शनिवार, जुलाई 09, 2011

देहली वैली - हिन्दी फिल्म उद्योग और राजनीति पर तेज प्रहार

देहली वैली- हिन्दी फिल्म उद्योग और राजनीति पर तेज प्रहार

वीरेन्द्र जैन

किसी फिल्म पुरस्कार समारोह में आमिर खान ने बरसात फिल्म के गाने पर अभिनय करके राज कपूर को जीवंत कर दिया था। इसमें कोई सन्देह नहीं कि आमिर खान इस युग के राज कपूर हैं जो समकालीन विषयों पर यथार्थवादी, मनोरंजक, और राजनीतिक सामाजिक विसंगतियों पर तेज प्रहार करने वाली फिल्में बनाते हैं। इन फिल्मों में अंतर्निहित व्यंग्य बिना किसी मुखर नारे के समाजिक यथार्थ के ऐसे दृष्य बिम्ब सामने लाता है जो हमको समाज के प्रति बढती उदासीनता के कारण उपेक्षित होते जा रहे विषयों पर विचार करने के लिए विवश कर देते हैं। खेद है कि इस फिल्म में पात्रों द्वारा प्रयुक्त गालियों से विचलित अनेक समीक्षक फिल्म के मूल विषय, उसके सन्देश और प्रभाव की उपेक्षा कर गये।

फिल्म का नाम देहली वैली है। कश्मीर वैली[घाटी] शब्द हमारे समाचार माध्यमों में इतना अधिक आया है कि वैली शब्द से ही एक ऐसे क्षेत्र की ध्वनि निकलती है जहाँ पिछले कई दशकों से क्षेत्र के निवासियों का एक वर्ग अलगाववादी हिंसक आन्दोलन चला रहा है, जिसके प्रति पूरा देश चिंतित है। देहली वैली[घाटी] नहीं है, किंतु असामाजिक तत्वों के काम, उनकी स्वतंत्र सत्ता, उनके उत्पीड़न, आदि इसे एक वैली ही बना देते हैं, जिसके प्रति एक दिशाहीन असंतोष मौजूद रहता है। देहली के राजधानी होने के कारण इसकी दशा पूरे देश की दशा का प्रतिनिधित्व करती है। फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं है जो उसे केवल देहली शहर की फिल्म बताता हो, इस के जैसे कोलकता, मुम्बई और दूसरे साठ बड़े शहर भी हो सकते हैं। पुराने शहर के वही पुराने जर्जर मकान, तथा वैसे ही मकान मालिक, झरते चूने की दीवारें, शौचालय जीने, और जिन्दा रहने के लिए दिन प्रतिदिन झूझते निम्न मध्यमवर्गीय किरायेदार, उनके घिसटते पुराने वाहन, भी सभी जगह हैं। कलाएं ऐसे प्रतीक चुनती हैं जिससे किसी एक चावल को परख कर पूरी हंड़िया का पता चल सके। संघर्ष के कई रूप होते हैं, जिनमें से जीवन संघर्ष भी एक है।

आम हिन्दी फिल्मों की करीने से सजी साफ सुथरी गरीबी से अलग आमिर की फिल्में शायद पहली बार सच्चे मध्यम वर्ग को केन्द्र में रख कर बनायी जा रही हैं, और उसमें यथार्थ जगत से ही चुनकर ऐसे रोचक प्रसंग जोड़े जाते हैं कि फिल्म व्यावसायिक स्तर पर भी दूसरी सफल फिल्मों को पीछे छोड़ देती है। दर्शक इन फिल्मों में अपना घर परिवेश और खुद को देख कर इसी तरह हँसता है जैसे होली खेल कर आने के बाद हम आप आइने में अपनी शक्ल देख कर हँसते रहे हैं। व्यंग्य का एक सजग पाठक और छोटा मोटा लेखक होने के कारण मैं जानता हूं कि व्यंग्य की धार तेज करने के लिए उसमें अतिरंजना डालना पड़ती है। वह अतिरंजना उस मूल प्रवृत्ति को बहुत साफ साफ रेखांकित कर देती है जिस पर व्यंग्य किया जा रहा हो। यह वैसा ही है जैसे हम अपने लेखन में कुछ पंक्तियों को बोल्ड कर देते हैं।

एक पत्रकार, एक प्रैस फोटोग्राफर, और एक व्यावसायिक कार्टूनिस्ट एक साथ रहते हैं, और हास्टल के छात्रों की तरह एक साथ रहने, खाने पीने, आलस करने व अपना काम एक दूसरे पर टालने, आपस में गाली गलौज करते करते साथ जीवन गुजार रहे हैं, क्योंकि उनके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है। इस तरह के रहन सहन में वह बनावट नहीं होती, जिसे तथाकथित सभ्यता कहा जाता है। जिनसे आप अपनी सभ्यता की उम्मीद करते हैं, पहले उन्हें अपने जैसे संसाधन तो उपलब्ध कराइए। यह अ-सभ्यता जब रहन सहन में है तो भाषा और व्यवहार में होगी ही होगी। फिल्म में पात्रों द्वारा प्रयुक्त गालियां उनके रहन सहन के साथ इतनी एकाकार हैं कि उनके मुँह से अस्वाभाविक और यौनिक नहीं लगतीं। आमिर की फिल्मों से पहले बोलचाल की यह स्वाभाविकता तो बड़े बड़े नामी यथार्थवादी हिन्दी फिल्म निर्माता भी नहीं ला सके थे। परोक्ष में यह फिल्म व्यावसायिक फिल्म निर्माताओं पर वैसा ही कटाक्ष भी है जैसा कि पीपली लाइव में विजुअल मीडिया पर किया गया है। फिल्म की ग्लैमर केन्द्रित हीरोइन के नाज नखरे, फूहड़ स्वर में बेहूदे ढंग से गाने की कोशिश, अपने चित्रों को पत्रकारों को जबरदस्ती देना, नकली ढंग से शरमाते शरमाते अपनी मेक-अप करने वाली के इशारे पर गा कर दिखाना उस फिल्म जगत पर कटाक्ष है। समाज में अपसंस्कृति का फैलाव ऐसा हो गया है कि वही फूहड़ गाना एल्बम के रूप में सामने आकर एक महिला फिल्म पत्रकार की अच्छी कमाई करा देता है किंतु इस फिल्म के दर्शकों को संगीत के आनन्द की जगह हँसी आती है। दूसरी ओर परम्परागत संगीत की कक्षाएं ऐसे जर्जर भवन में चल रही हैं जहाँ नर्तकी के पाँव की धमक से फर्श नीचे चला जाता है व उसका पाँव शास्त्रीय कलाओं की तरह अधर में लटक जाता है जो न नीचे जा रहा होता है और न ऊपर आ रहा होता है।

फिल्म में बाजारू खाने की गन्दगी से उपजे पेट के रोगों, पानी की कमी और डिब्बा बन्द जूसों का आधिक्य आदि की दशा बताने के लिए इतनी बार शौचालय प्रसंग लाये गये हैं कि आम दर्शक घिना सकता है पर दूसरी ओर यही घृणास्पद स्थितियां एक बड़े समाज का यथार्थ भी हैं जिन्हें हम चाहे अनचाहे झेल रहे हैं। फिल्म में कानून व्यवस्था की खराब हालत, लोगों का पुलिस के पास जाने से बचना, अपराधियों का इस तरह व्यवहार करना जैसे कि उन्हें किसी से कोई भय ही नहीं है, असीमित समय तक बेबकूफ प्रबन्धक के नीचे काम करने वाले कार्टूनिस्ट की मजबूरी, फोटोग्राफर को मकान किराया चुकाने के लिए ब्लेकमेलिंग के लिए विवश होना तथा पत्रकार को बेहद निजी क्षणों में भी काम पर जाने की गुलामी को भी दर्शा कर असंगठित क्षेत्र में चल रहे शोषण की ओर संकेत किये गये हैं। कुल मिला कर यह चाशनी में मिला कर दी गयी कढुवी औषधि है। जो चाशनी के स्वाद में अटक कर रह गये हैं उन्हें भी इसमें छुपी दवा असर करेगी क्योंकि हम दूसरों पर हँसते समय यह तय कर लेते हैं कि हमें ऐसा कुछ नहीं करना है जिससे हम पर कोई हँस सके। जो लोग भी इसका विरोध कर रहे हैं वे दर्शकों का ध्यान खींच कर परोक्ष में निर्माता की व्यावसायिक मदद ही कर रहे हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि इस फिल्म के साथ रिलीज अमिताभ बच्चन की फिल्म बुड्ढा होगा तेरा बाप पीछे छूट गयी जबकि इसके विज्ञापन में अमिताभ को सबका बाप बताया जा रहा था।

वीरेन्द्र जैन

2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड

अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023

मो. 9425674629

बुधवार, जुलाई 06, 2011

रामदेव के बयानों के भूसे में सत्य की तलाश


रामदेव के बयानों के भूसे में सत्य की तलाश

वीरेन्द्र जैन

रामकिशन यादव ने बाबा रामदेव बनते ही अपने बाल बढाये, भगवा कपड़े पहने और माथे पर तिलक लगाने लगे। इस भेषभूषा को एक सन्यासी की भेषभूषा माना जाता है, तथा हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले इसी भेषभूषा के कारण उस व्यक्ति को सत्य अहिंसा और सर्वे भवंतु सुखिना की कामना करने वाला मानते हैं। इस तरह उन्होंने हजारों वर्ष पूर्व के पतंजलि योग को रंगीन टीवी रखने वाले मध्यम वर्ग के बीच पहुँचाया और उनका ध्यान आकर्षित किया। उनका यह अभियान उस दौर में प्रारम्भ हुआ जब नये नये चौबीस घंटे वाले चैनल अपने प्रसार की तेज दौड़ में थे और नया नया दृष्य मीडिया अपना स्थान बना रहा था। अचानक मिली इस लोकप्रियता को भुनाने के लिए उन्होंने आशाराम बापू आदि की तरह आयुर्वेदिक दवाइयों की बिक्री भी प्रारम्भ की जो एक सस्ती और प्राचीन देशी पद्धति होने के कारण किसी भगवा भेषधारी से जुड़ कर धार्मिक सी महसूस होती है। योग से लेकर आयुर्वेद तक रामदेव के पास कुछ भी मौलिक नहीं था। उन्होंने राजीव दीक्षित आदि के सहयोग से आर्यसमाज की तरह के सुधारवादी लेख भी लिखे, और समाचार पत्रों में प्रकाशित करवाये, जो नवविकसित मध्यम वर्ग को प्रभावित करते थे। उनके पास अगर कुछ मौलिक है तो वह है उनकी मार्केटिंग की क्षमता और उसके लिए उचित समय का चुनाव।

राजनीति में आने के लिए भी उन्होंने जो समय और मुद्दा चुना वह बहुत ही उपयुक्त था तथा यदि अन्ना हजारे जैसे व्यक्ति सामने नहीं आते तो भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावनाओं का नेतृत्व हथियाने में वे सफल हो जाते। खादीधारी अन्ना के आगे निकल जाने से वे देर तक अन्ना हजारे का साथ नहीं दे सके और उनके सहयोगी से प्रतियोगी होने में उन्होंने देर नहीं की तथा भाजपा से तुरंत ही सहयोग का हाथ बढा दिया।

अपराध शास्त्र में बताया गया है कि कोई व्यक्ति कितना भी बनावटी क्यों न हो किंतु जब भी अचानक घटी कोई घटना उसे हतप्रभ कर देती है तो उसकी सहज प्रतिक्रिया से उसके व्यक्तित्व की असलियत सामने आ जाती है। गत 4 जून 2011 को आधी रात के दौरान जब पुलिस ने छापा मार कर उन्हें गिरफ्तार किया और वहाँ एकत्रित भीड़ को खदेड़ा तब रामदेवजी ने जो कुछ किया उससे उनकी सोच, भाषा, और आत्मविश्वास की दशा के साथ भाजपा और संघ परिवार की भाषा का साफ संकेत मिलता है। गत 5 जून को पत्रकारों से उन्होंने कहा-

  • मेरी जान को इस समय केन्द्र सरकार से खतरा है। यदि मुझे कुछ होता है तो इसके लिए सोनिया गान्धी और कांग्रेस जिम्मेवार होगी। [सारे आरोपों को सोनिया गान्धी पर लगाने की संघ परिवार की नीति]
  • मुझ पर और मेरे समर्थकों पर हमला सोनिया गान्धी और उनके सिपहसालारों ने कराया। उन्हें देश की जनता से प्यार नहीं है। [उपरोक्त]
  • पुलिस ने मेरे साफे से मेरा गला घोंट कर मारने की कोशिश की थी। पुलिस ने बेदर्दी से मेरे हाथ पैर पकड़े और पुलिस की जीप में डाल दिया, जिससे मेरी गरदन में चोट आयी। [हत्यारी पुलिस कमजोर सिद्ध हुयी]
  • मैं दो घंटे तक मंच के नीचे महिलाओं के बीच छुपा रहा, और देखा कि पुलिस ने कई राउंड गोलियां चलाईं और आंसू गैस के गोले छोड़े, निहत्थे लोगों को बेदर्दी से मारा पीटा, जिनमें से सौ से अधिक लोग घायल हैं और कई की हालत गम्भीर हैं। मैं आंखों पर पट्टी बांध कर बैठा रहा [पुलिस को इसका हिसाब देना पड़ता है कि कितने राउंड गोलियां चलायीं। पर महिलाओं के बीच आंखों पर पट्टी बाँधे छुपे बाबा ने देख और गिन लिया कि सौ से ज्यादा लोग घायल हैं और कई गम्भीर हैं]
  • पुलिस वाले राक्षसी प्रवृत्ति पर उतारू थे, उनका मकसद मुझे कुचल कर मारने का था।[ एक ही प्रैस कांफ्रेंस में पुलिस द्वारा दूसरी तरह से मारने की कोशिश का आरोप ]
  • मेरे साथी बालकृष्ण ने चिट्ठी पर दस्तखत दबाव में किये थे। यदि वे दस्तखत नहीं करते तो केन्द्र सरकार उनके लाखों समर्थकों की लाशें बिछवा देती। [ पर बाद में मंच पर आकर न तो दबाव महसूस किया और ना ही उन्होंने अनशन स्थगित किया, न इसका खुलासा किया]
  • पुलिस से कुचलवा कर मारने की केन्द्र की साजिश थी। [उसी प्रैस कांफ्रेंस में, दिल्ली राज्य पुलिस की जगह केन्द्रीय सरकार ने ले ली]
  • यदि मेरा और चारों मंत्रियों का नार्को टेस्ट करवाया जाये तो सच का पता चल जायेगा। [सुझाव तो अच्छा था, पर पता नहीं कि वे इस मांग पर टिके रहते या येदुरप्पा की तरह शपथ लेने से मुकर जाते, अगर यह मांग मानी जाती तो यह टेस्ट बाबा के बारे में और भी कुछ जानकारियां जनता के सामने ला देता, पर केन्द्रीय मंत्रियों की गोपनीयता के शपथ का क्या होता?]

[जनसत्ता, 6 जून2011 की रिपोर्ट से]

इसके अलावा भी बौखलाये बाबा ने घटना के पूर्व और पश्चात जो बयान दिये वे भी ध्यान देने लायक हैं।

· कभी उन्होंने उत्तराखण्ड सरकार से कहा था कि स्वास्थ और पेय पदार्थों से जुड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का भंडाफोड़ करने के कारण उन्हें अपने विरोधियों से हमले की आशंका है, इसलिए उन्हें ज़ेड श्रेणी सुरक्षा दी जानी चाहिए।[बाद में उन्होंने खतरे का ड्रामा भी रचा पर पकड़े गये पात्र ने सच बयान कर दिया]

· लखनऊ\ बाबा रामदेव ने दावा किया कि करोड़ों दलित उनके अनुयायी हैं और अगर वे बदलाव लाने की प्रक्रिया शुरू करेंगे तो सब उनका साथ देंगे।

· मैं जल्द ही अपनी पार्टी बनाउंगा जिसका नाम भारत स्वाभिमान पार्टी होगा। अगले लोकसभा चुनावों में मेरी पार्टी सभी 543 सीटों पर चुनाव लड़ेगी।

· नई दिल्ली\ बाबा रामदेव ने कहा कि वे राष्ट्रीय सवयं सेवक संघ को राष्ट्र द्रोही संगठन नहीं मानते और अपने आन्दोलन में उसका साथ लेने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।

· जून के बाद देश की राजनीति में बड़े बदलाव की सम्भावना है। देश में आर्थिक सामाजिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में बड़ा बदलाव आ सकता है।

· नई दिल्ली 28 फरबरी 2011\ बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार में लिप्त केन्द्र सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए लोगों को सड़क पर उतरने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारतमाता के एक सेवक को ब्लडी इंडियन और कुत्ता कहने वाले को संसद में बिठाया जाता है और बाबा से हिसाब मांगा जाता है।

· हरिद्वार 12 अप्रैल 2011- बाबा रामदेव ने अपनी सन्यास दीक्षा की सोलहवीं वर्षगांठ के अवसर पर कहा कि उनके हाथों में हथकड़ियां, और पैरों में बेड़ियां डालने की तैयारी की जा रही है। जो ताकतें यह साजिश रच रही हैं उनमें उद्योग जगत, भ्रष्ट राजनेता व अफसरशाही शामिल हैं, इनका खुलासा वे वक्त आने पर करेंगे। अपने खुद के उद्योगपति होने के जबाब में उन्होने कहा कि आर्थिक समृद्धि होना, दरिद्रता दूर करना कोई उद्योगपति बनना नहीं है, अर्थ से समर्थता आती है।

· नई दिल्ली 26 जून 2011\ मुझे गीदड़ की मौत नहीं मरना था। मुझे केन्द्र की कठपुतली बनी पुलिस के हाथों नहीं मरना था इसलिए में वहाँ से निकल गया। मुझ से मुरारी बापू और श्री श्री रवि शंकर सहित अखाड़ों के संतों ने अनुरोध किया कि था, इसलिए मैंने अनशन तोड़ा। मैंने अनशन इसलिए नहीं तोड़ा कि प्राण संकट में थे। जो भी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठायेगा हम उसी के साथ खड़े होंगे।

· हरिद्वार 1 जुलाई 2011\ रामदेव ने आरोप लगाया है जहर का इंजेक्शन देकर मरवाये गये स्वामी नित्यानन्द की तरह ही उनकी भी हत्या की गहरी साजिश रची गयी थी। पर वे निगमानन्द की तरह नहीं मरना चाहते थे। दिल्ली पुलिस की यह साजिश थी कि उन्हें मार कर यह कह दिया जाए कि वे भीड़ की भगदड़ में कुचल कर मर गये। उन्होंने दिल्ली पुलिस के अफसरों से तीन बार कहा कि वे उन्हें गिरफ्तार करें। [ शायद बाबा महिला भेष में गिरफ्तार होना चाहते होंगे तभी उन्होंने किसी महिला के कपड़े पहिन लिए थे]

यदि सुदर्शन की कहानी हार की जीत के सन्देश को याद किया जाये तो ऐसे बाबाओं की वजह से भविष्य में लोग बाबाओं पर भरोसा करना छोड़ सकते हैं। बाबा समुदाय को ध्यान देना चाहिए।

वीरेन्द्र जैन

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मो. 9425674629