मंगलवार, जून 09, 2015

भारत-बंगलादेश समझौता और राजनीतिक दलों की पहचान



भारत-बंगलादेश समझौता और राजनीतिक दलों की पहचान
वीरेन्द्र जैन
      













 अगर आप हिन्दी कवि सम्मेलनों के किसी पुराने गीतकार से परिचित हों और उससे वर्तमान में मंच पर गीत कविता की दशा और दिशा के बारे में पूछें तो उसके कथन में उसके गीतों से भी ज्यादा दर्द मिलेगा। वह कहता मिलेगा कि इन चुटकलेबाज हास्य कवियों ने हिन्दी गीत को नष्ट कर दिया है। आज मर्मस्पर्शी भावों से भरे गीतों की जगह सतही सम्वेदना वाली तुकबन्दियों और फूहड़ता ने ले ली है। जो गीतकार अब भी मंच पर जा रहे हैं वे उक्त चुटकलेबाजों से कम पारिश्रमिक पाकर अपमान का घूंट पी हिन्दी गीत की वाचिक परम्परा को जीवित रखे हुये हैं। रोचक यह है कि इन्हीं फूहड़ हास्य कवियों की कविताओं और चुटकलों से आधार लेकर जो कामेडी शो होने लगे हैं उनसे अब मंच के हास्य कवि भी परेशान हैं क्योंकि उनके क्षेत्र पर भी अतिक्रमण हो गया है।
       गत दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ढाका यात्रा के दौरान उन्होंने बंगबन्धु हाल ढाका में उपस्थित प्रमुख लोगों को जब सम्बोधित किया तो लगातार बजती तालियों के आधार पर कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने ढेरों चुटीले ज़ुमलों से मंच लूट लिया। उनका भाषण किसी समय के अटलबिहारी वाजपेयी की आमसभाओं की याद दिला गया जिनमें व्यक्त चुटीले सम्वादों का आनन्द आमसभा के बाद कई सप्ताह तक लोग लेते रहते थे। मोदी ने टूरिज्म और टैरिरिज्म की तुक मिलाते हुए टैरिरिज्म को समाप्त करने व टूरिज्म को बढावा देने की बात की। इसी क्रम में उन्होंने धार्मिक पर्यटन का एक बुद्ध सर्किट बनाने की बात उठाते हुए तुक जोड़ी कि जहाँ बुद्ध होंगे तो युद्ध नहीं होगा। उन्होंने कहा कि अब विस्तारवाद का युग नहीं है अपितु विकासवाद का युग है और भारत ने कभी विस्तारवाद का समर्थन नहीं किया। जिस तरह से मंच के कलाकार अपनी प्रस्तुति के पूर्व स्थानीय श्रोताओं की भावनाओं को छूने की कोशिश में उस क्षेत्र के लोगों की क्षेत्रीयता को जगाते हैं और उस धरती का गौरवगान करते हैं, उसी तरह मोदी ने पहला वाक्य बंगला भाषा में बोल कर तालियों के बीच कहा कि सबसे पहले सूरज यहाँ निकलता है फिर भारत में रोशनी आती है। वस्त्र निर्माण के क्षेत्र में आपका देश दुनिया में दूसरे नम्बर पर है और छह प्रतिशत की शानदार विकास दर बनाये हुये है। बंगलादेश के निर्माण में भारत की भूमिका की चर्चा करते हुए उन्होंने भारतीय सैनिकों के बलिदान और पाकिस्तान के नब्बे हजार सैनिकों की वापिसी की चर्चा करते हुए अपनी शांतिप्रियता की नीति की याद दिलायी। वे यह याद दिलाना भी नहीं भूले कि भारत और बंगलादेश दोनों ही देशों की सबसे 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम उम्र की है और दोनों ही देशों में युवा शक्ति का भण्डार है।
       उल्लेखनीय है कि भारत और बंगलादेश के बीच हुआ भूमि स्थानांतरण का समझौता बहुत व्यवहारिक समझौता है इससे दोनों देशों के बीच 161 एनक्लेवों का आदान-प्रदान किया गया है। बांग्लादेश को 111 सीमाई एनक्लेव हस्तांतरित किये जायेंगे जबकि 51 एनक्लेव भारत का हिस्सा बनेंगे। इस समझौते के तहत भारत को 500 एकड़ भूमि प्राप्त होगी जबकि बांग्लादेश को 10 हजार एकड़ जमीन मिलेगी। इस समझौते से 50 हजार लोगों की नागरिकता का सवाल भी सुलझ जायेगा। उल्लेखनीय है कि भारत और बांग्लादेश के बीच 4,096 किलोमीटर लम्बी सीमा लगती है और यह मुद्दा दोनों देशों के संबंधों में एक बड़ा अड़चन बना हुआ था। अब  भारत-बांग्लादेश के बीच 41 साल पुराने सीमा विवाद पर समझौता हुआ। भारत करीब 17 हजार एकड़ जमीन बांग्लादेश को देगा। बांग्लादेश करीब 7 हजार एकड़ जमीन भारत को देगा। दोनों देशों के बीच जमीन अदला-बदली पर सहमति बनी। इस ऎतिहसिक समझौते की पृष्ठभूमि पिछली सरकार ने ही तैयार कर ली थी किंतु अपने चुनावी लाभ के लिए देश के हित की चिंता न करने वाली भाजपा इसका मुखर विरोध कर रही थी, लोकसभा में विपक्ष की नेता के रूप में सुषमा स्वराज ने कहा था कि उनकी पार्टी यह समझौता नहीं होने देगी। आज जिस भाषा में नरेन्द्र मोदी ने बंगलादेश के लोगों की भावनाओं को जाग्रत किया उसी भावुकता के सहारे उनकी पार्टी अपनी वोटों की राजनीति के लिए भावनाएं भड़का कर इसका विरोध कर रही थी। अपनी सरकार के लिए भाजपा का यह बदला स्वरूप जो अब देश के हित में है, बताता है कि उनका देश हित सत्ता के हिसाब से बदलता रहता है। राजनीतिक रूप से यह समय भाजपा की अवसरवादी राष्ट्रीयता को पहचानने का भी समय है।
       यही समय है जब ममता बनर्जी की राजनीति को भी पहचाना जाना चाहिए। बंगाल राज्य की राजनीति में वे बामपंथी शासन का विकल्प बन कर उभरी थीं व अपनी सादगी से ईमानदारी का मुखौटा ओढ कर एक समझौताहीन दृढ नेता मानी जाती थीं। उन्होंने भी पिछली बार इसी समझौते पर अपना विरोध दर्शा कर और बंगलादेश जाने से खुल इंकार करके देश के बाहर सरकार की किरकिरी करवायी थी। जबसे उनकी पार्टी के बड़े बड़े नेता शारदा कांड में गले गले तक फँस गये हैं तब से मोदी सरकार के आगे वे शरणागत हो गयी हैं और अपनी सारी अकड़ भूल गयी हैं। उनका विनम्र होना स्वागत योग्य माना जाना चाहिए किंतु विनम्रता के इस प्रदर्शन का जो कारण है उससे पता चलता है कि वे कागज़ी शेरनी हैं और उनकी पेंटिंग्स का बाज़ार कुछ दागी संस्थानों तक ही सीमित है।
       बंगलादेश दौरे के समय मन्दिरों मठों की राजनीति करने वाले नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषणों में अटलबिहारी की उस दुर्गा का कहीं उल्लेख नहीं किया जिसके दुस्साहस पूर्ण फैसले से बंगलादेश अस्तित्व में आया और न ही उन्होंने उस पिछली सरकार का उल्लेख करने की जरूरत समझी जिसने इस समझौते की भूमिका तैयार की थी किंतु इसे लागू करवाने के लिए भारत जैसे लोकतंत्र में जिस कूटनीति की जरूरत होती है वह उन नौकरशाह नेताओं के पास नहीं थी। इस समझौते का स्वागत करते समय विभिन्न दलों के चरित्रों को पहचानने में भूल नहीं करना चाहिए।
वीरेन्द्र जैन                                                                          
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गुरुवार, जून 04, 2015

दलों की अधिमान्यता के नियमों में सुधार की आवश्यकता



 दलों की अधिमान्यता के नियमों में सुधार की आवश्यकता 
वीरेन्द्र जैन

हमारे देश में लगभग 1807 पंजीकृत दलों में से छह राष्ट्रीय और 64 प्रादेशिक दल अधिमान्य हैं। इन दलों की अधिमान्यता का कुल मतलब इतना है कि आम चुनावों के समय इन दलों के प्रत्याशियों को समान चुनाव चिन्ह आरक्षित रहता है, और सरकारी मीडिया पर इन्हें अपनी बात कहने के लिए कुछ समय आवंटित किया जाता है।  उक्त सुविधाओं के बदले में इन दलों पर कुछ बन्दिशें भी हैं, जिनमें अपने आय व्यय का हिसाब किताब प्रस्तुत करना, दल बदल कानून के अंतर्गत आना आदि। यह अधिमान्यता गत आम चुनावों में प्राप्त मतों, जीती गयी सीटों की संख्या और उनके क्षेत्रीय विस्तार पर निर्भर करती है। विडम्बना यह है कि 2014 के आम चुनावों के बाद राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त छह दलों में से चार की राष्ट्रीय मान्यता के समाप्त होने का संकट आ गया है व इस समय के नियमों के अनुसार भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ही बचे रहने वाले हैं। यह बहुदलीय लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत हैं क्योंकि चुनाव परिणामों में काँग्रेस निरंतर कमजोर होते जाने का प्रदर्शन कर रही है व भाजपा जिस जोड़तोड़ और गैरराजनीतिक आधारों पर देश के पश्चिमी भाग के सहारे अपना अस्तित्व बनाये हुये है उससे शेष देश में क्षेत्रीय दल विस्तार पा रहे हैं। राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से जरूरी है कि राष्ट्रीय दलों की नये तरीके से पहचान हो व लोकतंत्र की भावना के अनुसार अधिमान्यता के नियमों पर पुनर्विचार हो।
पिछले बीस वर्षों में क्रमशः चुनाव प्रणाली में कुछ सकारात्मक सुधार हुये हैं यद्यपि ये सुधार भी अभी अधूरे हैं. और हो चुके सुधारों के पालन कराने की व्यवस्था कमजोर है, पर अगर इतने सुधार भी नहीं हुये होते तो लोकतंत्र जंगली राज में बदल गया होता। स्मरणीय है कि प्रारम्भिक चुनावों में वोट एक जैसे होते थे पर पेटियां अलग अलग होती थीं जो उम्मीदवारों के अनुसार होती थीं। वोटर को जिसे वोट देना होता था वह उस की पेटी में वोट डालता था। उन दिनों एक की पेटी के वोट दूसरे की पेटी में डाल देने की शिकायतें होती थीं व पोलिंग आफीसर की भूमिका महत्वपूर्ण होती थी। उसके वाद कामन मतपेटी आयी और ऐसे मतपत्र आये जिन पर सभी प्रत्याशियों के चुनाव चिन्ह बने होते थे जिन में से पसन्द के चिन्ह पर मुहर लगा कर वोट दिया जाता था। उस दौर में मतदान पत्र मोड़ने की भूमिका का महत्व था अन्यथा एक चिन्ह पर लगी मुहर की स्याही दूसरे पर जाने से काफी मात्रा में वोट निरस्त हो जाते थे। तब वोटों के चुनाव चिन्हों पर लगने वाली मुहर को स्वास्तिक चिन्ह के अनुसार बनाया गया ताकि सही चिन्ह पर लगी मुहर को परखा जा सके। उन दिनों चुनाव में व्यय की गयी राशि और चुनाव प्रचार सामग्री पर नियंत्रण की कोई व्यवस्था नहीं थी। सम्पन्न उम्मीदवार अपने वाहनों से मतदाताओं को मतदान केन्द्र तक ले जाते थे। मतदाता पहचान पर्चियों पर उम्मीदवार का नाम और चुनाव चिंह होता था व कई नासमझ मतदाता तो यही समझते थे कि उनके पास जिसकी परची आयी है वही वोट है और उसे केवल उसी उम्मीदवार को वोट देने का अधिकार है। कई नेता तो चुनाव के दिन जीपों का कारवां लगा कर व हैलीकाप्टर को ग्रामीण क्षेत्रों में उड़ा कर मतदाताओं को प्रभावित कर लेते थे। अब व्यय और व्ययसाध्य चुनाव प्रचार पर किंचित नियंत्रण लगाने की कोशिश हुयी है।  उम्मीदवारों को शपथ पत्र द्वारा अपनी चल-अचल सम्पत्ति, देयताएं, चल रहे प्रकरण आदि की घोषणा करना पड़ती है। इस के साथ साथ चुनाव सभाओं की संख्या सीमित की गयी है व स्टार प्रचारकों पर नियंत्रण लगाने की कोशिशें की गयी हैं। मतदाता को प्रभावित करने के लिए दी जा रही उपहार सामग्री, शराब और धन का कुछ हिस्सा पकड़ा जा रहा है, पर उससे कई गुना बिना पकड़े बँट रहा है। वाहनों पर नियंत्रण रखा जा रहा है व नगरीय क्षेत्रों में उम्मीदवार के वाहन से मतदाताओं को मतदान केन्द्र तक लाये जाने से बचा जा रहा है। मतदाताओं और ईवीएम मशीनों की उचित सुरक्षा के प्रयास होते हैं। नोटा का बटन लाया गया है। कह सकते हैं कि कुछ किया गया है और बहुत कुछ किया जाना बाकी है।  
       दलों को एक जैसे आधार पर अधिमान्यता तो दी जाती है किंतु सभी अधिमान्य दलों के पास समान संसाधन नहीं हैं व दल को संचालित किये जाने के लिए साझा नियम नहीं बने हैं। सत्तार्‍ऊढ रहे दलों ने दल के नाम पर भवन बनाने के लिए बड़ी बड़ी ज़मीनें हथिया ली हैं और उनमें बाज़ार बनवा लिये हैं जिनके किराये से दलों का खर्च निकलता है, पर दूसरे दल इससे वंचित हैं। दलों के गठन से सम्बन्धित  आधारों को संविधान सम्मत बनाने के लिए ऐसे कुछ नियम बनने चाहिए, जैसे कि पिछले वर्षों में हर दल के अन्दर उसके संविधान के अनुसार समय पर संगठन के चुनाव करवाना जरूरी कर दिये गये थे। इसी तरह किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए उसके दल की विदेश, अर्थ, शिक्षा स्वास्थ और संस्कृति आदि से सम्बन्धित नीतियां घोषित करना जरूरी होना चाहिए। आम तौर पर दलों द्वारा चुनावों में प्रत्याशी बनाये जाने से सम्बन्धित कोई घोषित नियम नहीं हैं जिस कारण से ठीक चुनावों के समय दल बदलने वाले लोगों को टिकिट देकर लोकतंत्र को कलंकित किया जाता है। स्पष्ट घोषित नीति नहीं होने के कारण बहुत सारे लोग टिकिट के आकांक्षी हो जाते हैं जिस कारण से कई दलों में टिकिटों की नीलामी सी होती है और कई जातिवादी दल तो टिकिट देने की दुकान बन गये हैं। चुनाव आयोग को टिकिट देने के लिए सभी अधिमान्य दलों के अन्दर कुछ न्यूनतम वरिष्ठता तय करनी चाहिए व उसकी पुष्टि सुनिश्चित करने के लिए सदस्यता का कोई रजिस्टर तैयार कराना चाहिए।
       दलों के संचालन के लिए वित्तीय व्यवस्था का सर्वोत्तम तरीका यह है कि उसके सदस्य ही उसे अपने आर्थिक सहयोग से चलायें। सीपीएम की तरह कार्यकर्ताओं पर आय के अनुपात में लेवी लगाना सर्वोत्तम तरीका हो सकता है। कुछ बड़े कार्पोरेट संस्थान इलैक्ट्रोरल ट्रस्ट बना कर सरकार बना सकने की सम्भावना वाले कुछ दलों को मनमाने ढंग से चन्दा देते हैं। यह चन्दा परोक्ष में व्यापारिक लाभ लेने के लिए एडवांस धन के रूप में दिया जाता है। कोई औद्योगिक घराना कुछ दलों को चुनावी चन्दा क्यों देगा? अगर कम्पनी का कोई डायरेक्टर किसी दल को पसन्द करता है तो उसे व्यक्तिगत रूप में चन्दा देना चाहिए। कोई उद्योगपति यदि किसी दल विशेष को पसन्द करता है तो वह उसे अपनी क्षमता के अनुसार चन्दा दे सकता है किंतु एक ही उद्योग द्वारा एक से अधिक दलों को चन्दा देना तो उसकी पसन्दगी नहीं अपितु अवसरवादिता को दर्शाता है। यदि कोई उद्योग ईमानदारी से काम करते हुए लोकतंत्र के लिए सचमुच ही एक से अधिक दलों को मदद करना चाहता है तो उसे सभी अधिमान्य दलों को समान मात्रा में चन्दा देना चाहिए। एक तरीका यह भी हो सकता है कि सदस्यों के अलावा बाहर से मिलने वाला सारा चन्दा चुनाव आयोग के माध्यम से दिया जाये जिसका एक हिस्सा सार्वजनिक चुनाव व्यवस्था के लिए चुनाव आयोग को मिले।
उच्च सदन में जहाँ अप्रत्यक्ष चुनाव होता है धन की बड़ी भूमिका होती है और अपने आय व्यय में पारदर्शिता से बचने वाले दल अंततः उद्योगपतियों या उनके प्रतिनिधियों को ही उच्च सदन में भेजते देखे गये हैं। इस तरह उच्च सदन के गठन का उद्देश्य ही भ्रष्ट हो जाता है। अगर उच्चसदन के लिए दल में न्यूनतम वरिष्ठता की कठोर शर्तें हों तो अधिक अच्छे और योग्य लोग सदन को सार्थक करेंगे। सदन में पहुँचने वाले सदस्यों के व्यापारिक हितों को स्थगित रखने की कोई व्यव्स्था होना चाहिए व ऐसे व्यापारिक संस्थानों को विशेष निगरानी की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
       अधिमान्यता के लिए मतों के प्रतिशत और क्षेत्रीय विस्तार के अलावा दलों की पुष्ट सदस्य संख्या उनकी राजनीतिक सक्रियता, नीतियों की स्पष्टता, आंतरिक लोकतन्त्र आदि को भी आधार बनाया जाना चाहिए, वहीं अपराधियों, लम्बित प्रकरणों, और सरकारी देयताओं के प्रति उदासीन लोगों को टिकिट दिये जाने को अधिमान्यता की दृष्टि से नकारात्मक रूप में देखना चाहिए। जातिवादी और साम्प्रदायिक विचारों वाले दलों को अधिमान्यता देने के बारे में भी कड़े मापदण्ड लगाना चाहिए व आरोपियों को टिकिट न देने का शपथ पत्र लेना चाहिए। आचार संहिता लगने के पूर्व तक मतदाताओं को सलाह देने के ऐसे प्रचारात्मक कार्यक्रम नियमित चलाये जाते रहना चाहिए जो अपराधियों और आरोपियों को टिकिट देने वाले दलों के प्रति सावधान करते हों। इससे मतदाता उन उम्मीदवारों और दलों दूर रहेंगे जो आरोपियों को टिकिट देते हैं। जब इसी देश में ऐसे राष्ट्रीय दल भी हैं जिनके यहाँ न तो दल बदल की बीमारी है और न ही टिकिट के लिए मारामारी होती है तो ऐसा सभी दलों में क्यों नहीं हो सकता! जरूरी है कि पार्टी संविधान में टिकिट देने की कुछ न्यूनतम शर्तें पूर्व से घोषित हों और उनके अनुसार टिकिट न देने पर चुनव आयोग को उस उम्मीदवार को निर्दलीय घोषित करने का अधिकार हो। ऐसे उम्मीदवार को  मिले मतों को पार्टी को मिले कुल मतों में नहीं जोड़ा जाये।
       किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए यह जरूरी होना चाहिए कि किसी राष्ट्रीय समस्या के प्रति उसके स्पष्ट विचार हों, और उसकी कार्यकारिणी में मंत्रालयों के अनुरूप विशेषज्ञ प्रभारी हों। किसी तय समय में इन दलों को समस्या के बारे में अपनी पार्टी का दृष्टिकोण व्यक्त करना अपेक्षित होना चाहिए। राजनीतिक दलों की मौकापरस्ती पर लगाम लगाया जाना जरूरी है। अब वह समय आ गया है कि दलों की नीतियों और उनकी पारदर्शिता के आधार पर ही उसका समर्थक वर्ग अपना समर्थन तय करेगा। नीतियों के प्रति रहस्यात्मकता लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।   
वीरेन्द्र जैन                                                                          
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मंगलवार, जून 02, 2015

क्रांतिकारी बदलाव चाहती विवाह संस्था



क्रांतिकारी बदलाव चाहती विवाह संस्था
वीरेन्द्र जैन

विवाह के बारे में पहले से कुछ कहावतें प्रचलित रही हैं जैसे कि शादी एक ऐसा लड्डू है जिसे खाने वाला और न खाने वाला दोनों ही पछताते हैं, या तुलसी गाय बाजाय के, देत काठ में पाँव। पहले इन कहावतों में एक मीठी सी शिकायत रहती थी जो अब कढुवाहट में बदल गयी है और प्रचलित लतीफों का बड़ा हिस्सा दाम्पत्य जीवन की कटुताओं से सम्बन्धित लतीफों से भरा रहता है और वे दूसरों के बारे में होने के कारण लोग हँसते तो हैं, पर अपने दाम्पत्य जीवन के बारे में सोच कर उन लतीफों को कढुवी सच्चाई की तरह भी देखते हैं। आचार्य रजनीश [ओशो] ने एक संस्मरण में बताया है कि वे अपने विवाह के पक्ष में नहीं थे इसलिए उनके पिता ने अपने एक परिचित मित्र को दूर से इसलिए बुलवाया ताकि वे उन्हें विवाह के लिए तैयार कर सकें। रजनीश कहते हैं कि मैंने पिता के मित्र से केवल इतना कहा कि आप सुबह तक सोच कर बतायें कि क्या आप अपनी शादी से खुश हैं। सुबह रजनीश के सो कर उठने से पूर्व ही पिता के मित्र अपने नगर वापिस लौट गये थे। बाद में उनके सम्बोधनों को संकलित करके जो पुस्तकें प्रकाशित हुयीं उनमें से एक है- प्रेम और विवाह। इसमें वे सिद्ध करते हैं कि प्रेम स्वाभाविक है और विवाह कृत्रिम व्यवस्था है, इसलिए प्रेम परमात्मा से जुड़ा है अतः पवित्र है।
                साहित्य और जीवन से जुड़े विभिन्न कला रूप विवाह और उससे सम्बन्धित विभिन्न समस्याओं से भरे पड़े हैं तथा बहुत सारी फिल्में या कहानियां विवाह के बाद ‘दि एंड’ [समाप्ति] दिखाती रही हैं, इससे पता चलता है आत्मनिर्णय के विवाह तक पहुँचने में कितने तरह की समस्याएं विद्यमान हैं। परम्परागत विवाहों में भी विवाह के तय होने से लेकर उसके आयोजन और उन आयोजनों से जुड़ी कुप्रथाएं आदि ढेर सारी समस्याएं पैदा करते हैं। रिश्वत लेते हुए पकड़े गये कुछ लोगों से अंतरंग बात करने पर पता चला कि कभी आदर्श की बातें करने वाले इन लोगों ने बेटियों के विवाह हेतु दहेज जुटाने के लिए रिश्वत लेना सीखा। देश में कुल बाज़ार का तेइस प्रतिशत सौन्दर्यीकरण से जुड़ा हुआ है जो स्वास्थ के बाज़ार से अधिक है। खाप पंचायतों जैसी संस्थाएं जो अपने सदस्यों की शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ आदि की कोई चिंता नहीं करतीं किंतु विवाह के लिए कानून के समानांतर न्याय व्यवस्था चलाते हुए फाँसी देने तक के फैसले दे देती हैं, और गैर कानूनी होने के बाद भी उन फैसलों पर अमल भी करवाती हैं। जातिवादी संस्थाओं का सबसे प्रमुख काम विवाहों पर निरीक्षण रखना हो गया है। विवाह के असफल होने पर अलगाव से सम्बन्धित जो मान्यताएं तथा नये व पुराने कानून अस्तित्व में हैं, उनके व उनके दुरुपयोग के कारण या तो अनेक दम्पत्ति घुट घुट कर जीते हैं या अलग होकर अपना बहुत कुछ लुटा देने की स्थिति में पहुँच जाते हैं। कभी घुटना केवल स्त्रियों के हिस्से में आता था जो महिला समानता के आन्दोलन व सशक्तीकरण के कुछ कानूनों के कारण दोनों के हिस्सों में बँट गया है, जिसका असर बच्चों के विकास पर भी पड़ता है। अपने कर्म के प्रति समर्पित देश दुनिया के प्रमुख संस्कृतिकर्मी और राजनेता या तो अविवाहित रहे हैं या उनके वैवाहिक जीवन की नैतिकताओं में विचलन की सूचनाएं आम हैं। ये संकेतक हैं कि विवाह संस्था सुधार चाह रही है।
       हमारे समाज में जो बदलाव बताये जाते हैं वे मूल ढाँचे को छेड़े बिना केवल आवरण में होते हैं। पिछली सदियों में जिस गति से राजनीतिक आर्थिक ढाँचे में बदलाव आये हैं उस गति से सामाजिक ढाँचे में बदलाव नहीं आ रहे हैं। विज्ञान की डिग्री रखने वाले, टैक्नोक्रेट व प्रबन्धन वाले अधिकांश युवा भी घर के बुजुर्गों की मर्जी से अपनी जाति में पत्रिका मिलान कर सड़क पर बारात निकालते हुए ही शादी कर रहे हैं। लड़कों को तो किसी हद तक लड़की के रंग रूप को चुनने का अवसर मिलने भी लगा है, किंतु सुशिक्षित लड़कियों को भी यह अधिकार बहुत ही कम मिल पाया है। सम्पन्नता के अनुसार विवाह परम्पराओं के वैभव में भले ही अंतर आया हो किंतु परम्पराएं वही पुरानी निभायी जा रही हैं, जिनके अनेक दोषों से वे स्वयं परिचित हैं। अपने सबसे अच्छे बेमौसमी वस्त्रों में लिपटे स्त्री पुरुष और बच्चे, बीच सड़क पर बेतरतीब ढंग से शराब पीकर उछलते नृत्य समझकर चक्कर खाते युवा, आतिशबाजियां, जनरेटर और बैंड के बीच मुकाबला करते शोर के बीच में से निकलती हार्न बजाती मोटर साइकिलें, बिजली का हंडा सिर पर रखे बाल मजदूर और इस युग में घोड़े पर सवार दूल्हा जो दृश्य उपस्थित करते हैं वह जुगुप्सा जगाने वाला होता है। पता नहीं उसमें कौन लोग कैसे आनन्द लेते चले आ रहे हैं। दुखी परेशान होते हुये, बिना आरक्षण के यात्रा में भागते रिश्तेदारों का विवाह समारोहों में भाग लेना क्यों जरूरी होता है, जिनमें उम्रदराज बुजुर्ग ही नहीं दूध पीते बच्चे भी होते हैं। उनके रहने, सोने और शौचालय स्नान की उचित व्यवस्था तक नहीं होती पर अधिक से अधिक स्वादिष्ट गरिष्ठ भोजन लेना जरूरी होता है। यह यात्रा कई बार वे उधार लेकर भी करते हैं। आखिर हम क्यों अपनी और दूसरों की सुख सुविधा को ध्यान में रखते हुए इसे उस स्तर तक सीमित नहीं कर पा रहे हैं जिसमें पूरी घटना सिर्फ और सिर्फ आनन्द बन सके। भोपाल के प्रोफेसर डा. आफाक अहमद ने एक संस्मरण सुनाया था। सुप्रसिद्ध व्यंग्य लेखक शरद जोशी की बेटी की शादी की दावत थी और जब उन्होंने अपने हाथ में पकड़े हुए गुलदस्ते और उपहार को भेंट करने के लिए उनसे पूछा कि दूल्हा दुल्हिन कहाँ है? तो उन्होंने कहा कि यहीं लोगों के बीच आशीर्वाद लेते घूम रहे हैं, आइये बैठिये वे खुद आपके पास आ जायेंगे। पूरा जीवन प्रगतिशील मूल्यों के लिए बिताने वाले शरद जोशी ने बच्चों को किसी महाराजा कुर्सी पर बिठा कर वरिष्ठजनों को उन तक जाने की खराब परम्परा नहीं स्वीकारी थी। पिछले दिनों एक सुबह मित्र का बेटा अपनी नवविवाहिता के साथ मिठाई और ड्राईफ्रूट का डिब्बा लिए उपस्थित हुआ और पैर छूते हुये कहा कि हम लोगों ने विवाह कर लिया है व तय किया है कि वरिष्ठजनों को तकलीफ देने की जगह उनके घर पर जाकर ही आशीर्वाद लिया जाये। मन सचमुच गदगद हो गया। युवा होने का अर्थ ही है सार्थक परिवर्तन का साहस।
ऐसा नहीं है कि व्यक्तिगत स्तर पर छुटपुट बदलाव नहीं हो रहे हैं किंतु संगठित संस्थाओं द्वारा उन्हें समाज से विद्रोह माना जा रहा है व उन विद्रोहियों को समाज के हाशिए पर जाना होता है या दण्डित होना पड़ता है। कभी किसी जमाने में इक्के दुक्के लैला मज़नू, शीरी फरहाद की कहानियां सुनने को मिलती थीं किंतु इन दिनों प्रति सप्ताह दो तीन युवा जोड़े आत्महत्या कर रहे हैं किंतु समाज के कान पर जूं भी नहीं रेंग रही। बिना संगठन के कोई भी बदलाव सामजिक बदलाव का सूत्रपात नहीं कर पाता और बुझती चिनगारी की तरह चमक कर रह जाता है।
       विवाह संस्था में बदलाव के कुछ लक्षण युवाओं के अविवाहित रहने, या ‘लिव इन रिलेशन’ में देखने को मिल रहे थे किंतु पिछले दिनों आये उच्चतम न्यायालय के फैसलों से ऐसा लगता है कि इस तरह के रिश्तों को भी विवाह की पुरानी सीमाओं में बाँध कर वहीं लाया जा रहा है। लिव इन रिलेशन में रहने का मतलब ही यह था कि दो युवाओं ने परम्परागत विवाह से हट कर एक तयशुदा समय के लिए ज़िन्दगी बिताने का समझौता किया हुआ है। यह उनकी स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वे इस समझौते की अवधि कब तक रखें या अलग होने के लिए अपनी सम्पत्ति को किस तरह से बाँटें। इसको विवाह के कानूनों के हिसाब से तय करना इसकी प्रकृति को बदलना है। प्रगतिशील समाज को बदलते समय में बदलते सम्बन्धों का स्वागत करना चाहिये और सहयोगी बन कर उनके प्रयोगों को परखना चाहिये। यह नहीं भूलना चाहिए कि हम लोग मातृ प्रधान समाज से प्रारम्भ कर के परिवार की वर्तमान व्यवस्था तक पहुँचे हैं और विवाह संस्था पुनः कुछ बड़े परिवर्तन चाह रही है।
              जातियां काम की किस्म के कारण बनी थीं और जाति विवाह इसलिए उपयोगी थे ताकि समानधर्मा कुटीर उद्योग, गृह उद्योग, और कारीगरी के कौशल में विकसित हुए बच्चे अपने उस काम को सहयोगपूर्वक कर सकें जिसमें उन्हें पूर्व से ही प्रशिक्षण प्राप्त है। किंतु राजतंत्र की समाप्ति, सरकारी सेवाओं के नये वर्गों का उदय, उद्योगों की स्थापना, नगरी सभ्यता का विकास आदि ऐसी घटनाएं हुयी हैं जिनके कारण हमें विवाह को जाति तक सीमित रखने के नियम में परिवर्तन लाना चाहिए था, जो नहीं लाया गया है। अगर लोग जाति विवाह के पक्ष में ही हैं तो अब जातियां, डाक्टर, इंजीनियर, किसान, व्यापारी, पुलिस, फौजी, सरकारी सेवक, पत्रकार, औद्योगिक श्रमिक, आदि के आधार पर बदलना चाहिए।     
    मृत देहों की तरह मृत हो चुकी परम्पराओं को भी विसर्जित करने का साहस जुटाना होगा नहीं तो हमारा समाज किसी कबाड़खाने में बदल कर रह जायेगा। सुन्दरता के लिए बेतरतीब ढंग से बढ चुके अपने बालों और नाखूनों को उचित स्थान से काटना ही होता है। सामाजिक सौन्दर्य के लिए वंछित बदलाव का बीड़ा युवा ही उठा सकते हैं और उन्हें उठाना भी चाहिए।
वीरेन्द्र जैन                                                                          
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