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गुरुवार, फ़रवरी 14, 2019

मुलायम सिंह को अब आराम की जरूरत है?


 मुलायम सिंह को अब आराम की जरूरत है?

वीरेन्द्र जैन
सोलहवीं लोकसभा के अंतिम दिन समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव का यह कहना कि इस सदन के सभी लोग फिर से जीत कर आयें और हमारी पार्टी तो सरकार नहीं बना सकती इसलिए मोदी जी आप फिर से प्रधानमंत्री बनें, ने देश के राजनीतिक माहौल में हलचल मचा दी है। यह कथन इसलिए भी असंगत लगा क्योंकि इस समय पूरे देश के प्रमुख राजनीतिक दल मोदी को हटाने के लिए महागठबन्धन बनाने की ओर अग्रसर हैं और अनेक धुर विरोधी दल भी अपने मतभेद भुला कर एकजुट हो रहे हैं, तब मोदी को फिर से प्रधानमंत्री की औपचारिक कामना करने को भी गलत माना जाना स्वाभाविक है। इसका एक अर्थ यह भी निकलता है कि उनकी पार्टी की जीत न होने पर वे गैर भाजपा के किसी अन्य व्यक्ति के प्रधानमंत्री बनने की जगह मोदी को बेहतर मानते हैं। उनकी पार्टी में जो भी हैसियत शेष हो किंतु उपकृत जाति भाइयों में कुछ तो अपील बाकी है।
सोशल मीडिया पर अनेक लोगों के गुस्से के जबाब में मुलायम समर्थकों ने कहा है कि वे डिमेंशिया से पीड़ित हैं और भूल जाते हैं। उदाहरण के रूप में पिछले दिनों शिवपाल यादव के कार्यक्रम में अखिलेश की तारीफ, या शिवपाल यादव के उस बयान को सामने लाया जा रहा है जिसमें उन्होंने मुलायम सिंह को कैद में बताया था। उनके कुछ पक्षधर इसे उनकी राजनीतिक पहलवानी का चरखा दांव बता रहे हैं। दूसरी ओर उनके आलोचक इसे सीबीआई के दबाव का परिणाम बताते हुए उनके उस बयान की याद दिला रहे हैं जिसमें उन्होंने अपनी पार्टी वालों को अमर सिंह के सहयोग के महत्व को बतलाते हुए कहा था कि जिसके बिना सात साल की कैद हो सकती थी। प्रकरण अभी भी सीबीआई के झरोखे से अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
मुलायम सिंह को लोहियावादी कहा जाता रहा है किंतु सत्ता के लिए चुनावी राजनीति में जोड़ तोड़ करते हुए ना तो उन्हें लोहियावाद की दार्शनिक व्याख्या करते हुए सुना गया ना ही उनके राजनीतिक व प्रशासनिक फैसलों में लोहियावाद को अलग से रेखांकित किया जा सकता है। उनका लोहियावाद केवल लाल टोपी तक दिखता है। वे युवा काल में जुझारू और निर्भीक रहे हैं और इसी कारण से उनके आसपास के युवा उन्हें नेता मानने लगे थे। उन्होंने कुश्ती में जसवंतनगर के नत्थूसिंह का दिल जीत लिया था और पुरस्कार में उनकी विधानसभा सीट पायी थी। तब से उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उत्तर प्रदेश में कभी समाजवादी आन्दोलन ही मुख्य विपक्ष की तरह उभरा था व सत्ता विरोधी अनेक युवा उसके साथ चलने लगे थे। वे भी विचार के साथ नहीं अपितु संगठन के साथ थे और अपने देशज व्यवहार से वे सदैव निजी नेतृत्व वाला संगठन बनाने में सफल रहे। चौधरी चरण सिंह के साथ से पिछड़े वर्ग को राजनीति की मुख्यधारा में लाने और हिन्दू साम्प्रदायिकता से सतर्क मुस्लिम समाज को मिला कर चुनाव में उनकी जीत का आधार तैयार होता रहा है। मण्डल कमीशन से जागृत व संगठित पिछड़ा वर्ग तथा अयोध्या में रामजन्मभूमि विवाद के सहारे ध्रुवीकरण की कोशिश करने वालों के सामने कोई कमजोरी न दिखा कर उन्होंने मुस्लिम समाज को अपनी ओर आकर्षित कर लिया था। अपने मुख्यमंत्री काल में उन्होंने अपनी जाति के लोगों को किसान मजदूर से ठेकेदार और खानमालिक बना दिया था व सवर्ण समाज की ओर होने वाले धन व शक्ति के प्रवाह को मोड़ दिया था। पंचायत के पदों से लेकर नगरपालिका, जनपद पंचायत, एमएलसी, या पुलिस, होमगार्ड, सशस्त्र बलों में अपनी जाति या पिछड़ा वर्ग के लोगों की भर्ती कर के उन्होंने स्थायी समर्थक बना लिये थे। प्रशासन में प्रमुख पदों पर निजी पसन्द के अधिकारियों की नियुक्ति कर उन्होंने मनमानी का माहौल बना लिया था व लोकतांत्रिक व्यवस्था में जन समर्थन के सहारे केन्द्र में भी अपना स्थान बना लिया था। अमर सिंह के साथ ने उनके राजनीतिक कौशल की कमी की पूर्ति कर दी थी और उनको प्राप्त समर्थन की ताकत को राजनीति के बाज़ार में अच्छे सौदे के साथ ले जाने लगे थे।
अमर सिंह के निर्देशन में वे राजनीति में विचार, मानवीयता, बफादारी से दूर होते गये और निरंतर अवसरवादी फैसले लेते गये। वीपी सिंह का साथ नहीं देना, सोनिया गाँधी को विदेशी मूल के नाम पर अचानक समर्थन देने से पलट जाना और अटल बिहारी का मार्ग प्रसस्त कर देना। राष्ट्रपति के चुनाव में भाजपा काँग्रेस के उम्मीदवार को समर्थन देना व वामपंथियों के उम्मीदवार का प्रतीकात्मक समर्थन भी न देना, 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की परोक्ष मदद से सरकार बना लेना, लखनऊ में अटल बिहारी वाजपेयी के चुनाव में उनके प्रतिनिधि द्वारा साड़ी वितरण के समय मची भगदड़ में कई औरतों के मारे जाने पर पीड़ितों की जगह अटल जी के यहाँ पहुँचना, यूपीए सरकार से वामपंथियों द्वारा न्यूक्लियर डील पर समर्थन वापिस लेने पर पहले उनके साथ आम सभाएं करना और अचानक मतदान के समय पक्ष परिवर्तन कर लेना, उत्तराखण्ड आन्दोलनकारियों पर रात्रि में सोते समय गोलियां चलना व महिलाओं के साथ बलात्कार होना, आदि ऐसी सैकड़ों घटनाएं हैं जो कोई समाजवादी नेता नहीं कर सकता। 2012 के चुनावों में बिना मुख्यमंत्री घोषित किये हुए चुनाव लड़ना और अचानक अखिलेश को मुख्यमंत्री घोषित कर देना। अमर सिंह को वापिस पार्टी में लेकर राज्यसभा में भेज देना। सत्ता को अपने परिवार तक के घेरे में बनाये रखना आदि ऐसे अनेक काम हैं जो उनकी टोपी के रंग से मेल नहीं खाते। वे केन्द्र में सत्तारूढ दल के आगे झुकने को विवश हैं, इसलिए पता नहीं मौका देख कर अपने जाति समर्थन को किस जनविरोधी के चरणों में डाल दें।
अगर मुलायम सिंह अस्वस्थ हैं तो उन्हें स्वास्थलाभ हेतु आराम और अमर सिंह शिवपाल आदि से दूर रहने की जरूरत है। यही देश के हित में भी है। यह समाजवादी पार्टी के लोगों को भी चेतने का समय है।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

        

शुक्रवार, सितंबर 23, 2016

उत्तर प्रदेश का घटनाक्रम और कुछ बुनियादी सवाल

उत्तर प्रदेश का घटनाक्रम और कुछ बुनियादी सवाल
वीरेन्द्र जैन

उत्तर प्रदेश सरकार में गत दिनों जो कुछ चला, वह एक पार्टी या एक प्रदेश सरकार के संकट से अधिक, ऐसे संकटों की जड़ों को समझने की जरूरत बताता है। देश की विभिन्न सरकारों, विभिन्न दलों, और लोकतंत्र के विभिन्न स्तम्भों के बीच लगातार ऐसे ही टकराव चल रहे हैं जो कभी सतह पर आ जाते हैं और कभी अन्दर ही अन्दर व्यवस्था को खोखला करते रहते हैं। हमारा संविधान एक अच्छा संविधान है किंतु हमारे समाज से उसके अनुरूप ढलने की जो अपेक्षा की गयी थी, उसकी गति बहुत धीमी रही। परिणाम यह हुआ है कि बिना बड़े सामाजिक परिवर्तन के यह संविधान समाज के साथ साम्य नहीं बैठा पा रहा है।  
उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार की वास्तविक स्थिति यह है कि वहाँ कहने को तो समाजवादी नाम की पार्टी की सरकार है किंतु वह उतनी ही समाजवादी है जितने कि पूर्व राजपरिवार के सदस्य अपने आप को महाराजा, कुँवरसाहब, राजमाता, नबाब आदि कहते, कहलवाते हैं। पहलवान मुलायम सिंह ने कभी लोहिया जी से गंडा बँधवा लिया था और खुद को समाजवादी कहने लगे थे किंतु अमर प्रेम में पड़ने के बाद उन्होंने लोहियाबाद से ऐसा पीछा छुड़ाया कि केवल समाजवादी शब्द ही इस तरह शेष रह गया जिस तरह कि बन्दर से आदमी बनने के बाद भी पूंछ का अंतिम वेर्टेब्रा बाकी बचा हुआ है। वे कभी समाजवादी मूल्यों के पक्षधर की तरह प्रविष्ट हुये थे और उनका राजनीतिक कद भी वैसा ही था जैसा कि शेष समाजवादियों का रहा, पर मंडल कमीशन आने के बाद वे अपने पहलवान पट्ठों के उस्ताद से यादवों के नेता के रूप में बदल गये जिन्होंने पहले बहुजन समाजवादी पार्टी के सहयोग से और बाद में संघ की हिंसा से आतंकित मुसलमानों के सहयोग से समाजवादी [यादववादी] सरकार बनायी। राममन्दिर का सूत्र हाथ आने के बाद संघ परिवार ने जिस तरह से देश में साम्प्रदयिक विभाजन का सपना देखा था उसमें बहुसंख्यकों का सम्भावित वर्चस्व तोड़ने के लिए सवर्ण सशक्त चतुर हिन्दुओं को मेहनतकश जातियों से दूर करने की आवश्यकता थी और इसी आवश्यकता ने मंडल आन्दोलन को जन्म दिया था। इस आन्दोलन का पिछड़ी जातियों के उत्थान से न कोई वास्ता था और न ही इसका कोई सामाजिक असर हुआ। इसी मंडल आन्दोलन ने श्रीमती इन्दिरा गाँधी के बाद उपजे शून्य को भरने के लिए कूद पड़े संघ परिवार को देश पर झपट्टा नहीं मारने दिया। इस बीच पहलवान मुलायम सिंह को अमर सिंह जैसा व्यक्ति मिल गया जिसके पास वह सब कुछ था जो मुलायम सिंह के पास नहीं था, और जिसे वह सब कुछ चाहिए था जो मुलायम के पास था। वाक्पटुता, प्रत्युन्न्मति, बयानबाजी, सौदेबाजी तथा पार्टी चलाने और धन की ताकत वाले विरोधियों से मुकबला करने के लिए कोष की व्यवस्था करने वाला भी चाहिए था। अमरसिंह ने मुलायम सिंह की समस्त कमियों की पूर्ति की जिसके बदले में जनसमर्थन विहीन अमरसिंह ने पद प्रतिष्ठा का उपहार पाया। सफल राजनीति के लिए दोनों ही कोणों को साधने की जरूरत होती है। मुलायम सिंह ने सोचे समझे ढंग से सरकार से मिलने वाले सारे लाभ अपनी जाति के लिए लुटा दिये जिससे पहली बार उनके जाति समाज को सत्ता की मिठाई का स्वाद चखने को मिला और ये समझ में आया कि हम जिन सवर्णों के लिए लठैती करते रहे वह लाभ तो खुद भी उठा सकते हैं बशर्ते कि सरकार हमारी ही बनी रहे। अब पूरे उत्तर प्रदेश में उनकी जाति के सूबेदार अपने हित में यादववादी सरकार बनाने के लिए कृतसंकल्प रहते हैं बशर्ते जीत के लिए किसी अन्य समुदाय का साथ मिल जाये। विचार से जुड़ी नहीं होने के कारण उनकी कथित पार्टी का विस्तार इलाके से बाहर नहीं हुआ। सीधे चुनाव में उन्हें अपनी जाति और परिवार के बाहर सफलता नहीं मिली।  
सत्ता पाने और बनाये रखने के लिए जो अनियमितताएं करनी होती हैं उसके अपने वैधानिक खतरे होते हैं, जिनसे बचने के लिए सत्ता सुख में डूबे दल निरंतर असुरक्षा की भावना में जीते हैं। यह भावना उन्हें किसी भी तरह से सुरक्षातंत्र को लगातार मजबूत करने के लिए प्रेरित करती है। धन का संचय भी ऐसा ही एक उपाय है। अनियमितताओं के समानांतर कानून भी अपना काम करता रहता है। लोकतंत्र में सत्ता भी दीर्घकालीन नहीं होती इसलिए तंत्र से बचाव भी करते रहना पड़ता है। 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद अचानक अखिलेश को मुख्य मंत्री बनाना इसी सावधानी का हिस्सा था।
अमर सिंह की सलाह की सीमा में बंध जाने के बाद मुलायम सिंह ने सिर्फ और सिर्फ सत्ता की राजनीति की। अपनी सत्ता और उसके तंत्र को बचाये रखने व बढाने के लिए उन्होंने अपने प्रत्येक सहयोगी को धोखा देकर राजनीतिक लाभ उठाया। वीपी सिंह की सरकार उन्हीं के कारण गिरी थी, राष्ट्रपति के चुनाव व परमाणु समझौते के सवाल पर उन्होंने सीपीएम को धोखा दिया, प्रधानमंत्री पद के लिए सोनिया गाँधी को धोखा दिया, गठबन्धन के सवाल पर ममता बनर्जी को धोखा दिया बिहार चुनाव में लालू प्रसाद को धोखा दिया बगैरह। अमर सिंह को झूठमूठ का निकालने और वापिस ले लेने के मामले में अपने ही आज़म खान व रामगोपाल यादव को धोखा दिया तथा 2012 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री प्रत्याशी का नाम छुपा कर अपने मतदाताओं को धोखा दिया। सच तो यह है कि समाजवादी पार्टी में न कोई समाजवादी है और न ही कोई किसी सिद्धांत के साथ है न पार्टी जनता के साथ है। यह सत्ता पाने वाला एक गिरोह है जिसमें यादव सिंह जैसे हजारों करोड़ के इंजीनियर और मथुरा कांड जैसे भूमि अतिक्रमण वाले माफिया सुरक्षा पाते रहते हैं। वोटों के लिए बनावटी धर्म निरपेक्षता और भीतरी जोड़ तोड़ चलती रहती है। जब हित टकराने लगते हैं तो हलचल सामने आ जाती है।
मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, समेत समस्त छोटे राज्यों में इसी तरह की उठापटक चलती रहती है जिनके स्वरूप भिन्न हो सकते हैं किंतु बुनियाद एक जैसी है। इन्हें देख कर लगता है कि हम ऐसे सामंती युग में जी रहे हैं जिसका पूंजीवाद के साथ कोई टकराव नहीं है। इसे बदलने के लिए एक नये तरह के बड़े सामाजिक आन्दोलन की जरूरत है। ऐसे परिवर्तन की प्रतीक्षा में हम कभी जेपी के आन्दोलन, कभी वीपी सिंह, अन्ना, आम आदमी पार्टी, के पास भटकते हैं, पर अंततः निराश होते रहे हैं। नोटा के वोटों की वृद्धि कुछ संकेत दे रही है जिसे समझने की जरूरत है।
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, नवंबर 27, 2015

अमर मुलायम फिर से गलबहियां करते हुये

अमर मुलायम फिर से गलबहियां करते हुये
                                                                            वीरेन्द्र जैन

      कभी अपने आप को मुलायम सिंह का हनुमान और कभी टेलर बताने वाले अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी से निकाले जाने के बाद धमकी दी थी कि अगर उन्होंने मुँह खोल दिया तो सपा नेता जेल में होंगे। बहरहाल उनका मुँह नहीं खुल सका था व राजनीति में उन्होंने काँग्रेस अध्यक्ष के दरवाजे पर ढोक देने और जयप्रदा से दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा का प्रचार करके देख लिया था पर अंत में मुलायम सिंह की शरण में आना पड़ा।
      जहाँ तक मुलायम सिंह से उनकी पुरानी मित्रता का सवाल है तो उसे वे तिलांजलि दे चुके थे। वे एक दूसरे के पूरक रहे हैं। ठाकुर अमर सिंह के राजनीतिक उत्थान और उसके सहारे हुये उनके आर्थिक उत्थान में यादव जाति के समर्थन से नेता बने मुलायम सिंह यादव का समुचित योग दान रहा था। दूसरी ओर राजनीति में अर्थजगत के महत्व को उन्होंने ही पहलवान मुलायम सिंह को समझाया था। इस दौरान वे दो जिस्म एक जान थे। उनके ब्रेकअप प्रमाण तो उनके निम्नांकित बयानों से ही मिलता रहा था जिनका ना तो उन्होंने कभी खण्डन किया और ना ही ये कहा था कि ये प्रैस ने तोड़ मरोड़ कर छाप दिये हैं-  
 -मुम्बई। अमर सिंह ने कहा कि सपा का अर्थ मुलायम सिंह और उनका परिवार है और कुछ नहीं।[अगस्त 2010]
      -इलाहाबाद। समाजवादी पार्टी के पूर्व महा सचिव अमर सिंह ने रविवार को सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव पर अब तक का सबसे करारा हमला बोला है। अमर ने कहा है कि उनके जीने से ज्यादा जरूरी है मुलायम सिंह यादव का मरना। मुलायम सिंह ने मुसलमानों को हमेशा धोखा दिया है। [10 अगस्त 2010]
      -रायबरेली। सोनिया के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में दंगल प्रतियोगिता के उद्घाटन में शामिल होने आये समाजवादी पार्टी के निष्कासित नेता अमर सिंह ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गान्धी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जम कर तारीफ की साथ ही सोनिया गान्धी को अच्छे व्यक्तित्व वाली दुनिया की सबसे बेहतर नेता भी बताया। [1 सितम्बर 2010]
लखनउ। अमर सिंह ने यहाँ आयोजित देश के मौजूदा हालात और मुसलमान विषय पर आयोजित कार्यक्रम में कहा कि चौदह साल तक जिनकी जबान को कुरान की आयत और गीता का श्लोक समझा उन्हीं ने हमें रुसवा किया। मुलायम सिंह ने ही कल्याण सिंह को सपा में शामिल किया। व्यक्तिगत रूप से में कल्याण सिंह को मुलायम सिंह से बेहतर व्यक्ति मानता हूं क्योंकि वे साफ बात करते हैं और अपने कार्यों को स्वीकार करते हैं। कभी हमारे बगलगीर रहे मुलायम वर्ष 2003 में जनादेश की वजह से नहीं बल्कि मेरी कलाकारी से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रह सके थे। राज बब्बर को समाजवादी पार्टी में लाने और विश्व हिन्दू परिषद के वरिष्ठ विष्णु हरि डाल्मियाँ के बेटे संजय डाल्मियाँ को पार्टी का कोषाध्यक्ष और सांसद बनाने वाले मुलायम सिंह ही हैं। [19 अक्टूबर 2010]
      नई दिल्ली। मुलायम सिंह मेरे घर पर कब्जा किये हुये हैं और खाली नहीं कर रहे हैं। महारानी बाग का यह घर मैंने ही मुलायम सिंह को दिया था जिसका किरायानामा राम गोपाल के नाम से बना हुआ है जो मुलायम सिंह के निकट के रिश्तेदार हैं [नवम्बर 2010]
      कभी सोनिया गान्धी को प्रधानमंत्री न बनने देने के लिए विदेशी मूल का मुद्दा उछालने वाले अमर सिंह उस समय प्रति दिन मुलायम सिंह को कोसते रहते हैं। ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब वे मुलायम सिंह और उनके रिश्तेदारों, भाई भतीजों के खिलाफ असंसदीय भाषा में कुछ न कुछ नहीं कहते रहे हों। अपने एक बयान में उन्होंने कहा था आजम खान यह समझ लें कि अगर मैंने मुँह खोल दिया तो मुलायम सिंह यादव मुश्किल में पड़ जायेंगे, उनको जेल जाना पड़ सकता है, जो आजम खान मुझे दलाल कह रहे हैं, पहले वे जरा यह बताएं कि मैंने उन्हें क्या क्या दिया है। मुझे सप्लायर कहने वाले समाजवादी पार्टी के अन्य नेता भी आगे आकर बताएं कि मैंने उन्हें या मुलायम सिंह को क्या सप्लाई किया है,
इतना सब कुछ कह लेने के बाद उन्होंने और क्या छुपा लिया, और क्या छुपाना चाहते थे? यह राजनीतिज्ञों की भाषा नहीं अपितु ब्लेकमेलरों की भाषा थी। पता नहीं कि वे सार्वजनिक रूप से अपने पूर्व मित्र जिन मुलायम सिंह यादव के मरने तक की कामना करते थे उन्हें जेल जाने से वे क्यों बचाना चाहते रहे? कहीं ऐसा तो नहीं कि ऐसी कोई बात कहने पर वे खुद किसी अधिक बड़े मामले में सम्मलित हों और उसी से बचने के लिए वे गोलमाल भाषा में धमकी देते रहे हों।
       जनाधार विहीन नेता हमारे लोकतंत्र के लिए एक बड़े तमाशे की तरह हैं जो जनता को निरी मूर्ख और स्मृतिहीन मानते हैं। ऐसे लोग ही लोकतंत्र को जोड़तोड़ और जनसमर्थन को कारपोरेट घरानों के यहाँ गिरवी रखवाने का काम करते रहते हैं। लायजिनिंग का जो काम नीरा राडिया राजनीति में आये बिना करती रहीं वही काम कुछ लोग राज्यसभा की सदस्यता हथिया कर उससे मिली विशिष्ट स्तिथि का दुरुपयोग करते हुये करते रहे हैं।
            अमर और आज़म दोनों एक साथ नहीं रह सकते। आज़म जनाधार वाले नेता हैं और अमर जोड़तोड़ वाले नेता है। दोनों में से किसी का भी विरोध मुलायम को मँहगा पड़ने वाला है।
वीरेन्द्र जैन      
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मंगलवार, जुलाई 16, 2013

दागी के परिवरियों का पार्टीप्रवेश, मुलायम सिंह की भाजपायी हरकत

दागी के परिवारियों का पार्टीप्रवेश,  मुलायम सिंह की भाजपाई हरकत 
वीरेन्द्र जैन

पुरानी कथा कहानियों में ऐसा जिक्र आता है जिसमें निरवंशिया राजा के निधन पश्चात नगरवासी ऐसा भी तय कर लेते हैं कि किसी तय तिथि पर नगर की सीमा में सबसे पहले प्रवेश करने वाले व्यक्ति को ही राजा बना दिया जाये। सामंती अवशेषों के प्रभाव वाले लोकतंत्र में भी कुछ विचित्र संयोगों से उभरे व्यक्तियों को सरकारें चलाने के अवसर मिल जाते हैं। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह ऐसे ही नेता हैं, जो वैसे तो अच्छे प्रशासक नहीं हैं पर आगामी अवसरों की कल्पना कर एच. डी. देवगौड़ा की तरह देश के प्रधानमंत्री बनने तक के सपने देखने लगे हैं। उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत भले ही समाजवादी आन्दोलन में राम मनोहर लोहिया के सिपाही की तरह हुयी हो किंतु उनकी वर्तमान राजनीति से उस अतीत का कोई सम्बन्ध नहीं है। वे अगर सैद्धांतिक समाजवादी रहे होते तो अब तक उसी दशा में पहुँच गये होते जिसमें शेष सारे समाजवादी पहुँच गये हैं, पर आज उनकी पार्टी की उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में पूर्ण बहुमत वाली सरकार चल रही है। उनका उभार हिन्दू साप्रदायिकता की प्रतिक्रिया में उभरी मुस्लिम एकजुटता के साथ मण्डल दौर में बने मुस्लिम यादव गठजोड़ का परिणाम था जिसे अमर सिंह जैसे चतुर व्यापारी की सौदेबाज़ी का कूटनीतिक लाभ मिला। यह परिस्थितिजन्य संयोग ही है कि वे प्रदेश की राजनीति में प्रथम दो दलों में से एक हैं।
मुलायम सिंह समाजवादी विचारधारा के इतिहास, भाजपायी अवसरवाद, कांग्रेसी गवर्नेंस, मण्डलवाद जनित पिछड़ों की जातिवादी एकजुटता, कार्पोरेट जगत से गठजोड़ की अमर सिंही शैली, अल्पसंख्य्कों को बरगलाने वाले बयानों, अमिताभ परिवार की लोकप्रियता को भुनाने, आदि से निर्मित व्यक्तितत्व हैं, जो अपने खानदान और निकट रिश्तेदारों के संगठन से अपनी व्यक्तिवादी पार्टी चला रहे हैं जिसमें उनके बेटे, बहू, भाई, भतीजे, रिश्तेदारों, जाति भाइयों से बचे स्थानों पर समर्थकों, और अन्य लाभार्थियों को जगह दी जाती है। कभी किसी कालेज में चल रहे कवि सम्मेलन के दौरान किसी कवि द्वारा सरकार विरोधी कविता सुनाये जाने से विचलित स्थानीय थानेदार द्वारा मना किये जाने पर उस थानेदार को उठाकर पटक देने वाले युवा, छात्र पहलवान मुलायम सिंह ही थे जो उस समय समाजवादी युवजन सभा के जुझारू सदस्य थे। संविद सरकारों के दौर में उन्हें उभरने का अवसर मिला और वे नेता बन गये। कहते हैं कि सत्ता भ्रष्ट करती है और सम्पूर्ण सत्ता सम्पूर्ण भ्रष्ट करती है, जो उन पर क्रमशः लागू होती गयी। जब उन्हें समर्थन मिला, सत्ता मिली तो उस जन समर्थन को भुनाने और सत्ता के लाभों का विदोहन करने की सलाह देने वाले लोग भी मिलते गये और वे समाजवादी नाम से जुड़े रह कर भी चरित्र में भाजपायी होते गये जिसकी पुष्टि उनके निकटतम सहयोगी रहे बेनी प्रसाद वर्मा पिछले दिनों बहुत तल्खी से करते रहे हैं। आजकल वे अडवाणी जी को सत्यभाषी हरिश्चन्द्र बताने लगे हैं और 18 वर्ष पूर्व अयोध्या में कानून व्यवस्था बनाये रखने की कार्यवाही के लिए माफी माँगने लगे हैं।  
उत्तरप्रदेश का दुर्भाग्य यह रहा कि जैसे ही लोकतांत्रिक व्यवस्था विकसित होती गयी वैसे ही मतदाताओं को भावनात्मक रूप से बरगलाने का सिलसिला बढता गया। कभी मन्दिर बनवाने के नाम, कभी दलितों के उत्थान के नाम, कभी पिछड़ों के नाम, तो कभी किसानों के नाम पर वोट निकलवाये जाते रहे किंतु उन वोटों से शोषित पीड़ित वर्गों का भला कभी नहीं हुआ। एक बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक वोट तो उनकी सुरक्षा के नाम पर ही हथियाया जाता रहा। देश का सबसे बड़ा ऎतिहासिक प्रदेश सबसे अधिक निरक्षरों, कुपोषित बच्चों, अन्धविश्वासियों, , सर्वाधिक बेरोजगारों, अपराधियों, यौन अत्याचारों, दलित उत्पीड़न, और भ्रष्टाचार से ग्रस्त प्रदेश है। विकास योजनाओं, व सशक्तिकरण के नाम पर जो बन्दरबाँट होती है उसी को जीमने के लिए सारी राजनीतिक कुश्तियां चलती हैं। सारी लड़ाई गलत काम के विरोध की नहीं अपितु लूट में हिस्सेदारी के लिए होती है। सभी तरह के आर्थिक अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण चाहिए होता है जिसके लिए सत्तारूढ दल उनकी प्राथमिकता में होता है, यही कारण है कि सारे आर्थिक अपराधी सत्ता बदलने के बाद सत्तारूढ दल की जयजयकार करते और नये मंत्रिमण्डल के अभिनन्दन में बड़े बड़े विज्ञापन और होर्डिंग लगवाते हुए देखे जाते हैं।         
उत्तर प्रदेश की पिछली बसपा सरकार में परिवार कल्याण मंत्री बाबूलाल कुशवाहा पर राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ अभियान [एन आर एच एम] में करोड़ों के घपले का आरोप है और वे अभी जेल में हैं। यह घोटाला उजागर होने के बाद अनेक सम्बन्धित अधिकारियों की कारावास में सन्दिग्ध मौतें हो चुकी हैं। भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले बाबूलाल कुशवाहा को अपनी पार्टी में सदस्यता दे दी थी जिसकी व्यापक निन्दा हुयी थी। इस निन्दा से प्रभावित होने वाले चुनाव परिणामों की आशंका को देखते हुए भाजपा ने अपनी पार्टी के अन्दर से भी श्री कुशवाहा का विरोध करवा दिया था और उनसे फिलहाल अपनी सदस्यता स्थगित करने का बयान दिलवा दिया था। समाजवादी पार्टी ने चुनावों के दौरान भाजपा द्वारा एक ओर तो भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ने और दूसरी ओर दागियों को पार्टी में सम्मलित करने के दुष्कृत्य की कड़ी आलोचना की थी। बिडम्बना यह है कि अब मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी ने जेल में बन्द इन्हीं बाबू लाल कुशवाहा की पत्नी और भाई को गाजे बाजे के साथ समाजवादी पार्टी में सम्मलित कर लिया है जो परोक्ष में घोटाले के अभियुक्त को ही सदस्य बनाने के समान है। स्मरणीय है कि यह भाजपा के अनुशरण की तरह है जिसके विरोध के नाम पर मुलायम सिंह अल्पसंख्यकों के वोटों के समीकरण बना कर चुनाव जीतते हैं। रोचक यह है कि अब डील विशेषज्ञ भाजपा भी मुलायम सिंह की वैसी ही कठोर निन्दा कर रही है और पूछ रही है कि यह डील कितने में हुयी। तय है कि कभी समाजवादी पार्टी की सबसे बड़ी विरोधी बहुजन समाज पार्टी सरकार में मंत्री रहे अभियुक्त का पहले भाजपा में शामिल होने का प्रयास और फिर राज्य में सत्तारूढ समाजवादी पार्टी में सम्मलित होने के लक्ष्य बहुत साफ हैं जो इस इतने बड़े आर्थिक भ्रष्टाचार और इससे सम्बन्धित हत्या जैसे अपराध की जाँच को प्रभावित करने से कम कुछ भी नहीं हो सकता।
यह घटना उसी समय घटी है जब सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग संसद व विधानसभाओं में अपराधियों की बढती संख्या पर अपनी चिंताएं व्यक्त कर रहे हैं। सत्तारूढ समाजवादी पार्टी का झंडा लगा कर सरे आम गुंडागर्दी और लूटपाट करने के मामले में तथा अधिकांश थानों में पदस्थ जाति विशेष के पुलिस इंस्पेक्टर न केवल जातिवादी आग्रह रखने अपितु स्थानीय समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता की अनुमति से संचालित होने के आरोपों से घिरे हैं जिससे प्रदेश में भयानक असंतोष है जिसके दर्शन हाल ही में इलाहाबाद में हुये हैं। ऐसी दशा में एक बड़े अपराध के अभियुक्त की पत्नी व भाइयों को पार्टी में सम्मलित करके पहलवान मुलायम सिंह ने भाजपानुमा बेशर्मी जैसी बड़ी भूल की है जिसका राजनीतिक नुकसान उन्हें उठाना पड़ेगा।
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, मार्च 13, 2012

उत्तर प्रदेश- मुख्यमंत्री चयन में अमर सिंह की भूमिका


उत्तर प्रदेश – मुख्यमंत्री चयन में अमर सिंह की भूमिका  
वीरेन्द्र जैन    
      उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम आ चुके हैं तथा सपा बसपा, भाजपा, कांग्रेस को प्राप्त सीटें, मत, आदि के बारे में विस्तार से चर्चाएं हो चुकी हैं व हो रही हैं। प्रदेश में अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाये जाने के नेपथ्य में किसी समय के सब से महत्वपूर्ण व्यक्ति और उसकी नई पार्टी के बारे में चर्चा जरूरी है। मेरा आशय, श्री अमर सिंह और उनकी पार्टी लोकमंच से है जिसे लोकसभा और राज्य सभा में प्रतिनिधित्व करने वाले दो सांसदों के भरपूर प्रचार के बाद भी कहीं कोई सफलता नहीं मिली। कहने की जरूरत नहीं कि कभी समाजवादी पार्टी के सहारे देश की राजनीति में सक्रिय दखल रखने वाले अमर सिंह को लोकतंत्र में अपनी हैसियत का अहसास हो गया होगा। पूर्वांचल का नारा उछालने और समुचित मात्रा में धन व्यय करने के बाद भी फिलहाल उनका कोई राजनीतिक भविष्य नहीं दिखता। अपने धन के बल पर वे किसी पिछड़े राज्य से एक राज्यसभा की सीट खरीद सकते थे या अपने पुराने मित्र अरुण जैटली के सहारे भाजपा में सम्मलित होकर राज्य सभा में पहुँचने का प्रयास कर सकते थे, किंतु उत्तर प्रदेश में बाबूलाल कुशवाहा को सम्मलित करने के बाद भाजपा  के अन्दर जितना तीव्र विरोध उभरा था उसे देखते हुए अब अरुण जैटली भी यह साहस नहीं जुटा पायेंगे। स्मरणीय है कि समाजवादी पार्टी को छोड़ने के बाद जब वे इंगलेंड गये थे तब वहाँ पर उनके कभी के ‘बड़े भाई’ अमिताभ बच्चन भी प्रवास पर थे किंतु उन्होंने बहाँ प्रवास पर गये हुए अरुण जैटली से लम्बी बात करना ज्यादा जरूरी समझा था। उन्होंने ही कभी जैटली के सहारे भाजपा से परोक्ष मदद लेकर मुलायम की सरकार बनवायी थी और तभी से मुलायम सिंह भाजपा के प्रति मुलायम हो गये थे। भाजपा के अन्य लोग उन्हें इसलिए भी पसन्द नहीं करेंगे क्योंकि न्यूक्लियर डील के मसले पर आये अविश्वास प्रस्ताव पर भाजपा के सांसदों को खरीदने का काम करने का आरोप अमर सिंह पर ही लगा था जिसके लिए उन्हें जेल तक की हवा खानी पड़ी। यह मामला अभी तक लम्बित है और सुप्रीम कोर्ट के रुख को देखते हुए इसमें दोषी पाये गये लोगों को दण्ड मिलना तय है। स्मरणीय है कि संसद में नोटों की गिड्डियां उछाले जाने के दृष्य को देश के चालीस लाख लोग देख रहे थे, यदि फिर भी किसी को सजा नहीं मिली तो देश की जनता का न्याय पर से रहा सहा विश्वास भी उठ जायेगा और सदन एक तमाशा बन कर रह जायेगा। इसलिए दोनों पक्षों में से किसी एक पक्ष को सजा मिलना तय होने के कारण यह गठजोड़ सम्भव नहीं हो सकता।
      सम्भावना यह भी हो सकती है कि वे सारे गिले शिकवे भुला कर मुलायम सिंह से आजम खान की तरह गले मिल जायें क्योंकि मुलायम सिंह अंतिम समय तक उन्हें पार्टी से निकालने से डरते रहे थे, पर मुलायम सिंह का परिवार उन्हें फूटी आँख भी नहीं देखना चाहता जिनमें अखिलेश भी शामिल हैं। पार्टी से अलग होने के बाद वे कहते भी रहे हैं कि समाजवादी पार्टी एक परिवार की पार्टी होकर रह गयी है। पिछले दिनों वे मुलायम सिंह के खिलाफ इतना विषवमन कर चुके हैं कि उन्हें वापिस लेने से समाजवादी पार्टी की लोकप्रियता का ग्राफ भाजपा की तरह एकदम नीचे चला जायेगा। उन्होंने विभिन्न स्थानों पर कहा है-
उनके जीने से ज्यादा जरूरी है मुलायम सिंह यादव का मरना। मुलायम सिंह ने मुसलमानों को हमेशा धोखा दिया है।  [दैनिक भास्कर 10 अगस्त 2010]
            “चौदह साल तक जिनकी जबान को कुरान की आयत और गीता का श्लोक समझा उन्हीं ने हमें रुसवा किया। मुलायम सिंह ने ही कल्याण सिंह को सपा में शामिल किया। व्यक्तिगत रूप से में कल्याण सिंह को मुलायम सिंह से बेहतर व्यक्ति मानता हूं क्योंकि वे साफ बात करते हैं और अपने कार्यों को स्वीकार करते हैं। कभी हमारे बगलगीर रहे मुलायम वर्ष 2003 में जनादेश की वजह से नहीं बल्कि मेरी कलाकारी से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रह सके थे। राज बब्बर को समाजवादी पार्टी में लाने और विश्व हिन्दू परिषद के वरिष्ठ विष्णु हरि डाल्मियाँ के बेटे संजय डाल्मियाँ को पार्टी का कोषाध्यक्ष और सांसद बनाने वाले मुलायम सिंह ही हैं।जनसत्ता 19 अक्टूबर 2010]
      मुलायम सिंह मेरे घर पर कब्जा किये हुये हैं और खाली नहीं कर रहे हैं। महारानी बाग का यह घर मैंने ही मुलायम सिंह को दिया था जिसका किरायानामा राम गोपाल के नाम से बना हुआ है जो मुलायम सिंह के निकट के रिश्तेदार हैं [डीबी स्टार नवम्बर 2010]
      आजम खान यह समझ लें कि अगर मैंने मुँह खोल दिया तो मुलायम सिंह यादव मुश्किल में पड़ जायेंगे, उनको जेल जाना पड़ सकता है, जो आजम खान मुझे दलाल कह रहे हैं, पहले वे जरा यह बताएं कि मैंने उन्हें क्या क्या दिया है। मुझे सप्लायर कहने वाले समाजवादी पार्टी के अन्य नेता भी आगे आकर बताएं कि मैंने उन्हें या मुलायम सिंह को क्या सप्लाई किया है,
अखिलेश को मैंने ही आस्ट्रेलिया भिजवाया था तथा मेरी ही राजनीति के सहारे यह चुनाव जीत सके हैं
अमर सिंह दाँवपेंच की जिस राजनीति के सहारे मुलायम के जनसमर्थन का सौदा उद्योगपतियों और व्यापार की राजनीति करने वालों से करते रहे हैं उसमें बहुत कुछ काला सफेद करना पड़ता है जिसे उन्होंने मुलायम सिंह की ओट में किया होगा। यही कारण है कि वे बार बार यह कहते रहते हैं कि अगर मैंने मुँह खोल दिया तो वे मुश्किल में पड़ जायेंगे। बहुत सम्भव है कि मुलायम सिंह द्वारा मुख्यमंत्री का पद ग्रहण न करने और सत्त्ता से दूर रहने के साथ साफ सुथरे जीवन वाले युवा अखिलेश को मुख्य मंत्री बना कर दूरदर्शिता से काम लिया हो। देखना होगा कि उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण प्रदेश में अनुभव हीन युवा मुख्यमंत्री कैसी कैसी चुनौतियों का सामना करता है!
वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, मार्च 07, 2012


2012 के विधानसभा चुनाव परिणामों में अन्ना हजारे फेक्टर
वीरेन्द्र जैन                                     
                पिछले दिनों जब अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन किया था तब पूरे मीडिया ने उन्हें राष्ट्रीय नायक बना दिया था और ऐसा लगता था कि पूरा देश भ्रष्टाचार के खिलाफ एक साथ उठ खड़ा हुआ है। उस दौर में यह भ्रम भी होने लगा था कि गरीबी, बेरोजगारी, मँहगाई, असमानता, सामाजिक भेदभाव, विस्थापन, पानी, सड़क, बिजली आदि न होकर देश के पास इकलौता मुद्दा भ्रष्टाचार का ही है और आगामी अनेक चुनाव इसी मुद्दे के इर्दगिर्द लड़े जायेंगे। भ्रम होने लगा था कि इन चुनावों में जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्र, भाषा, लिंगभेद, के आधार पर होने वाले मतदान से मुक्ति मिलेगी और देश को समय पर  राज्य व केन्द्र के लिए भ्रष्टाचार से मुक्त स्वस्थ सरकारें मिलेंगीं। खेद की बात है कि 2012 के विधानसभा चुनाव परिणाम इस दिशा में एक कदम भी बढते नजर नहीं आये हैं। अन्ना हजारे का आंदोलन टायँ टाय़ँ फिस्स हो चुका है, और जाने माने भ्रष्टाचारी नेता व दल उन्हीं पुराने हथकण्डों से उसी  पुराने अन्दाज में वोट बटोरने का काम कर चुके हैं और वैसे ही परिणाम भी आ चुके हैं।
      पंजाब में प्रकाश सिंह बादल से लेकर उनके पुत्र सुखवीर सिंह बादल भी चुनाव जीते हैं जिन पर लम्बे समय से आरोप लगते रहे हैं। उनके ही भतीजे ने जो उनके मंत्रिमण्डल में महत्वपूर्ण मंत्री रहे थे अनेक आरोप लगाते हुए मंत्रिमण्डल से त्याग पत्र दिया था और अपनी अलग पार्टी बनायी थी। उनकी पार्टी द्वारा चुनाव लड़ने के कारण ही अकाली दल विरोधी वोट बँट गये और हर बार सत्ता बदलने की परम्परा का निर्वाह नहीं हुआ जिससे कई सीटों पर पहले से भी कम वोट पाकर भी अकाली उम्मीदवारों की जीत हो गयी है। उल्लेखनीय है कि जब स्विस बैंकों में जमा धन के बारे में आरोप प्रत्यारोप चरम पर थे उन्हीं दिनों सुखबीर सिंह बादल गोपनीय गैर सरकारी यात्रा पर विदेश गये थे, जिनके बारे में तरह तरह के कयास लगाये गये थे, पर उनके गठबन्धन की पार्टी भाजपा ने कोई सवाल नहीं उठाया था। उत्तर प्रदेश में भी ज्यादा सीटें जीतने वाले दोनों बड़े दल भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे रहे हैं। एनआरएचएम के साढे आठ हजार करोड़ के घोटाले और उसे दबाने के लिए उसमें हुयी नौ हत्याओं सहित मायावती को अठारह मंत्रियों को चुनाव से पहले निकालना पड़ा था तथा सौ से अधिक विधायकों का टिकिट भी काटना पड़ा था, पर फिर भी उनकी पार्टी अच्छी खासी संख्या में वोट ले गयी। उत्तर प्रदेश के सहोदर उत्तराखण्ड में भी उसने सरकार बनवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली सीटें जीती हैं और वोट प्रतिशत भी बढाया है। उत्तराखण्ड में भाजपा ने अपने मुख्यमंत्री को भ्रष्टाचार के आरोप में हटाया था और दूसरा ईमानदार मुखौटा मुख्यमंत्री नियुक्त किया था जो हार गया। कहा जा रहा है कि पिछले मुख्यमंत्री ने उसे हरवा दिया।  इतना होने पर भी भाजपा के मतों के प्रतिशत में बह्त ज्यादा कमी नहीं आयी।समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह पर भी सीबीआई की जाँच लम्बित है और उनके पुराने सहयोगी अमर सिंह बार बार तरह तरह के आरोप लगाते रहते हैं।
      उल्लेखनीय है कि पाँच राज्यों के लिए हुए विधानसभा चुनाव परिणामों में भ्रष्टाचार का मुद्दा केन्द्र में नहीं रहा। न तो पार्टियों ने टिकिट देते समय इस को आधार बनाया और न ही जनता ने वोट देते समय ही ऐसे लोगों को ही मत दिया जो आरोपों से मुक्त हों। अपनी ईमानदारी के लिए जाने जाने वाले बामपंथी दल इन चुनावों में सफल नहीं हो सके। इससे यह सन्देश मिलता है कि देश की जनता समाज में वांछित बदलावों को चुनावों से जोड़ कर नहीं देखती है। अन्ना के बहु चर्चित, और भीड़ जुटाऊ आन्दोलन के बाद भी  चुनाव उन्हीं पुराने हथकण्डों से लड़े और जीते जा रहे हैं। लोकप्रियता, जातिवाद, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण, सामंती प्रभाव, साधु साध्वियों के भेषभूषा में रहने वाले राजनेताओं का भावनात्मक प्रभाव, आदि अब भी चुनाव में भूमिका निभा रहे हैं।  
      इन चुनावों में की गयी व्यवस्था के लिए चुनाव आयोग की भरपूर तारीफ की जानी चाहिए जिसकी व्यवस्था ने न केवल उत्तर प्रदेश और मणिपुर जैसे संवेदनशील राज्यों में पूरी तरह शांतिपूर्वक और हिंसा मुक्त चुनाव करवाये अपितु नये मतदाता जोड़कर कुल मतदान के प्रतिशत में जबरदस्त वृद्धि  के लिए अनुकूल अवसर पैदा किया। इन चुनावों में न तो चुनावी धाँधली के आरोप लगे और न ही वोट खरीदे जाने की शिकायतें ही मिलीं। चुनाव के प्रारम्भ में ही जो करोड़ों की नकदी पकड़ी गयी उससे पैसे की दम पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार सतर्क हो गये और चुनावों में बड़े पैमाने पर धन और शराब की नदी बहने की खबरें नहीं आयीं।
       अन्ना हजारे की जिस टीम ने हिसार के उपचुनाव में अपना एक पक्षीय हस्तक्षेप दिखा कर जो भूल की थी उसके परिणाम स्वरूप उनकी अपनी टीम के ही कई सदस्य बिखर गये थे इसलिए उन्होंने घोषणा करने के बाद भी इन चुनावों में हस्तक्षेप नहीं किया, यह उनका प्रायश्चित था या असमंजस इसका मूल्यांकन होना बाकी है किंतु चुनाव परिणामों के बाद उनका बयान आया है कि जनलोकपाल बिल पास न करने के कारण ही कांग्रेस को सफलता नहीं मिली है, वह हास्यास्पद अवश्य है। उल्लेखनीय है कि हिसार चुनाव की तरह ही इन चुनावों में जीतने वाले ना तो बेदाग हैं और न ही वे उनके जनलोकपाल बिल के समर्थक ही हैं।  
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, फ़रवरी 18, 2010

अमर-मुलायम वाक्युद्ध शिखर पर बेपेन्दी के लोटे

अमर मुलायम वाक्युद्ध
राजनीति के शिखर पर बेपेंदी के लोटे
वीरेन्द्र जैन
अपने फिल्मी स्तम्भ में अमर सिंह के बारे में चर्चा करते हुये प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक जय प्रकाश चौकसे ने तर्क दिया था कि -- -इस फिल्मी स्तम्भ में अमर सिंह के बारे में लिखना इसलिये उचित है क्योंकि अमर सिंह राजनीति में फिल्मी आदमी माने जाते हैं और फिल्मों में राजनीति के नुमाइन्दे माने जाते हैं- हम कह सकते हैं कि वे मुलायम के डायलाग राइटर रहे हैं
यह सच है कि अमर सिंह राजनीति में जो भूमिकाएं करते रहे हैं वे उस परिकल्पना से कोसों दूर हैं जो हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने देश में एक लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की स्थापना करते समय राजनेताओं के बारे में की थीं। वे जनता के नेता नहीं हैं अपितु जनता के नेताओं से कुछ खास लोगों के हित में काम कराने वाले और जनहित के लिये सुरक्षित धन से इन दोनों को ही लाभांवित कराने वाले मध्यस्थ रहे हैं। समाजवादी पार्टी से निकाले जाने के बाद उनकी वाकपटुता एक बौखलाहट में बदलती जा रही है और वे दिन प्रति दिन उन मुलायम सिंह के प्रति कटु से कटुतर होते जा रहे हैं जिनके वे हनुमान होने का दावा किया करते थे, और उनके खिलाफ कभी कुछ भी न बोलने की कसम खाते थे। वे समझते थे कि राजनीतिक रणनीतियाँ बनाते समय उनके साथ मिलकर मुलायम सिंह ने जो समझौते किये थे उनके राज खुल जाने के डर से वे उनकी हर मांग के आगे सरेण्डर हो जायेंगे और परिवारियों को अपने प्रभाव से दबा कर चुप करा देंगे। प्रारम्भ में ऐसा हुआ भी जब मुलायम सिंह ने बात खत्म करने के लिये अपने भाई राम गोपाल यादव से फोन पर क्षमा मांगने के लिये कहा और उन्होंने वैसा किया भी। किंतु जब उस पारिवारिक बात को भी अमर सिंह ने प्रचारित करके उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश की तो पूरा कुनबा बिफर गया। गुस्से के साथ राम गोपाल यादव ने कहा कि वे कोई खुदा नहीं हैं जो मैं उनसे माफी माँगूंगा, वे पागल हो गये हैं और उनका दिमाग खराब हो गया है। बीच में अमर सिंह ने यह बयान देकर कि उनके अनेक राज मेरे सीने में दफन हैं और वे दफन ही रहेंगे, एक ब्लेकमेलिंगनुमा बयान द्वारा उन्हें याद दिलाया था कि अगर अपने राज को राज ही रखना चाहते हो तो उनसे समझौता कर लो, किंतु तब तक बात मुलायम सिंह के हाथों से निकल गयी थी और एक व्यक्ति केन्द्रित पार्टी का विकेन्द्रीकरण हो चुका था।
अब जब मुलायम सिंह के कुनबे की पार्टी के दरवाजे अमर सिंह के लिये हमेशा के लिये बन्द हो चुके हैं तब अमर सिंह अपने इकलौते ट्रम्प कार्ड को चुटकी में रगड़ते घूम रहे हैं। यह उनका अंतिम अस्त्र है, जिससे मुलायम् सिंह का कितना नुकसान होगा यह तो कहा नहीं जा सकता किंतु अमर सिंह ज़रूर निःशस्त्र हो जायेंगे। इस द्वन्द को झेलते झेलते हुये वे बौरा गये हैं तथा स्वयं को अपने मालिक मुलायम सिंह का दर्जी बताने वाले अब उनके कपड़े फाड़ने पर उतारू नज़र आते हैं। वे फिर फिर कर कभी अपनी पार्टी की कट्टर दुश्मन रही मायावती के साथ सहानिभूति व्यक्त करते हैं तो कभी बाल ठाकरे को परोक्षरूप से बेहतर बताते हैं। उन्होंने ही कभी विदेशी के बहाने सोनिया गान्धी को प्रधानमंत्री न बनने देने के सौदे किये थे, वे ही सोनिया गान्धी की प्रशंसा करते फिर रहे हैं।
अब वे बुन्देलखण्ड , हरित प्रदेश के पक्षधर होने के साथ कभी पूर्वांचल के लिये जनचेतना रैली की शुरूआत करते हैं, तो कभी अनशन करने की धमकी देते हैं। पूरे देश में घूम घूम कर प्रैस के आगे तरह तरह की बाते करते हुये वे यह भूल जाते हैं कि पिछले महीने अपना स्तीफा भेजते हुये उन्होंने अपने खराब स्वास्थ को कारण बताया था और अपना शेष समय अपने परिवार को देने की इच्छा व्यक्त की थी, किंतु अब वे एक नई पार्टी बनाने की बात कर रहे हैं तथा क्षत्रीय सम्मेलन की बातें कर उस जाति का नेतृत्व हथियाने की असम्भव कोशिश कर रहे हैं जिसमें पहले से ही अनेक नेता भरे हुये हैं। क्या राष्ट्रीय राजनीति इतनी गिर चुकी है कि कोई आदमी सरे आम सुबह् कुछ और शाम कुछ कहने लगे और लोग फिर भी उस पर भरोसा कर लें। ऐसा करके वे अपनी विश्वसनीयता और बीमारी के नाम पर पैदा हो सकने वाली सहानिभूति खुद ही खो रहे हैं। जया प्रदा, जया बच्चन अनिल अम्बानी, अमिताभ बच्चन के सहारे वे वोटरों का विश्वास जीत लेने का भ्रम पाले हुये हैं। कभी राजीव गांधी परिवार के सबसे निकट के मित्र रहे, और कभी यूपी की मुलायम सरकार के ब्रांड एम्बेसडर रहे अमिताभ बच्चन, जो बाल ठाकरे के चरणों में झुकते रहते हैं, न जाने किस भय में मोदी से गले लग रहे हैं। अमर सिंह द्वारा दुबई से स्तीफा भेजने के बाद हवाई अड्डे पर अमर सिंह से मिलने जाने वालों में अमिताभ इकलौते प्रमुख लोगों में से थे, जो अमर सिंह के कम्प्यूटर अभियान के ब्रांड एम्बेसेडर बन गये हैं। क्या उनके भी कुछ राज अमर सिंह के सीने में दफन हैं!
वे अपने किडनी के आपरेशन को मुलायम सिंह के ऊपर अहसान की तरह बता रहे हैं गोया उन्होंने अपनी किडनियाँ समाजवादी पार्टी को दान में दे दी हों। कभी उन्होंने स्वयं को दधीचि बताया जिन्होंने राक्षसों को मारने हेतु बज्र बनाने के लिये अपनी हड्डियाँ दान कर दी थीं। पर उनके इस प्रतीक पर किस को हँसी नहीं आयेगी कि उसी तरह उनका किडनी का आपरेशन है जो खराब होने के कारण विदेशी डाक्टरों ने निकाल दी हैं। जब उनसे राज्यसभा की सीट से भी स्तीफा माँगा गया तो उन्होंने उसके एवज़ में अपनी किडनियाँ लौटाने की शर्त रख दी गोया उन्हें मुलायम सिंह ने किसी तिज़ोरी में गिरवीं रखीं हों। उनके द्वारा पंचायत चुनाव तक नहीं जीत पाने की क्षमता के आरोप में वे कहते हैं कि मुलायम अपने बेटे अखिलेश, और भतीजे धर्मेन्द्र से कन्नौज और बुदायुँ सीट से स्तीफा दिलायें तो वे दो दो हाथ करने को तैयार हैं।
अमर सिंह अब मुलायम सिंह के लिये प्रतिदिन एक नई गाली तलाशते हैं।
· पिछले दिनों उन्होंने मुलायम को हरा साँप बतलाया था जो हरी घास में छुपा रहता है और बिना नज़र आये डस लेता है।
· एक दूसरी सभा में उन्होंने मुलायम को धृतराष्ट्र बताते हुये स्वयं को द्रौपदी बताया जिनकी लाज उनके सामने लुटती रही और वे चुप रहे।
· उन्होंने आजम खान के पुराने बयान के बहाने कहा कि भले ही उन्होंने मुलायम सिंह और कल्याण सिंह में पुरानी दोस्ती होने, और इसी कारण कल्याण के मित्र साक्षी महाराज को राज्यसभा में भेजने की बात ज़ाहिर कर दी हो. किंतु वे कोई राज नहीं बतायेंगे, पर इसलिये मेरी अंतरात्मा मुझे कचोट रही है, में खुद को अपराधी महसूस कर रहा हूं।
· शाहजहाँपुर में उन्होंने कहा कि मुलायम सिंह के कुकर्मों का ज़बाब पार्टी से बाहर आकर ही दिया जा सकता है।
· मुलायम सिंह एक ओर तो अंग्रेज़ी का विरोध करते हैं दूसरी ओर उनका बेटा विदेश में रह कर पढा है।
· उन्होंने समाजवादी पार्टी को यादव पार्टी में बदल दिया है।
· सपा ने मुझे कूड़ेदान की तरह स्तेमाल किया, और मुझे कूड़ा कहा गया।
किसी ने सही कहा है कि यह बेपेंदी के लुड़कते लोटे की गड़्गड़ाहट है जो उसके ज़मीन पर आने पर ही रुकेगी।



वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, जनवरी 28, 2010

मुलायम की चिंता में ज्योति बसु का प्रधान मंत्री न बनने का फैसला

मुलायम की चिंता में ज्योतिबसु का प्रधानमंत्री न बनने का फैसला
वीरेन्द्र जैन
गत दिनों देश के वरिष्ठतम नेताओं में से एक ज्योति बसु का 96 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लम्बे समय तक पोलित ब्यूरो सदस्य रहे और पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। उनके अस्सी वर्ष के बेदाग और समर्पित सक्रिय राजनीतिक जीवन में उनके किसी घनघोर विरोधी तक को उन पर उंगली उठाने का मौका नहीं मिला, जबकि वे दुनिया के इतिहास में सबसे लम्बे समय तक किसी चुनी हुयी सरकार के प्रमुख रहे। उनके निधन पर श्रद्धांजलि अर्पित करनेकेलिये सभी को एक मंच पर आना स्वाभाविक था, और ऐसा हुआ भी।
वे अपनी पार्टी के अनुशासित सिपाही थे और अपनी सारी उपलब्धियों का श्रेय अपनी पार्टी की नीतियों और कार्यक्रमों को देते रहे थे। स्वाभाविक था कि ज्योति बसु को याद करते समय उनकी पार्टी की नीतियाँ और कार्यक्रम भी चर्चा में आयें इसलिये कुछ डिनर पार्टी नुमा पार्टी चलाने वाले नेताओं ने इस अवसर पर कुछ ऐसी बातों का उल्लेख किया जिनका स्पष्टीकरण अनेक बार दिया जा चुका था और एक सच्ची लोकतांत्रिक पार्टी के अन्दर बहुमत से प्रस्ताव पास हो जाने के बाद उक्त विषय पर कभी कोई मतभेद सामने नहीं आया था।
अपने वित्तप्रबन्धक और राजनीतिक ताकत का सौदा करने वाले महासचिव द्वारा पद छोड़ दिये जाने से परेशान पहलवान मुलायम सिंह ने कहा कि यदि ज्योति बसु को प्रधान मंत्री बनने दिया गया होता तो देश का नक्शा कुछ और होता। उनका यह बयान असल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के बारे में उनकी समझ की कमी को दर्शाता है। सीपीएम कोई भाजपा नहीं है कि वोट लेने के लिये सिद्धांत बघारती फिरे और सता पाने के लिये सारे अनैतिक समझौते करने लगे। स्वयं मुलायम सिंह ने अमर सिंह की उंगलियों पर नाचते हुये अमेरिका से परमाणु समझौते पर एकदम से यू टर्न ले लिया था जबकि कुछ ही दिन पहले उन्होंने इसी समझौते के खिलाफ एक विशाल रैली में भाग लिया था। पिछले राष्ट्रपति के चुनाव में उन्होंने अपने राजनीतिक गठबन्धन की उम्मीदवार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, आज़ाद हिन्द फौज़ की केप्टन भारत रत्न डा. लक्ष्मी सहगल को समर्थन देने की जगह नरेन्द्र मोदी की पार्टी के उम्मीदवार मिसायल मेन को कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर समर्थन देना ठीक समझा था। ऐसा लगता है कि उनके पूर्व महासचिव द्वारा सार्वजनिक रूप से यह बताने के कारण कि उनके सीने में मुलायम सिंह के कई राज दफन हैं, मुलायम विचलित से हो गये हैं और असंगत बयानबाज़ी करने लगे हैं।
दरअसल पहलवान फिल्मी नायिकाओं, नायकों और उद्द्योगपतियों की चकाचौंध् से चमत्कृत और सौदेबाज़ी से एकत्रित पार्टी फंड के नशे में यह भूल गये हैं कि एक कैडर वाली पार्टी कैसे काम करती है। मुलायम सिंह स्वयं भी केन्द्रीय मंत्रि मण्डल के सदस्य रहे हैं और उन्हें पता ही होगा कि सरकार का कोई भी फैसला प्रधान मंत्री नहीं अपितु कैबिनेट की बैठक अपने बहुमत के आधार पर लेती है और सीपीएम जैसी वर्गीय सिद्धांत में विश्वास रखने वाली पार्टी अपने शत्रु वर्ग के फैसलों को अपने नाम से क्यों लागू करती क्योंकि उसके तो दो-तीन सद्स्य ही केबिनेट में आते। अम्बानियों को ढोने वाले मुलायम ही नहीं बाकी की सारी गैर बामपंथी पार्टियाँ अपने अपने आकाओं के हितों में फैसले लेने के लिये दबाव बनाते और सरकार का हाल वैसा ही होता जैसा कि तेरह दिन की अटल बिहारी की सरकार का हुआ था। सीपीएम ने गठबन्धन केवल भाजपा जैसी साम्प्रदायिक पार्टी को सत्ता से आने में रोकने के लिये बनाया था न कि सरकार बनाने के लिये। वे अगर चाहते तो पिछली यूपीए की सरकार में भी अपने चार केबिनेट मंत्री बनवा सकते थे पर लगातार समर्थन देते हुये भी उन्होंने स्वयं को सत्ता के चरित्र से दूर रखा जबकि परमाणु करार पर कांग्रेस से सौदा करने के बाद मुलायम सिंह पहली फुरसत में गृह मंत्री पद मांगने अमर सिंह के साथ पहुँच गये थे। सीपीएम ने चन्द्र शेखर के इस आरोप का कि वह ज़िम्मेवारी से भागती है तुरंत ज़बाब देते हुये कहा था कि अगर ज़िम्मेवारी से भागते होते तो बंगाल में लगातार तीस साल शासन नहीं चलाते।
एक प्रदेश में जातीय अस्तित्व रखने वाले मुलायम सिंह की खिसकती ज़मीन ने उन्हें विचलित कर दिया है और शायद रामायण की यह चौपाई उन्हें कुछ रास्ता दिखाये-
धीरज धरम मित्र अरु नारी
आपत काल परखिये चारी

वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, जनवरी 15, 2010

अमर मुलायम प्रसंग.........और ब्लेकमेलिंग किसे कहते हैं?

अमर-मुलायम प्रसंग्
.........और ब्लेकमेलिंग किसे कहते हैं?
[बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी]
वीरेन्द्र जैन
एक बोध कथा याद आ रही है।
जिस गाँव में नसरुद्दीन रहता था उस गाँव में एक गरीब आदमी की शादी तय हुयी। जिस दर्ज़ी को उसने पाज़ामा सिलने को दिया था वह बीमार पड़ गया तो उसे ठीक वक़्त पर पाज़ामा तैयार नहीं मिल सका। उसे मालूम चला कि अभी हाल ही में नसरुद्दीन ने पाज़ामा सिलवाया है तो उसने शादी के लिये उसका पाज़ामा माँग लिया और उसे बारात में चलने के लिये भी कहा। जब बारात उस गाँव में पहुँची तो दुल्हिन की दादी दूल्हे को देखने आयी। देख कर उसने कहा दूल्हा तो अच्छा है जवान है और सुन्दर है। साथ बैठे नसरुद्दीन से नहीं रहा गया तो उसने कहा कि हाँ और पाज़ामा मेरा पहिने हुये है। दादी के जाने बाद दूल्हे के रिश्तेदारों ने कहा कि भइ इस बात को कहने की क्या ज़रूरत थी। नसरुद्दीन ने अपनी गलती मान ली।
थोड़ी देर बाद दुल्हिन की मामी दूल्हे को देखने आयी तो उसने भी वही बात कही कि दूल्हा तो अच्छा है जवान है और सुन्दर है तो नसीरुद्दीन बोले और पाज़ामा भी अपना पहिने हुये है।
मामी के जाने के बाद रिश्तेदारों ने कहा कि आप पाज़ामे का ज़िक्र क्यों करते हैं। नसुरुद्दीन ने फिर अपनी गलती मानी और आगे सावधान रहने का बादा किया। थोड़ी देर बाद दुल्हिन की बुआ दूल्हे को देखने आयी तो वह भी बोली कि दूल्हा तो अच्छा है, जवान भी है और सुन्दर भी है तो नसीरुद्दीन बोल पड़े कि और पाज़ामा किसका पहिने हुये है इस बारे में मैं कुछ नहीं कह रहा हूं।
असल में अपने आप को मुलायम सिंह का दर्ज़ी बताने वाले अमर सिंह के साथ भी यही दिक्कत है कि वे यह बताने से नहीं चूक पाते कि मुलायम सिंह उन्हीं का पज़ामा पहिन कर दूल्हे बने हुये हैं। उधार का पज़ामा पहिन कर दूल्हा बने मुलायम जब तक पज़ामा उतार कर अपने पहलवान स्वरूप में नहीं उतर आते तब तक अमर सिंह जैसे लोग उन्हें अपने पाज़ामे की याद दिलाते ही रहेंगे क्योंकि वे ये भूल जाते हैं कि पाज़ामा भले ही किसी का हो पर सुन्दर और स्वस्थ दूल्हे तो मुलायम सिंह ही हैं और वे उन्हीं की शादी के बराती हैं। यदि दूल्हा ही नहीं होगा तो पाज़ामे तो नाड़े डले पड़े रहेंगे उन्हें कोई पूछने वाला भी नहीं मिलेगा।
किसी सभ्य व्यक्ति के मुँह से कोई शब्द यूं ही नहीं निकलता। कांग्रेस के सत्यव्रत चतुर्वेदी के मुँह से भी चिरकुट शब्द यूं ही नहीं निकल गया होगा।
ब्लेकमेलिंग किसी हमले या रहस्योदघाटन को नहीं कहते हैं अपितु वह इस बात को स्मरण कराते रहने का नाम ही है कि हमें तुम्हारी फलाँ फलाँ बातें पता हैं और यदि तुमने हमारी शर्तें नहीं मानीं तो वे रहस्य सार्वजनिक हो सकते हैं। उन गोपनीय बातों के सार्वजनिक हो जाने का कुछ भी परिणाम निकले किंतु उनके सार्वजनिक हो जाने के बाद ब्लेकमेलिंग का अंत हो जाता है। जो व्यक्ति सार्वजनिक रूप से गोपनीय बातों की बार बार याद दिलाता रहता है वह लाख इंकार के बाद भी ब्लेकमेलिंग ही कर रहा होता है।
भारतीय राजनीति में जब से संविद सरकारें बनना प्रारम्भ हुयी हैं तब से राजनीतिक भ्रष्टाचार तेज़ी से बड़ा है तथा दलबदल और चुनावी प्रबन्धन में व्यापक स्तर पर अवैध धन का स्तेमाल होने लगा है। इस खेल में बामपंथी दलों को छोड़ कर लगभग सभी प्रमुख दल शामिल हैं किंतु इतने व्यापक पैमाने पर दलबदल और लेन देन होते रहने के बाबज़ूद कभी किसी राजनीतिज्ञ ने किसी को इस आधार पर अपने पक्ष में फैसला करने के लिये विवश करने का प्रयत्न नहीं किया कि मुझे उसके फलाँ राज पता हैं।
रक्षा मंत्री जैसे ज़िम्मेवार पदों पर रहे किसी नेता के बारे में दिये गये ऐसे अन्धे बयानों से राष्ट्र के प्रति चिंतित लोगों के मन में उसके प्रति तरह तरह के सन्देह पैदा होते हैं और कोई भी अपनी सुविधानुसार कुछ भी कल्पना करने लगता है। अभी हाल ही में अमेरिका के साथ परमाणु बिजली घरों के बारे में किये गये समझौते पर अचानक पाला बदलने के बाद समाजवादी पार्टी सन्देह के घेरे में आयी थी तथा भाजपा ने सदन में नोटो के बंडल उछालते हुये उनके सदस्यों की खरीद फरोख्त् का आरोप लगाया था जो समाजवादी पार्टी के अमर सिंह पर ही था न कि कांग्रेस पर। इस प्रकरण की जाँच अभी ज़ारी है तथा अमर सिंह के बयान सन्देहों को पैदा कर रहे हैं। पिछले दिनों जब अमर सिंह की टेलीफोन वार्तायें अवैध रूप से रिकार्ड होने का मामला सामने आया था तो अदालत से उन वार्ताओं के सार्वजनिक होने से रोकने के लिये कोर्ट से आदेश लिया गया था जिसके कयासों की कहानियाँ मौखिक रूप से सुनी सुनायी गयी थीं।
अपने को अस्वस्थ घोषित करते हुये उस आधार पर पार्टी की सक्रियता से त्यागपत्र देने के लिये इंगलेंड को चुनना कहाँ तक उचित माना जा सकता है और ये कैसी अस्वस्थता है कि जो राज्यसभा की सदस्यता से त्यागपत्र देने को प्रेरित नहीं करती पर पार्टी की ज़िम्मेवारी के पदों से त्यागपत्र की मिसाइल को दूर से दाग देने और उस पर बहस को लगातार बनाये रखने को प्रेरित करती है। आखिर पार्टी के उन पदों पर रह कर भी ऐसी बहसों के अलावा सार्वजनिक रूप से वे और क्या करते रहे हैं!
यदि श्री अमर सिंह जी का अस्वस्थता के कारण त्यागपत्र देने का आधार सच्चा है तो उनके सबसे निकट रहे मुलायम सिंह और राम गोपाल यादव कितने निर्मम लोग माने जायेंगे जो उनकी अस्वस्थता के बाबजूद उनका त्याग पत्र स्वीकृत नहीं कर रहे हैं और उन्हें शारीरिक नहीं मानसिक रूप से अस्वस्थ बतला रहे हैं। क्या ये विचारणीय नहीं है कि इन दो में से किसी एक का असत्य होना तय है और सब जानते हैं कि लोग किनकी बातों को सच्चा और किनकी बातों को झूठा मान रहे हैं। श्री अमर सिंहजी ने मोहन सिंह को इलाज़ कराने और चुनाव खर्च के लिये गिड़गिड़ाते हुये माँगने पर जो धन देने का रहस्योदघाटन किया है वह भी अपने व्यक्तिगत खाते से उस समय शायद सशर्त ही दिया होगा और शर्त के उल्लंघन पर उसे वापिसी की शर्त रखी होगी। क्या अभी एक दो लोग जो उनके समर्थन में आये हैं क्या वे भी शर्तों के परिपालन में ही आगे आये हैं!
राजनीति में धन के हस्तक्षेप का दुष्परिणाम कुछ ही दिन पहले प्रमोद महाजन के दुखद निधन में देखा जा चुका है जिसमें एक भाई दूसरे की जान का दुश्मन बन चुका है। यह एक दूसरा उदाहरण सामने आ रहा है जब एक भाई एक ओर जा रहा है और दूसरा दूसरी ओर जा रहा है तथा इसके मूल में भी राजनीति में विचार को पीछे रख कर पैसे की राजनीति ही ज़िम्मेवार है। हिन्दी के टीवी सीरियलों की तरह ये मामला लम्बा खिंचने से तो अच्छा है कि सब कुछ सामने आ ही जाये- फोड़ा फूटा पीर हिरानी।
वीरेन्द्र जैन
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