारी तक अपने विभाग का नाम व पद लिखवाते हैं, यहाँ तक कि वकील भी मोटे मोटे अक्षरों में एडवोकेट लिखवा कर रखते हैं। राजनीतिक दलों के पदाधिकारी तो अपना छोटे से छोटा पद बड़े से बड़े अक्षरों में लिखवाना पसंद करते हैं।
1990 के दशक से देश में साम्प्रदायिकता का जो पुर्नजागरण हुआ है उसके बाद से लोगों के हाथों में बंधे कलावों तिलकों अंगूठियों दाढियों चोटियों, गले में पड़े दुपट्टॊं आदि से ही नहीं उनके घरो के दरवाजों और वाहनों पर लिखे जयकारों से उनके धार्मिक विश्वासों का उद्घोष होता रहता है, भले ही उनके आचरण उनके धार्मिक उद्घोषों के विरोधी हों। अधिकांश वाहनों पर बाहर की तरफ जयघोष के साथ साथ उक्त धार्मिक पंथ के प्रतीक चिन्ह और हथियार आदि अंकित रहते हैं। इनका उपयोग केवल इतना भर होता है कि साम्प्रदायिक दंगों के दौरान अपने वालों से ही प्रताड़ित होने से बच सकें। इन चिन्हांकनों से धर्म और पंथ का कितना भला हुआ है इसका कोई प्रमाण कभी नहीं मिला तथा हजारों दुर्घटनाग्रस्त वाहनों को देखने पर पता चलता है कि इन धार्मिक उद्घोषों ने दुर्घटना से कभी कोई रक्षा नहीं की और ना ही वाहनों को चोरी से ही बचाया।
        देश में वाहनों का सड़कों और उनकी दशाओं के अनुपात में बेतुका विस्तार भविष्य में अनेकानेक समस्याओं को जन्म देगा, खास तौर पर तब, जब कि वाहनों के साथ ट्रैफिक नियमों का पालन तो दूर की बात है लोगों को सही तरीके से पार्किंग की भी तमीज नहीं है जिसे किसी भी पार्किंग स्थल पर देखा जा सकता है। इसलिए आवशयकता इस बात की है कि नये नये सस्ते वाहन आने से पहले ट्रैफिक नियमों के कठोर अनुपालन को सुनिश्चित करने की व्यवस्था की जावे जिसके लिए  स्थानीय राजनेताओं के प्रभाव से बचने के लिए उनके अर्न्तराज्यीय और जल्दी स्थानान्तरण की व्यवस्था हो। डयूटी वाले चिकित्सकों पुलिस व प्रशासन के वाहनों, डयूटी वाले मान्यता प्राप्त संवाददाताओं, एम्बुलैंस फायर ब्रिग्रेड आदि आवश्यक सेवाओं को छोड़ कर किसी भी वाहन के बाहर किसी भी प्रतीक चिन्ह को प्रकट करना कठोरता पूर्वक रोका जाये व विशिष्टता वाले वाहनों को उनकी सुरक्षा के नाम पर अनिवार्य रूप से चैक किये जाने की व्यवस्था हो।
जिस तरह मोबाइल आने के बाद अपराधी साधन सम्पन्न हुये हैं उसी तरह वे मोबाइल के रिकार्ड के कारण उसी अनुपात में पकड़ में भी आये हैं। आज के अधिकांश अपराधों में वाहनों का प्रयोग आम हो गया है और अपराधों को पकड़ने में वाहनों की चैकिंग बहुत मदद कर सकती है। वाहन नियमों के किसी भी उल्लंघन के दुहराव पर उसका दण्ड भी दुगना कर देने से ट्रैफिक अपराधों पर अंकुश लग सकता है। एक से अधिक वाहन रखने वाले परिवार पर अतिरिक्त कर लगाने का प्रस्ताव तो पहले से ही विचाराधीन है। सड़क पर वाहनों की पार्किंग को अतिक्रमण माना जाना चाहिये। बेहतर होगा कि हम विदेशों से वाहनों के माडलों की नकल ही न सीखें अपितु उनके यहाँ के ट्रैफिक नियम भी सीखें।
जिगीशा और सौम्या की हत्या करने वाले तथा अपने वाहन पर गृहमंत्रालय की प्लेट लगाने वाले यदि विदेशी आंतकी होते तो सहज ही कल्पना की जा सकती है कि वे कितने 26/11 दुहरा सकते थे।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास  भोपाल मप्र
फोन 9425674629



बुधवार, नवंबर 12, 2014

इस आदमी की ज़ामातलाशी तो लीजिए



इस आदमी की ज़ामातलाशी तो लीजिए  
वीरेन्द्र जैन                                             
                        
       अखबार में कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब कोई बाबा, पुजारी. संत, महंत, पादरी, मौलवी, योग गुरु, ज्योतिषी, चमत्कारी, या किसी न किसी पंथ की एजेंसी रखने वाला किसी अपराध में न पकड़ा जाता हो। मजे की बात यह है कि इन अपराधियों की पक्षधरता करने वाले वे लोग होते हैं जिनको ठगे जाने का नम्बर अभी नहीं लगा है और यह काम भविष्य में होने वाला है।
       जनसत्ता [10 नवम्बर 2014] में प्रकाशित समाचार के अनुसार पंजाब के मोहाली में पुलिस ने नवादा बिहार निवासी मन्दिर के एक ऐसे महंत को गिरफ्तार किया है जो मृत घोषित किया जा चुका था और उसकी कथित हत्या के आरोप में पाँच आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी थी जिनमें से चार सगे भाई हैं। 1984 में उनके पिता की हत्या के आरोप में इसी कथित मृत फर्जी संत को सजा हुयी थी। 1994 में जमानत मिलते ही यह व्यक्ति गायब हो गया था व मोहाली के एक गाँव के मन्दिर में महंत बन गया था। योजना अनुसार उसके पुत्र ने अपने पिता की कथित हत्या के आरोप में उक्त पाँच लोगों पर आरोप लगाया व गिरफ्तार करा दिया। उसने अपने ड्रामे को विश्वसनीय बनाने के लिए पिता का श्राद्ध भी किया। ये आरोपी लम्बे समय से न्यायिक प्रक्रिया में उलझे रहे और लम्बे समय तक जेल काटी बाद में जब उन्हें पटना हाईकोर्ट से जमानत मिली तो उन्होंने स्वयं जाँच की और पाया कि कथित मृतक के बेटे बार बार पंजाब जाते हैं। खोज करने पर उन्हें पता चल गया कि वह हत्यारा व्यक्ति गोपालदास के नाम से मन्दिर का महंत बना बैठा है। पिछले दिनों तहलका में अयोध्या के महंतों के बारे में विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित हुयी थी जिसमें बताया गया था कि वहाँ सैकड़ों की संख्या में पूर्वी उत्तर प्रदेश, बुन्देलखण्ड, चम्बल, बिहार आदि के फरार अपराधी साधु भेष धरे मुफ्त की मलाई खा रहे हैं और सेवा करवा रहे हैं। गत वर्ष मध्य प्रदेश में एक मस्ज़िद के इमाम ने रिपोर्ट दर्ज करवायी थी कि घृणा के कुछ प्रचारक जिनके आतंकी समर्थक  होने का संदेह है जमात में शामिल होकर घूम रहे हैं व मस्जिदों में ठहर रहे हैं। खालिस्तानी आतंकियों को अगर स्वर्ण मन्दिर में आश्रय न मिला होता तो न तो आपरेशन ब्लूस्टार जैसी घटना घटती और न ही देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री की हत्या होती। पिछले वर्षॉं में मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर में एक साध्वी के निर्माणाधीन आश्रम में राजस्थान का एक हत्यारा पकड़ा गया था।  
       पिछले दिनों चले स्वच्छता अभियान में गुजरात से भाजपा सांसद और ओह माई गाड जैसी फिल्मों के अभिनेता परेश रावल ने कहा था कि हमारे मन्दिरों में सबसे अधिक गन्दगी रहती है और वहाँ सफाई की ज्यादा जरूरत है। इसी क्रम में अगर आगे बढा जाये तो कहा जा सकता है कि धार्मिक संस्थान जनता की सबसे अधिक श्रद्धा के केन्द्र हैं और वहाँ भी सफाई की जरूरत है। स्वच्छता की परिभाषा हमारे समाज की नैतिकता से जुड़ी है। स्वच्छता का मतलब है कि जैसा होना चाहिए वैसा नहीं होना, और वैसा बनाने के लिए जो भी अवांछित है उसे हटाना। अगर धर्म के क्षेत्र में भी उसके आचरणों व आदर्शों से विचलित अनावश्यक लोग अतिक्रमण करके गन्दगी फैला रहे हैं तो उन्हें हटाने का काम किया जाना चाहिए ताकि मानव श्रद्धा के केन्द्रों को स्वच्छ किया जा सके। उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष जब आसाराम को एक किशोरी के यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार किया गया था तब भाजपा के बड़े बड़े नेता जिनमें से कई आज केन्द्र में मंत्री भी बने बैठे हैं, उनके पक्ष में खड़े हो गये थे। संयोगवश हमारे आज के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उनके पक्ष में नहीं थे और उसी दौरान उन्हें प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी चयनित किया गया था जिसके लिए सबका एक सुर में बोलना अनिवार्य बना दिया गया था। यही कारण रहा कि उन्हें चुप्पी ओढना पड़ी, यदि ऐसा नहीं होता तो आज भाजपा के अनेक नेता उनकी पक्षधरता के बहाने धर्मनिरपेक्षता विरोधी राजनीति कर रहे होते। स्मरणीय है कि जब एक शंकराचार्य पर हत्या आदि के आरोप लगे थे और उनके जेल जाने की स्थिति बनी थी तब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी समेत भाजपा के बड़े बड़े नेता कानून को अपना काम करने देने की जगह दिल्ली में अनशन पर बैठ गये थे। जब आसाराम जी गिरफ्तार हो गये और कानून व्यवस्था को जाँच की स्वतंत्रता मिली तो जाँच एजेंसियों को इतने सारे तथ्य मिले कि अब लगता है कि पीड़ितों को अपेक्षाकृत बेहतर न्याय मिल सकेगा व अवैध रूप से हथियायी हुयी चल अचल सम्पत्ति मुक्त हो सकेगी।
धर्म में श्रद्धा रखने वालों को यह बात समझने की जरूरत है कि नकली भेष धारण कर धर्म के नाम पर अनेक लोग उसके स्वयंभू ठेकेदार बन व्यापार कर रहे हैं जो धर्म की मूल भावना को नुकसान पहुँचा रहा है। यदि इस तंत्र में से गलत, अपराधी, और धनपशुओं को दूर कर दिया जाये तो वह अधिक दया, करुणा, और मानवीय मूल्यों से युक्त हो सकेगा। तुलसीदास ने रामचरित मानस में कहा है कि- परहित सरस धरम नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।
       जो धर्म करोड़ों लोगों की श्रद्धा का केन्द्र है, जिसके नाम पर लोग मरने कटने को तैयार हो जाते हैं और जो देश के लोकतंत्र से लेकर आंतरिक व बाह्य सुरक्षा तक को प्रभावित कर रहा है उसे अपराधियों के हाथों में कैसे छोड़ा जा सकता है। उसकी स्वच्छता को पहली प्राथमिकता पर रखा जाना चाहिए। जो लोग भी सच्चे संत और सन्यासी हैं उनका जीवन पारदर्शी होना चाहिए व श्रद्धालुओं को यह पता होना चाहिए कि जीवन की कैसी कैसी चुनौतियों का सामना करते हुए उन्हें अंतर्ज्ञान प्राप्त हुआ है। पौराणिक कथा नायकों से लेकर महावीर, बुद्ध, ईसामसीह, रामकृष्ण परम हंस, विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, गुरुनानक, मुहम्मद साहब, आदि सबका जीवनवृत्त खुला रहा है इसलिए यह जरूरी है कि धर्मों से जुड़े लोगों का पूरा जीवनवृत्त उसके श्रद्धालुओं को ज्ञात हो। कानून व्यवस्था के रखवालों का भी यह कर्तव्य बनता है कि वह ऐसे लोगों का जीवनवृत्त पता करने के लिए स्थानीय पत्रकारों व जीवनी लेखकों को प्रोत्साहित करने हेतु आवश्यक व्यवस्था करें व प्राप्त जानकारी की पुष्टि करें। कैसी विडम्बना है कि देश के प्रधानमंत्री तक पहुँच रखने वाले व उनके शपथ ग्रहण समारोह में सम्मलित होने वाले आचार्य बालकृष्ण की नागरिकता तक विवादित रही है व उन्हें इसके लिए पुलिस प्रताड़ना भी सहनी पड़ी है। एक टीवी कार्यक्रम में कई कलाकारों के पूछने पर भी सर्वाधिक सक्रिय बाबा रामदेव अपनी उम्र नहीं बताते।उन्होंने अचानक गायब हो गये अपने परम्पूज्य गुरु के प्रति कभी सार्वजनिक चिंता प्रकट नहीं की और न ही इसके लिए स्थानीय सरकार की आलोचना की।
       सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों का पूरा जीवन पारदर्शी होना चाहिए। दुष्यंत कुमार ने कहा है- फिरता है, कैसे कैसे खयालों के साथ वो, इस आदमी की ज़ामातलाशी तो लीजिए। 
वीरेन्द्र जैन                                                                           
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शुक्रवार, जुलाई 25, 2014

अपराध के आँकड़े, राजनीति का हिसाब और अनियंत्रित वाणी



अपराध के आँकड़े, राजनीति का हिसाब  और अनियंत्रित वाणी  
वीरेन्द्र जैन

       सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या किसी भी तरह की दूसरी घटनाओं में मरने वालों से अधिक है और इसके लिए केवल ट्रैफिक विभाग में चल रही अवैध वसूली ही नहीं अपितु राज्यों में सत्तारूढ दल भी बराबर से ज़िम्मेवार होते हैं क्योंकि व्यावसायिक वाहनों की नियमित वसूली का तय हिस्सा अधिकांश सत्तारूढ दलों के पदेश कार्यालय तक पहुँचता है जिससे कार्यालय संचालित होता है। यह वसूली सुचारु ट्रैफिक के लिए बनाये गये नियमों और करों के भुगतान में उल्लंघन के प्रति आँखें मूँद लेने से ही सम्भव होती है। गम्भीर दुर्घटनाओं के दृश्य बहुत ही दिल दहलाने वाले होते हैं, पर आज तक उसके लिए किसी भी राजनेता या ट्रैफिक अधिकारी को सजा नहीं मिली है। सभी जानते हैं कि ट्रैफिक अधिकारी की नियुक्ति और पदस्थापना में कितना जबरदस्त लेन देन चलता है जिसकी पूर्ति, नियमों के उल्लंघन द्वारा वाहनों के अवैध संचालन की अनदेखी करने पर ही सम्भव हो पाती है। अधिकतर दुर्घटनाएं ऐसे ही वाहनों से होती हैं जो ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन कर चल रहे होते हैं। जिन हत्याओं को अखबार वालों ने आनर किलिंग का नाम दे दिया है उससे जुड़ी हत्याएं या आत्महत्याएं भी निरंतर बढ रही हैं पर उस सामाजिक अपराध को व्यक्तिगत अपराध मान कर कुछ भी नहीं किया जा रहा। दण्ड के भय में कमी अनेक अपराधों को प्रोत्साहित करती है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश काटजू साहब ने अपने एक फैसले में उत्तर प्रदेश में न्यायिक स्थिति पर बहुत कटु टिप्पणी की थी। खाप पंचायतों और प्रेमी प्रेमिका के परिवार के लोगों ने अपने ही आत्मीयों की जिस निर्ममता से हत्याएं की गयी हैं उनके खिलाफ कई सारे दल बोलने से बचते रहे हैं।   
       समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश राज्य की वर्तमान सरकार के सुप्रीमो पिता मुलायम सिंह यादव का यह बयान कि आबादी के अनुपात में उत्तरप्रदेश में बलात्कार बहुत कम हैं एक गलत समय पर फूहड़ तरीके से व्यक्त की गयी आंकड़ागत सच्चाई है। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो एक पूर्व अध्यापक राजनेता के साथ यह विवाद भाषा और गणित का सवाल जैसा है जिसमें एक ओर आबादी और यौन अपराध के आंकड़ों का अनुपात निकाला जा रहा है तो दूसरी ओर बयान में उस भाषा की कमी प्रकट होती है जो किसी संवेदनशील स्थिति की मांग होती है। बुन्देली भाषा में एक लोकोक्ति है कि - सच्चाई होते हुए भी माँ को अपने बाप की औरत नहीं कहा जाता। असल में उत्तरप्रदेश का पिछड़ापन, महानगरीय और औद्योगिक संस्कृति विकसित न होने के कारण सामंती सोच का बना रहना, वोटों की राजनीति के कारण जातिवाद और साम्प्रदायिकता का लगातार पल्लवित पुष्पित होते रहना, अपराध और राजनीति का एकाकार हो जाना ही समस्या की मुख्य जड़ में है। पश्चिमी उत्तरप्रदेश में प्रचलित एक कथन के अनुसार किसी के खेत से ईख उखाड़ लेना और एक जाति विशेष की दलित लड़की को यौन शोषण के लिए पकड़ लेना कोई उल्लेखनीय अपराध नहीं होता। हमने यौन शोषण के खिलाफ भले ही कागजी कानून बना कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली हो पर मानसिकता बदलने के लिए कोई सामाजिक आन्दोलन खड़ा नहीं किया। कभी बहुजन समाज पार्टी के जनक काँशीराम से एक सामाजिक आन्दोलन की उम्मीद की गयी थी पर उनकी राजनीति जल्दी ही फुस्स हो कर दलित वोटों के व्यापार में बदल कर रह गयी। रोचक यह है कि मुलायम सिंह की मुख्य प्रतिद्वन्दी सुश्री मायावती भी कभी बेलाग बोलती थीं पर बाद में वे केवल लिखवा कर लायी गयी परचियों से ही पड़ने लगी थीं। मुलायम सिंह के लिए भी ऐसा ही भाषण लेखक ही नहीं अपितु उनका तो प्रवक्ता भी होना चाहिए।   
       जिन घृणित और निन्दनीय अपराधों का उत्तरप्रदेश में सभी ओर से विरोध हो रहा है वह विरोध सर्वथा उचित होते हुए भी याद रखना होगा कि वे अपराध न तो नये हैं और न ही उनमें एकदम से बाढ आ आ गयी है। इस सदी के पहले दशक मे देश में औसतन 21024 बलात्कारों की शिकायत दर्ज़ हुयी है जबकि सब जानते हैं कि सामंती समाजों में ऐसे अपराधों की शिकायत बहुत ही कम दर्ज़ होती हैं । आनुपातिक रूप से ऐसे ही भयानक अपराध मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार, छत्तीसगढ, झारखण्ड, उड़ीसा व आन्ध्र प्रदेश में भी वर्षॉं से घटित होते रहे हैं और अभी भी हो रहे हैं, किंतु इनके तीखे विरोध के कुछ कारण हैं जिनमें पहला है कि पुलिस में एक जाति विशेष के लोगों को प्रमुख स्थानों पर तैनात किया जाना और उन लोगों द्वारा अपनी जाति के अपराधियों के खिलाफ कार्यवाही में लापरवाही बरतना। दूसरा सबसे बड़ा कारण वहाँ के सत्तारूढ दल समाजवादी पार्टी का गत लोकसभा चुनाव में पिछड़ना है जिस कारण वहाँ सफल हुयी भाजपा अपनी अभूतपूर्व लोकप्रियता घटने से पहले ही वहाँ चुनाव करा कर अपनी सरकार बना लेना चाहती है। कुछ आंकड़ों का अध्ययन ध्यान देने योग्य है।
दल/वर्ष
2007 विधानसभा
मत प्रतिशत
2009 लोकसभा
मत प्रतिशत
2012 विधानसभा
मत प्रतिशत
2014 लोकसभा
मत प्रतिशत
समाजवादी पार्टी
13267000
25
12885000
23
22090000
29
17989000
22
बीएसपी
15872000
30
15191000
27
19647000
26
15914000
19
भाजपा
08851000
17
09696000
17
11371000
15
34318000
42
कांग्रेस
04489000
09
10113000
18
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12
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08
आरएलडी
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04
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03
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02
00689000
01
     
ये आंकड़े बताते हैं कि भाजपा के पक्ष में लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान 2009 की तुलना में ढाई करोड़ वोटों का बढना उसे इस बात के लिए प्रेरित कर रहा है कि वो किसी भी तरह प्रदेश की वर्तमान सरकार को गिराकर अपनी सरकार बना ले क्योंकि विधानसभावार आंकड़े भी उसके पक्ष में हैं।
       इसमें कोई सन्देह नहीं कि यौन शोषण, बलात्कार और नृशंस हत्याओं की घटनाएं निन्दनीय हैं और उस पर भी सरकार की छवि की चिंता में पुलिस द्वारा उन घटनाओं पर लीपापोती की कोशिश, सत्तारूढ दल के नेताओं के असम्वेदनशील बयान जले पर नमक के समान हैं। उनकी जितनी भी भर्त्सना की जाये वह कम है। पर इसके साथ साथ यह भी ध्यान रखने की बात है कि इसके बहाने साम्प्रदायिक नफरत फैला कर वैसे ही अपराध करने वाले राज्य की सत्ता न हथिया लें। अमरनाथ यात्रा के दौरान घोड़ेवालों और लंगरवालों के झगड़े के बाद देश भर के मुसलमानों को तोगड़िया की वह धमकी भी ध्यान देने योग्य है जिसमें वे कहते हैं कि अगर गुजरात भूल गये हो तो मुज़फ्फरनगर तो याद होगा। दुर्भाग्य यह है कि लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का बड़ा हिस्सा अपनी सामाजिक जिम्मेवारियों को भूल कर लालचवश साम्प्रदायिक प्रचार का शिकार बन रहा है। कहीं ऐसा न हो कि गड़रिये से नाराज भेड़ें कसाई की शरण में पहुँच जायें।
वीरेन्द्र जैन
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