गुरुवार, नवंबर 10, 2016

कूटनीतिक चालें और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव

कूटनीतिक चालें और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 
वीरेन्द्र जैन

वैसे तो हमारे ढीले ढाले लोकतंत्र में किसी को भी सहज रूप से राजनीतिक पार्टी बनाने और चुनाव लड़ने का अधिकार है और कई ‘धरती पकड़’ पार्षद से लेकर राष्ट्रपति पद तक का फार्म भर के इस ढीले ढाले पन का उपहास करते रहते हैं पर उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में चार प्रमुख दलों के बीच टक्कर मानी जा रही है। रोचक यह है कि ये चारों दल राजनीतिक दल के नाम पर चुनावी दल हैं और सामाजिक राजनीतिक आन्दोलनों से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है, भले ही इनका ‘शुभ नाम’ कुछ भी हो। ये चारों दल पिछली परम्परा के अनुसार अपना अपना चुनावी घोषणा पत्र जारी करेंगे जिसका उनके कार्यक्रमों से कोई सम्बन्ध नहीं होगा क्योंकि ये दल कोई राजनीतिक कार्य करते ही नहीं हैं, एक से दूसरे चुनाव के बीच जो कुछ भी करते हैं वह चुनावी सम्भावनाओं से जुड़ा होता है।
उक्त चार दलों में से तीन दल राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल हैं, और एक राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त दल है। विडम्बना यह है कि इनमें से भी केवल एक दल ही राष्ट्रव्यापी दल कहा जा सकता है और यही दल सबसे कमजोर स्थिति में है। दूसरा दल पश्चिम मध्य भारत का दल है जो केन्द्र में सत्तारूढ है व उद्योग व्यापार वालों की पसन्द का दल होते हुए भरपूर संसाधन जुटा लेता है जिसके सहारे वह साम्प्रदायिक संगठनों को बनाये रखता है। ये संगठन चुनावों के दौरान ऐसा ध्रुवीकरण करते हैं कि उसे चुनावी लाभ मिल जाता है। इस दल की पहचान भले ही एक साम्प्रदायिक दल की है किंतु इसकी साम्प्रदायिकता की प्रमुख दिशा चुनाव केन्द्रित ही रहती है व शेष समय में इसके साम्प्रदायिक संगठन ध्रुवीकरण हेतु भूमि विस्फोटक [लेंड माइंस] बिछाने में लगे रहते हैं। तीसरा राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल एक जातिवादी दल है जो आरक्षण के आधार पर लाभांवित वर्ग में पैदा की गयी जातीय चेतना के भरोसे उनके सहयोग से चलता है। ये वह वर्ग है जिसने सरकारी नौकरियों में आकर पाया कि सवर्णों में उनके प्रति अभी भी नफरत बनी हुयी है और वे उन्हें मुख्यधारा में स्वीकार नहीं करते। स्थानीय निकायों के चुनावों और पंचायती व्यवस्था के चुनावों से लेकर सशक्तीकरण योजनाओं में भी इन्हें आरक्षण का लाभ मिला है जिस पर वे लगातार खतरा महसूस करते रहते हैं व इस भय के कारण एकजुट हो गये हैं। यह दल आंकड़ागत रूप से भले ही राष्ट्रीय दल की मान्यता पा गया हो, किंतु चुनावी दृष्टि से मूल रूप से यह उत्तरप्रदेश तक सीमित क्षेत्रीय दल ही है क्योंकि अभीतक और कहीं भी यह स्वतंत्र सरकार बना पाने में सफल नहीं हुआ है। यह दल अपने चुनावी खर्चों के लिए सवर्णों के उम्मीदवारों से सौदा करके  भी संसाधन जुटाता है। इसका अपना एक सुनिश्चित वोट बैंक बन गया है जिसमें अगर कोई दूसरा वर्ग सहयोग कर देता है तो इनकी जीत की स्थितियां बन जाती हैं व न मिलने पर वे ठीक प्रतिशत में अपने वोट पाकर भी हार जाते हैं। गत लोकसभा चुनाव में चार प्रतिशत वोट पाकर भी वे एक भी सीट नहीं जीत सके। कहा गया था कि ‘हाथी’ ने अंडा दिया है।
चौथी पार्टी राज्य स्तर की अधिमान्य पार्टी है और वर्तमान में वही सत्तारूढ है , अपने नाम में जुड़े समाजवाद शब्द से उनका अब कोई सम्बन्ध नहीं है। यह पार्टी पिछड़े वर्गों की एक जाति के वोटों तक सीमित पार्टी है और इसे भी किसी अन्य के समर्थन की जरूरत बनी रहती है। 2007 और 2012 के परिणाम बताते हैं कि समर्थन मिल जाने पर वे सरकार बना लेते हैं, और न मिले तो हार जाते हैं। इनका जातिगत समर्थन सरकार द्वारा देय सत्ता के लाभों के पक्षपात पूर्ण वितरण से बना है। पुलिस की सहायता से वे आपराधिक भावना वाले अफसरों, व्यापारियों से धन की वसूली भी करते रहते हैं। सरकारी ठेके और खदानों के अपने लोगों के बीच आवंटन से वे बहुत अर्थसम्पन्न हो चुके हैं और पहली बार मिले इस स्वाद को बनाये रखने हेतु एकजुट रहना चाहते हैं।
इस प्रदेश में समुचित संख्या में मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं जो संघ परिवार के सच्चे- झूठे आतंक से ग्रस्त होने के कारण भाजपा को हराना अपना प्रमुख ध्येय मान कर वोटिंग करते हैं और जो दल इस स्थिति में नजर आता है उसे अपना एकजुट समर्थन देकर जीतने में सहायता करते हैं। कभी काँग्रेस तो कभी समाजवादी और कभी बसपा उनके योगदान से लाभांवित होते रहे हैं।
ये चारों ही प्रमुख दल सत्ता की शक्ति और सम्पत्ति हथियाने के लिए लालायित नेताओं से भरे हुये हैं जो अपना लक्ष्य पाने के लिए किसी भी दल में सुविधानुसार आते जाते रह्ते हैं और भविष्य में भी ऐसा आवागमन कर सकते हैं। हाल ही में इनमें से हर दल में दूसरे दल में रह चुके नेता सहज रूप से आ चुके हैं और यह सिलसिला लगातार जारी है। ये सभी कभी न कभी सत्तारूढ रह चुके हैं और भरपूर अवैध धन सम्पत्ति के सहारे चुनावों में धन के प्रवाह द्वारा वोटों में वृद्धि के लिए तैयार थे, किंतु बड़े नोटों पर लगे प्रतिबन्धों ने उनको रणनीतियों में परिवर्तन के लिए बाध्य कर दिया है। इनमें से किसको कितना नुकसान हुआ है इसका आंकलन अभी शेष है किंतु केन्द्र की भाजपा सरकार ने इसे लागू किया है अतः अनुमान किया जा सकता है कि उसने पहले ही सावधानी पूर्वक उचित समय पर पांसे चले होंगे।
सच तो यह है कि यह कोई लोकतांत्रिक लड़ाई नहीं है अपितु सामंती युग का सत्ता संग्राम है जिसे नये हथियारों से लड़ा जाना है। इनमें षड़यंत्र, दुष्प्रचार, झूठ, धोखे, सिद्धांतहीनता, वंशवाद, दलबदल,  जातिवाद, साम्प्रदायिकता, अवैध धन, बाहुबलियों के दबाव, आदि का प्रयोग होगा। सबके पास अपने अपने मिसाइल हैं और अपने अपने कवच हैं। सब एक दूसरे का प्रत्यक्ष और परोक्ष सहयोग लेते देते रहे हैं और उसके लिए अभी भी तैयार हैं। चुनावों का विश्लेषण करते हुए कुछ लोग सैद्धांतिकता का छोंक लगाने की कोशिश करते हैं जो अंततः हास्यास्पद हो जाती है। राजनैतिक चेतना सम्पन्न वोट इतनी कम संख्या में है कि वह चुनाव परिणामों पर प्रभाव नहीं डालता। काँग्रेस किंकर्तव्यविमूढ होकर किराये के चुनावी प्रबन्धक के सहारे है, सपा और बसपा अपने जातिगत मतों के सहारे है व भाजपा दलबदल से लेकर दंगों और बेमेल गठबन्धनों तक कुछ भी कर सकती है।
यह चुनाव नहीं महाभारत का संग्राम है जहां युद्ध जीतने के लिए शकुनि की चालें व कृष्ण की कूटनीतियां सब काम करेंगी।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

            

बुधवार, अक्टूबर 26, 2016

इन राजनेताओं में किसी का ज़मीर क्यों नहीं जागता

इन राजनेताओं में किसी का ज़मीर क्यों नहीं जागता
वीरेन्द्र जैन



महावीर और बुद्ध के जमाने से सुनते आये हैं कि एक तृप्ति के बाद जीवन में वैराग्य भाव पैदा होता है और व्यक्ति अपने जीवन के पिछले भाग में की गयी भूलों के प्रति पश्चाताप करता है और सब कुछ त्याग देता है। इनमें से कुछ तो इसलिए स्मरणीय हो गये हैं कि उन्होंने यह प्रयास किये कि अपने स्वार्थ में जो समाज विरोधी भूलें उन्होंने कीं हैं उन्हें कोई दूसरा न करे। इसके लिए उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी जिसमें अपनी भूलों को स्वीकारा। महात्मा गाँधी ने अपनी आत्मकथा का नाम ही रखा है ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ । वे अपनी आत्मकथा के प्रारम्भ में ही लिखते हैं कि कैसे उन्होंने बचपन में पैसे चुराये, बीड़ी पी, और परिवार में वर्जित मांसाहार किया।
इस दौर के कुछ राजनेताओं ने भी अपने संस्मराणात्मक लेखन को आत्मकथा का नाम दिया है किंतु वह आत्म प्रशंसा से अधिक कुछ भी नहीं है। निर्धनता के खिलाफ अपने संघर्ष को भी इतना बढा चढा कर बताया है ताकि उनकी वह बहादुरी प्रकट हो जो उनमें कभी रही ही नहीं।
आज़ादी के बाद के राजनीतिक इतिहास को देखें तो पाते हैं कि नेहरू युग के बाद लगातार षड़यंत्रकारी राजनीति चली जिसमें अनैतिक रूप से धन अर्जित करने वालों ने अधिकारियों, राजनेताओं को ही नहीं अपितु मुख्यधारा के प्रमुख राजनीतिक दलों को निरंतर भ्रष्ट किया। इन सब ने न केवल उद्योगपतियों व विदेशी शक्तियों से ही धन लिया अपितु अपराधियों से भी धन लेकर उनके अपराधों को प्रोत्साहित किया। इस क्रिया ने न केवल हमारे विकसित होते लोकतंत्र की दिशा को असमय आहत किया अपितु न्यायतंत्र को भी प्रभावित किया। 1967 के बाद से इसकी धारावाहिकता इतनी अधिक है कि किसी एक वर्ष या किसी एक घटना की चर्चा कर देने से बात नहीं बनती। आश्चर्य तो यह है कि मीडिया में इनकी कहानियां छुटपुट रूप से आती रही हैं किंतु किसी भी राजनेता ने अपने मुँह से इन कहानियों को बता कर प्रायश्चित नहीं किया।
जब दलबदल कानून लागू नहीं हुआ था तब आयाराम – गयाराम संस्कृति का विकास हुआ था और जहाँ पक्ष विपक्ष में सदस्यों की संख्या में न्यूनतम अंतर होता था तब मंत्री पद न पाने वाले अनेक सक्षम विधायक दूसरे दल के साथ टांका भिड़ाने में लगे रहते थे और दर्जनों बार इसी कारण से सरकारें गिरीं और बनी हैं। इस तरह के दल बदल को ‘ह्रदय परिवर्तन’ भी कहा गया पर वह न तो ह्रदय से जुड़ा होता था और न विचारों से। यह शुद्ध रूप से अनैतिक सौदा होता था जिसमें वित्तीय संसाधन कोई सरकार से असहमत उद्योगपति ही जुटाता था और दलबदल करने वाले विधायक को अधिकांश मामलों में समुचित राशि दी जाती थी। भेड़ बकरियों के रेवड़ की तरह ऐसे विधायकों को घेर कर अनजान स्थानों के अच्छे होटलों में ले जाकर शराब और शबाब में डुबो दिया जाता था व तय समय पर विधानसभा में प्रकट करा दिया जाता था। दो ढाई दशक तक अनेक संविद सरकारों का गठन और पतन इसी तरह हुआ। अभी अभी महाराष्ट्र के पूर्व उप मुख्य मंत्री का एक कथन समाचार पत्रों में आया है जिसमें उन्होंने कहा है कि पहले 50-50 लाख रुपये में विधायक पाला बदल लेते थे पर अब पार्षद तक इतने में हिलते भी नहीं हैं। केन्द्र की अल्पमत सरकारों के दौर में किस तरह समर्थन जुटाया जाता रहा उसका नमूना 1990 से 2004 तक खूब देखा गया है। नरसिंह राव सरकार के खिलाफ आये अविश्वास प्रस्ताव के समय शराब में डूबा हुआ एक सांसद तो नशे में गलत बटन ही दबा देता है जिसे बाद में ठीक किया जाता है। विधेयकों को पास कराने में किस तरह से सौदे होते हैं उसे 2008 में परमाणु संधि विधेयक को पास कराने के समय देखने को मिला जिसमें समाजवादी पार्टी ने दो दिन के अन्दर ही अपना पाला बदल लिया था और भाजपा समेत कई दलों के अनेक सांसद अनुपस्थित हो गये थे। नोटों की गिड्डियां सदन में दिखायी गयी थीं। पिछले अनेक चुनावों के दौरान करोड़ों रुपयों से भरी गाड़ियां पकड़ी जाती रही हैं पर बाद में पता ही नहीं चलता कि उस पैसे का स्त्रोत क्या था और वह कहाँ गया या किसको दण्डित किया गया। चुनावों से जुड़ी हिंसा में चयनित हत्याओं की अनेक कहानियां हैं, जो भुला दी जाती हैं। वोट काटने वाले दलों के नेताओं को चुनावों के लिए धन का लेन देन लगातार चल रहा है।
इस तरह के अनेक अपराध निरंतर होते रहे हैं और कानून की अपनी सीमाएं हैं किंतु इनमें  सम्मिलित किसी भी राजनेता ने अभी तक इस सन्दर्भ के किसी सच को प्रकट नहीं किया है। कल्पना करें कि अगर अमर सिंह, शरद पवार या अमित शाह में कभी वैराग्य भाव जागृत हो जाये और वे अपने जीवन के सच प्रकट करें तो देश की राजनीति में कितना भूचाल आ जाये। पिछली सदी के सातवें दशक से इस तरह के अवैध व्यापार में कई हजार लोग सम्मलित रहे हैं किंतु किसी ने भी वादा माफ गवाह की तरह भी उसको प्रकट नहीं किया है जिससे उस वृत्ति और उन्हें पनपाने वालों की पहचान अखबारों के अनुमानों से आगे निकल सके।
स्वतंत्रता संग्राम की प्रमुख पार्टी होने, तथा दलितों व अल्पसंख्यकों के सुनिश्चित मतों की स्वाभाविक पार्टी होने के साथ साथ काँग्रेस सत्ता की सुविधाओं के कारण लम्बे समय तक सहज ही सरकार में रही है जिसे अपदस्थ करने के लिए भाजपा ने सबसे अधिक कूटनीतियों को बुना है और उनके लिए सभी तरह की नैतिकताओं की तिलांजलि दी है। उसके अनेक वरिष्ठ नेताओं को रिटायर कर दिया गया है व अब उनकी वापिसी सम्भव नहीं दीखती। यदि उम्र के इस पड़ाव पर उनका ज़मीर जागे और वे लोकतंत्र के हित में सच को प्रकट करने का साहस दिखायें तो राजनीति का बहुत सारा धुंधलका छंट सकता है।
काश ऐसा हो पाता !   
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, सितंबर 23, 2016

उत्तर प्रदेश का घटनाक्रम और कुछ बुनियादी सवाल

उत्तर प्रदेश का घटनाक्रम और कुछ बुनियादी सवाल
वीरेन्द्र जैन

उत्तर प्रदेश सरकार में गत दिनों जो कुछ चला, वह एक पार्टी या एक प्रदेश सरकार के संकट से अधिक, ऐसे संकटों की जड़ों को समझने की जरूरत बताता है। देश की विभिन्न सरकारों, विभिन्न दलों, और लोकतंत्र के विभिन्न स्तम्भों के बीच लगातार ऐसे ही टकराव चल रहे हैं जो कभी सतह पर आ जाते हैं और कभी अन्दर ही अन्दर व्यवस्था को खोखला करते रहते हैं। हमारा संविधान एक अच्छा संविधान है किंतु हमारे समाज से उसके अनुरूप ढलने की जो अपेक्षा की गयी थी, उसकी गति बहुत धीमी रही। परिणाम यह हुआ है कि बिना बड़े सामाजिक परिवर्तन के यह संविधान समाज के साथ साम्य नहीं बैठा पा रहा है।  
उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार की वास्तविक स्थिति यह है कि वहाँ कहने को तो समाजवादी नाम की पार्टी की सरकार है किंतु वह उतनी ही समाजवादी है जितने कि पूर्व राजपरिवार के सदस्य अपने आप को महाराजा, कुँवरसाहब, राजमाता, नबाब आदि कहते, कहलवाते हैं। पहलवान मुलायम सिंह ने कभी लोहिया जी से गंडा बँधवा लिया था और खुद को समाजवादी कहने लगे थे किंतु अमर प्रेम में पड़ने के बाद उन्होंने लोहियाबाद से ऐसा पीछा छुड़ाया कि केवल समाजवादी शब्द ही इस तरह शेष रह गया जिस तरह कि बन्दर से आदमी बनने के बाद भी पूंछ का अंतिम वेर्टेब्रा बाकी बचा हुआ है। वे कभी समाजवादी मूल्यों के पक्षधर की तरह प्रविष्ट हुये थे और उनका राजनीतिक कद भी वैसा ही था जैसा कि शेष समाजवादियों का रहा, पर मंडल कमीशन आने के बाद वे अपने पहलवान पट्ठों के उस्ताद से यादवों के नेता के रूप में बदल गये जिन्होंने पहले बहुजन समाजवादी पार्टी के सहयोग से और बाद में संघ की हिंसा से आतंकित मुसलमानों के सहयोग से समाजवादी [यादववादी] सरकार बनायी। राममन्दिर का सूत्र हाथ आने के बाद संघ परिवार ने जिस तरह से देश में साम्प्रदयिक विभाजन का सपना देखा था उसमें बहुसंख्यकों का सम्भावित वर्चस्व तोड़ने के लिए सवर्ण सशक्त चतुर हिन्दुओं को मेहनतकश जातियों से दूर करने की आवश्यकता थी और इसी आवश्यकता ने मंडल आन्दोलन को जन्म दिया था। इस आन्दोलन का पिछड़ी जातियों के उत्थान से न कोई वास्ता था और न ही इसका कोई सामाजिक असर हुआ। इसी मंडल आन्दोलन ने श्रीमती इन्दिरा गाँधी के बाद उपजे शून्य को भरने के लिए कूद पड़े संघ परिवार को देश पर झपट्टा नहीं मारने दिया। इस बीच पहलवान मुलायम सिंह को अमर सिंह जैसा व्यक्ति मिल गया जिसके पास वह सब कुछ था जो मुलायम सिंह के पास नहीं था, और जिसे वह सब कुछ चाहिए था जो मुलायम के पास था। वाक्पटुता, प्रत्युन्न्मति, बयानबाजी, सौदेबाजी तथा पार्टी चलाने और धन की ताकत वाले विरोधियों से मुकबला करने के लिए कोष की व्यवस्था करने वाला भी चाहिए था। अमरसिंह ने मुलायम सिंह की समस्त कमियों की पूर्ति की जिसके बदले में जनसमर्थन विहीन अमरसिंह ने पद प्रतिष्ठा का उपहार पाया। सफल राजनीति के लिए दोनों ही कोणों को साधने की जरूरत होती है। मुलायम सिंह ने सोचे समझे ढंग से सरकार से मिलने वाले सारे लाभ अपनी जाति के लिए लुटा दिये जिससे पहली बार उनके जाति समाज को सत्ता की मिठाई का स्वाद चखने को मिला और ये समझ में आया कि हम जिन सवर्णों के लिए लठैती करते रहे वह लाभ तो खुद भी उठा सकते हैं बशर्ते कि सरकार हमारी ही बनी रहे। अब पूरे उत्तर प्रदेश में उनकी जाति के सूबेदार अपने हित में यादववादी सरकार बनाने के लिए कृतसंकल्प रहते हैं बशर्ते जीत के लिए किसी अन्य समुदाय का साथ मिल जाये। विचार से जुड़ी नहीं होने के कारण उनकी कथित पार्टी का विस्तार इलाके से बाहर नहीं हुआ। सीधे चुनाव में उन्हें अपनी जाति और परिवार के बाहर सफलता नहीं मिली।  
सत्ता पाने और बनाये रखने के लिए जो अनियमितताएं करनी होती हैं उसके अपने वैधानिक खतरे होते हैं, जिनसे बचने के लिए सत्ता सुख में डूबे दल निरंतर असुरक्षा की भावना में जीते हैं। यह भावना उन्हें किसी भी तरह से सुरक्षातंत्र को लगातार मजबूत करने के लिए प्रेरित करती है। धन का संचय भी ऐसा ही एक उपाय है। अनियमितताओं के समानांतर कानून भी अपना काम करता रहता है। लोकतंत्र में सत्ता भी दीर्घकालीन नहीं होती इसलिए तंत्र से बचाव भी करते रहना पड़ता है। 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद अचानक अखिलेश को मुख्य मंत्री बनाना इसी सावधानी का हिस्सा था।
अमर सिंह की सलाह की सीमा में बंध जाने के बाद मुलायम सिंह ने सिर्फ और सिर्फ सत्ता की राजनीति की। अपनी सत्ता और उसके तंत्र को बचाये रखने व बढाने के लिए उन्होंने अपने प्रत्येक सहयोगी को धोखा देकर राजनीतिक लाभ उठाया। वीपी सिंह की सरकार उन्हीं के कारण गिरी थी, राष्ट्रपति के चुनाव व परमाणु समझौते के सवाल पर उन्होंने सीपीएम को धोखा दिया, प्रधानमंत्री पद के लिए सोनिया गाँधी को धोखा दिया, गठबन्धन के सवाल पर ममता बनर्जी को धोखा दिया बिहार चुनाव में लालू प्रसाद को धोखा दिया बगैरह। अमर सिंह को झूठमूठ का निकालने और वापिस ले लेने के मामले में अपने ही आज़म खान व रामगोपाल यादव को धोखा दिया तथा 2012 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री प्रत्याशी का नाम छुपा कर अपने मतदाताओं को धोखा दिया। सच तो यह है कि समाजवादी पार्टी में न कोई समाजवादी है और न ही कोई किसी सिद्धांत के साथ है न पार्टी जनता के साथ है। यह सत्ता पाने वाला एक गिरोह है जिसमें यादव सिंह जैसे हजारों करोड़ के इंजीनियर और मथुरा कांड जैसे भूमि अतिक्रमण वाले माफिया सुरक्षा पाते रहते हैं। वोटों के लिए बनावटी धर्म निरपेक्षता और भीतरी जोड़ तोड़ चलती रहती है। जब हित टकराने लगते हैं तो हलचल सामने आ जाती है।
मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, समेत समस्त छोटे राज्यों में इसी तरह की उठापटक चलती रहती है जिनके स्वरूप भिन्न हो सकते हैं किंतु बुनियाद एक जैसी है। इन्हें देख कर लगता है कि हम ऐसे सामंती युग में जी रहे हैं जिसका पूंजीवाद के साथ कोई टकराव नहीं है। इसे बदलने के लिए एक नये तरह के बड़े सामाजिक आन्दोलन की जरूरत है। ऐसे परिवर्तन की प्रतीक्षा में हम कभी जेपी के आन्दोलन, कभी वीपी सिंह, अन्ना, आम आदमी पार्टी, के पास भटकते हैं, पर अंततः निराश होते रहे हैं। नोटा के वोटों की वृद्धि कुछ संकेत दे रही है जिसे समझने की जरूरत है।
वीरेन्द्र जैन
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यह सामाजिक ही नहीं राजनीतिक फिल्म भी है

फिल्म समीक्षा- पिंक
यह सामाजिक ही नहीं राजनीतिक फिल्म भी है
वीरेन्द्र जैन

सुजित सरकार की फिल्म ‘पिंक’ न केवल विषय के चयन में महत्वपूर्ण है अपितु उसके निर्वहन में भी सफल है। पिछली सदी से प्रारम्भ महिलावादी आन्दोलनों के बाद जो महिला सशक्तिकरण आया है उससे परम्परावादी समाज के साथ कई टकराव भी पैदा हुये हैं। उन्हीं में से एक को इस फिल्म के विषय के रूप में चुना गया है।
यह बात खुले दिमाग से स्वीकार कर ली जाना चाहिए कि महिलावादी आन्दोलन उसी समय से तेज हुआ है जब से महिलाओं को गर्भ धारण करने या न करने की सुविधा प्राप्त हुयी है। परिवार नियोजन सम्बन्धी उपायों के विकसित हो जाने के बाद से ही महिला दोयम दर्जे के नागरिक होने से मुक्ति पा सकी है। महिला और पुरुष के बीच गर्भ धारण की क्षमता ही एक प्रमुख अंतर है, क्योंकि गर्भ धारण के दौरान उसे न केवल कठोर शारीरिक श्रम से बचना होता है अपितु बच्चे को पाल कर बढा करने में उसके जीवन का प्रमुख हिस्सा लग जाता रहा है। एक से अधिक बच्चे होने पर वह आजीवन घरेलू महिला होने के लिए अभिशप्त हो जाती है और वैसे ही घरेलू काम अपना लेती रही है। एक मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चे को अपने पैरों पर खड़ा करने लायक बनाने में बीस साल लग जाते हैं जिसके लिए कई बार न चाहते हुए भी दम्पति को एक साथ रहना भी जरूरी होता है। स्तनपान कराने से लेकर मातृत्व की भावना के कारण महिला की जिम्मेवारी बच्चे के पोषण हेतु अधिक महत्वपूर्ण होती है तो घर चलाने के लिए साधन अर्जित करने की जिम्मेवारी पुरुष के हिस्से में आयी है जिसके प्रति वह लापरवाह भी हो सकता है किंतु महिला अपनी जिम्मेवारियों के प्रति लापरवाह नहीं हो सकती। यह बात उसे बाँधती रही है, उसकी आज़ादी को सीमित करती रही है। गर्भधारण की स्वतंत्रता के बाद वह पारिवारिक गुलामी से, भावनात्मक गुलामी [इमोशनली ब्लैकमेलिंग] से मुक्त हो सकने की स्थिति में आयी है।
दूसरे के श्रम से अपने लिए सुविधाएं बढाने वाले समाज ने गुलाम बनाने शुरू किये व इतिहास बताता है कि ऐसे प्रत्येक मालिक से मुक्त होने के लिए मानव जाति को संघर्ष करना पड़ा है। हर बेड़ी के अपने स्वरूप होते हैं जिनमें से कुछ दृश्य होती हैं और कुछ अदृश्य होती हैं। परम्पराओं में ढाल कर कुछ बेड़ियों को इस तरह प्रस्तुत किया गया है जिससे वे प्राकृतिक जैसी लगने लगती हैं। अपने को प्राप्त हर पत्र का उत्तर देने के लिए प्रसिद्ध डा. हरिवंशराय बच्चन ने एक बार लिखा था कि ‘मैं आज़ाद को भी उतनी आज़ादी देना चाहूंगा कि अगर वह चाहे तो गुलामी स्वीकार कर ले’। न आज़ादी का स्वरूप किसी पर थोपा जा सकता है और न ही गुलामी के स्वरूप को थोपा जाना चाहिए।
अब महिलाओं को जबरदस्ती उस बन्धन से बाँध कर नहीं रखा जा सकता है जो बन्धन कच्चा पड़ चुका है। महिलाओं की शिक्षा, स्वतंत्र रोजगार, के बाद उन्हें अपना स्वतंत्र घर भी चाहिए जिससे निकाले जाने का अधिकार अब तक हमेशा परिवार के पुरुष के पास ही रहा है क्योंकि मकान का मालिकत्व उसे ही प्राप्त रहा है।  चर्चित फिल्म की तीन महिला पात्रों में से एक दिल्ली में अपने पिता का घर होते हुए भी किराये के मकान में दो अन्य युवतियों के साथ सहभागी की तरह रहती है व अपना मकान बनवाने के लिए लोन लेकर किश्तें चुका रही है। वह नहीं चाहती कि डांस के कार्यक्रमों से देर रात लौटने पर उसे परिवार की बन्दिशों का सामना करना पड़े। समझौते से देश को मिली आज़ादी के बाद एक नया सामंत वर्ग उभरा है जो नागरिक अधिकारों, सरकारी सुविधाओं, और कानून के पालन में भी अपनी विशिष्टता मानता है। रोचक यह है कि इस नये सामंती वर्ग की टकराहट पूंजीवाद से नहीं है अपितु यह उसका सहयोगी है। कथा का खलनायक ऐसे ही परिवार का लड़का है जिसे राजनीति में सक्रिय अपने चाचा का संरक्षण प्राप्त है। यही कारण है कि डिनर के लिए ले जाकर बलात्कार करने की कोशिश करने पर युवती अपनी रक्षा में उसे बोतल से मार देती कर घायल कर देती है, तो पुलिस उस लड़के की नियम विरुद्ध मदद करती है और पीड़ित लड़की को ही आरोपी बना देती है। लड़के का वकील लड़कियों की स्वतंत्र वृत्ति के कारण उनको ही चरित्रहीन सिद्ध करता है।
      यह लड़का और उसके साथी मकान मालिक को धमकाते ही नहीं अपितु उसके स्कूटर को टक्कर मार कर डराते भी हैं जिससे वह स्वतंत्र रूप से रह रही लड़कियों से मकान खाली करा ले और वे बेघर हो जायें। कहीं गुलाम परम्परा टूट न जाये इसलिए आसपास के सभी लोग स्वतंत्र लड़कियों को चरित्रहीन मान कर चलते हैं व उस धारणा को स्थापित भी करना चाहते हैं।
आन्दोलनों में एक गीत गाया जाता है- हम क्या गोरे क्या काले, सब एक हैं, हम जुल्म से लड़ने वाले सब एक हैं, एक हैं। प्रताडित और अकेली पड़ गयी लड़कियों की मदद के लिए एक ऐसा बूढा वकील सामने आता है जिसकी पत्नी [या प्रेमिका] मृत्यु शैया पर है और उसकी सेवा के लिए वह वकालत छोड़ चुका है। एक पीड़ित संवेदनशील व्यक्ति ही दूसरे की वेदना को समझ सकता है। इस वकील की सफल भूमिका अमिताभ बच्चन ने की है। यह वकील पर्यावरण के प्रदूषण से ही पीड़ित नहीं महसूस करता अपितु समाज में खत्म होती जा रही संवेदनाओं की साफ हवा की कमी को भी महसूस करता है। उम्र ने ऐसे लोगों की आवाजों को शिथिल कर दिया है व जज को उसे कहना पड़ता है कि थोड़ा तेज बोले। यह वकील, जज और मकान मालिक जैसे कुछ लोग इस बात का प्रतीक है कि मनुष्यता के पक्ष में आवाज उठाने वाले कुछ उम्रदराज लोग ही बचे हैं, और वे भी प्रदूषित वातावरण में अकेले पड़ते जा रहे हैं।
      पुलिस और नौकरशाही अपराधी राजनीतिज्ञों और उनके परिवारियों के खिलाफ कानून का पालन करवाने में डरती है। होटल मालिक जैसे व्यवसाय करने वाले उन्हीं के पक्ष में अनुकूल गवाही देने को मजबूर हैं। यह संयोग ही है कि न्याय व्यवस्था में कहीं कहीं कुछ संवेदनशील न्यायाधीश, या निरीह महिला पुलिसकर्मी दिख जाती हैं।
यह यथार्थवादी फिल्म स्पष्ट संकेत देती है कि यदि कुछ संयोग घटित न हुये होते तो व्यवस्था स्वतंत्र होने का प्रयास करती लड़कियों को हत्या के प्रयास व अवैध देह व्यापार के अपराध में सजा दे चुकी होती। महिला सशक्तिकरण कानून के दुरुपयोग को लेकर समाज में व्याप्त धारणाओं और उनके पक्ष की महिलाओं को बड़ी बिन्दी वाली ब्रिग्रेड बताने के संवाद बताते हैं कि बदलाव पर विमर्श न चाहने वाले उनकी निन्दा करके या चरित्र पर हमला करके अपनी घृणा व्यक्त करते रहते हैं। महात्मा गाँधी भी राजनीतिक स्वतंत्रता और सामाजिक स्वतंत्रता को अलग करके नहीं देखते थे। यही कारण रहा कि उन्होंने अछूतोद्धार, और स्वतंत्रता संग्राम साथ साथ चलाया था। जो राजनीति, सामाजिक स्वतंत्रता के आन्दोलन को दूर रख कर चलती है उसको गहराई नहीं मिलती। इस तरह यह फिल्म सामाजिक सवाल उठाते हुए  राजनीतिक सवाल भी उठाती है।
वीरेन्द्र जैन
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शनिवार, सितंबर 03, 2016

राजनीतिक दलों में उम्मीदवार बनाने के नियम क्यों नहीं?

राजनीतिक दलों में उम्मीदवार बनाने के नियम क्यों नहीं?

वीरेन्द्र जैन

संविधान के अनुसार हिन्दुस्तान के नागरिकों को आम चुनाव में खड़े होने और सर्वाधिक वोट पाकर सम्बन्धित सदन में प्रतिनिधि बनने का अधिकार है। किंतु यह अधिकार पूरी तरह से स्वच्छन्द अधिकार नहीं है अपितु इसमें भी कुछ किंतु परंतु लगे हैं। प्रत्याशी की उम्र 25 साल से अधिक होना चाहिए, उसका मानसिक स्वास्थ ठीक हो अर्थात पागल न हो, उसका आर्थिक स्वास्थ ठीक हो अर्थात दिवालिया न हो, इत्यादि। ये नियम समाज के, और लोकतंत्र के हित में बनाये गये हैं, तथा समय समय पर इनमें सुधार किया जाता रहा है। पिछले ही दिनों दलों की अधिमान्यता के लिए पात्रता परीक्षण का समय पाँच साल से बढा कर दस साल कर दिया गया है। इससे पूर्व भी दल बद्ल कानून के अस्तित्व में आने के बाद सदस्यों को सदन में भी दलों के साथ जोड़ा गया था और इन दलों में उनके पदाधिकारियों के सावाधिक चुनाव अनिवार्य किये गये थे, शायद यह दलों की कार्यप्रणाली में निर्वाचन आयोग का पहला हस्तक्षेप था। सुधारों की आवश्यकता हमेशा बनी रहती है इसलिए सर्वदलीय बैठक बुला कर सहमति से कुछ विकृतियों को दूर करने के लिए और भी नियम जोड़े जा सकते हैं।
भले ही हमारे विकसित होते लोकतंत्र में बड़े दलों सहित बहुत सारे दल व्यक्ति केन्द्रित हो कर रह गये हैं किंतु सार्वजनिक रूप से इस सत्य को ऐसा कोई भी दल स्वीकार नहीं करता। प्रत्येक के पास अपना दलीय संविधान और घोषणापत्र होता है भले ही उसके अमल में कितने ही विचलन होते रहते हों। विडम्बनापूर्ण है कि चुनाव लड़ने वाले किसी भी पंजीकृत दल ने उम्मीदवार बनाने के नियम नहीं बनाये हैं और टिकिट देने की जिम्मेवारी कुछ विश्वासपात्र चुनिन्दा लोगों की समिति को सौंप दी जाती है। उनके बारे में भी समय समय पर टिकिट बेचने के आरोप लगते रहते हैं। एक जातिवादी राष्ट्रीय दल तो खुले आम टिकिट बेचने के लिए कुख्यात हो गया है। टिकिट देने की इसी मनमानी के कारण दल के उद्देश्य और घोषणापत्र निरर्थक हो जाते हैं व उस क्षेत्र का चुनाव, दल की जगह व्यक्ति के चुनाव में बदल जाता है। यही कारण है कि क्षेत्रों के अपने अपने सूबेदार पैदा हो गये हैं। विभिन्न सरकारों में पदस्थ मंत्री अपने चुनाव क्षेत्र में अपने विभाग की विकास योजनाओं का काम अनुपात से अधिक कराने की कोशिश कर दूसरे क्षेत्रों के साथ पक्षपात करता है और परोक्ष रूप से सरकारी धन से अपने समर्थन को सुनिश्चित करते हुए अपने प्रिय लोगों की आर्थिक मदद करता है। उसे ही अगर अपने दल से टिकिट नहीं मिलता तो वह उसी क्षेत्र के लिए किसी दूसरे दल से टिकिट प्राप्त कर लेता है। अगर प्रत्याशी बनने के लिए पार्टी में सदस्यता की न्यूनतम अवधि तय हो तो कोई टिकिटाकांक्षी दलबदल न करेगा।  
उल्लेखनीय है कि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने मनमोहन सिंह कैबिनेट के दो मंत्रियों व काँग्रेस समेत बहुत सारे दूसरे दलों के अनेक नेताओं को एक दिन की सदस्यता पर भी टिकिट दे दिया  था। कुछ को तो काँग्रेस का टिकिट मिल जाने के बाद भी भाजपा का टिकिट मिल गया था, और  दूरदृष्टि वाले लोग बीच सफर में ही गाड़ी बदल कर दूसरी दिशा की गाड़ी में बैठ गये थे। ऐसे भी लोग थे जिन्होंने चुनाव का फार्म पहले भरा था और पार्टी की सदस्यता का फार्म बाद में भरा था। बहुत सारे सेलीब्रिटीज को तो अचानक बुला कर आनन फानन में चुनाव लड़वा दिया गया था जिनमें परेश रावल और बाबुल सुप्रियो जैसे फिल्मों से जुड़े लोग भी सम्मलित थे।
देश में सोलह सौ से अधिक दल पंजीकृत हैं और पंजीकरण का काम आम चुनाव घोषित हो जाने के बाद भी जारी रहता है। होना यह चाहिए कि पंजीकरण के न्यूनतम पाँच वर्ष समाज सेवा करने के बाद ही दल की ओर से चुनाव में उतरने की पात्रता हो। पार्टी की ओर से टिकिट पाने के लिए भी न्यूनतम वरिष्ठता अनिवार्य हो जो कम से कम दो वर्ष हो। किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए यह जरूरी हो कि वह देश की प्रमुख चुनौतियों के सम्बन्ध में अपना दृष्टि पत्र जारी करे और यह भी स्पष्ट करे कि समान दृष्टिपत्र वाले किसी दूसरे दल के होते हुए भी वह क्यों अलग दल पंजीकृत कराना चाहता है। किसी स्वतंत्र एजेंसी से दलों की सदस्य संख्या का आडिट भी कराया जा सकता है और दोहरी सदस्यता पर रोक लगायी जा सकती है। सहमति बनने पर उम्र की अधिकतम सीमा भी तय की जा सकती है।
अब राजनीति से जुड़े लगभग सबके पास मोबाइल फोन, आधार कार्ड और अपना यूनिक आइडेंटिफिकेशन नम्बर है तो किसी भी क्षेत्र की पार्टी इकाई से अपना उम्मीदवार तय करने के लिए आन लाइन विचार जाने जा सकते हैं। यह अधिक लोकतांत्रिक होगा और राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करेगा। इस तरह से धनिकों व दबंगों का दबाव रोका जा सकता है। देखा गया है कि कई दलों में टिकिट बाँटने वाली समिति को छुप कर काम करना होता है और उसके सदस्य अपने ही कार्यकर्ताओं से भागे भागे फिरते हैं। आय के अनुपात में लेवी लेने का नियम भी अगर सभी दलों में लागू कर दिया जाये तो राजनीतिक दलों को कार्पोरेट घरानों के चन्दे के दबाव में काम न करना पड़ेगा और किसी स्वार्थ के कारण राजनीति में घुसपैठ कर वर्चस्व जमाने वालों की विशेष स्थिति को समाप्त किया जा सकता है। आखिर राजनीतिक दलों को उसके अपने सदस्यों के सहयोग से ही चलना चाहिए। निर्वाचन के समय दिये जाने वाले शपथपत्र बताते हैं कि जनप्रतिनिधियों की आय में किस गति से वृद्धि हो रही है। ऐसी वृद्धि वाले राजनीतिक दलों के सदस्यों से आर्थिक सहयोग लेने की जगह बाहर वालों से सहयोग लेना ही राजनीति को भ्रष्ट कर रहा है।     
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629


बुधवार, अगस्त 31, 2016

क्या न्यायिक प्रकरणों का बढता विलम्बन आपराधिक षड़यंत्र है?

क्या न्यायिक प्रकरणों का बढता विलम्बन आपराधिक षड़यंत्र है?
वीरेन्द्र जैन
इन दिनों न्याय व्यवस्था पर खतरा बढ गया हैं क्योंकि उसकी कमियों कमजोरियों का लाभ लेकर कार्यपालिका और विधायिका में कुछ ऐसे लोग प्रमुख स्थानों पर पहुँच गये हैं, जो स्वतंत्र न्यायपालिका नहीं चाहते। वे नहीं चाहते कि वह न्यायपालिका मजबूत हो जो उनसे अलग विचार रखती है। लगभग ऐसी ही स्थिति इमरजैंसी के दौरान पैदा हो गयी थी और तब प्रतिबद्ध न्यायपालिका जैसे शब्द और व्याख्याएं प्रचलन में आयी थीं। पिछले दिनों जो लोग दिन दहाड़े किये गये कारनामों पर कानून की कमजोरियों के कारण सजा न मिल पाने को निर्दोष होने के प्रमाण की तरह बताते रहे हैं, वे ही अब न्यायपालिका से कह रहे हैं कि वे किन किन क्षेत्रों में दखल न दें और कार्यपालिका/विधायिका को अपनी मनमानी करने दें।
दुनिया भर में प्रचलित कथन है कि ‘देर से किया गया न्याय अन्याय के बराबर होता है’। हमारी न्याय प्रणाली में भी न्याय में लगने वाले समय को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इतने जनहितैषी संविधान के बावजूद यह अन्याय प्रणाली में बदलती जा रही है। न्यायालयों में लम्बित बहुत कम प्रकरण ही ऐसे होंगे जो सचमुच न्यायालयीन व्याख्या चाहते हों, अन्यथा अधिकांश में दोनों ही पक्ष यह जानते हैं कि कौन दोषी है, और उनमें से एक त्वरित न्याय चाहता है और दूसरा उसे लम्बित करा के लाभ की स्थिति में बने रहना चाहता है। ऐसी दशा में यह बहुत साफ है कि ज्यादातर मामलों में न्याय का विलम्बन दोषी पक्ष को ही लाभ पहुँचाता है।   
आपराधिक मामलों में न्याय में होने वाली देरी समाज में अपराधों को बढावा देती है, क्योंकि न्याय का काम केवल दोषी को सजा देकर समाज की ओर से बदला लेना भर नहीं होता अपितु ऐसा मानक स्थापित करना भी होता है ताकि दूसरे सजा के भय से वैसा काम करने से बचें। जब दोषी समाज में सिर उठाये ससम्मान घूमते हों तथा चुनाव प्रणालियों की कमजोरियों के कारण विधायिका में सम्मलित हो जाते हों तब स्वाभाविक है कि लोग अपना फैसला खुद करने के प्रति प्रेरित हों। विलम्बित न्याय व्यवस्था और हिंसक अपराधों में वृद्धि समानुपाती होती है। यह एक ऐसा दुष्चक्र होता है जिसमें प्रकरणों के लम्बन से प्रकरणों की संख्या बढती जाती है और संख्या बढने से न्याय में देरी के कारण प्रकरण बढते जाते हैं। इससे लाभान्वित होने वाला एक दोषी वर्ग है जो प्रकरणों के लम्बन को बढाना चाहता है। कर्मचारियों की वेतन विसंगतियों में साधारणतयः देखा गया है कि कर्मचारी बातचीत से प्रकरण हल कर लेना चाहते हैं किंतु नियोजक चाहते हैं कि मामला न्यायाधीन हो जाये जिसके नाम पर लम्बे समय तक सबका मुँह बन्द किया जा सके। स्पष्ट है कि लम्बन आमतौर पर शोषकों के हित में होता है और वे ही चाहते हैं कि अदालतों में लम्बित मामले बढते रहें। प्रतिक्रिया में जब शोषक वर्ग नियमों कानूनों के उल्लंघन पर उतर आता है तो उस पर दोहरी मार पड़ती है।
दोषियों ने अधिवक्ताओं का एक ऐसा वर्ग भी पैदा कर दिया है जो न्याय में देरी कराने की विशेषज्ञता हासिल कर चुका है। उन वकीलों के पास लोग प्रकरणों को लम्बित कराने के लिए ही जाते हैं, जिसके लिए वे असीमित फीस वसूल करते हैं। आमचुनावों में उतरने वाले लोगों को अपनी सम्पत्ति की घोषणा करना जरूरी होता है व ऐसे कुछ वकीलों की आय में अकूत वृद्धि के आंकड़े चौंकाते हैं। एक ऐसा भी जनविश्वास है कि मँहगा वकील करने वाला स्वयं ही अपने अपराधबोध का संकेत दे देता है। 
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने न्यायालयों में न्यायाधीशों की पदस्थापना में हो रही देरी पर सार्वजनिक टिप्पणी की है, जो ध्यान आकर्षित करती है। वह कौन सा वर्ग है जो लोक अदालतों का विरोध करता है ताकि अदालतों का बोझ कम न हो। एक संविधान सम्मत समाज की स्थापना के लिए  ऐसे सारे तत्वों को सामने लाया जाना चाहिए जो न्याय के रास्ते में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रोड़ा बन रहे हैं। इतिहास से सबक लेते हुए हमें सीखना चाहिए कि न्यायपालिका की आँखों में आँसू होना देश के भविष्य के लिए शुभ नहीं हो सकता। संविधान में आस्था रखने वाले सभी लोगों को  न्यायपालिका का सम्मान बनाये रखना होगा।  
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, अगस्त 09, 2016

गुजरात में मंत्रिमण्डल परिवर्तन और भाजपा में लोकतंत्र

गुजरात में मंत्रिमण्डल परिवर्तन और भाजपा में लोकतंत्र
वीरेन्द्र जैन

दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनावों में मिली हार तथा उत्तराखण्ड व अरुणाचल प्रदेश में दलबदल के सहारे सत्ता बदलने को न्यायालय द्वारा अनुचित ठहराये जाने के बाद गुजरात ने मोदी को बेचैन कर दिया है और उन्हें वहाँ मुख्यमंत्री या कहें मंत्रिमण्डल बदलने का अप्रिय निर्णय लेना पड़ा है। वे भले ही इसे आनन्दी बेन के 75 की उम्र के रिटायरमेंट से जोड़ कर प्रदर्शित कर रहे हों, पर उनकी इस बात पर विश्वास न करते हुए सब लोग समझ रहे हैं कि यह पिछले दिनों हार्दिक पटेल के नेतृत्व में हुए पटेलों के हिंसक आन्दोलन और ऊना के दलितों पर निर्भीकता पूर्वक किये गये दमन और अपमान से उपजे प्रतिरोध व राजनीति के उपचार का प्रयास है। यदि केवल आनन्दीबेन के 75 पार का सवाल होता तो पुराने मंत्रिमण्डल के शेष सारे चेहरे यथावत रखे गये होते, पर यहाँ तो लगभग सभी को बदल दिया गया है।  
दुनिया के कम्युनिष्ट आन्दोलन में सोवियत रूस की जो भूमिका थी लगभग वैसा ही गुजरात भाजपा के लिए एक माडल राज्य है। मोदी के सहारे भारतीय जनता पार्टी ने जो झांकी सजाई थी वह गुजरात के माडल के आधार पर ही सजी थी और उसके पतन से बिखर सकती है। यही कारण है कि उस पर विपक्ष के साथ साथ सबकी पैनी निगाहें लगी हुयी हैं। गुजरात बहुत पहले से औद्योगिक रूप से विकसित राज्य रहा है जिसे भाजपा की मोदी सरकार ने न केवल बचाये रखा था, अपितु उसमें होने वाली वृद्धि की दर को भी कम नहीं होने दिया। प्रशासनिक साफ सुथरापन और मुख्यमंत्री की ईमानदार छवि ने भी भाजपा शासित दूसरे भ्रष्ट राज्यों की तुलना में गुजरात राज्य की छवि को सुधारा था। इसी छवि के अतिरंजित प्रचार ने मोदी के नेतृत्व को मान्यता दी। गोधरा में साबरमती एक्सप्रैस में हुए हादसे के बाद जिस त्वरित गति से मुसलमानों के खिलाफ हिंसा हुयी उसकी निन्दा भले ही पूरी दुनिया में हुयी हो किंतु साम्प्रदायिकता के दुष्प्रचार से प्रभावित गुजरात के व्यापारी मानसिकता के लोगों को मोदी सरकार एक दृड़ सरकार नजर आई थी जो कठोर और अप्रिय फैसले लेने का खतरा मोल ले सकती थी।
भले ही भारतीय जनता पार्टी देश के मध्य और पश्चिमी राज्यों की प्रमुख पार्टी है अपितु उसका संगठन इन राज्यों में सक्रिय अन्य दलों से बहुत अच्छा रहा है। इस पार्टी में समान कद के बहुत सारे महात्वाकांक्षी नेता हैं पर गुजरात राज्य के माडल और संघ को प्रिय लगने वाले कठोर फैसले ले कर मोदी ने संघ नेतृत्व के सामने अपना कद बहुत बढा लिया था.। अब वे भाजपा के बादशाह है, जिन्होंने सभी वरिष्ठों को किनारे कर दिया है व लोकसभा के कुशल चुनाव प्रबन्धन से समकालीनों को नेतृत्व स्वीकारने को मजबूर कर दिया है। वे आपस में भले ही प्रतिद्वन्दिता करते रहें किंतु सत्ता और संगठन दोनों में अब मोदी का प्रतिद्वन्दी कोई नहीं है।
गुजरात के ऊना में सामंती मानसिकता के साथ दलितों की अकारण पिटाई और उस घटना का  वीडियो बना कर उसे चुनौती पूर्ण ढंग से वायरल करने को रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद से उत्तेजित दलितों और विपक्षियों ने गम्भीरता से लिया व गुजरात के दलित आन्दोलनरत हुये। पाटीदारो के हिंसक आन्दोलन के बाद यह मोदी के राज्य में उनके लिए दूसरी बड़ी चुनौती थी। उल्लेखनीय है कि इस विषय पर भाजपा नेतृत्व में दलित सांसदों समेत किसी की कोई प्रतिक्रिया देने की हिम्मत नहीं हुयी। स्वयं मोदी ने एक सप्ताह तक स्थिति का गहन परीक्षण करने के बाद आनन्दीबेन से त्यागपत्र दिला दिया। यह घटनाक्रम वर्तमान भाजपा में लोकतंत्र की असली तस्वीर प्रस्तुत करता है।
गुजरात के नये मुख्यमंत्री का चयन, जिसे मनोनयन कहना अधिक उचित होगा, भी ध्यान देने योग्य है। आनन्दीबेन के त्यागपत्र के ट्वीट होने के दो दिन तक पूरे विधायक दल में कहीं कोई सुगबुगाहट दिखाई नहीं दी, जब तक की पार्टी ने नितिन पटेल को मुख्यमंत्री बनाने के संकेत नहीं दिये। इसके आधार पर उन्होंने भावी मुख्यमंत्री की तरह मीडिया से संवाद भी शुरू कर दिया। मोदी के राज्य में उनके स्थान को भरने वाले व्यक्ति की यह आज़ादी उन्हें पसन्द नहीं आयी और चौबीस घंटे के अन्दर फैसला बदल दिया गया व विजय रूपानी को राजसिंहासन देने की राजाज्ञा को सुना दिया गया। आम तौर पर मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पसन्द को हाईकमान व्यक्त करता जिस पर विधायक दल मुहर लगाता है और फिर मुख्यमंत्री अपने मंत्रिमण्डल का गठन करता है जिसमें उपमुख्यमंत्री भी सम्मलित होता है। उल्लेखनीय है कि उपमुख्यमंत्री जैसा कोई पद संविधान में नहीं है और न ही उसके अधिकार कहीं वर्णित हैं, यह शुद्ध रूप से तुष्टीकरण का पद है। पर उपमुख्यमंत्री का फैसला भी नरेन्द्र मोदी के अभिन्न अमितशाह ने पहले ही कर दिया और नितिन पटेल को पहले से ही मंच पर जगह दे दी गयी। वैसे तो स्वयं विजय रूपानी को भी शपथ लेने के बाद ही राज्यपाल के बगल वाली कुर्सी पर बैठने का अधिकार बनता है किंतु वे भी पहले से बैठे हुए थे। मोदी के राजतंत्र में सारे नियमों और परम्पराओं को बदला जा रहा है।
रूपानी के मनोनयन के बाद वे आनन्दीबेन और नितिन पटेल के साथ दोनों उंगलियों से अंग्रेजी अक्षर ‘वी’ का प्रदर्शन करते नजर आये। ये चिन्ह किसी प्रतियोगिता में मिली जीत पर प्रदर्शित किया जाता है। उक्त आचरण उन खबरों को पुष्ट करता है कि आनन्दीबेन चाहती थीं कि नितिन पटेल को ही उनका उत्तराधिकार मिले किंतु मोदी से फोन पर बात करने के बाद विजय रूपानी का नाम तय हुआ, अर्थात मोदी के वीटो से वे मुख्यमंत्री बने व मीडिया को दिखाने के लिए एक साथ ‘वी’ बनाते नजर आये। 
यह सारा सत्ता परिवर्तन किसी रियासत के सत्ताधीश का अपनी गद्दी को सौंपने जैसा था। कथित गौसेवकों के दुराचरण पर, जिनके कारण यह सारा घटनाक्रम हुआ, बाद में मोदी ने माय गोव एप्प के जारी करते समय प्रतिक्रिया दी। उनकी गोलमोल प्रतिक्रिया के अनुसार गौसेवकों के असंवैधानिक आचरण तो ठीक हैं बशर्ते वे असली गौसेवक हों। अब राज्य सरकारें तय करें कि कौन असली है और कौन नकली है, जबकि सच्चाई यह है कि यह कानून व्यवस्था का मामला है। दूसरी ओर हैदराबाद के एक भाजपा विधायक ने खुले आम दलितों की पिटाई का समर्थन किया है तथा अखलाख की हत्या के मामले में भाजपा नेता हत्यारों के पक्ष में बयान देते रहे हैं। अडवाणी जी ने जिस इमरजैंसी की बात की थी वह भाजपा में निर्विरोध तानाशाही की स्वीकरोक्ति से साफ नजर आने लगी है।   
वीरेन्द्र जैन
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