सोमवार, फ़रवरी 04, 2019

श्रद्धांजलि शरद भट्ट सक्रिय, संतोषी, और हँसमुख व्यक्तित्व के धनी थे


श्रद्धांजलि
शरद भट्ट सक्रिय, संतोषी, और हँसमुख व्यक्तित्व के धनी थे
वीरेन्द्र जैन
3 फरबरी 2019 को चार बजे राजीव व्यास का फोन आया कि शरद भट्ट भाई साहब के न रहने की खबर किसी अज्ञात स्त्रोत से आयी है क्या आपको पता चला! अंतिम संस्कार का समय भी चार बजे सुभाष नगर विश्राम घाट पर ही है, और मैं दूर हूं। सुभाष नगर मेरे निवास से आधा किलोमीटर दूर पर ही है इसलिए मैं पुष्टि करने की जगह सही समय पर सीधे वहीं पहुंच गया। कई पुराने परिचित मिल गये और जैसा कि होता है अनेक तरह की स्मृतियां कौंधती रहीं। डा. विजय अग्रवाल, डा. आर डी गुप्ता, बुधौलिया जी, रमेश शर्मा, आदि लोग भी थे।
दतिया जैसे छोटे कस्बे में जहाँ सारे सक्रिय लोग एक दूसरे को जानते पहचानते रहे हैं, हम लोग जब कालेज में पढते थे तब नगर की आबादी कुल 25000 के आसपास थी। शरद से पहला घनिष्ठ परिचय 1970 के आसपास हुआ जब मैं एम.ए. [अर्थशास्त्र] फाइनल में था और शरद ने किसी विषय में एम.ए, में प्रवेश लिया था। सक्रियता के क्षेत्र सीमित थे और हर क्षेत्र में हाथ पांव मारने वाले मेरे जैसे लोग कालेज में अपनी उपस्थिति दिखाना चाहते थे। राजनीतिक दलों के लोग तो थे किंतु विचारधारा के लोग नहीं दिखते थे। मैं ब्लिट्ज का नियमित पाठक था और उससे भी वाम झुकाव बना था, या कहें कि उससे सूचनाएं और तर्क प्राप्त होते रहते थे जिनका प्रयोग कर मैं अपनी अलग पहचान बना लेता था। साहित्य, पत्रकारिता, खेल, संगीत से लेकर चुनावी गतिविधियों तक हर जगह बिना बुलाये हुए भी प्रवेश कर जाना हम लोग अपना अधिकार समझते थे व किले चौक पर हर शाम सौ पचास लोग अकारण भी एकत्रित रहते थे और कारण भी तलाश लेते थे।
शरद भट्ट राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में था और मेरी पहचान वामपंथी की तरह बनती जा रही थी इसलिए वह शायद मेरी टोह लेने के लिए निकट आया या भेजा गया था। हम लोगों का एक ग्रुप साथ साथ घूमता फिरता था जिनमें मैं तो अपने थोड़े से अध्ययन की जुगाली करता रहता था किंतु शरद कुछ बोलता नहीं था। वह संघ द्वारा किये जाने वाले बौद्धिक आयोजनों के कार्ड हम लोगों को देता था और कई बार तो किन्हीं बन्द दरवाजों में प्रवेश करने के लिए हम लोग भी उसके कार्ड ले लेते थे और उन्हें स्वचयनित घरों में बांट आते थे।
1971 का ऎतिहासिक आम चुनाव जो स्वघोषित समाजवादी इन्दिरा गाँधी और सीपीआई ने संयुक्त दक्षिण पंथ के खिलाफ लड़ा था, जिसमें हमारे क्षेत्र से जनसंघ की ओर से श्रीमती विजया राजे सिन्धिया उम्मीदवार थीं। मैं तब तक सीपीआई और सीपीएम के भेद को नहीं जानता था और स्वाभाविक रूप से देश के करोड़ों लोगों की तरह श्रीमती गाँधी के प्रचार से प्रभावित होकर उनका पक्षधर था। वैसे भी वहाँ वामपंथी पार्टी की उपस्थिति ही नहीं थी। मैंने ही पहली बार कम्युनिष्ट पार्टी के गठन के लिए शाकिर अली खाँ को पत्र लिखा था जो सेंसर हो गया था और पुलिस के स्पेशल ब्रांच के सदस्य मेरी निगरानी करने लगे थे। उसी चुनाव के दौरान काँग्रेस उम्मीदवार नरसिंहराव दीक्षित के पक्ष में चल रही आमसभा में मैंने भी बोलने की इच्छा प्रकट की और इस इच्छा का स्वागत हुआ। संयोग से उन्हीं दिनों मैंने अहमदाबाद के दंगों की रिपोर्ट पढी थी जिसमें किन्हीं हाजरा बेगम, जो विधवा थीं के चार बच्चों को उन्हीं के सामने काट डाला गया था व उनके सबसे छोटे बच्चे को भी उनके गिड़गिड़ाने व एक विधवा का आखिरी सहारा बताने के बाद भी न बख्शे जाने का जिक्र था। मैंने उस घटना की चर्चा बहुत ही मार्मिक ढंग से की जिसका बहुत प्रभाव पड़ा। कुछ श्रोताओं ने तो कहा था कि मेरे रोंगटे खड़े हो गये थे। उसके बाद मैं संघ के निशाने पर आ गया था। या कहें कि निगरानी में आ गया था। जनसंघ के बड़े बड़े नेताओं की आमसभाओं में जिन्हें सुनने किले चौक पर सभी कामन श्रोता जाते थे, तब मेरी निगरानी के लिए संघ के लोग मेरे समीप ही खड़े हो जाते थे और मेरे जगह बदलने पर वे भी जगह बदल कर वहीं आ जाते थे।
शरद उस चुनाव में श्रीमती सिन्धिया का कार्यालय सम्हाल रहे थे। वे उक्त भाषण की चर्चा के बाद मेरे पास भेजे गये थे और उन्होंने पूछा था कि मुझे क्या चाहिए? यह सीधा सीधा आर्थिक लालच था क्योंकि श्रीमती सिन्धिया बहुत पैसा खर्च कर रही थीं और जैसा कि बाद में पता चला था कि उनका काँग्रेस के उम्मीदवार और समर्थकों से सौदा भी हो गया था। मेरे जैसे युवा के लिए वह ज़िन्दगी का पहला ऐसा प्रस्ताव था, और उसे ठुकरा कर गौरवान्वित होने का भी पहला अवसर था। मैं जीवन भर इस गौरव के साथ जिया और वह घटना कभी नहीं भूला। हो सकता है कि उस घटना के बाद शरद के दिल में मेरे प्रति सम्मान बढा हो या नहीं बढा हो पर मेरी दृढता जरूर बढी थी। बाद में भी मैंने उसकी आत्मीयता में कभी कोई कमी नहीं देखी। इमरजैंसी में वे उन चन्द लोगों में थे जो 19 महीने मीसा बन्दी के रूप में जेल में रहे।
वह पीताम्बरा पीठ के भी सक्रिय प्रबन्धकों में थे और वहाँ आने वाले सैकड़ों विशिष्ट लोगों से उसका परिचय था किंतु कभी भी किसी अतिरिक्त लाभ लेने की कोई खबर नहीं सुनने को मिली जबकि अन्य अनेक लोग इस रोग के रोगी पाये गये। मैं एक स्थानीय अखबार में लिखता था और धार्मिक क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ भी लिखता रहा और आशंका रही कि शायद कभी शरद कोई शिकायत करे किंतु उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया।
तीन बेटियों, और असामयिक निधन के बाद अपने भाई के बेटे के पिता शरद जिम्मेवार पिता भी थे व उनके आग्रह पर ही पिछले साल से भोपाल आकर रहने लगे थे। मुझे बाद में पता लगा। इसी दौरान एक कामन मित्र के असामायिक निधन पर जब मैंने उन्हें सूचना दी तो उन्होंने अंतिम संस्कार में आने में किंचित देर नहीं की। उसी दौरान उन्होंने भोपाल स्थित दतिया के सारे मित्रों की एक बैठक व दावत करने का प्रस्ताव किया था जो अधूरा ही रह गया।
उनके सहयोग करने को तत्पर रहने और सदैव हँसमुख रहने की अनेक स्मृतियां हैं। “करोगे याद तो हर बात याद आयेगी। “
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629

गुरुवार, जनवरी 03, 2019

नीरज जी के जन्मदिन पर याद करते हुए किसी की आँख खुल गयी किसी को नींद आ गयी


नीरज जी के जन्मदिन पर याद करते हुए
किसी की आँख खुल गयी किसी को नींद आ गयी

वीरेन्द्र जैन
इस नये साल में हिन्दी के लाड़ले गीतकार गोपाल दास नीरज जी हमारे बीच नहीं हैं। जो लोग जीवन से जुड़े रहते हैं उनके लिए मृत्यु की चर्चा कुछ अधिक सम्वेदनशील विषय होती है। नीरज जी ने अपने सम्पूर्ण गीत लेखन में मृत्यु का बहुत गहराई से चित्रण किया है। हिन्दी में पहला मृत्युगीत उन्होंने ही लिखा था। श्री मुकुट बिहारी सरोज, जिनका नीरज जी के साथ कवि सम्मेलनों में बहुत लम्बा वक्त गुजरा, एक संस्मरण सुनाते थे। यही कोई 1955- 60 का समय रहा होगा जब यह गीत लिखा गया था। बांदा में कवि सम्मेलन था और तब हर कस्बे में कवि सम्मेलन सुनने नगर के सब विशिष्ट व्यक्ति आया करते थे। वहाँ एक जज थे जो बहुत सख्त मिजाज माने जाते थे। वे न केवल अपने कर्तव्य निर्वहन में ही कठोर थे अपितु कविताओं पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं देते थे। विचार बना कि नीरज जी मृत्यु पर लिखा अपना ताजा गीत सुनाएं ताकि उनकी प्रतिक्रिया को आजमाया जा सके। जब नीरज जी का क्रम आया तो उन्होंने मृत्युगीत सुनाया जिसको सुनते ही वे जज महोदय सीधे उठ कर अपनी कार उठा चले गये। आशंकाग्रस्त कुछ लोगों ने उनका पीछा किया तो पाया कि वे एक पुलिया पर बैठ कर फूट फूट कर रो रहे हैं।
इस गीत की कुछ पंक्तियां देखिए-  
दृग सूरज की गर्मी से रक्तिम हो आए,
जीवन समस्त लाशों को ढ़ोते बीत गया,
पर मृत्यु तेरे आलिंगन के आकर्षण में,
छोटा सा तिनका भी पर्वत से जीत गया,
सागर असत्य का दूर दूर तक फैला है,
अपनों पर अपने बढ़कर तीर चलाते हैं,
पर काल सामने से है जब करता प्रहार,
हम जाने क्यों छिपते हैं क्यों घबराते हैं,
गोधुली का होना भी तो एक कहानी है,
जो शनैः शनैः ही ओर निशा के बढ़ती है,
दीपक की परिणति भी है केवल अंधकार,
कजरारे पथ पर जो धीरे से चढ़ती है,
मधुबन की क्यारी में हैं अगणित सुमन मगर,
जो पुष्प ओस की बूँदों पर इतराता है,
उसमें भी है केवल दो दिन का पराग,
तीजे नज़रों को नीचे कर झर जाता है,
बादल नभ में आ घुमड़ घुमड़ एकत्रित हैं,
प्यासी घरती पर अमृत रस बरसाने को,
कहते हैं सबसे गरज गरज कर सुनो कभी,
हम तो आए हैं जग में केवल जाने को,
पत्थर से चट्टानों से खड़ी मीनारों से,
तुम सुनते होगे अकबर के किस्से अनेक,
जब हुआ सामना मौत के दरिया से उसका,
वह वीर शहंशाह भी था घुटने गया टेक,
वह गांधी ही था जिसकी आभा थी प्रसिद्ध,
गाँवों गाँवों नगरों नगरों के घर घर में,
वह राम नाम का धागा थामे चला गया,
उस पार गगन के देखो केवल पल भर में,
मैं आज यहाँ हूँ इस खातिर कल जाना है,
अपनी प्रेयसी की मदमाती उन बाँहों में,
जो तबसे मेरी याद में आकुल बैठी है,
जब आया पहली बार था मैं इन राहों में,
मेरे जाने से तुम सबको कुछ दुख होगा,
चर्चा कर नयन भिगो लेंगे कुछ सपने भी,
दो चार दिवस गूँजेगी मेरी शहनाई,
गीतों को मेरे सुन लेंगे कुछ अपने भी,
फिर नई सुबह की तरुणाई छा जाएगी,
कूकेगी कोयल फिर अम्बुआ की डाली पर,
फिर खुशियों की बारातें निकलेंगी घर से,
हाँ बैठ दुल्हन के जोड़े की उस लाली पर,
सब आएँ हैं इस खातिर कल जाना है,
उस पार गगन के ऊँचे अनुपम महलों में,
मिट्टी की काया से क्षण भर का रिश्ता है,
सब पत्तों से बिखरे हैं नहलों दहलों में,
हम काश समर्पित कर पाएँ अपना कण कण,
रिश्तों की हर इक रस्म निभानी है हमको,
जीलो जीवन को पूरी तरह आज ही तुम,
बस यह छोटी सी बात बतानी है हमको।
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अब आँसू की आवाज न मैं सुन सकता हूं
अब देख न सकता मैं गोरी तस्वीरों को
अब चूम न सकता मैं अधरों की मुस्कानें
अब बाँध न सकता बाँहों की जंजीरों को
मेरे अधरों में घुला हलाहल है काला
नयनों में नंगी मौत खड़ी मुसकाती है
'है राम नाम ही सत्य, असत्य और सब कुछ '
बस एक यही ध्वनि कानों में टकराती है
[गीत बहुत लम्बा है]
  
    नीरज जी के ज्यादातर गीतों में कफन, शमशान, अर्थी, लाश, के शब्द विम्ब भी मृत्यु के साथ मिलते हैं,
कफन बढा तो किसलिए नजर ये डबडबा गयी
श्रंगार क्यों सहम गया बहार क्यों लजा गयी
न जन्म कुछ न मृत्यु कुछ, बस सिर्फ इतनी बात है
किसी की आँख खुल गयी, किसी को नींद आ गयी
या

जब चले जाएंगे लौट के सावन की तरह ,
याद आएंगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह |
दाग मुझमें है कि तुझमें यह पता तब होगा ,
मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह |
हर किसी शख्स की किस्मत का यही है किस्सा ,
आए राजा की तरह ,जाए वो निर्धन की तरह |
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और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे!
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नीरजतो कल यहाँ न होगा
उसका गीत-विधान रहेगा
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खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चांदनी 
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों! चाल बदलकर जाने वालों!
चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।
***************************************************
सोने का ये रंग छूट जाना है
हर किसी का संग छूट जाना है
और जो रखा हुआ तिजोरी में
वो भी तेरे संग नहीं जाना है
आखिरी सफर के इंतजाम के लिए
जेब इक कफन में भी लगाना चाहिए
****************************************
ऐसी क्या बात है चलता हूं अभी चलता हूं
गीत इक और जरा झूम के गा लूं तो चलूं
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जब न नीरज ही रहेगा क्या यहाँ रह जायेगा
इत्यादि । उनके लाखों लाख चाहने वाले थे और वे सबको डराते हुए 94 साल तक देश के कोने कोने में गीत गुंजाते हुए जिये। नीरज जी को जितना याद करते हैं, वे याद आते रहते हैं। सदियों तक याद आते रहेंगे। वे खुद ही कह गये हैं-
इतने बदनाम हुये हम तो इस जामाने में
तुमको लग जायेंगीं सदियां हमें भुलाने में
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629




रविवार, दिसंबर 30, 2018

श्रद्धांजलि ; शिवमोहन लाल श्रीवास्तव वह बाजी जीत कर चला गया


श्रद्धांजलि ; शिवमोहन लाल श्रीवास्तव



वह बाजी जीत कर चला गयाImage may contain: Shiv Mohan Lal Shrivastav, eyeglasses
वीरेन्द्र जैन
जिस बात के अनेक सिरे होते हैं तो समझ नहीं आता कि बात कहाँ से शुरू करूं। आज मेरे सामने भी यही मुश्किल है। मैं कम्प्यूटर और इंटरनैट से 2008 में जुड़ा, और लगातार इस बात का अफसोस रहा कि क्यों कम से कम पाँच साल पीछे रह गया। बहरहाल जब जुड़ा तो मेरे हाथ में कारूं का खजाना लग गया था। यही ऐसा उपकरण था जो मुझे चाहिए था। मेरा कीमती समय इतना इंटरनैट को अर्पित हो गया कि पुस्तकें और पत्रिकाएं पढने की आदत छूट गयी। इसी दौरान नैट पर एक ‘डैथ मीटर’ की साइट मिली। इसमें कुछ कालम भरने पर मृत्यु के वर्ष की घोषणा की जाती थी। इन कालमों में जन्मतिथि, लम्बाई, बजन, बाडी मास इंडेक्स, सिगरेट, शराब, तम्बाखू की आदतें, अब तक हो चुकी व साथ चलने वाली बीमारियां, आपरेशन, जाँच रिपोर्टों के निष्कर्ष, पैतृक रोग, मां बाप की मृत्यु के समय उम्र, आदि पचास से अधिक कालम थे और इस आधार पर मृत्यु के वर्ष की घोषणा की जाती थी। उत्सुकतावश मैंने भी उक्त कालम भरे और निष्कर्ष निकाला। मेरी मृत्यु का वर्ष 2018 निकला। मैं इससे संतुष्ट था क्योंकि अपेक्षाकृत अच्छी आदतों वाले मेरे पिता भी 65 वर्ष ही जिये थे।
शिवमोहन के जीवन और याद करने वाली घटनाओं पर अगर जाऊंगा तो यह टिप्पणी कभी खत्म ही नहीं हो पायेगी पर संक्षिप्त में बता दूं कि शिव के पिता और मेरे पिता न केवल परिचित लोगों में थे अपितु 25000 की आबादी वाले नगर दतिया में एक दौर के सुपरिचित बौद्धिक लोगों में गिने जाते थे। छोटे नगर में वैसे तो सब एक दूसरे को जानते ही हैं, पर मेरा शिवमोहन से निकट का परिचय तब हुआ जबकि मैं बीएससी करने के बाद शौकिया एमए कर रहा था और मेडिकल में प्रवेश से बहुत किनारे से चूकने के बाद पढाई के प्रति बिल्कुल भी गम्भीर नहीं था। हम लोगों का ना तो कोई भविष्य था और ना ही उसके प्रति कोई चिंता ही थी। मुझे पत्रकारिता व साहित्य आकर्षित करता था और एक दबी इच्छा थी कि पत्रिकाओं में लिख कर पहचान बनाऊं और उसके सहारे कवि सम्मेलनों के मंच से जीवन यापन लायक धन कमाऊं। कस्बाई राजनीति समेत नाम रौशन करने वाली हर गतिविधि में शामिल होने की कोशिश करता था, पत्र पत्रिकाएं पढता था और उनके सहारे मंच पर छोटा मोटा भाषण भी दे लेता था। धर्मनिरपेक्षता और नास्तिकता घर से मिली थी इसलिए जनसंघ को पसन्द नहीं करता था। वाम की ओर झुकाव वाली राजनीति पसन्द थी क्योंकि मैं हिन्दी ब्लिट्ज़ का नियमित पाठक था। चौराहे के होटल हम जैसे युवाओं के स्थायी अड्डे थे जहाँ पर राजनीतिक चर्चा के अलावा रेडियो पर क्रिकेट की कमेंट्री व बिनाका गीतमाला भी सुनी जाती थी। कभी किसी विषय पर कोई बयान दिया तो अखबार वाले ने मेरे नाम के साथ ‘छात्रनेता ने कहा’, लिख कर छापा तो अच्छा लगा। इसी काल में मेरी कुछ छोटी छोटी कविताएं भी राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में छप चुकी थीं और कवि गोष्ठियों में बुलाया जाने लगा था। शिवमोहन बड़े बड़े सुन्दर व स्पष्ट अक्षरों में लिखते थे और उनका गद्य हर तरह की पत्र पत्रिकाओं में खूब छपता था। मुझे उनसे ईर्षा होती थी। याद नहीं कि किस तरह हम दोनों का ही अहंकार टूटा और हम लोग साथ साथ बैठने लगे।
नगर में एक दो स्थानीय अखबार थे जो साप्ताहिक थे और नियमित भी नहीं थे किंतु दो तीन क्षेत्रीय अखबार आते थे। इनके हाकर ही इनके सम्वाददाता हुआ करते थे जो या तो जनसम्पर्क के प्रैसनोटों को ही सीधे भेज देते थे या किसी दूसरे से खबरें लिखवाते थे। कुछ ऐसा हुआ कि हम लोग उनकी खबरें लिखने लगे। इस काम का मेहनताना इस तरह वसूलते थे कि एकाध खबर अपने नाम की भी डाल कर खुश हो जाते थे। युवा थे इसलिए   मजे के लिए कुछ लड़कियों के शार्ट नाम भी उनमें जोड़ देते थे। खबर बनाने में मरने वाले सेलीब्रिटीज बहुत काम आते थे। इनकी कपोल कल्पित शोकसभा आयोजित होती थी जिसकी खबरों में अध्यक्षता कभी मैं करता था तो कभी शिवमोहन, कभी अवधेश पुरोहित तो कभी अशोक खेमरिया। इस तरह हम लोगों के नाम अखबार में छपा करते थे। नगर के सब महत्वपूर्ण लोग हम लोगों के नाम से परिचित हो चुके थे। इतना ही नहीं हम लोग अपने नाम के आगे कुछ विशेषण भी लगाते रहते थे।
वक्त बीता मैं बैंक की नौकरी पर निकल आया और शिवमोहन स्कूल टीचर होते हुए स्कालरशिप पर रूस चले गये। वहाँ से लौट कर फिर सेंट्रल गवर्नमेंट में राजभाषा अधिकारी होते हुए भिलाई, रावतभाटा [राजस्थान], शिवपुरी, इन्दौर, कलप्पकम [तामिलनाडु] हैदराबाद में डिप्टी डायरेक्टर आफीसियल लेंगवेज के पद से स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ली। उसके लिखे हुए पत्रों और प्राप्त पत्रों की संख्या लाखों में होगी और उसी तरह हर स्तर के विशिष्ट व सामान्य व्यक्तियों से उनके परिचय का दायरा देश विदेश में फैला हुआ है। लेखक, पत्रकार, सम्पादक, संयोजक, मंच संचालक, विदेशी भाषा के ज्ञाता, सामाजिक कार्यकर्ता, ज्योतिषी, से लेकर सनकी, झगड़ालू, मुँहफट आदि अनेकानेक विशेषण उनके साथ लगते रहे हैं। एक अध्यापिका से प्रेमविवाह किया जो पंजाबी हैं, बड़ी संतान बेटी जो आस्ट्रेलिया पढने गयी तो वहीं की होकर रह गयी, बेटे ने कोई नौकरी नहीं करना चाही तो फ्रीलाँस है। उन्होंने भी यायावरों की तरह मनमर्जी का जीवन जिया तो कभी दतिया, कभी इन्दौर, कभी भोपाल, कभी विशाखापत्तनम, कभी हैदराबाद पड़े रहे। ज्योतिष और तंत्र में भरोसा न होने पर भी उसकी प्रैक्टिस करते रहे और बड़े बड़े लोग उनके क्लाइंट रहे। [बाद में हम लोग उन नासमझों पर हँसते भी रहे] उनके सोते सोते दुनिया छोड़ देने तक पूरा जीवन घटना प्रधान रहा।
अब भूमिका की बात। जब मैंने उनसे कहा कि मेरा डैथ मीटर बोल रहा है कि मैं 2018 में नहीं रहूंगा तो मेरा श्रद्धांजलि लेख तुम्हें लिखना होगा। वे कहते कि मैं उम्र में तुम से बड़ा हूं इसलिए मेरा श्रद्धांजलि लेख तुम्हें ही लिखना होगा। 2018 शुरू होते ही जब फोन पर या चैटिंग से बात होती थी तब वे याद दिलते थे कि अठारह चल रहा है। मैं कहता था कि अभी बीता तो नहीं है, और फिर यह तो एक बिना जाँचा परखा कैलकुलेशन है कोई तुम्हारा ज्योतिष तो नहीं है कि इसमें विद्या की बेइज्जती हो जायेगी।  
शिवमोहन मेरे जीवन का एक हिस्सा थे। सच तो यह है कि वे साहित्यकार नहीं थे अपितु साहित्यिक पत्रकार थे। वे उत्प्रेरक थे। उन्होंने कविता कहानी व्यंग्य आदि में हाथ जरूर आजमाया होगा किंतु उसे मान्यता नहीं मिली। किंतु उन्होंने विभिन्न विषयों पर खूब लेख लिखे, खूब छपे और साहित्य की मुख्यधारा में बने रहे। उनका जीवन लगातार उन संघर्षों में बीता जिन्हें वे खुद आमंत्रित करते थे। गालिब के शब्दों में –
मेरी हिम्मत देखिए, मेरी तबीयत देखिए
जब सुलझ जाती है गुत्थी, फिर से उलझाता हूं मैं
यही उनकी भी प्रकृति थी।
विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए वादा करता हूं कि समय मिलने पर उनके जीवन के बारे में भी जरूर लिखूंगा। 
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629
  


रविवार, दिसंबर 16, 2018

म.प्र. में शिवराज के एकाधिकार का टूटना


म.प्र. में शिवराज के एकाधिकार का टूटना
वीरेन्द्र जैन

गत विधानसभा चुनावों में भाजपा सरकारों का पतन न केवल मोदी-शाह के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को रोका जाना है अपितु इस पराजय के कई आयाम हैं और दूरगामी परिणाम होंगे। इन चुनाव परिणामों से न केवल मोदी-शाह की अलोकतांत्रिकता आहत हुयी है अपितु उनके अहंकार पर गहरी चोट हुयी है। इनमें से म.प्र. में सबसे ज्यादा नुकसान शिवराज सिंह के एकाधिकार का हुआ है।
उल्लेखनीय है कि शिवराज सिंह को नेतृत्व मध्य प्रदेश भाजपा के कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री सुन्दरलाल पटवा के परम प्रिय शिष्य होने के कारण विरासत में मिला था। जब श्री पटवा अस्वस्थ होकर लकवाग्रस्त हो गये तो प्रदेश के नेतृत्व में उनकी दावेदारी पर प्रश्नचिन्ह लग गया, भले ही वे कहते रहे कि मैं स्वस्थ हो रहा हूं। इसी दौरान उन्होंने अपना राजनीतिक वारिस शिवराज को घोषित किया और केन्द्रीय नेतृत्व को उनके स्थान पर नेतृत्व सौंपने का सुझाव दिया। भले ही भाजपा संगठन को संघ के समर्पित कार्यकर्ताओं द्वारा संचालित किये जाने के कारण पहले कैडर वाली पार्टी माना जाता रहा हो किंतु सत्ता का स्वाद लगते ही वह काँग्रेस कल्चर की पार्टी बन चुकी थी। तमाम तरह की राजनीतिक अनियमितताओं के लिए सर्वाधिक बदनाम इस पार्टी को इसके नियंत्रक संघ ने कभी नहीं टोका, क्योंकि किसी भी तरह से मिली सत्ता उनके लक्ष्यों को पूरा करने में मददगार थी। यही कारण रहा कि सबसे पहले, सर्वाधिक दल बदल कराने वाली तथा सैलीब्रिटीज को चुनाव में स्तेमाल करने वाली पार्टी भाजपा ही रही। इसी पार्टी ने चुनावों में धन के स्तेमाल से सत्ता हथियाने की शुरुआत की। इसी तरह पद व सत्ता के लिए आपसी मतभेद और चुनावों में भितरघात भी शुरू हो गया था। जब पटवा जी के गुट ने शिवराज को प्रदेश अध्यक्ष के पद पर बैठाना चाहा तो विक्रम वर्मा की दावेदारी ने चुनौती दी थी व शिवराज सिंह के साथ विधिवत चुनाव हुये थे। इस चुनाव में शिवराज हार गये थे।  
2003 के विधानसभा चुनाव का सीधा सामना करने में काँग्रेस के धुरन्धर नेता दिग्विजय सिंह के सामने भाजपा खुद को कमजोर पा रही थी क्योंकि उसके पास उस कद का कोई प्रादेशिक नेता नहीं था। यही कारण था कि उन्होंने साध्वी के भेष में रहने वाली तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री पर दाँव लगाया, जो खुद भी अपना पद छोड़ कर नहीं आना चाहती थीं। उन्होंने नानुकर करने के बाद केन्द्रीय नेतृत्व के सामने अनेक शर्तें रखीं जिनमें से एक थी कि अधिकतम टिकिट वितरण में उनकी मर्जी ही चलेगी। विवश और नाउम्मीद नेतृत्व ने उनकी यह शर्त मान ली। उल्लेखनीय है कि सुश्री उमा भारती का सुन्दरलाल पटवा और उनके समर्थकों से सदैव छत्तीस का आंकड़ा रहा था इसलिए उन्होंने सुनिश्चित पराजय वाली सीट पर दिग्विजय सिंह के खिलाफ शिवराज सिंह को चुनाव लड़वाना तय किया जिससे एक तीर से दो शिकार किये जा सकें। शिवराज सिंह चुनाव हार गये।
बाद के घटनाक्रम में जब उमा भारती को हुबली कर्नाटक के ईदगाह मैदान पर जबरन झंडा फहराने और परिणामस्वरूप हुये गोलीकांड में सजा सुनायी गयी तो भाजपा नेतृत्व ने इसे एक अवसर के रूप में लिया और उनसे स्तीफा लेने में किंचित भी विलम्ब नहीं किया। यद्यपि उमाभारती ने नेतृत्व के आदेश के खिलाफ पर्याप्त देर की और जमानत के प्रयास करती रहीं, जब जमानत नहीं मिली तो केन्द्र ने अरुण जैटली के साथ शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री चुनने के प्रस्ताव के साथ भेजा था, पर उमा भारती ने साफ इंकार कर दिया व वरिष्ठ और सरल श्री बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री चुनवा दिया जिन्होंने उनसे वादा किया था कि अवसर आने पर, उमा भारती के पक्ष में वे अपना पद छोड़ने में किंचित भी देर नहीं करेंगे। शिवराज सिंह को एक बार फिर मायूस होकर वापिस लौटना पड़ा था। बाद में कर्नाटक की काँग्रेस सरकार ने कूटनीति से सम्बन्धित मुकदमा वापिस ले लिया व उमा भारती अपनी छोड़ी हुयी सीट वापिस पाने के लिए उतावली हो गयीं, पर अब मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर केन्द्रीय नेतृत्व के निर्देश पर काम कर रहे थे, जिसने उन्हें पद छोड़ने से साफ रोक दिया था। उमाजी ने तरह तरह से दबाव बनाना शुरू किया,  तिरंगा यात्रा निकाली पर दबाव नहीं बना। फिर उन्होंने सरकार की आलोचना शुरू कर दी तो नेतृत्व ने सरकार बदलना तय कर दिया। अबकी बार उन्होंने शिवराज सिंह को जबरदस्ती थोप दिया जबकि उमा भारती लोकतंत्र की दुहाई देते देते विधायकों के मत लेने की बात करती रहीं। वे बैठक से बाहर भागीं पर उनके साथ कुल ग्यारह विधायक बाहर आये और अंततः कुल चार रह गये। उन्होंने रामरोटी यात्रा निकाली और अलग पार्टी के गठन की घोषणा कर दी। विधायक सत्ता के साथ ही रहे क्योंकि उमा भारती पर से केन्द्रीय नेतृत्व का वरद हस्त हट चुका था। नियमानुसार छह महीने के अन्दर शिवराज सिंह को विधायक का चुनाव लड़ना पड़ा और कई तरह की चुनौतियों को देखते हुए उन्होंने जिलाधिकारी से इतने पक्षपात कराये कि चुनाव आयोग को चुनाव स्थगित करना पड़ा व जिलाधिकारी को स्थानांतरित करना पड़ा। इस सब घटनाक्रम में शिवराज को केन्द्रीय नेतृत्व का समर्थन मिलता गया व अलग पार्टी बना चुकी उमा भारती खलनायक बनती गयीं। 2008 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने समुचित संख्या में उम्मीदवार उतारे और बारह लाख वोट लेकर भाजपा को यथा सम्भव नुकसान पहुँचाया, भले ही उनके कुल पाँच विधायक जीत सके। उमा भारती को हराने के लिए शिवराज ने पार्टी और सरकार की पूरी ताकत झौंक दी थी और चुनाव जीतने के लिए अपनाये जाने वाले सारे हथकण्डे अपनाये जिसके परिणाम स्वरूप वे खुद भी चुनाव हार गयी थीं। चुनाव प्रचार के दौरान उन पर असामाजिक तत्वों ने हमला भी किया था व उन्हें एक मन्दिर में छुपना पड़ा था। वहाँ से उन्होंने फोन कर के प्रैस को बताया था कि शिवराज के इशारे पर उनकी जान लेने की कोशिश की गयी थी। इसके बाद वे हिम्मत हार गयी थीं और उन्होंने भाजपा में वापिस आने के तेज प्रयास शुरू कर दिये थे। किंतु उतनी ही तेजी से शिवराज ने उनकी वापिसी का विरोध भी शुरू कर दिया था। उन्होंने कहा था कि उनकी वापिसी के साथ ही वे अपने पद से त्यागपत्र दे देंगे। यह मामला दो साल तक लटका रहा। उमा भारती बाबरी मस्जिद टूटने के प्रकरण में संयुक्त अभियुक्त हैं और उनका अलग होना संघ अपने परिवार के हित में नहीं देखता इसलिए उसने दबाव डाल कर वापिसी का यह फार्मूला तैयार किया कि उमा भारती मध्य प्रदेश में प्रवेश नहीं करेंगीं। उन्हें उत्तर प्रदेश से विधायक का चुनाव लड़वाया गया और जीत की व्यवस्थाएं की गयीं। वे मुख्यमंत्री रह चुकी थीं इसलिए उन्हें उ.प्र. में मुख्यमंत्री प्रत्याशी भी घोषित किया गया।
शिवराज ने एकाधिकार का महत्व समझ लिया था इसलिए अपनी राह के सारे कांटे दूर करना शुरू कर दिये थे। कैलाश विजयवर्गीय सबसे बड़े प्रतिद्वन्दी थे। एक समय तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी जान को खतरा बताया था और राजनीतिक पंडितों के अनुसार उनका इशारा कैलाश विजयवर्गीय की ओर ही था। केन्द्रीय नेतृत्व ने धीरे से उन्हें मध्य प्रदेश से हटा लिया और पार्टी महासचिव बना कर प्रदेश की राजनीति से दूर कर दिया। इसी तरह दिन में सपने देखने लगे तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा को भी अचानक पद मुक्त करवा कर  अपने निकटस्थ नन्द किशोर चौहान को बैठा दिया। प्रभात झा की तरह ही अरविन्द मेनन को भी झटके के साथ संगठन के पद भार से मुक्त कर दिया गया। अब सब शिवराज की कठपुतलियों के हाथ में था। मीडिया को विज्ञापनों से इस तरह से पाट दिया गया था कि प्रदेश में व्यापम जैसा कांड हो या पेटलाबाद जैसा विस्फोट, बड़वानी का आँख फोड़ने वाला कांड हो या मन्दसौर का गोलीकांड सब दब कर रह गये। विज्ञापनों में भी शिवराज का इकलौता चेहरा ही उभरता हुआ नजर आता था। किसानपुत्र, मामा, बेटी बचाओ, कन्यादान, कुम्भ, नर्मदा, तीर्थयात्रा, आशीर्वाद यात्रा, आदि आदि सब व्यक्ति केन्द्रित होता जा रहा था। यहाँ तक कि चुनाव प्रचार सामग्री में भी अटल अडवाणी तो क्या मोदी और शाह को भी दूर रख कर ‘ हमारा नेता शिवराज’ का नारा उछाला गया था।
तय है कि चुनाव में पराजय के बाद उनका यह कहना कि मैं कहीं नहीं जाऊंगा, यहीं रहूंगा, यहीं जिऊंगा, यहीं मरूंगा, स्वाभाविक ही है किंतु पद के साथ मिलने वाला समर्थन और सहयोग अब नहीं मिलेगा। सारे विरोध सामने आने लगेंगे। सबके सत्ता सुख छिन जाने का दोष भी अब अकेले झेलना होगा। आभार यात्रा के दो चार कार्यक्रमों की असफलता ही आइना दिखा देगी। यह बात अलग है कि अडवाणी, सुषमा गुट का यह नेता सैकड़ों अन्य मोदी शाह जैसे भाजपा नेताओं की तुलना में अच्छा था।
वीरेन्द्र जैन
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