बुधवार, सितंबर 18, 2019

श्रद्धांजलि स्मृति शेष माणिक वर्मा भोपाल में वे मेरे पड़ोसी भी रहे

श्रद्धांजलि स्मृति शेष माणिक वर्मा
भोपाल में वे मेरे पड़ोसी भी रहे

वीरेन्द्र जैन
माणिक वर्मा मंचों पर उस दौर के व्यंग्यकारों में शामिल हैं जब छन्द मुक्त व्यंग्य विधा को स्वतंत्र स्थान मिलने लगा था। एक ओर हास्य कविता में काका हाथरसी, निर्भय हाथरसी, गोपाल प्रसाद व्यास रमई काका शैल चतुर्वेदी हुल्लड़ मोरादाबादी आदि थे तो दूसरी ओर देवराज दिनेश, माणिक वर्मा, सुरेश उपाध्याय, ओम प्रकाश आदित्य, गोविन्द व्यास, आदि थे जिनमें माणिक वर्मा जी का विशेष स्थान था। बाद में अशोक चक्रधर, प्रदीप चौबे, मधुप पांडेय आदि जुड़े । इसके बाद की पीढी में तो फूहड़ चुटकलों ने ही कविता की जगह लेना शुरू कर दिया था। सबसे वरिष्ठ श्री मुकुट बिहारी सरोज इन सब में अलग थे जिन्होंने गीत में सार्थक व्यंग्य रचा।
मेरी पद्य और गद्य व्यंग्य रचनाएं 1971 से ही कादम्बिनी धर्मयुग, माधुरी, रंग आदि में प्रकाशित होने लगी थीं इसलिए मैं खुद को इस खानदान का सदस्य मान कर चलता था। व्यवस्था के खिलाफ मुखर रूप से लिखने वाले माणिक वर्मा मेरे पसन्दीदा कवि भी थे और हमविचार भी लगते थे। अनेक समारोहों में उनसे भेंट होती रही थी किंतु अपने संकोची स्वभाव के कारण मैं जल्दी घुल मिल नहीं पाता था, इसलिए रिश्ता दुआ सलाम तक सीमित रहा था। सरोज जी के प्रति उनकी श्रद्धा देख कर मुझे बहुत अच्छा लगता था जब वे उनसे आशीर्वाद स्वरूप थोड़ा सा पेय पदार्थ मांग रहे होते थे और अपनी तरह से प्रशंसा करने वाले सरोज जी कह रहे होते, कि तुम्हें तब तक एक बूंद नहीं दूंगा जब तक कि तुम वादा नहीं करते कि इतना अच्छा नहीं लिखोगे, आखिर तुम क्यों इतना अच्छा लिखते हो! बहुत भावुक आत्मीयता महसूस होती थी जब माणिक जी उन से कह रहे होते थे कि – बप्पा थोड़ी सी दे दो, आपका आशीर्वाद तो चाहिए ही है मुझे!
इस बीच काफी समय गुजर गया। कवि सम्मेलनों में कवि के रूप में स्थापित होने की मेरी वासना शांत हो चुकी थी व उसी अनुपात में मंच के कवियों के प्रति आकर्षण भी खत्म हो गया था। मैं 2001 में बैंक की नौकरी छोड़ कर भोपाल आकर रहने लगा था और कविता छोड़ कर गद्य लेखन की ओर चला गया था। इसी बीच पता चला कि माणिक वर्मा जी भोपाल में ही रहने लगे हैं और मेरे पड़ोस में ही रहते हैं। पंजाबी बाग की लाजपत राय कालोनी में नीले रंग से पुता हुआ जो मकान है वह उन्हीं का है। मंच के एक कवि श्री दिनेश प्रभात के माध्यम से उनसे पुनः भेंट का मौका मिला और मेरे निकट ही रहने की बात जान कर वे बोले – भैय्या आ जाया करो कभी। पुराने माणिक वर्मा की तुलना में वे बीमार से लगे थे और उम्र का प्रभाव भी दिखा था।
इसी बीच कवि और समाजवादी राजनेता उदयप्रताप सिंह को म.प्र. में समाजवादी पार्टी की ओर से चुनाव का प्रभारी नियुक्त किया गया। वे मेरे पूर्व परिचित थे इसलिए उन्होंने इस प्रवास के दौरान प्रतिदिन मिलने का आग्रह किया ताकि दिन भर की राजनीतिक उठापटक के बाद शाम को साहित्यिक संवाद हो सके। इसी क्रम में एक दिन माणिक वर्मा जी से मिलने का कार्यक्रम भी बना। हम उनके घर पहुंचे और काफी देर बैठे। उस दिन उनके आते रहने के पुनः आग्रह में मुझे औपचारिकता की जगह सच्चाई नजर आयी। इसी मुलाकात में पता चला कि उनके प्रिय पुत्र नीरज कैंसर की बीमारी से ग्रस्त हैं जिनकी देख रेख में चिंतित वे कवि सम्मेलनों से भी दूर रहने लगे थे, और ऐसे कार्यक्रमों में ही जाते थे जहाँ वायुमार्ग से जाकर चौबीस घंटे के अन्दर वापिस आ सकें। यही कारण था कि उन्हें सचमुच ही वार्तालाप करने के लिए आत्मीय मित्रों की जरूरत थी। मैंने उनके यहाँ जाना शुरू किया तो उनकी आदत में शामिल होता गया। अंतराल होने पर वे खुद ही फोन करके आने का आग्रह करने लगे। कुछ समय बाद ही उनके पुत्र की मृत्यु हो गयी।
अपनी प्रारम्भिक जीवन संघर्ष कथा सुनाते हुए उन्होंने बताया था कि वे बचपन में ही बम्बई चले गये थे जहाँ वे टेलरिंग का काम करने लगे थे। जिस दुकान पर वे यह काम करते थे वहीं के टेलर मास्टर ने उनके शायर होने की प्रतिभा को पहचाना था और प्रोत्साहित किया था। वे मूल रूप से गज़लकार ही थे। अभी भी वे लगातार गज़लें कहते थे। कवि सम्मेलनों के आकर्षण ने उन्हें व्यंग्य कवि बना दिया था। उन्होंने बताया था कि कभी नीरजजी आदि को कवि सम्मेलन में सुनने के लिए वे तीस तीस किलोमीटर साइकिल से जाया करते थे। जब मैंने उन्हें सीपीएम के पाक्षिक पत्र लोकजतन का सदस्य बनाया तो उन्होंने बताया था कि वे कभी कम्युनिष्ट पार्टी के सदस्य हुआ करते थे और कामरेड शाकिर अली खान हरदा में क्लास लेने के लिए आते थे। उन्होंने कभी सोवियत भूमि पत्रिका के पचासों ग्राहक बनाये थे। बातचीत में पता लगा कि उनके छोटे बेटे इन्दौर में ही एडीजे हैं और दामाद कहीं कलैक्टर के समतुल्य पद पर पदस्थ हैं। उनके मूल निवास हरदा में उनका पैतृक मकान और खेती है। बहू भी स्कूल टीचर है। दिल्ली के एक कवि व प्रकाशक [शायद उनका नाम श्याम निर्मम था] ने उनका समग्र प्रकाशित करने का फैसला किया था किंतु उनके आकस्मिक निधन से वह प्रकाशन स्थगित हो गया था।
बीएचईएल भोपाल में हरवर्ष 26 जनवरी को कवि सम्मेलन होता है। ज्ञान चतुर्वेदी बीएचईल के ही कस्तूरबा अस्पताल में वरिष्ठ चिकित्सक रहे हैं और संस्थान की साहित्यिक गतिविधियों के लिए प्रबन्धन उनसे सलाह लेता रहा था। एक किसी वर्ष ज्ञान चतुर्वेदी का फोन मेरे पास आया कि माणिक वर्मा के साथ कवि सम्मेलन सुनने आ जाना। इसके साथ ही यह भी बताया कि उनके स्थानीय होने के कारण पिछले वर्ष प्रबन्धन ने उनके द्वारा चाही गयी पन्द्रह हजार की राशि देना मंजूर नहीं किया था किंतु इस वर्ष मैंने उन्हें बीस हजार देना मंजूर करवा लिया। वे आगे बोले जब प्रबन्धन सुरेन्द्र शर्मा को इक्वायन हजार दे रहा है तो मैंने कहा कि माणिक वर्मा को तो बीस हजार मिलने ही चाहिए। यह ज्ञान चतुर्वेदी का उनके प्रति सम्मान का प्रदर्शन था।
उनके साथ बैठ कर कवि सम्मेलनों और विभिन्न कवियों के बारे में ढेर सारी जानकारियां सुनने को मिलीं। जिस दिन वे भोपाल छोड़ कर जा रहे थे उस दिन उन्होंने मुझे फोन किया था किंतु मैं किसी कार्यक्रम में था और उसे अटैंड नहीं कर पाया था, अगले दिन पता चला कि वे तो भोपाल छोड़ कर चले गये हैं।  मुझे श्रद्धांजलि देने के लिए उनका ही वह शे’र याद आ रहा है-
ज़िन्दगी चादर है धुल कर साफ हो जायेगी कल
इसलिए ही हमने उसमें दाग लग जाने दिये  
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, सितंबर 17, 2019

समीक्षा – जिन्हें जुर्मे इश्क पे नाज था संवेदनात्मक ज्ञान को चरितार्थ करती पुस्तक


समीक्षा – जिन्हें जुर्मे इश्क पे नाज था 





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संवेदनात्मक ज्ञान को चरितार्थ करती पुस्तक
वीरेन्द्र जैन
मुक्तिबोध ने कहा था कि साहित्य संवेदनात्मक ज्ञान है। उन्होंने किसी विधा विशेष के बारे में ऐसा नहीं कहा अपितु साहित्य की सभी विधाओं के बारे में टिप्पणी की थी। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जिस रचना में ज्ञान और संवेदना का संतुलन है वही साहित्य की श्रेणी में आती है।  
खुशी की बात है कि विधाओं की जड़ता लगातार टूट रही है या पुरानी विधाएं नये नये रूप में सामने आ रही हैं। दूधनाथ सिंह का आखिरी कलाम हो या कमलेश्वर का कितने पाकिस्तान , काशीनाथ सिंह का काशी का अस्सी हो या वीरेन्द्र जैन [दिल्ली] का डूब, सबने यह काम किया है। पंकज सुबीर की ‘जिन्हें जुर्म-ए-इश्क पे नाज़ था’ इसीकी अगली कड़ी है।
       अमूमन उपन्यास अनेक चरित्रों की अनेक कहानियों का ऐसा गुम्फन होता रहा है जिनके घटित होने का कालखण्ड लम्बा होता है और जो विभिन्न स्थलों पर घटती रही हैं। यही कारण रहा है कि उसे उसकी मोटाई अर्थात पृष्ठों की संख्या देख कर भी पहचाना जाता रहा है। चर्चित पुस्तक भी उपन्यास के रूप में सामने आती है। इसका कथानक भले ही छोटा हो, जिसका कालखण्ड ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास ‘नरक यात्रा’ की तरह एक रात्रि तक सिमिटा हो किंतु तीन सौ पृष्ठों में फैला इसमें घटित घटनाओं से जुड़ा दर्शन और इतिहास उसे सशक्त रचना का रूप देता है भले ही किसी को उपन्यास मानने में संकोच हो रहा हो। ईश्वर की परिकल्पना को नकारने वाली यह कृति विश्व में धर्मों के जन्म, उनके विस्थापन में दूसरे धर्मों से चले हिंसक टकरावों, पुराने के पराभवों व नये की स्थापना में सत्ताओं के साथ परस्पर सहयोग का इतिहास विस्तार से बताती है। देश में स्वतंत्रता संग्राम से लेकर समकालीन राजनीति तक धार्मिक भावनाओं की भूमिका को यह कृति विस्तार से बताती है। इसमें साम्प्रदायिक दुष्प्रचार से प्रभावित एक छात्र को दुष्चक्र से निकालने के लिए उसके साथ किये गये सम्वाद के साथ उसके एक रिश्तेदार से फोन पर किये गये वार्तालाप द्वारा लेखक ने समाज में उठ रहे, और उठाये जा रहे सवालों के उत्त्तर दिये हैं। पुस्तक की भूमिका तो धार्मिक राष्ट्र [या कहें हिन्दू राष्ट्र] से सम्बन्धित एक सवाल के उत्तर में दे दी गयी है, जिससे अपने समय के खतरे की पहचान की जा सकती है।
 
       “जब किसी देश के लोग अचानक हिंसक होने लगें। जब उस देश के इतिहास में हुए महापुरुषों में से चुन-चुन कर उन लोगों को महिमा मंडित किया जाने लगे, जो हिंसा के समर्थक थे। इतिहास के उन सब महापुरुषों को अपशब्द कहे जाने लगें, जो अहिंसा के हामी थे। जब धार्मिक कर्मकांड और बाहरी दिखावा अचानक ही आक्रामक स्तर पर पहुँच जाए। जब कलाओं की सारी विधाओं में भी हिंसा नज़र आने लगे, विशेषकर लोकप्रिय कलाओं की विधा में हिंसा का बोलबाला होने लगे। जब उस देश के नागरिक अपने क्रोध पर क़ाबू रखने में बिलकुल असमर्थ होने लगें। छोटी-छोटी बातों पर हत्याएँ होने लगें। जब किसी देश के लोग जोम्बीज़ की तरह दिखाई देने लगें, तब समझना चाहिए कि उस देश में अब धार्मिक सत्ता आने वाली है। किसी भी देश में अचानक बढ़ती हुई धार्मिक कट्टरता और हिंसा ही सबसे बड़ा संकेत होती है कि इस देश में अब धर्म आधारित सत्ता आने को है।’’ रामेश्वर ने समझाते हुए कहा।     

इस पुस्तक में टेलीफोन के इंटरसेप्ट होने के तरीके से इतिहास पुरुषों में ज़िन्ना, गाँधी, नाथूराम गोडसे के साथ सम्वाद किया गया है जैसा एक प्रयोग फिल्म ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ में किया गया था। इस वार्तालाप से उक्त इतिहास पुरुषों के बारे में फैलायी गयी भ्रांतियों या दुष्प्रचार से जन्मे सवालों के उत्तर मिल जाते हैं। कथा के माध्यम से निहित स्वार्थों द्वारा कुटिलता पूर्वक धार्मिक प्रतीकों के दुरुपयोग का भी सजीव चित्रण है।
नेहरूजी के निधन पर अपने सम्वेदना सन्देश में डा. राधाकृष्णन ने कहा था कि “ टाइम इज द एसैंस आफ सिचुएशन, एंड नेहरू वाज वैल अवेयर ओफ इट”। महावीर के दर्शन में जो सामायिक है वह बतलाता है कि वस्तुओं को परखते समय हम जो आयाम देखते हैं, उनमें एक अनदेखा आयाम समय भी होता है क्योंकि शेष सारे आयाम किसी खास समय में होते हैं। जब हम उस आयाम का ध्यान रखते हैं तो हमारी परख सार्थक होती है। पंकज की यह पुस्तक जिस समय आयी है वह इस पुस्तक के आने का बहुत सही समय है। कुटिल सत्तालोलुपों द्वारा न केवल धार्मिक भावनाओं का विदोहन कर सरल लोगों को ठगा जा रहा है, अपितु इतिहास और इतिहास पुरुषों को भी विकृत किया जा रहा है। पुराणों को इतिहास बताया जा रहा है और इतिहास को झुठलाया जा रहा है। आधुनिक सूचना माध्यमों का दुरुपयोग कर झूठ को स्थापित किया जा रहा है जिससे सतही सूचनाओं से कैरियर बनाने वाली पीढी दुष्प्रभावित हो रही है जिसका लाभ सत्ता से व्यापारिक लाभ लेने वाला तंत्र अपने पिट्ठू नेताओं को सत्ता में बैठा कर ले रहे हैं। ऐसे समय में ऐसी पुस्तकों की बहुत जरूरत होती है। यह पुस्तक सही समय पर आयी है। हर सोचने समझने वाले व्यक्ति की जिम्मेवारी है कि इसे उन लोगों तक पहुँचाने का हर सम्भव प्रयास करे जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। शायद यही कारण है कि देश के महत्वपूर्ण चिंतकों ने सुबीर को उनके साहस के लिए बधाई देते हुए उन्हें सावधान रहने की सलाह दी है।       
इस कृति की कथा सुखांत है, किंतु इसके सुखांत होने में संयोगों की भी बड़ी भूमिका है। कितने शाहनवाजों को रामेश्वर जैसे धैर्यवान उदार और समझदार गुरु मिल पाते हैं! कितने जिलों के जिलाधीश वरुण कुमार जैसे साहित्य मित्र होते हैं, विनोद सिंह जैसे पुलिस अधीक्षक होते हैं, और भारत यादव जैसे रिजर्व फोर्स के पुलिस अधिकारी मिल पाते हैं, जो रामेश्वर के छात्र भी रहे होते हैं व गुरु की तरह श्रद्धाभाव भी रखते हैं। आज जब देश का मीडिया, न्यायव्यवस्था, वित्तीय संस्थाएं, जाँच एजेंसियों सहित अधिकांश खरीदे जा सकते हों या सताये जा रहे हों, तब ऐसे इक्का दुक्का लोगों की उपस्थिति से क्या खतरों का मुकाबला किया जा सकता है या इसके लिए कुछ और प्रयत्न करने होंगे?
वीरेन्द्र जैन
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बुधवार, सितंबर 04, 2019

संस्मरण धर्मवीर भारती, पुष्पा भारती, कनु प्रिया


संस्मरण
धर्मवीर भारती, पुष्पा भारती, कनु प्रिया

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वीरेन्द्र जैन
गत दिनों भारत भवन में इला अरुण, के के रैना द्वारा परिकल्पित और निर्देशित नाटक ‘शब्द लीला’ के मंचन का समाचार पढने को मिला। पिछले कुछ वर्षों में भारत भवन में आमंत्रण भेजे जाने वाली सूची में संशोधन किया गया था और गत दो दशक की परम्परा को तोड़ते हुए मुझ जैसे लोगों को आमंत्रण भेजना बन्द कर दिया गया था, इनमें म.प्र. प्रगतिशील लेखक संघ के प्रदेश अध्यक्ष व ऎतिहासिक वसुधा पत्रिका के सम्पादक राजेन्द्र शर्मा भी सम्मलित हैं। यदि समय पर सूचना मिल गयी होती तो इसे देखने मैं अवश्य ही गया होता।
मेरी रुचि का कारण इसका विषय है। यह नाटक धर्मवीर भारती की प्रसिद्ध रचना ‘कनु प्रिया’ पर आधारित बताया गया है जिसके बाद में ‘अन्धायुग’ का मंचन भी किया गया था। कहा जाता है कि ‘कनु प्रिया’ रचने की प्रेरणा भारती जी को अपने निजी जीवन में उठे द्वन्द और उसे हल करने के प्रयासों से प्राप्त जीवन अनुभवों से मिली। वे इलाहाबाद विश्व विद्यालय में हिन्दी के प्राध्यापक थे और पुष्पा भारती उनकी कक्षा की सबसे सुन्दर लड़कियों में से एक थीं। पूर्व से विवाहित भारती जी को उनके रूप और इस आकर्षण को मिले प्रतिदान ने द्वन्द में डाल दिया था। उन दिनों इलाहाबाद हिन्दी साहित्य की राजधानी थी जहाँ भारती जी के अलावा निराला, फिराक गोरखपुरी, हरिवंशराय बच्चन, सुमित्रा नन्दन पंत, महादेवी वर्मा, उपेन्द्र नाथ अश्क, भैरव प्रसाद, मार्कण्डेय, कमलेशवर, दुष्यंत कुमार त्यागी, ज्ञानरंजन, रवीन्द्रनाथ त्यागी आदि आदि लोग सक्रिय थे। अपनी प्रेमिका छात्रा पुष्पा भारती से विवाह करने के विचार पर नैतिकतावादी भारती गहरे द्वन्द से घिरे रहे पर अंततः उनका प्रेम जीता और उन्होंने पुष्पा जी से विवाह कर लिया।
एक बार धर्मयुग में उन्होंने लोहिया जी पर एक संस्मरणात्मक लेख लिखा। इस लेख में उन्होंने लिखा था कि अपने दूसरे विवाह के सम्बन्ध में उन्होंने लगभग समस्त परिचितों और आदरणीयों से सलाह चाही थी किंतु किसी ने भी खुल कर मेरा समर्थन नहीं किया था। किंतु जब उन्होंने लोहिया जी से सलाह मांगी तब उनकी सहमति ने उन्हें बल दिया था और वे निष्कर्ष पर पहुँचे थे। जैसा कि मैं पहले भी एक संस्मरण में जिक्र कर चुका हूं कि जब पुष्पा भारती जी भोपाल आयीं थीं, और दुष्यंत संग्रहालय में मुझे उनसे बातचीत का अवसर मिला था तो मैंने उनसे भारती जी की राजनीति के बारे में जानना चाहा था। उनका उत्तर था कि भारतीजी किसी राजनीति विशेष से जुड़े हुए नहीं थे और उनके घर पर तो हर तरह की राजनीति के लोग आते थे। इस पर मैंने कुरेदते हुए लोहिया जी से उनके सम्बन्धों के बारे में जनना चाहा तो उन्होंने एक संस्मरण सुनाया।
“भारतीजी तब मुम्बई [तब की बम्बई] आ चुके थे। लोहिया जी मुम्बई आये हुये थे और रेलवे स्टेशन के रिटायरिंग रूम में रुके हुये थे। हम दोनों उनसे मिलने गये और भारती जी ने मेरा परिचय कराया तो उन्होंने छूटते ही कहा चीज तो बहुत अच्छी है। यह सुन कर मुझे आग लग गयी। जब भारतीजी ने बाहर ले जाकर मुझसे पूछा कि क्या आज शाम इन्हें खाने पर बुला लें तो मैंने साफ मना कर दिया कि इस आदमी को तो मैं कतई खाना नहीं खिला सकती। फिर भारतीजी ने कभी ऎसा प्रस्ताव नहीं किया।“
इस पर जब मैंने पुष्पाजी को धर्मयुग में लिखे भारतीजी के संस्मरण के बारे में बताते हुए यह भी बताया कि आपसे शादी का अंतिम निर्णय लोहिया जी की सलाह के बाद ही हुआ था तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ, क्योंकि उन्हें यह बात पता ही नहीं थी। वे बोलीं, तो ये बात थी। शायद उन्हें अफसोस हुआ हो।
भारतीजी की पहली पत्नी का नाम कांता था जिसे समाचार में भूल से कामता लिख दिया गया है। उन्होंने ‘रेत पर तड़फती हुयी मछली’ नाम से एक उपन्यासनुमा रचना लिखी है। इस कृति के बारे में कहा जाता है कि वह उनकी आत्मकथा है। भारतीजी से द्वेष रखने वाले किसी विश्वविद्यालय के चयनकर्ताओं ने उसे कभी कोर्स में भी लगा दिया था। कांता जी की एक लड़की भी थी जो काफी समय तक मुम्बई में रही।
भारतीजी जितने अच्छे साहित्यकार थे उतने ही अच्छे सम्पादक भी थे। मैं यह बात निजी अनुभव से कह सकता हूं कि उन्होंने देश भर में हजारों लेखकों को मांजा है, संवारा है, और पहचान दी है। छोटी छोटी पर्चियों पर लिखी उनकी संक्षिप्त टिप्पणियां आज भी मेरी धरोहर हैं।
इसी मुलाकात में पुष्पाजी ने एक और संस्मरण साझा किया था जो उन्हें लता मंगेशकर ने फोन करके बताया था। एक बार लताजी पुणे से लौट रही थीं कि दो लड़कियां लिफ्ट मांगने का इशारा करते हुयीं दिखीं तो उन्होंने ड्राइवर से उन्हें बैठा लेने को कहा। ड्राइवर ने बेमन से आदेश का पालन किया। लताजी उन लड़कियों से उनके बारे में पूछ ही रही थीं कि ड्राइवर ने सीडी प्लेयर चालू कर दिया जिसमें लताजी का ही गीत आ रहा था। उन लड़्कियों ने उन्हें रोकते हुए कहा कि रुकिए, लताजी का गीत आ रहा है। गीत समाप्त होने के बाद उन्होंने पूछा कि क्या तुम लोगों को लताजी पसन्द हैं? उत्तर में उन्होंने कहा कि वे तो हमारे लिए भगवान हैं। लताजी ने पूछा कि अगर तुम्हें लताजी से मिलवा दें तो? उन लड़कियों ने ऐसा भाव प्रकट किया कि यह तो सम्भव ही नहीं है। तब लताजी न कहा कि मैं ही लता मंगेशकर हूं तो दोनों ने इसे सबसे बड़ा चुटकला सुन लेने के अन्दाज़ में खुले मुँह पर चार उंगलियां रख कर उपहास भाव प्रकट किया। लता जी ने उनके विश्वास को तोड़ने की कोशिश न करते हुए ड्राइवर से कहा कि मुझे घर छोड़ते हुए इन्हें इनके गंतव्य तक पहुंचा देना। ड्राइवर ने जब उनके घर पर छोड़ा, जिसके बारे में वे लड़कियां शायद पहले से जानती होंगीं, तो उनकी हालत देखने लायक थी।
राजीव गाँधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद हिन्दी में सबसे पहला साक्षात्कार पुष्पा भारती को ही दिया था। इसकी व्यवस्था तत्कालीन सांसद अमिताभ बच्चन ने की थी जो उन्हें बड़ी बहिन मानते रहे हैं। स्मरणीय है कि अमिताभ की शादी के समय उन्होंने इसी भूमिका का निर्वाह किया था। अपने समय की बहुचर्चित पुष्पाजी मुम्बई में ही रहती हैं। कामना है वे स्वस्थ रहें और उम्रदराज हों।   
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
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शुक्रवार, अगस्त 23, 2019

संस्मरण – बाबूलाल गौर वे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सच्चे चेहरे थे

संस्मरण – बाबूलाल गौर
वे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सच्चे चेहरे थे
वीरेन्द्र जैन






 बाबूलाल गौर नहीं रहे।
हमारे संविधान निर्माताओं ने जिस लोकतंत्र की कल्पना की थी, उसके अनुरूप कम प्रतिनिधि ही सामने आये हैं, किंतु बाबूलाल गौर उनसे भिन्न थे। वे हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के सच्चे प्रतिनिधि थे। वे इतने अधिक पदों पर रहे कि उनके साथ अनेक विशेषण जुड़ते हैं। वे पार्षद से शुरू करते हैं और फिर विधायक, विधानसभा में विपक्ष के नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री और फिर मंत्री व केवल विधायक तक पहुँचते हैं किंतु कभी भी पद का अभिमान नहीं रखा। कपड़ा मिल में काम करते हुए जिस ट्रेड यूनियन के नेता का स्वरूप ग्रहण किया था उसे ही हमेशा बनाये रखा। उनसे कभी भी कोई मिल सकता था या वे किसी के भी घर जा सकते थे। यही कारण था कि उन्होंने लगातार विधायक चुने जाने का विश्व रिकार्ड बनाया। जिसे उनकी पार्टी की सदस्यता का पता न हो वह उनके आचरण से पता नहीं लगा सकता था कि वे भाजपा में हैं, काँग्रेस में हैं या किसी समाजवादी दल में हैं। भोपाल में रहने वाले सक्रिय लोगों से उनकी मुलाकात हो जाना सहज सम्भव थी। वे मुझे निजी तौर पर नहीं जानते थे किंतु जब जब भी मुलाकात हुयी तो बातचीत या व्यवहार से ऐसा नहीं लगा कि वे किसी अपरिचित से बात कर रहे हैं। वे हमेशा देशी आदमी की तरह सरल सहज रहे।
यह संस्मरण एक घटना विशेष से जुड़ा है। भूमिका भी बता दूं। मैं बैंक की नौकरी से वीआरएस लेकर 2001 में यह सोच कर भोपाल आया था कि लेखन और पत्रकारिता करने का पुराना सपना पूरा कर सकूं। यहाँ आकर निदा फाजली के शे’र का मतलब समझ में आया – यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता / मुझे गिराकर अगर तुम सम्हल सको तो चलो। पहले कभी लोकल अखबारों में सम्पादकीय पृष्ठ पर छपने वाले विचार परक लेख लिखता था, कभी कभी सम्पादकीय भी लिख देता था, सो सोचा था कि जब पूर्णकालिक पत्रकार ही बनना है तो बड़े अखबार में प्रवेश का रास्ता बनाया जाये। दैनिक भास्कर सबसे ज्यादा सरकुलेशन वाला अखबार था। उसमें सम्पादकीय पृष्ठ पर व्यंग्य का कालम आता था सो उससे ही शुरुआत हुयी। उनकी सीमा थी कि वे लगातार किसी एक व्यक्ति को नहीं छाप सकते थे सो मैं महीने में दो तीन बार ही छप पाता था जबकि मैं रोज लिखा करता था। सम्पादक से बात हुयी तो वे एक दो महीने में उस पृष्ठ पर छपने वाले दो मुख्य लेखों में से दूसरा लेख छापने लगे। इससे भी मेरा मन नहीं भरा। उन दिनों पाठकों के पत्र समुचित संख्या में छपते थे और उनमें से एक शिखर पर खास चिट्ठी के रूप में बाक्स में छपता था। इसमें कोई बन्दिश नहीं थी, इसलिए मैं सम्पादकीय की तरह इसमें लगभग नित्य लिखने लगा। यह व्यंग्य और सम्पादकीय का मिला जुला संक्षिप्त रूप होता था। इसे काफी पढा जाने लगा। उन दिनों मेरे पास इंटरनैट सुविधा नहीं थी और मैं अपना पत्र लेकर भरी दुपहरी में भास्कर कार्यालय जाया करता था किंतु अच्छा रिस्पोंस होने के कारण अखरता नहीं था।
इसी बीच दो घटनाएं घटीं। एक बयान में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भाजपा से सवाल पूछा कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की परिभाषा क्या है, और दूसरी घटना में भाजपा के पार्षदों के बीच आपस में मारपीट हो गयी जिसमें एक का सिर फट गया। इनको मिला कर मैंने एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी लिखी जिसे भास्कर ने खास चिट्ठी की तरह प्रकाशित की। उस समय भाजपा ने गौरी शंकर शेजवार को हटा कर गौर साहब को विपक्ष के नेता की जिम्मेवारी दे दी थी। उनके पास कैबिनेट मंत्री को मिलने वाली सारी सुविधाएं थीं। मेरे पत्र के प्रतिवाद में गौर साहब ने एक लम्बा पत्र लिखा। सम्पादकीय पृष्ठ देख रहे श्री राजेश पांडेय ने मुझे बुला कर वह लेखनुमा पत्र पढवाया। मैंने कहा कि जब पत्र के उत्तर में यह आया है तो इसे पत्र के कालम में ही छपना चाहिए।
पत्रनुमा लेख बड़ा था, इसलिए उसे संक्षिप्त किया गया और पत्र की तरह ही छापा गया। इस पत्र में गौर साहब की प्रतिभा और ज्ञान का परिचय मिलता है।
2005 में मैंने राज्य स्तरीय स्वतंत्र पत्रकार के रूप में अधिमान्यता के लिए आवेदन दिया था। इसमें विलम्ब होने पर मैंने मुख्यमंत्री कार्यालय को शिकायत लिख दी। खुशी है कि मेरी शिकायत पर तुरंत कार्यवाही हुयी और विशेष मीटिंग बुला कर मुझे अधिमान्यता दी गयी।
[ संलग्न तीन कटिंग्स ]

शनिवार, अगस्त 17, 2019

कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना - यह राजनीति है या कूटनीति


कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना - यह राजनीति है या कूटनीति
वीरेन्द्र जैन

रामकथा का कथानक ऐसा कथानक है जिस पर लगभग तीन सौ रचनाएं लिखी गयी हैं जो सभी अनूठी हैं। यही कारण है कि राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जिन्होंने खड़ी बोली में इस कथानक पर महाकाव्य रचा, कहते हैं –
राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है
कोई कवि बन जाय, सरल सम्भाव्य है
इस कथानक पर रची गयी सभी रचनाओं में एक बात साझा है कि रावण ने जब सीता का अपहरण किया था, तब वह साधु का भेष धर कर आया था। हमारे देश में पिछले दिनों घटित राजनीतिक घटनाओं में यह प्रवृत्ति निरंतर देखी जा रही है।
इसकी शुरुआत तो श्रीमती इन्दिरा गाँधी के सत्ता संघर्ष के दौर से हो गयी थी जिन्होंने अपनी ही पार्टी के एक गुट को परास्त करने के लिए खुद को समाजवाद की अग्रदूत बताना शुरू कर दिया था व कम्युनिष्टों से समर्थन पाने के लिए राष्ट्रपति पद पर उनके उम्मीदवार का समर्थन कर दिया था, बैंक व बीमा कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था तथा पूर्व राजा महाराजाओं के प्रिवीपर्स व विशेष अधिकारों को समाप्त कर दिया था। अपनी छवि बनाने के लिए उन्होंने एक कम्युनिष्ट पार्टी [सीपीआई] के साथ भी गठबन्धन कर लिया था। समाजवादी होने की छवि का भ्रम काफी समय तक बना रहा था, जब तक कि इमरजैंसी में संजय गाँधी ने काँग्रेस के असली चरित्र को प्रकट नहीं कर दिया था। बाद में सीपीआई को समझ आयी थी और 1978 के पंजाब अधिवेशन में उन्होंने अपनी भूल स्वीकारी थी और कुछ वरिष्ठ नेताओं को पार्टी से निकाला था जिनमें वरिष्ठ कम्युनिष्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे भी थे।
तत्कालीन जनसंघ जो बाद में भारतीय जनता पार्टी के रूप में उभरी वह देश के उत्तर-पश्चिमी भाग में कांग्रेस की सबसे बड़ी प्रतिद्वन्दी रही। संविद शासन के प्रयोगों में वह इकलौती संगठित पार्टी के रूप में उभरी क्योंकि उसके पीछे आरएसएस का मजबूत संगठन था। यही कारण रहा कि उसने कम्युनिष्ट पार्टी को छोड़ कर शेष सारे राजनीतिक दलों में सेंध लगा ली। समाजवादियों के दसियों दल धीरे धीरे उसमें समाते गये या निर्मूल होते गये।
भाजपा [ तब जनसंघ ] ने सबसे पहला भ्रम जनता पार्टी के गठन के समय जनता में पैदा किया और अपनी पार्टी को जनता पार्टी में विलीन कर दिया पर वे उसके सीमित कार्यकाल में भी गुपचुप रूप से अलग गुट बने रहे। जब उनके इस अलगाव की पहचान हो गयी तब उन्हें जनता पार्टी छोड़ना पड़ी और इसी कारण से पहली गैर कांग्रेसी सरकार का पतन हुआ। इसके कुछ समय बाद ही उन्होंने भारतीय जनसंघ से भारतीय लेकर और जनता पार्टी जोड़ कर भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। श्रीमती इन्दिरा गाँधी के समाजवाद का प्रभाव वे देख चुके थे इसलिए उन्होंने अपने घोषणा पत्र में अपने समाजवाद विरोधी चेहरे पर गांधीवादी समाजवाद का मुखौटा लगा लिया। यह मुखौटा फिट नहीं बैठा इसलिए इसे जल्दी ही उतारना पड़ा।
पंजाब में खालिस्तानी आन्दोलन के दौर में वे निशाने पर थे किंतु सत्तारूढ न होने के कारण सारे हमले कांग्रेस की ओर मुड़ गये। इस अलगाववादी आन्दोलन से भाजपा के लोग कभी सीधे नहीं टकाराये इसलिए नुकसान केवल कांग्रेस और कम्युनिष्टों को ही झेलना पड़ा। स्वर्ण मन्दिर पर आपरेशन ब्ल्यू स्टार का कहर श्रीमती इन्दिरा गाँधी को झेलना पड़ा जिसमें उनकी हत्या हो गयी। दिल्ली में सिख विरोधी नरसंहार हुआ किंतु भाजपा के लोग निष्क्रिय बने रहे। जब वे बुरी तरह चुनाव हार गये और लोकसभा में उनके कुल दो सदस्य चुने गये तो उन्होंने नई नीति के रूप में राम मन्दिर का मुद्दा तलाशा जो असल में कथित राम जन्मभूमि मन्दिर की जमीन के मालिकाना हक का मामला था जिसे अयोध्या में राम मन्दिर निर्माण का नाम दे दिया। इससे लाखों लोगों की भावनाएं भड़कीं। निशाने पर ध्रुवीकरण था जिससे हिन्दू बहुसंख्यक समाज में उन्हें समर्थन मिलता गया।
उन्होंने अपने सहयोगी संगठन विश्व हिन्दू परिषद को आगे करके उन्हीं मन्दिरों का मुद्दा उठाया जो विवादास्पद थे और अतीत में कभी भी मुसलमानों के साथ विवाद रहा था। प्रत्यक्ष में हिन्दू धर्मस्थलों की रक्षा थी किंतु परोक्ष में ध्रुवीकरण का लक्ष्य प्राप्त करना था।
मोदी शाह सरकार आने के बाद इस परम्परा को और अधिक करीने से लागू किया गया। ध्रुवीकरण के लिए उन्होंने ऐसे मुद्दे चुने जो प्रत्यक्ष में तो एक आदर्श उपस्थित करते दिखते थे किंतु उसके पीछे मुस्लिम समाज की विसंगतियां उभारना और उसमें अंतर्निहित भेद को बढाना था। तीन तलाक का मुद्दा भी ऐसा ही मुद्दा था। यह मुस्लिम समाज में ऐसी बुरी प्रथा है जो पीड़ित महिला को अधर में निराश्रित छोड़ देती है। किंतु किसी घटना के बाद पूरे मुस्लिम समाज से बदला लेने के लिए निरपराध लोगों को औरतों बच्चों और उनकी सम्पत्तियों को जला देने वालों के पक्षधरों से यह उम्मीद बेमानी थी कि वे उनके भले के लिए यह कदम उठा रहे हैं। इससे प्रगतिशीलता का दावा करने वाले अन्य विपक्षी दलों को विभूचन में छोड़ दिया। उस हिन्दू समाज में जिसके प्रतिनिधि होने का ये दावा करते हैं, में ढेर सारी गलत परम्पराएं हैं, किंतु देवदासियों से लेकर महिलाओं के मन्दिर प्रवेश तक पर ये सुप्रीम कोर्ट का आदेश तक मानने को तैयार नहीं।
धारा 370 को हटाने की तैयारी इसके लागू करते समय ही थी, और इसी कारण इसमें अस्थायी शब्द जोड़ा गया था। इसके बहुत से प्रावधान जैसे राज्यपाल की जगह राष्ट्रपति होना या मुख्यमंत्री की जगह प्रधानमंत्री होने को पहले से ही हटाया जा चुका था। कश्मीर में भारत के विलय के समर्थक सभी राष्ट्रीय दल थे और सब चाहते थे कि उचित समय पर इसे हटा दिया जाना चाहिए। किंतु इसे जिस तरह से प्रस्तुत किया गया उससे ऐसी छवि बनी कि शेष विपक्षी दल इसे हटाना नहीं चाहते और वे पाकिस्तान के पक्ष के समर्थन में हैं। दूसरी ओर वे यह भी प्रचारित करते हैं कि विपक्षी दल ऐसा वोट बैंक के लालच में कर रहे हैं अर्थात देश के सारे मुसलमान देश्द्रोही हैं व पाकिस्तान समर्थक हैं जो इसी आधार पर गैरभाजपा दलों को समर्थन देते हैं। सीमित सूचनाओं वाले लोग इस पर भरोसा भी कर लेते हैं।
गाँधी नेहरू परिवार का स्वतंत्रता संग्राम में गौरवशाली इतिहास रहा है जिसके प्रति पूरा देश उपकृत महसूस करता रहा है। उनके बाद की पीढी ने उनके इस इतिहास को हद से अधिक भुनाया और कांग्रेस में दूसरा नेत्रत्व ही विकसित नहीं हो सका। ऐसे लोग भी नेतृत्व में आ गये जो इस ऎतिहासिक पार्टी का नेतृत्व करने में उतने सक्षम नहीं थे जितने की आवाश्यकता थी। एक रणनीति के रूप में भाजपा परिवार ने इतिहास को विकृत करते हुए नेहरू जी की छवि को झूठे किस्सों से बिगाड़ने का सोचा समझा खेल खेला। इनका पूरा जोर उन मतदाताओं को फुसलाना होता है जिनकी जानकारियों के स्त्रोत सीमित हैं। इन सीमित स्त्रोतों को भी खरीद कर उनकी सोच को एक अवैज्ञानिक धारा में कैद कर दिया गया है।
भाषा से लेकर प्रतीकों तक ऐसा खेल रचा जा रहा है जिसमें सच को विलोपित किया जा रहा है और झूठ को स्थापित किया जा रहा है। यह सबकुछ चुनावी बहुमत हस्तगत करने के गुणाभाग के अनुसार सोच समझ कर किया जा रहा है। जब उनका ध्यान सच की ओर आकर्षित किया जाता है तो उनका उत्तर होता है कि इसी को तो राजनीति कहते हैं। यह एक गलत उत्तर है, यह राजनीति नहीं कूटनीति है।
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, अगस्त 13, 2019

धारा 144 लगाकर धारा 370 का समापन

धारा 144 लगाकर धारा 370 का समापन
वीरेन्द्र जैन

चक्रवर्ती सम्राटों की पुराण गाथाओं और अश्वमेध यज्ञ करने की कथाओं में श्रद्धा रखने वाला सामंती समाज स्वभावतः भूमि और भवनों को हस्तगत कर प्रसन्न होता है। जब मामला देश के स्तर का होता है तो दूसरे राज्यों को अपने राज्य में मिला कर उसे खुशी मिलती है। पुराने समय में राज्य, युद्ध या युद्ध का भय दिखा कर जीते जाते थे, अब तरीका बदल गया है। सिक्कम और गोवा के भारत में विलय पर देश में सर्वत्र प्रसन्नता देखी गयी थी। गोवा का विलय नेहरूजी के समय हुआ था और सिक्कम का विलय श्रीमती इन्दिरा गाँधी के प्रधानमंत्री रहते हुए हुआ था और जब जनता पार्टी के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उक्त विलय पर प्रतिकूल टिप्पणी की थी तो उन्हें अपने ही मंत्रिमण्डल के सदस्यों की आलोचना का शिकार होना पड़ा था। बाद में जैसा कि होता है, उन्होंने अपनी निजी बात के गलत अर्थ लगाने का बयान देकर स्थिति साफ की थी। दुनिया का आकार तो उतना का उतना ही रहता है किंतु उसमें राजनीतिक भूगोल बदलता रहता है जिससे इतिहास बनता है। पता नहीं कि हम पुरने समय में किन सीमाओं से बने देश को भारत, हिन्दुस्तान, इंडिया या भरतखण्डे जम्बूदीपे आदि मानते आ रहे हैं और अपने देश को प्राचीन देश कह कह कर उसकी एक एक इंच भूमि पर सौ सौ शीश चढा देने की गाथाएं बनाते, सुनाते रहते हैं, पर इतिहास बताता है कि देश की सीमाएं बदलती रही हैं। शायद यही कारण रहा है कि पुराने समय में सैनिकों द्वारा देश नहीं अपितु राजा की बफादारी का संकल्प लिया जाता था।
हमारे आज के नक्शे में दर्शाये गये भूभाग पर हजारों सालों से हूण, शक, मंगोल, मुगल, अंग्रेजों आदि के हमले होते रहे हैं और समय समय पर राज्यों के भूगोल बदलते रहे हैं। राजनीतिक नक्शे जड़ नहीं होते क्योंकि उन्हें चेतन लोगों द्वारा बनाया जाता है और उन्हीं के द्वारा बदला भी जाता है। 1947 में ब्रिटिश इंडिया को यह भूभाग छोड़ कर जाना पड़ा। अंग्रेजों को इस क्षेत्र से खदेड़ने में इसके हिन्दू, मुस्लिम, सिख ईसाई, पारसी, जैन बौद्ध आदि विभिन्न धर्मों की मानने वाले अनेक निवासियों ने एक साथ अंग्रेजों से टक्कर ली और महात्मा गांधी के नेतृत्व के कारण कम से कम हिंसा, प्रतिहिंसा से उन्हें जाने को विवश कर दिया। अहिंसक सत्ता परिवर्तन की यह अनूठी घटना थी। किंतु एक साथ अहिंसक संघर्ष करने वाले लोग सत्ता के सवाल पर धार्मिक आधार पर विभाजित हो गये, हिंसा पर उतर आये और 14-15 अगस्त 1947 को हिन्दुस्तान व पाकिस्तान दो बड़े हिस्सों में हम बंट गये। दोनों देशों के निर्माण में अंग्रेजों द्वारा शासित राज्यों को चयन की स्वतंत्रता थी कि वे चाहें तो भारत या पाकिस्तान में मिल स्कते हैं, और चाहें तो स्वतंत्र भी रह सकते हैं। केरल के दो राज्य अंग्रेजों के अधीन नहीं थे पर उन्होंने भारत में विलय मंजूर किया। हैदराबाद और जूनागढ राज्य प्रमुखों के न चाहने पर भी हिन्दुस्तान में मिलाये गये क्योंकि वहाँ के शासक मुस्लिम थे व जनता का बड़ा हिस्सा हिन्दू था। इसी तरह जम्मू कश्मीर राज्य भी उस दौरान अंग्रेजों के अधीन नहीं था पर उसने स्वतंत्र रहना चाहा। 1845 में नियंत्रण में दुरूहता को देखते हुए अंग्रेजों ने कश्मीर घाटी को जम्मू के डोगरा राजा गुलाब सिंह को 75 लाख नानकशाही रुपयों में बेच दिया था। यह क्षेत्र मुस्लिम बहुल था और जम्मू से आवागमन के रास्ते आज जितने सरल नहीं थे। कश्मीर घाटी और लेह लद्दाख में इसीलिए समानांतर नेतृत्व उभरता रहा। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में शेख अब्दुल्ला जनता के नेता के रूप में उभरे और मुस्लिम कांफ्रेंस के नाम से उन्होंने अपना संगठन बनाया तो वह सबसे बड़ा और प्रभावकारी संगठन था, जिसमें हथियार बन्द लड़ाके भी शामिल थे। बाद में उन्होंने अपने संगठन का नाम नैशनल कांफ्रेंस कर लिया और भारत की आज़ादी के लिए चल रहे राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं से सम्पर्क साधा।
उन दिनों कांग्रेस की नीति थी कि वह राजाओं के खिलाफ चल रहे आन्दोलनों को सीधे सहयोग नहीं करती थी पर अपने नेताओं को निजी तौर पर मदद करने के लिए कहती थी। शेख अब्दुल्लाह, जनता की मांगों के लिए राजा से टकराते रहते थे। नेहरू और शेख अब्दुलाह की मित्रता इसी सन्दर्भ में परवान चढी। जब शेख अब्दुलाह, जो कश्मीर के हिन्दू और मुसलमानों दोनों का नेता था ने 11 जून 1939 को एक अधिवेशन में मुस्लिम कांफ्रेंस का नाम नैशनल कांफ्रेंस रखा तो उनका एक धड़ा चौधरी गुलाम अब्बास के नेतृत्व में टूट गया जो इस नाम परिवर्तन के खिलाफ था। इससे थोड़ा कमजोर होकर शेख अब्दुल्लाह नेहरू और कांग्रेस के और करीब आ गये।  परोक्ष में कांग्रेस का समर्थन पाकर शेख अब्दुल्लाह की नैशनल कांफ्रेंस ही वहाँ का प्रमुख संगठन रहा जिसने अपने संघर्षों से जनता को अनेक अधिकार दिलवाये जिनमें ज़मींदारी प्रथा की समाप्ति भी था।
1947 में तत्कालीन राजा हरी सिंह के ढुलमुल रवैये को देखते हुए, कभी मुस्लिम कांफ्रेंस का हिस्सा रहे गुलाम अब्बास के धड़े ने पाकिस्तान से मिल कर कबाइलियों की फौज से हमला करा दिया जिसका सामना शेख अब्दुल्लाह ने अपने लड़ाकों की मदद से करते हुये भारत सरकार से अविलम्ब हस्तक्षेप करने का आग्रह किया। भारत सरकार बिना विलय के दूसरे के राज्य में अपनी फौज नहीं भेज सकती थी इसलिए उसने राजा हरी सिंह पर विलय के लिए दबाव डाला जो परिस्तिथियों को देखते हुए उन्हें स्वीकार करना पड़ा। इस पर हस्ताक्षर होते ही भारत सरकार ने अपनी फौज घाटी में भेजी, जो नैशनल कांफ्रेंस के लड़ाकों के साथ मिल कर लड़ी। नैशनल कांफ्रेंस के अनेक लड़ाके शहीद हुये, किंतु तब तक आधा कश्मीर नियंत्रण से बाहर जा चुका था जो आज आज़ाद कश्मीर या पाकिस्तान आक्यूपाइड कश्मीर के नाम से जाना जाता है। पाकिस्तान इसी को आधार बना कर अपने यहां प्रशिक्षित घुसपैठिये भेजता है, जो आतंकी गतिविधि करते हैं, अलगाववाद भड़काते हैं।
शेख अब्दुल्लाह कश्मीर घाटी में अपनी हैसियत को देखते हुये स्वयं भी स्वतंत्र कश्मीर का शासक बनना चाहता था इसलिए उसने युद्ध विराम के बाद विलय की शर्तें रखीं जिनको माने बिना घाटी की जनता का विश्वास नहीं जीता जा सकता था, इसलिए सबको वे शर्तें माननी पड़ीं। धारा 370 के प्रावधान उन्हीं शर्तों के कारण लाये गये थे, जो क्रमशः कमजोर किये जाते रहे। श्रीमती इन्दिरा गाँधी के समय इमरजैंसी में बहुत से प्रावधान हटा दिये गये थे।
मुस्लिम कांफ्रेंस के टूटे हुए धड़े का नेता ही पीओके में गया था और उसका दखल अब भी कश्मीर में था। घाटी की भौगोलिक स्थिति एवं उसमें अंतर्राष्ट्रीय रुचि को देखते हुए वहाँ सेना को बनाये रखना पड़ा व चुनाव इस तरह से कराना पड़े ताकि भारत सरकार के समर्थन वाली राज्य सरकार ही गठित हो। उल्लेखनीय है कि जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय चुनाव हुये थे तब उन्होंने कहा था कि हमारी पार्टी चुनाव हार गयी तो क्या हुआ किंतु इस बार कश्मीर में लोकतंत्र जीता है। कहा जाता है कि उस समय पहली बार वहाँ साफ सुथरे चुनाव हुये थे।
सच है कि जम्मू कश्मीर में लम्बे समय तक शासन शेख अब्दुल्लाह परिवार या उनके रिश्तेदारों आदि को जागीर की तरह सौंपा जाता रहा और सेना की सुरक्षा में वे उसी तरह शासन भी करते रहे। इन परिवारों पर सरकारी धन के दुरुपयोग कर निजी सम्पत्ति बनाने के आरोप गलत नहीं हैं। जिस धन से विकास द्वारा वहाँ के लोगों का विश्वास जीत कर उन्हें विलय का महत्व समझाये जाने में लगाना था, उसे कश्मीर के शासकों ने निजी हित में लगा कर दोहरा नुकसान किया। कश्मीर के साथ प्रयोग दर प्रयोग किये जाते रहे। जगमोहन जैसे राज्यपालों ने दमन के सहारे कश्मीर को बदलने की कोशिश में वहाँ अलगाववाद आतंकवाद के साथ साम्प्रदायिकता के बीज भी बो दिये जो वहाँ कभी नहीं रही। इसी का परिणाम था कि एक लाख हिन्दू पंडितों को कश्मीर छोड़ कर जम्मू में बसना पड़ा। यह अलगाव अभी भी समस्या बना हुआ है। भयग्रस्त पंडित लाख आश्वासनों के बाद भी लौटने का जोखिम नहीं उठाना चाहते पर मिलने वाली राहत को बनाये रखने व बढाने के लिए अपने असंतोष को राजनीतिक हवा देने का काम निरंतर करते रहते हैं। अलगाववादी भी समय समय पर साम्प्रदायिक आधार पर आतंक के लिए नमूने की हिंसा करके भयभीत करते रहते हैं। साम्प्रदायिकता पर आधारित राजनीति भी इसमें अपने हाथ तापती रहती है।
दुर्घटना में गम्भीर रूप से घायल व्यक्ति का इलाज वही डाक्टर कर सकता है जो या तो अनुभवी हो या जो मरीज के जीने मरने से निरपेक्ष हो कर अपने प्रयोग करना चाहता हो। ऐसे ही कश्मीर को बहुत से डाक्टर छूने से ही डरते रहे और इस दशा से लाभांवित लोग यथास्थिति बनाये रखने के लिए उपचार न कर के केवल जिन्दा रखे रहे। इस दिशा में श्रीमती गाँधी ने इमरजैंसी के दौरान कुछ सुधार किये थे या उसके बाद अब नरेन्द्र मोदी सरकार ने जोखिम लेने का साहस दिखाया है। वहाँ संचार के साधन बन्द हैं और कर्फ्यू जैसे हालत हैं।
पक्ष विपक्ष दोनों ही चाहते रहे कि धारा 370 की समाप्ति हो किंतु खतरे को दूसरे पर टालने की कोशिश करते रहे। भाजपा ने जब यह नारा दिया था, तब उसे सत्ता और फिर परिपूर्ण सत्ता में आने का भरोसा ही नहीं था। अपने ऐसे ही वादों के कारण उन्हें सत्ता में आने पर बहुत असमंजस का सामना करना पड़ा है। वे इस या उस बहाने से उससे बचते रहे, किंतु जब सारे बहाने सामाप्त हो गये तो ओखली में सिर देना ही पड़ा।
धारा 370 हटना चाहिए थी किंतु धारा 144 लगा कर नहीं।  
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 09425674629



                

रविवार, अगस्त 04, 2019

पुनरावलोकन फिल्म मेकिंग आफ महात्मा मोहनदास करमचन्द गांधी के महान बनने की कहानी


पुनरावलोकन फिल्म मेकिंग आफ महात्मा

मोहनदास करमचन्द गांधी के महान बनने की कहानी
वीरेन्द्र जैन
2 अक्टूबर 1869 को जन्मे गांधीजी का यह 150वां जन्मवर्ष है। हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में पद ग्रहण करते ही अपने पहले पहले उद्बोधनों में ही इस अवसर का उल्लेख किया था। यद्यपि 2019 के आम चुनावों के दौरान कुछ उम्मीदवारों ने गाँधीजी का उल्लेख उनकी महानता के अनुरूप न करके उनके हत्यारे का महिमा मंडन करने की कोशिश की जिसे उनके दल समेत पूरे देश ने एक स्वर से विरोध किया।
मध्यप्रदेश सरकार के संस्कृति संचालनालय ने इस अवसर पर गांधी जी के जीवन पर बनी कुछ फिल्मों के प्रदर्शन का आयोजन किया जिनमें उनके 125वें जन्मवर्ष के दौरान बनायी गयी श्याम बेनेगल की फिल्म मेकिंग आफ महात्मा भी थी। विषय की दृष्टि से यह एक बहुत महत्वपूर्ण फिल्म थी क्योंकि गांधीजी के अफ्रीका से भारत लौटने के बाद उनके स्वतंत्रता आन्दोलन के बारे में तो बहुत लिखा पढा गया है किंतु उनकी इस भूमिका में आने के लिए कौन सी परिस्तिथियां जिम्मेवार थीं और वे किस किस तरह से संघर्ष करते हुए इस स्थिति तक पहुँचे उसकी कथा कम ही लोगों को ज्ञात है। यह फिल्म उस कमी को पूरी करती है। आम तौर पर हमें जब महान लोगों के बारे में बताया जाता है तो अवतारवाद पर भरोसा करने वाला हमारा समाज उन महापुरुषों को जन्मना महान [बोर्न ग्रेट] मान कर चलता है। सच यह है कि किसी भी व्यक्ति के निर्माण में उसका परिवेश, परिस्तिथियां और उनके साथ उसकी मुठभेड़ जिम्मेवार होती है। इसे वह समय भी निर्धारित करता है जिस समय में वे घटनाएं सामने आती हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल ने मेकिंग आफ महात्मा बना कर बोर्न ग्रेट की धारणा को तोड़ने की कोशिश की है। गांधी जी के निर्माण की कथा महात्मा बुद्ध की उस कथा से मिलती जुलती है जिसमें सुख सुविधाओं में पले राजपुत्र सिद्धार्थ ने किसी वृद्ध, बीमार, और मृतक को देख कर इनके हल खोजने की कोशिश की थी, और उस कोशिश में महात्मा बुद्ध बन गये थे।
गांधीजी के ऐसे बहुत अच्छे वकील होने के प्रमाण नहीं मिलते हैं जो अपनी तर्क क्षमता से अपने मुवक्किल के पक्ष में काले को सफेद सिद्ध कर देता है अपितु लन्दन से बैरिस्टिर की डिग्री लेकर लौटने के बाद भी भारत में उनकी प्रैक्टिस अच्छी नहीं चल रही थी। किसी की सिफारिश पर उन्हें दक्षिण अफ्रीका में परिवार के अन्दर ही लेनदेन के एक मुकदमे को लड़ने के लिए बुलवाया गया था। उस मामले में भी उन्होंने एक अच्छे वकील होने की जगह एक सद्भावी पंच की भूमिका निभाते हुए दोनों के बीच समझौता कराने का प्रयास किया। यह आम वकीलों के व्यवहार से अलग था क्योंकि अधिक फीस हस्तगत करने के लिए वकील मुकदमे को चलाते रहना चाहते हैं। समझौते का उनका प्रयास सफल रहा था व इसी सद्भाव से प्रभावित होकर उनके मुस्लिम मुवक्किल के प्रतिद्वन्दी ने भारत आदि देशों से श्रमिक के रूप में आये लोगों के साथ अंग्रेज शासकों के व्यवहार के बारे में बताया। खुद भी भेदभाव का शिकार हो चुके गांधी जी को इससे स्थितियों को और समझने में मदद मिली, जिसके लिए उन्होंने एशिया के लोगों को संगठित किया और अपने ज्ञान व सद्भावी व्यक्ति की छवि के विश्वास पर विरोध का नेतृत्व किया। इस काम में उनके सम्पन्न मुवक्किलों ने भी मदद की।
उनकी समझ थी कि व्यक्ति दोषी नहीं होता है अपितु परिस्तिथियां दोषी होती है व मनुष्य परिस्तिथियों का दास होता है। यह समझ उन्हें कुरान बाइबिल गीता और टालस्टाय की पुस्तक पढ कर प्राप्त हुयी थी। कहा जा सकता है कि उनके निर्माण में पुस्तकों के साथ साथ उस धर्म निरपेक्ष भावना की भूमिका थी जिसके अनुसार वे किसी भी धर्म और उसके ग्रंथों से नफरत नहीं करते थे। यही कारण रहा कि उन्होंने मानवता का पाठ उन्हीं धर्मग्रंथों से सीखा जिन्हें बिना पढे या गलत ढंग से पढ कर लोग दंगे करते हैं और हजारों लोगों की हत्याएं कर देते हैं। जब भी कोई कुछ नया देखता है तो उससे सम्बन्धित अपने परम्परागत प्रतीकों से तुलना करके अपने विचार बनाता है। गांधीजी की सोच और विचारों को अफ्रीका के संघर्ष ने काफी बदला। वहीं पर उन्होंने कमजोरों के संघर्ष के दौरान अहिंसा की भूमिका को समझा और उसका प्रयोग किया। अफ्रीका में ही उन्होंने आन्दोलनों के दौरान सत्याग्रह का प्रयोग किया।   
गांधीजी ने शासकों का विरोध करते हुए भी युद्ध के समय उनका साथ दिया व रैडक्रास में काम करके घायलों की सेवा की। उन्हें इस बात से ठेस पहुंची कि ईसाइयत का पाठ पढी नर्सें भी काले लोगों की मरहमपट्टी नहीं करतीं। उन्होंने खुद यह काम किया और लोगों को प्रभावित किया। उनसे प्रभावित होकर किसी ने उन्हें अपनी ज़मीन दान कर दी तो उसमें उन्होंने फार्म बनाकर खेती प्रारम्भ कर दी और उसका नाम टालस्टाय फार्म रखा। जब उन्होंने मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व किया तो मजदूरों को फार्म पर काम दिया ताकि वे भूखे न मरें और उनका संघर्ष जिन्दा रहे। यही समय था जब गांधीजी को सादगी और स्वावलम्बन का महत्व समझ में आया। उनका सूट बूट और टाई छूट गयी। भारत लौटने पर उन्होंने इसी तर्ज पर आश्रम बनाये थे। वे जो कहते थे उसे खुद करके दिखाते थे इसी क्रम में उन्होंने अपनी पत्नी को भी आन्दोलन में भाग लेने व जेल जाने के लिए सहमत कर लिया तब उन महिलाओं को उतारा जिन के पति आन्दोलन के कारण जेल में थे। समय पर दाई के न आने पर उन्होंने अपनी पत्नी की डिलेवरी भी खुद करायी।    
गांधीजी ओजस्वी वक्ता नहीं थे किंतु बहुत सरलता से अपनी बात रखते थे जिससे उनकी बातों में सच्चाई झलकती थी। विचार सम्प्रेषित करने की कला में माहिर थे और अपने आचरण से वे सन्देश देते थे, इसके साथ साथ उन्होंने वहां इंडियन ओपीनियन नामक अखबार निकाला जिससे उनके विचारों का प्रसार हुआ। उनके विचारों से प्रभावित लोगों ने उन्हें सहयोग दिया। यही काम उन्होंने भारत लौट कर भी किया और भारत में यंग इंडियन व हरिजन नामक अखबार निकाले। उनके विचारों से प्रभावित होकर बड़े अखबार के सम्पादकों ने उनके आन्दोलन पर लेख लिखे और उनकी आवाज ब्रिटिश हुकूमत तक पहुँची, जिससे उन्हें संवाद सम्प्रेषण में प्रैस का महत्व समझ में आया। उनके आश्रमों में लगातार विदेशी अखबारों के सम्वाददाता मेहमान बनते रहे।
गांधीजी कुल इक्कीस साल साउथ अफ्रीका में रहे और जो मोहनदास करमचन्द बैरिस्टर होकर गये थे वे महात्मा गांधी बन कर भारत लौटे। इक्कीस साल की इस कहानी को सवा दो घंटे की फिल्म में बांध कर श्याम बेनेगल जैसे फिल्मकार ही दिखा सकते थे, जो 25 वर्ष पूर्व उन्होंने सफलता पूर्वक कर के दिखाया था। किसी बायोपिक में सम्बन्धित व्यक्ति के रंग रूप लम्बाई देहयष्टि के अनुरूप कलाकार चाहिए होते हैं जिसे फिल्मी दुनिया के ही रजत कपूर और पल्लवी जोशी जैसे सुपरिचित कलाकारों ने सफलतापूर्वक निर्वहन करके दिखा दिया था। यही कारण रहा कि इस फिल्म के लिए 1996 में बैस्ट फीचर फिल्म का अवार्ड मिला और रजत कपूर को बैस्ट एक्टर का अवार्ड मिला था।
व्यक्तित्व निर्माण की ऐसी सजीव कथाओं को बार बार देखा दिखाया जाना चाहिए।  
वीरेन्द्र जैन
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