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शनिवार, अक्टूबर 27, 2012

गडकरी के कारनामों की ज़िम्मेवारी संघ पर भी आती है


                 गडकरी के कारनामों की ज़िम्मेवारी संघ पर भी आती है
                                                                                                                         वीरेन्द्र जैन
      जब कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह गत एक वर्ष से लगातार यह सवाल पूछ रहे थे कि गडकरीजी के पास इतना पैसा कहाँ से आया तो दुर्भाग्य से न तो मीडिया और न ही प्रशासन इसे गम्भीरता से ले रहा था। उनके इस बयान को केवल एक राजनीतिक बयान मान कर हाशिए पर कर दिया गया था, जबकि सच्ची बात तो यह है दिग्विजय सिंह के पिछले सारे बयान तथ्यात्मक और गम्भीर प्रकृति के रहे हैं, जो बाद में सच साबित हुए हैं। संघ परिवार तो उनके बयानों से इतना भयग्रस्त रहता है कि उसने तो कभी भी उन पर गम्भीर प्रतिक्रिया नहीं की, अपितु छिछले तरीके से उन्हें हास्यास्पद बता गाली गलौज कर उनसे बचने की कोशिश की। सोशल मीडिया के प्रमाण बताते हैं कि संघ परिवार ने ऐसे लोगों की एक बड़ी टीम बना रखी है जो सैकड़ों छद्म नामों से उन सभी महत्वपूर्ण लेखकों, पत्रकारों, व राजनेताओं को गाली गलौज करके हतोत्साहित करने, और उनकी छवि खराब करने की कोशिश करते रहते हैं, जो संघ परिवार के कार्यों की समीक्षा करते हैं। आज जब सच्चाइयां सामने आ रही हैं तब ये भी जरूरी है कि सोशल मीडिया में ऐसे छद्मनाम धारी खाते खोलने वालों की न केवल तलाश की जाये अपितु उनके इस अपराध के उद्देश्य के बारे में गहन पूछ्ताछ की जाये ताकि समाज में साम्प्रदायिकता के बीज बोकर देश की दिशा को गलत रास्ते पर ले जाने के षड़यंत्र का पर्दाफाश हो सके। उल्लेखनीय है कि अपने सारे साम्प्रदायिक हिंसक कारनामों, उनके खुलासों, अदालत की टिप्पणियों, आयोगों की रिपोर्टों के बाद भी नरेन्द्र मोदी गुजरात में लोकप्रियता इसलिए बनाये हुए हैं क्योंकि अपने झूठ के सहारे संघ परिवार ने समाज के एक हिस्से में साम्प्रदायिकता की जड़ें गहरी कर दी हैं, और यह काम एक दिन में नहीं हुआ है। प्रतिक्रिया में मुस्लिम और ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों ने भी अपने अपने राजनीतिक दल बनाने शुरू कर दिये हैं जिनका असर केरल और असम में प्रत्यक्ष दिखने लगा है। इसलिए जरूरी है कि साम्प्रदायिकता से मुकाबले का काम भी उसी निरंतरता और सक्रियता से किया जाये जितनी निरंतरता और सक्रियता से साम्प्रदायिक बीज बोये जा रहे हैं। खेद की बात है कि सत्तारूढ यूपीए में सम्मलित दलों में दिग्विजय जैसे दूरदर्शी लोग अल्पसंख्यक हो गये हैं।
     
      इस बात का अब शायद ही किसी को सन्देह हो कि भाजपा संघ का ही एक सहायक संगठन है और उसकी सारी प्रमुख नीतियां व सांगठनिक निर्णय संघ द्वारा ही लिए जाते हैं जिन्हें लागू करना भाजपा के लिए जरूरी होता है। भाजपा अध्यक्ष के रूप में गडकरी के चयन के प्रति जब भाजपा के अन्दर कोई कल्पना तक नहीं कर रहा था तब संघ द्वारा उन्हें अध्यक्ष के रूप में लाद दिया गया था। उनके इस चयन के प्रति न केवल पूरा मीडिया अपितु स्वयं भाजपा के बड़े बड़े नेताओं के मुँह खुले रह गये थे। स्मरणीय है कि उन दिनों जब संघ प्रमुख से भाजपा के अगले अध्यक्ष के बारे में पूछा गया था तब उन्होंने कहा था कि दिल्ली के गेंग डी फोर, अर्थात वैंक्य्या नायडू, सुषमा स्वराज, अरुण जैटली, और अनंत कुमार में से कोई नहीं। बाद में हुआ भी ऐसा ही और एक फासिस्ट संगठन ने पूरी भाजपा पर गडकरी को थोप दिया था। इतना ही नहीं गडकरी को दूसरा कार्यकाल देने के लिए संविधान में संशोधन भी उन्हीं के निर्देश पर किया गया जिसका मूल लक्ष्य गडकरी को दुबारा अध्यक्ष पद पर पदारूढ करना रहा था।

      संघ की कार्यप्रणाली को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि वे श्री गडकरी के कार्यकलापों से अनभिज्ञ रहे होंगे या बाद में दिग्विजय सिंह जैसे संघ विरोधी नेताओं द्वारा सवाल उठाये जाने पर जिज्ञासाएं न पैदा हुयी हों, किंतु उन्होंने सब कुछ जानते हुए भी न केवल गडकरी को भाजपा पर थोपा अपितु दूसरे कार्यकाल के लिए भी रास्ता बनवाया। सच तो यह है कि गडकरी का कार्यकाल किसी भी पूर्व अध्यक्ष से अधिक अच्छा नहीं रहा था जिन्हें ऐसी विशेष सुविधा मिली हो। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में पहले से अच्छा परिणाम देने के बाद भी जब कान्ग्रेस के अपेक्षाओं के अनुरूप परिणाम नहीं आये तो उस जिम्मेवारी का अहसास राहुल गाँधी समेत कांग्रेस के जिम्मेवार नेताओं पर देखा जा सकता था, किंतु वोटों और सीटों के मामले में पहले से पिछड़ने के बाद भी भाजपा के लोगों के समक्ष गडकरी के चेहरे पर कोई शर्म नहीं थी क्योंकि उनका भविष्य पार्टी नहीं अपितु संघ द्वारा तय किया जाना था और जब तक संघ उन्हें चाहता तब तक वे किसी की परवाह नहीं करना चाह्ते। उनके कार्यकाल में हुए विधानसभा चुनावों में गोआ जैसे छोटे राज्य को छोड़ कर कहीं भी सफलता नहीं मिली। अपनी अध्यक्षता के बाद पहली रैली के दौरान ही वे चक्कर खाकर बेहोश हो गये थे जिन्हें संयोग से वयोवृद्ध अडवाणीजी के कन्धों का सहारा मिल गया अन्यथा कोई बड़ी घटना भी सम्भावित थी। इसी दौरान उन्होंने अपने शरीर की चर्बी कम कराने के लिए शल्य चिकित्सा करायी। जब पूरा देश गम्भीर राजनीतिक गतिविधियों से उद्वेलित था तब मुख्य विपक्षी दल के अध्यक्ष गडकरीजी अपने परिवार के साथ विदेश भ्रमण के लिए चले गये। राज्य सभा के चुनावों में उन्होंने जिस तरह से अपने धनी मित्रों को टिकिट दिये उससे पार्टी में ही विद्रोह की स्थिति खड़ी हो गयी और झारखण्ड में अपने सबसे मुखर नेता श्री आहलूवालिया को नहीं जिता सके। अध्य्क्ष बनने के बाद उन्होंने जिस तरह से पार्टी को ठुकराने वाले नेताओं पर कृपादृष्टि करने का अहसान प्रदर्शित करना चाहा था उसके उत्तर में उन्हें कभी पार्टी के थिंकटैंक कहे जाने वाले गोबिन्दाचार्य से जो अपशब्द सुन कर मौन रह जाना पड़ा था वैसा व्यवहार उन जैसा  स्वाभिमानहीन व्यक्ति ही कर सकता है। उनकी कार में मृत पायी गयी लड़की की घटना हो या उनके बेटों की शादी में दौलत के शर्मनाक प्रदर्शन का मामला हो, शरद पवार और उनके भतीजे अजीत पवार से उनके व्यापारिक सम्बन्धों का मामला हो, संघ ने कभी भी कोई आपत्ति प्रकट नहीं की। कहा जाता है कि नरेन्द्र मोदी के साथ अपनी पिछली बैठक में संघ ने उन्हें गडकरी के एक और कार्यकाल के लिए मनाने की कोशिश की थी और शायद उसमें सफल भी हो गये थे।
      स्मरणीय है कि अटलबिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में पैट्रोल पम्प और गैस एजेंसियों के आवंटन में संघ के लोगों के हित में जो पक्षपात किया गया था और अटलबिहारी वाजपेयी ने जिस पर अपना त्यागपत्र देने की पेशकश तक कर दी थी, उससे संघ की शुचिता पर सन्देह के दाग लग चुके हैं। गडकरी के कारनामों के खुलासों और संघ द्वारा उन्हें अध्यक्ष बनाने व बनाये रखने की कोशिशों से ये सन्देह फिर से उभर आये हैं। ऐसे आचरणों की निरंतरता से आश्चर्य नहीं कि भविष्य में जब भ्रष्ट जननायकों की सूची और फोटो प्रकाशित हों तो उनमें संघ के पदाधिकारिय़ों के नाम भी सम्मलित दिखाई दें। गडकरी के खिलाफ साबित होने वाले किसी भी आरोप से संघ को मुक्त नहीं माना जा सकता।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
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शुक्रवार, जून 15, 2012

मोदी के सामने रीढ विहीन होती जाती भाजपा


                                 मोदी के सामने रीढ विहीन होती जाती भाजपा  
                                                                                    वीरेन्द्र जैन
      जैसे कि सुब्रम्यम स्वामी उस जनता पार्टी के प्रमुख हैं जिस नाम की पार्टी ने कभी इमरजैन्सी लगाये जाने से आक्रोशित जनता का समर्थन हासिल करते हुए केन्द्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनायी थी, पर  सुब्रम्यम स्वामी की यह जनता पार्टी, आज वही जनता पार्टी नहीं है केवल उसका साइनबोर्ड भर है। वैसे ही अब भाजपा रूपी जनसंघ वह पार्टी नहीं रह गयी है जो आज से कुछ दशक पहले थी, या अपने जनसंघ रूप में जन्म लेने के समय थी। इसकी रीढ टूट चुकी है और अब यह एक अपंग पार्टी हो गयी है।
      भाजपा, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राजनीतिक शाखा है जो संघ के लक्ष्य को पाने के लिए उसके 62 अन्य संगठनों की तरह चुनावी मोर्चे पर इस उद्देश्य से काम करती है ताकि सरकार बना के आंतरिक सुरक्षा बलों, और आर्थिक संसाधनों पर अधिकार किया जा सके और अंततः संघ के हिन्दू राष्ट्र के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके। देश की बहुसंख्यक जनता संघ परिवार और उसकी साम्प्रदायिक नीतियों को पसन्द नहीं करती इसलिए जनता को  भ्रमित करने के लिए उन्हें जनसंघ व भाजपा के माध्यम से उदारतावादी मुखौटे लगा कर आना पड़ा। पर जब इन मुखौटों के बाद भी उनका समर्थन  मतदान में दस प्रतिशत से आगे नहीं गया तब उन्होंने अपनी नीतियों पर पुनार्विचार की जगह दूसरे दूसरे तरीकों से जनता को भरमाने और संख्याबल बढाने की हरसम्भव कोशिश की। ऐसा करके वे या तो सत्तारूढ हुए हैं या प्रमुख विपक्षी दल बन कर, सत्तारूढ पार्टी की अलोकप्रियता के समय नकारात्मक समर्थन मिलने की ताक में रहते हैं।  जोड़ तोड़ की दम पर यह पार्टी न केवल राज्यों में सफल भी हुयी अपितु  1998 से 2004 के बीच उसने देश के केन्द्र में गठबन्धन सरकार चलायी।
      सच तो यह है कि भाजपा ने अपनी पार्टी का शरीर कृत्रिम हवा भर कर फुलाया। संविद सरकारों के दौर में वे बिना किसी न्यूनतम कार्यक्रम के प्रत्येक संविद सरकार में सप्रयास सम्मलित हुये व भितरघात करते रहे। संघ की अनुमति से अपने संख्या विस्तार के लिए उसने बड़े पैमाने पर दलबदल को प्रोत्साहन दिया व कांग्रेस समेत किसी भी पार्टी से आने वाले किसी भी उपयोगी व्यक्ति को पार्टी में प्रवेश देने या टिकिट देने में कोई संकोच नहीं किया, भले ही वह गैर कानूनी, आपराधिक कार्यों में लिप्त रहने के कारण निकाला गया हो। उसके सारे फैसले संघ के इशारों पर होते रहे हैं क्योंकि हर स्तर के संगठन सचिव संघ के प्रचारकों को ही नियुक्त किये जाने का नियम है और इस तरह उसका पूरा नियंत्रण रहता है, पर बात बात में हस्तक्षेप करने वाले संघ ने कभी भी इस दलबदल को हतोत्साहित करने की कोशिश नहीं की। कभी अपने को सैद्धांतिक और अन्य पार्टियों से भिन्न बताने वाली यह पार्टी आज दलबदल की ईंटों से खड़ी पार्टियों में सबसे प्रमुख पार्टी है। दलबदल के खिलाफ कानून बनने तक उन्होंने इसी अनैतिक कदम के द्वारा ही सरकारें बनायीं। इससे उसके वोट प्रतिशत का भी विस्तार हुआ। जिस नेहरू-गान्धी परिवार के लोगों को वे पानी पी पी कोसते हैं, उसी परिवार के दो सदस्यों मनेका गान्धी और वरुण गान्धी को अपने पुराने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करके सादर टिकिट दिया आज वे न केवल अपनी मर्जी से ही अपना टिकिट तय करते हैं अपितु वरुण की पत्नी को भी चुनाव लड़ाने जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि विधानसभा चुनावों में उनके द्वारा चयनित और समर्थित प्रत्याशियों की करारी हार के बाद मनेका पीलीभीत से और वरुण सुल्तानपुर से इस विश्वास के साथ चुनाव लड़ने का मन बना चुके हैं, कि पार्टी को तो टिकिट देना ही पड़ेगा। अपना बड़ा समर्थन दिखाने के लिए उन्होंने क्रिकेट खिलाड़ी, फिल्म स्टार, आदि को भर्ती किया जो उनकी सभाओं में भीड़ जुटाने के भरपूर पैसे लेते हैं जो उनकी एक दिन की शूटिंग के पारिश्रमिक से कई गुना होते हैं। इसी तरह साधु साध्वियों के भेष में रहने वाले प्रवचनकर्ताओं को लालच देकर उन्हें उनके धार्मिक काम की जगह धर्मभीरु लोगों के वोट खींचने के लिए नियुक्तियां दीं, जिनमें से कुछ को तो उन्हें विधायक, सांसद और मुख्यमंत्री तक बनाना पड़ा। रामजन्मभूमि मन्दिर विवाद को उन्होंने साम्प्रदायिक रूप देकर ध्रुवीकरण कराया व साम्प्रदायिक दंगों की श्रंखला खड़ी करके ध्रुवीकरण द्वाराअपनी जीत का माहौल बनाया।
      राज्यों में जहाँ जहाँ उनकी सरकारें बनीं उन्होंने संघ की संस्थाओं के नाम पर जमीनों और भवनों का कौड़ियों के मोल में अधिग्रहण किया तथा विभिन्न अवैध और अनैतिक तरीकों से अटूट धन संग्रहीत किया। संघ की ओर से इन विकृत्तियों को रोके जाने या भ्रष्ट लोगों को मंत्रिमण्डल से हटाये जाने के कभी निर्देश नहीं दिये गये। परिणाम यह हुआ कि भाजपा के संगठन और संसद में  कमाऊ पूत ही स्थान पाते गये। दिवंगत प्रमोद महाजन को तो नागपुर अधिवेशन में अटलबिहारी वाजपेयी ने अपना लक्षमण बतलाया था। आज भी वे पहले उसके बेटे, फिर बेटी को राजनीति से जोड़े रखने के भरपूर प्रयास करने में लगे हुए हैं। नितिन गडकरी के अध्यक्ष बनते समय कभी पार्टी छोड़ देने की धमकी देने वाले गोपीनाथ मुंडे को लोकसभा में उपनेता बनाना पड़ा था। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह द्वारा उठाये गये इस सवाल का कि गडकरी के पास इतना पैसा कहाँ से आया, आज तक कोई उत्तर नहीं दिया गया।              
            भाजपा सदैव से ही ऐसी नहीं थी। अपने पूर्व नाम जनसंघ के प्रारम्भिक दौर में कुछ सिद्धांतवादिता शेष थी। स्मरणीय है कि ; प्रथम, जमींदारी और जागीरदरी के खिलाफ जब वैचारिक माहौल बन रहा था और राजस्थान विधान सभा में इसे हटाने के लिए विधेयक आया तब जनसंघ के पास तेरह विधायक थे. उनमे ग्यारह विधायक ज़मींदारी के समर्थक थे. जनसंघ ने उन्हें दल से निकाल दिया और पार्टी के पास मात्र दो विधायक रह गए। जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन के दौरान विपक्ष ने विधान सभा से इस्तीफा देने का निर्णय लिया. इस पर जनसंघ के पच्चीस विधायकों में से चौदह ने विरोध किया. पार्टी ने उन सबको निकाल दिया। किंतु आज येदुरप्पा से लेकर मोदी तक और वसुन्धरा से लेकर उमाभारती तक के मामलों में भाजपा दृड़ता नहीं दिखा सकी। इसका प्रमुख कारण उसकी सत्ता लोलुपता है। कुर्सी के लिए उन्होंने जनसंघ को जनता पार्टी में विलीन करने से लेकर कैसे कैसे गलत और अनैतिक समझौते किये हैं उनकी सूची बहुत लम्बी और सर्वज्ञात है। आज भाजपा के रूप में जनसंघ का केवल नाम चल रहा है, जहाँ अवैध पैसे की दम पर वोट खरीदे जाते हैं तथा झूठ और षड़यंत्र के सहारे चुनाव के समय साम्प्रदायिकता फैला कर ध्रुवीकरण किया जाता है। हिन्दू एकता का ढोंग करने वाले आज चुनावों में  जातिवाद  का भरपूर सहारा लेते हैं और अपने राजनीतिक आर्थिक हितों के लिए जातिवादी दलों के साथ गलबहियां करते हैं। वे वोटों के लालच में सारे सांसदों को गालियाँ देने वाले  बाबा रामदेव से लेकर अन्ना हजारे तक किसी भी आन्दोलन में घुसने की कोशिश करते हैं जबकि एक बड़े आकार का दल होने के कारण ये राजनीतिक आन्दोलन उन्हें स्वयं चलाने चाहिए थे।
           
आज भाजपा चुनावी सौदेबाजी में माहिर और सिद्धांतहीन गठजोड़ के लिए सदैव उतावली संस्था के रूप में सत्ता के लिए टकटकी लगाये रहती है। आज यह उस संस्था के रूप में जानी जाती है जिसमें मूल्य और लोकतंत्र की जगह जिद और दबाव के आगे बार बार झुकने के दृष्य सामने रहे हैं। आज भाजपा सिद्धांतों के लिए सत्ता का दाँव इसलिए नहीं खेल पा रही क्योंकि वो रीढहीन हो चुकी है जो भ्रष्टाचार के आरोप में कैमरे के सामने आये राष्ट्रीय अध्यक्ष को तब तक पार्टी में ढोती है जब तक कि उसे सजा नहीं हो जाती उसकी गैर राजनीतिक पत्नी को लोकसभा में भेजने को विवश होती है।
      अपने षड़यंत्रकारी तरीकों के कारण वे हर सहभागी से डरते हैं जो उनकी पोल खोल सकता है, वे राज्यों के हर उस मुख्यमंत्री और मंत्री से डरते हैं जो उनके खजाने को निरंतर भर रहे हैं और इसी के सहारे अपने खजाने को भी कुबेर का खजाना बना लेते हैं। आज उनकी सबसे बड़ी ताकत पैसा, अवसरवादिता, सैद्धांतिक लोच, और विकल्प हीनता वाले क्षेत्र ही हैं। यही कारण है कि आज अनुशासन नाम का भी नहीं रह गया है और इसी के अनुसार उसके नेतृत्व की छवि भी प्रभावित हुयी है  इस रीढहीनता के चलते वे कभी भी विलुप्त जातियों की सूची में सम्मलित हो सकते हैं।
वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, जून 01, 2012

अडवाणीजी अब तो सच्चाई स्वीकारिये


अडवाणीजी अब तो सच्चाई स्वीकारिये
वीरेन्द्र जैन
       दर्शन शास्त्र के एक प्रोफेसर को साधारण भौतिक वस्तुएं भूल जाने की बीमारी थी। बरसात की एक शाम जब वे भीगे हुए अपने घर के दरवाजे पर पहुँचे तो घर में प्रवेश से पहले ही तेज याददाश्त वाली उनकी पत्नी ने पूछा छाता कहाँ है?
वह तो कहीं खो गया प्रोफेसर ने बताया
...पर कहाँ? पत्नी ने क्रोधपूर्ण जिज्ञासा की
वह तो पता नहीं वे बोले
आखिर आपको कब पता चला कि छाता खो गया है? पत्नी का अगला प्रश्न था
जब बरसात बन्द हो गयी और मैंने छाता बन्द करने के लिए हाथ ऊपर किया तो पता चला कि छाता तो है ही नहीं प्रोफेसर ने बताया।        
       भाजपा के वरिष्ठतम नेता पूर्व प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी लाल कृष्ण आडवाणी को भी भाजपा से जनता के निराश होने का ज्ञान तब हुआ जब उन्हें सारी उम्मीदवारियों से मुक्त कर दिया गया अर्थात उनकी आशाओं पर न केवल पानी फेर दिया गया अपितु पौंछा भी लगा दिया गया। इतना ही नहीं गडकरी ने अपने चहेते भामाशाह अंशुमान मिश्रा द्वारा जो अपने पैसे की दम पर भाजपा अध्यक्ष को जेब में डाले हुए है, उनका अपमान भी करा दिया जिसने भारतीय राजनीति के इस सबसे वरिष्ठ नेता को रिटायर होकर नाती पोतों को खिलाने की सलाह दे डाली है और इस रामलीला पार्टी में राजनीतिक भूमिकाओं को अभिनेताओं की भूमिकाओं से तुलना करते हुए कहा है कि देश को ए.के. हंगल नहीं आमिर और रणवीर कपूर की जरूरत है। स्थिति की बिडम्बना यह भी है कि भरी पूरी पार्टी में उन लोगों का अकाल दिखा जो अपने नेता के इस अपमान का विरोध करते क्योंकि सारी ही पार्टी लालचियों और चापलूसों के गिरोह में बदल गयी है, जो गडकरी जैसी कठपुतली को सलाम कर सकते हैं पर अडवाणी के अपमान पर अफसोस भी नहीं कर सकते। जब अडवाणी के सहारे सत्ता तक पहुँचने की सम्भावनाएं थीं तब इन्हीं लोगों ने रथ यात्रा के दौरान उनको गिरफ्तार किये जाने पर पूरे देश में हिंसक उपद्रव कर दिये थे।
       वैसे अडवाणी ने भाजपा के प्रति जनता के रुख का सार्वजनिक खुलासा अभी किया हो पर जहाँ जहाँ भाजपा की सरकारें हैं या वह किसी क्षेत्रीय पार्टी के नीचे किसी राज्य सरकार में सम्मलित है वहाँ वहाँ जनता की निराशा के पर्याप्त संकेत सूचना माध्यमों पर उपलब्ध हैं। उन्हें छुपाने के लिए सम्बन्धित राज्यों के जनसम्पर्क विभाग द्वारा पर्याप्त मात्रा में खैरातें बाँटी जा रही हैं, पर वे फिर भी रोके नहीं रुक रहीं। निराश जनता ने एनडीए का शासन भी भोग लिया है और वह जानती है कि सरकार के सहारे लूटखसोट करने में ये सबसे आगे रहते हैं इसलिए जनता अब इन्हें विकल्प के रूप में नहीं देख रही। जहाँ तक बाबूलाल कुशवाहा समेत उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी से निकाले गये मंत्रियों को भाजपा में सम्मलित करने का सवाल है, वह भाजपा के लिए कोई नया हथकण्डा नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार चलाने के लिए उन सुखराम से गलबहियाँ करने से गुरेज नहीं किया गया था जिन पर छापा पड़ने पर इन्होंने छह दिन तक संसद नहीं चलने दी थी। शिबू सोरेन समेत दागी मंत्रियों को हटाने के नाम पर इन्होंने सदन के कई महत्वपूर्ण दिन बरबाद करवा दिये थे उन्हीं के साथ आज झारखण्ड में सरकार बनाये हुए हैं और वही शिबू सोरेन अपने लड़के के नाम पर सरकार चला रहे हैं और अपनी सरकार में भाजपा अपना राज्य सभा का उम्मीदवार तक नहीं जितवा पाती। जिन जयललिता के भ्रष्टाचार के खिलाफ इन्होंने संसद में तूफान मचा दिया था उन्हीं के सहारे अटल बिहारी ने एनडीए की सरकार चलायी तथा इतनी चिरौरियां करते हुए चलायी कि जयललिता अटलजी के रक्षा मंत्री को घंटों बाहर बिठाये रखती थीं। टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले की शुरुआत भी एनडीए शासन काल में ही हो गयी थी, जिसमें अडवाणीजी उपप्रधानम्ंत्री थे व ‘प्रधान मंत्री के सारे काम’ देख रहे थे।      
       सत्ता के लिए सारे अनैतिक हथकण्डे अपनाना व सभी तरह के समझौते करना गडकरी ने अपने पूर्ववर्तियों से ही सीखा है। टिकिट न मिलने या किसी अन्य असंतोष की वजह से अपनी पार्टी छोड़ने वाले सारे प्रमुख नेताओं को भाजपा ने आगे बढकर गले लगाया है और उसका एक बड़ा हिस्सा दलबदलुओं या लोकप्रिय सितारों को किराये से लेकर से भरा हुआ है। दलबदल करा के पूरे विधायक दल को किसी पर्यटन स्थल पर कैद करने की परम्परा भी भाजपा ने ही शुरू की थी व दलबदल में सौदेबाजी की शुरुआत भी मध्यप्रदेश में संविद शासन के लिए विजया राजे सिन्धिया द्वारा थैली खोल देने से ही हुयी थी। उत्तर प्रदेश में मायावती के साथ छह छह महीने सरकार चलाने का बेहद हास्यस्पद प्रयोग भी भाजपा की देन है। इस पर इनके सहयोगी बाल ठाकरे ने व्यंग किया था कि अगर कुछ पैदा करना था तो छह छह महीने क्यों कम से कम नौ नौ महीने  का समझौता तो करना चाहिए था। समस्त दलबदलुओं समेत सौ लोगों का मंत्रिमण्डल बनाने का अजीब प्रयोग भी उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह सरकार में किया गया था जिसके मंत्रियों का यहाँ तक कहना था कि मंत्री बने छह महीने हो गये पर हमारे पास आज तक एक भी फाइल दस्तखत होने नहीं आयी। पूर्व डकैतों को टिकिट देने की शुरुआत भी भाजपा ने ही की थी जब उन्होंने मुलायम सिंह के खिलाफ मलखान सिंह को खड़ा किया था, बाद में तो यह फार्मूला ही चल निकला था। आज भी प्रत्येक चुनाव में आत्मसमर्पित दस्यु या जमानत पर छूटे अपराधी टिकिट माँगते देखे जाते हैं। नगर निकायों या पंचायती राज में तो उनमें से कई अभी भी विभिन्न पदों पर कब्जा किये हुए हैं। अभी हाल ही में हरियाणा के उपचुनाव में इन्होंने उन्हीं भजनलाल के बेटे के साथ समझौता किया था जिन्हें भ्रष्ट और अवसरवादी बताते हुए इन्होंने लम्बा समय गुजारा है।
       अवसरवादी, समझौता परस्ती का यह दोष भले ही भाजपा में अब अपने चरम पर पहुँच गया हो किंतु इसकी शुरुआत बहुत पहले ही हो गयी थी और कोई भी ऐसा काम अडवाणी की जानकारी के बिना सम्भव ही नहीं था। कर्नाटक के रेड्डी बन्धुओं को इस दशा तक पहुँचाने में अडवाणी की परम शिष्य श्रीमती सुषमा स्वराज के आशीर्वाद का ही हाथ रहा है जिन्हें श्रीमती सोनिया गान्धी के खिलाफ चुनाव में उतारा गया था और चुनाव की पूरी व्यवस्था रेड्डी बन्धुओं ने की थी। यदि उम्र के इस पड़ाव पर अडवाणीजी सचमुच ही अपने किये पर पछता रहे हों तो उन्हें चाहिए कि वे अब एक सच्ची आत्मकथा लिखें और पूरे राजनीतिक जीवन में अपने द्वारा किये या देखे गये उन कामों का खुलासा करें जो अभी तक जनता के सामने नहीं आये हैं। यदि उन्होंने ऐसा करने का साहस जुटाया तो वे प्रधानम्ंत्री बनने की तुलना में इतिहास में अमर हो सकते हैं और भारतीय लोकतंत्र को अपना आत्मावलोकन करने व सुधरने का अवसर मिल सकता है।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, जुलाई 29, 2010

मुख्य भूमिका में कामेडियन हो जैसे

मुख्य भूमिका में कामेडियन हो जैसे
वीरेन्द्र जैन

एक समय था जब हिन्दी फिल्मों में नायक नायिका अलग होते थे और कमेडियन अलग होते थे। इन कामेडियंस के लिए अलग से कहानी में जगह निकाली जाती थी और नायक नायिका की प्रेम कहानी के समांतर उनकी भी कहानी चलती रहती थी। धीरे धीरे वह जमाना आया कि नायक और कामेडियन का भेद मिट गया तथा अक्षय कुमार, परेश रावल ही नहीं, ओम पुरी, शाहरुख खान और आमिर खान तक कामेडियन-नायक की भूमिका निभाने लगे। हमारे देश की राजनीति भी कुछ ऐसे ही दौर से गुजर रही है।
किसी समय राजनीति में शीर्षस्थ नेता अध्ययंशील,शालीन, सुसभ्य और गुरु गम्भीर बने रहते थे किंतु कुछ राजनेता समानान्तर ढंग से अपनी बात कहने के लिए मनोरंजक और चुटीला और ग्राम्य, तरीका अपनाते रहते थे जिससे उनकी बात जनता तक पहुँच भी जाती थी और उन्हें याद भी बनी रहती थी। इनमें अनेक स्थानीय नेताओं के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी नेता राज नारायण सबसे अधिक चर्चित रहे थे। बाद में लालू प्रसाद यादव ने भी यही ढंग अपनाया और इसी की दम पर जनता दल से अलग होकर अपना अलग दल बनाया व उसके सर्वे सर्वा बन गये। समाजवादी पार्टी में रहने तक अमर सिंह भी इसी तरीके का स्तेमाल करते रहे हैं।
संघ के आदेश पर नियुक्त भाजपा के नये अध्यक्ष नितिन गडकरी और कुछ अन्य नेता भी इसी दौर के हैं जो अधिकतर हास्यास्पद बयान ही देते हैं किंतु उनके ये बयान राज नारायण और लालू प्रसाद की तरह सोचे समझे ढंग से दिये गये बयान नहीं हैं अपितु अपनी अनुभवहीनता और गलत प्रतीकों के प्रयोग के कारण व्यंगात्मक न होकर हास्यास्पद हो जाते हैं। वे इन बयानों के द्वारा विषय वस्तु की गम्भीरता को नष्ट कर देते हैं। मँहगाई के सवाल पर नितिन गडकरी ने कहा कि सरकार गेंहूँ इसलिए सड़ा रही है ताकि उसे शराब बनाने वालों को बेच सके। यह बयान एक राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष की गरिमा के अनुकूल नहीं है, जबकि बढती मँहगाई और उचित संरक्षण के अभाव में सरकारी निगमों में गेंहूँ का सड़ना एक गम्भीर चिन्ता का विषय है जिस पर उनसे पूर्व सुप्रीम कोर्ट भी टिप्पणी कर चुका है।
गत दिनों भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने कहा कि सोहराबुद्दीन हत्याकण्ड के आरोपी अमित शाह को कांग्रेस इसलिए परेशान कर रही है ताकि बढती मँहगाई से ध्यान हटाया जा सके। ये बयान बेहद बचकाना और झुग्गी झोपड़ी में रहने वाली औरतों की लड़ाई के दौरान दिये गये कुतर्कों की तरह है। सोहराबुद्दीन, उसके साथी तुलसी प्रजापति और उसकी पत्नी कौसर बी की हत्या हुयी है जिसे न केवल वरिष्ठ पुलिस अधिकारी स्वीकार कर चुके हैं अपितु उन आरोपियों में से एक सरकारी गवाह बनने को तैयार भी हो गया है। इतना ही नहीं स्तिथि का पूर्वाभास होने के कारण भाजपा ने उन राम जेठमलानी को राज्य सभा में भेजना मंजूर कर लिया जो भाजपा के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ चुनाव में खड़े हुये थे और जिन्होंने इस पार्टी के प्रमुख मुद्दे “अफजल को फाँसी” के विपरीत अफजल की वकालत करना स्वीकार किया था। उनको वकील् बनाने के बाद भी भाजपा नेता का उक्त बयान कि मँहगाई के मुद्दे से ध्यान बँटाने के लिए अमित शाह को परेशान किया जा रहा है, बेहद हास्यास्पद है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि आगामी दिनों में जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद तोड़ने वालों या गुजरात में निर्दोष मुसलमानों की हत्याएं करने वालों पर शिकंजा कसेगा तब भी वे ऐसे ही बयान देंगे। भाजपा नेताओं के इन बयानों से उनके पक्ष में तो कोई वातावरण नहीं ही बनता, मँहगाई जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी होने वाली विपक्षी राजनीतिक लड़ाई कमजोर होती है। उनके ये बयान उमा भारती, ऋतम्भरा, आचार्य धर्मेन्द्र, अशोक सिंघल, आदि के बयानों की तरह लगते हैं जो गैर जिम्मेवारी से बिना किसी सोच के दिये जाते हैं, जैसे कि हरियाना में गौ हत्या के सन्देह में हिदू तत्ववादियों ने जब चार हरिजनों की हत्या कर दी थी तो अशोक सिंघल ने कहा था कि चार हरिजनों की जान की तुलना में एक गाय की जान ज्यादा महत्वपूर्ण है।
लोकतत्र में एक जिम्मेवार विपक्ष का होना बहुत जरूरी होता है, जो सतारूढ दल पर अंकुश बनाये रखता है और उसे मनमानी करने से रोकने का काम करता है। यह गलत नहीं होगा अगर यह कहा जाये कि विपक्ष को सत्ता पक्ष की तुलना में अधिक चेतन, सक्षम, और सक्रिय होना नितांत जरूरी है किंतु जब विपक्ष के प्रमुख नेता ही तरह तरह के अपराध कर्मों में आरोपी बन रहे हों और ऊल जलूल बयान देते हों तब सत्ता पक्ष की मनमानी पर अंकुश कौन रखेगा। खेद है कि आज देश के दो प्रमुख दलों को अपने अपने आरोपों में प्रतियोगी होकर यह बताने में अपनी ऊर्जा नष्ट करना पड़ रही है कि कौन बड़ा अपराधी है। दूसरे के अपराध को बड़ा बताने के रक्षात्मक उपायों द्वारा राजनीति करना बेहद बिडम्बनापूर्ण हैं, यह मुद्दों की लड़ाई को भटकाती है। यह लापरवाही पूर्ण राजनीति तब हो रही है जब देश के सामने आतंकवाद, अलगाववाद, और दिनों दिन फैलते जा रहे माओवाद का खतरा सामने है।
वीरेन्द्र जैन
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गुरुवार, मई 06, 2010

गडकरी की किरकिरी

गडकरी की किरकरी
वीरेन्द्र जैन
हमने सफेद बालों को सम्मान देने की कुछ ऐसी परम्परा विकसित की है कि ऊर्जावान और नवोन्मेषी युवाओं को भी वह सम्मान नहीं मिल पाता जिसके वे अधिकारी हैं, और अपेक्षाकृत उम्रदराज किंतु कम योग्य व्यक्ति भी आदर पा लेता है। इसके विपरीत यूरोप में जहाँ साधारण परिवार से आये हुये ओबामा जैसे लोग राष्ट्रपति के पद तक पहुँच जाते हैं वहीं हमारे यहाँ ऐसे युवा किसी बड़े खानदान, पूर्व राज परिवार, या औद्योगिक घराने के नाम पर ही किसी ऊंची पदवी को पा पाता है। भाजपा के नये अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ भी कुछ कुछ ऐसा ही होता नज़र आ रहा है। वे संघ के निर्देश पर भाजपा के अध्यक्ष तो चुन लिये गये हैं किंतु वरिष्ठ भाजपा नेताओं के मन में उनके प्रति सम्मान का भाव नहीं दिखाई देता। जो किसी पद पर भी नहीं है, वे भी अपने को भाजपा भाग्य विधाता मान कर चल रहे हैं।
ताज़ा घटना कभी भाजपा के थिंकटैंक के रूप में चर्चित रहे गोबिन्दाचार्य की है जिन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष को अपनी ज़ुबान पर लगाम लगाने की सलाह देते हुये कहा है कि उनकी अभी की हरकतों से उनकी छवि अनर्गल बोलने वाले सतही और अक्षम नेता की बनती जा रही है और ऐसी छवि बनने से रोकने के लिए वाणी पर संयम की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि मैं न तो पार्टी से निष्काषित किया गया और न ही पार्टी से त्यागपत्र दिया। नौ सितम्बर 2000 को मैं अध्य्यन अवकाश पर गया और 2003 के बाद मैंने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता का पुनः नवीनीकरण नहीं कराया और स्वयं को पार्टी से मुक्त कर लिया।
श्री गडकरी को जानकारी विहीन निरूपित करते हुये गोबिन्दाचार्य ने कहा कि आप और आपके पार्टी पदाधिकारियों को बयान या सक्षात्कार देने से पूर्व मेरी विशिष्ट स्थिति का ज्ञान होना चाहिए, और वाणी में संयम का पालन करना चाहिए। आपकी पार्टी की आंतरिक गुटबाज़ी और गड़बड़ियों का शिकार मुझे बनाने से मेरी छवि पर आघात होता है।स्मरणीय है कि श्री गडकरी ने एक साक्षात्कार में कहा था कि अगर पार्टी छोड़ कर गये नेता प्रायश्चित कर रहे हैं तो हम उचित फोरम पर विचार करेंगे। स्मरणीय यह भी है कि श्री गोबिन्दाचार्य सुश्री उमा भारती के गुरु के रूप में विख्यात हैं और वाणी में सयंम की यह सीख उन्होंने कभी अपनी शिष्या को देने की ज़रूरत नहीं समझी।

भाजपा के किताबी राष्ट्रीय अध्यक्ष के सामने संभवतः संकट यह है कि पार्टी संविधान में थिंक टैंक का कोई पद नहीं है इसलिए यह नहीं पता चल सकता कि यह पद पार्टी अध्यक्ष से ऊंचा होता है या नीचा होता है, ना ही पार्टी संविधान में इस स्थिति के बारे में कुछ लिखा है कि कोई व्यक्ति अध्य्यन अवकाश का बहाना बना कर पार्टी के काम से मुक्ति ले ले और उचित समय पर अपनी सदस्यता का नवीनीकरण भी नहीं कराये तो उसे पार्टी के भीतर माना जा सकता है या बाहर माना जा सकता है। यह कुछ कुछ वैसा ही है कि कोई सरकारी कर्मचारी ट्रांस्फर से बचने के लिए बीमारी का बहाना बना कर रिलीव न हो और फिर ज्वाइन ही न करे। भाजपा के मामले में तो इस प्रकरण को आर एस एस की बड़ी अदालत ही फैसला देगी कि वे पार्टी के अन्दर हैं या बाहर हैं। फैसला कुछ भी हो किंतु अपनी छवि को बचाने के लिए गोबिन्दाचार्य ने पार्टी अध्यक्ष की छवि को कठपुतली की छवि दे डाली है जो कुछ भी तय नहीं कर सकता।
कहा जाता है कि इससे पूर्व भी संघ के निर्देश पर सुश्री उमा भारती को भाजपा में सम्मलित किया जाना था जिन्होंने अपनी ही बनायी पार्टी से त्याग पत्र दे दिया था और प्रवेश के लिए लगातार नागपुर और दिल्ली के चक्कर लगा रहीं थीं।किंतु भाजपा के पूर्व अध्यक्ष वैंक्य्या नाइडू, सुषमा स्वराज, अरुण जैटली, शिवराज सिंह चौहान, नरेन्द्र तोमर आदि ने एक स्वर से विरोध व्यक्त करके गडकरी की भूमिका को असमंजस में डाल दिया था। कहा जाता है कि उनको प्रवेश देने की स्थिति में शिवराज सिंह ने मुख्य मंत्री पद से त्यागपत्र देने की धमकी तक दे दी थी। दूसरी ओर अयोध्या की बाबरी मस्ज़िद टूटने के मामले में उनकी गवाही महत्वपूर्ण हो सकती है इसलिए भाजपा उन्हें अनुशासन में बाँध कर रखना चाहती है। स्मरणीय है कि लिब्राहन आयोग के सामने सुश्री उमा भारती जो साध्वियों जैसे कपड़े पहिनती हैं, ने यह कहा था कि 6 दिसम्बर 92 को अयोध्या में क्या हुआ था उन्हें कुछ भी याद नहीं है। श्री गडकरी की चिंताएं लगभग वैसी ही आदर्शमुखी हैं जैसी कि प्रधानमंत्री बनने के बाद बम्बई अधिवेशन में राजीव गान्धी की थीं। वे पार्टी में प्रशिक्षण प्रारम्भ करना चाहते हैं, चापलूसी, और पैर छूने की परम्परा को समाप्त करना चाहते हैं तथा अगले आम चुनाव तक दस प्रतिशत वोट बढाना चाहते हैं। किंतु हुआ यह है कि उनके आने के बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री को पूरी शासन व्यव्स्था बेल्लारी के व्यापारी बन्धुओं के चरणों में डाल देनी पड़ी और ईमानदार और समर्पित कार्यकर्ता शोभा को मंत्रिमण्डल से हटाने को विवश होना पड़ा। झारखण्ड में शिबू सोरेन के आगे नाक रगड़ना पड़ी और जिन्हें दागी कह कह कर उन्होंने संसद नहीं चलने दी थी उन्ही के नेतृत्व को स्वीकार करना पड़ा। मध्य प्रदेश में सारे दागी मंत्रियों को वापिस मंत्रि मण्डल में शामिल करना पड़ा।
गडकरी ने अपने विश्वस्त लोगों का जो गुट तैय्यार किया है उसमें महाराष्ट्र का ही वर्चस्व है जिससे अनेक दूसरे लोग असंतुष्ट हैं। भाजपा के स्टार शत्रुघ्न सिन्हा ने तो सार्वजनिक रूप से भी निन्दा की है, और गडकरी को चुप लगा कर बैठना पड़ा। अब यदि ऐसी घटनाएं लगातार बढती रहीं तो उनकी साख का और ह्रास होगा, इसलिए अनुशासन बनाये बिना वे अध्यक्ष पद की ज़िम्मेवारी नहीं निभा सकेंगे।
वीरेन्द्र जैन
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