शुक्रवार, दिसंबर 12, 2014

जन्मशताब्दी वर्ष पर विशेष ख्वाज़ा अहमद अब्बास राजनीतिक कटाक्ष के मेरे पहले शिक्षक थे



जन्मशताब्दी वर्ष पर विशेष
ख्वाज़ा अहमद अब्बास राजनीतिक कटाक्ष के मेरे पहले शिक्षक थे
वीरेन्द्र जैन 

       दतिया में 1952 के आसपास मेरे पिता के पास एक पड़ोसी युवक आया था जिसने उनसे रोजगार के लिए सलाह माँगी थी व उसकी योग्यता और क्षमताओं तथा खुद की रुचियों को देखते हुए उन्होंने उसे समाचारपत्र की एजेंसी लेने की सलाह दी थी। इसका परिणाम यह हुआ था कि उसकी एजेंसी में प्रारम्भ होने वाला प्रत्येक नया अखबार या पत्रिका सम्भावनाओं के परीक्षण के लिए मेरे पिता के पास आती थी। बच्चों की पत्रिका पराग आयी तो उसके प्रवेशांक से ही हम लोगों को मिल गयी थी जिसे मैंने और मेरी बहिन ने चौथी पाँचवीं कक्षा के छात्र रहते हुए ही पढना शुरू कर दिया था। यही हाल 1961 या 1962 में प्रारम्भ हुये हिन्दी ब्लिट्ज़ का हुआ जब मैं नौंवी दसवीं कक्षा का छात्र ही था। हिन्दी ब्लिट्ज़ में आखिरी पन्ने पर ख्वाज़ा अहमद अब्बास का स्तम्भ आज़ाद कलम के नाम से प्रकाशित होता था जिसे मैं सबसे पहले अनिवार्य रूप से पढने लगा। तब हमें यह भी पता नहीं था कि ख्वाज़ा अहमद अब्बास कौन हैं और उनका फिल्मों से भी कोई नाता है। उस समय तक मैं यह तो जान चुका था कि मेरे पिता रूढियों के विरोधी और प्रगतिशील हैं पर उनके बामपंथी भी होने का भी पता मुझे नहीं था। हिन्दी ब्लिट्ज़ मेरे घर कई वर्षों तक आता रहा और मैं एकलव्य की तरह ख्वाज़ा अहमद अब्बास से प्रशिक्षित होता रहा। कभी कभी तो मैं समाजशास्त्र की कक्षा में भी ऐसी टिप्पणी कर देता था जिससे मेरे सहपाठियों के अलावा अध्यापक भी परेशान हो जाते थे। इसके पीछे ब्लिट्ज़ में ख्वाज़ा अहमद अब्बास के स्तम्भ की खास भूमिका होती थी।
       1962 में भारत चीन सीमा विवाद जब युद्ध में बदल गया था तब की घटना है कि हैदराबाद के निज़ाम के पास जब लोग राष्ट्रीय रक्षा कोष के लिए सहयोग माँगने गये तो करोड़ों अरबों की ज़ायज़ाद के मालिक निज़ाम ने यह कह कर सहयोग देने से मना कर दिया था कि उनके पास कुछ नहीं है इसलिए वे कुछ नहीं दे सकते। उल्लेखनीय है कि वे हैदराबाद रियासत के विलय से असंतुष्ट थे। इस खबर के बाद एक पोस्टमैन ने उन्हें पाँच रुपये का मनिआर्डर भेजते हुए लिखा था कि आपके पास कुछ नहीं है तो इससे काम चलाइए। अब्बास जी ने कटाक्ष में इस पर एक रोचक दृष्य सृजित किया था कि कैसे इस पाँच रुपये के मनिआर्डर आने के बाद बेगमों ने उससे राशन नमक सब्जी आदि मँगायीं और भूखे बच्चों का पेट भरा। उनके इस व्यंग्य ने न केवल मुझे गहरे में प्रभावित किया था अपितु धर्मनिरपेक्षता का भाव मजबूत हुआ था। मैं लगभग एक दशक तक लगातार ब्लिट्ज़ का पाठक बना रहा और राजनीति में कटाक्ष करना सीखता रहा जो बाद में कृष्ण चन्दर और हरिशंकर परसाई के लेखन से और मजबूत हुआ। इसी बीज के सहारे मैंने 1977 से 1980 के बीच ब्लिट्ज़ और करंट में खुद भी व्यंग्य रचनाएं लिखीं।
       जब फिल्मों और कलाकारों के बारे में पढने का मौका मिला तब पता चला कि ख्वाज़ा अहमद अब्बास न केवल राजकपूर की अधिकांश फिल्मों के लेखक ही हैं अपितु खुद भी निर्माता निर्देशक बगैरह भी हैं। तब तक मैं कम्युनिष्टों को पसन्द करने लगा था व इस सूचना ने कि वे कम्युनिष्ट हैं, मेरे मन में उनके प्रति सम्मान की भावना और बढ गयी थी। उनकी फिल्में सौद्देश होती थीं और सबसे कम खर्च में बना करती थीं। वे फिल्म बनाने से पहले अपने ढेर सारे मित्रों में से कुछ को सूचना देते थे जो उन्हें पाँच पाँच सौ रुपये भेज देते थे। इस तरह एकत्रित राशि से वे फिल्म बनाते थे तथा फिल्म बिक जाने के बाद सबको उनकी राशि वापिस कर देते थे। आज के राजनीतिक समय में आँखें खोलने वाले क्या कल्पना कर सकते हैं अमिताभ बच्चन जैसे कथित महानायक को सात हिन्दुस्तानी में सबसे पहले अवसर देने वाले अब्बास देश की स्वतंत्रता के महानायक जवाहरलाल नेहरू, रूस के राष्ट्रपति निकिता ख्रुश्चेव के भी मित्र थे पर न तो उन्होंने कभी कोई कार खरीदी और न ही बंगला। सादगी से रहने वाले अब्बास, अपनी जरूरतों से ज्यादा कमाने और जोड़ने के पागलपन में कभी नहीं पड़े। उन दिनों बलराज साहनी, चेतन आनन्द, गुरुदत्त, पृथ्वी राज कपूर, साहिर, मजरूह, शैलेन्द्र, कैफी आज़मी, अली सरदार ज़ाफरी, ए के हंगल, जैसे प्रगतिशील लोगों से फिल्मी दुनिया सम्पन्न थी। इस दुनिया में उन्हें इतना सम्मान प्राप्त था कि जब उन्होंने बालीवुड की पहली बहुसितारा फिल्म ‘चार दिल चार राहें’ बनायी तो उसमें पृथ्वीराज कपूर, मीना कुमारी, राज कपूर, निम्मी, शम्मी कपूर, जैसे उस दौर के नामी सितारों ने लगभग मुफ्त में काम किया। उन्होंने ‘नीचा नगर’ ‘धरती के लाल’ ‘डा. कोटनीस की अमर कहानी’ ‘बम्बई रात की बाँहों में’ ‘सात हिन्दुस्तानी’ ‘नक्सलाइट’ जैसी फिल्में भी बनायीं
       अपने 73 वर्षीय जीवन के 50 साल उन्होंने लेखन, पत्रकारिता, फिल्म निर्देशन, आदि में लगाये और 73 किताबें लिखीं। उन्होंने लगभग 60 फिल्मों का लेखन व निर्देशन किया जिनमें सुप्रसिद्ध शोमैन राजकपूर की बहुत सारी फिल्में हैं। उनके द्वारा राजकपूर के लिए लिखी गयी फिल्म ‘आवारा’ को अंतर्राष्ट्रीय सफलता मिली तो उससे सामाजिक प्रतिबद्धता के सिनेमा को मान्यता मिली और यह एक ऎतिहासिक फिल्म बन गयी। उल्लेखनीय है कि महबूब खान जैसे फिल्म निर्मात निर्देशक इस फिल्म को बनाने की हिम्मत नहीं जुटा सके थे।    
       सात जून 2014 को उनके जन्म को सौ वर्ष पूरे हो चुके हैं। वे ऐसे नींव के पत्थर हैं जिन पर फिल्मी दुनिया की कई कुतुब मीनारें आज भी रोशन हैं। हिन्दी में जब तक सोद्देश्य सिनेमा रहेगा , तब तक ख्वाजा अहमद अब्बास का नाम भुलाया नहीं जा सकता। गत 27 वर्षों से उनके प्रशंसक उनके जन्मदिन पर जुहू की उसी गली में एकत्रित होते हैं जहाँ वे रहते थे। उनके संकल्प को देखते हुये कहा जा सकता है कि यह सिलसिला तब तक तो चलेगा ही चलेगा जब तक उनको देखने वाला एक भी व्यक्ति शेष रहेगा।
वीरेन्द्र जैन                                                                          
2 /1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल म.प्र. [462023]
मोबाइल 9425674629
       

शनिवार, दिसंबर 06, 2014

निरंजन ज्योति प्रकरण – भाषा की साम्प्रदायिकता के सवाल

गुरुवार, दिसंबर 04, 2014

विवाह समारोहों में भाग लेने की सीमा



विवाह समारोहों में भाग लेने की सीमा
वीरेन्द्र जैन   
       एक विवाह समारोह में भाग लेकर लौटा हूँ। विवाह एक ऐसे रिshshश्ते के परिवार में था कि जाना अनिवार्य था। रिश्ते के विवाह समारोहों में जाने के लिए एक मजबूरी यह भी होती है कि उन्होंने हमारे परिवार की शादी में जो उपहार दिये थे उन्हें लौटाना होता है। न जाने का मतलब बेईमानी माना जाता है। आयोजन दूसरे नगर में था जो बस मार्ग से सीधा नहीं जुड़ा है। दूरी दो सौ किलोमीटर। एक स्टेशन पर जाने के बाद दूसरी लाइन की ट्रेन पकड़नी होती है। पहली ट्रेन लेट हो जाने पर आठ घंटे बाद दूसरी मिलती है। पहली दूरी कुल नब्बे किलोमीटर है जिसके लिए आरक्षण के डिब्बे में बैठना और आरक्षण लेना मॅंहगा पड़ता है व उपलब्ध नहीं होता। नब्बे किलोमीटर जनरल डिब्बे में जानवरों की तरह धॅंस कर जाना पड़ा। बारह चौदह घन्टे की शादी समारोह के लिए ज्यादा कपड़े ले जाना भी उचित नहीं लगा था इसीलिए शादी में पहिने जाने वाले कपड़े ही पहिन कर निकले थे जो भीड़ में रूंध रहे थे और बड़ी कोफ्त हो रही थी। गाड़ी लेट भी थी जिससे उसके छूट जाने की धुकधुकी भी लगातार बनी हुयी थी। बहरहाल दौड़ते भागते गाड़ी मिल गयी। गंतव्य तक पहॅंचने के बाद विवाह स्थल को तलाशने और उस तक पहॅंचने में भी समुचित समय लगा। बारात निकलने की तैयारी में थी। एक एक कमरे में दस दस बीस बीस लोग भरे थे। गनीमत थी कि कमरे के साथ बाथरूम संलग्न था पर दस लोगों के दबाव के आगे वह बेवश था। सोचा तो था हाथ मुँह धो लेंगे पर मेरा नम्बर आने तक पानी समाप्त हो चुका था। धर्मशालानुमा उस होटल का मैनेजर नीचे ही कह रहा था कि उसने पानी कम स्तेमाल करने के बारे में पहले ही बता दिया था। बोर में पानी कम रह गया है और वह कोशिश कर रहा है कि उपलब्ध पानी टंकी में चढ जाये।  जिस परिवार में विवाह था उसका मुखिया बदहवास सा दौड़ भाग कर रहा था, उसे बात करने की फुरसत नहीं थी। मेरे कमरे में रूके दूसरे लड़के बारात निकलने से पहले शराब का सेवन करना चाहते थे जो कि आजकल बारात की एक रस्म जैसी हो गयी है, पर मेरे वहॉं होने से असुविधा सी महसूस कर रहे थे। मैं उठ कर बाहर हाल में बैठ गया। बारात सड़क पर बेतरतीब धमाचौकड़ी मचाती हुयी वैसी ही निकली जैसी कि बारातें कानफोड़ू शोर के साथ निकलती हैं जिनमें गरीबों के छोटे छोटे बच्चे नंगे पैर लाइट के भारी भारी हंडे उठाये चल रहे थे। मैं आगे निकल कर सीधे विवाहस्थल तक पहुँच गया। वहॉं भी विद्युत की समुचित सजावट थी पर तथाकथित संगीत थोड़ा धीमा था। बारात वैसे ही आयी और वही सब कुछ हुआ जैसा कि आम बारातों में होता है। बस दूल्हा दुल्हन नये थे। उनके चेहरों पर कास्मेटिक्स के प्रयोग तो भरपूर थे पर वह पुरानी ललक पुलक का भाव नदारद था। बारातियों का स्वागत धन की चकाचौंध और रेडीमेड खाद्य वस्तुओं से हो रहा था पर उसमें स्वागत भाव अब नहीं होता सो यहॉं भी नहीं था। फिर सारे लोग बफे भोजन पर टूट पड़े। लाइन और अनुशासन का तो सवाल ही नहीं था। अपने अपने भिक्षापात्र लिए सब सरवाइबिल आफ फिटेस्ट का नजारा पेश कर रहे थे। महिलाएं सर्वाधिक अनुशासनहीन थीं व सबसे अधिक भीड़ आइसक्रीम काउन्टर पर थी। ज्यादातर सम्पन्न मध्यमवर्गीय परिवार के लोग थे पर मुफ्त के माल का स्वाद ही कुछ और होता है। अपने उपहार देने का मुख्य कार्यक्रम पूरा कर मैंने मुक्ति की सॉंस ली व सीधे स्टेशन आ गया। राहत सी मिली।
      इस पूरे आयोजन में न मेरा कहीं आनन्द था और न ही मेजबान का। न यात्रा का, न भोजन, न संगीत, और न ही मेहमानी का। आखिर हम इस औपचारिकता को कब तक और क्यों ढोयें? मैंने तय कर लिया है कि भविष्य में जब तक अपना या मेजबान का आनन्द नहीं महसूस करूंगा, मैं किसी दूर के विवाह समारोह में भाग नहीं लूंगा। संचार के साधनों से बधाई देते हुए उपहार की देय राशि में किराये की राशि जोड़ कर भेजना दोनों पक्षों को प्रीतिकर लगेगा।
वीरेन्द्र जैन                                                    
2 /1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल म.प्र. [462023]
मोबाइल 9425674629
 

मंगलवार, दिसंबर 02, 2014

रामपाल प्रकरण का दूसरा आयाम



रामपाल प्रकरण का दूसरा आयाम
वीरेन्द्र जैन

       पता नहीं कि इसे सौभाग्य कहा जाये या दुर्भाग्य कि जब देश में मीडिया की संख्या बहुत बढ गयी है तब उसकी गुणवत्ता उतनी ही घटती जा रही है। जिसे जनता की आवाज़ बनना था वह मुख्यधारा का मीडिया सरकारों का भौंपू बन कर रह गया है, जिसमें वही सब कुछ वैसे ही आता है जैसा कि शासन तंत्र प्रकट करना चाहता है।
       पिछले दिनों पूरे देश ने प्रिंट और विजुअल मीडिया पर कथित संत रामपाल की कहानी देखी और यह प्रभाव ग्रहण किया कि नित्यानन्द, आसारामों की तरह ही एक और बाबा की पोल खुल गयी है। लोगों को बताया गया कि जिस आश्रम में घटना घटित हुयी उसके बारह एकड़ क्षेत्रफल को सोलह फीट ऊंची बाउंड्री वाल से घेरा गया था, जिसमें ढेर सारे हथियार, दो तीन ट्राली लाठियां, पैट्रोल बम व प्रशिक्षित कमांडो थे। वहाँ दस से पन्द्रह हजार लोगों को जिनमें औरतें और बच्चे भी शामिल थे, सुरक्षा ढाल बनाने के लिए जबरन रोका गया था। आश्रम में भोजन पानी और ईँधन का समुचित भंडार था, जहाँ सबको निःशुल्क भोजन मिलता था। बाबा का निवास, रहन सहन की सभी तरह के आरामदायक कीमती सामानों और साजसज्जा से युक्त था। इस वातानुकूलित भवन में विशाल स्वीमिंग पूल भी निर्मित है। वहाँ बुलेट प्रूफ कीमती कारें तथा तेल का टैंकर भी था। आश्रम में सभी तरह की जाँच सुविधाओं से युक्त एक चिकित्सालय भी था जहाँ से एक प्रिगनेंसी जाँच किट भी मिली है। मीडिया ने यह भी बताया कि आधुनिकतम कोडों से खुलने वाली कई कीमती तिजोरियां भी मिलीं और एक बंकर या सुरंगनुमा संरचना भी मिली है। यह भी बताया गया कि वहाँ के सैकड़ों ब्लेक कैट कमांडो को नक्सलवादियों ने प्रशिक्षित किया है। आश्रम का संत रामपाल हत्या के एक प्रकरण में लगातार कोर्ट के बुलावे की उपेक्षा कर रहा है और अदालत ने उसे किसी भी हालत में पकड़ लाने के लिए आदेश दिये थे। उसकी गिरफ्तारी अदालत के कठोर आदेश के परिपालन में तीस हजार सुरक्षा बलों को लगाना पड़ा जिसमें 26 करोड़ रुपयों से अधिक खर्च हुये। लगभग एक सप्ताह चली तनातनी के बीच छह लोगों की मृत्यु हो गयी जिनमें पाँच महिलाएं व एक बच्चा शामिल है। इतना सब जान कर कोई भी नफरत और गुस्से से भर उठेगा।  
       इसके समानांतर इस पूरी घटना का एक दूसरा आयाम भी सामने आया है जो भले ही आश्रमों की अकूत आमदनी के श्रोत का जबाब तो नहीं देता पर ऐसा जरूर लगता है कि सच इकतरफा नहीं है अपितु कहीं बीच में है। रामपाल ने हरियाना सरकार में जूनियर इंजीनियर की नौकरी छोड़ कर संत बनना चुना था जिसका मतलब है कि वे संतई का धन्धा करने वाले अन्य कई लोगों की तरह निरक्षर और अपढ नहीं हैं, तथा रोजगार के विकल्प के रूप में संतई को नहीं चुना था। सूत्र बताते हैं कि उनकी नौकरी के रिकार्ड में भी ऐसी कोई खराबी नहीं थी जिससे बचने के लिए उन्होंने यह मार्ग अपनाया हो। आम तौर पर धर्म का धन्धा करने वाले परम्परागत धर्म व देवी-देवताओं की बहती धारा में अपनी नाव डालकर ही अपना स्थान बनाते हैं और नई जमीन तोड़ने का खतरा मोल नहीं लेते पर रामपाल ने कबीर पंथ को अपनाया जिसके मानने वाले लोग न के बराबर हैं और न्यूज चैनलों की बहस से पता चला कि इस पंथ के जो पुराने मठ हैं वे उन्हें मान्यता नहीं देते । आम तौर पर धर्म का धन्धा करने वाले किसी भी धर्म के विचारों के साथ सीधे टकराव से बचते हैं, पर रामपाल ने आर्य समाज और दयानन्द सरस्वती के खिलाफ पुस्तक लिखी जिस कारण आर्यसमाजियों की बड़ी जनसंख्या, और खाप पंचायतों वाले हरियाणा में उनका विरोध हुआ जो बाद में हिंसक भी हो गया। उनके ऐसे ही उदार आचरण ने उनका व्यक्तिगत विरोध आमंत्रित किया और इसी कारण करोन्था आश्रम वाली दान की जमीन पर विवाद हुआ था जिसमें किसी व्यक्ति की मृत्यु हो गयी थी व हत्या के आरोप में रामपाल को अभियुक्त बनाया गया था व गिरफ्तार भी किया गया था।
       घटनाक्रम के अनुसार 2006 में रामपाल को करोंथा आश्रम में हजारों की भीड़ ने घेर लिया था व उनके चार हजार अनुयायी भी घिरे हुये थे। गिरफ्तार करने के लिए विशेष रूप से भेजे गये वरिष्ठ पुलिस अधिकारी विकास नारायण राय उस अवसर की गम्भीरता बताते हुये लिखते हैं कि हिंसक भीड़ ने न केवल पत्थरबाज़ी की थी अपितु वे लोग आश्रम में घुसने की कोशिश भी कर रहे थे। इसी डर में अन्दर से गोली चलायी गयी थी जिसमें एक आदमी की मौत हो गयी थी। इस कारण और ज्याद गुस्साई भीड़ द्वारा डिवीजन के कमिश्नर और पुलिस अधीक्षक भी घेर लिये गये थे। भीड़ की उग्रता देखते हुए पुलिस पार्टियां भेज पाना भी सम्भव नहीं हो पा रहा था। अगर उस दिन रामपाल को नहीं निकाला जाता तो एक बड़े जानलेवा हमले का आह्वान था। श्री राय जो रोहतक में पदस्थ रह चुके थे व वहाँ के प्रमुख लोगों का विश्वास उन्हें प्राप्त था, ने बहुत हिकमत अमली से स्थितियों को सम्हाला और जान पर खेल कर उसे सुरक्षित गिरफ्तार किया। उस दिन रास्ते में शराब से धुत लाठियों और धारदार जैलियों वाले सैकड़ों उग्र लोगों ने सड़क तोड़ कर व रास्ते में रुकावट पैदा करने की कोशिश की थी व पथराव किया था। बरवाला आश्रम के ताजा घटनाक्रम में भी बाहर हिंसक भीड़ फैली हुयी थी और दस हजार भक्तों को देर रात में अगर पुलिस ने सुरक्षित नहीं भिजवाया होता तो व्यापक हिंसा की आशंका थी। रामपाल की गिरफ्तारी के दिन उसके समर्थकों के कई वाहनों में आग लगाये जाने की घटना से इसके संकेत मिलते हैं।
       श्री राय लिखते हैं कि हरियाना में नशे का चलन बहुत अधिक है जिसका दुष्परिणाम स्त्रियों को ही भुगतना पड़ता है और दीक्षा में नशे के विरोध को आवश्यक शर्त होने के कारण महिलाओं का इन आश्रमों के प्रति स्वाभाविक श्रद्धा बढती है। सत्संग में आने के बहाने वे अपने शराबी और सामंती पतियों के जुल्मों से मुक्त रहती हैं, और कुछ दिन सुकून के बिताने का सुख ले पाती हैं। इसी के उलट खाप पंचायतों वाले ऐसे आश्रम को दुश्मन मान कर चलते हैं। उल्लेखनीय है कि खाप पंचायतों ने नशे के खिलाफ कभी वैसा फैसला नहीं सुनाया जैसा कि वे विवाह आदि के मामले में सुनाते रहने के लिए बदनाम हैं।  
       इस पृष्ठभूमि में स्पष्ट है कि रामपाल कितना असुरक्षाबोध से ग्रस्त होगा जो मुफ्त भोजन और धार्मिक कार्य के बहाने लोगों को जोड़ कर वह अपनी सुरक्षा दीवाल बना रहा था। उसके आश्रमों में मिले हथियारों में ज्यादातर एयर गन मिली हैं जो सामने वाले को डराने का काम करके उसे सुरक्षा देती थीं। दूसरी बन्दूकों में ज्यादातर लाइसेंसी बन्दूकें ही पायी गयी हैं। कई हजार लाठियां होना भी सुरक्षा की ओर ज्यादा संकेत करता है। उसके पास भरपूर संख्या में वाहन और डीजल इंजन आदि थे जिस कारण उसने डीजल पैट्रोल का टैंकर भी ले रखा था ताकि इमरजैंसी में उसे परनिर्भरता से नहीं गुजरना पड़े। पन्द्रह हजार लोगों का खाना बनने वाले स्थल पर भरपूर गैस सिलेंडर होना भी स्वाभाविक हैं जिसको दूसरे रूप में कभी भी विस्फोटकों की तरह भी स्तेमाल किया जा सकता है। दो चार बोतलों में डीजल या पैट्रोल के अलावा पैट्रोल बम जैसी कोई चीज नहीं पायी गयी। आश्रम में कई हजार टायलेट और बाथरूम हैं तथा एसिड की बोतलें उनको साफ करने के प्रयोग में लाये जाने का तर्क दिया गया। उल्लेखनीय है कि अपनी सुरक्षा के अलावा रामपाल और उसके भक्तों पर उपरोक्त वस्तुओं के दुरुपयोग का कभी कोई आरोप नहीं लगा।
       सुप्रीम कोर्ट से करोंथा आश्रम का फैसला रामपाल के पक्ष में बहुत पहले आ चुका है पर वह आठ वर्ष पूर्व हिंसक तरीके से छीन लिये गये अपने आश्रम को वापिस नहीं पा सका है। उसके समर्थक पूछते हैं कि क्या यह न्यायपालिका का अपमान नहीं है!  रामपाल खुले में आने से डरता है और इसी कारण वह अदालत में भी उपस्थित नहीं होन चाहता। 2006 में उसके ऊपर लगे हत्या के आरोप की सीबीआई से जाँच कराने की माँग छह वर्षों से हाईकोर्ट के सामने लम्बित है। वे अदालत के आदेश की अवहेलना के पीछे इस भावना की ओर इशारा करते हैं। रामपाल अपने लड़के बेटी और दामाद के साथ वहाँ रहता था। वहाँ हजारों गरीब बेसहारा बीमार लोग आते थे जिनके लिए अस्पताल भी था इसलिए प्रिगनेंसी किट का मिलना दूसरे कई संतों के अनैतिक कामों जैसा प्रमाण नहीं हो सकता।
       आश्रम के पास इतनी अधिक मात्रा में अज्ञात श्रोतों से धन का आना और सम्पत्तियों का निर्माण कई सन्देहों को भी जन्म देता है। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि इस प्रकरण में सच्चाई कहीं दृश्य के दो आयामों के बीच लटकी हुयी है और यह हरियाना की दो जीवनशैलियों के द्वन्द का मामला अधिक है। हमें किसी फैसले पर पहुँचने से पहले सच्चाई का पता लगाना होगा और रामपाल जैसे दूसरे प्रकरणों को पहले से रोकना होगा। दुखद यह है कि हमारे राजनेता एक ओर तो किसी पर कालिख पोतते हैं पर दूसरी ओर वैसे ही मामले में निजी लाभ लेने में संकोच नहीं करते। रामपाल जैसे ही बाबा रामरहीम से भाजपा ने खुला समर्थन लिया था और सरकार बनने के बाद विधानसभा अध्यक्ष समेत सैतीस विधायक उसके चरणों में माथा टेकने गये थे। इससे पहले कि कोई नई घटना घटे, इस तरह के सभी मामलों में शीघ्र से शीघ्र एक जैसी कार्यवाही करने की जरूरत है।
वीरेन्द्र जैन                                                                           
2 /1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल म.प्र. [462023]
मोबाइल 9425674629