गुरुवार, जनवरी 03, 2019

नीरज जी के जन्मदिन पर याद करते हुए किसी की आँख खुल गयी किसी को नींद आ गयी


नीरज जी के जन्मदिन पर याद करते हुए
किसी की आँख खुल गयी किसी को नींद आ गयी

वीरेन्द्र जैन
इस नये साल में हिन्दी के लाड़ले गीतकार गोपाल दास नीरज जी हमारे बीच नहीं हैं। जो लोग जीवन से जुड़े रहते हैं उनके लिए मृत्यु की चर्चा कुछ अधिक सम्वेदनशील विषय होती है। नीरज जी ने अपने सम्पूर्ण गीत लेखन में मृत्यु का बहुत गहराई से चित्रण किया है। हिन्दी में पहला मृत्युगीत उन्होंने ही लिखा था। श्री मुकुट बिहारी सरोज, जिनका नीरज जी के साथ कवि सम्मेलनों में बहुत लम्बा वक्त गुजरा, एक संस्मरण सुनाते थे। यही कोई 1955- 60 का समय रहा होगा जब यह गीत लिखा गया था। बांदा में कवि सम्मेलन था और तब हर कस्बे में कवि सम्मेलन सुनने नगर के सब विशिष्ट व्यक्ति आया करते थे। वहाँ एक जज थे जो बहुत सख्त मिजाज माने जाते थे। वे न केवल अपने कर्तव्य निर्वहन में ही कठोर थे अपितु कविताओं पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं देते थे। विचार बना कि नीरज जी मृत्यु पर लिखा अपना ताजा गीत सुनाएं ताकि उनकी प्रतिक्रिया को आजमाया जा सके। जब नीरज जी का क्रम आया तो उन्होंने मृत्युगीत सुनाया जिसको सुनते ही वे जज महोदय सीधे उठ कर अपनी कार उठा चले गये। आशंकाग्रस्त कुछ लोगों ने उनका पीछा किया तो पाया कि वे एक पुलिया पर बैठ कर फूट फूट कर रो रहे हैं।
इस गीत की कुछ पंक्तियां देखिए-  
दृग सूरज की गर्मी से रक्तिम हो आए,
जीवन समस्त लाशों को ढ़ोते बीत गया,
पर मृत्यु तेरे आलिंगन के आकर्षण में,
छोटा सा तिनका भी पर्वत से जीत गया,
सागर असत्य का दूर दूर तक फैला है,
अपनों पर अपने बढ़कर तीर चलाते हैं,
पर काल सामने से है जब करता प्रहार,
हम जाने क्यों छिपते हैं क्यों घबराते हैं,
गोधुली का होना भी तो एक कहानी है,
जो शनैः शनैः ही ओर निशा के बढ़ती है,
दीपक की परिणति भी है केवल अंधकार,
कजरारे पथ पर जो धीरे से चढ़ती है,
मधुबन की क्यारी में हैं अगणित सुमन मगर,
जो पुष्प ओस की बूँदों पर इतराता है,
उसमें भी है केवल दो दिन का पराग,
तीजे नज़रों को नीचे कर झर जाता है,
बादल नभ में आ घुमड़ घुमड़ एकत्रित हैं,
प्यासी घरती पर अमृत रस बरसाने को,
कहते हैं सबसे गरज गरज कर सुनो कभी,
हम तो आए हैं जग में केवल जाने को,
पत्थर से चट्टानों से खड़ी मीनारों से,
तुम सुनते होगे अकबर के किस्से अनेक,
जब हुआ सामना मौत के दरिया से उसका,
वह वीर शहंशाह भी था घुटने गया टेक,
वह गांधी ही था जिसकी आभा थी प्रसिद्ध,
गाँवों गाँवों नगरों नगरों के घर घर में,
वह राम नाम का धागा थामे चला गया,
उस पार गगन के देखो केवल पल भर में,
मैं आज यहाँ हूँ इस खातिर कल जाना है,
अपनी प्रेयसी की मदमाती उन बाँहों में,
जो तबसे मेरी याद में आकुल बैठी है,
जब आया पहली बार था मैं इन राहों में,
मेरे जाने से तुम सबको कुछ दुख होगा,
चर्चा कर नयन भिगो लेंगे कुछ सपने भी,
दो चार दिवस गूँजेगी मेरी शहनाई,
गीतों को मेरे सुन लेंगे कुछ अपने भी,
फिर नई सुबह की तरुणाई छा जाएगी,
कूकेगी कोयल फिर अम्बुआ की डाली पर,
फिर खुशियों की बारातें निकलेंगी घर से,
हाँ बैठ दुल्हन के जोड़े की उस लाली पर,
सब आएँ हैं इस खातिर कल जाना है,
उस पार गगन के ऊँचे अनुपम महलों में,
मिट्टी की काया से क्षण भर का रिश्ता है,
सब पत्तों से बिखरे हैं नहलों दहलों में,
हम काश समर्पित कर पाएँ अपना कण कण,
रिश्तों की हर इक रस्म निभानी है हमको,
जीलो जीवन को पूरी तरह आज ही तुम,
बस यह छोटी सी बात बतानी है हमको।
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अब आँसू की आवाज न मैं सुन सकता हूं
अब देख न सकता मैं गोरी तस्वीरों को
अब चूम न सकता मैं अधरों की मुस्कानें
अब बाँध न सकता बाँहों की जंजीरों को
मेरे अधरों में घुला हलाहल है काला
नयनों में नंगी मौत खड़ी मुसकाती है
'है राम नाम ही सत्य, असत्य और सब कुछ '
बस एक यही ध्वनि कानों में टकराती है
[गीत बहुत लम्बा है]
  
    नीरज जी के ज्यादातर गीतों में कफन, शमशान, अर्थी, लाश, के शब्द विम्ब भी मृत्यु के साथ मिलते हैं,
कफन बढा तो किसलिए नजर ये डबडबा गयी
श्रंगार क्यों सहम गया बहार क्यों लजा गयी
न जन्म कुछ न मृत्यु कुछ, बस सिर्फ इतनी बात है
किसी की आँख खुल गयी, किसी को नींद आ गयी
या

जब चले जाएंगे लौट के सावन की तरह ,
याद आएंगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह |
दाग मुझमें है कि तुझमें यह पता तब होगा ,
मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह |
हर किसी शख्स की किस्मत का यही है किस्सा ,
आए राजा की तरह ,जाए वो निर्धन की तरह |
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और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
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नीरजतो कल यहाँ न होगा
उसका गीत-विधान रहेगा
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खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चांदनी 
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों! चाल बदलकर जाने वालों!
चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।
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सोने का ये रंग छूट जाना है
हर किसी का संग छूट जाना है
और जो रखा हुआ तिजोरी में
वो भी तेरे संग नहीं जाना है
आखिरी सफर के इंतजाम के लिए
जेब इक कफन में भी लगाना चाहिए
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ऐसी क्या बात है चलता हूं अभी चलता हूं
गीत इक और जरा झूम के गा लूं तो चलूं
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जब न नीरज ही रहेगा क्या यहाँ रह जायेगा
इत्यादि । उनके लाखों लाख चाहने वाले थे और वे सबको डराते हुए 94 साल तक देश के कोने कोने में गीत गुंजाते हुए जिये। नीरज जी को जितना याद करते हैं, वे याद आते रहते हैं। सदियों तक याद आते रहेंगे। वे खुद ही कह गये हैं-
इतने बदनाम हुये हम तो इस जामाने में
तुमको लग जायेंगीं सदियां हमें भुलाने में
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629




रविवार, दिसंबर 30, 2018

श्रद्धांजलि ; शिवमोहन लाल श्रीवास्तव वह बाजी जीत कर चला गया


श्रद्धांजलि ; शिवमोहन लाल श्रीवास्तव



वह बाजी जीत कर चला गयाImage may contain: Shiv Mohan Lal Shrivastav, eyeglasses
वीरेन्द्र जैन
जिस बात के अनेक सिरे होते हैं तो समझ नहीं आता कि बात कहाँ से शुरू करूं। आज मेरे सामने भी यही मुश्किल है। मैं कम्प्यूटर और इंटरनैट से 2008 में जुड़ा, और लगातार इस बात का अफसोस रहा कि क्यों कम से कम पाँच साल पीछे रह गया। बहरहाल जब जुड़ा तो मेरे हाथ में कारूं का खजाना लग गया था। यही ऐसा उपकरण था जो मुझे चाहिए था। मेरा कीमती समय इतना इंटरनैट को अर्पित हो गया कि पुस्तकें और पत्रिकाएं पढने की आदत छूट गयी। इसी दौरान नैट पर एक ‘डैथ मीटर’ की साइट मिली। इसमें कुछ कालम भरने पर मृत्यु के वर्ष की घोषणा की जाती थी। इन कालमों में जन्मतिथि, लम्बाई, बजन, बाडी मास इंडेक्स, सिगरेट, शराब, तम्बाखू की आदतें, अब तक हो चुकी व साथ चलने वाली बीमारियां, आपरेशन, जाँच रिपोर्टों के निष्कर्ष, पैतृक रोग, मां बाप की मृत्यु के समय उम्र, आदि पचास से अधिक कालम थे और इस आधार पर मृत्यु के वर्ष की घोषणा की जाती थी। उत्सुकतावश मैंने भी उक्त कालम भरे और निष्कर्ष निकाला। मेरी मृत्यु का वर्ष 2018 निकला। मैं इससे संतुष्ट था क्योंकि अपेक्षाकृत अच्छी आदतों वाले मेरे पिता भी 65 वर्ष ही जिये थे।
शिवमोहन के जीवन और याद करने वाली घटनाओं पर अगर जाऊंगा तो यह टिप्पणी कभी खत्म ही नहीं हो पायेगी पर संक्षिप्त में बता दूं कि शिव के पिता और मेरे पिता न केवल परिचित लोगों में थे अपितु 25000 की आबादी वाले नगर दतिया में एक दौर के सुपरिचित बौद्धिक लोगों में गिने जाते थे। छोटे नगर में वैसे तो सब एक दूसरे को जानते ही हैं, पर मेरा शिवमोहन से निकट का परिचय तब हुआ जबकि मैं बीएससी करने के बाद शौकिया एमए कर रहा था और मेडिकल में प्रवेश से बहुत किनारे से चूकने के बाद पढाई के प्रति बिल्कुल भी गम्भीर नहीं था। हम लोगों का ना तो कोई भविष्य था और ना ही उसके प्रति कोई चिंता ही थी। मुझे पत्रकारिता व साहित्य आकर्षित करता था और एक दबी इच्छा थी कि पत्रिकाओं में लिख कर पहचान बनाऊं और उसके सहारे कवि सम्मेलनों के मंच से जीवन यापन लायक धन कमाऊं। कस्बाई राजनीति समेत नाम रौशन करने वाली हर गतिविधि में शामिल होने की कोशिश करता था, पत्र पत्रिकाएं पढता था और उनके सहारे मंच पर छोटा मोटा भाषण भी दे लेता था। धर्मनिरपेक्षता और नास्तिकता घर से मिली थी इसलिए जनसंघ को पसन्द नहीं करता था। वाम की ओर झुकाव वाली राजनीति पसन्द थी क्योंकि मैं हिन्दी ब्लिट्ज़ का नियमित पाठक था। चौराहे के होटल हम जैसे युवाओं के स्थायी अड्डे थे जहाँ पर राजनीतिक चर्चा के अलावा रेडियो पर क्रिकेट की कमेंट्री व बिनाका गीतमाला भी सुनी जाती थी। कभी किसी विषय पर कोई बयान दिया तो अखबार वाले ने मेरे नाम के साथ ‘छात्रनेता ने कहा’, लिख कर छापा तो अच्छा लगा। इसी काल में मेरी कुछ छोटी छोटी कविताएं भी राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में छप चुकी थीं और कवि गोष्ठियों में बुलाया जाने लगा था। शिवमोहन बड़े बड़े सुन्दर व स्पष्ट अक्षरों में लिखते थे और उनका गद्य हर तरह की पत्र पत्रिकाओं में खूब छपता था। मुझे उनसे ईर्षा होती थी। याद नहीं कि किस तरह हम दोनों का ही अहंकार टूटा और हम लोग साथ साथ बैठने लगे।
नगर में एक दो स्थानीय अखबार थे जो साप्ताहिक थे और नियमित भी नहीं थे किंतु दो तीन क्षेत्रीय अखबार आते थे। इनके हाकर ही इनके सम्वाददाता हुआ करते थे जो या तो जनसम्पर्क के प्रैसनोटों को ही सीधे भेज देते थे या किसी दूसरे से खबरें लिखवाते थे। कुछ ऐसा हुआ कि हम लोग उनकी खबरें लिखने लगे। इस काम का मेहनताना इस तरह वसूलते थे कि एकाध खबर अपने नाम की भी डाल कर खुश हो जाते थे। युवा थे इसलिए   मजे के लिए कुछ लड़कियों के शार्ट नाम भी उनमें जोड़ देते थे। खबर बनाने में मरने वाले सेलीब्रिटीज बहुत काम आते थे। इनकी कपोल कल्पित शोकसभा आयोजित होती थी जिसकी खबरों में अध्यक्षता कभी मैं करता था तो कभी शिवमोहन, कभी अवधेश पुरोहित तो कभी अशोक खेमरिया। इस तरह हम लोगों के नाम अखबार में छपा करते थे। नगर के सब महत्वपूर्ण लोग हम लोगों के नाम से परिचित हो चुके थे। इतना ही नहीं हम लोग अपने नाम के आगे कुछ विशेषण भी लगाते रहते थे।
वक्त बीता मैं बैंक की नौकरी पर निकल आया और शिवमोहन स्कूल टीचर होते हुए स्कालरशिप पर रूस चले गये। वहाँ से लौट कर फिर सेंट्रल गवर्नमेंट में राजभाषा अधिकारी होते हुए भिलाई, रावतभाटा [राजस्थान], शिवपुरी, इन्दौर, कलप्पकम [तामिलनाडु] हैदराबाद में डिप्टी डायरेक्टर आफीसियल लेंगवेज के पद से स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ली। उसके लिखे हुए पत्रों और प्राप्त पत्रों की संख्या लाखों में होगी और उसी तरह हर स्तर के विशिष्ट व सामान्य व्यक्तियों से उनके परिचय का दायरा देश विदेश में फैला हुआ है। लेखक, पत्रकार, सम्पादक, संयोजक, मंच संचालक, विदेशी भाषा के ज्ञाता, सामाजिक कार्यकर्ता, ज्योतिषी, से लेकर सनकी, झगड़ालू, मुँहफट आदि अनेकानेक विशेषण उनके साथ लगते रहे हैं। एक अध्यापिका से प्रेमविवाह किया जो पंजाबी हैं, बड़ी संतान बेटी जो आस्ट्रेलिया पढने गयी तो वहीं की होकर रह गयी, बेटे ने कोई नौकरी नहीं करना चाही तो फ्रीलाँस है। उन्होंने भी यायावरों की तरह मनमर्जी का जीवन जिया तो कभी दतिया, कभी इन्दौर, कभी भोपाल, कभी विशाखापत्तनम, कभी हैदराबाद पड़े रहे। ज्योतिष और तंत्र में भरोसा न होने पर भी उसकी प्रैक्टिस करते रहे और बड़े बड़े लोग उनके क्लाइंट रहे। [बाद में हम लोग उन नासमझों पर हँसते भी रहे] उनके सोते सोते दुनिया छोड़ देने तक पूरा जीवन घटना प्रधान रहा।
अब भूमिका की बात। जब मैंने उनसे कहा कि मेरा डैथ मीटर बोल रहा है कि मैं 2018 में नहीं रहूंगा तो मेरा श्रद्धांजलि लेख तुम्हें लिखना होगा। वे कहते कि मैं उम्र में तुम से बड़ा हूं इसलिए मेरा श्रद्धांजलि लेख तुम्हें ही लिखना होगा। 2018 शुरू होते ही जब फोन पर या चैटिंग से बात होती थी तब वे याद दिलते थे कि अठारह चल रहा है। मैं कहता था कि अभी बीता तो नहीं है, और फिर यह तो एक बिना जाँचा परखा कैलकुलेशन है कोई तुम्हारा ज्योतिष तो नहीं है कि इसमें विद्या की बेइज्जती हो जायेगी।  
शिवमोहन मेरे जीवन का एक हिस्सा थे। सच तो यह है कि वे साहित्यकार नहीं थे अपितु साहित्यिक पत्रकार थे। वे उत्प्रेरक थे। उन्होंने कविता कहानी व्यंग्य आदि में हाथ जरूर आजमाया होगा किंतु उसे मान्यता नहीं मिली। किंतु उन्होंने विभिन्न विषयों पर खूब लेख लिखे, खूब छपे और साहित्य की मुख्यधारा में बने रहे। उनका जीवन लगातार उन संघर्षों में बीता जिन्हें वे खुद आमंत्रित करते थे। गालिब के शब्दों में –
मेरी हिम्मत देखिए, मेरी तबीयत देखिए
जब सुलझ जाती है गुत्थी, फिर से उलझाता हूं मैं
यही उनकी भी प्रकृति थी।
विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए वादा करता हूं कि समय मिलने पर उनके जीवन के बारे में भी जरूर लिखूंगा। 
वीरेन्द्र जैन
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रविवार, दिसंबर 16, 2018

म.प्र. में शिवराज के एकाधिकार का टूटना


म.प्र. में शिवराज के एकाधिकार का टूटना
वीरेन्द्र जैन

गत विधानसभा चुनावों में भाजपा सरकारों का पतन न केवल मोदी-शाह के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को रोका जाना है अपितु इस पराजय के कई आयाम हैं और दूरगामी परिणाम होंगे। इन चुनाव परिणामों से न केवल मोदी-शाह की अलोकतांत्रिकता आहत हुयी है अपितु उनके अहंकार पर गहरी चोट हुयी है। इनमें से म.प्र. में सबसे ज्यादा नुकसान शिवराज सिंह के एकाधिकार का हुआ है।
उल्लेखनीय है कि शिवराज सिंह को नेतृत्व मध्य प्रदेश भाजपा के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सुन्दरलाल पटवा के परम प्रिय शिष्य होने के कारण विरासत में मिला था। जब श्री पटवा अस्वस्थ होकर लकवाग्रस्त हो गये तो प्रदेश के नेतृत्व में उनकी दावेदारी पर प्रश्नचिन्ह लग गया, भले ही वे कहते रहे कि मैं स्वस्थ हो रहा हूं। इसी दौरान उन्होंने अपना राजनीतिक वारिस शिवराज को घोषित किया और केन्द्रीय नेतृत्व को उनके स्थान पर नेतृत्व सौंपने का सुझाव दिया। भले ही भाजपा संगठन को संघ के समर्पित कार्यकर्ताओं द्वारा संचालित किये जाने के कारण पहले कैडर वाली पार्टी माना जाता रहा हो किंतु सत्ता का स्वाद लगते ही वह काँग्रेस कल्चर की पार्टी बन चुकी थी। तमाम तरह की राजनीतिक अनियमितताओं के लिए सर्वाधिक बदनाम इस पार्टी को इसके नियंत्रक संघ ने कभी नहीं टोका, क्योंकि किसी भी तरह से मिली सत्ता उनके लक्ष्यों को पूरा करने में मददगार थी। यही कारण रहा कि सबसे पहले, सर्वाधिक दल बदल कराने वाली तथा सैलीब्रिटीज को चुनाव में स्तेमाल करने वाली पार्टी भाजपा ही रही। इसी पार्टी ने चुनावों में धन के स्तेमाल से सत्ता हथियाने की शुरुआत की। इसी तरह पद व सत्ता के लिए आपसी मतभेद और चुनावों में भितरघात भी शुरू हो गया था। जब पटवा जी के गुट ने शिवराज को प्रदेश अध्यक्ष के पद पर बैठाना चाहा तो विक्रम वर्मा की दावेदारी ने चुनौती दी थी व शिवराज सिंह के साथ विधिवत चुनाव हुये थे। इस चुनाव में शिवराज हार गये थे।  
2003 के विधानसभा चुनाव का सीधा सामना करने में काँग्रेस के धुरन्धर नेता दिग्विजय सिंह के सामने भाजपा खुद को कमजोर पा रही थी क्योंकि उसके पास उस कद का कोई प्रादेशिक नेता नहीं था। यही कारण था कि उन्होंने साध्वी के भेष में रहने वाली तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री पर दाँव लगाया, जो खुद भी अपना पद छोड़ कर नहीं आना चाहती थीं। उन्होंने नानुकर करने के बाद केन्द्रीय नेतृत्व के सामने अनेक शर्तें रखीं जिनमें से एक थी कि अधिकतम टिकिट वितरण में उनकी मर्जी ही चलेगी। विवश और नाउम्मीद नेतृत्व ने उनकी यह शर्त मान ली। उल्लेखनीय है कि सुश्री उमा भारती का सुन्दरलाल पटवा और उनके समर्थकों से सदैव छत्तीस का आंकड़ा रहा था इसलिए उन्होंने सुनिश्चित पराजय वाली सीट पर दिग्विजय सिंह के खिलाफ शिवराज सिंह को चुनाव लड़वाना तय किया जिससे एक तीर से दो शिकार किये जा सकें। शिवराज सिंह चुनाव हार गये।
बाद के घटनाक्रम में जब उमा भारती को हुबली कर्नाटक के ईदगाह मैदान पर जबरन झंडा फहराने और परिणामस्वरूप हुये गोलीकांड में सजा सुनायी गयी तो भाजपा नेतृत्व ने इसे एक अवसर के रूप में लिया और उनसे स्तीफा लेने में किंचित भी विलम्ब नहीं किया। यद्यपि उमाभारती ने नेतृत्व के आदेश के खिलाफ पर्याप्त देर की और जमानत के प्रयास करती रहीं, जब जमानत नहीं मिली तो केन्द्र ने अरुण जैटली के साथ शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री चुनने के प्रस्ताव के साथ भेजा था, पर उमा भारती ने साफ इंकार कर दिया व वरिष्ठ और सरल श्री बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री चुनवा दिया जिन्होंने उनसे वादा किया था कि अवसर आने पर, उमा भारती के पक्ष में वे अपना पद छोड़ने में किंचित भी देर नहीं करेंगे। शिवराज सिंह को एक बार फिर मायूस होकर वापिस लौटना पड़ा था। बाद में कर्नाटक की काँग्रेस सरकार ने कूटनीति से सम्बन्धित मुकदमा वापिस ले लिया व उमा भारती अपनी छोड़ी हुयी सीट वापिस पाने के लिए उतावली हो गयीं, पर अब मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर केन्द्रीय नेतृत्व के निर्देश पर काम कर रहे थे, जिसने उन्हें पद छोड़ने से साफ रोक दिया था। उमाजी ने तरह तरह से दबाव बनाना शुरू किया,  तिरंगा यात्रा निकाली पर दबाव नहीं बना। फिर उन्होंने सरकार की आलोचना शुरू कर दी तो नेतृत्व ने सरकार बदलना तय कर दिया। अबकी बार उन्होंने शिवराज सिंह को जबरदस्ती थोप दिया जबकि उमा भारती लोकतंत्र की दुहाई देते देते विधायकों के मत लेने की बात करती रहीं। वे बैठक से बाहर भागीं पर उनके साथ कुल ग्यारह विधायक बाहर आये और अंततः कुल चार रह गये। उन्होंने रामरोटी यात्रा निकाली और अलग पार्टी के गठन की घोषणा कर दी। विधायक सत्ता के साथ ही रहे क्योंकि उमा भारती पर से केन्द्रीय नेतृत्व का वरद हस्त हट चुका था। नियमानुसार छह महीने के अन्दर शिवराज सिंह को विधायक का चुनाव लड़ना पड़ा और कई तरह की चुनौतियों को देखते हुए उन्होंने जिलाधिकारी से इतने पक्षपात कराये कि चुनाव आयोग को चुनाव स्थगित करना पड़ा व जिलाधिकारी को स्थानांतरित करना पड़ा। इस सब घटनाक्रम में शिवराज को केन्द्रीय नेतृत्व का समर्थन मिलता गया व अलग पार्टी बना चुकी उमा भारती खलनायक बनती गयीं। 2008 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने समुचित संख्या में उम्मीदवार उतारे और बारह लाख वोट लेकर भाजपा को यथा सम्भव नुकसान पहुँचाया, भले ही उनके कुल पाँच विधायक जीत सके। उमा भारती को हराने के लिए शिवराज ने पार्टी और सरकार की पूरी ताकत झौंक दी थी और चुनाव जीतने के लिए अपनाये जाने वाले सारे हथकण्डे अपनाये जिसके परिणाम स्वरूप वे खुद भी चुनाव हार गयी थीं। चुनाव प्रचार के दौरान उन पर असामाजिक तत्वों ने हमला भी किया था व उन्हें एक मन्दिर में छुपना पड़ा था। वहाँ से उन्होंने फोन कर के प्रैस को बताया था कि शिवराज के इशारे पर उनकी जान लेने की कोशिश की गयी थी। इसके बाद वे हिम्मत हार गयी थीं और उन्होंने भाजपा में वापिस आने के तेज प्रयास शुरू कर दिये थे। किंतु उतनी ही तेजी से शिवराज ने उनकी वापिसी का विरोध भी शुरू कर दिया था। उन्होंने कहा था कि उनकी वापिसी के साथ ही वे अपने पद से त्यागपत्र दे देंगे। यह मामला दो साल तक लटका रहा। उमा भारती बाबरी मस्जिद टूटने के प्रकरण में संयुक्त अभियुक्त हैं और उनका अलग होना संघ अपने परिवार के हित में नहीं देखता इसलिए उसने दबाव डाल कर वापिसी का यह फार्मूला तैयार किया कि उमा भारती मध्य प्रदेश में प्रवेश नहीं करेंगीं। उन्हें उत्तर प्रदेश से विधायक का चुनाव लड़वाया गया और जीत की व्यवस्थाएं की गयीं। वे मुख्यमंत्री रह चुकी थीं इसलिए उन्हें उ.प्र. में मुख्यमंत्री प्रत्याशी भी घोषित किया गया।
शिवराज ने एकाधिकार का महत्व समझ लिया था इसलिए अपनी राह के सारे कांटे दूर करना शुरू कर दिये थे। कैलाश विजयवर्गीय सबसे बड़े प्रतिद्वन्दी थे। एक समय तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी जान को खतरा बताया था और राजनीतिक पंडितों के अनुसार उनका इशारा कैलाश विजयवर्गीय की ओर ही था। केन्द्रीय नेतृत्व ने धीरे से उन्हें मध्य प्रदेश से हटा लिया और पार्टी महासचिव बना कर प्रदेश की राजनीति से दूर कर दिया। इसी तरह दिन में सपने देखने लगे तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा को भी अचानक पद मुक्त करवा कर  अपने निकटस्थ नन्द किशोर चौहान को बैठा दिया। प्रभात झा की तरह ही अरविन्द मेनन को भी झटके के साथ संगठन के पद भार से मुक्त कर दिया गया। अब सब शिवराज की कठपुतलियों के हाथ में था। मीडिया को विज्ञापनों से इस तरह से पाट दिया गया था कि प्रदेश में व्यापम जैसा कांड हो या पेटलाबाद जैसा विस्फोट, बड़वानी का आँख फोड़ने वाला कांड हो या मन्दसौर का गोलीकांड सब दब कर रह गये। विज्ञापनों में भी शिवराज का इकलौता चेहरा ही उभरता हुआ नजर आता था। किसानपुत्र, मामा, बेटी बचाओ, कन्यादान, कुम्भ, नर्मदा, तीर्थयात्रा, आशीर्वाद यात्रा, आदि आदि सब व्यक्ति केन्द्रित होता जा रहा था। यहाँ तक कि चुनाव प्रचार सामग्री में भी अटल अडवाणी तो क्या मोदी और शाह को भी दूर रख कर ‘ हमारा नेता शिवराज’ का नारा उछाला गया था।
तय है कि चुनाव में पराजय के बाद उनका यह कहना कि मैं कहीं नहीं जाऊंगा, यहीं रहूंगा, यहीं जिऊंगा, यहीं मरूंगा, स्वाभाविक ही है किंतु पद के साथ मिलने वाला समर्थन और सहयोग अब नहीं मिलेगा। सारे विरोध सामने आने लगेंगे। सबके सत्ता सुख छिन जाने का दोष भी अब अकेले झेलना होगा। आभार यात्रा के दो चार कार्यक्रमों की असफलता ही आइना दिखा देगी। यह बात अलग है कि अडवाणी, सुषमा गुट का यह नेता सैकड़ों अन्य मोदी शाह जैसे भाजपा नेताओं की तुलना में अच्छा था।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, नवंबर 22, 2018

फिल्म समीक्षा मार्क्सवाद की एक अनौपचारिक क्लास – मोहल्ला अस्सी


फिल्म समीक्षा
मार्क्सवाद की एक अनौपचारिक क्लास – मोहल्ला अस्सी
वीरेन्द्र जैन

मोहल्ला अस्सी मूवी के लिए इमेज परिणाम
काशीनाथ सिंह हिन्दी के सुपरिचित कथाकार हैं। उन्होंने कभी हंस में धारावाहिक रूप से बनारस के संस्मरण लिखे थे जिनका संकलन ‘काशी के अस्सी’ नाम से प्रकाशित हुआ था। यह पुस्तक मध्य प्रदेश के पाठक मंच में भी खरीदी गयी थी और हजारों लोगों द्वारा पढी व सराही गयी थी। बनारस में सच्चे हिन्दुस्तान के दर्शन होते हैं। कबीरदास की इस नगरी में हिन्दू, मुसलमान, काँग्रेसी, संघी और कम्युनिष्ट वर्षों से एक साथ लोकतांत्रिक रूप से अपने विचारों के हथियारों से लड़ते भिड़ते हुए भी भाई भाई की तरह रहते हैं। जीना यहाँ, मरना यहाँ, इसके सिवा जाना कहाँ। बनारसी साड़ी को बुनने वाले लाखों मुस्लिम मजदूरों के साथ बाबा विश्वनाथ के लाखों भक्त रह कर साथ साथ गंगा स्नान करते हैं। यहाँ विस्मिल्लाह खाँ जैसे प्रसिद्ध शहनाई वादक, तो गुदईं महाराज से लेकर किशन महाराज तक जग प्रसिद्ध तबला वादक व गायक हुये हैं। यहाँ समाजवादी आन्दोलन भी चला और बीएचयू में सभी धाराओं के राजनीतिक विचारों को जगह भी मिली। जितने वामपंथी बुद्धिजीवी अलीगढ मुस्लिम यूनीवर्सिटी में पैदा हुये उतने ही बनारस हिन्दू यूनीवर्सिटी में भी पैदा हुये, जिन्होंने देश भर को दिशा दी। बनारस ने सभी विचारधाराओं को अपनी चौपाल में जगह दी और वहाँ के चाय के ढाबों में वैसी बहसें हुयीं जैसी अंतर्राष्ट्रीय सेमीनारों में भी नहीं होती होंगीं। जिसे प्रभु वर्ग [इलीट क्लास] में असभ्य या अश्लील समझा जाता होगा वैसी गालियां यहाँ मुहावरों की तरह प्रयुक्त होती हैं और उनके प्रयोग में लिंग भेद भी बाधा नहीं बनता।
इस फिल्म का कथानक पुस्तक ‘काशी का अस्सी’ के एक अध्याय ‘ पांड़े कौन कुमति तोहि लागी’ से उठाया गया है। इस संस्मरण का काल पिछली सदी के आठवें, नौवें दशक का है जब भाजपा ने संसद में अपनी सदस्य संख्या दो तक सीमित हो जाने के बाद अपने राजनीतिक अभियान को राम जन्म भूमि विवाद के साथ जोड़ दिया था। यह वह काल था जब काशी के पंडों की आमदनी सिकुड़ रही थी और वे जीवन यापन के लिए अपने ही बनाये मूल्यों के साथ समझौता करने के लिए मजबूर हो रहे थे। पप्पू की चाय की दुकान बनारस की वह प्रसिद्ध जगह है जहाँ बैठ कर लोग खूब बहसते हैं और मजाक करते हैं। कथानक केवल इतना है कि गंगा किनारे बसे पंडितों के मुहल्ले में ब्राम्हण सभा का अध्यक्ष धर्मपाल शास्त्री किसी भी पंडे को अपने यहाँ विदेशी किरायेदार नहीं रखने देता क्योंकि उसके अनुसार मांसाहारी होने के कारण वे अपवित्र होते हैं और गन्दगी फैलाते हैं। दूसरी ओर विदेश से बनारस आये हुए पर्यटक अच्छा किराया देते हैं। वैकल्पिक रूप से स्थानीय मल्लाह, नाई आदि अपने घर की कोठरियां किराये से देकर अच्छी कमाई कर रहे होते हैं और अपने सुधरे रहन सहन से ब्राम्हणों के श्रेष्ठता बोध को चुनौती देने लगते हैं। मार्क्सवाद के अनुसार समाज का मूल ढांचा अर्थ व्यवस्था बनाती है व उसी के अनुसार व्यक्ति की संस्कृति अर्थात सुपर स्ट्रेक्चर तय होता है। जब कथा नायक आर्थिक तंगी से जूझता है तो वह अपने घर में स्थापित शिव जी की कोठरी को विदेशी किरायेदार को देने को मजबूर हो जाता है और रात्रि में शिवजी के सपने में आकर आदेश देने का बहाना बना कर उन्हें गंगा में विसर्जित कर देता है। उससे प्रेरणा पाकर उस मुहल्ले के सभी पंडे अपने अपने घरों में स्थापित शिव मूर्तियों को अन्यत्र स्थापित कर खाली हुयी कोठरियों को विदेशी पर्यटकों को किराये से देने लगते हैं। इकानामिक स्ट्रक्चर, सुपर स्ट्रक्चर को बदल देता है। दूसरी तरफ चाय की दुकान में बैठे बुद्धिजीवी इन्हीं विषयों पर लम्बी लम्बी चर्चायें चलाते हैं। इसे देख कर फिल्म पार्टी की याद आ जाती है। एक पात्र कहता है 1992 के बाद जितने मुसलमान नमाज पढने जाने लगे और टोपियां लगाने लगे उतने पहले कभी नहीं जाते थे। दोनों तरफ से घेटो बनने लगे। रामजन्म भूमि पर भी अच्छी बहस सामने आयी।
वहीं नाई का काम करने वाला एक युवा एक अमेरिकन युवती को घुमाते घुमाते व्यवहारिक ज्ञान अर्जित कर लेता है व थोड़ा सा योग सीख कर उसके साथ अमेरिका भाग जाता है। वह वहाँ से बारबर बाबा बन कर लौटता है। वह अपने पुराने सहयोगियों को बताता है कि दुनिया एक बाज़ार है, जिसमें वह योग बेचने लगा है। कभी बनारस को रांड़, सांड़, सीढी, सन्यासी से याद किया जाता था किंतु अब फिल्म में किरायेदारी की दलाली करने वाला एक ब्रोकर कहता है कि अस्सी-भदैनी में ऐसा कोई भी घर नहीं जिसमें पंडे, पुरोहित, और पंचांग न हों और ऐसी कोई गली नहीं जिसमें कूड़ा, कुत्ते और किरायेदार न हों”।
फिल्म के मुख्य किरदार धर्मपाल शास्त्री [पांडे] की भूमिका सनी देवल ने निभायी है तो उनकी पत्नी की भूमिका साक्षी तंवर ने निभायी है। गाइड कम ब्रोकर की भूमिका भोजपुरी फिल्मों के नायक रवि किशन की है तो सौरभ शुक्ला आदि की भी भूमिकाएं हैं। बुद्धिजीवी गया सिंह की भूमिका उन्होंने खुद ही निभायी है। सनी देवल ने अच्छा अभिनय किया है किंतु उनकी भूमिका के अनुरूप उनका चयन ठीक नहीं था वे धुले पुछे बाहरी व्यक्ति ही लगते रहे जबकि साक्षी तंवर और सौरभ शुक्ला ने अपने को बनारसी रंग ढंग में ढाल लिया था। फिल्म में कहानी और घटनाक्रम देखने के अभ्यस्त दर्शकों को लम्बे लम्बे डायलाग वाली राजनीतिक बहस पसन्द नहीं आयेगी। पर वह ज्ञनवर्धक है।
इस फिल्म की दो अन्य उपलब्धियां सेंसर बोर्ड के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का 36 पेज का फैसला और साहित्यिक संस्मरणों पर फिल्म बनने की शुरुआत होना भी है। उम्मीद की जाना चहिए कि दूसरे निर्माता निर्देशक भी साहस करेंगे।  
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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बुधवार, नवंबर 21, 2018

फिल्म समीक्षा संक्रमण काल में सामाजिक अवधारणाओं की चुनौतियां पर मनोरंजक फिल्म – बधाई हो


फिल्म समीक्षा
संक्रमण काल में सामाजिक अवधारणाओं की चुनौतियां पर मनोरंजक फिल्म – बधाई हो
वीरेन्द्र जैन

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टीवी इंटरनैट के आने से पहले कालेज के दिनों में जब अंग्रेजी फिल्में देखने का फैशन चलन में था, तब तीन घंटे की फिल्म के अभ्यस्त हम लोगों को दो घंटे की फिल्म देख कर कुछ कमी सी महसूस होती थी, पर अब नहीं लगता क्योंकि बहुत सारी हिन्दी फिल्में भी तीन घंटे से घट कर दो सवा दो घंटे में खत्म हो जाती हैं। पहले फिल्में उपन्यासों पर बना करती थीं अब कहानियों या घटनाओं पर बनती हैं और उनमें कई कथाओं का गुम्फन नहीं होता। पिछले कुछ दिनों से इसी समय सीमा में किसी विषय विशेष पर केन्द्रित उद्देश्यपरक फिल्में बनने लगी हैं। कुशल निर्देशक उस एक घटनापरक फिल्म में भी बहुत सारे आयामों को छू लेता है। अमित रवीन्द्रनाथ शर्मा के निर्देशन में बनी ‘बधाई हो’ इसी श्र्ंखला की एक और अच्छी फिल्म है।
       यौन सम्बन्धों के मामले में हम बहुत दोहरे चरित्र के समाज में रह रहे हैं। वैसे तो सुरक्षा की दृष्टि से सभी गैर पालतू प्रमुख जानवर यौन सम्बन्धों के समय एकांत पसन्द करते हैं और सारी दुनिया की मनुष्य जाति में भी यह प्रवृत्ति पायी जाती है पर हमारी संस्कृति में ब्रम्हचर्य को इतना अधिक महत्व दिया गया है कि पति पत्नी के बीच के यौन सम्बन्धों को स्वीकारने में भी पाप बोध की झलक मिलती है। भले ही विवाह के बाद पूरा परिवार शिशु की प्रतीक्षा करने लगता है, दूधों नहाओ पूतों फलो के आशीर्वाद दिये जाते रहे हैं जिसके के लिए यौन सम्बन्धों से होकर गुजरना होता है, किंतु उसकी समस्याओं पर सार्वजनिक चर्चा नहीं की जा सकती। पैडमैन फिल्म बताती है कि यौन से सम्बन्धित सुरक्षा सामग्री भी अश्लीलता समझी जाती रही है। प्रौढ उम्र में गर्भधारण इसी करण समाज में उपहास का आधार बनता है भले ही यौन सम्बन्धों की उम्र दैहिक स्वास्थ के अनुसार दूर तक जाती हो।
यह संक्रमण काल है और हम धीरे धीरे एक युग से दूसरे युग में प्रवेश कर रहे हैं। यह संक्रमण काल देश की सभ्यता, नैतिकिता, और अर्थ व्यवस्था में भी चल रहा है। हमारा समाज आधा तीतर आधा बटेर की स्थिति में चल रहा है। फिल्म का कथानक इसी काल की विसंगतियों से जन्म लेता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मूल निवासी कथा नायक [गजराव राव] रेलवे विभाग में टीसी या गार्ड जैसी नौकरी करता है, व दिल्ली की मध्यम वर्गीय कालोनी में रहता है, जहाँ पुरानी कार सड़क पर ही पार्क करना पड़ती है। दिल्ली में बढे हुये उसके लगभग 20 और 16 वर्ष के दो बेटे हैं। उसकी माँ [सुरेखा सीकरी] भी उसी छोटे से फ्लेट में उसके साथ रहती है और कमरे की सिटकनी बन्द करने की आवाज तक महसूस कर लेती है। वह परम्परागत सास की तरह बहू [नीना गुप्ता] को ताना मारते रहने में खुश रहती है। कविता लिखने का शौकीन भला भोला मितव्ययी कथा नायक भावुक क्षणों में भूल कर जाता है और लम्बे अंतराल के बाद उसकी पत्नी फिर गर्भवती हो जाती है जिसका बहुत समय बीतने के बाद पता लगता है। वह गर्भपात के लिए सहमत नहीं होती।
उसका बड़ा बेटा [आयुष्मान खुराना] भी किसी कार्पोरेट आफिस में काम करता है व उसका प्रेम सम्बन्ध अपने साथ काम करने वाली एक लड़की [सान्या मल्होत्रा] से चल रहा होता है। लड़के के परिवार के विपरीत माँ [शीबा चड्ढा ] के संरक्षण में पली बड़ी पिता विहीन लड़की अपेक्षाकृत सम्पन्न मध्यमवर्गीय परिवार से है व उनके रहन सहन में अंतर है। लड़की की माँ आधुनिक विचारों की है तदानुसार लड़की अपना मित्र व जीवन साथी चुनने के लिए स्वतंत्र है। वे साझे वाहन से कार्यालय जाते हैं, और अवसर मिलने पर दैहिक सम्बन्ध बना लेने को भी अनैतिक नहीं मानते।
लड़के की माँ के गर्भधारण के साथ ही उसके परिवार में व्याप्त हो चुका अपराधबोध सबको गिरफ्त में ले लेता है। पड़ोसियों की मुस्कराती निगाह और तानों में सब उपहास के पात्र बनते हैं और इसी को छुपाने के क्रम में लड़का और लड़की के बीच तनाव व्याप्त हो जाता है जो दोनों के बीच एकांत मिलन का अवसर मिलने के बाद तब टूटता है जब वह लड़का अपनी चिंताओं के कारण को स्पष्ट करता है। लड़की के लिए यह हँसने की बात है किंतु लड़के के लिए यह शर्म की बात है।
जब लड़की अपनी माँ को सच बताती है तो माँ अपनी व्यवहारिक दृष्टि से सोचते हुए कहती है कि रिटायरमेंट के करीब आ चुके लड़के के पिता की नई संतान का बोझ अंततः उसे ही उठाना पड़ेगा। लड़का यह बात सुन लेता है और गुस्से में उन्हें कठोर बातें सुना देता है, जिससे आहत लड़की से उसका मनमुटाव हो जाता है। इसी बीच लड़के की बुआ के घर में शादी आ जाती है जिसमें शर्मिन्दगी के मारे दोनों लड़के जाने से मना कर देते हैं। उनके माँ बाप और दादी जब वहाँ जाते हैं तो सारे मेहमान भी उन्हीं की तरफ उपहास की दृष्टि से देखते हैं। यह बात दादी को अखर जाती है और वह गुस्से में अपनी बेटी और बड़ी बहू को लताड़ते हुए कहती है कि जिन संस्कारों को भूलने की बात कर रहे हो उनमें वृद्ध मां बाप की सेवा करना भी है जो कथा नायिका गर्भवती बहू को तो याद है पर उपहास करने वाले भूल गये हैं, जो कभी भूले भटके भी उससे मिलने नहीं आते। बीमार होने पर इसी बहू ने उनको बिस्तर पर शौच कर्म कराया है जब कि वे लोग देखने तक नहीं आये। वह विदा होती नातिन के यह कहने पर कि वह अमेरिका जाकर नानी को फोन करेगी, कहती है कि उसने मेरठ से दिल्ली तक तो फोन कभी किया नहीं अमेरिका से क्या करेगी। इसे सुन कर एक पुरानी फिल्म ‘खानदान’ में भाई-भाई के प्रेम के लिए रामायण को आदर्श बताने वाले नायक के आदर्श वाक्य का उत्तर देते हुए का प्राण द्वारा बोला गया वह डायलाग याद आता है, जब वह कहता है ‘ कौन सी रामायण पढी है तुमने? हमारी रामायण में तो यह लिखा हुआ है कि बाली को उसके सगे भाई सुग्रीव ने मरवा दिया और रावण को उसके सगे भाई सुग्रीव ने’।
अंग्रेजी में कहावत है कि मोरलिटी डिफर्स फ्रोम प्लेस टु प्लेस एंड एज टु एज। लगता है इसके साथ यह भी जोड़ लेना चहिए कि क्लास टु क्लास।     
            लड़के की माँ को जब पता लगता है कि उसके कारण उसका उसकी गर्ल फ्रेंड से मनमुटाव हो गया है तो वह लड़के को गोद भराई का कार्ड देने के बहाने भेजती है और लड़की की माँ से माफी मांगने की सलाह देती है। यही बात उनके मन का मैल दूर कर देती है। और एक घटनाक्रम के साथ फिल्म समाप्त होती है।
इस मौलिक कहानी को बुनने और रचने में पर्याप्त मेहनत की गयी है व पश्चिमी उत्तर प्रदेश की स्थानीयता और दिल्ली की आधुनिकता के बीच की विसंगतियों को सफलता से उकेरा गया है। पान की दुकान को युवा क्लब बनाये रखने, घर में अपनी बोली में बोलने, पड़ोसियों द्वारा ताक झांक करने व दूसरी ओर आधुनिक परिवार में माँ बेटी का एक साथ ड्रिंक करना पार्टियां देना आदि बहुत स्वाभाविक ढंग से व्यक्त हुआ है। सारी शूटिंग स्पाट पर की गयी है और डायलाग में व्यंग्य डाला गया है, जिसका एक उदाहरण है कि जब माँ के गर्भवती होने पर हँसती हुयी लड़की से नाराज लड़का कहता है कि अगर ऐसी ही स्थिति तुम्हारी माँ के साथ हुयी होती तो तुम्हें कैसा लगता। लड़की कहती है, तब तो बहुत बुरा लगता।.......... क्योंकि मेरे पिता नहीं हैं। चुस्त कहानी और पटकथा लेखन के लिए अक्षर घिल्डियाल, शांतुन श्रीवास्तव, और ज्योति कपूर बधाई के पात्र हैं। फिल्म की व्यावसायिक सफलता ऐसी फिल्मों को आगे प्रोत्साहित करेगी जो बदलते समय के समानांतर सामाजिक मूल्यों में बदलाव को मान्यता दिलाती हैं।
वीरेन्द्र जैन
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