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शुक्रवार, जून 22, 2012

भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व और उसके विरोधाभास


भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व और उसके विरोधाभास  
वीरेन्द्र जैन
      देश में भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है और यही कारण है कि जब भी कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़ा होता हुआ दिखता है तो उसके पीछे बहुत सारे लोग यह सोचे बिना ही आ जाते हैं कि जब तक यह समर्थन किसी सार्थक परिवर्तनकारी राजनीति और राष्ट्रव्यापी संगठन के साथ नहीं जुड़ता तब तक किसी परिणिति तक नहीं पहुँच पाता। जय प्रकाश नारायण का आन्दोलन हो या वीपी सिंह का अभियान हो वे व्यापक राजनीतिक दृष्टि और संगठन के बिना चलाये गये थे इसलिए बिना कोई परिवर्तन किये बड़ी घटनाएं बन कर रह गये। आज अन्ना का आन्दोलन हो या रामदेव का वे भी इसी दोष के शिकार हैं इसलिए उनकी परिणिति भी तय है। स्मरणीय है कि विदेशों में जमा धन को वापिस लाने को भाजपा ने अपना चुनावी मुद्दा बनाया था किंतु उसे आन्दोलन का रूप देने की कोई कोशिश नहीं की। जब रामदेव और अन्ना हजारे ने इस समस्या पर आन्दोलन प्रारम्भ किये तो कई राजनीतिक दल तो इनके पीछे इसलिए आ गये ताकि इनके अभियान से उठी लहर में वे अपनी नैय्या पार लगा सकें।
       भाजपा से जुड़े संगठनों ने तो साफ साफ कहा कि अन्ना के अनशन के दौरान उन्होंने न केवल संसाधनों में मदद की थी अपितु भीड़ एकत्रित करने में योगदान भी किया था। उनका यह बयान अन्ना टीम के लिए नुकसान दायक साबित हुआ था। अपनी सोच और अतीत में किये गये कारनामों के कारण भाजपा और उससे जुड़े जनसंगठन इस तरह से बदनाम हैं कि उनके सहयोग की भनक भर आन्दोलन को कमजोर करने के लिए काफी होती है इसलिए वे विपक्ष में रहते हुए भी इस विषय पर आन्दोलन नहीं छेड़ते पर उसका सम्भावित लाभ लेने के लिए परदे के पीछे से प्रयास करते हैं। स्मरणीय है कि जब अन्ना हजारे के आन्दोलन के प्रति लोगों में तीव्र आकर्षण पैदा हुआ था तब संघ ने भ्रष्टाचार के खिलाफ पहले आन्दोलन न छेड़ने के लिए भाजपा नेताओं को फटकार लगायी थी। रामदेव तो परोक्ष रूप से भाजपा से जुड़े ही रहे हैं और उनके ट्रष्ट भाजपा को विधिवत चन्दा देते आये हैं। यह अलग बात है कि उसे सार्वजनिक रूप से स्वीकारने में तब तक कतराते रहे जब तक मीडिया में प्रमाण सहित सच सामने नहीं आ गया।
      एक बार असफल हो जाने के बाद अन्ना हजारे और रामदेव ने सन्युक्त होकर पुनः आन्दोलन छेड़ने की योजनाएं तैयार की हैं और भाजपा जैसे दल उसके समर्थन को लपक लेने की तैयारी करने लगे हैं। असल में यह भ्रष्टाचार के खिलाफ आक्रोशित जनता के साथ एक और धोखा है कि उसकी भावनाओं को उस दल को बेच दिया जाये जिसे जनता पसन्द नहीं करती। इस आन्दोलन में कहीं भी चुनाव प्रणाली, कार्यपालिका व न्यायपालिका में वांछित परिवर्तन का नक्शा नहीं है जिनके चलते वर्तमान में जो भी कानून हैं वे निष्प्रभावी हैं, और उनके होते हुए भी भ्रष्टाचार ने इतना बड़ा स्वरूप ग्रहण कर लिया है।
      अभी हाल ही में घटित घटनाओं पर इन संगठनों ने जो टिप्पणियां की हैं उनसे इनकी कूटनीति का पता चलता है। अल्पसंख्यकों के मन में भाजपा के प्रति जो सन्देह हैं वही सन्देह भाजपा के जनसंगठनों से सहायता लेने वाले इन आन्दोलनकारियों के प्रति न रहें इसलिए इन्होंने कुछ वैसे ही टोटके किये हैं जैसे कि राजनीतिक दल करते रहते हैं। पिछले वर्ष अन्ना हजारे ने जब अनशन तोड़ा था तो एक मुस्लिम और एक दलित कन्या के हाथों से जल ग्रहण करने का ड्रामा किया था। विदेशों में जमा पैसा वापिस लाने का आन्दोलन चलाने वाले आयुर्वेद दवाओं के उद्योगपति रामदेव ने अपनी आन्ध्रा यात्रा के दौरान पृथक तेलंगाना राज्य की माँग का समर्थन किया था जिसे भाजपा अपना समर्थन दे रही है। पिछले महीने रामदेव ने आल इंडिया यूनाइटिड मुस्लिम मोर्चे के बैनर तले नई दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में आयोजित सम्मेलन में कहा कि अगर हिन्दू दलितों को आरक्षण मिलता है तो मुस्लिम दलितों को क्यों नहीं मिलना चाहिए? संविधान के अनुच्छेद 341 के अंतर्गत धार्मिक आधार पर पाबन्दी पूरी तरह गलत है, इस अनुच्छेद में बदलाव आना चाहिए। मैं इसके खिलाफ लड़ाई का ऐलान करता हूं। इस अवसर पर उन्होंने ‘बिसिमिल्लाह’ से शुरुआत करते हुए कुरान की आयत भी पढी। उन्होंने यह भी कहा कि मुसलमान देशभक्त हैं और देश पर जान कुर्बान करने के लिए तैयार रहते हैं। स्मरणीय है कि मुस्लिम विरोधी भाजपा मुसलमानों और ईसाइयों को आरक्षण देने के पक्ष में नहीं है पर उसने रामदेव के इस कूटनीतिक बयान पर कोई टिप्पणी नहीं की, जबकि कांग्रेस द्वारा यही बयान देने पर आसमान सिर पर उठा लेती। स्मरणीय है पिछले वर्ष रामदेव अपना राष्ट्रीय स्वाभिमान दल बनाकर उस बैनर से पूरे देश में चुनाव लड़ने की समय पूर्व घोषणा कर चुके थे, तथा भाजपा से झिड़की खाने के बाद उसे वापिस ले लिया था।
      गत दिनों यूपीए द्वारा प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाये जाने के बाद टीम अन्ना ने उन पर लगाये गये पुराने आरोपों को उसी तरह से उकेरा जैसे कि श्रीमती प्रतिभादेवी सिंह पाटिल को उम्मीदवार बनाये जाने पर भाजपा ने उनके परिवार वालों के खिलाफ लगाये थे। जो अपने आन्दोलन को गैर राजनीतिक प्रचारित करते हैं उनके द्वारा ऐसे समय कथित आरोप लगाये जाने से उनके राजनीतिक लक्ष्यों की झलक मिलती है। उल्लेखनीय है कि हजारों करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोप में जिन जगन मोहन रेड्डी को सीबीआई कैद में रख कर पूछ्ताछ कर रही है, उनकी जेबी पार्टी द्वारा उपचुनावों में सारी सीटें जीत लिए जाने के बाद भी भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलनरत टीम अन्ना ने न तो उन पर टिप्पणी करने की जरूरत समझी और न ही चुनाव प्रणाली के दोषों पर ही कोई टिप्पणी की। जब तक जगन मोहन रेड्डी कांग्रेस से अलग नहीं हुए थे तब तक भाजपा की ओर से उन पर और उनके पिता वाय एस रेड्डी पर अनगिनित आरोप ही नहीं लगाये जाते थे अपितु वे उनके ईसाई होने के कारण सोनिया गान्धी के संरक्षण मिले होने का आरोप भी लगाते थे। पर अब भाजपा नेता मनेका गान्धी जगन मोहन की माँ से सहानिभूति व्यक्त करती हैं और भाजपा उनके साथ गठबन्धन के प्रति वैसे ही लालायित है, जैसा कभी सुखराम और जयललिता के साथ कर चुकी है।  
      अन्ना हजारे और बाबा रामदेव दोनों को ही राजनीतिक दल बनाने, या गठबन्धन करने का पूरा अधिकार है पर वे जिस नैतिकता की दुहाई देते हुए अपना आन्दोलन चला रहे हैं उसके  आधार पर जनता को मूर्ख बनाने का अधिकार नहीं है। रामदेव कई लाख करोड़ डालरों के स्विस बैंकों में जमा होने की बात कहते रहे हैं किंतु स्विट्जरलेंड के केन्द्रीय बैंक स्विस नैशनल बैंक ने अपने सालाना विवरण में जानकारी दी है कि सन 2011 के अंत तक भारतीयों के 218 करोड़ स्विस फ्रैंक अर्थात कुल 12740 करोड़ रुपये जमा थे। पर राजनीतिक दलों की तरह आन्दोलन चलाने वाली यह जोड़ी बिना किसी जिम्मेवारी के मनमाने  आरोप लगा रहे हैं क्योंकि उन्हें अपने आँकड़ों को कहीं सिद्ध नहीं करना है अपितु सत्तारूढ दल के खिलाफ माहौल बनाना है। उल्लेखनीय है कि इस प्रक्रिया में वे आपस में भी एक दूसरे को ठगने लगते हैं। रामदेव टीम अन्ना के नाभिक अरविन्द केजरीवाल को मंच पर ही डाँट देते है और उनकी अभिव्यक्ति को रोक देते हैं तो खुद जाकर शरद पवार समेत सभी नेताओं से मिलते हैं। टीम अन्ना के प्रमुख लोग खुद भी अन्ना के अनशन इतिहास के कारण उन्हें मुखौटा बनाये हुए हैं और विसंगति आने पर कहते हैं कि डाकूमेंट अंग्रेजी में होने के कारण उनके नेता अन्ना को समझ में नहीं आया। ये लोग एक दूसरे का समर्थन हड़प लेना चाहते हैं, और भाजपा जैसे दल इनके द्वारा पैदा किये गये जनउभार से राजनीतिक लाभ उठाने की फिराक में उनके मददगार हैं। पिछले साल भर में इस क्षेत्र में जैसी जैसी घटनाएं हुयी हैं उसमें कहा नहीं जा सकता कि कब किसका सच सामने आ जाये और आन्दोलन की हवा निकल जाये या कितने अग्निवेष और निकलें।  कुछ लोग इसे आन्दोलन न कह कर तमाशा कहते हैं और लगता है कि वे गलत भी नहीं हैं।  
 वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा सिनेमा के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मोबाइल 9425674629

  

बुधवार, जून 08, 2011

रामदेव का रामलीला मैदान काण्ड- एक भिन्न दृष्टिकोण्


रामदेव का रामलीला मैदान काण्ड – एक भिन्न दृष्टिकोण
वीरेन्द्र जैन
योग प्रशिक्षक बाबा रामदेव द्वारा अठारह करोड़ के पण्डाल में जो अनशन, तप या अष्टांग योग किया जा रहा था और सरकार ने उनसे उच्च स्तरीय बात करने, समझौता करने और बाबा द्वारा समझौते का उल्लंघन करने के बाद आधी रात में जो कुछ भी किया उस पर बहुत कुछ कहा जा चुका है। चौबीस घंटे के चैनलों, और सनसनीखेज समाचारों के लिए उत्सुक अखबारों ने पूरे घटनाक्रम को अति नाटकीय रूप प्रदान करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
सच तो यह है कि इस सारे घटनाक्रम के मूल में हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली की वे अपरिपक्वताएं हैं जिनके कारण हमारे राजनीतिक दल अपने सिद्धांतों, घोषणाओं, और कार्यक्रमों की जगह शगूफों, नारों या वादों का प्रयोग कर के वोट निकलवा लेने व किसी भी तरह बहुमत पाकर सत्ता का भरपूर दोहन करने के लक्ष्य हेतु काम करते हैं। उल्लेखनीय है कि 1967 के आम चुनावों में हेलीकाप्टर से चुनाव प्रचार ने भारी संख्या में मतों का हेर फेर किया था। जब 1969 में पूर्व राजा रानियों के प्रिवीपर्स व विशेष अधिकार समाप्त किये गये थे तब ग्वालियर के एक पूर्व राजपरिवार ने पूरे देश की रियासतों में घूम घूम कर निष्क्रिय हो चुके राजपरिवारों को तत्कालीन सरकार के खिलाफ राजनीति में उतरने के लिए सक्रिय किया था और तब से वे अपनी अपनी पूर्व रियासतों में अपना जनाधार बनाये हुये हैं। कभी गौ हत्या के भावनात्मक नाम पर चुनाव हो जाते हैं तो कभी शरीयत या रामजन्म भूमि मन्दिर के नाम पर। भूमि सुधार, मँहगाई, बेरोजगारी, जनवितरण प्रणाली, शिक्षा, स्वास्थ आदि आर्थिक सामजिक सवालों को चुनावों का मुख्य मुद्दा बनना अभी शेष है। भले ही ये मुद्दे घोषणापत्रों के कागजों पर नकल कर लिए जाते हों, पर न तो ये उम्मीदवारों को ही पता होते हैं और ना ही ये जनता के बीच में उतारे जाते हैं। गत लोक सभा चुनावों के दौरान विदेशों में जमा काले धन का मुद्दा बामपंथी दलों के घोषणा पत्रों में हमेशा की तरह सम्मलित था व जनता दल [यू] ने भी उसका जिक्र किया, पर भाजपा ने ज्यादा मुखर हो कर उस पर जोर दिया था, पर चुनाव परिणामों के बाद इन दलों में से कोई भी सत्ता में नहीं आया किंतु विपक्षी दलों के रूप में भी बाद में इस पर कोई बड़ा आन्दोलन नहीं किया गया। आन्दोलन के रूप में इस सवाल को आरटीआई कार्यकर्ता अरविन्द केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के सहयोग से उठाया।
सातवें दशक से देश में मुख्य रूप से दो राजनीतिक धाराएं सक्रिय हुयीं जिनमें से एक तो कांग्रेस थी जो स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों की विरासत का लाभ लेते हुए गान्धीजी के दलित उत्थान से जागृत जातियों को मिले आरक्षण और बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता से भयभीत अल्पसंख्यकों की संरक्षक बन कर चुनाव जीतती रही थी। दूसरी ओर विभिन्न गैर कांग्रेसी दल थे जिनमें हिन्दूवादी भारतीय जनसंघ, कम्युनिस्ट दल, और विभिन्न नामों से कार्यरत समाजवादी दल थे जो आपस में एक नहीं थे। परम्परागत रूप से सुरक्षित वोट बैंक के कारण कांग्रेस ने राजनीतिक काम न करके शासन पाने और उसे चलाने पर पूरा जोर लगाया तो भारतीय जनसंघ ने साम्प्रदायिकता को उभारने की ओर जोर दिया ताकि वे बहुसंख्यक मतों के सहारे सत्ता पा सकें। समाजवादियों और कम्युनिष्टों ने कुछ राजनीतिक चेतना के काम किये किंतु समाजवादियों की आपसी फूट के साथ साथ चीन से सीमा विवाद के बाद कम्युनिष्टों के दो चुनावी पार्टियों और कुछ गैर चुनावी ग्रुपों में बिखर जाने से उनके काम हाशिये पर चले गये। परिणाम यह हुआ कि भारतीय जनसंघ जो बाद में भारतीय जनता पार्टी के नाम से जाना गया, विपक्ष के बड़े हिस्से को हड़प कर एक बड़ा दल बन गया। चुनाव जीतने और सत्ता में आने के लिए इसने सभी सम्भव हथकण्डे अपनाये। वे हर तरह के गैर कांग्रेसी गठबन्धन में सम्मलित होने के लिए सबसे आगे रहे। उन्होंने भावुक मुद्दों से वोटरों को फुसलाने के साथ साथ किसी भी तरह के लोकप्रिय व्यक्तियों को अपने साथ जोड़ने के सौदे करने शुरू किये। फिल्मी सितारे, क्रिकेट खिलाड़ी, साधु वेषभूषाधारी, पूर्व राज परिवार के सदस्यों, दलबदलुओं के साथ साथ क्षेत्र के जातिवादी अनुपात के अनुसार टिकिट वितरण पर भी पूरा ध्यान दिया। रंगीन टीवी पर प्राइवेट चैनल आने के बाद योग प्रशिक्षण के कार्यक्रमों से बाबा राम देव ने लोकप्रियता और धन कमाया तथा अपने एक सहयोगी की मदद से आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण का एक बड़ा साम्राज्य स्थापित कर लिया। उन से जुड़ा हालिया घटनाक्रम भी योग प्रशिक्षक के रूप में लोकप्रिय हो गये बाबा की लोकप्रियता को भुनाने से जुड़ा है। बाबा रामदेव एक अति महात्वाकांक्षी व्यक्ति हैं और जैसे जैसे उन्हें सफलताएं मिलती गयीं वैसे वैसे उनकी भूख बढती गयी। वे यज्ञ कर्मी से योग प्रशिक्षक बने, फिर आयुर्वेदाचार्य के नाम से आयुर्वेद का उद्योग खड़ा कर लिया, योग शिविरों के नाम पर मोटी मोटी फीसें ही नहीं वसूलीं अपितु अपना जनसम्पर्क बढा कर नेताओं और अधिकारियों से ढेर सारे सरकारी लाभ व धनिकों से मोटे मोटे चन्दे लिये। देश भर में आश्रमों के नाम पर औने पौने दामों में जमीनें हथियायीं। यादव जाति के नाम पर मुलायम सिंह यादव और लालू यादव को भी फुसलाया, तथा रुतबा बढाने के लिए सरकार से मिली एक्स श्रेणी की सुरक्षा को वाय श्रेणी की सुरक्षा में बदलवाने के लिए झूठी परिस्तिथियां पैदा करने की कोशिशें कीं। उनकी इस लोकप्रियता को देखते हुए शगूफेबाज राजनीतिक दलों ने उनका उपयोग करना चाहा तो परम अतृप्त रामदेव की राजनीतिक महात्वाकांक्षाएं भी भड़कीं। उन्होंने सोचा कि क्यों न वे अपनी लोकप्रियता को राजनीतिक सत्ता में बदलें इसलिए उन्होंने विदेशों में जमा धन को वापिस लाने के जनरुचि वाले सवाल को अपना प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाया व अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाने का इरादा घोषित कर दिया। स्मरणीय है कि इस इरादे का विरोध भाजपा ने किया और उनके सारे नेताओं ने उनसे पार्टी न बनाने का अनुरोध किया। भाजपा के लोग तब से उनसे लगातार दूरी बनाये रहे, बाबा ने भी पलट के उत्तराखण्ड के भाजपा शासन के एक मंत्री द्वारा उनसे दो लाख रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप लगाया पर उसका नाम उजागर नहीं किया। कहा जाता रहा कि बाद में नाम उजागर न करने का भी बाबा ने सौदा किया। ताजा घटनाक्रम में जब अन्ना हजारे ने जनलोकपाल विधेयक के नाम पर अनशन किया तो उस आन्दोलन में भी बाबा सम्मलित हो गये पर अन्ना के समर्थकों ने इस आन्दोलन को राजनीतिक दलों के नेताओं से मुक्त रखने का फैसला किया और उमाभारती ओम प्रकाश चौटाला, अरुण जैटली समेत वहाँ पहुँचने वाले अनेक नेताओं को मंच तक नहीं जाने दिया। इनमें अपना राजनैतिक दल बनाने की घोषणा कर चुके रामदेव भी थे जिन्होंने स्वय़ं को अपमानित महसूस किया। इस उपेक्षा के बदले में बाबा ने दो दिन तक लगातार संघ प्रमुख मोहन भागवत और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के साथ चार चार छह छह घंटे तक बैठकें कीं। इसी दौरान यह भी तय हुआ कि बाबा अपना अलग दल बनाने का इरादा छोड़ देंगे व संघ परिवार उन्हें अन्ना के मुकाबले खड़ा होने में अपना पूरा समर्थन देगी। उन्होंने अपना वादा पूरा किया पर बाबा ने पता नहीं किस अपराधबोध में सरकार के मंत्रियों के साथ लिखित में समझौता कर लिया और जब भाजपा ने अपने समझौते के कारण दबाव डाला तो वो द्वन्द में फँस कर समय से अपना वादा पूरा नहीं कर सके। एक व्यक्ति के समक्ष देश की सरकार के शरणगत होने के आरोपों से व्यथित सरकार ने देर होने की स्तिथि में पत्र को सार्वजनिक कर दिया जिससे बाबा की असलियत सबके सामने आ गयी। बाद में बाबा के समर्थन में भी संघ परिवार अकेला खड़ा नजर आया जिससे पूरी स्तिथि साफ हो गयी। कम समय में बड़ी दौलत तभी खड़ी हो पाती है जब कानूनों की अवहेलना की जाये और बाबा की दौलत के पीछे भी कुछ न कुछ कमियां रही ही होंगीं। यही कारण है कि उनके साथी बालकिशन को तंबू उखड़ने के तुरंत बाद गुप्त अभियान पर अंतर्ध्यान हो जाना पड़ा जिनकी नागरिकता की गलत घोषणा के बारे में भी सवाल उठाये जा रहे हैं। जब तक हम अपने लोकतंत्र में एक स्वस्थ राजनीतिक चेतना का विकास और जनता का राजनीतिक शिक्षण नहीं कर लेते इस तरह की घटनाएं होती ही रहेंगीं। केंट वाटर प्यूरीफायर बेचने का प्रचार करने वाली हीरोइनें को जब तक प्रमुख दल की वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाये जाने की मजबूरी रहेगी तब तक रामदेव रामलीला मैदान काण्ड होते ही रहेंगे।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल [म.प्र.] 462023
मो. 9425674629

शनिवार, मई 28, 2011

भगवा पर भड़कने वाले अब कहाँ हैं?


भगवा पर भड़कने वाले अब कहाँ हैं?
वीरेन्द्र जैन
यदि देश विदेश में जाने जाने वाले भगवाभेषधारी सन्यासी को अपमानित करने के लिए किसी सार्वजनिक स्थान पर चाँटा मार दिया जाता है तब भगवा रंग की चिंताओं पर एकाधिकार प्रकट करने वाले धार्मिक संगठनों को क्या चुप रहना चाहिए? यह सवाल उन हिन्दू संगठनों की कलई खोलता है जो देश के गृहमंत्री द्वारा आतंकवाद के आरोप में पकड़े गये उन व्यक्तियों को भगवा आतंकी कहने पर भड़क गये थे जो भगवा भेष में रह कर अपनी आतंकी गतिविधियां संचालित कर रहे थे व अपने ही धार्मिक समाज को धोखा देकर उन्हें दंगों की आग में झोंके जाने का षड़यंत्र रच रहे थे। यद्यपि यह तय है कि जब कोई रंग या भेष किसी सम्प्रदाय विशेष की पहचान करा रहा तो उसके उल्लेख में सावधानी बरतना चाहिए ताकि उस सम्प्रदाय के निर्दोष लोग आरोपों की चपेट में आकर आहत न हों। पर यह सावधानी इकतरफा नहीं हो सकती। देश के जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता सुप्रसिद्ध आर्यसमाजी स्वामी अग्निवेश पर मोदी के राज्य गुजरात में जो हमला किया गया उस पर संघ परिवार से जुड़े हिन्दू संगठन न केवल मौन रहे अपितु उनमें से अनेक ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हमलावरों का समर्थन किया। इससे भगवा की ओट में की जा रही राजनीति अपने नग्न रूप में प्रकट हुयी। इसके अनुसार वही भगवा श्रद्धेय है जो भाजपा या संघ परिवार के साथ है, वे चाहे प्रज्ञा सिंह हों, दयानन्द पांडे हों, योगी आदित्यनाथ हों, उमाश्री भारती हों, या दूसरे छोटे बड़े ढेर सारे भगवा भेषधारी राजनीतिज्ञ हों। स्मरणीय है कि हमारे देश में तेरहवीं शताब्दी में माधवाचार्य ने जिन षडदर्शनों की चर्चा की है उनमें शैव, शाक्त और वैष्णव, तीन आस्तिक और जैन, बौद्ध व लोकायत तीन नास्तिक दर्शन हैं जिन्हें एक साथ समेट कर आज की हिन्दू राजनीति अपना बल प्रकट करती है। किसी समय इन दर्शनों के पंडितों के बीच में खुला शास्त्रार्थ चलता था और सिद्धांतों के आधार तीव्र मतभेद प्रकट होते थे। इन शास्त्रार्थों से प्रभावि हो कर लोग अपने विश्वासों और पूजा पद्धतियों को बदलते रहते थे। विभिन्न समयों में भिन्न भिन्न आस्थाओं का बाहुल्य इस बात का प्रमाण है हमारे यहाँ आस्थाओं और पूजा पद्धतियों के सम्बन्ध में एक लोकतंत्र जिन्दा था जिसे अब कट्टरता द्वारा नष्ट करने की कोशिश की जा रही है व वैचारिक स्वतंत्रता पर हमले किये जा रहे हैं। बिडम्बनापूर्ण यह है कि ये हमले वही लोग कर रहे हैं जो इमरजैंसी में विचारों की स्वतंत्रता को सीमित किये जाने के खिलाफ किये गये राजनैतिक प्रतिरोध की पैंशन ले रहे हैं। रामकथा के प्रतीक बताते हैं कि साधु स्वरूप के प्रति जो श्रद्धा जनमानस में थी उसका दुरुपयोग भी होता था। इस कथा में सीताहरण का प्रसंग ऐसा ही प्रसंग है जो परोक्ष में सन्देश देता है कि साधु की परीक्षा उसके स्वरूप से नहीं अपितु उसके बारे में जानकर ही की जा सकती है। संघ परिवार इसके विपरीत चल रहा है और उसके अनुसार उनके पक्ष के साधु भेषधारी चाहे जो कुछ भी कर रहे हों और उनके ज्ञान व कर्म का क्षेत्र कुछ भी हो, वे सम्मानीय माने जाने चाहिए। दूसरी ओर किसी अन्य राजनीतिक धारा के लोगों या सामाजिक कार्य से जुड़े साधु भेषधारी चाहे जितना भी समाज हितैषी और उल्लेखनीय कार्य कर रहे हों वे उनसे असहमति रखने वाले विचारों के लिए थप्पड़ के पात्र हैं। आतंकवाद के आरोप में कैद प्रज्ञा सिंह से भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह और भाजपा में प्रवेश के लिए निरंतर लालायित उमा भारती जेल में मिलने जाती हैं और उसको जेल में मिलने वाली सुविधाओं के सम्बन्ध में अतिरंजित बयान देकर लोगों में भ्रम पैदा करने की कोशिश करती हैं। कोई नहीं जानता कि प्रज्ञा सिंह का धार्मिक ज्ञान त्याग और तपस्या कितनी है कि भाजपा शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री ही उसे मेहमान बनाते हैं और सपरिवार उसके साथ बैठ कर फोटो खिंचवाते हैं। उसके इस ज्ञान, तपस्या और त्याग की खबर दूसरे दलों में कार्य करने वाले धार्मिक हिन्दू नेताओं को नहीं होती और न वे उसके ज्ञान का लाभ लेते हैं न उसके साथ सपरिवार फोटो खिंचवाते हैं। यदि किसी धार्मिक व्यक्ति का कद उसकी राजनीतिक सम्बद्धता से तय किया जाने लगे तो सवाल उठता है कि धर्म और उसके प्रतिनिधियों का अपमान कौन कर रहा है? गत दिनों मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री देवास में एक साध्वी की कथा सुनने चले गये थे जिसका आयोजन कांग्रेस के किसी नेता ने करवाया था, तो उन्हें अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं से अपमानित होना पड़ा और खरी खोटी सुननी पड़ीं, जबकि उक्त साध्वी गाहे बगाहे भाजपा और संघ परिवार की मददगार के रूप में जानी जाती हैं व भाजपा ने अपने शासन के दौरान उन्हें अनेक स्थानों पर आश्रमों के नाम पर बड़ी बड़ी जमीनें आवंटित की हैं। धार्मिक नेताओं को राजनीति के आधार पर बाँटने का माहौल किसने बनाया है। उपरोक्त घटना में जिसने भगवा भेषधारी सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश का अपमान किया वह उन्हें माला पहिनाने के बहाने उनके पास तक पहुँचा था और उन पर हमला कर दिया था। इसे संघ परिवार के समर्थक उचित प्रसाद देना बतला रहे हैं। स्मरणीय है कि यही तरकीब नाथूराम गोडसे ने भी अपनायी थी और वह भी हाथ जोड़ते हुये बापू को प्रणाम करने के बहाने पिस्तौल छुपा कर आया था व सीने में नजदीक से तीन गोलियां उतार दी थीं। जो व्यक्ति अपने दुस्साहस के लिए जिम्मेवारी तक लेने और अपने किये को स्वीकारने के लिए भी तैयार न हों उनके प्रति क्या धर्मान्ध भी श्रद्धा रख सकते हैं! सारे देश में घूम घूम कर बाबरी मस्जिद ध्वंस का वातावरण तैयार करने वाले लाल कृष्ण आडवाणी जब कहते हैं कि वे तो मस्जिद तोड़ने वालों को रोक रहे थे पर वे मराठीभाषी होने के कारण उनकी बात नहीं समझ सके, तो क्या उनकी बात विश्वसनीय कही जा सकती है। इसी घटनाक्रम को सम्हालने के लिए दिल्ली भेज दिये गये अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में कहा था कि मुझे बताया गया है कि इस अवसर पर आडवाणीजी बहुत दुखी थे और उनका चेहरा आँसुओं से भरा हुआ था, तो क्या उनके समर्थकों ने भी अपने प्रिय नेता की बात का भरोसा किया होगा। विश्वसनीयता का यह संकट कौन पैदा कर रहा है!
विस्मरणीय यह भी नहीं है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे को जो समर्थन मिला है उसको दो फाड़ करने के लिए बाबा रामदेव को अनशन पर बैठने हेतु भाजपा नेताओं ने ही उत्प्रेरित किया है तथा उनकी छवि के अनुसार मिलने वाले समर्थन में अन्ना के सबसे बड़े सहयोगी स्वामी अग्निवेश रामदेव की काट बन रहे थे। इसलिए उनके एक विचार को मुद्दा बना के उनके भेष को बदनाम करने के प्रयास किये गये हैं।
शगूफे बुलबुलों की तरह होते हैं उनकी उम्र लम्बी नहीं होती। लोकतंत्र शगूफों पर ज्यादा नहीं चल सकता अंततः सच्चाई ही बचती है। कवि केदारनाथ अग्रवाल की कविता है-
कागज की नावें हैं तैरेंगीं, तैरेंगीं
लेकिन वे डूबेंगीं डूबेंगीं डूबेंगीं
वीरेन्द्र जैन
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मो. 9425674629

गुरुवार, मार्च 03, 2011

एक जनाकांछा को हथियाता अपात्र नेतृत्व


एक जनाकांक्षा को हथियाता अपात्र नेतृत्व
वीरेन्द्र जैन
आज भ्रष्टाचार हमारे देश की प्रमुख समस्याओं में से एक की तरह पहचाना जा रहा है, क्योंकि इसी के कारण हमारी दूसरी प्रमुख जन समस्याओं को हल करने वाली योजनाएं निष्फल होती जा रही हैं। भ्रष्टाचार के कारण ही किसानों को उनके लिए घोषित लाभ नहीं मिल पाते, और अनुदान हड़प लिया जाता है। भ्रष्टाचार के कारण ही सशक्तिकरण योजनाओं के लाभ कमजोर वर्ग तक नहीं पहुँच पाते। भ्रष्टाचार के कारण ही निर्माण कमजोर बनते हैं और विकृत सामानों की सरकारी खरीद हो जाती है। कहा जाता है कि हमारे यहाँ के योजनाकार और योजनाएं किसी भी दूसरे विकासशील देश की योजनाओं से दोयम नहीं है, किंतु ईमानदारी से उनका अनुपालन नहीं हो पाने के कारण वे निरर्थक हो जाती हैं और कमजोर न्याय व्यवस्था के कारण दोषियों को सजा नहीं हो पाती। भ्रष्टाचार से लाभ कमाकर स्वयं को सशक्त करने वाले अनेक धन्धेबाज लोग सदनों में पहुँचकर लोक सेवकों का स्थान छीन रहे हैं और उन्होंने जनतंत्र को धनतंत्र में बदल दिया है। यही कारण है कि आज देश की जनता व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध है और इस विरोध में वे लोग भी सम्मलित हैं जो खुद भी कहीं कहीं छोटा मोटा भ्रष्टाचार करके बड़े भ्रष्टाचार से राहत पाने का शार्टकट अपनाये हुये हैं। यदि टीवी कार्यक्रमों की लोकप्रियता को सर्वेक्षण का आधार बना कर देखें तो पता चलता है कि स्वस्थ मनोरंजन के कार्यक्रमों में से गत वर्षों में सीरियल “आफिस-आफिस” “कक्काजी कहिन” और “रजनी” बहुत लोकप्रिय हुये थे जो राजनीति व नौकरशाही के भ्रष्टाचार पर तीखे कटाक्ष करते थे। यही कारण है कि वर्षों पुराने योग के नये कार्यक्रमों से अचानक लोकप्रिय हो गये अतिमहात्वाकान्क्षी बाबा रामदेव ने राजनीति में प्रवेश करने के लिए इसी मुद्दे को पकड़ा और यथा अनुमानित जनसमर्थन प्राप्त किया। इस जनसमर्थन से उत्साहित रामदेव ने जल्दी ही अपनी पार्टी बनाने की घोषणा कर डाली।
उनके इस अभियान में समाज सेवा से जुड़े दूसरे लोकप्रिय नाम, जैसे अन्ना हजारे, स्वामी अग्निवेश, किरन बेदी, गोबिन्दाचार्य, अरविन्द केजरीवाल, राम जेठमलानी आदि भी सम्मलित हैं किंतु इसके नेतृत्व करने का अवसर अपेक्षित कम शिक्षित बाबा रामकिशन, अर्थात रामदेव को ही मिल रहा है क्योंकि वे अपने टीवी कार्यक्रमों और योग शिविरों द्वारा स्वयं को अधिक लोकप्रिय बताकर आगे आये हुये हैं। दुर्भाग्य से सच यह भी है कि वे [रामदेव] नेतृत्व करने के लिए इन सब से कम सक्षम हैं, और उनका इतिहास भी उनको इस अभियान का नेतृत्व करने की नैतिक इजाजत नहीं देता। अब यह जग जाहिर हो चुका है कि जिन रामकिशन यादव के पास साइकिल का पंचर जुड़वाने के भी पैसे नहीं होते थे, वे आज 1115 करोड़ की ट्रस्ट को संचालित कर रहे हैं। इस बात में कोई दम नहीं कि कि उनके नाम से एक भी पैसा जमा नहीं है, और सारा पैसा ट्रस्ट का है। आज जो कोई भी अपनी आमदनी का वित्तीय प्रबन्धन कराना चाहता है तो सीए यही सलाह देता है कि कोई ट्रस्ट बना डालो जिसमें अपना और अपने परिवारियों को ही सदस्य बना लो। यह सारा पैसा रामदेव के शिविरों, टीवी कार्यक्रमों से प्राप्त रायल्टी, किताबों, सीडी पत्रिकाओं तथा आयुर्वेदिक दवाओं के बिक्री आदि से ही नहीं प्राप्त हुआ अपितु उन्हें अघोषित दानदाताओं से दान में भी बहुत बड़ी बड़ी राशियां मिली हैं। कई राज्य सरकारों ने भी उन्हें बड़ी बड़ी जमीनें मुफ्त के भाव दी हैं। आज 903 करोड़ की पूंजी वाला उनका दिव्य योग मन्दिर ट्रस्ट और 212 करोड़ की पूंजी वाला पतंजलि योगपीठ हरिद्वार एक हजार एकड़ से भी ज्यादा जमीन में फैले हुये हैं। हिमाचल प्रदेश में भी उनका 90 करोड़ का एक ट्रस्ट है जो फ्लैट्स बना कर बेच रहा है। दिव्य फार्मेसी प्रति वर्ष 50 करोड़ कमा रही है और अभी हाल ही में हरिद्वार में 100 करोड़ की लागत से पतंजलि विश्वविद्यालय की स्थापना की गयी है। मध्य प्रदेश सरकार भी उन्हें 1618 एकड़ की जमीन जबलपुर में देने वाली है। 2009 में रामदेव ने स्काटलैंड में 310 एकड़ का टापू 14.7 करोड़ में खरीदा था। मुम्बई के उनके रियल स्टेट का कारोबार करने वाले एक भक्त ने उन्हें एक इमारत भेंट की जिसमें कभी दीपा लेडीज बार चला करता था। इस जगह उन्होंने आश्रम खोला और इस आश्रम का उद्घाटन भी उन्होंने खुद किया था। इतनी बड़ी बड़ी राशियाँ दान करने वाले इस भ्रष्टाचारी दौर में ये दानदाता साफ सुथरे होंगे यह केवल एक सद्भावना भर ही हो सकती है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि घरों में रंगीन टीवी और डिस्क कनेक्शन रखने वाले मध्यमवर्गीय लोगों को उनके घरों में ही योग सिखा कर बाबा ने बहुत ही अच्छा काम किया है, जिसे सभी ने श्रद्धापूर्वक स्वीकारा भी है। उनके आयुर्वेदिक दवा उद्योग को भी लोगों के स्वास्थ से जोड़कर स्वीकारा जा सकता है, किंतु जब पैसे और सम्पत्ति के लिए अन्धी हवस जब शुरू होती है तो वह समाज की नैतिक मान्यताओं को ताक पर रख देती है। रामदेव ने न केवल ज्यादा से ज्यादा जमीनें हथियाने की कोशिशें कीं अपितु हस्तगत की इन फैक्टरियों को अपने भाई रामभरत और बहनोई यशवीर शास्त्री को ही सौंपी ताकि हिसाब का रहस्य, रहस्य ही रहे। उनके मंच पर उत्तर प्रदेश की एक बदनाम चिट फंड की कम्पनी का मालिक और उसके अधिकारी ही नजर आते रहे हैं। उन्होंने हरिद्वार और रांची में किसी कुशल व्यापारी की तरह मेगा हर्बल फूड पाई की दो कम्पनियों का प्रारम्भ किया है जिसमें एक तो केन्द्र सरकार के एक मंत्री की पार्टनरशिप में है।
समाजसेवा के ढेर सारे आयाम हैं, जिनमें से राजनीति भी एक है। आमतौर पर राजनीति के माध्यम से समाज सेवा करने वालों के लिए एक उम्र कम पड़ती है, इसलिए इस क्षेत्र में हर उम्र के लोग मिल जायेंगे। तब यह कैसे सम्भव है कि कोई व्यक्ति यदि एक क्षेत्र विशेष में अपनी सेवाएं दे रहा हो तो वह उतने ही दूसरे महत्वपूर्ण क्षेत्र में काम करने के लिए दूसरों से आगे आने की कोशिश करे। यदि रामदेव चाहते तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध काम करने वाले संगठनों या दलों को अपना समर्थन देकर भी अपना काम कर सकते थे किंतु इसकी जगह उन्होंने न केवल स्वयं नेतृत्व हथियाने अपितु अपना एक अलग दल बनाने के नाम पर भी जोड़ तोड़ शुरू कर दी। रामदेवजी के पूरे जीवन पर दृष्टिपात करने पर उनके अति महात्वाकांक्षी होने का पता चलता है। वे एक निर्धन परिवार में पैदा हुए थे और आर्य समाज की संस्था गुरुकुल कांगड़ी में शिक्षा प्राप्त करते थे। इसी दौरान अपने गुजारे के लिए उन्होंने आर्य समाज की शिक्षण संस्थाओं, महिला महाविद्यालयों और दूसरी जगहों में हवन कराना शुरू कर दिया था। इसी दौरान उन्होंने अपने दो साथियों कर्मवीर और आचार्य बाल्कृष्ण के साथ कनखल के गंगा नहर के किनारे बने कृपालु बाग दिव्य योग मन्दिर में रहने के लिए कमरा लिया और इसके संचालक स्वामी शंकर देव को अपना गुरू बनाया और धीरे धीरे इस आश्रम पर अपना कब्जा कर लिया। रामदेव व कर्मवीर तो योग सिखाने लगे और बालकृष्ण ने वैद्यगिरी प्रारम्भ कर दी। जल्दी ही अपने लक्ष्य में बाधक मानकर रामदेव ने कर्मवीर को अलग कर दिया, और बाद में कर्मवीर को आश्रम में घुसने तक नहीं दिया। रामदेव ने इस मामले में अपने गुरु स्वामी शंकरदेव की बात ही नहीं मानी, और उनकी नाराजी की फिक्र ही नहीं की। पिछले दिनों स्वामी शंकरदेव रहस्यमय ढंग से गायब हो गये और उनका पता अभी तक नहीं चला है। योग के बहाने वे अपनी फार्मेसी की दवाइयाँ भी बिकवाने लगे। उन्होंने योग की लोकप्रियता को अपनी लोकप्रियता के लिए स्तेमाल किया। योग शिविर लगा कर उन्होंने लाभ पाने वाले अफसरों और नेताओं से उन्होंने भरपूर सुविधाएं प्राप्त कीं। अपने लिए सरकार से मिली एक्स श्रेणी की सुरक्षा को वाय श्रेणी की सुरक्षा में बदलने के लिए एक झूठा आतंकवादी बनवाया जो सुतली बम लेकर उनके साथ हैलीकाप्टर में बैठ गया और अपने आप को पकड़वा दिया। बाद में पुलिस द्वारा कड़ी पूछताछ के बाद उसने राज खोल दिया कि उससे ऐसा किसने और क्यों करवाया था।
उन्होंने अखबारों में समाज सुधारों वाले लेख लिखे, टीवी पर इंटरव्यू दिये जिनमें कोका-कोला और ऐलोपैथी आदि के खिलाफ सोचे समझे ढंग से विवादास्पद बयान दिये, जिससे चर्चा में आ सकें। बड़े बड़े नेताओं को अपने यहाँ बुलवाया, सीपीएम कार्यालय पर हमला करवाया, दिग्विजय सिंह द्वारा उनकी सम्पत्ति की जाँच की माँग किये जाने पर सीधे कांग्रेस अध्यक्ष पर आरोप लगा दिये आदि आदि। कुल मिला कर ये अति महात्वाकांक्षी व्यक्ति के अतिरंजित प्रयास हैं, जो चर्चित होने के लिए चर्चित होती हुयी वस्तु से स्वयं को जबरदस्ती जोड़ लेने का प्रयास करता है। वैसे अभी तक उन्होंने काले धन के बारे में सारे के सारे आरोप हवाई लगाये हैं, एक भी आरोप किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ सप्रमाण नहीं लगाये गये हैं, यह वैसा ही है कि उन्होंने अभी उत्तराखण्ड के एक मंत्री द्वारा उनसे दो लाख की रिश्वत माँगने का आरोप लगा दिया था किंतु अभी तक उसका नाम उजागर नहीं किया। आखिर उन्हें ऐसा क्या भय है कि वे उसका नाम उजागर नहीं कर सकते। भ्रष्टाचार के खिलाफ जनान्दोलन की सम्भावनाओं को निजी महात्वाकांक्षाओं के लिए शगूफे पैदा करने वाले रामदेव जैसे लोगों से बचाना चाहिए।



वीरेन्द्र जैन
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शुक्रवार, अप्रैल 23, 2010

दो यादवों का किस्सा- राम किशन और लालू यादव्

दो यादवों का किस्सा- रामकिशन यादव और लालू यादव
वीरेन्द्र जैन
जब तक बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार के खिलाफ डंका नहीं बोला था और एक अलग पार्टी बनाने की घोषणा नहीं की थी तब तक श्री लालू प्रसाद यादवजी और योगगुरू बाबा रामदेव, दो जिस्म एक जान थे, किंतु अब वे एक दूसरे के आमने सामने हैं।
बाबा रामदेव टीवी कार्यक्रमों से मिली अपनी लोकप्रियता को भुनाने के लिए एक आयुर्वेदिक दवाओं की फैक्ट्री चलाते हैं जिसमें काम करने वाले मजदूरों के अपने मालिकों और प्रबन्धकों के साथ वैसे ही सम्बन्ध हैं जैसे कि किसी भी दूसरे फैक्ट्री मालिक और मजदूर के बीच होते हैं, अर्थात फैक्ट्री मालिक मजदूर से ज्यादा से ज्यादा काम लेकर कम से कम भुगतान करना चाहता है और मजदूर अपने व अपने परिवार के जीवन यापन के लिए तत्कालीन समय में होने वाले व्यय के अनुसार उद्योग जगत की दूसरी इकाइयों के अनुरूप वेतन व भत्ते चाहता है। यह स्थिति ही मालिकों और मजदूरों के बीच टकराव को जन्म देती है। अपने हक़ को पाने के लिए मजदूर यूनियन बनाता है, माँगें रखता है, धरना प्रदर्शन करता है व ज़रूरत पर हड़ताल भी करता है। यह नौबत बाबा रामदेव की फैक्ट्री में भी आयी थी और वहाँ काम करने वाले मज़दूरों ने अपनी माँगें मनवाने के लिए यूनियन बनायी जिसकी सम्बद्धत्ता सीपीएम के मज़दूर संगठन सीटू से बनायी। जब उनकी माँगें नहीं मानी गयीं तब उन्होंने हड़ताल की और मजदूरों को सम्बोधित करने के लिए सीपीएम नेता वृन्दा करात को आमंत्रित किया। इसी दौरान मज़दूरों द्वारा कामरेड वृन्दा करात को बताया गया कि यहाँ बनने वाली औषधियों में से एक में मानव अस्थियों का चूर्ण भी मिलाया जाता है, जबकि उसकी पैकिंग पर ऐसा कोई उल्लेख नहीं होता। राज्य सभा सदस्य वृन्दा करात ने उक्त औषधि खरीदी उसकी पक्की रसीद ली और फिर उसे सम्बन्धित प्रयोगशाला को जाँच के लिए भेज दिया। किंतु जब उसकी रिपोर्ट आयी और उसमें मानव अस्थियों के ऊतकों की पुष्टि की गयी तो न केवल बाबा रामदेव ने हंगामा कर दिया अपितु संघ वालों और अपने प्रशंसकों को टीवी पर उत्तेजित भाषा में उकसा कर सीपीएम के मुख्यालय पर हमला करवा दिया।
जो संघ परिवार के संगठन शाकाहार आदि विषय पर लोगों की भावनाओं को भड़काने में सबसे आगे रहते है वही दवाओं में बिना बताये हुये मानव अस्थियों के ऊतकों की विधिवत रिपोर्ट आ जाने के बाद भी बाबा रामदेव के पक्ष में एक राजनीतिक दल के मुख्यालय पर हिंसा करवा रहे थे।
उस दौरान संघ परिवार के विरोधी दिख कर अपनी राजनीति चलाने वाले लालू प्रसाद यादव भी बाबा राम देव के समर्थन में उतर आये थे जबकि वे सी पी एम के साथ राजनीतिक गठबन्धन में रहे थे और जब उनकी प्रदेश सरकार भंग की जा रही थी तो सीपीएम के हस्तक्षेप से ही बची थी। आश्चर्य से भरे प्रेक्षक जब मामले की तह में गये तो पता चला कि उस समय लालू प्रसाद का जाति प्रेम उमढ पड़ा था। बाबा राम देव का असली नाम राम किशन यादव है तथा इसी आधार पर उन्होंने लालू प्रसाद और मुलायम सिंह जैसे बड़े यादव नेताओं को उनके राजनीतिक गठबन्धन के विपरीत जाने को प्रेरित कर लिया था। उन्होंने रामदेव के समर्थन में उतरते हुये कहा था कि चाहे मानव की हड्डियाँ मिली हों या दानव की मिली हों किंतु रोग ठीक होना चाहिये। लालू जी के इस समर्थन के पीछे प्रमुख कारण ही यह था कि वे यादव हैं, और इस समय लोकप्रिय हैं। चुनावी नेता उनके साथ इसलिए लगे हैं ताकि फिल्म स्टार क्रिकेट खिलाड़ियों की तरह उनकी लोकप्रियता का लाभ उठा सकें। इस अभियान के दौरान रामकिशन यादव जी ने मध्य प्रदेश समेत सभी राज्यों के नेताओं का सहारा लेकर अपने अभियान को बढाया, जिनमें भ्रष्टाचार के आरोपित और आयकर के छापों में सप्रमाण रेखांकित नेता भी सम्मलित है, और प्रचार प्रभावित लोगों को अपनी आयुर्वेदिक दवाओं का ग्राहक बनाया है। जो दवाएं बाज़ार में अपेक्षाकृत सस्ती मिलती हैं वे ही रामदेव जी की फैक्ट्री में मँहगी मिलती हैं, किंतु टीवी कार्यक्रम से सम्मोहित लोग उन्हें ही खरीदते हैं। आज उनके आश्रम से जुड़ी संस्थाओं की सम्पत्ति 750 करोड़ के आस पास तक पहुँच गयी बताई जाती है। देश और विदेश में उनके आश्रम ने ज़मीनों में निवेश किया हुआ है।
राजनीतिज्ञों द्वारा महत्व दिये जाने से उत्साहित बाबा रामदेव स्वयं ही राजनीति में सक्रिय होने को व्याकुल हो उठे और उन्होंने भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाना चाहा, जिसके प्रति पीड़ित जनता सबसे अधिक संवेदनशील है। जहाँ एक ओर उनकी बात का असर हुआ वहीं दूसरी ओर जो लोग उनके समर्थन की सम्भावना से अपनी राजनीति का लाभ देख रहे थे, वे बौखला उठे। एक सभा में लालूप्रसाद् बोले कि “यह ठीक नहीं कि अपने को सही साबित करने के लिए रामदेव प्रत्येक नेता की आलोचना करें, हक़ीक़त यह है कि बाबा बौरा गये हैं, हमने उनसे कहा था कि वे कोई राजनीतिक दल खड़ा न करें। उनके कैंसर को ठीक करने के दावे की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि रिसर्च के इस युग में यह ठीक नहीं है, इस युग में ऐसा करना न केवल धोखाधड़ी है अपितु लोगों को बेबकूफ बनाना है।“
भाजपा के नवनियुक्त राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने भी कहा कि मैं बाबा से निवेदन करता हूं कि वे राजनीतिक दल न बनाएं उनकी मांगों को हम भाजपा द्वारा पूरी करवायेंगे।
बाबा रामदेव की यह बात लोगों को हज़म नहीं हो रही है कि बाबा एक ओर तो भ्रष्टाचार के खिलाफ पार्टी बनाने का दावा करें और दूसरी ओर भ्रष्टाचार के प्रामाणिक आरोपों वाले मंत्रियों से सुसज्जित मध्य प्रदेश राज्य जैसे मंत्रिमण्डल के मुख्यमंत्री के साथ गलबहियां करें। वे एक ओर तो अपने आरोपों को हवाई बना कर जनता का भावनात्मक समर्थन पा लेना चाहते हैं वहीं दूसरी ओर किसी व्यक्ति विशेष पर उंगली न उठा कर अपने लक्ष्य को सुविधानुसार घुमाने की नीति अपनाये हुये हैं। इससे ज्यादा अच्छा काम तो पत्रकार कर रहे हैं नाम और प्रमाण के साथ आरोप लगा रहे हैं और स्टिंग आपरेशन कर रहे हैं। बाबा ने अभी तक यह नहीं बताया कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए वे वैधानिक तरीका अपनाएंगे या देश के कानून तोड़कर काम करेंगे, और यदि वैधानिक तरीके पर चले तो भ्रष्टाचार का पता लगाने के लिए, प्रमाण जुटाने के लिए और उनके आधार पर इसी न्याय व्यवस्था में शीघ्र और सुनिश्चित दण्ड की व्यवस्था के लिये वे क्या करेंगे। उनके द्वारा इस काम के लिये नियुक्त लोग भारतीय पुलिस, प्रशासनिक अधिकारी, या आयकर अधिकारी की तरह व्यवहार नहीं करने लगेंगे इस बात की क्या गारण्टी होगी?
उनकी इन महात्वाकांक्षाओं से सर्वाधिक नुकसान उस योग का होगा जो अभी उन पर विश्वास होने के कारण लोकप्रिय होता जा रहा था। वे योग गुरू की तरह लोकप्रिय हुये हैं तो उसी काम को बेहतर ढंग से करें यही ज्यादा अच्छा है फिल्म स्टारों और क्रिकेट खिलाड़ियों की तरह लोकप्रियता को उपभोक्ता सामग्री बेचने जैसे कामों में लगाने जैसा काम न करें। उंसे पहले भी कुछ लोग अपनी लोकप्रियता को राजनीति से भुनाने की कोशिश में असफल हो चुके हैं जिनमें फणेशवर नाथ रेणु, गोपाल दास नीरज, नबाब पटौदी, प्रकाश झा, आदि सैकड़ों नाम हैं। भ्रष्टाचार किसी व्यक्ति के बूते का काम नहीं है उसे पूरी व्यवस्था का साथ मिल रहा है और भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए पूरी व्यवस्था बदलनी पड़ेगी जो एक समर्पित संगठन और कार्यक्रम के बिना सम्भव नहीं। यह संगठन और कार्यक्रम तब बनेगा जब उसके लिए ईमानदार इरादा हो और कोई निहित स्वार्थ न हो। बेहतर तो यह होगा कि वे पूरे देश की जगह किसी एक नेता और किसी एक क्षेत्र से शुरुआत करें। दूसरा सन्देश यह भी मिलता है कि नेताओं के बीच जातिवादी प्रेम तभी तक रहता है जब तक वह उसे लाभ दिला रहा हो। समय बतायेगा कि बाबा की महात्वाकाँक्षाएं उन्हें सफल करती हैं या असफल करती हैं।
वीरेन्द्र जैन
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