शनिवार, जनवरी 24, 2015

फिल्म समीक्षा ‘डौली की डोली’ विवाह संस्था पर सवाल उठाता मनोरंजन



फिल्म समीक्षा         
‘डौली की डोली’ विवाह संस्था पर सवाल उठाता मनोरंजन

वीरेन्द्र जैन
       यह संयोग है कि जिस दिन देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हरियाणा में ‘बेटी बचाओ बेटी पढाओ’ का आवाहन दुहराया उसी के दो दिन बाद फिल्म ‘डौली की डोली’ रिलीज हुयी जो अप्रत्यक्ष रूप से खरीदी हुयी बहुओं से जनित समस्या की ओर भी इंगित करती है। उल्लेखनीय है कि हरियाणा और पंजाब में लिंगानुपात की स्थिति बहुत खराब है और वहाँ उड़ीसा या बंगला देश से खरीद कर लायी हुयी लड़कियों से विवाह किया जाने लगा है। समाचार हैं कि कई बार अपराधी तत्व लुटेरी दुल्हनों के सहारे घरों के सारे माल की सफाई करवा देते हैं, और अपराधबोध से ग्रस्त परिवार पुलिस रिपोर्ट भी नहीं कर पाते। यद्यपि फिल्म में लिंगानुपात की जगह सुन्दर बहू को घर लाने की लोलुपता को कहानी का आधार बनाया गया है, किंतु दोनों ही मामलों में मूल समस्या तो यही रहती है। इस फिल्म में जो पहला शिकार बताया गया है वह भी हरियाणा का सम्पन्न किसान परिवार ही है, जिसके पास पैसा है पर बहू चाहिए।
विवाह संस्था समाज की बहुत महत्वपूर्ण संस्था है और लोकप्रिय फिल्मों, नाटकों या साहित्य की बहुत सारी समस्याएं इसी संस्था में आ गयी बुराइयों के आसपास घूमती रहती हैं। देखने में आ रहा है कि सर्वाधिक सात्विक चुटकले परिवार के परम्परागत ढाँचे के चरमराने पर ही बनाये जा रहे हैं। महानगरों में बहुत सारे युवा अविवाहित रहना पसन्द कर रहे हैं और लिव इन रिलेशन्स को कानूनी मान्यता के बाद सामाजिक मान्यता भी मिलती जा रही है। विषयगत फिल्म का मूल भाव भले ही विवाह संस्था से मनोरंजन निकालना हो किंतु विषय में प्रवेश करने पर उसकी समस्याओं से अछूता रहना तो सम्भव नहीं है। इसी फिल्म के एक व्यंगात्मक डायलाग में कहा गया है कि शादी चाहे परम्परागत होती या लुटेरी दुल्हिन के साथ हुयी हो पति तो दोनों ही स्थितियों में लुटता है, जेब तो उसी की खाली होती है।
       राजकुमार राव एक अच्छे अभिनेता है और इस फिल्म में उन्होंने अपनी बनी हुयी गम्भीर छवि से अलग हट कर हास्य भूमिका की है व उसमें भी सफल रहे हैं। इसी फिल्म में दादी की भूमिका निभा रही पात्र का बार बार और पुलिस पूछ्ताछ तक में भी एक ही वाक्य का बोलना कि ‘बेटी दी सब कुछ दिया’ भी अच्छा हास्य पैदा करता है। प्रसिद्ध व्यंगकार शरद जोशी भी किसी के कमजोर तकिया कलाम या गलत भाषा प्रयोग का दुहराव कर कर के हास्य पैदा करते थे। फिल्म में सोनम कपूर, पुलकित सम्राट और वरुण शर्मा भी हैं जिन्होंने भूमिका के अनुरूप ठीक अभिनय किया है।
       यह एक छोटी और कम बज़ट की फिल्म है जिसमें एक से अधिक आइटम सौंग हैं और अतिथि कलाकार की तरह प्रसिद्ध कलाकार भी आते हैं। सलमान खान के भाई और मलाइका अरोरा के पति अरबाज खान की इस हास्य प्रधान फिल्म का निर्देशन अभिषेक डोगरा ने किया है व तमाम मनोरंजक मसालों से सजाया है, पर इसका दुर्भाग्य यह है कि दर्शक अभी हाल ही में ‘पीके’ जैसी फिल्म देख चुके हैं जिसमें भरपूर मनोरंजन के साथ सामाजिक सन्देश भी था। ‘पीके’ का हैंग ओवर अभी बाकी है। यह फिल्म भारतीय दर्शकों की आदतों के विपरीत एक बहुत छोटी फिल्म है, जो सिनेमा हाल तक गये दर्शकों में एक अतृप्ति सी छोड़ती है।
       जब कलाएं कोई उपदेश या सन्देश न देकर अपने दर्शकों और पाठकों से सन्देश निकालने की स्वतंत्रता की नीति के अनुरूप रची जाती हैं तो वे कलाप्रेमियों को भी कला रचना में शामिल कर लेती हैं। कला प्रेमी अपनी समझ और सोच के अनुरूप सन्देश निकालता है। यह फिल्म जिस तरह के दर्शकों के पास तक अपनी पहुँच बना सकेगी वैसा ही सन्देश भी दे सकेगी।   
वीरेन्द्र जैन                                                                           
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गुरुवार, जनवरी 22, 2015

किरण वेदी पर लगाया भाजपा का दाँव



किरण वेदी पर लगाया भाजपा का दाँव
वीरेन्द्र जैन

       भाजपा ने श्रीमती किरण वेदी को दिल्ली विधान सभा चुनावों में मुख्यमंत्री पद प्रत्याशी की तरह उतारने का फैसला किया है। इसके संकेत भाजपा द्वारा देर तक मुख्य मंत्री पद प्रत्याशी न घोषित करने व भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने के बाद श्रीमती वेदी द्वारा भाजपा के पुराने कार्यकर्ताओं के साथ रंगरूटों जैसे व्यवहार से मिल गया था। यह भाजपा नेतृत्व का हताशा में उठाया गया कदम है। आम जनता को अपने दुहरे चरित्र से भ्रमित करने वाली भाजपा इस बार अपने ही शिखर के नेताओं और समर्थकों के साथ धोखा कर रही है। यही कारण है कि इस पार्टी को मोदी की पार्टी में बदल जाने के बाद आम कार्यकर्ताओं द्वारा पहली बार ऐसा खुला विद्रोह हुआ जिसे दबाने के लिए पुलिस और आरएएफ बुलानी पड़ी।  
       श्रीमती किरण वेदी और भाजपा को जानने वाले एक अनुभवी पत्रकार का मानना है कि यह एक खतरनाक फैसला है। उनका कहना है कि एक भले व्यक्तित्व की ख्याति रखने वाली किरण वेदी भाजपा जैसे दल के परम्परागत नेतृत्व की तरह काम करने की दृष्टि से अपात्र हैं। यह एक संयोग है कि वे देश की पहली आईपीएस अधिकारी हैं और उनकी पदस्थापना दिल्ली में रही है जहाँ समाचारों के लिए भूखे भेड़ चाल वाले मीडिया के लिए वे एक ज्वलंत विषय बन कर उभरीं थीं। इसी पहचान ने उन्हें परम्परागत पुलिस अधिकारी से अलग पहचान दी और इसे बनाये रखने की प्रेरणा भी दी। देश के तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी के किसी ड्राइवर द्वारा गलत स्थान पर खड़ी की गयी कार पर अनजाने में दण्ड लगा देना और उस दण्ड पर स्थिर रहना केवल इसलिए खबर बन गया था क्योंकि वे एक महिला आईपीएस थीं और उस समय तक महिला अधिकारियों तक को आमतौर पर कमजोर और ढुलमुल माना जाता था। इसी दौरान ऐसे ही ढेर सारे दृढ फैसले राज्यों के सैकड़ों आईएएस आईपीएस पुरुष अधिकारियों द्वारा लिये जाते रहे पर वे खबर नहीं बन सके, बनना भी नहीं चाहिए थे क्योंकि उन्होंने वही किया था जो उन्हें करना चाहिए था। किरण वेदी में एक बाल हठ या त्रिया हठ हमेशा रहा जिसे वे अपने पद और मीडिया की निगाह वाली स्थापना के कारण पूरा भी कर सकीं। पुलिस अधिकारियों का ऐसा ऐसा हठ बिहार, उत्तर प्रदेश या मध्यप्रदेश के दूर दराज के क्षेत्रों में नहीं चल पाता है। उन्होंने मीडिया द्वारा बनायी गयी छवि की रक्षा का पूरा प्रयास किया, भले ही दिल्ली में वकीलों से टकराने के बाद उन्हें हतोत्साहित होना पड़ा हो। एक सेलीब्रिटी बन जाने के बाद उनकी महात्वाकांक्षाओं ने उन्हें अन्ना आन्दोलन से जोड़ा भले ही पद पर रहते हुए उन्होंने नौकरशाही में चल रहे भ्रष्टाचार से टकराने का कोई उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया। इसी आन्दोलन से मिली लोकप्रियता ने उन्हें चुनावी राजनीति में आने को प्रेरित किया और सहज सफलता के लिए उस सत्तारूढ दल से जोड़ दिया जो उनके घोषित विचारों से मेल नहीं खाता है।
       देश विभाजन के बाद इस में आकर बसे शरणार्थियों के कारण दिल्ली शुरू से ही भाजपा का प्रभाव क्षेत्र रहा है और समय समय पर विभिन्न चुनावों में वे जीतते भी रहे हैं। यही कारण रहा कि यहाँ समुचित संख्या में स्थानीय नेतृत्व विकसित हो सका। नगर निगम पर लम्बे समय तक उनका अधिकार रहा है। जैसे जैसे राजनीति अपनी महात्वकांक्षाओं की पूर्ति का साधन बनती गयी वैसे वैसे भाजपा नेतृत्व में पद के लिए आपसी टकराहट भी होती रही है। मदन लाल खुराना और साहिब सिंह वर्मा की टकराहट में श्रीमती सुषमा स्वराज को एक बार मुख्यमंत्री पद सौंपा जा चुका है और इसी टकराहट के चलते विधान सभा चुनाव हार भी चुके हैं। अभी भी हर्षवर्धन सतीश उपाध्याय और जगदीश मुखी के बीच प्रतियोगिता चल रही थी। अभी भी उदित राज, मनोज तिवारी, रमेश बिदूड़ी आदि बाहर के लोगों के सहारे लोकसभा चुनावों में नैय्या पार लगी थी। किरण वेदी का भाजपा सद्स्य बनते ही सीधा मुख्यमंत्री पद प्रत्याशी बनना दिल्ली के किसी भी पुराने नेतृत्व को हजम नहीं हो सकता। इसे स्वीकार कराने में केवल एक तर्क ही ने काम किया होगा कि उन्हें बताया गया कि अरविन्द केजरीवाल की पार्टी से जीतने का यह इकलौता सम्भव हथकण्डा है। यह सन्देश भी केवल दिल्ली के उच्च नेतृत्व के साथ ही साझा किया जा सकता था क्योंकि निचले स्तर पर यह सन्देश जाने पर समर्थक हतोत्साहित हो सकते थे।
       किसी प्रदेश में या देश में केवल प्रशासनिक क्षमता के सहारे लोकतांत्रिक सरकार नहीं चलायी जा सकती। भारत जैसे विकासमान लोकतंत्र में तो जनता को उसकी सारी कमियों, अन्धविश्वासों, अज्ञानों के साथ साधना होता है व उसी में से क्रमशः विकास और परिवर्तन की राह निकालना होती है। श्रीमती वेदी स्वयं को अच्छी प्रशासक मानती हैं और अपने चालीस साल के प्रशासनिक अनुभवों के कारण स्वयं को नेतृत्व की अधिकारी भी मानती हों, किंतु उन्हें पहले लोकतंत्रिक ढ्ंग से भाजपा कार्यकर्ता और फिर दिल्ली की जनता से अपने नेतृत्व को स्वीकार कराना पड़ेगा। अभी उनका सोच है कि नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता से भाजपा को विजय मिल जायेगी और उन्हें अच्छा प्रशासन देने के लिए मनमोहन सिंह की तरह कुर्सी सौंप दी जायेगी, जिसे सब लोग स्वीकार कर लेंगे। बहुत सम्भव है कि उनकी यह समझ गलत साबित हो। उल्लेखनीय है कि शिक्षा का अधिकार, भोजन का अधिकार, सूचना का अधिकार, ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना आदि के बाद भी मनमोहन सिंह सरकार सुचारु रूप से नहीं चल सकी और अंततः उसे जाना पड़ा। यदि भाजपा इतना कैडर वाला संगठन होता तो श्रीमती वेदी को न तो इतनी आसानी से दल में प्रवेश मिला होता और न ही इतनी जल्दी इतने महत्वपूर्ण पद का प्रत्याशी बनाया गया होता। सारे दक्षिणपंथी व मध्यममार्गी दल पद और पैसे के लालची लोगों की दबी छुपी महात्वाकांक्षाओं को दुलरा सहला कर ही चल रहे हैं। कुछ को नकद लाभ दिया जा रहा है तो कुछ को भविष्य के लिए उम्मीदें दी गयी हैं। अभी ऊपर से लोगों को लाकर बिठाने और ईमानदारी से प्रशासन चलाने के वादे से पार्टी नहीं बचायी जा सकती। यही कारण है कि पार्टी नेतृत्व व कार्यकर्ताओं को साधने के साथ साथ साफ सुथरी सरकार चलाना बहुत कौशल का काम और यह समन्वय श्रीमती वेदी में नजर नहीं आता। उन्हें इसका कोई अनुभव भी नहीं है। उल्लेखनीत है कि बेदाग वीपी सिंह, अनुभवी इन्द्र कुमार गुजराल सहित कई राज्यों की ईमानदार बामपंथी गठबन्धन वाली सरकारें भी बहुत लम्बी नहीं चल सकीं। अपने कार्यकर्ताओं को पहले सम्बोधन में ही उन्होंने उन्हें जिस तरह से अनुशासित और आज्ञाकारी बनाने की कोशिश की वैसा अनुशासन तो भाजपा जैसे राजनीतिक दलों में कठिन हैं।  
       उल्लेखनीय है कि भाजपा में हमेशा मुख्यमंत्री पद देने, देकर हटाने या देने का लालच देकर न देने के कारण ही भाजपा में बगावत हुयी है  वीरेन्द्र कुमार सखलेचा, शंकर सिंह बघेला, केशुभाई पटेल, कल्याण सिंह, मदनलाल खुराना, उमा भारती, येदुरप्पा, से लेकर अनेक प्रसंग हैं, भले ही बाद में सफल न होने पर ज्यादातर वापिस लौट आये हों। यदि एक बार यह भी मान लिया जाये कि किरन बेदी के मुख्यमंत्री बनने की स्थिति आ जाती है तो भी उनके द्वारा इस पद पर आवश्यक लोचपूर्ण व्यवहार सम्भव नहीं। लोकसभा चुनावों के दौरान सातों सीटों पर मिली विजय में दल बदल कर आने वाले उदितराज, मनोज तिवारी, विधूड़ी, आदि की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी, किंतु ये लोग किरन बेदी के इस तरह आने और नेतृत्व हथियाने से खुश नहीं हैं जिसे दबे स्वर में व्यक्त भी कर चुके हैं। उसी तरह से मुखर न होने वाले हर्षवर्धन, विजय गोयल, जगदीश मुखी, विजेन्द्र गुप्ता आदि के समर्थक भी भावनाओं को दबा कर बैठे हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में भी सबसे बड़ा दल होने के बाद भी भाजपा को कोई दल समर्थन देने को तैयार नहीं हुआ था व काँग्रेस ने आप पार्टी को समर्थन देना अधिक उपयुक्त समझा था। विजय गोयल ने तो अगस्त 2014 के दौरान राज्यसभा में साफ कह दिया था कि यूपी और बिहार वालों को दिल्ली आने से रोकने की जरूरत है ताकि दिल्ली के विकास को गति दी जा सके। बहुत सम्भव है उनके इस बयान का भाजपा को अब नुकसान उठाना पड़े। विधायकों की संख्या कम होने पर कोई दल उनके साथ गठबन्धन करने नहीं आयेगा।
       वैसे तो चुनाव परिणामों का पूर्व अनुमान सदैव ही सम्भावनाओं का खेल होता है और राजनीतिक दल जीत के दाँव लगाते रहते हैं किंतु ऊपर से जो प्रतीत होता है उसके अनुसार उन्होंने गलत प्रत्याशी पर दाँव लगा दिया है।  
वीरेन्द्र जैन                                                                          
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बुधवार, जनवरी 21, 2015

उधार के सिन्दूर से सुहागिन होती भाजपा



उधार के सिन्दूर से सुहागिन होती भाजपा
वीरेन्द्र जैन

       अगर भाजपा यह बात केवल प्रचारित ही नहीं करती अपितु उस पर भरोसा भी करती है कि उसे गत लोकसभा चुनाव में दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए डाले गये वोटों में से जो मत मिले हैं वे राजनीतिक रूप से चेतन मतदाताओं द्वारा बिना किसी लोभ लालच से दिये गये स्वाभाविक और अधिकतम हैं, तो उसे यह भी मान लेना चाहिए कि जागरूक मतदाता बँधुआ नहीं होता है और दलों के कारनामों के प्रभाव में उसकी दिशा बदल भी सकती है। उल्लेखनीय है कि उक्त चुनाव में भाजपा की जीत काँग्रेस की अलोकप्रियता, व्यापक पैमाने पर दल बदलुओं और विभिन्न क्षेत्रों के लोकप्रिय लोगों को चुनाव में उतारकर संसाधनों के तीव्र प्रवाह के सहारे सम्भव हुयी थी। इस प्रबन्धन में मीडिया का भी भरपूर दुरुपयोग किया गया था। उल्लेखनीय है कि लोकसभा चुनावों के बाद हुये उपचुनावों या विधानसभा चुनावों में उनके मतों के प्रतिशत और संख्या दोनों में कमी आयी है।
       भाजपा चुनाव जीतने के लिए कभी भी किन्हीं नैतिक नियमों के पालन की पक्षधर नहीं रही। इस दिशा में न केवल उन्होंने अभिनव प्रयोग किये हैं अपितु दूसरे दलों द्वारा शुरू किये गये कुत्सित प्रयोगों के साथ भरपूर प्रतियोगिता भी की है व उनसे आगे रहे हैं। ये प्रयोग चाहे दलबदल के हों, साम्प्रदायिकता के हों, जातिवाद के हों, क्षेत्रवाद के हों, भाषावाद के हों, सेलिब्रिटीज को उपयोग करने के हों, पेड न्यूज के हों, मतदाताओं को लुभाने के लिए धन और शराब बहाने के हों, या बाहुबलियों से धमकाने के हों, उन्होंने किसी से कभी गुरेज नहीं किया। इनमें से कई प्रयोग भले ही दूसरे दलों ने प्रारम्भ किये हों किंतु इन अवैध और अनैतिक साधनों का सबसे अधिक उपयोग भाजपा ने ही किया है।
       साक्षरता में वृद्धि, जन आन्दोलनों से जनित राजनीतिक ज्ञान, व समाचार माध्यमों, विशेष रूप से टीवी पर चलने वाली बहसों के कारण राजनीतिक तर्क वितर्क आमजन तक भी पहुँचे हैं। पिछले दिनों ऐसे चेतन लोगों की संख्या में वृद्धि भी हुयी है। ऐसे लोग संगठनों के अभाव में भले ही कुछ ठोस परिणाम न दे पा रहे हों किंतु अन्ना जैसे आन्दोलनों में सामने आकर या कुछ विशेष फिल्मों को सफल बना कर वे समाज की धड़कन के संकेत तो देते ही रहते हैं। लोकतंत्र के सन्देश केवल मतदान केन्द्रों से ही नहीं आंके जाने चाहिए। पिछले दिनों कुछ महत्वपूर्ण मामलों पर केन्द्रीय मंत्री वैंक्य्या नायडू का बार बार संसद में ढीठता पूर्वक यह कथन कि हमें जनता से विजयी मत मिले हैं इसलिए हम हर तरह से सही हैं, वास्तविक लोकतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध फासीवाद के संकेत हैं। एक महिला केन्द्रीय मंत्री द्वारा गाली गलौज की भाषा में बयान देने पर उनके ग्रामीण और पिछड़े वर्ग का होने का कुतर्क और उनके विरोध को पिछड़े वर्ग का विरोध बतलाना यह राज भी खोलता है कि ऐसे ज्ञात अयोग्य व्यक्ति को किसी जाति विशेष की कारण ही टिकिट दिया गया, मंत्री बनाया गया व बनाये रखा गया। उसके विरोध को जातिवादी विरोध बताया गया। क्या पूर्ण बहुमत वाली सरकार का यह तुष्टीकरण नहीं है?
       जब कोई दल गलत हथकण्डों के सहारे चुनाव जीतता है, सत्ता सुख भोगता है और अवैध धन सम्पत्ति अर्जित करता है तो वह तंत्र को सुधारने की जगह उसे वैसा ही बनाये रखने या और बिगाड़ने का काम करता है। भाजपा आज इसी के सहारे सत्ता में है और उसके अधिकांश जनप्रतिनिधियों का रहन सहन बिल्कुल भी सादगीपूर्ण नहीं है कि यह भी माना जा सके कि उन्होंने किसी अच्छे उद्देश्य के लिए गलत सहारे लिये हैं। संघ प्रचारकों और कार्यकर्ताओं के रहन सहन में आये परिवर्तनों को देख कर उनके पिछले जानकार भी अचम्भित हैं। मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों को मिले बड़े बड़े निवास उनके संगठनों के कार्यालयों या कार्यकर्ताओं के आश्रय स्थलों के रूप में प्रयुक्त न होकर उन प्रतिनिधियों की ऐशगाह में बदल कर रह गये हैं। उल्लेखनीय है कि बामपंथियों को मिली ऐसी सुविधाएं उनके संगठनों और कार्यकर्ताओं द्वारा पार्टी के काम में उपयोग की जाती हैं। पिछले दिनों अनेक केन्द्रीय मंत्रियों ने अनावश्यक विदेश यात्राएं करना चाही थीं जिनमें से आधे से अधिक को प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुमति नहीं मिली। सेना के, पुलिस के, प्रशासन के बड़े बड़े अधिकारियों, फिल्मी जगत के अतिलोकप्रिय मँहगे कलाकारों, पूर्व राज परिवारों के सदस्यों, धार्मिक वेषधारी आश्रम मालिकों, व अवसरवादी दलबदलुओं के सहारे बहुमत जुटाया गया है, उनसे सादगी की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। मँहगा चुनाव लड़ने वालों बाहुबलियों, व धनपशुओं की मदद से चुनाव जीतने वालों से ईमानदारी व निष्पक्षता की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। ऐसे लोगों द्वारा ईमानदारी का मुखौटा लगा कर चुप बैठने की एक सीमा होती है।
भाजपा की उच्चस्तरीय कमेटी राजनीतिक आधार पर नहीं अपितु प्रबन्धन के सहारे सत्ता हथियाने के लिए प्रयास करती है यही कारण है कि उनके यहाँ अमितशाह जैसे लोग आगे हो जाते हैं। कोई भी, कैसे भी उन्हें सत्ता दिलाये वह उनके लिए महत्वपूर्ण होता है और सत्ता न दिला सकने वाला कर्मठ से कर्मठ व्यक्ति भी हाशिये पर फेंक दिया जाता है। राज्यों में सत्ता बनाने व बचाये रखने वाला व्यक्ति गम्भीर से गम्भीर अनियमितता और भ्रष्टाचार करने के बाद भी वरण करने योग्य माना जाता है। कर्नाटक, मध्यप्रदेश आदि तो ज्वलंत उदाहरण हैं। सारे स्वाभिमान को तिलांजलि देकर शिवसेना से गलबहियां की जा सकती हैं या शरद पवार की एनसीपी या कश्मीर में पीडीपी से वार्ता की जा सकती है। शिरोमणि अकाली दल द्वारा आतंकियों की फाँसी के खिलाफ जाने पर भी गठबन्धन रखा जा सकता है और बीजू जनता दल या जेडीयू द्वारा ठुकराये जाने के बाद भी उम्मीद की डोरी लटकायी रखी जा सकती है। सब कुछ जानते हुए भी ममता बनर्जी से सहयोग की उम्मीद साधी जा सकती है और उसके द्वार से पूरी तरह निराश हो जाने के बाद ही उनके खिलाफ मोर्चा खोला जाता है, उनके सदस्यों से दल बदल कराया जाता है। यही हाल राज ठाकरे के पूर्व विधायकों से किया जाता है। दिल्ली के चुनावों में जीतने की उम्मीदें धूमिल हो जाने के बाद किरण बेदी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में घोषित करके आयात किया जाता है और यह भी ध्यान नहीं दिया जाता है कि पूर्व में उन्होंने भाजपा और उनके मान्य नेता के खिलाफ क्या क्या कहा व लिखा था। ऐसे अभियानों में तभी तक सफलता भी मिल सकती है जब तक चुनाव प्रबन्धन के खेल पर निर्भर हों, पर लोकतंत्र के चेतन होने की दशा में पूरी बाजी एकदम से उलट सकती है। दिल्ली विधानसभा का आगामी चुनाव दिल्ली की राजनीतिक चेतना का परीक्षण भी होगा।  
वीरेन्द्र जैन                                                                          
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सोमवार, जनवरी 19, 2015

आवश्यकता अविष्कार की जननी की तरह ही भाषा का विकास




आवश्यकता अविष्कार की जननी की तरह ही भाषा का विकास
वीरेन्द्र जैन

       जीवित प्राणियों में केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो अपनी बात को भाषा में बोल और लिख सकता है और इस तरह दूर दराज तक अपने अनुभवों को काल के किसी भी खण्ड तक ले जा सकता है। अन्य प्राणी  आवाज तो निकालते हैं किंतु वह आवाज उनकी जाति और उस काल तक ही सम्प्रेषित हो पाती है। यह उनकी अपनी तात्कालिक जरूरत तक ही सीमित रहती है। मनुष्य सामाजिक अध्य्यन और विकास के लिए भी भाषा का उपयोग करता है।  
       भाषा जीवन के लिए है, जीवन भाषा के लिए नहीं। इसलिए अगर जीवन जड़ या पुरोगामी नहीं है तो उसके उपयोग के साधन भी समय और जरूरत के अनुसार बदलेंगे। भाषा भी उनमें से एक है। इतिहास बताता है कि हमारे देश में भी भाषाओं में निरंतर परिवर्तन होता रहा है। जैसा कि होता है कि यथास्थिति से लाभांवित होने वाले या किसी अन्य कारण से उससे चिपके रहने वाले लोग ऐसे परिवर्तनों का विरोध करते रहे हैं। हिन्दी के सबसे महत्वपूर्ण कवि तुलसी दास ने जब आम आदमी की बोलचाल की भाषा में रामकथा लिखी थी तो बनारस के ब्राम्हणों ने यह कहते हुए उन पर घातक हमले किये थे कि प्रभु का चरित्र तो देव भाषा [संस्कृत] में ही लिखा जा सकता है भाखा [आम आदमी के बोलचाल की भाषा] में लिखना उनका अपमान है। इतिहास गवाह है कि तुलसी दास ने कितनी कठिनाइयों के साथ अपने ग्रंथ का पाठ आयोजित करवाया था और उसे नाट्य रूप देकर जगह जगह रामलीलाएं करवायी थीं, जो आज लगातार खेले जाने वाला सबसे पुराना जननाट्य है। उसी का परिणाम है कि आज हिन्दी भाषी क्षेत्र में राम के सबसे अधिक भक्त हैं और अधिकांश मन्दिर इसी जनप्रियता के बाद ही निर्मित हुये हैं। आज हजारों लोग राम चरित मानस के पाठ और व्याख्याओं की दम पर ही अपनी रोजी रोटी चला रहे हैं। रामचरित मानस में ही अवधी, बुन्देली, भोजपुरी और ब्रजभाषा के शब्दों का एक साथ प्रयोग देखने को मिलता है और कहा जा सकता है कि भाषायी क्षेत्रों की एकता में तुलसी की भाषायी एकता की बड़ी भूमिका है। इन सारे क्षेत्रों में रिश्तों की नैतिकताओं के पीछे इस एक ग्रंथ के आदर्श निहित हैं। यदि रामकथा केवल संस्कृत तक सीमित रहती तो वह, और उसके आदर्श पिछड़ों और दलितों तक नहीं पहुँच पाते।
       भाषा सम्प्रेषण का माध्यम है और भाषा व उसमें शब्दों का चयन इस बात पर निर्भर करता है कि कौन किसको सम्बोधित कर रहा है और उस सम्बोधन का विषय क्या है। समाज में होने वाले परिवर्तनों में सम्बोधित करने वाले और सम्बोधित होने वाले व्यक्ति ही नहीं बदलते अपितु सम्वाद के विषय भी बदलते रहते हैं। उल्लेखनीय है कि जब 1971 में इन्दिरा गाँधी द्वारा बैंकों, बीमा कम्पनियों के राष्ट्रीयकरण की आँधी आयी और आम आदमी को बैंकों में प्रवेश मिला तब बड़ी संख्या में हिन्दी अधिकारियों की भर्ती हुयी क्योंकि बैंकों को आम आदमी के साथ सम्वाद करना था। किंतु 1991 से जब नई आर्थिक नीतियों के अंतर्गत उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण पर जोर दिया जाने लगा तो धड़ाधड़ अंग्रेजी सिखाने वाले संस्थान बढ गये। मोबाइल और कम्प्यूटराइजेशन के बढते ही बहुत सारे लोगों ने कामचलाउ अंग्रेजी सीख ली। जब हम वे वस्तुएं अधिक से अधिक स्तेमाल करना पड़ेंगीं जो विदेशों में ही अविष्कृत हुयी हैं और वहीं उन वस्तुओं व पुर्जों का नामकरण हुआ है तो हम उनकी भाषा के शब्दों से कैसे गुरेज कर सकते हैं। सरकारी कार्यालयों ने हिन्दी के नाम पर अंग्रेजी शब्दों का जो संस्कृतीकरण किया है वह कितना निरर्थक और हास्यास्पद हुआ है यह हम जानते ही हैं। इसलिए नागरिकों के बीच जाति, धर्म, रंग भाषा, और लिंग का कोई भेद न मानने वाले लोकतांत्रिक देश में हमें हर आम जन से अगर सम्वाद करना है तो उस भाषा को अपनाना होगा जो सबकी समझ में आ रही हो। इसमें संस्कृत, उर्दू, अंग्रेजी, के शब्द भी हिन्दी में आना स्वाभाविक है व इसी तरह दूसरी भाषाओं में भी अन्य भाषाओं के शब्दों का आदान प्रदान होना तय है। दूसरी ओर यह भी ध्यान में रखने की बात है कि हम अपनी हीनताबोध में विदेशी भाषा को ओढने की कोशिश न करें। जिस तरह गंगा में गन्दे नाले मिल कर भी पवित्र हो गये मान लिये जाते हैं उसी तरह अगर हम दूसरी भाषाओं के सीमित शब्दों को ग्रहण करेंगे तो उससे हमारी गंगा का कोई नुकसान नहीं होगा। सभी जानते हैं कि अंग्रेजी भाषा कितने अधिक शब्द दूसरी भाषाओं के सम्मलित करती रही है जिसके करण ही वह विश्व में सम्वाद की भाषा बन सकी है।
       सोचने का विषय यह है कि हम आज़ादी के बाद कोई नया अविष्कार, या विचार क्यों नहीं दे सके! जब हम वस्तुओं, विचारों और कार्यक्रमों का आयात ही करते रहेंगे व हमारे पास निर्यात करने के लिए कुछ नहीं होगा तो हमें न केवल दूसरों की भाषा अपितु संस्कृति भी अपनानी पड़ेगी। बाज़ार जब आता है तो अपनी मांग पैदा करने के लिए अपने साथ अपनी संस्कृति भी लाता है। अगर हम पिज्जा और बर्गर का अनुवाद करेंगे तो उसका स्वाद ही खराब करेंगे। अपनी भाषा के नये शब्दों को प्रचलन में लाने के लिए उसे पूर्व प्रचलित भाषा और आदर्श व्यक्तियों से जोड़ना पड़ता है। जब दूरदर्शन पर महाभारत सीरियल आता था तब रिश्तों के आगे श्री लगाना प्रारम्भ हो गया था जैसे जीजाश्री, भाभीश्री, आदि। यह सीरियल का प्रभाव था। उसी तरह लोकप्रिय फिल्मों के प्रमुख डायलोग या चरित्र भी प्रचलन में आ जाते हैं।      
       भाषा का छुआछूतवाद संवाद की क्षमताओं को घटाता है। दुनिया की समस्त भाषाएं क्रियाओं से विकसित हुयी हैं। किसी भी काल खण्ड की प्रचलित भाषा किसी दूसरे कालखण्ड में वैसी ही नहीं रह सकती इसलिए जरूरी है कि हम प्रत्येक ग्रहणीय शब्द को गले लगाने में गुरेज नहीं करें। ‘आनो भद्रा क्रतवो यंतु विश्वत’ ।
वीरेन्द्र जैन                                                                           
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